न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के निवारण के लिए आंतरिक न्याय तंत्र एक ढकोसला है; देश भर में पारदर्शिता चाहती है अदालत लेकिन अपने घर में नहीं

सुभाष चन्द्र

मार्च, 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से कथित तौर पर 15 हज़ार करोड़ रूपए के अधजले नोट मिलने से भ्रष्टाचार का संगीन मामला सामने आया लेकिन आंतरिक जांच के नाम पर उस मामले को दबा दिया गया न्यायपालिका ने किसी जज के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए अनुमति देना भी चीफ जस्टिस के हाथ में रखा हुआ है ऐसे में भ्रष्टाचार कैसे रुक सकता है क्योंकि वह तो ऊपर से नीचे के तरफ बहता है सुप्रीम कोर्ट के जजों ने 25 वर्ष तक अपनी Assets & Liabilities भी देना जरूरी नहीं समझा था और आज भी सभी जज ऐसा नहीं कर रहे हैं यह भी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है। 

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तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने 4 अप्रैल, 2022 को लोकसभा को बताया था कि 5 वर्ष में (1/1/ 2017 से 31/12 /2021) हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की 1631 शिकायत मिली जो चीफ जस्टिस को भेजी गई थी तब से अब तक 4 वर्ष बीत गए लेकिन किसी को कुछ नहीं पता चला कि शिकायतों के क्या हुआ

अब 13 फरवरी 2026 को कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने लोकसभा में सूचना दी है कि पिछले 10 वर्षों में (2016 से 2025 तक) विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कार्यरत जजों के खिलाफ 8630 शिकायत प्राप्त हुई किरेन रिजिजू के द्वारा जो समय बताया गया, उसे देख कर लगता है करीब 7 हज़ार शिकायत तो अप्रैल 2022 से दिसंबर, 2025 के बीच ही आई हैं

आंतरिक जांच के नाम पर शिकायतों पर हुई कार्रवाई को गोपनीय रखना अपने आप में भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है आखिर जनता को पता चलना चाहिए किस जज के खिलाफ शिकायत हुई, किसने जांच की और जांच में क्या निकला और अगर शिकायत सही पाई गई तो जज के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई इतना ही नहीं यह भी पता चलना चाहिए कि शिकायत साबित होने के बाद क्या उस जज को हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन तो नहीं दिया गया

प्रधानमंत्री तक को तो लोकपाल की जांच के दायरे में रखा गया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट तो जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों पर लोकपाल द्वारा की जा रही कार्रवाई को भी रोक देता है जिसका मतलब साफ़ है कि न्यायपालिका प्रधानमंत्री की भ्रष्टाचार पर Zero Tolerance में सबसे बड़ा रोड़ा है

देश में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की जड़ तो कॉलेजियम सिस्टम है जो 35 साल से एक गैर संवैधानिक और गैर कानूनी प्रक्रिया न्यायपालिका ने देश पर थोपा हुआ है जिसमें किसी तरह की कोई पारदर्शिता नहीं है अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के 5 जजों को Adhoc appointment पर रखा है जिनमें 3 मुस्लिम हैं यानी 60% आरक्षण मुस्लिमों को दे दिया इस तरह की नियुक्तियां बिना लेनदेन संभव ही नहीं हैं

कितने ही लोगों को न्यायपालिका जमानत देने को आमादा रहती है जिनके खिलाफ ED पुख्ता  सबूत जुटा कर गिरफ्तार करती है लेकिन जब से जस्टिस खानविलकर की पीठ ने PMLA एक्ट में ED की शक्तियों को उचित कहा है, तभी से अलग अलग हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट उस फैसले को कुंद करने में लगे हैं और ED को कमजोर कर रहे हैं याद होगा अच्छे भले ED के डायरेक्टर संजय कुमार मिश्रा की बीआर गवई बलि लिए बिना नहीं माने थे

चीफ जस्टिस सूर्यकांत कुछ अलग हटकर फैसले ले रहे हैं और इसलिए उनसे उम्मीद करते हैं कि वे जजों के विरुद्ध शिकायतों की खुली जांच करें और उन शिकायतों पर हुई कार्रवाई को हर 3 महीने बाद सार्वजनिक करें अभी तक 8630 शिकायतों का क्या हुआ, यह भी सार्वजनिक किया जाए

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