Love Jihad: जबरन धर्मांतरण के बाद ‘मिस इंडिया अर्थ’ की अब सनातन में घर वापसी, सायाली बोलीं- ‘आतिफ से शादी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल’


महाराष्ट्र के पुणे के पिंपरी-चिंचवाड की रहने वाली और ‘मिस इंडिया अर्थ 2019’ की विजेता रहीं सायली सुर्वे ने इस्लाम से हिंदू धर्म में घर वापसी की है। दरअसल, यह लव-जिहाद की जड़ों में मठ्ठा डालने वाला साहसी कदम है। इससे बेटियों की आंखें जरूर खुलेंगी, जो लव जिहाद में अंधी होकर बिना सोचे-समझे कदम उठा लेती हैं। सायली ने माना कि उसने आतिफ के प्यार में पड़कर सब कुछ छोड़ा, मगर आतिफ ने उसके साथ सिर्फ ज्यादती की। उन्होंनें शौहर आतिफ तासे पर मारपीट और धर्मांतरण के गंभीर आरोप लगाए हैं। सुर्वे का कहना है कि आतिफ से शादी के बाद उनका जबरन धर्मांतरण कराया गया और उन्हें लगातार मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। अब उन्हें हिंदू धर्म में वापस लौटते हुए बेहद खुशी हो रही है। उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘आद्या सुर्वे’ रख लिया है।

परिवार के विरोध के बावजूद आतिफ तासे से की थी लव मैरिज

सौंदर्य प्रतियोगिता ‘मिस इंडिया अर्थ 2019’ का खिताब जीतकर देशभर में पहचान बनाने वाली सयाली सुर्वे एक बार फिर चर्चा में हैं। लेकिन इस बार वजह ग्लैमर की दुनिया में कोई नई उपलब्धि नहीं, बल्कि उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा एक साहसी और आंखे खोलने वाला फैसला है। सायाली ने पुणे के पिंपरी-चिंचवाड में आयोजित एक समारोह में फिर से हिंदू धर्म अपना लिया। उनके इस फैसले ने एक बार फिर उस बहस को हवा दे दी है, जिसे देश में “लव जिहाद” के नाम से जाना जाता है। सायली के अनुसार, उन्होंने परिवार के विरोध के बावजूद मीरा-भायंदर के उद्यमी आतिफ तासे से लव मैरिज की थी। कुछ समय तक सब ठीक था, लेकिन फिर उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाने लगा। उनसे मारपीट की गई, जबरन इस्लाम कबूल करवाकर उनका नाम ‘अतेज़ा तासे’ कर दिया गया। बाद में दोनों के चार बच्चे हुए। मॉडल होने के बावजूद सायली अपने बच्चों की खातिर सबकुछ सहती रहीं।

पुलिस से नहीं मिला न्याय, हिंदू संगठन बने घर वापसी का जरिया

ब्यूटी पेजेंट रहीं सायली ने मीडिया को बताया, “परिवार के विरोध के बावजूद आतिफ तासे से शादी करना मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। शादी के बाद मैंने काफी कुछ झेला। मैंने कई बार पुलिस से मदद की गुहार लगाई, लेकिन मुझे वहाँ से कोई न्याय नहीं मिला।” उन्होंने आगे बताया कि अंत में उन्होंने हिंदुत्ववादी संगठनों से संपर्क किया, जिनकी मदद से उनकी ‘घर वापसी’ संभव हो पाई। पिंपरी-चिंचवड में वैदिक मंत्रोच्चार और होम-हवन के जरिए शुद्धिकरण की प्रक्रिया पूरी की गई। सायाली का मामला केवल एक व्यक्ति के निजी जीवन का निर्णय नहीं रह गया है। यह तेजी से एक सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। जब कोई सार्वजनिक पहचान रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में इस तरह का बड़ा निर्णय लेता है, तो स्वाभाविक रूप से वह समाज में व्यापक चर्चा का कारण बनता है।

सोशल मीडिया से राजनीतिक मंचों तक सुर्खियों में लव-जिहाद

सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक यह सुर्खियों में है और इसे लव-जिहाद का ताजा मामला बताया जा रहा है। दरअसल, जब ऐसे संबंधों में धोखे, दबाव या हिंसा के आरोप सामने आते हैं, तब मामला केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता। तब यह सामाजिक विश्वास और पारदर्शिता का भी प्रश्न बन जाता है। यही कारण है कि ऐसे मामलों को लेकर समाज में गहरी प्रतिक्रिया देखने को मिलती है। इससे न केवल दो व्यक्तियों के बीच बल्कि समुदायों के बीच भी अविश्वास पैदा होता है। समाज के लिए यह एक गंभीर चेतावनी होती है कि रिश्तों में ‘अपना धर्म’ होने के साथ-साथ पारदर्शिता और ईमानदारी कितनी जरूरी है। यदि कहीं अन्याय या उत्पीड़न होता है, तो उसका विरोध होना चाहिए।  

देशभर में 10 राज्यों में जबरन धर्मांतरण विरोधी कानून लागू

दरअसल, सायाली का यह कोई पहला मामला नहीं है। देशभर के कई राज्यों में चल रहा लव जिहाद भोली-भाली हिंदू युवतियों को प्रलोभन, लालच देकर प्रेम के जाल में फंसाने, मुस्लिम आबादी बढ़ाने और धर्मांतरण को बढ़ावा देने की सुनियोजित साजिश है। वास्तव में लव जिहाद आतंकवाद का ही दूसरा महीन चेहरा है। यह हिंदू बेटियों पर अंतहीन अत्याचार, उनके धर्मांतरण और जिहाद की जुगुत्सा का बेहद वीभत्स और जीवंत चेहरा है। इसी के चलते उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी ‘लव जिहाद’ के मामलों पर लगाम कसने के लिए बेहद सख्त कदम उठाया था। यूपी विधानसभा में उप्र विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक-2024 पास किया। यूपी में भी  लव जिहाद के दोषियों को पहली बार उम्रकैद तक की सजा होगी। अवैध मतांतरण की गंभीर घटनाओं की रोकथाम के लिए सरकार ने कानून का दायरा और सजा की अवधि बढ़ाई गई है। देशभर में 10 राज्यों में जबरन धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं। उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात, झारखंड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा में ये कानून हैं। 

खड़गे साहब, क्या कांग्रेस ने प्यार निभाना भी सीखा है; मोदी से देवगौड़ा की शादी से परेशान होने से पहले अपने घर को देख लेते तो बेहतर था

सुभाष चन्द्र

कांग्रेस के नाम के अध्यक्ष खड़गे साहेब को जेडीएस नेता देवगौड़ा से बड़ी तकलीफ हुई है। उनके राज्यसभा से रिटायर होने पर  खड़गे ने कहा कि पता नहीं क्या हो गया जो देवगौड़ा जी ने प्यार तो हमसे किया लेकिन शादी मोदी से की ऐसी तड़प दिखाने से पहले खड़गे साहेब को याद रखना चाहिए था कि प्यार निभाना भी होता है जबकि कांग्रेस ने गैरों को तो छोड़िए अपनों को धोखा देने में भी कोई कमी नहीं की

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जेडीएस से कर्नाटक में सरकार बनाकर कांग्रेस कुमारस्वामी की मुख्यमंत्री रहते हुए उसकी ऐसी दुर्गति कर दी कि मीडिया के सामने उसे फूट फूट कर रोना पड़ा और अब कहते हो कि देवगौड़ा ने हमसे प्यार किया और शादी मोदी से की खड़गे साहेब मोदी ने कभी देवगौड़ा का गलती से भी कभी कोई अपमान नहीं किया जबकि आप लोगों ने देवगौड़ा की पार्टी के पीठ में खंजर घोपने का काम किया

आप गैरों की बात क्यों करते हो, अपने घर की हालत देखो जिस दिन आप देवगौड़ा पर विलाप कर रहे थे, उसी दिन असम कांग्रेस के लोकसभा सांसद प्रद्युत बारदोलोई कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में चले गए उन्होंने कहा कि पार्टी में उनका दम घुटता है, उन्हें अपमानित किया जाता रहा है यानी प्रद्युत को भी मोदी से प्रेम हो गया उसके पहले फरवरी में असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोराह राहुल गांधी से 15 मिनट बात करने के बाद कांग्रेस छोड़ने के लिए Convince हो गए और भाजपा में चले गए उसके साथ ही पार्टी के उपाध्यक्ष नवज्योति ताल्लुकदार भी पार्टी छोड़ गए

अब ऐसे लोगों के साथ भी कांग्रेस “प्यार” नहीं निभा सकी और बरस रहे हो देवगौड़ा पर ओडिशा में कांग्रेस के 3 विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में भाजपा को वोट दे दिए, वो सस्पेंड कर दिए गए -बिहार और हरियाणा में भी बगावत हुई कौन जिम्मेदार है? खड़गे जी आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है 

हरियाणा में पार्टी अध्यक्ष आप बना नहीं सके असम में बागड़ोर गौरव गोगोई के हाथ में दी हुई  है जो खुद पाकिस्तान के साथ संबंध होने के आरोप झेल रहा है और AIUDF भी कांग्रेस से किनारा कर रही है जो पिछले चुनाव में आपके साथ थी बंगाल में क्या होगा कुछ पता नहीं क्योंकि अधीर रंजन चौधरी का भी मुंह फूला हुआ है केरल में शशि थरूर किधर चला जाए आपको पता नहीं तमिलनाडु में द्रमुक अबकी बार कितनी घास डालेगी कांग्रेस को अभी पत्ते नहीं खुले हैं

खड़गे साहब आपकी पार्टी के निर्लज्ज लोग सुबह उठते है और मोदी के घर की तरफ मुंह करके उसे गाली बकना शुरू कर देते है देश के खिलाफ कुछ भी हो जाए कांग्रेस की ख़ुशी ठिकाना नहीं रहता गाज़ा और ईरान के लिए टसुए बहाती है कांग्रेस लेकिन कभी बांग्लादेश में हिंदुओं के कत्लेआम पर एक शब्द नहीं बोली इतना ही नहीं ऑपेरशन सिंदूर पर सेना पर उंगली उठाती  रही कांग्रेस जबकि पाकिस्तान को मोदी ने 4 दिन में घुटनों पर ला दिया कितनी घटिया सोच है कांग्रेस की जो हर हाल में पाकिस्तान के साथ खड़ी रहती है और जो अफगानिस्तान में पाकिस्तान द्वारा 400 निर्दोष लोगों की हत्या पर भी खामोश हो गई

खड़गे जी, आप और आपके लोग मोदी से नफरत करते रहो लेकिन यह याद रहे मोदी ऐसा फूल है जिसकी तरफ हर कोई आकर्षित हो रहा है आपके विलाप का कोई असर नहीं है

गंगा में हड्डी ही तो फेंकी है, हिंदू तो अस्थियाँ बहाते हैं… लेफ्ट-लिबरल गैंग कर रहा मुस्लिम युवकों की घृणा का बचाव, कांग्रेसी बता रहे ‘इफ्तार’

 
वाराणसी में 14 मुसलमानो को भ्रम हो गया कि उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस सत्ता में आ गई और यह दोगले गंगा जैसी पवित्र नदी में मंदिरों के बीच नाव पर मटन और चिकन के साथ रोजा इफ्तार की पार्टी किये और गंगा नदी में ही इन्होंने हड्डियां और मांस के टुकड़े फेके और इनका दुःसाहस देखीये कि उन्होंने उसका बाकायदा वीडियो भी बनाया
इन सभी 14 मुसलमानो को गिरफ्तार कर लिया गया है,आज अगर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्ता में होती तो इन सभी 14 मुसलमानो को अखिलेश यादव यश भारती पुरस्कार से सम्मानित करते क्योंकि समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता और कांग्रेस के बड़े नेता अजय राय उनके समर्थन में खड़े हो गए
                 गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी करने वाले मुस्लिमों के बचाव में उतर कांग्रेस का क्या एजेंडा
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले से गंगा नदी में नॉनवेज बिरयानी खाकर इफ्तार पार्टी करते नाव पर सवार कुछ मुस्लिम युवकों का वीडियो सामने आया। वीडियो पर संज्ञान लेते हुए बीजेपी के महानगर युवा अध्यक्ष रजत जायसवाल ने FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 14 लोगों को गिरफ्तार किया। अब इस घटना पर कांग्रेस और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम इन मुस्लिम लोगों का बचाव करने पर उतर गया है।
कांग्रेसियों को सनातन धर्म में पवित्र माने जाने वाली गंगा नदी में नॉनवेज बिरयानी का सेवन करना गलत नहीं लगा। उल्टा सनातनियों की आस्था पर सवाल करना शुरू कर दिया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत का सवाल है कि आखिर इन मुस्लिम लोगों ने कौन-सा कानून तोड़ा है? वह पूछती हैं कि इनका पाप क्या है? और यह पूछते हुए वह समाज पर सवाल खड़े करती हैं कि आज के समय में समाज किस ओर जा रहा है?
क्योंकि वे आरोपित मुस्लिमों के असली पाप को अपने पोस्ट में खुद ही छिपा लेती हैं। उनकी जानकारी में यह सिर्फ एक इफ्तार पार्टी थी, जिसे रमजान के महीने में हर मुस्लिम को करने का मजहबी हक है। लेकिन वह इस तथ्य को छिपाती हैं कि वह पवित्र गंगा नदी में नॉनवेज खा रहे थे और यह भी कि उन्होंने चबाई हुई हड्डियाँ तक माँ गंगा के पवित्र जल में फेंकीं। और यह कृत्य बिंदू माधव के धरहरा मंदिर के ठीक सामने किया गया।
इफ्तार पार्टी बताकर इसे सही ठहराने वाली कांग्रेस किस मदरसे की दीन दे रही है, क्योंकि मौलवी तो खुद इसे गलत ठहरा रहे हैं। वाराणसी के ही अंजुमन इन्तेजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव एसएम यासीन ने इसकी निंदा की है। उन्होंने कहा कि इफ्तार एक शुद्ध धार्मिक कार्य है, कोई पिकनिक नहीं है। उन्होंने यह भी साफ कहा कि इफ्तार के बाद तुरंत मगरिब की नमाज जरूरी है।
कांग्रेस तथ्यों को आसानी से छिपाना जानती है, क्योंकि इससे उन मुस्लिम लोगों की सच्चाई सामने आती है कि उन्होंने ऐसा जानबूझ कर किया था। शायद यह कांग्रेस के लिए सेकुलरिज्म दिखाने का तरीका हो सकता है। लेकिन यही कांग्रेस दिल्ली के उत्तम नगर में हिंदू युवक तरुन की हत्या पर सवाल नहीं करती, तब नहीं पूछती कि उसका पाप क्या था? तब पूछा नहीं जाता कि होली पर सिर्फ एक गुब्बारा फेंकने पर क्यों मुस्लिमों की भावनाएँ आहत हो जाती हैं? इन मामलों में देश को कट्टर मजहबी मानसिकता की ओर बढ़ते देखे जाने पर सवाल नहीं किए जाते हैं।

गंगा में हड्डियाँ फेंकना अपराध नहीं, और अस्थियाँ विसर्जित करने पर सवाल

लेकिन वाराणसी के इस मामले को लेकर सनातन लोगों की आस्था क्यों आहत हुई? इस पर कांग्रेस इकोसिस्टम धड़ल्ले से सवाल कर रहा है। बिना यह जाने कि सनातन में गंगा नदी और बनारस के घाटों की क्या मान्यताएँ हैं। ऐसे ही इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के वसीम अकरम त्यागी की भी परेशानी सुप्रिया श्रीनेत जैसी ही है। वही भी पूछ रहे हैं कि गिरफ्तार किए गए मुस्लिम लोगों का अपराध क्या है? इतना ही नहीं वे गंगा नदी की पवित्रता पर भी सवाल उठा रहे हैं।
वसीम अकरम का कहना है, “अपराध क्या है? नाव में चिकन बिरयानी खाना या गंगा में हड्डी फेंकना? अब सवाल यह है कि यह अपराध कैसे है? अगर यह अपराध है तो फिर इसी गंगा में अस्थियाँ विसर्जित की जाती हैं! तब तो वो भी अपराध है? इसी गंगा के तट पर जगह-जगह शमशान घाट हैं, जली अधजली लाशें उसमें बहा दी जाती हैं, तब तो वह भी अपराध है? इसी गंगा में जाने कितने ऐसे जीव हैं जो मांसाहारी हैं, तब उनका गंगा में रहना ही अपराध है? सरकार गंगा से उन तमाम जीवों को बाहर निकालेगी?”
यह व्यक्ति गंगा नदी में हड्डी फेंकने पर पूछता है कि अपराध क्या है? और इसी हवाले से गंगा में अस्थियाँ विसर्जित करना इसे अपराध लगने लगता है। इतना ही नहीं गंगा के पास शमशान घाट से लेकर नदी में जीवों से भी इसे परेशानी होने लगती है। सिर्फ इसीलिए क्योंकि इसके मुस्लिम भाइयों के कृत्य पर पुलिस ने संज्ञान लिया, जो कि जानबूझ कर धार्मिक भावनाओं को उकसाने के लिए किया गया था। शायद इसे अस्थियाँ बहाने और हड्डियाँ फेंकने में कोई अंतर नजर नहीं आता।

क्या है गंगा नदी से जुड़ी हिंदुओं की आस्था? अस्थियों और हड्डियों में फर्क

वाराणसी के इस मामले में मुस्लिमों के इफ्तार पार्टी की करने से कोई दिक्कत नहीं है, समस्या यहाँ गंगा नदी में मांस खाने से है। जिसे वह इफ्तार पार्टी के नाम पर खा रहे हैं। गंगा नदी को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र नदी मानी जाती है, जिसे देवी के रूप में पूजा जाता है। यह पापों का नाश करने वाली, मोक्ष प्रदान करने वाली और जीवन का आधार है।
वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में गंगा को देवनदी कहा गया है। राजा भागीरथ की तपस्या से भगवान शिव ने गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा, ताकि सगर के 60,000 पुत्रों को मोक्ष मिले। गंगा स्नान से पाप धुलते हैं और पुण्य प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गंगा नदी का जल पूजा-अर्चना, अभिषेक और शुद्धिकरण में जरूरी है। कुंभ मेला जैसा उत्सव गंगा तट पर होते हैं। इसे जीवनदायिनी माँ गंगा कहा जाता है।
बात है गंगा नदी में अस्थियाँ विसर्जित करने की तो, गरुण पुराण के अनुसार, दाह संस्कार के बाद अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने से मृत आत्मा को मोक्ष, स्वर्ग या ब्रह्मलोक मिलता है। गंगा स्वर्ग से आई होने से पितरों की आत्मा मुक्त हो जाती है, पुनर्जन्म चक्र टूटता है।
गंगा नदी को लेकर हिंदू धर्म में ये सिर्फ कुछ मान्यताएँ हैं, ऐसी कई कथाएँ हैं जो गंगा नदी को लेकर प्रचलित हैं। जिन पर हिंदू धर्म टिका हुआ है। इन्हीं मान्यताओं के कारण हिंदू धर्म की भावनाओं का आहत होना संभव है। यहाँ हड्डियाँ फेंकने और अस्थियाँ बहाने का फर्क भी साफ हो जाता है। यही वजह है कि वाराणसी के मामले में मुस्लिमों द्वारा जानबूझ कर की गई नॉनवेज इफ्तार पार्टी से धार्मिक भावनाएँ होती हैं।

हिंदू सहिष्णु हो सकता है, लेकिन मुस्लिमों की तरह हिंसा के बजाए कानूनी कार्रवाई करना जानता है

गंगा नदी के प्रति हिंदुओं की आस्था को लेकर भारत का हर नागरिक वाखिफ है। शायद मुस्लिम इसे ज्यादा ठीक ढंग से समझते हैं। तभी जानबूझ कर इफ्तार पार्टी करने के लिए गंगा नदी पहुँच जाते हैं। यह सांप्रदायिक हिंसा भड़काने जैसा कृत्य नहीं तो और क्या है? क्या कभी किसी हिंदू को मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ते देखा गया, नहीं। लेकिन आए दिन मंदिर के पास मांस के टुकड़े फेंक दिए जाते हैं।
यह जानबूझ कर नहीं, तो और किसलिए किया गया हो सकता है। जो कांग्रेस और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम सवाल पूछ रहा है कि वाराणसी के मामले में मुस्लिमों का क्या अपराध था? उनकी सेकुलर चादर सिर्फ हिंदुओं पर आकर ढक जाती है, जबकि मुस्लिमों को सेकुलरिज्म सिखाने के लिए उनकी चादर फट जाती है। क्योंकि सब जानते हैं कि हिंदू धर्म सहिष्णु है, वह मुस्लिमों की तरह अल्लाह के अपमान पर किसी का सर तन से जुदा नहीं करता।
वह कानूनी कार्रवाई करना जानता है, जैसा कि वाराणसी के मामले में हुआ भी। संविधान के तहत पहले पुलिस से शिकायत हुई और कानूनी प्रक्रिया के तहत गिरफ्तारी की गई। वह धर्म के नाम पर हिंसा फैलाना नहीं जानते हैं। बावजूद इन कांग्रेसी औऱ लेफ्ट लिबरल इकोसिस्म को देश की हालत सिर्फ इन मामलों में याद आती है, वही मुस्लिमों की कट्टरपंथ के नाम पर हिंसा पर चुप्पी साध लेते हैं। और मामूली इफ्तार पार्टी करने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की बात करते हैं।

7 देशों पर हमला और 34 ट्रिलियन का कर्ज, Petro-Dollar का अंत

                                                                                                                        प्रतीकात्मक तस्वीर
अमेरिका के हाल के दिनों के रुख को देखकर यह साफ संकेत मिल रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को लागू करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह रणनीति अब और अधिक आक्रामक रूप में दिखाई दे रही है। फरवरी 2026 में एक महत्वपूर्ण घटना हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप ने एक ‘अंतरिम व्यापार ढाँचे’ की घोषणा की थी।

इस समझौते में भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिली थी और टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया। हालाँकि, अमेरिकी विदेश नीति का यह संतुलन ज्यादा दिन नहीं टिक सका। ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव और ट्रंप प्रशासन की आक्रामक नीतियों ने इस कूटनीतिक मिठास को जल्दी ही खत्म कर दिया।

इसी बीच, अमेरिका ने अब एक बार फिर अपनी सख्त व्यापारिक रणनीति का संकेत देते हुए Section 301 (US Trade Act 1974) का सहारा लिया है। यह प्रावधान अमेरिका को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी देश की व्यापार नीतियों की गहराई से जाँच कर सके। इस प्रक्रिया को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के माध्यम से संचालित किया जाता है।

यदि इस जाँच में किसी भी प्रकार की ‘अनुचित व्यापारिक प्रथाएँ’ (Unfair Trade Practices) सामने आती हैं तो अमेरिका को यह अधिकार मिल जाता है कि वह संबंधित देश पर अतिरिक्त टैरिफ लगा सके या मौजूदा व्यापारिक समझौतों को निलंबित कर दे। यह वही रणनीति है, जिसका इस्तेमाल ट्रंप प्रशासन ने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के खिलाफ किया था।

ट्रंप की मजबूरी या सोची-समझी चाल?

अमेरिका की नीति में अचानक आए इस बदलाव के पीछे एक अहम वजह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला माना जा रहा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के कुछ ग्लोबल टैरिफ टूल्स को स्ट्राइक डाउन यानी रद्द कर दिया था। इसके बाद से ही प्रशासन पर यह दबाव बढ़ गया कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नए रास्ते तलाशे।

ऐसे में अब ट्रंप प्रशासन वैकल्पिक उपायों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश करता नजर आ रहा है। Section 301 जैसी कानूनी शक्तियों का सहारा लेना इसी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका का आरोप है कि भारत समेत दुनिया की 16 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ‘Structural Excess Capacity’ यानी जरूरत से कहीं अधिक उत्पादन क्षमता की समस्या है। अमेरिका का कहना है कि इन देशों में सरकारी सब्सिडी और नीतियों के कारण उद्योगों में उत्पादन क्षमता इतनी बढ़ गई है कि वे अपनी घरेलू जरूरत से ज्यादा सामान बना रहे हैं।

इसका सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ रहा है। अमेरिका का दावा है कि इस ओवरप्रोडक्शन के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुओं की भरमार हो रही है, जिससे कीमतें प्रभावित होती हैं और कई देशों को ट्रेड सरप्लस का फायदा मिलता है। वहीं, इसका नुकसान अमेरिकी उद्योगों और वहाँ के रोजगार पर पड़ता है।

ट्रंप प्रशासन इसे अमेरिकी नौकरियों के लिए खतरे के रूप में पेश कर रहा है। इसी आधार पर अब वह सख्त कदम उठाने की तैयारी में है ताकि घरेलू उद्योगों को सुरक्षा दी जा सके और वैश्विक व्यापार में अमेरिका की स्थिति को मजबूत किया जा सके।

भारत पर निशाना क्यों?

अमेरिका की नई व्यापारिक सख्ती में भारत भी सीधे निशाने पर आ गया है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ‘ट्रेड सरप्लस’ है यानी भारत, अमेरिका को उसकी खरीद से करीब $58 बिलियन अधिक का निर्यात करता है।

इसके अलावा ‘Excess Capacity’ (अधिक क्षमता) भी एक बड़ा कारण है। सोलर मॉड्यूल्स के मामले में भारत की उत्पादन क्षमता अपनी घरेलू माँग से लगभग तीन गुना अधिक है। यही स्थिति स्टील, टेक्सटाइल, पेट्रोकेमिकल्स और ऑटोमोटिव सेक्टर्स में भी है जिससे अमेरिका को ग्लोबल मार्केट में असंतुलन का खतरा नजर आता है।

हालाँकि इस जाँच के दायरे में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि चीन, यूरोपियन यूनियन, जापान और वियतनाम समेत कुल 16 देश शामिल हैं। यदि यह जाँच आगे चलकर टैरिफ में बदलती है तो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स और सोलर उपकरणों का निर्यात महँगा हो जाएगा। ऐसे में वैश्विक बाजार में एक नया ट्रेड वॉर शुरू हो जाएगा।

शांति से शक्ति पर लौटे ट्रंप?

जनवरी 2025 में ट्रंप ने खुद को शांति स्थापित करने वाले नेता के रूप में पेश करते हुए सत्ता संभाली थी। लेकिन सिर्फ एक साल के भीतर ही अमेरिका का रुख पूरी तरह बदलता नजर आया और उसने 7 देशों पर सीधे सैन्य हमले कर दिए।

हालात इतने गंभीर हो गए कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अपहरण और ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या जैसी घटनाओं की चर्चा होने लगी। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सब केवल तेल और संसाधनों के लिए हो रहा है या इसके पीछे डॉलर के उस वैश्विक दबदबे को बचाने की कोशिश है जिसे कुछ लोग कमजोर होता हुआ मान रहे हैं।

अमेरिका की बौखलाहट के पीछे क्या वजह है?

अमेरिका के आक्रामक रुख को समझने के लिए सबसे जरूरी है- नंबर्स को देखना। GDP की दौड़ में अब तस्वीर बदल रही है। 2026 के आँकड़ों के मुताबिक, BRICS+ देशों की संयुक्त GDP (PPP के आधार पर) वैश्विक GDP का करीब 37% से 40% तक पहुँच चुकी है। वहीं, G7 देशों (अमेरिका और उसके साथी) की हिस्सेदारी घटकर लगभग 29% रह गई है। यह बदलाव सीधे-सीधे वैश्विक ताकत के संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

दूसरा बड़ा झटका ‘पेट्रो-डॉलर’ सिस्टम को लग रहा है। 1970 के दशक में हेनरी किसिंजर की पहल पर अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अहम समझौता हुआ था, जिसके तहत तेल का व्यापार सिर्फ डॉलर में होता था। इससे डॉलर पूरी दुनिया की जरूरत बन गया। अब हालात बदल रहे हैं चीन और सऊदी अरब के बीच तेल का व्यापार युआन में होने लगा है, जिससे इस व्यवस्था की पकड़ कमजोर हो रही है।

डॉलर की स्थिति भी धीरे-धीरे कमजोर होती दिख रही है। IMF के अनुसार, वैश्विक रिजर्व करेंसी में डॉलर की हिस्सेदारी 2001 में 71% थी जो 2026 तक घटकर 58% से नीचे आ गई है। ऐसे में जब आर्थिक ताकत पर दबाव बढ़ता है और वैश्विक प्रभाव को चुनौती मिलने लगती है। सवाल यही है कि क्या अमेरिका अपनी ताकत दिखाने के लिए आक्रामक कदम उठा रहा है?

परफॉर्मेटिव रियलिज्म: ट्रंप की इंटरनल पॉलिटिक्स

क्या यह सिर्फ अमेरिका की विदेश नीति है? तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। यह अंदरूनी राजनीति का दबाव भी है जो अब बाहरी फैसलों में झलक रहा है। सबसे पहले आर्थिक स्थिति को देखें। अमेरिका का राष्ट्रीय कर 34 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुँच चुका है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के लिए डॉलर की वैश्विक माँग बनाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि इसमें गिरावट अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल सकती है।

दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर भी चुनौती बढ़ रही है। 2026 में ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट देखी जा रही है। महँगाई और टैरिफ वॉर से परेशान अमेरिकी जनता में असंतोष बढ़ा है और बड़ी संख्या में लोग इन नीतियों के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं।

इसी संदर्भ में एक्सपर्ट्स ‘परफॉर्मेटिव रियलिज्म’ की बात करते हैं यानी ऐसी नीतियाँ और कार्रवाइयाँ जिनका उद्देश्य वास्तविक समाधान से ज्यादा अपनी ताकत का प्रदर्शन करना होता है। ईरान जैसे मामलों में की गई सैन्य कार्रवाई को कुछ विश्लेषक इसी नजरिए से देखते हैं, जहाँ कदम रणनीति से ज्यादा संदेश देने के लिए उठाए जाते हैं।

ट्रंप पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी कम नहीं है। NATO के पारंपरिक सहयोगी अब पहले जैसे साथ खड़े नहीं दिख रहे। कई यूरोपीय देशों के साथ मतभेद सामने आए हैं, जिससे अमेरिका की वैश्विक पकड़ पर असर पड़ा है। आर्थिक मोर्चे पर लिए गए फैसलों खासकर भारी टैरिफ और व्यापार युद्ध ने सप्लाई चेन को भी प्रभावित किया है। वहीं सुप्रीम द्वारा कुछ टैरिफ फैसलों पर रोक लगने से प्रशासन को झटका भी लगा है।

अमेरिका के सामने असली चुनौती उसकी आर्थिक स्थिति है यानी बढ़ता कर्ज, बजट घाटा और डॉलर पर निर्भरता। अगर दुनिया डॉलर से दूरी बनाती है तो ट्रेजरी बॉन्ड बेचना मुश्किल हो जाएगा, ब्याज दरें बढ़ेंगी और सरकार को या तो टैक्स बढ़ाने होंगे या सैन्य खर्च घटाना पड़ेगा। इसका सीधा मतलब होगा अमेरिका की ‘एकमात्र सुपरपावर’ वाली स्थिति पर असर पड़ेगा।

इसी दबाव का असर वैश्विक स्तर पर भी दिख रहा है। ग्लोबल साउथ के देश धीरे-धीरे अमेरिकी वित्तीय सिस्टम से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे ‘Decoupling’ कहा जा रहा है। उधर चीन इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी ताकत तेजी से बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिका की नई रक्षा रणनीति भी संकेत देती है कि वह वैश्विक सुरक्षा का बोझ सहयोगी देशों पर डालते हुए अपने क्षेत्रीय प्रभुत्व को मजबूत करना चाहता है।

इस पूरे परिदृश्य में चाहे ट्रंप हों या कोई और राष्ट्रपति, अमेरिका की प्राथमिकताएँ लगभग एक जैसी ही रहतीं चीन के प्रभाव को सीमित करना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना और BRICS देशों की डी-डॉलराइजेशन की कोशिशों को कमजोर करना। भू-राजनीतिक लक्ष्य वही हैं बस उन्हें हासिल करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।

तेल पर अमेरिकी नियंत्रण की कोशिश

अमेरिका की हालिया कार्रवाइयों का पैटर्न देखने पर एक बात साफ उभरती है निशाने पर वही देश हैं जिनके पास बड़े ऊर्जा संसाधन हैं। जिन 7 देशों पर कार्रवाई की बात हो रही है, उनमें ईरान, इराक, नाइजीरिया, वेनेजुएला और सीरिया जैसे प्रमुख तेल उत्पादक शामिल बताए जाते हैं। वेनेजुएला में की गई कार्रवाई का लक्ष्य उसके विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण बताया जा रहा है, जबकि ईरान के संदर्भ में इसे उभरते ऊर्जा गठबंधनों को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

नाइजीरिया में दिसंबर 2025 की एयर स्ट्राइक को कुछ विश्लेषक अफ्रीका में बढ़ते चीन के प्रभाव को सीमित करने और खनिज संसाधनों पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति मानते हैं। नाइजीरिया के मामले में अमेरिका ने ‘Country of Particular Concern (CPC)’ का हवाला दिया यह टैग आमतौर पर धार्मिक स्वतंत्रता या मानवाधिकार के मुद्दों से जोड़ा जाता है। ऐसे लेबल कई बार कूटनीतिक दबाव बनाने के औजार बन जाते हैं।

ईरान ने निकाल दिया अमेरिका का ‘तेल’

इराक के युद्ध की तरह ही ट्रंप प्रशासन पर आरोप है कि उसने ईरान में ‘तत्काल परमाणु खतरे’ का दावा किया, जबकि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) या अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास इसके स्पष्ट सबूत सामने नहीं आए।
यह संदेश सिर्फ ईरान के लिए नहीं बल्कि भारत और चीन जैसे देशों के लिए भी माना जा रहा है कि डॉलर से दूरी की कीमत भारी हो सकती है। लेकिन इसी रणनीति में एक बड़ी चुनौती भी छिपी है। ईरान जैसे देश पर हमला वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सीधे प्रभावित करता है क्योंकि दुनिया की बड़ी तेल सप्लाई इस क्षेत्र से गुजरती है।
ऐसे में तेल की कीमतें 150 डॉलर तक पहुँचने का जोखिम बढ़ सकता है जिसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। किसी देश में घुसकर वहाँ के राष्ट्रपति को पकड़ लाना आसान है लेकिन युद्ध के बीच दुनिया की 20% तेल सप्लाई को बचाए रखना नामुमकिन है। तख्तापलट करना तो अमेरिका को आता है लेकिन $150 तक पहुँचने वाले तेल के दाम और टूटी हुई इकोनॉमी को संभालने का उसके पास कोई प्लान नहीं है।

अगला शिकार: ग्रीनलैंड और संसाधन युद्ध

अब नजर ग्रीनलैंड पर है, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है जहाँ सिर्फ 56000 लोग रहते हैं। ट्रंप ने तो यहाँ तक कह दिया है कि ‘या तो ग्रीनलैंड हमें दे दो, वरना हम छीन लेंगे।’ कम आबादी वाला यह इलाका रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
पहला कारण इसकी लोकेशन है- यह ऐसा स्थान है जहाँ से अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य गतिविधियों पर नजर रख सकता है। दूसरा कारण यहाँ मौजूद रेयर अर्थ मिनरल्स हैं, जो आधुनिक टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और AI के लिए जरूरी हैं। तीसरा कारण वैश्विक दबदबा है- अमेरिका नहीं चाहता कि उसके प्रतिद्वंद्वी यहाँ पैर जमाएँ।

अस्त होता अमेरिकी साम्राज्य का सूर्य

अमेरिका आज पहले जैसा संतुलित वैश्विक नेता नहीं रह गया है बल्कि एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ उसकी साख और प्रभाव दोनों चुनौती के घेरे में हैं। इराक में बोले गए झूठ और अफगानिस्तान में मिली हार ने उसकी अजेय होने की छवि को खत्म कर दिया है, इसलिए अब वह अपनी गिरती हुई ‘सॉफ्ट पावर’ को सैन्य ताकत के जोर पर छिपाने की कोशिश कर रहा है।

आर्थिक मोर्चे पर भी स्थिति बदलती दिख रही है। लंबे समय तक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ रहा पेट्रो-डॉलर सिस्टम अब दबाव में है। BRICS जैसे समूहों का बढ़ता प्रभाव और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर काम इस बदलाव को साफ दिखाता है।

ब्रिक्स देश अब ‘BRICS Pay’ और डिजिटल मुद्राओं के जरिए डॉलर के बिना व्यापार करना सीख चुके हैं। भारत जैसी शक्तियाँ अब अमेरिका की धमकियों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। इस तरह से अमेरिका की यह आक्रामकता उसकी मजबूती नहीं उसकी कमजोरी का सबसे बड़ा सबूत है। ऐसी ‘महाशक्ति’ जब संवाद छोड़ दे और सिर्फ डंडे का इस्तेमाल करे तो समझ लीजिए कि उस साम्राज्य का सूर्यास्त करीब है।

डोनाल्ड ट्रंप ने जो किया, वो तो गलत किया था, उसका हिसाब बाद में भी हो सकता है, लेकिन अभी होर्मुज में उसे अकेला छोड़, NATO और EU देश, ईरान को अपना मित्र समझने की भूल न करें

सुभाष चन्द्र

डोनाल्ड ट्रंप ने पूरे विश्व में जो “टैरिफ” आतंक मचाया था, उसका वह दाव तो अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ही उल्टा कर दिया। निश्चित रूप से ट्रंप ने हर देश को अपना दुश्मन बना लिया था। इसके अलावा “ग्रीनलैंड” को लेकर पूरे EU से दुश्मनी मोल ले ली थी मोदी जैसे मित्र को भी दूर कर लिया था NATO से भी बाहर होने की बात उसने की थी जिसमें दोष NATO देशों का भी था क्योंकि बजट का हिस्सा अधिकांश देश नहीं दे रहे थे

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ट्रंप को पता नहीं था कि एक दिन जिन देशों को ठेंगा दिखा रहा है “टैरिफ” ठोक कर, कल उसे उन्हीं की जरूरत पड़ेगी ईरान से युद्ध होना कोई नई बात नहीं थी ईरान केवल इज़रायल और अमेरिका के लिए खतरा नहीं था बल्कि उसका “इस्लामिक परमाणु बम” किसी के लिए भी खतरा हो सकता है लेकिन यह बात आज NATO और EU देश नहीं समझ रहे 

होर्मुज पर कंट्रोल के लिए जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान समेत सभी ने अपने जंगी जहाज़ भेजने से मना कर दिया है हो सकता है ये सभी देश ट्रंप से अपना टैरिफ का हिसाब चुकता कर रहे हों लेकिन ट्रंप की हजार गलतियों के बावजूद उसे होर्मुज में अकेला छोड़ना कोई समझदारी नहीं है NATO और EU ये समझने की भूल न करें कि ऐसा करने से ईरान उनका मित्र बन जाएगा ईरान का लक्ष्य इज़रायल को दुनिया के नक़्शे से मिटाना है और उसके लिए ही उसने हमास, हिज्बुल्ला और हूती जैसे आतंकी संगठन खड़े किये हुए है

अमेरिका-इज़रायल का ईरान से युद्ध एक ईसाई-मुस्लिम युद्ध में बदल चुका है, या कहे तो इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में बदल चुका है, जिसमे इस्लामिक देश भी बंट चुके है ईरान की युद्ध में उपलब्धि अमेरिका के खिलाफ सीधी कुछ नहीं है, वह बस सुन्नी देशों में अमेरिका के अड्डों को निशाना बना रहा है ईरान तो सऊदी अरब यानी “अल्लाह के घर” को भी नहीं छोड़ रहा इसलिए आज अगर NATO और EU देशों के होर्मुज से वह तेल के जहाज निकाल भी देता है तब भी जरूरत पड़ने पर उन पर भी हमला कर सकता है जैसा ईरान से कहा भी है कि हमारी मिसाइल यूरोप तक मार कर सकती हैं

NATO और EU देशों को आभास होना चाहिए कि वे भी इस्लामिक कट्टरता और आतंकवाद का दंश झेल रहे हैं जिससे निपटने के लिए कल उन्हें भी अमेरिका और इज़रायल की जरूरत पड़ सकती है कहते है कि कभी भारतवर्ष के कई हिंदू राजा अपने ही साथी हिंदू राजाओं के खिलाफ मुगलों से मिल गए थे ऐसा इतिहास में ईसाईयों ने भी किया और अब फिर वही किया जा रहा है जो प्रमुख ईसाई और यहूदी देश को छोड़ कर ईसाई देश ईरान की तरफ  झुक रहे हैं एकजुटता का अभाव केवल हिंदुओं में ही नहीं रहा, ईसाइयों में भी रहा है और अब भी दिखाई दे रहा है

होर्मुज अगर ईरानी कब्जे में रहा तो NATO और EU देशों में गैस और तेल की कीमतें उनकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर देंगी ईरान उन्हें बचाने नहीं आएगा माना ट्रंप ने सबके साथ अपराध किया है लेकिन उसका हिसाब बाद में कर लेना परंतु अभी उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए वो युद्ध में घुसने के लिए नहीं कह रहा, बस होर्मुज पर कंट्रोल करने के लिए मदद मांग रहा है 

होर्मुज के बाद अब हूती संगठन Bab el-Mandeb Strait को बंद करने की धमकी दे रहा है

ईरान का साथ देने से पहले उसके हमास की 7 अक्टूबर 2024 की बर्बरता याद कर लेनी चाहिए, उसके बाद की इज़रायल की केवल प्रतिक्रिया नहीं

अब कहानी साफ़ हुई : मणिपुर में कांग्रेस की क्या खिचड़ी पकी थी और क्यों मोदी को मणिपुर भेजना चाहती थी कांग्रेस; कांग्रेस का हीरो है मैथ्यू

सुभाष चन्द्र

मणिपुर की हिंसा किसी विशेष वजह से नहीं थी बल्कि कांग्रेस की विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर रची हुई साजिश प्रतीत होती थी आखिर क्यों कांग्रेस के बड़े बड़े नेता प्रधानमंत्री मोदी को मणिपुर जाने की जिद करते थे और क्यों यूरोप के देश भी मणिपुर में रूचि दिखा रहे थे? यह भी याद रहे राहुल गांधी भी उन दिनों बेल्जियम जाकर यूरोपीय यूनियन के नेताओं से मणिपुर पर चर्चा करने गया था उसका मुख्य कारण था मणिपुर की घाटियों में घात लगा कर बैठे कुकी मोदी की हत्या करने में सक्षम थे अब मामला साफ़ होता नज़र आया है

NIA ने CIA के मिशनरी अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक को मणिपुर म्यांमार सीमा पर कुकी ईसाइयों को भारतीय सुरक्षाबलों से लड़ने की ट्रेनिंग देने के आरोप में पकड़ा है वैनडाइक को कोलकाता हवाई अड्डे पर आव्रजन ब्यूरो ने हिरासत में लिया, जबकि तीन-तीन यूक्रेनी नागरिकों को लखनऊ और दिल्ली के हवाई अड्डों पर हिरासत में लिया गया। ये सभी पर्यटक वीजा पर भारत में दाखिल हुए, गुवाहाटी पहुंचे, फिर मिजोरम गए और बिना अनुमति के प्रतिबंधित क्षेत्र (परमिट) में प्रवेश कर गए प्रतिबंधित क्षेत्र का उल्लंघन करने वाला पर्यटक, ऐसा कभी-कभार हो ही जाता है लेकिन एनआईए का कहना है कि वे म्यांमार में विद्रोही समूहों को पूर्वोत्तर भारत में हमले करने के लिए प्रशिक्षित करने गए थे 

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यह सभी कट्टर क्रिश्चियन है जो कुकी ईसाइयों को भारत सरकार से लड़ने के लिए आतंकवादी ट्रेनिंग दे रहे थे और यह म्यांमार में इनका आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप चल रहा है। 

इन्होंने यूरोप के कई देशों से ड्रोन के पार्ट इंपोर्ट किया और म्यांमार में बाकायदा इन्होंने ड्रोन असेंबली फैक्ट्री लगाई थी जहां ड्रोन को असेंबल कर कुकी आतंकियों को ट्रेनिंग देते थे 

अमेरिका की कुख्यात संस्था सीआईए कई तरीके से काम करती है

जैसे अगर किसी देश की सरकार अमेरिकी हितों के खिलाफ हो तो उसे सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए भी अपने लोगों को भेजती है जैसे उन्होंने बांग्लादेश में किया अब मैथ्यू के पीछे मणिपुर और अन्य भारतीय राज्यों में कहां कहां बलवा पैदा करने के लिए कौन था, कह नहीं सकते लेकिन जाहिर कुछ विदेशी शक्तियां निश्चित रूप से थी  

उसने यूक्रेन में भी वहां के नागरिकों को ट्रेनिंग दी थी और रूस में भी वहां के नागरिकों को ट्रेनिंग दिया है उसके बाद यह भारत में टूरिस्ट वीजा पर आया और मणिपुर होते हुए म्यांमार में उसने कई कुकी ट्रेनिंग कैंप चलाएं

कितने बड़े खतरे हैं देश के सामने जिनसे साधारण मानव का जीवन खतरे में पड़ सकता है लेकिन हमारे देश में कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग छोटी मोटी बातों पर अटके रहते हैं अब और कुछ नहीं तो दो दिन की गैस की लाइन से परेशान हो गए जबकि 12 साल से कभी कोई लाइन नहीं देखी लेकिन जो लाइन देखी, वो थी लगातार होने वाले बम धमाकों की, वो याद नहीं और तो और इतने गंभीर विषय पर भी एक दो तो लिख ही देंगे “जू जी छी लौल बैक”

NIA और अन्य सुरक्षा एजेंसियां सतर्क न हो तो देश को कुछ भी अहित हो सकता है - एजेंसियां कोई न कोई रोज साजिश बेनकाब कर रही हैं कल खबर थी दिल्ली से अमृतसर तक सेना की मूवमेंट पर नज़र रखने की पाकिस्तानी साजिश बेनकाब की गई आज खबर है अल-फलाल यूनिवर्सिटी नेटवर्क ध्वस्त होने के बाद जैश ने एक बार फिर रची थी बड़े हमले की साजिश

आज दुनिया भर में तेल और गैस का संकट है लेकिन फिर भी हम बहुत हद तक बचे हुए हैं, कम से कम इतना तो समझना ही चाहिए

हैदराबाद : अदरक-लहसुन पेस्ट के नाम पर परोसा जा रहा ‘जहर’, मिलावटखोर ‘शहजादा फूड मास्टर’ मोहम्मद जफर गिरफ्तार: 1155 किलो नकली पेस्ट और 2.5 लाख रूपए की मशीनरी जब्त

              नकली लहसुन-अदरक पेस्ट, आरोपित मोहम्मद ज़फ़र गिरफ्तार (साभार : X_@hydcitypolice)
हैदराबाद में मिलावटी पेस्ट बनाने का एक और मामला सामने आया है। कमिश्नर टास्क फोर्स (खैरताबाद जोन) ने टप्पाचाबुतरा इलाके में छापेमारी कर मोहम्मद जफर आलम को रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। आरोपित ‘सहारा इंडिया’ के नाम से बेहद अस्वच्छ परिस्थितियों में नकली पेस्ट तैयार कर रहा था। पुलिस ने मौके से 1,155 किलोग्राम मिलावटी पेस्ट और मशीनरी जब्त की है, जिसकी कीमत करीब 2.5 लाख रूपए आँकी गई है।

गंदगी के बीच साइट्रिक एसिड का खेल

जाँच में पता चला कि आरोपित मोहम्मद जफर आलम अदरक-लहसुन के पेस्ट में साइट्रिक एसिड और भारी मात्रा में नमक मिलाकर उसे तैयार करता था। यह काम धूल, मक्खियों और गंदगी के बीच खुले प्लास्टिक के डिब्बों में किया जा रहा था, जो इंसानी सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। हैरान करने वाली बात यह है कि आरोपित का FSSAI लाइसेंस जिस पते पर था, काम उससे अलग जगह पर अवैध रूप से चल रहा था।

हैदराबाद के होटलों में हो रही थी सप्लाई

यह मिलावटी और असुरक्षित पेस्ट हैदराबाद के थोक किराना स्टोरों और फूड कैटरिंग सेवाओं (होटल-शादियों) को धड़ल्ले से सप्लाई किया जा रहा था। इससे पहले भी मल्लेपल्ली इलाके में मोहम्मद फारूक नाम का शख्स ‘शहजादा फूड मास्टर’ के नाम से करीब 1,090 किलो नकली पेस्ट बनाते पकड़ा गया था। लगातार सामने आ रहे इन मामलों ने बाजार में मिलने वाले डिब्बाबंद मसालों की शुद्धता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कांग्रेसी ऐसे बोल रहे हैं जैसे वे सत्ता में होते तो देश में तेल और गैस की कमी नहीं होती, देखिए सच्चाई


जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गाँधी की सरकारों को छोड़ो, जब पायलट राजीव गांधी देश का प्रधानमंत्री बना था तब भी देश इतनी समस्याओं से झूझ रहा था कि अक्ल से पैदल महामूर्खों से भी महामूर्ख जनता कांग्रेस की चालों को नहीं समझ सकी।

इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में तो घर में बच्चे के मुंडन में 25 से ज्यादा लोगों के खाने पर पाबन्दी ही नहीं लड़के की शादी में 100 और लड़की की शादी में 200 से ज्यादा लोगों पर सख्त पाबन्दी होने के सिर्फ 100 आदमियों के भोजन की इजाजत थी बाकियों को चाय और पकोड़े खिलाने की इजाजत थी। अगर किसी वजह से छापा पड़ने पर आदेश का उलंघन पर जेल का प्रावधान था। इतना ही नहीं और आगे देखिए कांग्रेस सरकारों की जनता पर क्रूरता:-

1. दो बोरी सीमेंट के लिए तहसीलदार के दफ्तर से परमिट लेना पड़ता था।
2. चीनी के लिए राशन कार्ड की जरूरत थी। शादी ब्याह में एक बोरी चीनी के लिए जिला खाद्य निरीक्षक से परमिट लेना पड़ता था।
3. गैस कनेक्शन के लिए 5 से 7 साल का वेटिंग था।
साभार सोशल मीडिया 
4. गैस सिलेंडर के लिए मीलों लंबी लाइन लगती थी। सुबह 4 बजे से लोग गैस एजेंसी के सामने जमा हो जाते थे।
लोग गैस सिलेंडर ब्लैक में खरीदते थे।
5. बंद घी का टीन तक बेचने पर सख्ती थी।
6. 2014 के चुनाव में साल में सिर्फ 10 सिलेंडर देने का वादा कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक था।
यह सिलसिला सोनिया मनमोहन की सरकार तक जारी रहा है।
ईरान इजरायल युद्ध जो पूरे खाड़ी देशों में फैल गई है, गैस की आमद लगभग बंद हो गया है, की आड़ में कांग्रेस मोदी सरकार को घेरने की कोशिश में है।
कांग्रेसी आज के लौंडो को बरगला सकती है। जिसकी याददाश्त कमजोर नहीं है, जिन्होंने 2014 के पहले का जमाना देखा है, वे कांग्रेसियों के नकारेपन को कभी नहीं भूल सकते।
मोदी ने सत्ता संभालने के बाद गैस की उपलब्धता इतनी बढ़ा दी कि गरीब लोगों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिया जाने लगा।
अब सब को इतना तो समझ लेना चाहिए कि क्यों इन फट्टू चालाक तुच्चों ने हर घर तक LPG पहुंचाने की गलती क्यों नहीं की, क्यों कभी भी आने वाली आकस्मिक आपदा की वजह से कांग्रेस ने 60 साल बाद भी LPG की पहुंच करीब 50% तक ही रखी थी
अभी भी गैस की इतनी किल्लत नहीं हुई है कि लोग ज्यादा परेशान हों। जिन उद्योगों में LPG/PNG/LNG का इस्तेमाल होता है उन्हें कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया गया है ताकि डोमेस्टिक जरूरत पूरी हो सके।
तथ्य समझिए कि क्यों बेवजह LPG Cylinder की एजेंसी पर भीड़ लगी है लेकिन दूसरी तरफ सरकार कह रही है कि LPG Cylinders की कोई समस्या नहीं है, लेकिन चूंकि अफ़वाह उड़ा दी गई है कि LPG Cylinder नहीं मिलेगा जिसके चलते जो लोग एक दो महीने में 1 LPG Cylinder की बुकिंग करवाते थे वो भी 2 बुकिंग कर रहे हैं और दूसरी ओर जिनके घरों में Multiple कनेक्शन हैं वो भी एकसाथ Extra बुकिंग कर रहे हैं। Online Booking और Missed Phone Call के माध्यम से LPG Cylinder की बुकिंग करने वाली सुविधा कुछ समय के लिए बाधित हो गई है या कर दी गई है और जिसके चलते लोग Agency पर जाकर Booking करा रहे हैं, Offline वाले Cylinder उठाने के लिए वहां अलग से लगे हुए हैं।
समाजसेवक बने फिर रहे नेताओं से पूछो कि:-
लालू गाय-गोबर-दूध-दही बेच कर 2000 करोड़ का मालिक बन गया।
चिदंबरम गमला में गोभी उगा कर 4000 करोड़ का मालिक बन गया।...
अभी तो रुको
शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले 10 एकड़ जमीन में सब्जियों उगाके अरबों खरबों की मालिक बन गई।
और तो और फ़र्ज़ी गाँधी बिना कुछ किए 80000 करोड़ के मालिक बन गए।
टिकैत अनाज बेच कर 1500 करोड़ का मालिक बन गया।

सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री मोदी का अपमान चाहता है; यह साबित कर दिया नेहा राठौर को “अग्रिम जमानत” दे कर

सुभाष चन्द्र

मैं पहले ही कह चुका हूं देश में ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट बंद कर देने चाहिए क्योंकि जब हर काम सुप्रीम कोर्ट ने ही करना है तो उनका क्या लाभ है। जो प्रधानमंत्री मोदी को अपमानित करने कोई मौका नहीं छोड़ती बल्कि उन्हें अपमानित करने के बहाने ढूंढती फिरती है, उस नेहा राठौर को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह माना कि आरोपी जांच प्रक्रिया में शामिल हो चुकी है। कोर्ट ने कहा कि वह आगे भी जांच में सहयोग करती रहें अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के मुताबिक जांच एजेंसियां अपना काम जारी रखेंगी साथ ही आरोपी को जांच में पूरा सहयोग करना होगा कोर्ट ने यह भी कहा कि फिलहाल गिरफ्तारी जैसी कोई सख्त कार्रवाई जरूरी नहीं है इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत दी जा रही है

जांच में शामिल तो हो गई लेकिन यह भी देखिए कब तक जांच से भागती फिरती रही पुलिस के समन नकारती रही और शोर मचाती रही कि क्या पीएम से सवाल भी नहीं पूछ सकते हाई कोर्ट ने उसे अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया क्योंकि तब वह जांच में शामिल नहीं हो रही थी

इस बेलगाम महिला ने कहा था मोदी जी बिहार आए पाकिस्तान को धमकाने के लिए मोदी शाह और भाजपा पहलगाम जैसे मामलों से देश को युद्ध की तरफ धकेल रहे हैं अब इसमें जांच का क्या मतलब रह जाता जो एक के बाद एक कोर्ट से उसे छूट मिलती रही बोलने से पहले या कहो तो “भौंकने” से पहले नहीं सोचते कि परिणाम क्या हो सकता है अब बोला था तो केस को भुगतो और साबित करो कि सही कहा था। वह जांच में शामिल तब ही हुई जब उसने सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम याचिका दायर की

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जमानत मिलते ही उसका एक बयान देखा “खामनेई तेरी मर्दानगी को सलाम” अब आप इस बात का मतलब निकाल सकते हैं क्या कहना चाहती है और क्या इशारा कर रही है पीएम के लिए लेकिन उसे सब कुछ बकवास करने की छूट मिल गई है सुप्रीम कोर्ट से 

एक केस में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ वर्ष पहले व्यवस्था दी थी कि अग्रिम जमानत तब तक लागू रहती है जब तक केस का अंतिम निर्णय न हो जाए

आप याद कीजिए राहुल गांधी का बयान, उसके कहने का क्या मतलब था कि “ऐसा कैसे है कि सब मोदी चोर होते हैं” नाम नीरव मोदी का भी लिया लेकिन निशाना नरेंद्र मोदी ही थे सजा हुई 2 साल की और अगर वह सजा माफ़ नहीं हुई होती तो आज राहुल गांधी संसद में न होता और इस कदर विदेशों में जाकर मोदी और भारत का अपमान न कर रहा होता लेकिन उसे छोड़ दिया अपने को कांग्रेसी परिवार का बताकर जस्टिस गवई ने और उसे अभय दान दे दिया

4 दिसंबर, 2025 को जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने राहुल गांधी द्वारा सेना के अपमान मामले को 5 महीने के लिए स्थगित कर 22 अप्रैल, 2026 तारीख तय कर दी जिन जजों ने राहुल को फटकार लगाई थी, उन्हें ही बदल दिया गया और यह 22 अप्रैल भी आगे बढ़ेगी क्योंकि शबरीमला मंदिर की Review Petition की सुनवाई 8 साल बाद 9 जजों की बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल, 2026 तक करेगी अगर जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा को शबरीमला बेंच में शामिल कर लिया गया तो राहुल को एक बार और शायद 6 महीने की छूट मिल जाये वीर सावरकर के अपमान के लिए भी उसे झाड़ पड़ी थी आज किसी को पता नहीं सुप्रीम कोर्ट में उस केस का क्या स्टेटस है

संविधान और न्यायपालिका के प्रति संवेदनशील प्रधानमंत्री मोदी मिला हुआ है सुप्रीम कोर्ट को लेकिन उसे फिर भी वह कबूल नहीं है न्यायपालिका के जजों का भरतनाट्यम इंदिरा गांधी के सामने होता था क्या वही ठीक था?

‘भोपाल में ईद से पहले भिड़े मुस्लिम गुट :पेशाब की बूँदें टपकती हैं तो नहीं पढ़वा सकते नमाज’: ‘प्रोस्टेट’ पर दारुल इफ्ता ने दिया फतवा

          ईद से पहले भिड़े मुस्लिम गुट, 'प्रोस्टेट' पर दारुल इफ्ता ने दिया फतवा (साभार : Aajtak & Bhaskar)
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में ईद से ठीक पहले एक फतवे ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। दारुल इफ्ता की ओर से जारी एक मजहबी राय (फतवे) में कहा गया है कि अगर किसी व्यक्ति को प्रोस्टेट की बीमारी है या पेशाब टपकने की समस्या रहती है, तो वह इमामत नहीं कर सकता यानी दूसरों को नमाज नहीं पढ़ा सकता।

हालाँकि, इस दस्तावेज में किसी का नाम नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे सीधे तौर पर भोपाल के शहर काजी मुश्ताक अली नदवी से जोड़कर वायरल किया जा रहा है। मुस्लिम पर्व कमेटी ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे शहर काजी की छवि खराब करने की साजिश बताया है और जाँच की माँग की है।

क्या है इस फतवे में?

यह पूरा विवाद 9 मार्च 2026 को नायब मुफ्ती सैयद अहमद खान कासमी द्वारा जारी किए गए एक जवाब से शुरू हुआ। फतवे में शरीयत के नियमों का हवाला देते हुए बताया गया कि यदि किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी समस्या है जिसमें पेशाब की बूँदें अनियंत्रित रूप से टपकती हैं, तो वह व्यक्ति इमाम बनकर लोगों की नमाज की अगुवाई नहीं कर सकता। हालाँकि, वह अपनी नमाज खुद अदा कर सकता है। दारुल इफ्ता जामे एहतमाम मसाजिद कमेटी के नाम से निकले इस फतवे ने समाज के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है।

शहर काजी को निशाना बनाने का आरोप

इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी इस विवाद में कूद पड़ी। कमेटी के संरक्षक शमशुल हसन का कहना है कि ईद की नमाज से ठीक पहले इस तरह की जानकारी सार्वजनिक करना समाज में भ्रम फैलाने की कोशिश है।

शमशुल हसन ने सीधा आरोप लगाया कि यह फतवा शहर काजी मुश्ताक अली नदवी को निशाना बनाने के लिए जानबूझकर वायरल किया गया है। कमेटी के मुताबिक, फतवा जारी करने वाले मौलवी अब्दुल कलाम और इसके पीछे के लोगों की भूमिका संदिग्ध है। कमेटी ने मामले की पुलिस जाँच कराने के संकेत भी दिए हैं।

इस्लामिक जानकारों और संगठनों की राय

एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद ‘ताजुल मसाजिद’ में नमाज पढ़ाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मामले में मुस्लिम समाज दो धड़ों में बंटता नजर आ रहा है। एक तरफ जहाँ त्योहार कमेटी इसे साजिश बता रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ इस्लामिक जानकारों का मानना है कि यह केवल शरीयत के नियमों की एक साधारण व्याख्या है।

उनके अनुसार, मौलवी द्वारा दिए गए ऐसे जवाब अक्सर नियमों को स्पष्ट करने के लिए होते हैं और इन्हें किसी खास व्यक्ति से जोड़कर देखना गलत है। फिलहाल, भोपाल में इस मुद्दे को लेकर तनावपूर्ण चर्चाएँ जारी हैं और पुलिस प्रशासन भी स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

उत्तर प्रदेश : आपदा में अवसर तलाश करने वाले LPG की कालाबाजारी पर सख्त योगी सरकार, 4800+ जगहों पर छापेमारी: 70 FIR दर्ज, 10 गिरफ्तार

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कहते हैं "आपदा में अवसर" मिलना, पर इस बार पासा उल्टा पड़ गया और गैस माफियाओं का बरसों पुराना काला खेल बेनकाब हो गया...!
अभी कुछ पहले News18 पर एंकर रुबिका लियाकत के शो गूंज में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता प्रो धर्मेंद्र यादव के साथ आए कार्यकर्ता ने कहा कि "जिससे गैस लेते हैं वह अब 3000 रूपए में दे रहा है. .." जब उससे एजेंसी का नाम पूछा गया तो बता नहीं पाया, हालाँकि एंकर ने एजेंसी का नाम बताने के लिए बहुत जोर दिया, लेकिन अफवाह फ़ैलाने वाले ने नाम नहीं बताया। योगी सरकार को उस व्यक्ति की तलाश कर अफवाह फ़ैलाने के आरोप में सजा देनी चाहिए। भारत में वर्तमान में एलपीजी गैस की कोई कमी नहीं है, लेकिन सरकार ने भविष्य की सुरक्षा और आपूर्ति को सुव्यवस्थित बनाए रखने के लिए सावधानीवश गैस रिफिल बुकिंग हेतु 25 दिनों की समय सीमा निर्धारित कर दी है। सरकार का उद्देश्य प्रबंधन सुधारना था, किंतु इस नियम के लागू होते ही देश भर की गैस एजेंसियों पर मची अफरातफरी ने एक बहुत बड़े घोटाले की कलई खोलकर रख दी है।
सच्चाई यह है कि गैस एजेंसी मालिकों ने एक व्यवस्थित सिंडिकेट बना रखा था। ये लोग आम घरेलू उपभोक्ताओं के नाम पर, उनकी जानकारी के बिना ही स्वयं घरेलू गैस रिफिल बुक कर लेते थे और उन सिलेंडरों को ऊंचे दामों पर होटल, रेस्टोरेंट और औद्योगिक इकाइयों जैसे व्यावसायिक संस्थानों पर 'ब्लैक' में बेच रहे थे। जब तक बुकिंग की कोई समय सीमा नहीं थी, उपभोक्ता को पता ही नहीं चलता था कि उसके हिस्से की गैस कहीं और बेची जा चुकी है। किंतु अब जैसे ही 25 दिन की शर्त लागू हुई, और जब वास्तविक उपभोक्ता ने अपना सिलेंडर बुक करने का प्रयास किया, तो सिस्टम ने "Already Booked" दिखाकर बुकिंग रिजेक्ट कर दी। उपभोक्ता हैरान और परेशान कि उसने तो काफी समय यानि विगत एक महीने से सिलेंडर लिया ही नहीं तो फिर यह बुकिंग रिजेक्ट कैसे हो गई...?
उपभोक्ता पैनिक में आकर गैस एजेंसियों के बाहर बुकिंग अथवा सिलेंडर के लिए लाईन लगाकर खड़े हो गए...!
ऐसी स्थिति में एजेंसी मालिक मुंह छिपाकर भागने लगे या वहां हंगामा खड़ा होने लगा...!
क्यों...?
क्योंकि गैस कंपनियों के सिस्टम/सर्वर पर उपस्थित डाटा के अनुसार उपभोक्ता के सिलेंडर को तो गैस एजेंसी मालिकों ने बेच कर खा लिया था।
यह स्पष्ट है कि भारत में गैस की कोई किल्लत नहीं है, बल्कि यह कृत्रिम संकट इन बिचौलियों यानि गैस एजेंसी मालिकों की काली करतूतों का परिणाम है। सरकार के इस एक निर्णय ने घरेलू गैस की अवैध बिक्री के इस बड़े रैकेट को सार्वजनिक कर दिया है।
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच दुनियाभर में ऊर्जा का संकट पैदा हो गया है। भारत में भी ईंधन को लेकर कई नए नियम बनाए गए हैं और इस बीच देशभर में कालाबाजारी और जमाखोरी किए जाने के मामले सामने आए हैं।
इस बीच योगी आदित्यानाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने एलपीजी (LPG) की कालाबाजारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। पूरे उत्तर प्रदेश में प्रवर्तन टीमों ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाया।
आँकड़ों के अनुसार, 12 मार्च से सोमवार (16 मार्च) तक प्रदेश में कुल 4,816 जगहों पर निरीक्षण और छापेमारी की जा चुकी है। इस दौरान 70 FIR दर्ज की गई हैं जबकि 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। जाँच अधिकारियों ने बताया कि 67 लोग अवैध LPG गतिविधियों में संलिप्तता के शक में अभियोजन का सामना कर रहे हैं।
यह कार्रवाई ऐसे समय में की जा रही है जब देश के कई हिस्सों में मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण LPG की घबराहट में बुकिंग (Panic Booking) बढ़ने की समस्या सामने आ रही है। इसी को देखते हुए राज्य सरकार ने आपूर्ति व्यवस्था को दुरुस्त रखने के लिए निगरानी और सख्ती बढ़ा दी है।
अधिकारियों के मुताबिक, 4108 LPG वितरकों पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है ताकि उपभोक्ताओं को उनकी बुकिंग के अनुसार समय पर गैस सिलेंडर की डिलीवरी सुनिश्चित हो सके। सरकार ने LPG स्टॉक की नियमित समीक्षा करने का भी फैसला किया है और सिलेंडरों की उपलब्धता पर लगातार नजर रखी जा रही है।
इस बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कालाबाजारी और जमाखोरी में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही यूपी सरकार ने पेट्रोल, डीजल और LPG की लगातार उपलब्धता बनाए रखने के लिए सभी जिलों में सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
एजेंसियाँ पूरे प्रदेश में सक्रिय रहकर आपूर्ति व्यवस्था की निगरानी कर रही हैं ताकि कहीं भी कालाबाजारी या कमी की स्थिति न बने। स्थिति पर नजर रखने के लिए सरकार ने खाद्य आयुक्त कार्यालय और सभी जिलों में 24 घंटे कंट्रोल रूम स्थापित किए हैं और आपूर्ति की लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है।
यदि आप भी इस समस्या से त्रस्त हैं या आपके नाम पर भी घरेलू गैस सिलेंडर की अवैध बुकिंग करके गायब कर दी गई है, तो चुप न बैठें और तुरंत संबंधित विभाग में शिकायत दर्ज कराएं।
शिकायत दर्ज करने हेतु महत्वपूर्ण नंबर:
* MOPNG हेल्पलाइन (LPG): 1906 (24/7 आपातकालीन और शिकायत सेवा)
* भारत गैस (Bharat Gas): 1800-22-4344
* इंडेन (Indane): 1800-233-3555
* एचपी गैस (HP Gas): 1800-233-3555
* राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन: 1800-11-4000 या 1915
जागरूक बनें और इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी आवाज उठाएं।