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रूस से पैसा लेते थे 150+ कांग्रेस सांसद, पत्रकारों ने दलाली में लिखे 16000 आर्टिकल- निशिकांत दुबे ने ‘कठपुतली गैंग’ की खोली पोल: इंदिरा हो या राजीव, DNA में ‘सूटकेस कल्चर’


पूर्व PM इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की Grok AI जनरेटेड तस्वीर, भाजपा MP निशिकांत दुबे (बाएँ)
भारत में बिकाऊ लोगों की कमताई नहीं। कदम-कदम पर बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र की औलादें मिल जाएँगी। देशहित में वर्तमान मोदी सरकार को इसकी जाँच कर सच्चाई को सामने लानी चाहिए। इन मुद्दों पर दर्ज होने मुकदमों की सुनवाई करने वाली निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट और इनकी पैरवी करने वकीलों पर गिद्ध की निगाह रख सबके खातों की जाँच करवानी चाहिए। अगर किसी भी रूप में इनके बचाव में निर्णय दिया जाता है। इन मुद्दों पर ऐसे ही सख्ती से पेश आना जैसाकि पाकिस्तान के साथ। 
आज विपक्ष खासतौर से कांग्रेस देश में लोकतंत्र और संविधान खतरे पर चीखाचिल्ली कर देश को गुमराह कर चोर मचाए शोर वाली हालत किये हुए है। ऐसा इसलिए कि जनता ही इतनी भुलक्कड़ है जो इनके कुकर्मों को भूल इनके पाखंड के चक्रव्यू में फंसते रहे हैं। EVM को लागू करने वाले ही इसको हटा बैलेट पेपर लाने का शोर मचा रहे हैं ताकि इनके गुंडे बैलेट बॉक्स लूटने और बैलेट पेपर फाड़ने के काम लग जाए। 
दूसरे, भारत में CAA विरोध में बने शाहीन बागों से लेकर हुए प्रदर्शन, धरने और उपद्रव आदि कोई जनता के हित में नहीं किए गए थे बल्कि जॉर्ज सोरोस और अन्य भारत विरोधियों की दी भीख के धन से कर दुनिया में भारत को बदनाम करने का दुस्साहस किया जा रहा है। अक्ल से पैदल जनता समझती है कि मोदी सरकार जनता के साथ बहुत अन्याय कर रही है। जो विरोधी भारत विरोधियों की हाथ कठपुतली बन देश में उपद्रव कर जनता को गुमराह करने वाले क्या देशहित में काम कर सकते हैं। 
 
 
दूसरे, LoP राहुल गाँधी की कार्यशैली क्या पद के अनुरूप है? स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगने वाला बताए क्या साबित करना चाहता है? साबित करता है कि इस आदमी को भारतीय इतिहास का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं।   
संविधान के मूल स्वरुप को बिगाड़ने वाले द्वारा जब संविधान की रक्षा का शोर मचाने वालों के कुकर्म को चोर मचाये शोर नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा? 
सोनिया गाँधी जिसे परिवार 'राजमाता' कहते है वही सोनिया उस FDL-AP की co-president जो कश्मीर विरोधी संगठन है। इतना ही नहीं कई पत्रकार भी शामिल हैं। यही वजह है कि कांग्रेस कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देती रही। अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करती है। INDI गठबंधन को समर्थन देने वाली जनता को इन पार्टियों से जवाब मांगना चाहिए।    
झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया है कि कभी कांग्रेस के 150 से अधिक सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे। उनका कहना है कि पत्रकारों के एक समूह भी रूस का दलाल था।

ट्विटर/एक्स पर निशिकांत दुबे ने ‘कांग्रेस, करप्शन और गुलामी’ शीर्षक के साथ किए पोस्ट में ये दावा किया है। उन्होंने कहा है;

  1. ये अवर्गीकृत गुप्त दस्तावेज सीआईए का 2011 में जारी हुआ।
  2. कांग्रेस के बड़े नेता एचकेएल भगत की अगुवाई में 150 से ज्यादा कांग्रेस के सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे, रूस के लिए दलाली करते थे?
  3. पत्रकारों का एक समूह दलाल था, कुल 16000 न्यूज आर्टिकल रूस ने छपवाए?
  4. उस जमाने में रूस के जासूसी संस्थानों के 1100 लोग हिन्दुस्तान में थे जो नौकरशाही, व्यापारी संगठनों, कम्युनिस्ट पार्टियों, ओपिनियन मेकर को अपने पॉकेट में रखते थे और सूचना के आधार पर भारत की नीति बनाते थे?
  5. कांग्रेस की उम्मीदवार सुभद्रा जोशी ने लोकसभा चुनाव में उस वक्त 5 लाख रुपए लिए जर्मन सरकार से चुनाव के नाम पर, हारने के बाद इंडो जर्मन फोरम की अध्यक्ष बनीं।
उन्होंने लिखा है, “यह देश था या ग़ुलामों, दलालों या बिचौलियों की कठपुतली। कांग्रेस इसका जवाब दे, आज इस पर जाँच हो या नहीं?”
यह पहला मौका नहीं है जब रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी से पैसे लेने और उनके इशारे पर काम करने का आरोप कांग्रेस पर लगा है। इससे पहले भी इंदिरा गाँधी और उनके बेटे राजीव के जमाने में कॉन्ग्रेस के ‘ब्रीफकेस कल्चर’ को लेकर को लेकर तथ्य सामने आ चुके हैं।
2017 की शुरुआत में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कुछ पुराने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए गए थे। इससे पता चलता है कि इंदिरा गाँधी के जमाने में कांग्रेस के 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिला था। 2005 में केजीबी के ही एक पूर्व जासूस वासिली मित्रोकिन की किताब आई थी। इसमें तो बकायदा बताया गया है कि खुद इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर पैसे भेजे गए थे।
                                                                                                                                                                                           साभार: indiafacts.org
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया को बताया था कि जो तथ्य सार्वजनिक हुए, उससे जाहिर होता है कि 1967 के आम चुनाव के वक्त कांग्रेस सहित देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों को विदेश से पैसा मिला था। उन्होंने बताया था कि शीत युद्ध के जमाने में कम्युनिस्ट देश जहाँ भारत में साम्यवाद के फैलाव के लिए पैसे खर्च कर रहे थे, तो पूँजीवादी देश साम्यवाद को रोकने के लिए। ऐसे में जब सत्ताधारी दल का नेता ही बिकने को तैयार हो तो विदेशी ताकतों के लिए चीजें आसान हो जाती है।
किशोर ने ऐसी कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए एक फेसबुक पोस्ट भी लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि विदेश से पैसा लेने के मामले की जाँच भी कराई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट दबा दी गई। जब कुछ विपक्षी सांसदों ने इसे सार्वजनिक करने की माँग की तो तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने संसद में कहा कि जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं, उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते, क्योंकि इससे उनके हितों को नुकसान पहुँचेगा।

लेकिन, सालों तक जिन तथ्यों को कांग्रेस छिपाती रही उसे मित्रोकिन ने 2005 में दुनिया के सामने ला दिया। वे सोवियत संघ के जमाने के हजारों गोपनीय दस्तावेज चुराकर देश से बाहर ले गए थे। बाद में इसके आधार पर क्रिस्टोफर एंड्रयू (Christopher Andrew) के साथ मिलकर किताबें लिखी। द वर्ल्ड वॉज गोइंग आवर वे (The World Was Going Our Way) नामक किताब में कहा गया है कि केजीबी ने 1970 के दशक में पूर्व रक्षा मंत्री वीके मेनन के अलावा चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार के लिए फंड दिया था।
2017 में सामने आई दिसंबर 1985 की सीआईए की रिपोर्ट में बताया गया है कि सोवियत संघ ने भारतीय कारोबारियों के साथ समझौतों के जरिए कांग्रेस पार्टी को रिश्वत दी थी। सोवियत संघ का दूतावास कांग्रेस नेताओं को छिपकर रकम देने सहित कई खर्चों के लिए बड़ा रिजर्व रखता था। इसके मुताबिक कांग्रेस के अलावा सीपीआई और सीपीएम को भी सोवियत संघ से काफी पैसा मिलता था। ऐसा नहीं है कि सभी को पैसे ही दिए गए थे। कुछ के साथ तो सोवियत संघ ने बकायदा समझौता भी किया था।

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि केजीबी के पैसे की वजह से भारत के ढेरो नेता सोवियत संघ की मुट्ठी में थे और वे भारतीय राजनीति को अपने हितों के हिसाब से प्रभावित करते थे। मित्रोकिन की किताब में भी यह बात कही गई है। केजीबी के लीक दस्तावेजों में भारत को तीसरी दुनिया की सरकारों में केजीबी के घुसपैठ का एक मॉडल बताया गया था। इन दस्तावेजों में साफ तौर पर भारत सरकार में केजीबी के बहुत से सूत्र होने की बात कही गई थी।

                                                                                                                                                                                               साभार: indiafacts.org

ऐसा भी नहीं है कि इंदिरा के बाद विदेश से पैसा लेने की कांग्रेस की आदत छूट गई। दस्तावेज बताते हैं कि सोवियत संघ से पैसा लेने का जो सिलसिला इंदिरा गाँधी के जमाने में शुरू हुआ था वह राजीव गाँधी के जमाने में भी जारी रहा है। हालॉंकि इस दौर में सोवियत संघ का प्रभाव कुछ सीमित करने की कोशिश भी हुई थी।

                                                                                                                                                                                                 साभार: indiafacts.org

ये दस्तावेज मीडिया में भी केजीबी की घुसपैठ के बारे में बताते हैं। इसके अनुसार सोवियत संघ ने अपने प्रोपेगेंडा के प्रचार के लिए भारत के बड़े मीडिया संस्थानों के साथ व्यापक पैमाने पर साँठगाँठ कर रखी थी। वे उसकी जरूरत के हिसाब से लेख लिखते थे। यहाँ तक की संपादकीय में भी सोवियत संघ की धुन बजाते थे। जिन संस्थानों का जिक्र है उनमें टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, द हिंदू शामिल है।

मित्रोकिन ने अपनी किताब में बताया है कि सोवियत संघ ने इस काम के लिए भारत में 40-50 पत्रकार रखे थे। बाद के सालों में इनकी संख्या बढ़कर 200 से 300 हो गई थी।

आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से AAP की गोद में बैठे पत्रकारों को लगा सदमा

शराब घोटाले में गिरफ्तार हुए आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया का किस तरह दुष्प्रचार किया जा रहा है, समझा जा सकता है कि मामला कितना गंभीर है। अरविन्द केजरीवाल पार्टी मनीष को एक आबकारी नहीं बल्कि शिक्षा मंत्री की गिरफ़्तारी बता रही है। आखिर केजरीवाल और उनकी पार्टी कब तक और कितना झूठ बोलेंगे?
जबकि मुख्यमंत्री केजरीवाल स्वयं बोलते रहे हैं कि असली मुद्दों से ध्यान भटकने के लिए भाजपा बेचारे ईमानदार शिक्षा मंत्री को बदनाम कर रहे हैं। अगर सिसोदिया ने कोई घोटाला किया क्यों नहीं सीबीआई से जाँच करवाकर दोषी होने पर क्यों नहीं जेल में बंद कर देते, फिर आज आबकारी मंत्री को क्यों शिक्षा मंत्री के नाम से सम्बोधित किया जा रहा हम आबकारी मंत्री क्यों नहीं? 

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सीबीआई के चंगुल में फंस चुके हैं। शराब घोटाले और आबकारी नीति में अनियमितता के मामले में सीबीआई रिमांड में लेकर उनसे पूछताछ कर रही है। इसके बाद कोर्ट फैसला करेगा कि मनीष सिसोदिया दोषी है या निर्दोष। लेकिन आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता सड़क पर प्रदर्शन कर जांच एजेंसियों और कोर्ट पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं सिसोदिया की गिरफ्तारी से आम आदमी पार्टी के गोद में बैठे पत्रकारों पर भी दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। केजरीवाल सरकार के विज्ञापन और पैसे पर पलने वाले ये पत्रकार कठिन समय में पूरी निष्ठा के साथ अपनी वफादारी साबित करने के लिए सीबीआई जैसी जांच एजेंसी पर सवाल खड़े कर रहे हैं। यहां तक कि पत्रकार का मुखौटा लगाकर सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर विलाप करते नजर आ रहे हैं। 

सेक्युलर और लिबरल पत्रकारों में शुमार सागरिका घोष को भी मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से बड़ा झटका लगा है। उनके भीतर का दर्द भी छलक कर बाहर आ रहा है। अब वो समानता की दुहाई देकर ट्विटर पर विलाप कर रही है। वो अपने ट्वीट में सवाल कर रही है,”जैसा मनीष सिसोदिया को हिरासत में भेज दिया जाता है, सवाल उठता है: क्या आज के भारत में कानून के समक्ष समानता है ? नागरिकों के लिए एक संदर्भ होना चाहिए। कानून को बिना किसी डर या पक्षपात के अपना काम करना चाहिए।”

खुद को समाजवादी और लिबरल पत्रकारिता के झंडाबरदार बताने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी को मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से गहरा सदमा लगा है। उन्होंने इस गिरफ्तारी को विपक्ष के खिलाफ मोदी सरकार का अभियान तक बता डाला। उन्होंने ट्विटर पर विलाप करते हुए लिखा, “सिसोदिया तो एक शुरुआत है..सवाल एक एक सीट का..सवाल एक एक नेता का..सवाल हर फाइल का..सवाल बचेगा कौन..समूचे विपक्ष पर शिंकजा कसने की तैयारी ?” गौरतलब है कि पुण्य प्रसून वाजपेयी और अरविंद केजरीवाल का प्रेम जगजाहिर है। 2014 में केजरीवाल के साथ पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ मीडिया से ‘सेटिंग-गेटिंग’ वाला वीडियो खूब वायरल हुआ था। इसमें केजरीवाल पुण्य प्रसून वाजपेयी से इंटरव्यू के खास हिस्सों को दिखाने की सेटिंग करते दिखे।

इस रुदाली गैंग में शामिल होने से भला तथाकथित पत्रकार विनोद कापड़ी कैसे पीछे रहते। उन्होंने अपनी वफादारी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने सिसोदिया का खुलकर बचाव करते हुए अपनी वेदना प्रकट की। आखिरकार उन्हें भी तो ‘आप’ के नमक का हक अदा करना था। उन्होंने बखूबी इसका पालन किया और ट्वीट में लिखा, “हाँ तकलीफ़ है .. तुम्हें भी होनी चाहिए क्योंकि मनीष देश इकलौते ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने स्कूल और शिक्षा पर सबसे ज़्यादा फ़ोकस किया। काश तुम्हें भी अच्छा स्कूल-शिक्षा मिलती तो Zombie बने नहीं घूम रहे होते। और हाँ, ये तस्वीर मेरे घर की है। साथ में मैं हूं। दोबारा बुलाऊंगा।”

जब पति विलाप कर रहा हो तो पत्नी भला कैसे इससे अलग हो सकती है। पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना ही पत्नी का कर्तव्य होता है। तथाकथित पत्रकार साक्षी जोशी भी मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद रुदालियों के गैंग में पति विनोद कापड़ी के साथ कदम से कदम मिलाती नजर आईं। उन्होंने तो सीबीआई जैसी जांच एजेंसी पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने अपने ट्वीट में सीबीआई को तोता बताते हुए लिखा, ” मनीष सिसोदिया 5 दिन के सीबीआई रिमांड में, सीबीआई को “तोता’ यूं ही नहीं कहा जाता।”

किसी सरकार से 3BHK फ़्लैट लेकर उसके पक्ष में खबरें लिखने के लिए मशहूर लिबरल और वामपंथी पत्रकार रोहिणी सिंह भी सिसोदिया की गिरफ्तारी पर विलाप करती हुई नजर आईं। केजरीवाल सरकार से विज्ञापन और अन्य माध्यम से मिली मदद के लिए थोड़ा आंसू बहना था, उन्होंने ऐसा करने में कोई कमी नहीं रखी। आप के संयोजक और दिल्ली के सीएम केजरीवाल को खुश करने के लिए एक बाद एक कई ट्वीट किए। उन्होंने लिखा, ” सबसे बेहतर स्कूल बनाने वाला गिरफ़्तार और सबसे अधिक नफ़रत फैलाने वाला केंद्रीय मंत्री…? ये है आपका नया भारत?”

रोहिणी सिंह ने एक आम आदमी पार्टी की कार्यकर्ता की तरह देश की जांच एजेंसी पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा, “यह नया भारत है साहब, यहाँ आँख में आँख डाल कर सिर्फ बात करने वाले विपक्षी नेताओं को माफी नहीं है, फिर आम आदमी पार्टी ने तो एक के बाद एक 3 चुनाव हराए हैं। पहले जो ‘तोता’ था अब ‘बाज़’ बन चुका है। साहब के एक इशारे पर शिकार उड़ा ले जाता है।”

कहा जाता है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। ऐसा पत्रकारिता में भी देखा जाता है। मोदी विरोध के नाम पर पत्रकार भी एकजुट नजर आते हैं। सेक्युलर और लिबरल गैंग की पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी भी मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी पर अपनी वेदना रोक नहीं पाई। उनका दर्द भी छलक आया, क्योंकि उन्हें विपक्ष के खत्म होने का डर सता रहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद दूसरे दलों को बीजेपी की ‘बी टीम” बताने वाले नेताओं को समझना चाहिए कि मोदी और बीजेपी स्वभाव से वर्चस्ववादी हैं। धर्मनिरपेक्ष स्टैंड नहीं लेने से आप नहीं बचेंगे, क्योंकि मोदी “विपक्ष मुक्त” भारत चाहते हैं।”

खुद को लिबरल-सेक्युलर पत्रकार बताने वाले इनमें से ज्यादातर पक्षकार यानि पत्रकार पहले कांग्रेस और लेफ्ट के करीबी रहे हैं। अब आम आदमी पार्टी को उभरता देख ये पक्षकार उनकी गोदी में जाकर बैठ गए हैं। दूसरों को गोदी मीडिया बताने वाले इन पक्षकारों की खुद की विश्वनीयता नहीं रही है। मीडिया के लोग तो इनकी सच्चाई जानते ही है, लेकिन अब सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी के पक्ष में इनके विलाप और वायरल तस्वीरों ने इनकी असलियत आम लोगों के बीच खोल कर रख दी है। 

हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने में छद्दम धर्म-निरपेक्ष मशहूर हस्तियाँ, नेता, पत्रकार और पॉपुलर ब्रांड्स तक हैं शामिल

           ऐसी 21 घटनाएँ जब मशहूर हस्तियों, नेताओं, पत्रकारों और ब्रांडों ने हिंदू देवी-देवताओं का उड़ाया मजाक
बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा और दिल्ली बीजेपी के पूर्व नेता नवीन जिंदल द्वारा पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणियों पर चल रहे विवाद के बीच, लोग हिंदू देवताओं पर टिप्पणियों की तुलना में पैगंबर पर की गई टिप्पणी पर एकतरफा चल रही प्रतिक्रिया पर 
सवाल उठा रहे हैं। जहाँ हिंदू देवताओं और सनातन परंपराओं पर बहुत खराब टिप्पणियाँ की गई हैं, जिन पर न कोई FIR हुआ और न मृत्युदंड की कोई माँग की गई, जबकि हर शहर में ‘लिबरल्स’ द्वारा समर्थित भीड़ नूपुर शर्मा के सिर पर लगातार ईनाम घोषित कर सिर कलम करने की माँग कर रही थी।

CAA में हिन्दुत्व विरोधी नारों पर भी छद्दम धर्म-निरपेक्षों के
मुंह में दही ही जमा था, सुनाई और दिखना भी बंद हो गया था 
इस्लामिक किताबों में लिखी बातों को आज नूपुर और नवीन जिंदल द्वारा कहे जाने पर जो बबाल मचा हुआ है, इसका मुख्य कारण सेकुलरिज्म नहीं बल्कि सेकुलरिज्म की आड़ में खेली गयी तुष्टिकरण की गन्दी सियासत। नूपुर को उकसाने वाले तस्लीम रहमानी का कोई नाम तक नहीं लेता,क्यों? अगर इस्लामिक किताब में लिखी बात को टीवी पर बुलवाने का असली गुनहगार रहमानी है, न शिवलिंग पर उकसाने वाली बात बोलता न ही नूपुर को बोलना पड़ता। दूसरे, हर देशप्रेमी को आंखें को अपने दिलो-दिमाग को खोल जन-विरोधी हरकतों में लिप्त नेताओं को पहचान जो हिन्दू नेता वोट बैंक की गन्दी घिनौनी सियासत कर नूपुर के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने वालों का समर्थन कर रहे है, ये लोग तब भी इन्हीं लोगों  खड़े थे, जब CAA विरोध में जब fuck hindutva के नारे लग रहे थे; इसी विरोध में हिन्दुओं की गैर-हाज़िरी में इन कट्टरपंथियों द्वारा भारत को इस्लामिक देश बनाये जाने पर नीतियां बनायीं जाती थीं। जब अपने सर्वाधिक पढ़े(एक लाख से अधिक) लेख में इसका उल्लेख किया था, किसी ने कट्टरपंथी ने विरोध तक नहीं किया था। 

हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में, कई मशहूर हस्तियों, पत्रकारों और राजनेताओं ने बिना किसी प्रतिरोध या प्रतिक्रिया के हिंदू देवी-देवताओं को गाली देना बंद कर दिया है। वास्तव में, उनमें से कई अपनी इस हरकत की वजह से अपने करियर में आगे बढ़े हैं। यहाँ ऐसी टिप्पणियों और सोशल मीडिया रिपोर्टों की एक छोटी सी सूची हम पेश कर रहे हैं। देखिए इन लोगों ने किस तरह से हिन्दू धर्म और देवी-देवताओं का अपमान किया है।

अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी

इससे पहले कि राम मंदिर निर्माण की बात थोड़ी दूर की कौड़ी लग रही थी, तब केजरीवाल ने 2014 में कहा था कि उनकी नानी (दादी) इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगी। वह बार-बार राम मंदिर की जगह स्कूल, कॉलेज और अस्पताल बनाने की माँग कर रहे थे।
राम मंदिर पर हिंदुओं का मजाक उड़ाने के अलावा, 2019 में, सीएम केजरीवाल ने एक अपमानजनक तस्वीर साझा की, जहाँ एक व्यक्ति अपने हाथ में झाड़ू (उनकी पार्टी का प्रतीक) के साथ हिंदू पवित्र प्रतीक स्वास्तिक को पीटते हुए दूर भगाने की कोशिश कर रहा था।
एक अन्य ट्वीट में, केजरीवाल ने भारत सरकार के साथ दिल्ली की आप सरकार के टकराव से ध्यान हटाने के लिए भगवान हनुमान द्वारा जेएनयू को जलाने का चित्रण करते हुए एक कार्टून साझा किया
आप में केवल केजरीवाल ही नहीं हैं जो हिंदू विरोधी बयान देते हैं या हिंदुओं के खिलाफ माहौल बनाने में लिप्त हैं। आप नेता संजय सिंह ने भी राजनीति में प्रासंगिकता हासिल करने के प्रयास में जून 2021 में भाजपा और अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा धन की हेराफेरी का आरोप लगाते हुए एक झूठा अभियान चलाया था। जो बाद में फेक साबित हुआ था।
अगस्त 2020 में, AAP के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने सिक्किम में कंचनजंगा की तस्वीरें साझा की थीं, जिन्हें हिंदुओं और बौद्धों, दोनों द्वारा पवित्र माना जाता है, उत्तराखंड में कामेट पीक और नंदा देवी पहाड़ियों, जहाँ नंदा देवी का एक पवित्र मंदिर है, जो एक अवतार है हिंदू देवी माँ दुर्गा की। इसने इन पवित्र चोटियों और दिल्ली के गाजीपुर में एक विशाल लैंडफिल के बीच समानता दिखाई। विवादित ट्वीट के साथ कैप्शन लिखा था, “भारत के सबसे ऊँचे पहाड़।”

ज्ञानवापी में मिले ‘शिवलिंग’ का अपमान

हाल ही में ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के वजूखाने में मिले ‘शिवलिंग’ का मजाक उड़ाने का एक सिलसिला शुरू हो गया। तब भी हिन्दुओं की तरफ से कोई तीखी प्रतिक्रिया या FIR की बात नहीं आई।
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की एक तस्वीर साझा करते हुए कटाक्ष करते हुए लिखा था कि उम्मीद है कि यह खुदाई सूची में अगला नहीं होगा।
यहाँ तक कि सबा नकवी ने ज्ञानवापी परिसर के अंदर मिले शिवलिंग का उड़ाने के लिए भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की एक तस्वीर साझा की। हालाँकि इसे आलोचना के बाद अब डिलीट कर दिया है।
वहीं राजद नेता कुमार दिवाशंकर ने भी अपने ट्वीट में भाजपा का मजाक उड़ाते हुए शिवलिंग का अपमानजनक संदर्भ दिया।
पीस पार्टी के शादाब चौहान ने भी वाराणसी की एक अदालत द्वारा ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को सील करने के आदेश के बाद एक अपमानजनक ट्वीट किया, जब उसके वुजुखाना के अंदर एक शिवलिंग मिला। चौहान ने छोटे खंभों के साथ लगे एक किनारे की तस्वीर पोस्ट की थी, जिसमें दावा किया गया था कि अगर कोई शिवलिंग पर दावा करता है तो न्यायाधीश उस क्षेत्र को सील कर देंगे।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता दानिश कुरैशी ने भी ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के अंदर शिवलिंग मिलने पर तंज कसते हुए सोशल मीडिया पर शिवलिंग पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। वहीं इस टिप्पणी को लेकर गुजरात पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।
केवल नेता ही अपमानजनक टिप्पणी करने वाले नहीं हैं। इकोनॉमिक टाइम्स ने भी भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र को शिवलिंग के रूप में चित्रित करके हिंदुओं का मजाक उड़ाते हुए एक मीम प्रकाशित किया था और बम भोलेनाथ कैप्शन दिया था। तस्वीर को प्रिंट संस्करण के MEME’S THE WORD कॉलम में शामिल किया गया था।
कॉलम में एक और कार्टून ताजमहल के तहखाने में बंद दरवाजों को खोलने की माँग का मजाक उड़ाता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर रतन लाल ने भी ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में मिले शिवलिंग को लेकर सोशल मीडिया पर अपमानजनक पोस्ट किया था। उन्होंने कहा था कि अगर वह शिवलिंग है, तो ऐसा लगता है कि शायद शिव जी का भी खतना हुआ था।
प्रोफेसर रविकांत चंदन ने ज्ञानवापी विवादित ढाँचे पर एक बहस के दौरान टिप्पणी की थी कि पंडितों द्वारा परिसर में हो रही अवैध गतिविधियों को कथित रूप से देखने के बाद इसे औरंगजेब द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था। उन्होंने जिस किताब और कहानी का जिक्र किया, उसका किसी ऐतिहासिक दस्तावेज में कोई जिक्र नहीं है। यहाँ तक कि किताब के लेखक ने खुद किताब को गंभीरता से नहीं लेने का सुझाव दिया था।
स्वतंत्र पत्रकार रकीब हमीद नाइक, एक कुख्यात हिंदू-फोबिक तत्व, ने ज्ञानवापी में शिवलिंग को बदनाम करने के लिए व्हाइट हाउस की एक तस्वीर और उसके सामने का एक फव्वारा लगाया। तथाकथित ‘पत्रकार’ के अनुसार, सर्वेक्षण दल को शिवलिंग नहीं मिला, बल्कि एक फव्वारे का पता चला है, जिसका उपयोग हिंदू पक्ष द्वारा ज्ञानवापी के स्वामित्व के लिए किया जा रहा है।

आस्था का अपमान

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े जेएन मेडिकल कॉलेज में फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ जितेंद्र कुमार अपनी कक्षा में यौन अपराधों के बारे में पढ़ा रहे थे। पॉवरपॉइंट प्रेजेंटेशन में वे विषय की व्याख्या करते थे, डॉ कुमार ने हिंदू देवताओं के लिए अपमानजनक संदर्भ दिए। बलात्कार के एक संक्षिप्त इतिहास को संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए, उन्होंने बलात्कार को हिंदू देवी-देवताओं से जोड़ा। हालाँकि, कुमार को जाँच लंबित रहने तक विश्वविद्यालय से निलंबित कर दिया गया था, लेकिन उनके खिलाफ की गई किसी भी सख्त कार्रवाई पर अभी कोई अपडेट नहीं है।

कथित कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी द्वारा 2002 में गोधरा ट्रेन जलाने की घटना में मारे गए 59 कारसेवकों और माँ सीता के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणी को कोई कैसे भूल सकता है। हिंदुओं के विरोध के बाद हालाँकि उसके कई शो उस समय रद्द कर दिए गए थे। फिर भी उसे अभी एक बड़े रियलिटी शो लॉक अप में मौका दिया गया था जिसे उन्होंने जीता भी।

विवादास्पद इस्लामिक उपदेशक इलियास शरफुद्दीन ने भी शिवलिंग की तुलना पुरुष शरीर के अंग से की है और कहा है कि हिंदुओं को मूर्ति और पुरुष के निजी अंग की पूजा करने की आदत है। वह ज़ी न्यूज़ द्वारा आयोजित ‘ताल ठोक के’ बहस में भाग लेने वालों में से एक थे। वेदों, गीता और उपनिषदों का हवाला देते हुए, शराफुद्दीन ने पहले तर्क दिया कि हिंदू ग्रंथों में उल्लेख है कि ‘जो लोग मूर्तियों की पूजा करेंगे उन्हें नरक में भेजा जाएगा’। “हिंदुओं को मूर्ति, लिंग और मानव शरीर के गुप्तांगों की पूजा नहीं करनी चाहिए”, उसने ‘ज्ञानवापी सर्वेक्षण वीडियो में शिवलिंग की उपस्थिति का मजाक उड़ाते हुए कई भद्दी टिप्पणियाँ की। यहाँ तक कि अन्य प्रतिभागियों को न सुनकर, वह हँसा और कहा, ” प्राइवेट पार्ट की पूजा नहीं होनी चाहिए (निजी अंगों की पूजा नहीं करनी चाहिए)”।

ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी हिन्दू देवी-देवताओं को ‘मनहूस’ कहा था।

बंगाली फिल्म अभिनेत्री सायोनी घोष ने अपने ट्विटर प्रोफाइल पर बेहद आपत्तिजनक कार्टून साझा किया था। जब उसे कार्रवाई की धमकी दी गई, तो उसने दावा किया कि उसका अकाउंट हैक कर लिया गया था। बाद में टीएमसी ने उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट भी दिया।

मशहूर हस्तियों, नेताओं और मीडिया घरानों के अलावा, ब्रांडों को भी हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने की आदत होती है और जब उन्हें इस पर फटकार लगती है, तो उन्हें अक्सर वामपंथी और लिबरलों का समर्थन मिलता है। हाल के दिनों में, हिंदुओं को लक्षित करते हुए कई आपत्तिजनक अभियान और ब्रांड शुरू किए गए थे। हालाँकि, ज्यादातर मामलों में विज्ञापनों को हिंदुओं के विरोध के बाद हटा दिया गया था, लेकिन ब्रांड हिंदू विरोधी विज्ञापनों के किसी भी गंभीर परिणाम के बिना आसानी से पीछा छुड़ा लिए।

2019 में, रेड लेबल ने हिंदुओं को घृणित कट्टरपंथियों के रूप में पेश करते हुए गणेश चतुर्थी पर एक विज्ञापन अभियान शुरू किया। विज्ञापन में एक व्यक्ति को घर ले जाने के लिए गणेश की मूर्ति की खरीदारी करते हुए दिखाया गया, जहाँ उसने एक बुजुर्ग मूर्ति निर्माता से बात की कि वह किस प्रकार की मूर्ति खरीदना चाहता है। मूर्ति निर्माता को हिंदू पौराणिक कथाओं का गहरा ज्ञान था, वह जिस पेशे में है, उसके लिए आश्चर्य की बात नहीं है। बातचीत के दौरान मूर्ति निर्माता एक स्कल टोपी निकालता है और उसे पहनता है, जो यह दर्शाता है कि वह मुस्लिम है। यह देखकर, संभावित खरीदार हिचकिचाता है और कहता है कि वह आगे वापस आएगा, जिसका स्पष्ट अर्थ है कि वह किसी मुसलमान से मूर्ति नहीं खरीदना चाहता था। मूर्ति निर्माता ने तब उसे चाय की पेशकश की और कुछ बातचीत की, जिसने हिंदू व्यक्ति का मन बदल दिया, और उसने तुरंत वह मूर्ति खरीद ली। खैर, हिंदुस्तान यूनिलीवर के एक ब्रांड रेड लेबल को ऐसे विज्ञापनों को जारी करने और बैकलैश के बाद उन्हें वापस लेने की आदत है।

ऐसे ही ज्वैलरी ब्रांड तनिष्क द्वारा 2020 में लव जिहाद का महिमामंडन करने वाला एक विज्ञापन जारी किया गया था। विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोगों ने उस विज्ञापन के लिए ज्वैलरी ब्रांड तनिष्क के बहिष्कार का आह्वान किया, जिसमें एक मुस्लिम परिवार में विवाहित हिंदू महिला को दिखाया गया था। उसके गोद भराई की तैयारी हो रही थी। हालाँकि, विरोध के बाद उसे YouTube से हटा दिया गया था।

2021 में, लोकप्रिय एथनिक गारमेंट ब्रांड फैबइंडिया ने भी दिवाली पर ‘जश्न-ए-रिवाज़’ नाम का एक विज्ञापन लॉन्च किया। जिस पर कई सोशल मीडिया यूजर्स ने हिंदू त्योहार और भावनाओं के इस तरह से इस्लामीकरण पर आपत्ति जताई। बहुत से लोगों ने दिवाली को ‘जश्न-ए-रियाज़’ कहने का समर्थन नहीं किया। इसे भी विरोध के बाद हटा दिया गया। हालाँकि, बाद में फैबइंडिया ने दावा किया कि यह दिवाली अभियान भी नहीं था जो कि लोगों के विरोध से बचने के लिए एक तरह की बहानेबाजी थी।

इजरायल का सनसनीखेज खुलासा : हमास आतंकियों के साथ एसोसिएटेड प्रेस के पत्रकारों ने अल जला टावर में पी हर रोज कॉफी

   आईडीएफ चीफ ने कहा एसोसिएटेड प्रेस के पत्रकारों के साथ हमास आतंकियों के अच्छे संबंध (साभार: एसेसिएट प्रेस)
फिलिस्तीन के साथ जारी विवाद के बीच 
इजरायल डिफेंस फोर्स के सीनियर लेवल अफसर ने बड़ा खुलासा करते हुए दावा किया है कि एसोसिएटेड प्रेस के गाजा में रहने वाले पत्रकारों के हमास के साथ अच्छे संबंध थे। टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक जिस मीडिया बिल्डिंग को आईडीएफ ने उड़ा दिया था, वहाँ एपी के पत्रकार हमास के आतंकियों के साथ ‘सुबह की चाय-कॉफी’ पीते थे।

15 मई 2021 को हमास के खिलाफ आक्रामक हमला करते हुए आईडीएफ ने गाजा में स्थित अल जला टॉवर पर भीषण बमबारी कर उसे ध्वस्त कर दिया था, जिसमें अल जजीरा और एसोशिएटेड प्रेस समेत कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट थे।

काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन के बाद आईडीएफ ने कहा था कि अल जला टॉवर, जिसमें प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स थे वह आतंकी संगठन हमास के इंटेलीजेंस यूनिट का हाउस था। यहीं से हमास आईडीएफ की गतिविधियों पर एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर डिवाइसेस के जरिए नजर रखता था।

 लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली डिफेंस फोर्स के चीफ अवीव कोहावी ने दावा किया है कि एसोसिएटेड प्रेस के पत्रकारों ने जाने-अनजाने अल जला टॉवर के ग्राउंड-लेवल पर स्थित कैफेटेरिया में हमास के इलेक्ट्रॉनिक्स विशेषज्ञों के साथ सुबह की कॉफी पी थी।

एसोसिएटेड प्रेस ने आईडीएफ के दावों को नकारा

हालाँकि, एसोसिएटेड प्रेस ने आईडीएफ के इन आरोपों का खंडन करते हुए इसे “बिल्कुल झूठा” बताया और कहा कि इमारत में एक भी कैफेटेरिया नहीं था।
29 मई 2021 रात को एक बयान जारी कर एपी ने कोहावी के दावों को गलत बताया। न्यूज एजेंसी ने कहा, “इजरायली सेना के चीफ ऑफ स्टाफ द्वारा लगाया गया यह आरोप पूरी तरह से झूठा और निराधार है। भवन में कैफेटेरिया भी नहीं था। इस तरह के निराधार दावे एसोसिएटेड प्रेस के पत्रकारों की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं।”
अपने बयान में एपी ने अल जला टॉवर को उड़ाने की घटना की स्वतंत्र जाँच की माँग की, ताकि फैक्ट का पता चल सके। न्यूज एजेंसी के मुताबिक, “जैसा कि हमने बार-बार कहा है, हमें इमारत में हमास के पहले से होने की कोई जानकारी नहीं थी और न ही आईडीएफ ने हमले से पहले ऐसी किसी भी संभावित उपस्थिति की चेतावनी दी। हमें नहीं पता कि इजरायल क्या सबूत दिखाएगा, लेकिन हम इसके बारे में जानना चाहते हैं।”
सही थी एयर स्ट्राइक --आईडीएफ चीफ 
गाजा के अल जला टॉवर पर एयर स्ट्राइक को सही ठहराते हुए आईडीएफ प्रमुख अवीव कोहावी ने अल जला टॉवर पर एयर स्ट्राइक को लेकर कथित तौर पर अपने सहयोगियों से कहा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कुछ वर्ग इजरायल की निंदा कर रहे हैं, लेकिन हमें इसका तनिक भी अफसोस नहीं है। उसे उचित ढंग से ध्वस्त किया गया है।
इजरायली मिलिट्री इंटेलीजेंस के अधिकारियों ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए इमारत पर हमले को सही बताया है। हमास जिस मंजिल पर काम कर रहा था, उस पर केवल सर्जिकल स्ट्राइक करने के बजाय पूरे ढाँचे को ही उड़ाना ज्यादा सही था, क्योंकि सर्जिकल स्ट्राइक से टॉवर की सभी क्षमताओं को नष्ट नहीं किया सकता।
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अल जला टॉवर को “पूरी तरह से वैध लक्ष्य” बताते हुए कहा कि इजरायली इंटेलीजेंस के जरिए इस तरह के सबूत मिले हैं।
नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर आईडीएफ के अधिकारियों ने कहा है कि इजरायल के रक्षा प्रतिष्ठान ने पेंटागन के अधिकारियों को हमास के मिलिट्री ऑपरेशन के बारे में खुफिया जानकारी दी थी।
इजराइल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालत पहुंचा अल जला टॉवर 
इन सब के बीच इजरायल द्वारा नेस्तनाबूद किए गए अल जला मीडिया टॉवर के मालिक जवाद मेहदी ने इंटरनेशनल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा है कि टॉवर को जमींदोज करना एक युद्ध अपराध था। यह शिकायत आईसीसी के मुख्य अभियोजक द्वारा इजरायल-फिलिस्तीन के हालिया संघर्ष को अपराध बताने के बाद आई है।
हमास के आतंकवादियों के साथ मिले होने के आरोपित मेहदी ने कहा कि इजरायली खुफिया एजेंसियों ने 13 मंजिला इमारत पर हमले से पहले उसे खाली करने के लिए केवल एक घंटे का वक्त दिया था।
आईसीसी पहले से ही मार्च 2014 से इजरायली फोर्स और फिलिस्तीन के आतंकी गुटों के बीच संभावित युद्ध के मामलों की जाँच कर रहा है। हालाँकि, आईसीसी के पास इस तरह की जाँच करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि इजरायल अदालत का सदस्य नहीं है।