अभी 10 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन वी अंजारिया की पीठ ने 5 साल की बच्ची के बलात्कारी और हत्यारे अतुल निहाले की फांसी की सजा पर तब तक के लिए रोक लगा दी जब तक उसकी अपील पर निर्णय न ले लिए जाए। यह कोई पहला मामला नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट या विभिन्न हाई कोर्ट अपराधियों के प्रति दया न दिखाई हो और यही कारण है बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं जिसकी जिम्मेदारी अदालतों को लेनी होगी।
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वर्तमान केस 24 सितंबर, 2024 का है जिसमें ट्रायल कोर्ट ने 18 मार्च, 2025 को (केवल 6 महीने में) BNS और पोक्सो एक्ट में आरोपी को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। सजायाफ्ता ने हाई कोर्ट में अपील की लेकिन जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रामकुमार चौबे की खंडपीठ ने जनवरी, 2026 में फांसी की सजा को बरकरार रखा। तारीखों पर ध्यान दीजिए। मात्र 16 महीने में ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों से फैसले दे दिए। इससे जल्द न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अटका दी।
The High Court “rejected mitigating factors such as his socio-economic background, marital status, and family responsibilities, holding that these could not outweigh the gravity of the offence. It had observed that the assault reflected a lust-driven barbarity and an utter disregard for human dignity, particularly that of a defenceless child”.
हाई कोर्ट ने आरोपी के उस दावे को भी ख़ारिज कर दिया जिसमें कहा गया था (जैसा लगभग सब मामलों में कहा जाता है) कि उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी। कोर्ट ने कहा मेडिकल रिपोर्ट ऐसा कुछ नहीं कहती कि उसे अपने एक्शन्स पर कोई कंट्रोल नहीं था। ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने उसके अपराध को “rarest of the rare” कहा।
आज मैंने कहीं यह भी पढ़ा था कि सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल और हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के साथ यह भी जानकारी मांगी है कि अभियुक्त का जेल में बर्ताव कैसा रहा है। क्या डेढ़ साल में अच्छा आचरण उसकी सजा को बदलने के लिए संज्ञान में लाया जाना चाहिए? हो सकता है कि अगर अच्छे आचरण की रिपोर्ट मिले तो सुप्रीम कोर्ट उसे जमानत दे दे और फिर केस चलता रहे।
न्यायपालिका की सभी अदालतों को बच्चियों पर होने वाले सेक्स अपराधों पर निर्णय देते हुए सही मायने में “application of mind” apply करना चाहिए क्योंकि गलत फैसले समाज पर बुरा असर डाल रहे हैं। अपराधी का हौसला बढ़ता ही इसलिए है कि उसे विश्वास दिला दिया जाता है कि तुम्हारा कुछ नहीं होगा 10 साल तो लग ही जायेंगे। एक नहीं अनेक केस है जिनमे गलत फैसले हुए हैं। एक जज भाई साहब ने 5 वक्त की नमाज़ के आधार पर ही सजा कम कर दी थी -ऐसे भी निर्णय होते है?

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