छँटनी के डर से जेफ बेजोस से नौकरी की भीख माँगता प्रांशु वर्मा, इंडिया ब्यूरो चीफ, वॉशिंगटन पोस्ट में नौकरी बचाने की शर्त बना ‘भारत विरोध’

                           Washington Post में छटनी; नौकरी बचाने भारत का विरोध करने को तैयार  
वरिष्ठ पत्रकारों का अपने ही संस्थान के मालिक से सार्वजनिक मंच पर नौकरी बचाने की अपील करना मीडिया जगत में एक असामान्य और चौंकाने वाली स्थिति है। यह घटना न सिर्फ संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है बल्कि मीडिया संस्थानों पर मालिकाना प्रभाव की वास्तविकता को भी सामने लाती है। साथ ही, यह उस धारणा को भी चुनौती देती है कि मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करता है।

‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा का ऐसा ही एक मामला सामने आया है। अखबार में बड़े पैमाने पर छँटनी की खबरें सामने आने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए सीधे अमेजन के संस्थापक और द वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस से हस्तक्षेप करने की अपील की है।

प्रांशु वर्मा का ट्वीट सिर्फ यह कहने तक सीमित नहीं था कि उन्हें नौकरी पर बने रहने दिया जाए। वह ट्वीट ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने सबके सामने अपना परिचय, अपने काम का ब्योरा और अखबार के प्रति अपनी निष्ठा एक साथ रख दी हो। जेफ बेजोस को टैग करते हुए वर्मा ने कहा कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ भारत के गिने-चुने मीडिया संस्थानों में से है, जो सरकार के दबाव या सेंसरशिप के डर के बिना रिपोर्टिंग करता है।

 एक ही झटके में, उन्होंने खुद को कथित तौर पर तानाशाही मीडिया इकोसिस्टम में एक बहादुर विरोधी के तौर पर पेश कर दिया। साथ ही, अखबार को कथित तौर पर दबाने वाले भारतीय शासन व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाले एकमात्र ‘योद्धा’ के तौर पर पेश किया। दरअसल, लंबे वक्त से इस तरह की दुश्मनी विदेशी मीडिया निकालता रहा है। पश्चिमी संरक्षकों का समर्थन पाने के लिए इस तरह की मनगढ़ंत बातें कुछ मीडियाकर्मी लंबे वक्त से करते रहे हैं।

इसके बाद जो सामने आया, उसने लोगों को और हैरान कर दिया। प्रांशु वर्मा ने अपने ट्वीट में अपने ब्यूरो की उन खबरों की गिनती भी कर दी जिन्हें वह चर्चित मानते हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर भारतीय अरबपतियों पर की गई वे रिपोर्टें गिनाईं, जिनमें दावा किया गया था कि उनके साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार किया जाता है। इसके अलावा मोदी सरकार के दौर में कथित भाई-भतीजावाद से जुड़ी खबरें, भारतीय कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने के आरोपों वाले लेख और भारत की घुसपैठ रोकने की कोशिशों को ‘मुसलमानों को बांग्लादेश भेजने का अभियान’ बताने वाली रिपोर्टें भी शामिल थीं।

ब्यूरो चीफ द्वारा भेजे गए हर लेख का एक मकसद साफ था। ना केवल बेजोस के सामने अपनी काबिलियत साबित करना नहीं बल्कि उस ‘ग्लोबल नजरिए’ के साथ वैचारिक जुड़ाव का संकेत देना जिसने वाशिंगटन पोस्ट की विदेशी रिपोर्टिंग को परिभाषित किया है।

वर्मा ने यह साफ कर दिया कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में काम करने और वहाँ टिके रहने का एक तय तरीका है। वहाँ भारत पर रिपोर्टिंग का मतलब सिर्फ घटनाएँ बताना नहीं है बल्कि भारत को कटघरे में खड़ा करना भी है। भारत को एक ऐसे संप्रभु लोकतांत्रिक देश के रूप में नहीं देखा जाता जो जटिल समस्याओं से जूझ रहा हो बल्कि उसे शक की नजर से देखा जाता है। उसकी नीतियों और फैसलों को अक्सर दमन, बहुसंख्यकवाद और नैतिक चूक के फ्रेम में रखकर पेश किया जाता है।

जाली दस्तावेजों, सीमा घुसपैठ और कई मामलों में आपराधिक आरोपों से जुड़े अवैध रोहिंग्याओं के जबरन देश में आने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जाता बल्कि इसे सांप्रदायिक उत्पीड़न अभियान का नाम दिया जाता है। अरबपति उदारीकरण की ओर बढ़ रही अर्थव्यवस्था में कारोबारी नहीं हैं, बल्कि सत्ताधारी भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। कूटनीतिक तनाव भू-राजनीति नहीं बल्कि भारत की कथित नैतिक विफलताओं के कारण उत्पन्न ‘विघटन’ है।

इसीलिए वर्मा की दलील पत्रकारिता के बचाव के लिए नहीं है बल्कि खुद को बनाए रखने की कोशिश है। इसमें साफ पता चलता है कि देखो हम कितना नुकसान करते हैं। देखो हम किस तरह की बातें फैलाते हैं। यकीनन इसे बचाना जरूरी है।

ताजा मामला ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ पर छाए संकट के बारे में बहुत कुछ बताता है। पोस्ट के पुराने मीडिया रिपोर्टर पॉल फारही की रिपोर्ट के मुताबिक, अखबार स्टाफ में भारी कटौती की तैयारी कर रहा है, जिससे 300 लोगों की नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर विदेशी डेस्क और स्पोर्ट्स डेस्क पर पड़ेगा। एडिटर्स ने कथित तौर पर चेतावनी दी है कि न्यूजरूम के आधे से ज्यादा लोगों को छँटनी का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले 2023 में करीब 240 लोगों को नौकरी से हटाया गया था।

ये छँटनी की वजह साफ है। एडवरटाइजिंग रेवेन्यू गिर गया है, सब्सक्रिप्शन रुक गए हैं और ग्लोबल जर्नलिज्म के लिए जो नैतिक दिखावा कभी होता था, वह अब बिलों का भुगतान नहीं कर रहा है। पढ़ने वाले ध्यान नहीं दे रहे हैं, इसलिए नहीं कि जवाबदेह रिपोर्टिंग का स्वागत नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसलिए कि रिपोर्टिंग के रूप में लगातार ‘नैरेटिव एक्टिविज्म’ ने भरोसा खत्म कर दिया है।

वर्मा की बेजोस से सार्वजनिक अपील एक व्यापक और कुछ हद तक ‘बेशर्मी’ है। ब्यूरो चीफ और सीनियर एडिटर एक अरबपति मालिक से मेहरबानी की अपील करते हैं, साथ ही सत्ता से अपनी स्वतंत्रता का दावा करते हैं। यह एक ऐसी उलझन है जिसे #SaveThePost जैसे हैशटैग से दूर नहीं किया जा सकता।

अजीब बात है कि एक पत्रकार जो भारत सरकार पर प्रेस की आजादी को दबाने का आरोप लगाता है। उसका अपना पेशेवर भविष्य पूरी तरह से एक अमेरिकी उद्योगपति के विवेक पर निर्भर करता है। यह विडंबना ही है कि वर्मा अपने ब्यूरो की भारत के व्यापारिक समूहों पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का बखान करते हुए एक अमेरिकी व्यवसायी से अपनी नौकरी बचाने की गुहार लगा रहे थे।

हालाँकि, प्रॉब्लम यह नहीं है कि बेजोस घाटे में चल रहे डेस्क को फंडिंग देने में हिचकिचा रहे हैं। प्रॉब्लम यह है कि द वॉशिंगटन पोस्ट जैसे आउटलेट्स इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि नफ़रत से भरी, सोच पर अड़ी रिपोर्टिंग अब एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल नहीं है। इसी सोच की वजह से द वॉशिंगटन पोस्ट के लिए दुनिया भर में मुश्किलें बढ़ रही हैं। ये संस्थान ऐसी हालत में आ गया है कि अब उसे बने रहने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को निकालने के बारे में सोचना पड़ रहा है।

वर्मा का ट्वीट उनकी नौकरी बचाने के लिए था। अनजाने में ही इसने उस मानसिकता को उजागर कर दिया जिसने अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में से एक को पतन के कगार पर पहुँचा दिया है। यही कारण है कि न्यूजलॉन्ड्री, द वायर आदि जैसे अधिकांश भारतीय मीडिया संस्थान जो द पोस्ट की विचारधारा का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भी इसी कारण से चंदा और सदस्यता के लिए लगातार अनुरोध करना पड़ता है।

चाहे वह कोई अमेरिकी प्रतिष्ठित समाचार पत्र हो या उसके भारतीय वैचारिक अनुकरणकर्ता, पाठकों ने उन मीडिया संगठनों से अपना समर्थन वापस लेना शुरू कर दिया है जो छद्म पत्रकारिता को ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता करते हैं।

‘मियाँ’ का मतलब ‘अवैध बांग्लादेशी’… मुस्लिम विरोधी एजेंडा बताकर ‘द वायर’ का हिमंता के खिलाफ प्रोपेगेंडा

                    द वायर और असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा (साभार : The Wire & thecrossbill)
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हाल के बयानों को लेकर मुख्यधारा के वामपंथी मीडिया और ‘द वायर’ जैसे पोर्टल्स ने एक सुनियोजित अभियान छेड़ दिया है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ‘मियाँ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर मुख्यमंत्री को ‘मुस्लिम विरोधी’ सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। हिमंता बिस्वा सरमा का संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के खिलाफ है जो असम की स्वदेशी संस्कृति, भूमि और लोकतांत्रिक अधिकारों को निगल रहे हैं।

द वायर का नैरेटिव: बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश

‘द वायर‘ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमंता बिस्वा सरमा जानबूझकर एक खास समुदाय (मियाँ) को डराने और उन्हें ‘परेशान’ करने की राजनीति कर रहे हैं। लेख में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने 4 से 5 लाख मियाँ मतदाताओं के नाम हटाने की बात कहकर लोकतंत्र का अपमान किया है। ‘द वायर’ ने मुख्यमंत्री के उस बयान को भी हाइलाइट किया जिसमें उन्होंने लोगों से मियाँ समुदाय के लिए ‘मुश्किलें’ पैदा करने को कहा, ताकि वे असम छोड़ दें।

वामपंथियों को हिमंता ने दिया जवाब

 हिमंता बिस्वा सरमा ने वायर और उस जैसी वामपंथी खेमों के स्वघोषित मुस्लिम मसीहों को तीखा जवाब दिया है। उन्होंने X पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, “जो लोग ‘मियाँ’ शब्द (यह असम में बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होता है) पर मेरी टिप्पणी को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए कि असम के बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद क्या कहा है। यह मेरी भाषा नहीं है, न मेरी कल्पना, और न ही कोई राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये शब्द खुद अदालत के हैं, ‘असम में चुपचाप और खतरनाक तरीके से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है, जिससे लोअर असम के रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जिलों के हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अवैध प्रवासियों की वजह से ये इलाके धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इसके बाद यह केवल समय की बात होगी कि इन इलाकों को बांग्लादेश में मिलाने की माँग उठाई जाए। अगर लोअर असम हाथ से निकल गया, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा और उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन भी देश के हाथ से निकल सकते हैं’।”

हिमंता ने आगे लिखा, “जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ‘जनसंख्या पर आक्रमण’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है और देश की एकता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चेतावनी देती है, तो उस सच्चाई को स्वीकार करना न तो नफरत है, न सांप्रदायिकता, और न ही किसी समुदाय पर हमला। यह एक गंभीर और पुरानी समस्या को समझना है, जिसे असम दशकों से झेल रहा है।

उन्होंने लिखा, “हमारा प्रयास किसी मजहब या किसी भारतीय नागरिक के खिलाफ नहीं है। हमारा प्रयास असम की पहचान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है, ठीक वैसे ही जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देश को चेतावनी दी थी। उस चेतावनी को नजरअंदाज करना ही असम और भारत के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।”

वामपंथियों की आँखों में क्यो खटकते हैं हिमंता?

वामपंथी खेमे की राजनीति अक्सर इस सोच पर टिकी रही है कि धार्मिक पहचान को दबाकर रखा जाए और खास समुदायों को खुश करने की नीति अपनाई जाए। उन्हें ऐसे नेता पसंद आते हैं जो हर मुद्दे पर संतुलन के नाम पर चुप्पी साध लें या फिर वोट बैंक के दबाव में फैसले लें। जब कोई नेता खुलकर अपनी पहचान की बात करता है तुष्टीकरण की राजनीति को चुनौती देता है और स्पष्ट शब्दों में सच बोलता है, तो वही वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा इसी वजह से वामपंथियों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। वह बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर हिंदू अपनी पहचान पर गर्व क्यों न करे। वामपंथी विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीति में हिंदू पहचान को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि अगर कोई नेता हिंदुत्व की बात करेगा, तो उनकी वैचारिक जमीन कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वामपंथी गुट ऐसे नेताओं को कट्टर, विभाजनकारी या असहिष्णु साबित करने की कोशिश करते हैं।

वामपंथियों को यह भी खलता है कि हिमंता सरमा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह देखने के बजाय उन्हें शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं। जब वह घुसपैठ या अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते हैं तो वामपंथी इसे मानवाधिकार या अल्पसंख्यक विरोध के रूप में पेश करने लगते हैं। असल में समस्या यह है कि वामपंथी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखते हैं और कानून, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन जैसी बातों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

हिमंता सरमा का अपराध वामपंथियों की नजर में यही है कि वह डरकर नहीं बोलते। वह न तो किसी समुदाय के दबाव में आते हैं और न ही वैचारिक आलोचना से घबराते हैं। वह साफ कहते हैं कि देश और समाज का हित सबसे ऊपर है, चाहे इसके लिए कड़वी बात ही क्यों न कहनी पड़े। यही स्पष्टता वामपंथियों को असहज करती है।

कुल मिलाकर हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति उस सोच से अलग है जिसमें नेताओं को हर मुद्दे पर संतुलित या अस्पष्ट भाषा में बोलते देखा जाता है। वह अपनी बात सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, चाहे वह उनकी पहचान का सवाल हो, विकास का मुद्दा हो या घुसपैठ और कानून-व्यवस्था का मामला। यही वजह है कि एक वर्ग उन्हें मजबूती और स्पष्टता का प्रतीक मानता है, जबकि वामपंथी उन्हें अपने लिए चुनौती और असहजता का कारण समझता है।

हापुड़ : हनुमान चालीसा पाठ पर भड़के SC दबंग, प्रजापति माँ-बेटे को जूतों की माला पहनाकर निकाला जुलूस-अंबेडकर प्रतिमा के सामने रगड़वाई नाक

                      माँ-बेटे के साथ अपराध करने वाले 4 आरोपित गिरफ्तार (साभार X_@hapurpolice)
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ शाहपुर चौधरी गाँव में एक माँ और उसके बेटे को जूतों की माला पहनाकर पूरे गाँव में घुमाया गया और उन्हें अमानवीय तरीके से अपमानित किया गया। इस पूरी घटना से जुड़ी FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की है और अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है।

मंदिर में विवाद और जूतों की माला का ‘फरमान’

 जानकारी के अनुसार, घटना की जड़ें अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय से जुड़ी हैं। पीड़ित युवक दीपक चौधरी (प्रजापति समुदाय) के अनुसार, उस दौरान गाँव के मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था, तभी दलित समुदाय के एक युवक ने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसका दीपक ने विरोध किया था।

आरोप है कि इसी रंजिश के चलते 26 जनवरी 2026 को कुछ दलित युवकों ने दीपक को रास्ते में रोक लिया और गाली-गलौज की। इसके बाद उसकी माँ को भी मौके पर बुला लिया गया। गाँव की पंचायत ने कथित तौर पर एक ‘तालिबानी’ फरमान सुनाया कि दोनों को जूतों की माला पहनाकर घुमाया जाए ताकि धर्म पर टिप्पणी का बदला लिया जा सके।

प्रतिमा के सामने नाक रगड़वाई और निकाला जुलूस

पीड़ित ने FIR में आरोप लगाया कि उसे और माँ को जबरन बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने ले जाया गया और वहाँ उनकी नाक रगड़वाई गई। इसके बाद भीड़ ने दोनों के गले में जूतों और चप्पलों की माला डाल दी और पूरे गाँव में उनका जुलूस निकाला।
इस दौरान माँ-बेटे के साथ मारपीट भी की गई और उन्हें हाथ जोड़कर माफी माँगने पर मजबूर किया गया। यह पूरी शर्मनाक घटना गाँव में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

पुलिस की कार्रवाई और गाँव में तनाव

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। गढ़ कोतवाली पुलिस ने पीड़ित की तहरीर पर तत्काल 10 नामजद युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चार आरोपितों (अनिल, अमित, सागर और विनीत) को गिरफ्तार कर लिया है।

गढ़ कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर देवेंद्र विष्ट ने बताया कि आरोपितों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि एक आरोपित पुलिस विभाग से जुड़ा है, जिसकी जाँच की जा रही है। फिलहाल गाँव में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

UGC Regulations पर कुछ लोग मोदी को कुर्सी से उतारने को मैदान में आ गए लेकिन भूल गए उसके काम जो सभी के लिए किए, किसी खास जाति के लिए नहीं; उन कामों को देख लो कृतघ्न लोगों

सुभाष चन्द्र

वामपंथियों ने जिस तरह UGC बिल में सवर्ण जाति के विरुद्ध जहर खोल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को फंसा अपना जहरीला खेल खेला उसे सवर्ण वर्ग को समझ कर वामपंथियों का ही नहीं बल्कि जातियों पर आधारित हर  पार्टियों का भी तिरस्कार करना चाहिए। इन पार्टियों में शामिल सवर्ण वर्ग के लोगों का भी सामाजिक बहिष्कार करने चाहिए। अगर अभी भी सवर्ण जाति ने अपनी आंखें नहीं खोली फिर शायद दोबारा मौका नहीं आएगा। टीवी चर्चाओं में जेएनयू के प्रो आनंद रंगनाथन ने चर्चा में शामिल RJD प्रवक्ता सुश्री कंचना यादव का वो वीडियो दिखाकर कंचना को बेनकाब कर दिया जिसमे वह सवर्ण जाति के व्यक्तियों को फंसाने के लिए उकसा रही थी। यानि सवर्ण वर्ग को अपने हित में जातिगत आधारित पार्टियों का चुनावों में खुलकर बहिष्कार करना चाहिए। जो एकजुटता बिल के विरोध में दिखाई है वही एकजुटता चुनावों में इन जातिगत आधारित पार्टियों और इनके समर्थक सवर्ण लोगों के बहिष्कार में दिखानी होगी।  

1-मिस कॉल पर गैस सिलेंडर;

2-आनलाइन बिलों का भुगतान;

3-यू पी आई पेमेंट;

4-डीजी लाॅकर;

5-जन औषधि केन्द्र;6-आयुष्मान कार्ड;7-नयी संसद भवन;8-फ्री वैक्सीनेशन;9-जन धन योजना;

10-सर्जिकल स्ट्राइक;11-ऑपरेशन सिन्दूर;

12-तीन तलाक ख़त्म;

13-आधार लिंक;

14-फास्टैग;

लेखक 
चर्चित YouTuber 
15-चिनाब ब्रिज;
16-जम्मू की सुरंग;
17-गंगा एक्सप्रेस-वे;
18-काशी कॉरिडोर;
19-विश्वनाथ कॉरिडोर;

20-केदारनाथ पुनर्निर्माण;21-श्री राम मंदिर निर्माण;

22-सुकन्या समृद्धि योजना;23-शौचालयों का निर्माण;24-रेलवे पटरियों का दोहरीकरण;

25-रेलवे स्टेशनों का विस्तार;26-टिकट बुकिंग में दिन कम;27-टिकट कैंसिलेशन सुविधा;

28-स्वर्णिम चतुर्भुज योजना;29-भारत माला प्रोजेक्ट; 30-18 एम्स का निर्माण; 31-S I R;

32-महात्मा गांधी सेतु पुनर्निर्माण; 33-भूपेन हजारिका सेतु; 34-सेना का आधुनिकीकरण;

35-मेक इन इंडिया; 36-ड्रोन क्रांति; 37-किसानों के खाते में सीधे पैसे; 38-राशन डिजिटलाइजेशन; 39-फ्री राशन; 40-कन्या सुमंगला योजना;

41-G S T लागू करना; 42-G S T में भारी कटौती।

43-सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण; 44-तालाबों का निर्माण; 45-हर घर नल से जल;

46-22 घंटे बिजली; 47-इनकम टैक्स में 12 लाख की छूट; 48-धारा 370 का हटना;

49-553 नये रेलवे स्टेशन; 50-1500 नये ओवर ब्रिज; 51-1500 से अधिक बेकार कानून हटाना;

52-भ्रष्टाचारियों पर E D के रिकार्ड तोड  छापे;

53-3000 रु में फास्टैग की वर्षभर की छूट;

54-E V M में VVPAT लागू करना;

55-कर्तव्य पथ मार्ग;

56-नोटों में सांस्कृतिक धरोहरों के चित्र;

57-नालंदा यूनिवर्सिटी का पुनर्निर्माण;

58-तेजस का घरेलू उत्पादन;

59-सेल फोन निर्माण में आत्मनिर्भरता;

60-मुद्रा योजना;

61-उज्ज्वला योजना;

62-सुरक्षा बीमा;

63-390 नये विश्वविद्यालय;

64-7 नये IIT;

65-7 नये IIM;

66-16 नये IIIT;

67-300 नये मेडिकल कॉलेज;

68-पम्बन ब्रिज का निर्माण;

69-ऋषिकेश -कर्णप्रयाग रेलवे प्रोजेक्ट;

70-उत्तराखंड चारधाम सड़क निर्माण;

71-ब्रह्मोस उत्पादन फैक्ट्री;

72-असॉल्ट राइफल निर्माण अमेठी;

73-वन्दे भारत आधुनिक ट्रेनें।

74-वक्फ बोर्ड प्रॉपर्टी पर कानून;

75-रेलवे में बायो टॉयलेट;

76-श्रम हित के श्रम कानूनों को लागू करना;

77-G RAM जी योजना लागू करना;

78-सड़कों के निर्माण में भारत चीन को पीछे छोड़ चुका है;

79- लाखों  युवाओं को सरकारी नौकरियाँ;

80-8 लाख से अधिक कार्मिशियल लाइसेंस आबंटन;

81-80,000 नये पेट्रोल पंप;

82-शौर्य स्थल का निर्माण;

83-रेल बजट का आम बजट में विलय;

84-9000 से अधिक नये स्कूल;

85-अवैध निर्माणों पर बुलडोजर;

86-बॉर्डर पर फेंसिंग;

87-आर्मी को आतंक के विरुद्ध खुली छूट;

88-विकास कौशल योजना;

89-विमुद्रीकरण;

90-टोल नाके समाप्त करके फास्टैग सुविधा;

91-चंद्रयान -3 सफल;

92-मंगल मिशन;

93-मल्टी सैटेलाइट स्टेबिलाइजेशन;

94-बिहार में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को कम करना;

95-Statue of Unity/ National War Memorial/Police Memorial निर्माण;

96-स्मार्ट सिटी विस्तार;

97-किसानों को यूरिया कोटिंग;

98-P F निकालना सुविधाजनक हुआ;

99-निजी और घरेलू क्षेत्रों में 5 करोड़ से अधिक नये रोजगार का सृजन;

100-कृर्षि कानून पारित हुए होते तो दलाली भी खत्म होती और मण्डियों पर बहुत से बांग्लादेशियों के अवैध कब्ज़े भी ख़त्म हुए होते-

अभी UCC और जनसंख्या नियंत्रण भी लागू होना है -

मोदी / भाजपा के साथ खड़े रहो -

आपके एक वोट से कश्मीर की पत्थरबाजी 90% कम हुई; राम मंदिर बना; काशी संवार दी; 370 हटा और पाकिस्तान को 3 बार घुस के मारा -

लिच्छवी राणा द्वारा संग्रहित -

मध्य प्रदेश : अब्बू ने किया गाय का रेप, हिंदू संगठनों के प्रदर्शन के बाद पुलिस ने किया गिरफ्तार: बैतूल का मामला


मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दामजीपुरा गाँव में अब्बू नाम के युवक ने गाय के साथ रेप किया। पुलिस ने वायरल वीडियो के आधार पर आरोपित अब्बू हिरासत में ले लिया है।

इस घटना से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे इलाके में तनाव और आक्रोश का माहौल बन गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रविवार (1 फरवरी 2026) की सुबह करीब 10 बजे से ही गाँव में बवाल शुरू हो गया। वीडियो सामने आते ही आक्रोशित लोगों की भीड़ ने सबसे पहले आरोपित अब्बू की दुकान में आग लगा दी।

इसके बाद पास की अन्य दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई और आगजनी की घटनाएँ हुईं। उपद्रव के दौरान टायर पंक्चर, इलेक्ट्रॉनिक, मोबाइल और टेलरिंग जैसी कई दुकानों को नुकसान पहुँचा है। कई वाहनों को भी क्षतिग्रस्त किया गया। घटना की खबर फैलते ही हिंदू संगठनों में भारी नाराजगी देखी गई और आसपास के जिलों से भी लोग दामजीपुरा पहुँचने लगे।

हालात बिगड़ते देख पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आया। भैंसदेही, चिचोली और मोहदा थानों का पुलिस बल मौके पर तैनात किया गया है। पुलिस लाइन से अतिरिक्त बल भी भेजे गए हैं। अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन गाँव में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है।

जिन UGC नियमों को SC ने रोका उनमें शामिल ‘वामपंथी’ इंदिरा जयसिंह की सिफारिशें


सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियम UGC इक्विटी नियम 2026 पर स्टे लगा दिया है। हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों को लेकर किए गए नोटिफिकेशन को लेकर बवाल मचा हुआ है। प्रमोशन ऑफ इक्विटी 2026 के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 27 जनवरी 2026 को छात्रों को भरोसा दिलाया कि इस नियम का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन छात्रों का डर खत्म नहीं हुआ और विरोध प्रदर्शन जारी रहा।

दरअसल ये तर्क दिया जा रहा है कि जनरल कटेगरी के लोग जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते इसलिए उनकी शिकायत को सिस्टम से बाहर रखा जा रहा है। UGC इक्विटी नियम 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए एक ‘सुधार’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्वराज्य के अनुसार, 2026 के नियमों के बजाए 2025 का नियम एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स में भेदभाव को दूर करने के लिए ज्यादा कारगर है। यह एक संतुलित नजरिया पेश करता है और ज्यादा व्यावहारिक है।

बराबरी पर UGC रेगुलेशन की शुरुआत

2019 में छात्र रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने दो पीआईएल दायर की थी, जिसके आधार पर 2025 के ड्राफ्ट तैयार किए गए थे। इन छात्रों में एक की मौत 2016 में और दूसरे की 2019 में हुई थी। उनके परिवारों ने आरोप लगाया था कि इनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया गया, जिसकी वजह से इनदोनों ने आत्महत्या कर ली थी।

दोनों याचिकाकर्ताओं की वकील सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह थी। उन्होंने एडवोकेट प्रसन्ना और दिशा वाडेकर के साथ मिलकर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की माँग की। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए गाइडलाइंस तैयार की जाए, उसी के आधार पर यूजीसी के नए नियम बनाए गए।

कहा जाता है कि PIL में पूरी तरह से नए नियम की माँग नहीं की गई थी, बल्कि मौजूदा यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में बराबरी को बढ़ावा देना) रेगुलेशन, 2012 को सख्ती से लागू करने की माँग की गई थी। 2012 के नियमों के तहत यूनिवर्सिटी को भेदभाव, खासकर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को समानता दिलाने पर जोर दिया गया था।

PIL में याचिकाकर्ताओं ने एडमिशन, मूल्यांकन, हॉस्टल अलॉटमेंट और कैंपस लाइफ में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। उन्होंने संस्थानों पर 2012 के नियम को लागू करने में पूरी तरह विफल रहने का भी आरोप लगाया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कोई मॉनिटरिंग नहीं की जाती थी। समान अवसर वाली जगह काफी कम थी। NAAC का कोई अता-पता नहीं था।
जनवरी 2025 में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) को नियमों का पालन न करने के लिए फटकार लगाई। जजों ने UGC को सेल, शिकायतों और एक्शन पर डेटा पेश करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट UGC ने बताया कि वह रेगुलेशन के नियम का ड्राफ्ट बना रही है।

2025 के रेगुलेशन ने एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में जाति के आधार पर भेदभाव को दूर करने के लिए एक नियम बनाया।

UGC ने फरवरी 2025 में (हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन में प्रमोशन ऑफ इक्विटी) रेगुलेशन जारी किए थे। 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन का उद्देश्य सुरक्षा, निष्पक्षता और स्वायत्तता के बीच एक संतुलित ढाँचा तैयार करना था। PIL की माँग के मुताबिक, ‘इक्विटी कमेटी’ और 24/7 हेल्पलाइन जैसे उपाय सुझाए गए, ताकि सभी शामिल पार्टियों (विशेषकर SC/ST छात्रों) के लिए सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

इन नियमों में संस्थानों को अपनी स्थितियों के अनुसार, नियमों को लागू करने का अधिकार दिया गया। इक्विटी कमेटी का नेतृत्व संस्था के प्रमुख द्वारा किए जाने का प्रावधान है, ताकि संस्था की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जा सके।

कमेटी में कम से कम एक सदस्य SC ​​या ST समुदाय से होना जरूरी था। ड्राफ्ट रेगुलेशन ने सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए फैकल्टी, छात्र-छात्राओं और संस्थान के प्रशासनिक स्टाफ की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है।

2026 के रेगुलेशन में इंदिरा जयसिंह की सिफारिशों को शामिल किया गया

हालाँकि याचिकाकर्ता 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन से खुश नहीं थे। सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने ड्राफ्ट में दस मुख्य बदलावों का प्रस्ताव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रेगुलेशन को फाइनल करने के लिए 8 हफ्ते की डेडलाइन तय की। इसको देखते हुए नए रेगुलेशन 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई किया गया।

इस रेगुलेशन में 2025 के रेगुलेशन में किए गए ‘संतुलन’ का अभाव था, और इसमें जयसिंह की कई सिफारिशें शामिल थीं।

2026 के रेगुलेशन ने पीड़ितों की कैटेगरी को SC, ST और OBC तक सीमित करके जनरल कटेगरी को जाति-आधारित हिंसा का शिकार मानने से मना कर दिया। जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए जाति-आधारित भेदभाव की शिकायत करने का कोई प्रावधान नहीं है। 2026 के रेगुलेशन न सिर्फ यह मानते हैं कि जाति के आधार पर भेदभाव सिर्फ SC, ST और OBC के लोगों के साथ होता है। इसमें जनरल कटेगरी के लोगों की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि नया नियम मानता है कि इनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता।

नया फ्रेमवर्क जनरल कटेगरी के स्टूडेंट्स के खिलाफ है, जिनके पास नियमों का गलत इस्तेमाल होने पर संस्थान का सहारा नहीं होगा। यही वजह है कि 2026 के रेगुलेशन का जनरल कटेगरी के छात्र विरोध कर रहे हैं, जिन पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

यमलोक के द्वार पर बहने वाली 'वैतरणी नदी' का रहस्य

जो भी धरती पर आया है उसे मृत्युलोक को प्राप्त करना है इसका लेखाजोखा यमराज के पास होता है। लेकिन उसके पाप-पुण्य का निर्णय धर्मराज चित्रगुप्त जी महाराज करते हैं। लेकिन धरती से लेकर धर्मराज तक पहुँचने में आत्मा को अनेक पड़ाव से गुजरना पड़ता है। इन पड़ावों में कई दुर्गम पड़ाव ऐसे होते हैं जिन्हे आत्मा अपने जीवनकाल में किये दान-पुण्यों और बड़ों को दिए जाने पर हृदय से निकले आशीर्वाद के कारण सुगमता से पार करने में सक्षम कर देते हैं। इसीलिए शास्त्र बड़ों का सम्मान करने की शिक्षा देते हैं। माँ के चरणों में अगर स्वर्ग है तो उसका द्वार पिता के चरणों में होता है। घर में आए किसी भी अतिथि(परिचित अथवा अपरिचित) का आदर-सम्मान देने से परमपिता को प्रसन्न करना होता है। अगर घर पर किसी भी अतिथि पर अगर जल भी दिया तो जो घूंट गले से उतरता है दिल से निकला आशीर्वाद कर्म में लिखा जाता है। पता नहीं कब से उसने पानी या कुछ अन्न नही लिया है। यह सब निर्भर करता है संस्कारों पर।
हमारे शास्त्रों (गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण) में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसी यात्रा के दौरान नरक लोक और यमलोक की सीमा पर एक भयानक नदी स्थित है, जिसे 'वैतरणी' कहा जाता है।
कैसी होती है यह नदी?
यह कोई सामान्य जल की नदी नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, यह रक्त, कीचड़, पीप, और विषैले पदार्थों से भरी है। इसका 'जल' तेजाब के समान खौलता रहता है। इसमें भयंकर साँप, बिच्छू और मगरमच्छ जैसे जीव आत्माओं को कष्ट देने के लिए रहते हैं।
इस नदी में कौन गिरता है?
गरुड़ पुराण के अनुसार, अपने जीवन में कुकर्म करने वाले लोग इस नदी में धकेले जाते हैं:
माता-पिता, गुरु और साधुओं का अपमान करने वाले।
झूठ, छल-कपट और धोखा देने वाले।
गौ-हत्या या गौ-अपमान करने वाले।
लोभी और दान न करने वाले व्यक्ति।
वैतरणी पार कैसे होती है? (गौदान का महत्त्व)
यहीं पर 'गौदान' का सबसे बड़ा महत्व बताया गया है। जिसने जीवन में निस्वार्थ भाव से गौदान किया हो, मृत्यु के पश्चात वह गाय उस आत्मा को इस भयानक नदी से पार लगाती है।
क्या है वैतरणी दान?
मृत्यु के समय या श्राद्ध पक्ष में किया जाने वाला एक विशेष दान, जिससे आत्मा को यह नदी पार करने में सहायता मिलती है।
सामग्री: काले रंग की गाय (या प्रतीकात्मक), तिल, लोहा, कंबल, जल पात्र आदि।
बचाव का मार्ग (आध्यात्मिक संदेश)
वैतरणी नदी केवल भय का प्रतीक नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। इससे बचने का उपाय है—जीवन में धर्म, करुणा, सत्य और गौ-सेवा का मार्ग अपनाना।
अच्छे कर्म ही परलोक में साथी बनते हैं।

नेहरू लियाकत समझौता रद्द करने का उपाय सोचा जाए; अंतरिम प्रधानमंत्री नेहरू के पापों की कोई सीमा नहीं थी

सुभाष चन्द्र

भारत के धर्म के आधार पर विभाजन के अनुसार मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और हिंदुओं को भारत आ जाना चाहिए था।  क्योंकि पाकिस्तान मुसलमानों की मांग पर बनाया गया था, इसलिए आज मुसलमानों को यह कहने का अधिकार नहीं है कि वे भी हिंदुस्तान में बराबर के हकदार हैं 

लेकिन गांधी और नेहरू ने बड़ी कुटिलता से मुसलमानों को भारत में रहने दिया उसी दिन उन दोनों ने दूसरा पाकिस्तान बनाने के षड्यंत्र की बुनियाद रख दी और आज उस बुनियाद पर इमारत खड़ी हो गई है

नेहरू को 2 सितंबर, 1946 को (विभाजन से पहले) Viceroy की Executive Council में Vice President बनाया गया de facto प्रधानमंत्री की हैसियत से काम करने के लिए जिसका काम सत्ता हस्तांतरण की देखभाल करना, विदेश नीति को बनाना और डिप्लोमेटिक संबंधों को बनाना था लेकिन नेहरू ने अंतरिम प्रधानमंत्री होते हुए ही विदेश मामलों में ग़दर मचा कर सर्वनाश कर दिया

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भारत के चुनाव 1951 में हुए और इसलिए नेहरू सरकार को देश विरोधी कार्य करने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि उन्हें जनता की अनुमति नहीं थी लेकिन फिर भी उसने किए नेहरू ने तो कश्मीर काट कर पाकिस्तान को दे दिया, तिब्बत काट कर चीन को दे दिया और UNO की स्थाई सीट एवं वीटो पावर चीन को दे दी RSS पर बैन भी अंतरिम प्रधानमंत्री होते हुए लगाया जो कोर्ट में पिट गया

नेहरू ने 8,अप्रैल 1950 को पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री लियाकत अली के साथ (भारत का विभाजन करने के बाद) एक समझौता करके एक बार फिर भारत के लिए सर्वनाश कर दिया। उस समझौते का उद्देश्य था

- To guarantee the rights of minorities in both countries and to reduce communal tensions.

-Key provisions: The pact included clauses on protecting minority rights, the return of abducted women and property, and the freedom of minorities to return to their homes

भारत ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की ऐसे रक्षा की कि उनकी संख्या आज 20 करोड़ से ज्यादा हो गई लेकिन पाकिस्तान अल्पसंख्यक हिंदुओं को गाजर मूली की तरह काट कर 22% से 2% पर ले आया

इसलिए कानूनी दृष्टि ने नेहरू को Elected Prime Minister न होते हुए ऐसा समझौता करने का कोई अधिकार नहीं था 1960 में नेहरू की जब Indus Water Treaty पर भारत ने रोक लगा दी तो लियाकत अली के साथ समझौते को भी रद्द किया जा सकता है इस समझौते के साइन होने तक तकनीकी रूप से मुसलमानों को वोट देने का भी अधिकार नहीं था और क्योंकि 1951 में चुनाव होने थे, नेहरू ने मुसलमानों को वोटर बनाने के लिए वह समझौता किया लियाकत अली से समझौते के वक्त नेहरू Elected PM नहीं था जबकि सिंधु जल समझौते से समय वो Elected PM था और अगर 1960 का समझौता रोका जा सकता है तो 1950 के समझौते को रोकने के भी उपाय तलाशने चाहिए

अब सवाल यह उठेगा कि 1950 के समझौते के समय के लोग तो इस वक्त होंगे नहीं तो समझौता रद्द करने का असर उन पर तो होगा नहीं ऐसी स्थिति में उनके वंशजों को इस समझौते के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए किसी संविधान विशेषज्ञ को यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाना चाहिए

बलूचिस्तान में BLA के ‘ऑपरेशन हेरोफ-2’ से दहला पाकिस्तान, 12 शहरों में लड़ाकों का राज: 41 लोगों की हत्या का बदला 20 पाक फौजियों की मौत

    BLA का क्वेटा समेत 12 शहरों पर भीषण हमला, पाकिस्तान की ज्यादतियों का बदला (साभार : X_@News_File3)
बलूचिस्तान इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है, जहाँ बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने शनिवार (31 जनवरी 2026) सुबह से पाकिस्तान के खिलाफ अपनी जंग के दूसरे चरण का ऐलान कर दिया है। पाकिस्तानी फौज की कथित ज्यादतियों और 41 लोगों की हत्या के जवाब में बलोच लड़ाकों ने ‘ऑपरेशन हेरोफ’ के तहत राजधानी क्वेटा समेत 12 प्रमुख शहरों पर भीषण हमले शुरू किए हैं।

विद्रोहियों ने कई पुलिस थानों और सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया है, जबकि जवाबी कार्रवाई में कम से कम 20 पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की खबर है। हालत इतने खराब हैं कि कई जगहों पर पाकिस्तानी फौज को अपनी चौकियाँ छोड़कर भागना पड़ा है और अब वे लड़ाकू हेलीकॉप्टरों के जरिए आसमान से हमले कर रहे हैं।

क्वेटा से ग्वादर तक बारूद की गूँज और थानों पर कब्जा

शनिवार (31 जनवरी 2026) सुबह करीब 6 बजे राजधानी क्वेटा एक जबरदस्त धमाके से दहल उठी, जिसके बाद लगातार दो घंटे तक गोलीबारी होती रही। BLA के हथियारबंद लड़ाकों ने न सिर्फ क्वेटा, बल्कि ग्वादर, नुश्की, मस्तुंग और पसनी जैसे जिलों में एक साथ मोर्चा खोल दिया है।

मस्तुंग में विद्रोहियों ने पुलिस स्टेशन पर कब्जा कर करीब 30 कैदियों को रिहा कर दिया है। क्वेटा के अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है और रेल सेवाओं को पूरी तरह रोक दिया गया है। लड़ाकों ने सड़कों पर गश्त करते हुए वीडियो जारी किए हैं, जिनमें पाकिस्तानी फौज की गाड़ियों को जलते हुए देखा जा सकता है।

‘करो या मरो’ की जंग और BLA चीफ की अपील

बीएलए के कमांडर-इन-चीफ बशीर जेब बलूच ने एक वीडियो संदेश जारी कर इस हमले को अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए ‘निर्णायक दौर’ बताया है। उन्होंने आम जनता से घरों से बाहर निकलकर लड़ाकों का साथ देने की अपील की है। प्रवक्ता जियांद बलोच का कहना है कि यह कब्जा करने वाली ताकतों के खिलाफ अंतिम प्रतिरोध है।

उन्होंने चेतावनी दी कि बलूच हर गली और मोहल्ले से दुश्मन का सफाया करेंगे। यह हमला अगस्त 2024 में शुरू हुए ‘ऑपरेशन हेरोफ’ का अगला हिस्सा है, जिसके पहले चरण में विद्रोहियों ने 130 सैनिकों को मारने का दावा किया था।

इंटरनेट बंद और चीन को भी बड़ी चेतावनी

तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने क्वेटा, सिबी और चमन जैसे इलाकों में मोबाइल डेटा सर्विस बंद कर दी है ताकि विद्रोहियों के बीच संपर्क न हो सके। नसीराबाद में रेलवे ट्रैक पर एंटी-टैंक माइन और विस्फोटक बरामद हुए हैं, जिससे बड़ी तबाही की साजिश का पता चलता है।

इस बीच, बलोच विद्रोहियों ने चीन को भी सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि वह ग्वादर और बलूचिस्तान के प्रोजेक्ट्स से दूर रहे, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा। फिलहाल बलूचिस्तान के रेड जोन से लेकर सुदूर इलाकों तक भारी गोलीबारी और धमाकों का सिलसिला जारी है।

आज हुए चुनाव तो NDA को 352 सीटों का अनुमान, बीजेपी अपने दम पर 287 सीटें जीत सकती है


भारत की राजनीति में एक बार फिर ‘मोदी फैक्टर’ और NDA की मजबूती को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इंडिया टुडे–सी वोटर के ताजा ‘मूड ऑफ द नेशन’(MOTN) सर्वे के अनुसार, यदि जनवरी 2026 में आज लोकसभा चुनाव कराए जाएँ तो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(NDA) बड़े बहुमत के साथ सत्ता में लौट सकता है।

सर्वे में अनुमान जताया गया है कि NDA को 350 से अधिक सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस  के नेतृत्व वाला INDIA गठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है। यह सर्वे 8 दिसंबर 2025 से 21 जनवरी 2026 के बीच किया गया, जिसमें देशभर के 36,265 लोगों को शामिल किया गया।

इसमें हर आयु वर्ग, जाति, धर्म और लिंग के लोगों की राय ली गई और सर्वे में लगभग 5% तक मार्जिन ऑफ एरर की संभावना भी बताई गई है।

NDA को 352 सीटों का अनुमान, बीजेपी अपने दम पर बहुमत के करीब

MOTN सर्वे के मुताबिक, अगर आज लोकसभा चुनाव हों तो NDA को कुल 352 सीटें मिलने का अनुमान है। यह आँकड़ा 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA को मिली 293 सीटों से काफी अधिक है। सर्वे बताता है कि भारतीय जनता पार्टी अकेले 287 सीटें जीत सकती है, यानी पार्टी अपने दम पर बहुमत का आँकड़ा पार कर सकती है।

अगस्त 2025 के सर्वे में बीजेपी को 260 सीटें मिलने का अनुमान था, जो अब बढ़कर 287 हो गया है। वहीं कांग्रेस को इस सर्वे में केवल 80 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है, जो 2024 में मिली 99 सीटों से कम है। इसके अलावा अन्य दलों के खाते में 176 सीटें जाने का अनुमान लगाया गया है।

इतना ही नहीं अगर विपक्ष ने वोट चोरी और संवैधानिक संस्थाओं को आरोपित करना नहीं छोड़ा उनकी सीटें और भी कम होने की संभावना है। अगर NDA के शासन में हो रहे भ्रष्टाचार पर FIR कर उजागर करने, दूसरे, घुसपैठियों को निकालने में सरकार का सहयोग पर ही INDI गठबंधन राहत पा सकता है। 

वोट शेयर में भी NDA आगे, INDI गठबंधन को नुकसान

सर्वे में गठबंधन स्तर पर वोट प्रतिशत का भी अनुमान लगाया गया है। इसके अनुसार, यदि आज चुनाव हों तो NDA को करीब 47% वोट शेयर मिल सकता है, जबकि INDI गठबंधन को 39% वोट मिलने की संभावना है। वहीं अन्य दलों के हिस्से में 14% वोट जा सकते हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में NDA को लगभग 43–44% वोट शेयर मिला था, जबकि INDIA गठबंधन को करीब 40% वोट मिले थे। अगस्त 2025 के सर्वे में NDA को 47% और INDIA गठबंधन को 41% वोट शेयर मिलने का अनुमान था। इस बार INDIA गठबंधन के वोट शेयर में गिरावट देखी जा रही है।

मोदी सबसे पसंदीदा चेहरा, लोकप्रियता कायम

सर्वे में प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे बेहतर चेहरे को लेकर भी सवाल किया गया। इसमें 55% लोगों ने नरेंद्र मोदी को अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त बताया। अगस्त 2025 में यह आँकड़ा मोदी के लिए 52% था, यानी मोदी की लोकप्रियता में हल्का इजाफा हुआ है। पीएम मोदी की अप्रूवल रेटिंग 57% दर्ज की गई है, जो अगस्त 2025 में 58% थी।

इसके अलावा सर्वे में लोगों से यह भी पूछा गया कि देश का अब तक का सबसे बेहतर प्रधानमंत्री कौन रहा है। इस पर 50% लोगों ने नरेंद्र मोदी का नाम लिया, जबकि 12% लोगों ने इंदिरा गाँधी और 12% लोगों ने अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री बताया।

पाकिस्तान : मुस्लिम Gen Z ने खोली पोल, फौज-सरकार ने लेख डिलीट करवा खुद के पैर पर मारी कुल्हाड़ी

                                            पाकिस्तानी छात्र का लेख सेना ने किया डिलीट
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख अमेरिका को ‘खुश’ करने में लगे हैं। वहाँ जोरदार लॉबिंग की जा रही है ताकि छवि सुधारी जा सके। ऑपरेशन सिंदूर के बाद हर महीने $50,000 यानी 45 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। छवि सुधारने में अब तक 9 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। लेकिन Gen Z हुक्मरानों को ये बता रहे हैं कि ‘तुमसे ना हो पाएगा’।

तंगहाली के बीच लॉबिंग में खर्च किए करोड़ों

FARA के दस्तावेज बता रहे हैं कि पाकिस्तान सरकार और उसके थिंक टैंक अमेरिका में अपनी छवि सुधारने में लगे हुए हैं। इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने यूनाइटेड स्टेट्स में लॉबिंग और पब्लिक पॉलिसी आउटरीच पर $900,000 यानी ₹80864097.30 खर्च किए। इस दौरान पाकिस्तानी दूतावास ने अमेरिकी फर्म एर्विन ग्रेव्स स्ट्रैटजी ग्रुप LLC के साथ समझौता किया, ताकि हर अमेरिकी सांसद, अधिकारियों और नीति बनाने वालों तक पहुँच बन सके। मीडिया में नैरेटिव बदलने के लिए एक अमेरिकी कंपनी, कॉर्विस होल्डिंग इंक को लगाया गया ताकि पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के लिए अमेरिकी दौरे के दौरान आर्मी चीफ आसीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने रेयर अर्थ मिनरल्स भी गिफ्ट किए। इसका नतीजा ये रहा कि रेयर अर्थ मिनरल्स और मेटल्स पर पाकिस्तान और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच करार हुआ। दस्तावेज में खोज, माइनिंग, प्रोसेसिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर सहयोग के बारे में बताया गया है, जिसकी $1 ट्रिलियन यानी करीब 8.9 लाख करोड़ रुपए तक इंडिकेटिव कमर्शियल वैल्यू होगी।

बुजुर्गों की इतनी ‘कोशिश’ के बावजूद Gen Z इन्हें देश के लिए ‘बेकार’ बता रहे हैं।

बगावत के लिए तैयार पाकिस्तान के Gen Z

पाकिस्तान के Gen Z का गुस्सा भड़क रहा है। ये लोग सत्ता पर काबिज नेताओं और सेना के अधिकारियों को चुनौती दे रहे हैं। सेना ने एक वायरल लेख को हटवा दिया है, जिसमें उनकी पोल पट्टी खोली कर रख दी गई थी।

देश के हर हिस्से में हो रहे विरोध को कुचलने वाली असीम मुनीर की सेना को एक लेख ने विचलित कर दिया। कैसे पाकिस्तान के सोशल मीडिया यूजर इस मुद्दे पर अपनी सरकार-सेना को घेर रहे हैं, ट्विटर पर इस ट्रेंड को देख कर समझा जा सकता है।

इसमें कहा गया है कि ‘जितना चाहें, आप लोगों को लड़वाएँ’, जेन जी इस पर मीम बनाएगा। दरअसल अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ अर्कांसस में PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी के एक लेख को डिलीट कर दिया गया। इसमें उसने पाकिस्तान के हुक्मरानों को साफ-साफ बताया था कि Gen Z अब उनकी बातों में आने वाला नहीं है और न ही उनके झूठे दावों को मानने वाला है।

इसमें बताया गया है कि नौजवान और जेन जी अब पुराने नेताओं की बातों में नहीं आने वाले हैं। पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था से यह बगावत की शुरुआत है। लेख देखते ही देखते वायरल हो गया। इससे घबराकर लेख को डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया।

पाकिस्तान में अब Gen Z बगावत करने जा रहे हैं। इस बगावत में हिंसा नहीं बल्कि विचार है। विचारों को रोकने के लिए पाकिस्तानी शासन के प्रयास को भी ये लेख बता रहा है। जबरदस्ती चुप करने की कोशिश की जा रही है। बगावत की शुरुआत एक युवा पाकिस्तानी छात्र के विचार से शुरू हुआ है। उसने बताया है कि कैसे देश की युवा पीढ़ी पुराने नेताओं के आदेश मानना ​छोड़ चुकी है।

लेख में साफ कहा गया है कि “आप जितना चाहे उतना लड़ाइयाँ करवा सकते हैं, Gen Z उससे मीम बनाएगा। सभी मेनस्ट्रीम मीडिया को सेंसर कर दो, Gen Z अपनी राय बताने के लिए रंबल, यूट्यूब और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर चला जाएगा। बूमर्स, अब आप विचारों को सेंसर नहीं कर सकते। वे दिन गए जब आप लोगों को बेवकूफ बना सकते थे। अब किसी को बेवकूफ नहीं बनाया सकता है।”

यह लेख एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन पर था, जो अब मौजूद नहीं है यानी जैसा लेखक जोरैन निजमानी ने कहा, ठीक वैसा ही हुआ है। यहाँ सच बताने के लिए यूट्यूब से लेकर दूसरे सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। चैनल पर सेना प्रमुख असीम मुनीर और शहबाज सरकार के खिलाफ खबरें आनी बंद हो गई हैं। इस पर ही Gen Z कह रहा है कि इस तरह की घटिया तरीकों से हुक्मरान नहीं बच सकते। सच को ज्यादा देर तक दबाया नहीं जा सकता।

पाकिस्तानी सेना के हुक्म से हटाया गया लेख

अमेरिका में रहने वाले पाकिस्तानी PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी का ‘इट इज ओवर’ टाइटल वाला यह लेख असल में 1 जनवरी को एक जाने-माने पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर था। हालाँकि कुछ घंटों बाद ही इसे हटा दिया गया। इसके पीछे पाकिस्तान की आर्मी का दबाव था।

दरअसल निजमानी जेन जी के बीच इस लेख की वजह से ‘हीरो’ बन गया। लेख पर रोक के बाद इसका स्क्रीन शॉट जेन जी शेयर कर रहे हैं। जेन जी का गुस्सा आसीम मुनीर की पाकिस्तानी आर्मी पर दिख रहा है। इसे सेंसरशिप कहा जा रहा है और बेबाक लेखन के लिए एक्टर फाजिला काजी और कैसर खान निजमानी के बेटे जोरैन निजमानी की तारीफ की जा रही है।

देशभक्ति जबरन पढ़ाई-सिखाई नहीं जाती- जोरैन निजमानी

लेख में बताया गया है कि पाकिस्तान के सत्ताधारी वर्ग का अब युवा पीढ़ी पर अपना असर खत्म हो गया है। देश के हुक्मरान देशभक्ति को बढ़ाने के लिए स्पॉन्सर लेक्चर, सेमिनार और कैंपेन चला रहे हैं, इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। सरकार के ये सारे प्रयास बेकार हैं।

उन्होंने लिखा, “सत्ता में बैठे बड़े-बूढ़ों पर से युवा पीढ़ी यकीन नहीं कर रही है। ये लोग समझ रहे हैं कि सत्ताधारी बस आम जनता को बरगला रहे हैं। ये लोग स्कूलों और कॉलेजों में देशभक्ति को बढ़ावा देने के लिए चाहे कितने भी वाद-विवाद और सेमिनार कर लें, यह काम नहीं कर रहा है।”

सेना का नाम लिए बिना सारी बातें कही गई है। पीएचडी छात्र निजमानी कहते हैं कि देशभक्ति भाषणों या नारों से नहीं सिखाई जा सकती, बल्कि यह अपने आप बढ़ती है, जब नागरिकों को समान अवसर, भरोसेमंद इंफ्रास्ट्रक्चर, काम करने वाले सिस्टम और गारंटी वाले अधिकार दिए जाते हैं।

उन्होंने कहा, “जब बराबर मौके, अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर और अच्छे सिस्टम हों तो देशभक्ति अपने आप आती ​​है। जब आप आम जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरी करते हैं। उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि उनके अधिकार सुरक्षित हैं, तब आपको स्कूलों या कॉलेजों में जाकर देशभक्ति सिखाने की जरुरत नहीं होती। लोग खुद ही अपने देश को पसंद करते हैं।”

पाकिस्तानी सच्चाई को बता रहा ये लेख हुक्मरानों को इतना कड़वा लगा कि उन्होंने इसे हटवा दिया, क्योंकि जनता असलियत को समझ रही है। हालाँकि लेख Gen Z और Gen Alpha को सेंटर में रख कर लिखा गया है।

इसमें कहा गया है, “युवा दिमाग, Gen Z, Alphas अच्छी तरह जानते हैं कि क्या हो रहा है। देशभक्ति के विचार को ‘बेचने’ की कोशिशों को वे अच्छी तरह समझ रहे हैं। इंटरनेट की वजह से, हमारे पास जो भी थोड़ी बहुत एजुकेशन बची है, उसकी वजह से लोगों तक बातें पहुँच रही हैं। वरना लोगों को अनपढ़ रखने की सत्ता पर बैठे लोगों ने पूरी कोशिश की, लेकिन फेल हो गए। हालाँकि जनता अपनी बात डर की वजह से नहीं कह पा रही है, क्योंकि उसे साँस लेना ज्यादा पसंद है।”

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया की जानकारी लोगों तक पहुँचाना आसान बना दिया है, इसलिए लोगों की सोच को कंट्रोल नहीं किया जा सकता। युवाओं में काफी बेचैनी है, जो लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने आगे कहा, “युवा समझ रहे हैं कि वे सत्ता में बैठे लोगों को चैलेंज नहीं कर सकते, इसलिए देश छोड़ रहे हैं। वे चुपचाप निकल जाना पसंद करेंगे। पीछे मुड़कर भी नहीं देखेंगे क्योंकि उनके दोस्तों ने आवाज उठाई तो उन्हें चुप करा दिया गया।”

पाकिस्तान में लेख हटाने का हो रहा विरोध

डिजिटल प्लेटफॉर्म से लेख हटाने का पाकिस्तान में काफी विरोध हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की कनाडाई विंग ने दावा किया कि आर्टिकल हटाने से यह पक्का हो गया है कि जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती।

पार्टी ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “ज़ोरेन निज़ामानी का आर्टिकल ‘इट इज ओवर’ को हटाया जाना, ये बताता है कि पाकिस्तान का सच क्या है। जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती। Gen Z करप्शन, गैर-बराबरी और दोहरे चरित्र को समझती है। इंसाफ़, नौकरी और इज्जत के बिना प्रोपेगैंडा फेल हो जाता है। पुराने कंट्रोल के तरीके खत्म हो गए हैं, युवा आगे बढ़ गए हैं।”

पाकिस्तानी एक्टिविस्ट मेहलका समदानी ने लिखा, “हैरानी की बात नहीं है कि यह लेख अब एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन से एक्सेस नहीं हो रहा है – ठीक वैसी ही सेंसरशिप जिसके बारे में ज़ोरेन बात करते हैं।”

वकील अब्दुल मोइज़ जाफ़री ने कहा, “यह बहुत बढ़िया लेख है। पाकिस्तान में अपनी नौकरी में फेल हो रहे हर जवान से लेकर हर बूढ़े आदमी के दिल से लिखा गया है।” पाकिस्तान की मानवाधिकार आयोग ने भी लेख हटाने की आलोचना की है और कहा है कि एक्सप्रेस ट्रिब्यून से जोरीन निजमानी का लेख हटाना पाकिस्तान में बोलने की आजादी पर बढ़ती पाबंदियों का उदाहरण है।

पाकिस्तान की ये हालत है कि बलूचिस्तान, पीओके समेत कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। खाने-पीने के लाले पड़े हैं। आम जनता को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो रही। सबकुछ काफी महँगा हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। इस बीच जेन जी का गुस्सा भड़कने लगा है। हुक्मरानों के ऐशो आराम जेन जी को दिख रहे हैं। ऐसे में भारत का एक और पड़ोसी देश जेन जी के गुस्से का शिकार होने के लिए तैयार है।

क्या UGC बिल मोदी सरकार को गिराने की साज़िश थी? UGC के नियमों पर सुप्रीम रोक; सच तो ये है कि “सवर्ण” भी जातीय भेदभाव के शिकार हैं; UGC के नियम तो अब ख़त्म ही समझो

सुभाष चन्द्र

भारत में जो जाति के नाम पर हिन्दुओं को बाँटने का घिनौना खेल सालों से खिल रहा है उसे गहराने के लिए क्या UGC बिल लाया गया था। अगर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई होती तो देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह द्वारा मंडल कमीशन को लाकर सवर्णों ने विरोध किया था, अगर UGC बिल पर रोक नहीं लगाई होती देश में इतना उपद्रव मच गया होता जिसकी आंच में मोदी सरकार का गिरना तय था। 

प्रधानमंत्री मोदी को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तत्काल हटाना ही नहीं, कैबिनेट मीटिंग में पूछना चाहिए कि बिल पर बयानबाज़ी करने से पहले पढ़ा क्यों नहीं। टीवी पर हुई चर्चाओं में एक बात सामने आयी कि "किसी सवर्ण पर जाति टिप्पणी पर सजा देने से पहले उसकी पुष्टि करनी होगी, गलत पाने पर शिकायतकर्ता पर कानूनी कार्यवाही होगी।" लेकिन इसको को निकाल दिया गया। दूसरे जेएनयू के प्रोफेसर ने RJD महिला प्रवक्ता यादव का एक जो विवादित वीडियो -जिसमे यादव उच्च जाति के लिए कह रही है कि इसको फंसाना है..." उसी चर्चा में शामिल उसी महिला यादव को उसकी औकात दिखाई थी।        

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सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या  बागची की पीठ ने UGC Regulations 2026 पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा कर 2012 के नियमों को लागू रखने का आदेश दिया है। CJI ने यह भी कहा कि ये बहुत गंभीर मामला है और अगर हम दखल नहीं देंगे तो समाज के लिए विभाजनकारी हो सकता है और इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। इससे पैदा होने वाले हालातों में समाज के शरारती तत्व लोगों का शोषण कर सकते है। 

कोर्ट ने अगली सुनवाई 19 मार्च की तय की है और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस मामले को देखने के लिए एक नामचीन कानूनविदों की समिति बनाने के लिए कहा है जो इस पर विचार करे। इस समिति का मतलब है 3-6 महीने के लिए मामला लटक गया और उसके बाद The Viksit Bharat Shiksha Adhishthan Bill, 2025 संसद से पारित हो जाएगा जो UGC को ही समाप्त कर देगा अन्य 2 संस्थानों के साथ और जब UGC ही ख़त्म हो जाएगा तो उसके 2026 के नियम स्वत ही खत्म हो जाएंगे

एक बात तो निश्चित है कि UGC के जिन नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने कहा “The Regulations are, we are sorry to say prima facie, the language there is completely vague, the provisions are capable of misuse” वे नियम UGC ने अपने रेगुलेशन में कैसे और किसके कहने पर डाले। इसके पीछे गहरी साजिश और शरारत थी ऐसा लगता है, सरकार को ही बदनाम करने की नहीं बल्कि मोदी को निजी तौर पर निशाना बनाने की

न्यूज़ पोर्टल्स पर कहा गया है कि UGC ने विश्विद्यालयों में जातीय भेदभाव की शिकायते बढने की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट और The Viksit Bharat Shiksha Adhishthan Bill, 2025 को देखने वाली संसदीय समिति को भेजी थी जबकि समिति ने ऐसी कोई रिपोर्ट UGC से नहीं मांगी थी। UGC का संसदीय समिति को बिना मांगे रिपोर्ट भेजना ही संदेह पैदा करता है और इशारा करता है कि UGC के भीतर से ही शरारत की गई जिसके लिए मैं UGC के चेयरमैन विनीत जोशी को भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं रख सकता।

 

बहुत लोगों का मानना है कि इस कांड के पीछे दिग्विजय सिंह का हाथ जो संसदीय समिति के अध्यक्ष है। निजी रूप से दिग्विजय सिंह ने विनीत जोशी को कुछ कहा हो तो कह नहीं सकते लेकिन समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद को 10 फरवरी तक देनी है और इस बीच समिति कोई अंतरिम रिपोर्ट किसी को नहीं देती। 

कुछ लोग मेरे लेखों पर मुझसे नाराज हुए थे और मुझे ब्राह्मणों के खिलाफ भी कह दिया गया जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। हिंदू समाज के सभी वर्गों की अलग अहमियत है लेकिन ब्राह्मण हिंदू समाज की रीढ़ हैं और सदा आदरणीय रहेंगे। मुझे केवल इस बात पर शोभ था कि UGC के नियमों के विरोध में निजी रूप से नरेंद्र मोदी के लिए बहुत बुरा भला कहा गया और अपशब्द कहे गए। बाद में तो मोदी की कब्र खोदने की नारे लगाए गए, पुतले जमीन पर डाल कर डंडे बरसाए गए जो शर्म की बात है जबकि मोदी का सीधा इस प्रकरण में कोई हाथ नहीं था। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन देश, समाज और जनता के कल्याण के लिए लगा दिया उसका ऐसा अनादर देख कर मैं क्षुब्ध था। 

सवर्ण समझ को “ऊंची जाति” के वर्ग में शामिल किया जाता है। जब सवर्ण समाज भी जाति ही है तो वह भी जातीय भेदभाव का शिकार हो ही नहीं सकता है बल्कि सबसे बड़ा शिकार है क्योंकि उस पर ही सबसे ज्यादा झूठे आरोप लगाए जाते हैं। 

केवल कानून से समाज की समस्याएं दूर नहीं होती। दहेज़ विरोधी कानून आया, क्या दहेज़ प्रथा बंद हो गई, SC/ST act आया लेकिन ऐसा दुरूपयोग हुआ कि लोग वर्षों तक बेकसूर होते हुए भी जेलों में रहे लेकिन क्या SC/ST act के उद्देश्य पूरे हुए, नहीं

बॉलीवुड ने ब्राह्मणों, वैश्यों और ठाकुरों को दलितों पर अत्याचार करने वालों की छवि लोगों के दिलों में बिठा दी है। उसका ही असर है कि सवर्ण समाज और SC/ST/OBC समाज एक दूसरे को परस्पर विरोधी समझते हैं

धर्म बदलने वाले SC-ST नहीं ले सकते आरक्षण: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण के बाद लाभ को बताया ‘संविधान के साथ धोखा’

                               आरक्षण पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला (साभार: AI ChatGPT/Canva)
भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…

कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण

ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।

                                                         साहनी की याचिका

                                   याचिका का पूरा हिस्सा

हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी

ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।
लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”
                                                            गवाह का बयान रहा अहम
                                                       गवाह लक्षन के बयान की कॉपी

इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।
यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”

धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?

अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।
कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।
जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”

सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।
                                           तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।
                                                            सूसई केस का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”
ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।

हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।
                                  इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।
                                                            हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”

सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।

क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।
जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।
क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।

आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत

भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।

इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”

न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”
हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।