7 देशों पर हमला और 34 ट्रिलियन का कर्ज, Petro-Dollar का अंत

                                                                                                                        प्रतीकात्मक तस्वीर
अमेरिका के हाल के दिनों के रुख को देखकर यह साफ संकेत मिल रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को लागू करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह रणनीति अब और अधिक आक्रामक रूप में दिखाई दे रही है। फरवरी 2026 में एक महत्वपूर्ण घटना हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप ने एक ‘अंतरिम व्यापार ढाँचे’ की घोषणा की थी।

इस समझौते में भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिली थी और टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया। हालाँकि, अमेरिकी विदेश नीति का यह संतुलन ज्यादा दिन नहीं टिक सका। ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव और ट्रंप प्रशासन की आक्रामक नीतियों ने इस कूटनीतिक मिठास को जल्दी ही खत्म कर दिया।

इसी बीच, अमेरिका ने अब एक बार फिर अपनी सख्त व्यापारिक रणनीति का संकेत देते हुए Section 301 (US Trade Act 1974) का सहारा लिया है। यह प्रावधान अमेरिका को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी देश की व्यापार नीतियों की गहराई से जाँच कर सके। इस प्रक्रिया को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के माध्यम से संचालित किया जाता है।

यदि इस जाँच में किसी भी प्रकार की ‘अनुचित व्यापारिक प्रथाएँ’ (Unfair Trade Practices) सामने आती हैं तो अमेरिका को यह अधिकार मिल जाता है कि वह संबंधित देश पर अतिरिक्त टैरिफ लगा सके या मौजूदा व्यापारिक समझौतों को निलंबित कर दे। यह वही रणनीति है, जिसका इस्तेमाल ट्रंप प्रशासन ने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के खिलाफ किया था।

ट्रंप की मजबूरी या सोची-समझी चाल?

अमेरिका की नीति में अचानक आए इस बदलाव के पीछे एक अहम वजह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला माना जा रहा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के कुछ ग्लोबल टैरिफ टूल्स को स्ट्राइक डाउन यानी रद्द कर दिया था। इसके बाद से ही प्रशासन पर यह दबाव बढ़ गया कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नए रास्ते तलाशे।

ऐसे में अब ट्रंप प्रशासन वैकल्पिक उपायों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश करता नजर आ रहा है। Section 301 जैसी कानूनी शक्तियों का सहारा लेना इसी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका का आरोप है कि भारत समेत दुनिया की 16 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ‘Structural Excess Capacity’ यानी जरूरत से कहीं अधिक उत्पादन क्षमता की समस्या है। अमेरिका का कहना है कि इन देशों में सरकारी सब्सिडी और नीतियों के कारण उद्योगों में उत्पादन क्षमता इतनी बढ़ गई है कि वे अपनी घरेलू जरूरत से ज्यादा सामान बना रहे हैं।

इसका सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ रहा है। अमेरिका का दावा है कि इस ओवरप्रोडक्शन के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुओं की भरमार हो रही है, जिससे कीमतें प्रभावित होती हैं और कई देशों को ट्रेड सरप्लस का फायदा मिलता है। वहीं, इसका नुकसान अमेरिकी उद्योगों और वहाँ के रोजगार पर पड़ता है।

ट्रंप प्रशासन इसे अमेरिकी नौकरियों के लिए खतरे के रूप में पेश कर रहा है। इसी आधार पर अब वह सख्त कदम उठाने की तैयारी में है ताकि घरेलू उद्योगों को सुरक्षा दी जा सके और वैश्विक व्यापार में अमेरिका की स्थिति को मजबूत किया जा सके।

भारत पर निशाना क्यों?

अमेरिका की नई व्यापारिक सख्ती में भारत भी सीधे निशाने पर आ गया है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ‘ट्रेड सरप्लस’ है यानी भारत, अमेरिका को उसकी खरीद से करीब $58 बिलियन अधिक का निर्यात करता है।

इसके अलावा ‘Excess Capacity’ (अधिक क्षमता) भी एक बड़ा कारण है। सोलर मॉड्यूल्स के मामले में भारत की उत्पादन क्षमता अपनी घरेलू माँग से लगभग तीन गुना अधिक है। यही स्थिति स्टील, टेक्सटाइल, पेट्रोकेमिकल्स और ऑटोमोटिव सेक्टर्स में भी है जिससे अमेरिका को ग्लोबल मार्केट में असंतुलन का खतरा नजर आता है।

हालाँकि इस जाँच के दायरे में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि चीन, यूरोपियन यूनियन, जापान और वियतनाम समेत कुल 16 देश शामिल हैं। यदि यह जाँच आगे चलकर टैरिफ में बदलती है तो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स और सोलर उपकरणों का निर्यात महँगा हो जाएगा। ऐसे में वैश्विक बाजार में एक नया ट्रेड वॉर शुरू हो जाएगा।

शांति से शक्ति पर लौटे ट्रंप?

जनवरी 2025 में ट्रंप ने खुद को शांति स्थापित करने वाले नेता के रूप में पेश करते हुए सत्ता संभाली थी। लेकिन सिर्फ एक साल के भीतर ही अमेरिका का रुख पूरी तरह बदलता नजर आया और उसने 7 देशों पर सीधे सैन्य हमले कर दिए।

हालात इतने गंभीर हो गए कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अपहरण और ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या जैसी घटनाओं की चर्चा होने लगी। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सब केवल तेल और संसाधनों के लिए हो रहा है या इसके पीछे डॉलर के उस वैश्विक दबदबे को बचाने की कोशिश है जिसे कुछ लोग कमजोर होता हुआ मान रहे हैं।

अमेरिका की बौखलाहट के पीछे क्या वजह है?

अमेरिका के आक्रामक रुख को समझने के लिए सबसे जरूरी है- नंबर्स को देखना। GDP की दौड़ में अब तस्वीर बदल रही है। 2026 के आँकड़ों के मुताबिक, BRICS+ देशों की संयुक्त GDP (PPP के आधार पर) वैश्विक GDP का करीब 37% से 40% तक पहुँच चुकी है। वहीं, G7 देशों (अमेरिका और उसके साथी) की हिस्सेदारी घटकर लगभग 29% रह गई है। यह बदलाव सीधे-सीधे वैश्विक ताकत के संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

दूसरा बड़ा झटका ‘पेट्रो-डॉलर’ सिस्टम को लग रहा है। 1970 के दशक में हेनरी किसिंजर की पहल पर अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अहम समझौता हुआ था, जिसके तहत तेल का व्यापार सिर्फ डॉलर में होता था। इससे डॉलर पूरी दुनिया की जरूरत बन गया। अब हालात बदल रहे हैं चीन और सऊदी अरब के बीच तेल का व्यापार युआन में होने लगा है, जिससे इस व्यवस्था की पकड़ कमजोर हो रही है।

डॉलर की स्थिति भी धीरे-धीरे कमजोर होती दिख रही है। IMF के अनुसार, वैश्विक रिजर्व करेंसी में डॉलर की हिस्सेदारी 2001 में 71% थी जो 2026 तक घटकर 58% से नीचे आ गई है। ऐसे में जब आर्थिक ताकत पर दबाव बढ़ता है और वैश्विक प्रभाव को चुनौती मिलने लगती है। सवाल यही है कि क्या अमेरिका अपनी ताकत दिखाने के लिए आक्रामक कदम उठा रहा है?

परफॉर्मेटिव रियलिज्म: ट्रंप की इंटरनल पॉलिटिक्स

क्या यह सिर्फ अमेरिका की विदेश नीति है? तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। यह अंदरूनी राजनीति का दबाव भी है जो अब बाहरी फैसलों में झलक रहा है। सबसे पहले आर्थिक स्थिति को देखें। अमेरिका का राष्ट्रीय कर 34 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुँच चुका है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के लिए डॉलर की वैश्विक माँग बनाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि इसमें गिरावट अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल सकती है।

दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर भी चुनौती बढ़ रही है। 2026 में ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट देखी जा रही है। महँगाई और टैरिफ वॉर से परेशान अमेरिकी जनता में असंतोष बढ़ा है और बड़ी संख्या में लोग इन नीतियों के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं।

इसी संदर्भ में एक्सपर्ट्स ‘परफॉर्मेटिव रियलिज्म’ की बात करते हैं यानी ऐसी नीतियाँ और कार्रवाइयाँ जिनका उद्देश्य वास्तविक समाधान से ज्यादा अपनी ताकत का प्रदर्शन करना होता है। ईरान जैसे मामलों में की गई सैन्य कार्रवाई को कुछ विश्लेषक इसी नजरिए से देखते हैं, जहाँ कदम रणनीति से ज्यादा संदेश देने के लिए उठाए जाते हैं।

ट्रंप पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी कम नहीं है। NATO के पारंपरिक सहयोगी अब पहले जैसे साथ खड़े नहीं दिख रहे। कई यूरोपीय देशों के साथ मतभेद सामने आए हैं, जिससे अमेरिका की वैश्विक पकड़ पर असर पड़ा है। आर्थिक मोर्चे पर लिए गए फैसलों खासकर भारी टैरिफ और व्यापार युद्ध ने सप्लाई चेन को भी प्रभावित किया है। वहीं सुप्रीम द्वारा कुछ टैरिफ फैसलों पर रोक लगने से प्रशासन को झटका भी लगा है।

अमेरिका के सामने असली चुनौती उसकी आर्थिक स्थिति है यानी बढ़ता कर्ज, बजट घाटा और डॉलर पर निर्भरता। अगर दुनिया डॉलर से दूरी बनाती है तो ट्रेजरी बॉन्ड बेचना मुश्किल हो जाएगा, ब्याज दरें बढ़ेंगी और सरकार को या तो टैक्स बढ़ाने होंगे या सैन्य खर्च घटाना पड़ेगा। इसका सीधा मतलब होगा अमेरिका की ‘एकमात्र सुपरपावर’ वाली स्थिति पर असर पड़ेगा।

इसी दबाव का असर वैश्विक स्तर पर भी दिख रहा है। ग्लोबल साउथ के देश धीरे-धीरे अमेरिकी वित्तीय सिस्टम से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे ‘Decoupling’ कहा जा रहा है। उधर चीन इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी ताकत तेजी से बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिका की नई रक्षा रणनीति भी संकेत देती है कि वह वैश्विक सुरक्षा का बोझ सहयोगी देशों पर डालते हुए अपने क्षेत्रीय प्रभुत्व को मजबूत करना चाहता है।

इस पूरे परिदृश्य में चाहे ट्रंप हों या कोई और राष्ट्रपति, अमेरिका की प्राथमिकताएँ लगभग एक जैसी ही रहतीं चीन के प्रभाव को सीमित करना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना और BRICS देशों की डी-डॉलराइजेशन की कोशिशों को कमजोर करना। भू-राजनीतिक लक्ष्य वही हैं बस उन्हें हासिल करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।

तेल पर अमेरिकी नियंत्रण की कोशिश

अमेरिका की हालिया कार्रवाइयों का पैटर्न देखने पर एक बात साफ उभरती है निशाने पर वही देश हैं जिनके पास बड़े ऊर्जा संसाधन हैं। जिन 7 देशों पर कार्रवाई की बात हो रही है, उनमें ईरान, इराक, नाइजीरिया, वेनेजुएला और सीरिया जैसे प्रमुख तेल उत्पादक शामिल बताए जाते हैं। वेनेजुएला में की गई कार्रवाई का लक्ष्य उसके विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण बताया जा रहा है, जबकि ईरान के संदर्भ में इसे उभरते ऊर्जा गठबंधनों को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

नाइजीरिया में दिसंबर 2025 की एयर स्ट्राइक को कुछ विश्लेषक अफ्रीका में बढ़ते चीन के प्रभाव को सीमित करने और खनिज संसाधनों पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति मानते हैं। नाइजीरिया के मामले में अमेरिका ने ‘Country of Particular Concern (CPC)’ का हवाला दिया यह टैग आमतौर पर धार्मिक स्वतंत्रता या मानवाधिकार के मुद्दों से जोड़ा जाता है। ऐसे लेबल कई बार कूटनीतिक दबाव बनाने के औजार बन जाते हैं।

ईरान ने निकाल दिया अमेरिका का ‘तेल’

इराक के युद्ध की तरह ही ट्रंप प्रशासन पर आरोप है कि उसने ईरान में ‘तत्काल परमाणु खतरे’ का दावा किया, जबकि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) या अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास इसके स्पष्ट सबूत सामने नहीं आए।
यह संदेश सिर्फ ईरान के लिए नहीं बल्कि भारत और चीन जैसे देशों के लिए भी माना जा रहा है कि डॉलर से दूरी की कीमत भारी हो सकती है। लेकिन इसी रणनीति में एक बड़ी चुनौती भी छिपी है। ईरान जैसे देश पर हमला वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सीधे प्रभावित करता है क्योंकि दुनिया की बड़ी तेल सप्लाई इस क्षेत्र से गुजरती है।
ऐसे में तेल की कीमतें 150 डॉलर तक पहुँचने का जोखिम बढ़ सकता है जिसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। किसी देश में घुसकर वहाँ के राष्ट्रपति को पकड़ लाना आसान है लेकिन युद्ध के बीच दुनिया की 20% तेल सप्लाई को बचाए रखना नामुमकिन है। तख्तापलट करना तो अमेरिका को आता है लेकिन $150 तक पहुँचने वाले तेल के दाम और टूटी हुई इकोनॉमी को संभालने का उसके पास कोई प्लान नहीं है।

अगला शिकार: ग्रीनलैंड और संसाधन युद्ध

अब नजर ग्रीनलैंड पर है, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है जहाँ सिर्फ 56000 लोग रहते हैं। ट्रंप ने तो यहाँ तक कह दिया है कि ‘या तो ग्रीनलैंड हमें दे दो, वरना हम छीन लेंगे।’ कम आबादी वाला यह इलाका रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
पहला कारण इसकी लोकेशन है- यह ऐसा स्थान है जहाँ से अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य गतिविधियों पर नजर रख सकता है। दूसरा कारण यहाँ मौजूद रेयर अर्थ मिनरल्स हैं, जो आधुनिक टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और AI के लिए जरूरी हैं। तीसरा कारण वैश्विक दबदबा है- अमेरिका नहीं चाहता कि उसके प्रतिद्वंद्वी यहाँ पैर जमाएँ।

अस्त होता अमेरिकी साम्राज्य का सूर्य

अमेरिका आज पहले जैसा संतुलित वैश्विक नेता नहीं रह गया है बल्कि एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ उसकी साख और प्रभाव दोनों चुनौती के घेरे में हैं। इराक में बोले गए झूठ और अफगानिस्तान में मिली हार ने उसकी अजेय होने की छवि को खत्म कर दिया है, इसलिए अब वह अपनी गिरती हुई ‘सॉफ्ट पावर’ को सैन्य ताकत के जोर पर छिपाने की कोशिश कर रहा है।

आर्थिक मोर्चे पर भी स्थिति बदलती दिख रही है। लंबे समय तक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ रहा पेट्रो-डॉलर सिस्टम अब दबाव में है। BRICS जैसे समूहों का बढ़ता प्रभाव और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर काम इस बदलाव को साफ दिखाता है।

ब्रिक्स देश अब ‘BRICS Pay’ और डिजिटल मुद्राओं के जरिए डॉलर के बिना व्यापार करना सीख चुके हैं। भारत जैसी शक्तियाँ अब अमेरिका की धमकियों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। इस तरह से अमेरिका की यह आक्रामकता उसकी मजबूती नहीं उसकी कमजोरी का सबसे बड़ा सबूत है। ऐसी ‘महाशक्ति’ जब संवाद छोड़ दे और सिर्फ डंडे का इस्तेमाल करे तो समझ लीजिए कि उस साम्राज्य का सूर्यास्त करीब है।

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