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अखिलेश यादव ने फैलाया ‘नोटों के निजीकरण’ का झूठ, पॉलिमर शीट खरीदने के टेंडर पर गढ़ी कहानी: भूल गए UPA के दौर में विदेश से आता था करेंसी पेपर

                                            नोटों के निजीकरण पर अखिलेश का फर्जी दावा
विपक्ष का धरातल में जाने का मुख्य कारण झूठ परोस कर जनता को गुमराह करना है। अब तक जितने भी मुद्दों को विपक्ष ने उछाला सबके सब धराशाही हो गए। एक बात जो ध्यान देने वाली है कि राममन्दिर चढ़ावे में चोरी का मामला है यह चुनाव तक खींचेगा क्योकि उम्मीद की जा रही है कि अखिलेश और कुछ विपक्षी भी लपेटे में आएंगे। जो उत्तर प्रदेश में थाली में सजाकर योगी आदित्यनाथ को सत्ता सौंपने का काम करेगी।  

समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाया है कि क्या भाजपा सरकार में अब भारतीय बैंक नोटों का भी निजीकरण किया जा रहा है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी एक टेंडर का हवाला दिया है।

इस टेंडर में नोटों की छपाई के लिए इस्तेमाल होने वाली ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए कंपनियों से आवेदन माँगे गए हैं। इसे आधार बनाकर अखिलेश यादव ने X पर लिखा, “कमीशनखोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था।”

उन्होंने लिखा, “भ्रष्ट BJP राज में अब नोटों का भी प्राइवेटाइजेशन हो जाएगा क्या? कमीशनख़ोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था। जब देश की मुद्रा ही आत्मनिर्भर नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था और देश आत्मनिर्भर कैसे होगा? अब क्या सरकार भी आउटसोर्सिंग पर दे दी जाएगी?”

अखिलेश ने लिखा, “इतने बड़े और संवेदनशील कार्य के लिए इतना छोटा कंजूसीभरा टेंडर निकालने के पीछे, कहीं चुपके से औपचारिकता पूरा करने का कोई गलत मंसूबा तो नहीं है। लगता है सेटिंग पहले ही हो चुकी है, दिखाने को ख़ानापूर्ति की जा रही है। भाजपा सरकार नहीं, मुनाफाखोरों की भागीदार है।”

जिस टेंडर का अखिलेश यादव जिक्र कर रहे हैं, वह 17 जुलाई 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी किया गया एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) है। इसमें भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए उपयुक्त ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए आवेदन माँगे गए हैं। अखिलेश यादव का यह दावा कि इससे बैंक नोटों का निजीकरण हो रहा है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है।

यह टेंडर केवल BRBNMPL द्वारा एक विशेष प्रकार के कच्चे माल यानी बेस सब्सट्रेट की खरीद के लिए जारी किया गया है। इसका भारतीय मुद्रा की छपाई, डिजाइन, सुरक्षा फीचर्स या नोट जारी करने का अधिकार किसी निजी कंपनी को देने से कोई संबंध नहीं है। भारतीय नोटों की छपाई पहले की तरह ही केवल RBI के नियंत्रण वाली प्रेसों में होती रहेगी।

इनमें BRBNMPL की मैसूर और सालबोनी स्थित प्रेसें तथा सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) की नासिक और देवास स्थित प्रेसें शामिल हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ समय से पॉलिमर आधारित बैंक नोट लाने की संभावना पर विचार कर रहा है। खासकर छोटे मूल्य के नोटों के लिए क्योंकि वे जल्दी गंदे हो जाते हैं और उनकी जगह नए नोट छापने पड़ते हैं। जून 2026 में RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव शुरुआती चरण में है और केंद्रीय बैंक इसके फायदे और नुकसान का अध्ययन कर रहा है। भविष्य में ऐसा निर्णय होने पर भी नोटों की छपाई इन्हीं सरकारी प्रेसों में होगी, किसी निजी कंपनी के पास नहीं जाएगी।

 भारत में अभी पॉलिमर नोट जारी नहीं किए जाते और इसलिए यहाँ पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने वाली कोई कंपनी भी नहीं है। दुनिया के केवल कुछ ही देश पॉलिमर नोट जारी करते हैं। जैसे सामान्य कागज वाले नोटों के लिए इस्तेमाल होने वाले कॉटन पेपर में सुरक्षा फीचर पहले से शामिल होते हैं, वैसे ही पॉलिमर शीट में भी निर्माण के दौरान सुरक्षा फीचर जोड़े जाते हैं। इसलिए यह एक विशेष प्रकार का उत्पाद है जिसे दुनिया की केवल कुछ कंपनियाँ ही बनाती हैं। इसी कारण BRBNMPL ने योग्य कंपनियों से वैश्विक स्तर पर एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) माँगा है।

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, रोमानिया और वियतनाम जैसे कई देशों ने अपने सभी या अधिकांश मूल्य वर्ग के लिए पॉलिमर बैंक नोट अपनाए हैं। लेकिन ये देश भी इन नोटों के लिए जरूरी विशेष ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट खुद नहीं बनाते। ये शीट कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों से खरीदी जाती हैं। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी ऑस्ट्रेलिया की CCL Secure है।

इसकी बेस फिल्म इसकी सहयोगी कंपनी Innovia Films तैयार करती है। इसके बाद CCL Secure उस पर ओपैसिफिकेशन लेयर और संबंधित केंद्रीय बैंक की जरूरत के मुताबिक सुरक्षा फीचर जोड़ती है। दूसरी बड़ी कंपनी ब्रिटेन की De La Rue है जो अपना Safeguard पॉलिमर सब्सट्रेट बनाती है और तैयार बैंक नोट भी छापती है। दुनिया के केंद्रीय बैंक और उनकी नोट छापने वाली प्रेसें इन विशेष कंपनियों से तैयार पॉलिमर शीट खरीदती हैं। वे इन्हें खुद नहीं बनातीं।

अखिलेश यादव जहाँ पॉलिमर शीट के आयात को बैंक नोटों का निजीकरण बता रहे हैं तो वहीं हकीकत यह है कि भारत में भी हाल तक कागज वाले नोट आयातित सुरक्षा कागज पर ही छपते थे। RBI लंबे समय तक जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से आयातित करेंसी पेपर पर निर्भर था।

हालाँकि, होशंगाबाद की सिक्योरिटी पेपर मिल से कुछ घरेलू उत्पादन होता था लेकिन आत्मनिर्भरता को बड़ी मजबूती तब मिली जब मैसूर में बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने काम शुरू किया। SPMCIL और BRBNMPL के इस संयुक्त उपक्रम ने 2016 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। इससे भारत की उत्पादन क्षमता काफी बढ़ी और मेक इन इंडिया पहल के तहत आयातित बैंक नोट पेपर पर निर्भरता काफी कम हुई।

इसका मतलब यह है कि जब केंद्र में अखिलेश यादव की पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थी, तब भारत विदेशी देशों से आयात किए गए कागज पर बैंक नोट छाप रहा था।

यह टेंडर भविष्य में इस्तेमाल हो सकने वाली नई सामग्री की जाँच और तैयारी की एक सामान्य प्रक्रिया है और यह पूरी तरह RBI की निगरानी में होगी। आयातित शीट का इस्तेमाल ₹10 और ₹20 के नोटों के सीमित पायलट प्रोजेक्ट के लिए किया जाएगा। इससे बैंक नोटों के निजीकरण या मुद्रा पर सरकार के नियंत्रण में किसी तरह की कमी का कोई संकेत नहीं मिलता।

दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल भारत में डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में नकदी का इस्तेमाल होता है। इसलिए यदि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव लागू होता है तो बड़ी मात्रा में पॉलिमर शीट की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में विदेशी कंपनियाँ भारतीय निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर भारत में ही उत्पादन इकाइयाँ लगाने में रुचि लेंगी।

जहाँ तक अखिलेश यादव के इस आरोप का सवाल है कि इतने महत्वपूर्ण काम के लिए बहुत छोटा विज्ञापन जारी किया गया, तो आजकल टेंडर विज्ञापन इसी तरह प्रकाशित किए जाते हैं। विस्तृत निविदा दस्तावेज और सभी शर्तें संबंधित विभाग या एजेंसी की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाती हैं जबकि अखबारों में केवल छोटा-सा विज्ञापन देकर वेबसाइट का पता बताया जाता है। इससे खर्च कम रहता है क्योंकि बड़े अखबारी विज्ञापनों पर ज्यादा पैसा खर्च होता है। इस विज्ञापन में भी इच्छुक कंपनियों से कहा गया है कि वे EOI दस्तावेज, पात्रता मानदंड और अन्य जानकारी के लिए www.brbnmpl.co.in पर जाएँ।

ईरान-US के बीच सीजफायर: क्या खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’


ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

X पर सक्रिय ट्रोल पर हुई कार्रवाई तो भड़क गई कांग्रेस, मोदी सरकार को बनाने लगे निशाना: इन हैंडल्स से फैलाया जा रहा था एंटी इंडिया प्रोपगैंडा

सुप्रिया श्रीनेत ने किया प्रेस कॉन्फ्रेंस (साभार: X_SupriyaShrinate)

केंद्र सरकार ने IT एक्ट की धारा 69ए का इस्तेमाल करते हुए बुधवार (18 मार्च 2026) को कई ऐसे एक्स हैंडल्स पर कार्रवाई की है, जिनके माध्यम से सोशल मीडिया पर एंटी-इंडिया प्रोपगैंडा फैलाया जा रहा था। ये एक्स हैंडल अधिककर विपक्षी पार्टियों और उसके इकोसिस्टम से जुड़े थे, जिन्हें भारत में अब ‘Withheld’ कर दिया गया है। इस कार्रवाई का मकसद ऐसे कटेंट का प्रसार रोकना है, जो समाज में अव्यवस्था और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।

इस घटना के तुरंत बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सरकार पर अभिव्यक्ति की आजादी छीनने का आरोप लगाते हुए अभियान शुरू कर दिया। दिल्ली में पार्टी की सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म विभाग की प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

श्रीनेत ने इस कदम को बढ़ती सेंसरशिप की संस्कृति बताया और केंद्र पर आरोप लगाया कि वो असहमति को दबा रही है डिजिटल चर्चा पर अपना कब्जा मजबूत कर रही है और अपनी नीतियों की आलोचना करने वालों पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर स्वतंत्र असहमति वाली आवाजों को चुप कराने का पैटर्न अपनाया है।

श्रीनेत ने कहा कि ऐसे कदम दरअसल नौकरशाहों को खुली जानकारी तक पहुँचने के फैसले पर पावर दे देते हैं। सुप्रिया ने कहा, “यह सिर्फ कहानी गढ़ने की बात नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी की आत्मा पर हमला है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार मुख्यधारा के मीडिया में दखल के बाद अब सोशल मीडिया की दुनिया में भी अपना दखल बढ़ा रही है।

श्रीनेत ने आगे लिखा, “जिन लोगों पर असर पड़ा है उनमें से कई कांग्रेस के साथ नहीं हैं। कुछ तो हमारी फैसलों की आलोचना भी करते हैं लेकिन हम उनके समर्थन में आवाज उठाते हैं। हमने राहुल गाँधी से सीखा है कि किसी भी अन्याय का सामना करने वाले का साथ दें चाहे वो हमारे खिलाफ रहे हों और वो हमारे आधिकारिक सिस्टम का हिस्सा न हों बावजूद इसके कि भाजपा और उसके ट्रोल्स क्या कहते हैं।”

श्रीनेत यहीं नहीं रुकी, बल्कि कहा कि अकाउंट्स ब्लॉक करने से सवाल नहीं रुकेंगे। उन्होंने यह भी शिकायत की कि यह मुद्दा एक बड़ी समस्या का हिस्सा है और सरकार को बढ़ते संसदीय आर्थिक चुनौतियों और विदेश नीति की कमियों से ध्यान हटाने का आरोप लगाया।

श्रीनेत ने इसी तरह के तर्कों वाला एक वीडियो भी अपलोड किया और बैन किए गए अकाउंट्स के समर्थन में ट्वीट किया जिसमें उन्होंने फैसले को ‘अस्वीकार्य’ बताया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कायर’ कहा।

दिलचस्प बात यह है कि यह पुरानी बड़ी पार्टी असहमति कुचलने का लंबा इतिहास रखती है और अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करती रही है। फिर भी वह इन लोगों के पीछे खड़ी हो गई है न कि ऊँचे आदर्शों की सच्ची चिंता से बल्कि इसलिए कि वे विपक्ष की कहानी फैलाते हैं। बेशक यह उनके खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र कारण नहीं हो सकता क्योंकि उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में काफी कुछ शामिल है।

फेक न्यूज फैलाने में माहिर हैं ये अकाउंट

नेहर_हू 2 लाख 42 हजार 300 फॉलोअर्स वाला एक पॉपुलर अकाउंट है जो इस्लामो-लिबरल गुट का है जिस पर रोक लगी है। इसने बार-बार न सिर्फ झूठी खबरें फैलाईं बल्कि नस्लवाद दिखाया और भारतीय सेना पर आरोप लगाए। उसने न्यायपालिका की भी निंदा की क्योंकि उसने मशहूर जिम मालिक ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार को सुरक्षा नहीं दी जो पहलगाम आतंकी हमले के शिकारों का मजाक उड़ा रहा था और कह रहा था ‘केवल भारत में हीरो को विलेन बना दिया जाता है।’

उसने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का भाषण शेयर किया जिसमें ब्रिटेन की विविधता का जश्न था और कहा कि ‘भारत में ठीक उलटा है’ देश की निंदा करने का कोई मौका नहीं छोड़ा भले ही झूठ बोलकर। यह अकाउंट ‘अल्पसंख्यक खतरे में’ वाली बनाई गई कहानियाँ फैलाने में सबसे आगे रहा जबकि हिंदुओं पर हमलों को साफ कर दिया या उनके नरसंहार का मजाक उड़ाया।

साल 2024 में उसने ओपइंडिया के हिंदूफोबिया ट्रैकर का हवाला देकर कहा कि कश्मीर में हिंदू उत्तर प्रदेश से ज्यादा सुरक्षित हैं ताकि अपनी आश्चर्यजनक अपमानजनक और असंवेदनशील सोच दिखा सके। वह कश्मीरी पंडितों के जिहादियों के कारण पलायन को जानता है लेकिन फिर भी उनके दर्द का मजाक उड़ाता है।

इसी महीने अमेरिका के भारत राजदूत सर्जियो गोर और इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर सैमुअल जे पापारो भारत की वेस्टर्न आर्मी कमांड के चंडीगढ़ मुख्यालय गए। बातचीत पश्चिमी थिएटर की गंभीर सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित थी जो पाकिस्तान से सैन्य गतिरोध और दुश्मनी के कारण महत्वपूर्ण है।

लेकिन इस मीटिंग का इस्तेमाल प्रधानमंत्री मोदी को समझौता करने का आरोप लगाने के लिए किया गया जो कांग्रेस पार्टी अक्सर लगाती है और इससे रक्षा बलों की ईमानदारी पर सवाल उठाए गए।

नेहर_हू ने बिहार के लोगों पर उनके वोटिंग चॉइस के लिए नस्लवादी हमला किया और कहा ‘टॉयलेट में माइग्रेशन का मजा लो अगले 5 साल’ मेहनतकश मजदूर वर्ग का अपमान करने के लिए सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने उसकी पसंदीदा पार्टियों को वोट नहीं दिया।

“उत्तर प्रदेश और बिहार से लाखों प्रवासी त्योहार पर घर जाने के लिए भयानक तकलीफ झेलते हैं। कुछ तो मर भी जाते हैं” उसने 2024 में इसी तरह कहा और उन्हें केसरिया पार्टी को सपोर्ट करने के लिए कोसा और आरोप लगाया कि उसकी सरकार ने वंदे भारत अमीरों के लिए शुरू किया। उसने इसमें ‘जैसा बोया वैसा काटा’ जैसे तंज भी खुशी खुशी जोड़े। इस आदमी ने लगातार राज्य और उसके रहने वालों को स्वच्छता और दूसरी चीजों पर नीचा दिखाया है।

एक महिला ने बताया कि उसने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में समाजवादी पार्टी को वोट दिया था लेकिन उसे भाजपा का स्लिप मिल गया। हालाँकि उसने ये भी कहा कि मेरे साथ छोटा बच्चा था वोटिंग के समय जिस वजह से गलत बटन दब गया और मुझे ईवीएम से कोई समस्या नहीं है।” लेकिन उसकी झूठी बात का इस्तेमाल करके उसने भारत के चुनाव आयोग की निंदा की।

उसने और अल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने पत्रकार निशा पाल को निशाना बनाने की कोशिश की क्योंकि उन्होंने पहलगाम आतंकी घटना ऑपरेशन सिंदूर और इजराइल-हमास युद्ध के बारे में कुछ मुस्लिम बच्चों से सवाल पूछे थे।

उसने एक वीडियो भी अपलोड किया जिसमें कथित पाकिस्तानी आदमी भारतीय क्रिकेट टीम की जीत का जश्न मना रहा था और कह रहा था कि इस्लामिक रिपब्लिक भारत से बेहतर देश है जबकि अपने देश के खिलाफ आतंकवाद समेत सभी बड़े अपराधों को नजरअंदाज कर रहा था।

मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी के रूप में छिपा एंटी इंडिया प्रोपगैंडा

डॉ निमो यादव 2.0 एक और प्रमुख अकाउंट जो भारत में बैन हो गया है उसने दो केंद्रीय मंत्रियों को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से जोड़ने तक की हद पार कर दी। उसने कहा, “क्या यह सच है कि एन सीतारमण का ऑफिस और राजीव चंद्रशेखर ट्विटर पर उस व्यक्ति को फॉलो कर रहे थे जो भारत में आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा था।” इसने इन नेताओं की जाँच NIA से कराने की डिमांड तक रख डाली।

इस बीच जिन पार्टियों को ये लोग सपोर्ट करते हैं वे वोट बैंक के लिए माफिया और गैंगस्टरों को बढ़ावा दे रही हैं और अपनी एजेंडा थोपने के लिए मानवीय सीमाओं को पार कर रही हैं। उसने भारतीय सेना के अधिकारियों के दिखने पर मजाक भी किया और कहा, “यह तब होता है जब मिड-डे मील में अंडे बैन कर दो।” इस तरह से वो वर्दीधारी सैनिकों का सम्मान करता है, जिन्होंने युद्धक्षेत्र में पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मनों से लड़ते हुए अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया।

इन हैंडल्स पर निखिल गुप्ता की गिरफ्तारी पर मजा लिया जो खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के असफल हत्या षड्यंत्र में शामिल था और चाहा कि उसकी कहानी धुरंधर 2 में दिखाई जाए, जिसमें आर माधवन भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का रोल करते हैं। यह भारतीय खुफिया एजेंसियों का मजाक उड़ाने का उसका दयनीय प्रयास था।

डॉ निमो यादव 2.0 ने एक और पोस्ट में दावा किया कि ‘भारत के लिए चीजें अच्छी नहीं लग रही’ क्योंकि ‘रूस ने पाकिस्तान को सस्ते दाम पर कच्चा तेल ऑफर किया’ जिसे उसने सरकार की बड़ी असफलता बताया। दूसरी तरफ भारत रूस से बहुत सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा है खासकर 2022 में अमेरिका की धमकियों और टैरिफ के बावजूद।

वह जानता है कि रूस का पाकिस्तान को ऑफर भारत की इजराइल से निकटता की तरह दोनों देशों के रिश्तों में बाधा नहीं डालता फिर भी उसने अपनी प्रचार से मुँह नहीं मोड़ा।

अलग-अलग अकाउंट्स लेकिन काम एक जैसा

इसी तरह की पाबंदी मनीष आरजे के अकाउंट पर भी लगी है। उसने दावा किया था कि बिहारी वोटरों ने अपनी आत्मा 10 हजार में बेच दी क्योंकि उन्होंने भाजपा को सपोर्ट किया। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया इस गुट को तभी स्वीकार्य लगती है जब उनकी पसंदीदा पार्टियाँ जीतती हैं।

उसने भी बाकियों की तरह झूठी जानकारी फैलाने से खुद को नहीं रोका और इजराइल को ‘फादरलैंड’ कहा गलत तरीके से प्रधानमंत्री मोदी को इसका श्रेय देते हुए जबकि मोदी ने भारतीय यहूदियों के बारे में कहा था कि वे पश्चिम एशिया के उस देश को अपना पिता मानते हैं जबकि भारत को मातृभूमि।

आरजे ने कोलकाता मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुई भयानक बलात्कार और हत्या की घटना में पीड़िता की माँ को भी अपनी छोटी राजनीति में घसीट लिया और आरोप लगाया कि न्याय की उनकी गुहार दरअसल भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा से थी। उसने शोक संतप्त महिला की बेइज्जती की, जबकि उसे सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार से जवाब माँगना चाहिए था।

उसने लगातार उन पोस्ट्स को रीट्वीट किया जो भू-राजनीतिक संकट से भारतीयों पर पड़ने वाले नुकसान का मजाक उड़ाती हैं।

‘एक्टिविस्ट और सोशल वर्कर’ संदीप सिंह लिस्ट में एक और नाम है जो कांग्रेस का खासकर हरियाणा यूनिट का खुलकर समर्थन कर रहा है कई पोस्ट्स के जरिए जो श्रीनेत के दावे का खंडन करता है कि ये अकाउंट उनकी पार्टी को सपोर्ट नहीं करते।

इसके अलावा वह भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध चाहता है जैसा कि हालिया विवादित रिपोर्ट में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने कहा है धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर और भेदभाव रोकने के लिए। रिपोर्ट ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग पर टारगेटेड सैंक्शंस की भी सिफारिश की।

डॉ रंजन जिनके अकाउंट का भी यही हाल हुआ। उसने एक कार्यक्रम का वीडियो पोस्ट किया और गलत दावा किया कि मोदी सरकार के प्रभाव में भारतीय मीडिया नागरिकों से संकट और आपदाएँ छिपा रही है। उसका साफ मकसद है लोगों में डर पैदा करना और सरकार के खिलाफ नफरत भड़काना, बिना देश पर पड़ने वाले असर को सोचे।

उसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान को भी तोड़ मरोड़ कर पोस्ट किया और जातीय विभाजन पैदा करने की कोशिश की।

कुछ लोगों ने घटना के बाद अपने ट्वीट्स लॉक कर लिए जिससे कई सवाल उठे।

ये वही लोग हैं, जो हिंदू एक्टिविस्ट विजय पटेल के अकाउंट सस्पेंड होने पर खुश थे और मालाबार गोल्ड चाहता था कि उन्हें जेल भेजा जाए क्योंकि उन्होंने उनके पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर्स को हायर करने की आलोचना की थी जो ऑपरेशन सिंदूर की निंदा कर रहे थे। वे ‘सेंसरशिप’ का मजा लेते हैं जब तक वो उनके विरोधियों पर अन्यायपूर्ण तरीके से लगे। पाखंड और दोहरे मापदंड वाकई हैरान करने वाले हैं।

अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमित शाह ने कांग्रेस को उसके एडिटेड वीडियो का इस्तेमाल करने के लिए फटकार लगाई जिसमें आरोप था कि भाजपा की सत्ता आने पर आरक्षण खत्म हो जाएगा। यह वीडियो कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन और उनके पूरे नेटवर्क द्वारा असली बताकर फैलाया गया था। इस तरह नुकसान पहुँचाने के इरादे से गलत सूचना फैलाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ठीक वैसे ही देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी जो ऐसी तकनीकें इस्तेमाल करती रही है उसके इन अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई के बाद नाराज होना आश्चर्य की बात नहीं है।

रूस से पैसा लेते थे 150+ कांग्रेस सांसद, पत्रकारों ने दलाली में लिखे 16000 आर्टिकल- निशिकांत दुबे ने ‘कठपुतली गैंग’ की खोली पोल: इंदिरा हो या राजीव, DNA में ‘सूटकेस कल्चर’


पूर्व PM इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की Grok AI जनरेटेड तस्वीर, भाजपा MP निशिकांत दुबे (बाएँ)
भारत में बिकाऊ लोगों की कमताई नहीं। कदम-कदम पर बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र की औलादें मिल जाएँगी। देशहित में वर्तमान मोदी सरकार को इसकी जाँच कर सच्चाई को सामने लानी चाहिए। इन मुद्दों पर दर्ज होने मुकदमों की सुनवाई करने वाली निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट और इनकी पैरवी करने वकीलों पर गिद्ध की निगाह रख सबके खातों की जाँच करवानी चाहिए। अगर किसी भी रूप में इनके बचाव में निर्णय दिया जाता है। इन मुद्दों पर ऐसे ही सख्ती से पेश आना जैसाकि पाकिस्तान के साथ। 
आज विपक्ष खासतौर से कांग्रेस देश में लोकतंत्र और संविधान खतरे पर चीखाचिल्ली कर देश को गुमराह कर चोर मचाए शोर वाली हालत किये हुए है। ऐसा इसलिए कि जनता ही इतनी भुलक्कड़ है जो इनके कुकर्मों को भूल इनके पाखंड के चक्रव्यू में फंसते रहे हैं। EVM को लागू करने वाले ही इसको हटा बैलेट पेपर लाने का शोर मचा रहे हैं ताकि इनके गुंडे बैलेट बॉक्स लूटने और बैलेट पेपर फाड़ने के काम लग जाए। 
दूसरे, भारत में CAA विरोध में बने शाहीन बागों से लेकर हुए प्रदर्शन, धरने और उपद्रव आदि कोई जनता के हित में नहीं किए गए थे बल्कि जॉर्ज सोरोस और अन्य भारत विरोधियों की दी भीख के धन से कर दुनिया में भारत को बदनाम करने का दुस्साहस किया जा रहा है। अक्ल से पैदल जनता समझती है कि मोदी सरकार जनता के साथ बहुत अन्याय कर रही है। जो विरोधी भारत विरोधियों की हाथ कठपुतली बन देश में उपद्रव कर जनता को गुमराह करने वाले क्या देशहित में काम कर सकते हैं। 
 
 
दूसरे, LoP राहुल गाँधी की कार्यशैली क्या पद के अनुरूप है? स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगने वाला बताए क्या साबित करना चाहता है? साबित करता है कि इस आदमी को भारतीय इतिहास का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं।   
संविधान के मूल स्वरुप को बिगाड़ने वाले द्वारा जब संविधान की रक्षा का शोर मचाने वालों के कुकर्म को चोर मचाये शोर नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा? 
सोनिया गाँधी जिसे परिवार 'राजमाता' कहते है वही सोनिया उस FDL-AP की co-president जो कश्मीर विरोधी संगठन है। इतना ही नहीं कई पत्रकार भी शामिल हैं। यही वजह है कि कांग्रेस कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देती रही। अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करती है। INDI गठबंधन को समर्थन देने वाली जनता को इन पार्टियों से जवाब मांगना चाहिए।    
झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया है कि कभी कांग्रेस के 150 से अधिक सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे। उनका कहना है कि पत्रकारों के एक समूह भी रूस का दलाल था।

ट्विटर/एक्स पर निशिकांत दुबे ने ‘कांग्रेस, करप्शन और गुलामी’ शीर्षक के साथ किए पोस्ट में ये दावा किया है। उन्होंने कहा है;

  1. ये अवर्गीकृत गुप्त दस्तावेज सीआईए का 2011 में जारी हुआ।
  2. कांग्रेस के बड़े नेता एचकेएल भगत की अगुवाई में 150 से ज्यादा कांग्रेस के सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे, रूस के लिए दलाली करते थे?
  3. पत्रकारों का एक समूह दलाल था, कुल 16000 न्यूज आर्टिकल रूस ने छपवाए?
  4. उस जमाने में रूस के जासूसी संस्थानों के 1100 लोग हिन्दुस्तान में थे जो नौकरशाही, व्यापारी संगठनों, कम्युनिस्ट पार्टियों, ओपिनियन मेकर को अपने पॉकेट में रखते थे और सूचना के आधार पर भारत की नीति बनाते थे?
  5. कांग्रेस की उम्मीदवार सुभद्रा जोशी ने लोकसभा चुनाव में उस वक्त 5 लाख रुपए लिए जर्मन सरकार से चुनाव के नाम पर, हारने के बाद इंडो जर्मन फोरम की अध्यक्ष बनीं।
उन्होंने लिखा है, “यह देश था या ग़ुलामों, दलालों या बिचौलियों की कठपुतली। कांग्रेस इसका जवाब दे, आज इस पर जाँच हो या नहीं?”
यह पहला मौका नहीं है जब रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी से पैसे लेने और उनके इशारे पर काम करने का आरोप कांग्रेस पर लगा है। इससे पहले भी इंदिरा गाँधी और उनके बेटे राजीव के जमाने में कॉन्ग्रेस के ‘ब्रीफकेस कल्चर’ को लेकर को लेकर तथ्य सामने आ चुके हैं।
2017 की शुरुआत में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कुछ पुराने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए गए थे। इससे पता चलता है कि इंदिरा गाँधी के जमाने में कांग्रेस के 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिला था। 2005 में केजीबी के ही एक पूर्व जासूस वासिली मित्रोकिन की किताब आई थी। इसमें तो बकायदा बताया गया है कि खुद इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर पैसे भेजे गए थे।
                                                                                                                                                                                           साभार: indiafacts.org
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया को बताया था कि जो तथ्य सार्वजनिक हुए, उससे जाहिर होता है कि 1967 के आम चुनाव के वक्त कांग्रेस सहित देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों को विदेश से पैसा मिला था। उन्होंने बताया था कि शीत युद्ध के जमाने में कम्युनिस्ट देश जहाँ भारत में साम्यवाद के फैलाव के लिए पैसे खर्च कर रहे थे, तो पूँजीवादी देश साम्यवाद को रोकने के लिए। ऐसे में जब सत्ताधारी दल का नेता ही बिकने को तैयार हो तो विदेशी ताकतों के लिए चीजें आसान हो जाती है।
किशोर ने ऐसी कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए एक फेसबुक पोस्ट भी लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि विदेश से पैसा लेने के मामले की जाँच भी कराई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट दबा दी गई। जब कुछ विपक्षी सांसदों ने इसे सार्वजनिक करने की माँग की तो तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने संसद में कहा कि जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं, उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते, क्योंकि इससे उनके हितों को नुकसान पहुँचेगा।

लेकिन, सालों तक जिन तथ्यों को कांग्रेस छिपाती रही उसे मित्रोकिन ने 2005 में दुनिया के सामने ला दिया। वे सोवियत संघ के जमाने के हजारों गोपनीय दस्तावेज चुराकर देश से बाहर ले गए थे। बाद में इसके आधार पर क्रिस्टोफर एंड्रयू (Christopher Andrew) के साथ मिलकर किताबें लिखी। द वर्ल्ड वॉज गोइंग आवर वे (The World Was Going Our Way) नामक किताब में कहा गया है कि केजीबी ने 1970 के दशक में पूर्व रक्षा मंत्री वीके मेनन के अलावा चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार के लिए फंड दिया था।
2017 में सामने आई दिसंबर 1985 की सीआईए की रिपोर्ट में बताया गया है कि सोवियत संघ ने भारतीय कारोबारियों के साथ समझौतों के जरिए कांग्रेस पार्टी को रिश्वत दी थी। सोवियत संघ का दूतावास कांग्रेस नेताओं को छिपकर रकम देने सहित कई खर्चों के लिए बड़ा रिजर्व रखता था। इसके मुताबिक कांग्रेस के अलावा सीपीआई और सीपीएम को भी सोवियत संघ से काफी पैसा मिलता था। ऐसा नहीं है कि सभी को पैसे ही दिए गए थे। कुछ के साथ तो सोवियत संघ ने बकायदा समझौता भी किया था।

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि केजीबी के पैसे की वजह से भारत के ढेरो नेता सोवियत संघ की मुट्ठी में थे और वे भारतीय राजनीति को अपने हितों के हिसाब से प्रभावित करते थे। मित्रोकिन की किताब में भी यह बात कही गई है। केजीबी के लीक दस्तावेजों में भारत को तीसरी दुनिया की सरकारों में केजीबी के घुसपैठ का एक मॉडल बताया गया था। इन दस्तावेजों में साफ तौर पर भारत सरकार में केजीबी के बहुत से सूत्र होने की बात कही गई थी।

                                                                                                                                                                                               साभार: indiafacts.org

ऐसा भी नहीं है कि इंदिरा के बाद विदेश से पैसा लेने की कांग्रेस की आदत छूट गई। दस्तावेज बताते हैं कि सोवियत संघ से पैसा लेने का जो सिलसिला इंदिरा गाँधी के जमाने में शुरू हुआ था वह राजीव गाँधी के जमाने में भी जारी रहा है। हालॉंकि इस दौर में सोवियत संघ का प्रभाव कुछ सीमित करने की कोशिश भी हुई थी।

                                                                                                                                                                                                 साभार: indiafacts.org

ये दस्तावेज मीडिया में भी केजीबी की घुसपैठ के बारे में बताते हैं। इसके अनुसार सोवियत संघ ने अपने प्रोपेगेंडा के प्रचार के लिए भारत के बड़े मीडिया संस्थानों के साथ व्यापक पैमाने पर साँठगाँठ कर रखी थी। वे उसकी जरूरत के हिसाब से लेख लिखते थे। यहाँ तक की संपादकीय में भी सोवियत संघ की धुन बजाते थे। जिन संस्थानों का जिक्र है उनमें टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, द हिंदू शामिल है।

मित्रोकिन ने अपनी किताब में बताया है कि सोवियत संघ ने इस काम के लिए भारत में 40-50 पत्रकार रखे थे। बाद के सालों में इनकी संख्या बढ़कर 200 से 300 हो गई थी।

क्या मुनीर ईरान के लिए पाकिस्तान के "मीर ज़फर" बनेंगे? क्योकि इधर मोदी से बात, उधर पलट गए ट्रंप: एक बार फिर लिया भारत-पाक सीजफायर को रोकने का श्रेय, आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर किस अधिकार से मुनीर से सौदा किया जा रहा है?


भारत के ऑपरेशन सिंदूर में हुए आक्रामक हमलों से पाकिस्तान अभी तक कराह रहा है। भारत से बचाने के लिए शहबाज-मुनीर अमेरिका, चीन और तुर्किए से गुहार लगा रहे हैं। आसिम मुनीर अपने कटोरा लेकर अमेरिका में ट्रंप को हाजिरी लगाने पहुंच चुके हैं, जबकि शहबाज शरीफ अगले हफ्ते ईरान जाने वाले हैं, जहां भीख में हथियार मांग सकते हैं। इस बीच मोदी सरकार ने साफ-साफ अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर पाकिस्तान ने अब सीजफायर तोड़कर हमले की हिमाकत दिखाई, तो इस दफा उसका संपूर्ण संहार तय है। जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत यह भी साफ कर दिया कि किसी भी तरह का आतंकी हमला भी ‘एक्ट ऑफ वार’ माना जाएगा। इसलिए भारत लगातार युद्धाभ्यास में जुटा है, जिससे पाकिस्तानी हुक्मरानों की घबराहट बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान पीएम मोदी की तासीर से अब बखूबी वाकिफ हो गया है, वे अंदर घुसकर मारने में यकीन रखते हैं। एकाधिक बार हुई सर्जिकल स्ट्राइक से उन्होंने यह साबित भी किया है। भारत का युद्धाभ्यास सीधा मुनीर-शहबाज को अल्टीमेटम है कि अगर सीजफायर तोड़ने की हिमाकत दिखाने की जुर्रत भी की, तो ऑपरेशन सिंदूर से भी बड़ा ऑपरेशन शुरू हो जाएगा क्योंकि टारगेट लॉक हो चुके हैं। काउंटडाउन शुरू हो जाएगा और उसके बाद पाकिस्तान का विनाश निश्चित है।

पीएम मोदी की नीति जो भारत को छेड़ेगा, उसको छोड़ा नहीं जाएगा
भारत युद्ध में पहल पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि उसका मानना है कि यह युद्ध का युग नहीं है, बल्कि भारत बुद्ध का देश है, जो शांति में विश्वास रखता है। लेकिन इसके साथ ही पीएम मोदी की नीति है कि जो भारत को छेड़ेगा, उसको छोड़ा नहीं जाएगा। भारत ने इसके लिए जबरदस्त तैयारी शुरू कर दी है। सेना की ताकत में इजाफा किया जा रहा है, जिससे एक साथ तीन देशों को काउंटर किया जा सके। यदि पाकिस्तान ने सीजफायर करने की हिमाकत की तो इस बार भारत ट्रिपल प्रहार करेगा। सबसे पहले पाकिस्तान को तबाह करेगा। इस दौरान उसे हथियार भेजने वाले चीन और तुर्किए को भी सबक सिखाने की तैयारी है। पाकिस्तान में लगे चीन के डिफेंस सिस्टम और उसके हथियार डिपो तबाह कर दिए जाएंगे। इसी तरह तुर्किए के ड्रोन और वॉरशिप को भी निशाने पर लिया जाएगा। पाकिस्तान की घबराहट की सबसे बड़ी वजह भारत के हाईटेक हथियार हैं, जिन्होंने 48 घंटे में ही पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था।

दूरदर्शी विजन और अत्याधुनिक हथियारों से दुश्मन को किया नाकाम
पीएम मोदी के दूरदर्शी विजन ने हमारी सेनाओं को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाया है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ही तीन हथियार ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल पहली बार किसी कॉम्बैट ऑपरेशन में किया गया, जिसमें वो शत-प्रतिशत सफल रहे। राफेल, जिससे पाकिस्तान और पीओके में आतंकी अड्डों को तबाह किया गया। दूसरा हथियार है ब्रह्मोस, जिसने पाकिस्तानी एयरबेस को भारी नुकसान पहुंचाया और तीसरा हथियार है S-400, जिसने पाकिस्तान के हर हमले को नाकाम किया। हालांकि एस-400 के साथ आकाश और स्पाइडर के अलावा दूसरे एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तानी ड्रोन और जेट के के हमलों को 100 फीसदी नाकाम किया था।

भारत के अभेद्य सुरक्षा कवच को और अधिक मजबूत करने की तैयारी
भारत के अभेद्य सुरक्षा कवच के पीछे मजबूत वजह में लॉन्ग रेंज डिफेंस सिस्टम एस-400 है, जिसकी रेंज 400 किमी है। मीडियम रेंज का डिफेंस सिस्टम आकाश और बराक-8 है। आकाश की रेंज 70 से 80 किलोमीटर है, जबकि इजराइल के सहयोग से तैयार किए गए बराक की रेंज 70 से 100 किमी है। इसके अलावा शॉर्ट रेंज डिफेंस सिस्टम स्पाइडर और इग्ला-S है। स्पाइडर की रेंज 20 से 30 किमी है, जबकि इग्ला की रेंज 10 से 15 किमी है। इन डिफेंस सिस्टम का चक्रव्यूह तैयार किया गया, जिसमें पाकिस्तान का हर ड्रोन, हर मिसाइल फंस कर तबाह हो गए। अब भारत अपनी इस रक्षा प्रणाली में और ज्यादा इजाफा करने जा रहा है, जिसमें एयर डिफेंस के लिए तीन नई मिसाइलें तैनात की जाएंगी, जबकि एस-400 के बाकी 7 सिस्टम इस साल के आखिर तक भारत को मिल जाएंगे। पीएम मोदी के कार्यकाल में ही साल 2018 में एस-400 की डील हुई थी, जिसमें से तीन भारत को मिल चुके हैं, बाकी जल्द मिल जाएंगे। ऐसे भी कयास हैं कि एस-400 को लेकर नए कंसाइनमेंट की डील हो सकती है।

इधर पीएम मोदी से की बात, उधर पलट गए ट्रंप: एक बार फिर लिया भारत-पाक सीजफायर को रोकने का श्रेय, आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर हो रहा सौदा 

भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर श्रेय लेने की कोशिश की है। उन्होंने कहा, “मैंने ही पाकिस्तान से वॉर को रुकवाया था। मुझे पाकिस्तान पसंद है, मैं सोचता हूँ मोदी भी शानदार व्यक्ति हैं।”

दरअसल, बुधवार (18 जून 2025) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान फौज के जनरल आसिम मुनीर ने व्हाइट हाउस में साथ में लंच किया। इसके बाद मीडिया से बातचीत की। इस दौरान ट्रंप ने एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ्ता कराने का दावा किया।

साथ ही आसिम मुनीर की तारीफ करते हुए कहा कि मध्यस्थता के दौरान पाकिस्तान ने भी काफी प्रभावी ढंग अपनाया। ट्रंप ने कहा कि इसमें आसिम मुनीर का खास नेतृत्व था। उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान न्यूक्लियर देश हैं, इसीलिए वॉर रुकवा दिया।

बता दें कि इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर 35 मिनट बात की थी। इस दौरान पीएम ने साफ कहा था कि भारत-पाकिस्तान सीजफायर में ट्रंप की कोई भूमिका नहीं थी। इसके बाद भी अब डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि उन्होंने दोनों देशों के बीच सीजफायर करवाया।

दिल्ली दारू घोटाले में फिर जेल जा सकते हैं केजरीवाल-सिसोदिया, CBI ने अदालत में दी अर्जी: पंजाब में भगवंत मान की कुर्सी पर खतरा, कांग्रेस का दावा- AAP के 30 MLA संपर्क में


दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) को मिली करारी हार के बाद उसकी मुश्किलें और बढ़ती जा रही है। पार्टी को अब राजनैतिक और कानूनी फ्रंट पर समस्याएँ आ रही हैं। दिल्ली के बाद उसका पंजाब का सिंहासन डोल रहा है।

कांग्रेस पंजाब में उसकी सरकार गिराने की फिराक में हैं। दूसरी तरफ शराब घोटाला मामले में मुखिया केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के खिलाफ CBI ने जल्दी मुकदमा चलाने को कदम बढ़ा दिए हैं। AAP को एकसाथ कई फ्रंट पर चुनौती मिलने वाली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली में हार के बाद पंजाब की कांग्रेस ईकाई सरकार गिराने में जुट गई है। पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने रविवार (9 फरवरी, 2025) को दावा किया है कि सत्तारूढ़ AAP के 30 विधायक कांग्रेस के सम्पर्क में हैं।

उन्होंने दावा किया है कि यह सम्पर्क पिछले एक वर्ष से बना हुआ है। उन्होंने कहा है कि यह सभी विधायक AAP छोड़ कर कांग्रेस को समर्थन देने को भी तैयार हैं। उन्होंने पार्टी में भीतरी लड़ाई का भी हवाला दिया है।

प्रताप सिंह बाजवा ने दावा किया है कि केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को पद से हटा कर खुद सीएम बनने का कदम उठा सकते हैं। बाजवा ने कहा है कि आगामी दिनों में पंजाब में एक सीट पर उपचुनाव होना है और इस सीट से केजरीवाल अपनी किस्मत आजमा सकते हैं।

उन्होंने कहा, “अपने करीबियों की बड़ी फ़ौज को समायोजित करने के साथ ही केन्द्रीय एजेंसियों की जाँच एवं कार्रवाई से बचें और फंड्स जुटाने को AAP मुखिया पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की कोशिश करेंगे।”

बाजवा ने यह भी दावा किया कि भगवंत मान दिल्ली में भाजपा के हाईकमान से अपने संबंध सुधारने में जुटे हैं। बाजवा जैसे ही कुछ सुर पंजाब कांग्रेस के मुखिया और सांसद अमरिंदर सिंह ‘राजा वरिंग’ के हैं। उन्होंने कहा है कि आने वाले दिनों में राज्य के भीतर कई नेता AAP छोड़ सकते हैं।

उन्होंने कहा है कि अब पंजाब में कांग्रेस असफल ‘पंजाब मॉडल’ और असफल ‘दिल्ली मॉडल’ को लेकर सरकार पर हमलावर होगी। उन्होंने कहा है कि दिल्ली में AAP की हार, पंजाब में कांग्रेस के लिए ‘आपदा में अवसर’ जैसी है।

वरिंग ने कहा है कि AAP को पंजाब से भी अपना बोरिया बिस्तर बाँध लेना चाहिए। वहीं AAP ने पार्टी में टूट के सभी दावों को नकारा है। पंजाब AAP के प्रवक्ता नील गर्ग ने कहा, “केजरीवाल हमारे राष्ट्रीय संयोजक हैं और भगवंत मान पंजाब के मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस का ग्राफ रसातल को जा रहा है। दिल्ली में लगातार तीसरी बार उसका प्रदर्शन जीरो रहा है।”

नील गर्ग ने दावा किया कि 2027 चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन 2022 के मुकाबले और भी बुरा होगा। गौरतलब है कि 117 सीटों वाली पंजाब विधानसभा में वर्तमान में AAP को प्रचंड बहुमत हासिल है। उसके पास 93 विधायक हैं जबकि कांग्रेस के पास मात्र 16 विधायक हैं।

राज्य में शिरोमणि अकाली दल के पास 3 जबकि भाजपा के पास 2 विधायक हैं। कांग्रेस------ लगातार कहती आई है कि उसका अधिकांश वोट AAP ने ही लिया है। वह अब दिल्ली में AAP की हर और पंजाब में अंदरूनी लड़ाई के शेयर वापसी करने के मूड में है।

AAP के लिए सिर्फ पंजाब ही नहीं बल्कि दिल्ली में भी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। उसके दोनों बड़े नेताओं केजरीवाल और सिसोदिया पर चुनाव हारने के बाद जेल जाने की तलवार लटक रही है। दिल्ली शराब घोटाला मामले में जमानत पर चल रहे दोनों के खिलाफ जाँच एजेंसी CBI ने मुकदमा जल्दी चालू करने की अर्जी अदालत को दी है।

CBI की एक विशेष अदालत ने सिसोदिया और केजरीवाल के वकीलों से कहा है कि वह मुकदमे के कागजों की जाँच जल्दी पूरी कर लें ताकि जल्द से जल्द मुकदमा चालू किया जा सके। अदालत ने यह बात 3 फरवरी, 2025 को कही। इससे पहले CBI ने कहा है कि वह जल्द से जल्द इस मामले में 23 आरोपितों के खिलाफ मुकदमा चालू करना चाहती है।

अवलोकन करें:-

मैं झूम के नाचूँ आज… AAP की झाड़ू बिखर गई तो क्या, मैंने छोड़ दी सबकी लाज; क्या पंजाब सरकार बीजेपी/क
मैं झूम के नाचूँ आज… AAP की झाड़ू बिखर गई तो क्या, मैंने छोड़ दी सबकी लाज; क्या पंजाब सरकार बीजेपी/क
 

केजरीवाल समेत बाकी लोगों पर आरोप है कि उन्होंने दिल्ली की आबकारी नीति ने बदलाव किया जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ। इस नीति बदलने से निजी विक्रेताओं फायदा पहुंचाया गया और उनसे वापसी में मिले 100 करोड़ रूपए को गोवा चुनाव में खपाया गया।