जंतर मंतर पर पीएम पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाली युवती पर एफआईआर दर्ज (फोटो साभार-abp) उत्तर प्रदेश के नोएडा एक्सप्रेसवे पुलिस स्टेशन में एक युवती के खिलाफ जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में शिकायत दर्ज कराई गई है। आरोपित के खिलाफ जीरो FIR भी ग्रेटर नोएडा में ही दर्ज कराई गई है।
क्रांतिकारी कॉकरोच सपरिवार फरार चल रही है खुद के साथ साथ अपने परिवार को भी रोड पर ले आई है। क्या कोई CJP या जिसके कहने पर आंदोलन में आकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, खड़ा दिख रहा है? सभी अपनी चादर बचाने में लगे हुए हैं। जिन माता पिता को हम वो सम्मान नहीं दे पा रहे है जिसकी वो हकदार है तो हम उनके लिए ऐसा भी असम्मान पैदा नहीं होने देंगे जिससे वो हमारे प्रति निराश हो जाए। इस लड़की की वजह से इसका परिवार ही परेशान नहीं है इसके समाज में इसके रिश्ते नातेदार भी इसे कोस रहे होंगे, जिसने एक झटके में मान सम्मान सब छीन लिया समाज में प्रतिष्ठा भी धूमिल कर दी। जिस हिसाब से इसने अपने गटर जैसे मुखारबिंद से मोदी जी के लिए अपमानजनक शब्द कहे वो माफी के काबिल तो बिल्कुल भी नहीं है ऊपर से इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को घसीटा उनके लिए अनर्गल वकबास की वो तो और भी शर्मिंदा करने वाला था। अगर मोदी जी इसे माफ भी कर दें तो भी इसे कोई भी शरीफ इंसान तो नौकरी नहीं देगा जो भी नौकरी देगा लोग उसे भी टारगेट करेंगे नौकरी देने वाले तक का दिवाला निकल जाएगा। ये कॉकरोच पार्टी की कैसी क्रांति थी जिसमें ये अपनी लड़ाई तो जीत गए मगर इस आंदोलन में गए लोग माफी मांग रहे है खुद तो शर्मिदा है ही अपने परिवार को भी शर्मिंदा कर दिया है ऐसी परवरिश के लिए लोग इनके माता पिता को दोषी मान रहे है।
गाजियाबाद के इंदिरापुरम में रहने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील स्मृति सिंह की शिकायत के आधार पर नोएडा सेक्टर 168 की रहने वाली रुचिका सिंह के खिलाफ BNS 2023 के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है। बताया जाता है कि रुचिका सिंह ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। उसका आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाला वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल होने का दावा किया जा रहा है।
A case has been registered at Noida Expressway Police Station against Ruchika Singh following allegations that she made an objectionable remark about the Prime Minister during a demonstration at Jantar Mantar.
शिकायत में जानबूझकर विद्वेष फैलाना, सामाजिक तनाव पैदा करने और शांति भंग करने का आरोप है। अभी तक आरोपित रुचिका सिंह को पुलिस ने हिरासत में नहीं लिया है। पुलिस फिलहाल वीडियो फुटेज और दूसरे सबूतों की जाँच कर रही है और इसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस रुचिका सिंह की सोशल मीडिया एकाउंट भी खँगाल रही है। मैलोनी का भी इसने वीडियो में जिक्र किया और पीएम मोदी को भद्दी भद्दी गालियाँ दी थी। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था।
ये मामला सार्वजनिक जगह पर संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है इसके लिए कानून में आईपीसी की धाराओं के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएँ भी लगाई जा सकती है।
वकील स्मृति सिंह का कहना है कि पीएम का पद राष्ट्र की गरिमा से जुड़ा हुआ है। वे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और आपत्तिजनक बयान देकर गरिमा को ठेस पहुँचाया गया है। इससे जनभावनाएँ आहत हुई हैं।
जंतर मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान कई लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। इतना ही नहीं बैनर और पोस्टर पर भी आपत्तियाँ जताई गई।
एफआईआर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास ने आपत्ति जताई है। उन्होने इसे वादाखिलाफी माना है और केन्द्र से पूछा है कि जब एफआईआर दर्ज नहीं करने की बात हुई थी तो क्यों किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई अपमाजनक भाषा का इस्तेमाल करता है तो उसपर सिविल मानहानि का केस हो सकता है लेकिन प्रदर्शनकारियों पर आपराधिक मामला दर्ज करना बेहद गलत है।
ई20 पेट्रोल विवाद में मेटा-गूगल और एक्स पर मानहानि मुकदमा करने की मंजूरी, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI ChatGPT) केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उन्हें इंटरनेट पर उनके खिलाफ चलाए जा रहे फर्जी और मानहानिकारक (Defamatory) कंटेंट के खिलाफ दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दर्ज करने की अनुमति दे दी है। इस फैसले के बाद अब मेटा (Meta), गूगल (Google), यूट्यूब और एक्स (X) जैसी बड़ी कंपनियों को कोर्ट में जवाब देना होगा।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा विवाद केंद्र सरकार की ई-20 (E20 Fuel) यानी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल नीति से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया पर कुछ समय से ऐसे वीडियो, ऑडियो और पोस्ट लगातार फैलाए जा रहे हैं, जिनमें झूठा दावा किया गया है कि गडकरी और उनके परिवार ने इस नीति से निजी और आर्थिक मुनाफा कमाया है। इन वीडियो में एआई (AI) तकनीक का इस्तेमाल करके उनकी नकली आवाज और चेहरा (Deepfake) बनाकर भ्रामक बातें फैलाई जा रही थीं।
गडकरी की ओर से पेश हुए वकील संदीप एस लड्डा ने कोर्ट को बताया कि यह फर्जी सामग्री मुंबई के साथ-साथ पूरे देश में देखी जा रही है। याचिका में स्पष्ट किया गया कि एथेनॉल नीति का संचालन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय करता है, न कि सड़क परिवहन मंत्रालय। इसलिए गडकरी पर लगे निजी फायदे के आरोप पूरी तरह से झूठे, निराधार और उनकी सामाजिक छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए बनाए गए हैं।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अभय आहूजा की पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए मुकदमा दर्ज करने की मंजूरी दी। चूँकि सामग्री इंटरनेट पर हर जगह मौजूद है, इसलिए हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) तय करने के लिए यह इजाजत जरूरी थी। अब गडकरी इस याचिका के जरिए कंपनियों को इन वीडियो को हटाने और भविष्य में ऐसा कंटेंट रोकने के लिए आदेश (Injunction) की माँग करेंगे।
याचिका में गडकरी ने साफ किया है कि इसका मकसद सरकार की नीतियों पर होने वाली निष्पक्ष आलोचना को रोकना बिल्कुल नहीं है। सही तथ्यों पर आधारित आलोचना का स्वागत है, लेकिन एआई का गलत इस्तेमाल करके बनाई गई फर्जी तस्वीरें, बनावटी आवाज और अभद्र भाषा को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं कहा जा सकता। यह किसी व्यक्ति के सम्मान और व्यक्तित्व अधिकारों (Personality Rights) का हनन है।
इस मामले में केंद्र सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और अनजान वीडियो बनाने वालों को भी पक्षकार बनाया गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट के इस कदम से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी खबरें और डीपफेक कंटेंट फैलाने वालों पर नकेल कसेगी और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय हो सकेगी।
राम चित्र अपमान पर ढाका में हिंदुओं का विरोध प्रदर्शन। (फोटो साभार - दिनाजपुर टीवी)
आज भारत के अधिकांश राज्यों में भगवा लहराने का देश पर इतना असर नहीं पड़ा जितना बंगाल में लहराने से पड़ना शुरू हुआ है। बंगाल चुनाव सिर्फ चुनाव नहीं था सनातन का शंखनाद था। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी यदि मुस्तैदी से सनातन विरोधियों पर कार्यवाही करते रहेंगे, बंगाल को घुसपैठ मुक्त करने से इसकी गूंज भारत ही नहीं विश्व में होगी। भारत में आज़ादी की चिंगारी बंगाल से निकली थी। ब्रिटिश सरकार महात्मा गाँधी या कांग्रेस से डरकर नहीं बल्कि बंगाली नेताजी सुभाष चंद्र बोस से डरकर गयी थी। हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या। बंगाल चुनाव के बाद से सनातन विरोधियों की पार्टियां धराशाही हो रही है। दफ्तर में छंटनी का कानून है last come first go शायद यही कानून सनातन विरोधी पार्टियों पर भी अपने आप लागु हो चूका है।
टीवी पर होनी वाली परिचर्चाओं में मुस्लिम कट्टरपंथी और इनकी समर्थक पार्टियां जब घिर रही होती है तो मुद्दे से भटकाते संविधान की दुहाई देते नज़र आते हैं। अयोध्या राममन्दिर में 200 करोड़ रूपए के घोटाले को जिस तरह उछाला जा रहा है इसके पीछे हिन्दुओं को राममन्दिर से दूर करने का बहुत गहरा षड़यंत्र है। प्रभु श्रीराम द्वारा सच्चाई सामने आने पर हिन्दुओं को बाँटने वाले चाहे वह मीडिया हो या राम विरोधी पार्टियां सब चारों खाने चित होंगे। अगर बंगाल में शुभेंदु अधिकारी शंखनाद कर रहे है तो उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पीछे नहीं रहने वाले।
बांग्लादेश की राजधानी ढाका शुक्रवार (19 जून) को जय श्री राम के नारों से गूँज उठी। भगवान राम के अपमान के विरुद्ध सैकड़ों की संख्या में सड़क पर उतरकर हिंदुओं ने प्रदर्शन किया। मसाल जुलूस निकालते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों पर कार्रवाई के लिए बांग्लादेश की सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। साथ ही कहा है कि देश के सभी 64 जिलों में एक-एक राम मंदिर का निर्माण किया जाएगा।
प्रदर्शनकारी ढाका के शाहबाग चौराहे पर इकट्ठा हुए थे। वहाँ उन्होंने बांग्लादेश सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और न्याय की माँग की। हिंदुओं ने सरकार को दोषियों को पकड़ने के लिए 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने साफ कहा कि अगर तय समय में कार्रवाई नहीं हुई, तो वे रविवार (21 जून) को धार्मिक मामलों के मंत्रालय को ज्ञापन सौंपेंगे।
Dhaka | Hindu community in Bangladesh protest against 'the insult of Lord Ram' and held a torchlight procession in Dhaka, demanding the arrest of the culprit
Construction of an idol of Lord Ram at the Sanatan Complex at Polash Bari in Gaibandha was halted after +1 pic.twitter.com/AQIBpxmczX
मशाल जुलूस में शामिल हिंदुओं ने चेतावनी दी है कि यदि आरोपित गिरफ्तार नहीं हुए, तो आंदोलन पूरे देश में फैलेगा। बांग्लादेश के सभी 64 जिलों में उग्र प्रदर्शन किए जाएँगे। शनिवार (20 जून) को ‘बांग्लादेश पूजा उद्जापन परिषद’ ने भी देशव्यापी विरोध का ऐलान किया है। हिंदुओं का कहना है कि वे हर जिले में भगवान राम का मंदिर बनाकर रहेंगे।
जगह-जगह हुआ विरोध प्रदर्शन
शुक्रवार (19 जून) सुबह भी ढाका में अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। हिंदू महाजोत के दो गुटों ने नेशनल प्रेस क्लब और ढाका रिपोर्टर्स यूनिटी में कार्यक्रम किए। प्रेस क्लब के सामने एक बड़ा मानव बंधन बनाया गया। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री से मिलने और रैलियाँ निकालने की भी योजना बनाई है। उनकी माँग है कि दोषियों को कड़ी सजा दी जाए।
अवलोकन करें:-
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बांग्लादेश : भगवान राम के पोस्टर पर मारे जूते-चप्पल, जुमे की नमाज के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने
भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद बनाकर पालने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों में लेशमात्र भी शर्म है सभी को एकजुट ह...
पूरा मामला
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रंगपुर डिवीजन के गाइबांधा जिले में भगवान राम का मंदिर और 81 फीट ऊँची प्रतिमा बनाई जा रही थी। कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इस निर्माण को रुकवा दिया। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान भगवान राम की तस्वीर वाले बैनर पर चप्पलें मारी गईं। इसका Video वायरल हुआ। इस घटना से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुँची है।
क्या ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस इतिहास बनने के कगार पर पहुँच गयी है? जिस कुर्सी की खातिर "श्रीराम" नाम से, सनातन से चिढ़ती थी, वही इनको और इनकी पार्टी को इतिहास बना रहा है। कल जिस मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने सनातन और हिन्दुओं पर हमले करवाए आज वही मुस्लिम समाज भी इन्हे नहीं पूछ रहा। अगर वर्तमान मुख्यमंत्री सुभेंदु इसी तरह काम करते रहे बंगाल में कोई ममता या INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाला । कई साल हिन्दुओं ने हिन्दू विरोधी सरकारों के अत्याचार सहे हैं। चुनावों में उन्हें वोट तक नहीं डालने दिया जाता था जिस वजह से हिन्दू विरोधी सरकारें सत्ता में आती रहती थीं। फिलिस्तीन में इजराइल के हमलों पर तो INDI गठबंधन के हर नेता की जुबान खुलती थी लेकिन बंगाल में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों पर बोलने पर सबको सांप सूंघ जाता था।
इफ्तार पार्टी हो या फिर नमाज के दौरान मुस्लिम महिलाओं की तरह ममता हिजाब धारण करने पर इनके हिन्दू ब्राह्मण होने पर सन्देह होता है, जिसका खुलासा कोई खोजी पत्रकार या ममता की ही पार्टी कर सकती है।
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सिलीगुड़ी साइबर थाने में एक FIR दर्ज की गई है। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2025 में कोलकाता में आयोजित ईद कार्यक्रम के दौरान सनातन धर्म को ‘गंदा धर्म’ बताया था।
एफआईआर दर्ज होने के बाद से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही वीडियो में उन्हें विवादित टिप्पणी करते सुन सकते हैं। वो कहती सुनाई पड़ रही हैं- “हम जानबूझकर एक गंदा धर्म, जिसे जुमला पार्टी ने बनाया, हम उसे नहीं मानते हैं।”
West Bengal | A complaint lodged against former CM Mamata Banerjee at Cyber Thana, Siliguri, by a lawyer, Advocate Rinki Chatterjee Singh over her alleged statement against Sanatana Dharma.
यह शिकायत वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने दर्ज कराई है। उनका कहना है कि इस बयान से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के कुछ नेता पहले भी हिंदू धर्म को लेकर विवादित बयान देते रहे हैं।
रिंकी चटर्जी सिंह ने दावा किया कि उन्होंने 2025 में भी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई और उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
वहीं, तृणमूल कॉन्ग्रेस के दार्जिलिंग यूनिट के महासचिव और वकील अत्री शर्मा ने भी बयान को अनुचित बताया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।
TMC नेताओं पर एक्शन जारी ( फोटो साभार-chatgpt) पश्चिम बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ-साथ आपराधिक नेटवर्क पर लगाम कसी जा रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बांग्लादेशियों को बाहर निकाल रही है, वहीं ‘तोलाबाजी’ यानी सिंडिकेट, चुनाव बाद हिंसा और आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान चला रही है। बीते एक हफ्ते में 70 से ज्यादा टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है।
कोई बनियान-कच्छे में तो कोई लुंगी पहने हुआ गिरफ्तार
अपराधियों को हर हाल में गिरफ्तार करने के आदेश हैं। यही वजह है कि कई ऐसी तस्वीरें सामने आई जब इन लोगों को अचानक घरों, अड्डों और शराब के ठेकों से उठाया गया और सड़कों पर घुमाया गया। ये वे लोग हैं, जिन्होंने बंगाल में अराजकता फैला दी थी और जनता दहशत में जीने के लिए मजबूर थी।
West Bengal Police after getting free from shackles of TMC govt, Now catching Goons and Culprits.
The don of Howrah, Akash Singh, accused of shooting policemen in 2021 and hurling more than 20 bombs was paraded in his underwear on the streets of Howrah to send a strong message pic.twitter.com/EBypfNzOTZ
बंगाल पुलिस ने हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को कच्छा और बनियान में सड़कों पर घुमाया था। वह हावड़ा के डॉन कहलाता था। आकाश सिंह पर 2021 में पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने और 20 से ज्यादा बम फेंकने का आरोप है। एक कड़ा संदेश देने के लिए उसे हावड़ा की सड़कों पर सिर्फ अंडरवियर में घुमाया गया।
पश्चिम बंगाल में TMC के गुंडे सनी मोल्ला पर पुलिस का शिकंजा
इसके बाद 25 मई 2026 को टीएमसी के गुंडे और कुख्यात सनी मोल्ला को पुलिस ने गिरफ्तार कर सड़कों पर बनियान-पैजामा में घुमाया। स्थानीय लोगों के अनुसार, सनी मोल्ला TMC से जुड़ा एक संविदा आधारित होम गार्ड था और लंबे समय से संकराइल और आसपास के इलाकों में रंगदारी और दबंगई का नेटवर्क चला रहा था। वह व्यापारियों, छोटे दुकानदारों से रंगदारी वसूलता था। विरोध करने पर धमकी देता, मारपीट करता और कारोबार बंद कराने की चेतावनी देता था। इलाके में लोग उसे ‘छोटा डॉन’ कहकर बुलाते हैं।
TMC’s “Bade Bhai” Shamim Ahmed,paraded by WB Police.
The same man accused of unleashing Islamist violence in Shibpur, bombing streets, and opening fire on BJP supporters.
From threatening citizens to being marched publicly.
टीएमसी से जुड़ा और ‘बड़े भाई’ कहलाने वाले शमीम अहमद को भी पश्चिम बंगाल पुलिस ने बनियान- ऑफ पेंट में सड़कों पर घुमाया। दरअसल ये वह व्यक्ति है, जिस पर शिबपुर में इस्लामी हिंसा भड़काने, सड़कों पर बमबारी करने और BJP समर्थकों पर गोली चलाने के आरोप है।
जलपाईगुड़ी जिले में टीएमसी नेता पंचानन रॉय को एक कार में शराब पीते हुए पकड़ा गया था। वह स्थानीय पंचायत समिति के अध्यक्ष हैं और शराब पार्टी करते हुए गिरफ्तार किया गया। टीएमसी पार्षद मोनी गाजी को भी पुलिस रेड के दौरान शराब की बोतलों और आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। उस पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है।
ऐसे अपराधी शुभेंदु शासन के आते ही छिपने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि इनलोगों को बनियान कच्छा शॉर्ट पैंट में ही पुलिस उठा कर ले गई। इनलोगों को सड़कों पर घुमा भी रही है, ताकि लोगों के मन में उनका भय खत्म हो सके, जो पिछले 15 सालों से व्याप्त है। सरकार ‘नो नोटिस एक्शन’ वाली छवि बना रही है। अपराधियों को देर रात छापेमारी कर भी गिरफ्तार किया जा रहा है। कई जिलों में लगातार तलाशी के बाद कई लोगों को दबोचा गया, ताकि लोगों को संदेश मिले कि ‘भागने पर भी बचना मुश्किल’ है।
बीते 18 मई से करीब एक हफ्ते में राज्य में भ्रष्टाचार वसूली और चुनाव बाद हिंसा को लेकर टीएमसी के 70 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पूर्व मंत्री सुजीत बसु भी शामिल हैं। वहीं पूर्व मंत्री के करीबी बंगाल के बिधाननगर नगर निगम के 34 नंबर वार्ड के टीएमसी पार्षद और बोरो चेयरमैन रंजन पोद्दार को बिधाननगर उत्तर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ तोलाबाजी यानी जबरन वसूली करने और लोगों को डराने-धमकाने का आरोप है।
बीते 23 मई 2026 को एक दिन में राज्यभर में 17 टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें कोलकाता और बिधाननगर के कई पार्षद शामिल हैं। मुर्शिदाबाद के बड़ंचा में दबंग तृणमूल नेता अबु बक्कर को हत्या के प्रयास और हथियार से हमला करने के आरोप में पकड़ा गया।
कोलकाता नगर निगम के पार्षद सुदीप पोल्ले और बिधाननगर के पार्षद बरुआ को तोलाबाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हावड़ा से 2021 विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोपित उपग्राम प्रधान गुरुपद माझी और उसके भाई राजू माझी को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा हुगली, नदिया, मुर्शिदाबाद से लेकर कूचबिहार तक के टीएमसी गुंडों को पुलिस ने पकड़ा।
उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक पार्षद को घर के अंदर सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बनगांव नगर पालिका के वार्ड नंबर 22 से TMC पार्षद सुकुमार राय को पुलिस कॉलर पकड़कर थाने ले गई।
पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में शेख कमरुद्दीन को चुनावी आतंक, भ्रष्टाचार और वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहीं कूच बिहार से भवरंजन बर्मन को बीजेपी कार्यकर्ता को पीटने और पैसे माँगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बीजेपी नेता पप्पू साना पर हमले और शुभेंदु अधिकारी के पीएम रहे चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पुलिस ने कई इलाकों में लगातार छापेमारी की है और कई लोगों को हिरासत में लिया।
टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुल्मों से त्रस्त जनता की प्रतिक्रिया भी इस दौरान सामने आई। जब कोलकाता के युवा टीएमसी अध्यक्ष तपन बिस्वास और उसके साथियों को पुलिस गिरफ्तार कर ले जा रही थी तो उसे लोगों ने थप्पड़ मारे। कुछ ऐसा ही हाल हावड़ा से गिरफ्तार श्यामला मित्रा का हुआ। उसे भी लोगों ने पीटा।
दक्षिण 24 परगना से जब TMC नेता अरित्रा बोस को गिरफ्तार किए जाने के बाद महिलाएँ उसे पीटने के लिए चप्पल- झाड़ू लेकर दौड़ी। जब पुलिस उसे वैन में बैठाकर ले जा रही थी, तब झाड़ू, चप्पल और पानी की बोतलें पुलिस वैन पर फेंकने लगी। संदेशखाली में ईडी टीम पर हमले को लेकर गिरफ्तार टीएमसी नेता शाहजहाँ की मदद करने वाली दो महिला नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया। इन पर शाहजहाँ को बचाने के लिए भीड़ जमा कर हिंसा भड़काने का आरोप है।
घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान
अवैध घुसपैठ और बॉर्डर नेटवर्क पर भी कार्रवाई तेज हुई है। बंगाल सरकार ने ‘होल्डिंग सेंटर’ शुरू किए हैं और पुलिस-आरपीएफ-बीएसएफ के समन्वय से संदिग्ध घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा है।
North 24 Parganas, West Bengal: More than 100 Bangladeshi nationals allegedly living illegally in different parts of West Bengal gathered at the Hakimpur check post in North 24 Parganas on Tuesday morning to return to Bangladesh. The gathering comes after directives regarding… pic.twitter.com/TC06rVaeMm
हाल ही में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अवैध रूप से रह रहे 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मंगलवार सुबह (26 मई 2026) को बांग्लादेश लौटने के लिए उत्तरी 24 परगना के हाकिमपुर चेक पोस्ट पर जमा किया गया।
हाल ही में सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि बगैर दस्तावेज वाले बांग्लादेशियों की पहचान कर उसे पुलिस के हवाले करें, ताकि जनता से इनलोगों को अलग किया जा सके और देश से निकाला जा सके।
बीजेपी सरकार का पूरा अभियान ये दिखाता है कि अपराधियों और घुसपैठियों को अब ‘पहले जैसा संरक्षण’ नहीं दिया जाएगा। अपराधियों का जेल भेजा जाएगा और घुसपैठियों को ‘देश निकाला’ मिलेगा। चाहे ये लोग कहीं भी छिप जाएँ, पुलिस उन्हें ढूंढ निकालेगी और हर हाल में सलाखों के पीछे भेजेगी। इसलिए अपराधी कहीं जंगल में छिपे मिल रहे हैं तो कहीं घरों में छिप कर शराब पीते।
दिल्ली हाई कोर्ट में मंगलवार (21 अप्रैल 2026) को आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल, कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और यूट्यूबर रवीश कुमार के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में दोनों पर अवमानना की कार्रवाई करने की माँग की गई है।
यह याचिका एडवोटेक वैभव सिंह ने दायर की है। इसमें कहा गया है कि आबकारी नीति (Excise Policy) मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत की कार्यवाही का वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, जो गलत है।
याचिका में खासतौर पर उस वीडियो पर आपत्ति जताई गई है, जिसमें अरविंद केजरीवाल जस्टिस शर्मा से खुद को केस से अलग करने की माँग करते हुए अपनी दलील रख रहे थे। ये वीडियो अब तेजी से वायरल हो रहा है। याचिका में इन वीडियो को सोशल मीडिया से हटाने का निर्देश दिए जाने की भी माँग की गई।
इस मामले में अरविंद केजरीवाल और रवीश कुमार के अलावा कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, AAP नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, संजीव झा, पुरनदीप सिंह साहनी, जरनैल सिंह, मुकेश अहलावत और विनय मिश्रा के खिलाफ भी कार्रवाई की माँग की गई है। इस मामले की सुनवाई 22 अप्रैल 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच करेगी, जिसमें चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया शामिल हैं।
याचिका में क्या कहा गया?
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में कहा गया कि AAP के कई नेताओं और अन्य विपक्षी दलों के सदस्यों ने जानबूझकर और सोच-समझकर कोर्ट की छवि खराब करने की कोशिश की। इसमें कहा गया है कि इन लोगों ने कोर्ट की कार्यवाही की वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग करके उसे सोशल मीडिया पर फैलाया, ताकि देश और विदेश में न्यायपालिका की छवि खराब हो और आम लोगों को गुमराह किया जा सके।
याचिकाकर्ता एडवोकेट वैभव ने यह भी बताया कि ये वीडियो और ऑडियो क्लिप फेसबुक, इंस्टाग्राम, यू्ट्यूब और कई न्यूज चैनलों पर साझा किए गए। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि जिस तरह से ये रिकॉर्डिंग की गई और फिर अलग-अलग नेताओं ने इसे शेयर, रीट्वीट और पोस्ट किया। उससे यह एक बड़ी साजिश जैसी लगती है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि केजरीवाल और AAP के अन्य नेताओं ने मिलकर कोर्ट की छवि खराब करने, आम जनता को गुमराह करने और यह दिखाने की कोशिश की कि न्यायपालिका किसी राजनीतिक दबाव में काम कर रही है।
नरेंद्र मोदी भारत का पहला ऐसा प्रधानमंत्री है जिसे सबसे ज्यादा गालियां पड़ी हैं। फिर भी मस्त हाथी की तरह अपने काम में लगा हुआ है। हद तो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुंडों द्वारा दी जाने वाली गाली दे दी। लेकिन सारा मीडिया इस गुण्डई गाली पर खामोश है। अगर यही गाली किसी बीजेपी वाले ने दे दी होती सारा मीडिया breaking news चलाकर उछाल रहा होता।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस(TMC) की प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बेहद अभद्र और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है।
अरामबाग टीवी के पत्रकार शफीकुल इस्लाम द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में ममता बनर्जी कहती सुनाई दीं, “वह (नरेंद्र मोदी) दूरदर्शन का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं और राजनीतिक प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने महिला आरक्षण बिल के बारे में कुछ कहा था। मैं उनके भाषण नहीं सुनती।”
इसके बाद उन्होंने हैरान करते हुए कहा, “अमार ब** लागे ना”। जानकारी के लिए बता दें कि ‘ब**’ एक बेहद आपत्तिजनक बंगाली शब्द है जिसका इस्तेमाल जननांगों के बाल के रूप में किया जाता है। जिस तरह हिंदी में ‘मुझे झाँ** फर्क नहीं पड़ता’ का इस्तेमाल होता है, उसी तरह बंगाली में इसका इस्तेमाल किया गया है। ममता बनर्जी के इस बयान पर लोगों में आक्रोश है और उन पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाषा के स्तर को और नीचे गिराने के आरोप लग रहे हैं।
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया हो। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी ममता बनर्जी ने ‘B#ra’ जैसे सेक्सिस्ट शब्द का इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा था। इसका इस्तेमाल पुरुषों के जननांग के लिए किया जाता है।
Although nothing better is expected of the foul mouthed Mamata Banerjee, but this time she has outdone herself. She abused the Prime Minister, again and used a sexist slang ‘Bara’, which means Dick. Earlier she had used the word ‘Bal’, meaning pubic hair.
उस समय भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने कहा था, “आज के समय में ममता बनर्जी जितनी घृणित और आपत्तिजनक कोई भी नेता नहीं है। लेकिन पश्चिम बंगाल के लोग अब उनसे तंग आ चुके हैं।”
नोएडा में हिंसक प्रदर्शन (साभार- दैनिक भास्कर) नोएडा में सैलरी की माँग को लेकर कर्मचारियों के प्रदर्शन में भड़की हिंसा को लेकर भड़काऊ पोस्ट करने पर RJD प्रवक्ता प्रियंका भारती और कंचना यादव के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। इन्होंने मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के एक पुराने वीडियो को नोएडा का बताकर शेयर किया था। इस पुराने वीडियो में पुलिस को प्रदर्शनकारी को पीटते दिखाया गया था।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने पहले ही इन वीडियो का फैक्टचेक किया था। पुलिस ने वीडियो को गलत बताते हुए कहा कि यह वीडियो मध्यप्रदेश के शहडोल जिले की घटना का है। इसे गौतमबुद्ध नगर का बताकर सोशल मीडिया अकाउंट्स से प्रसारित किया जा रहा है, जो बिल्कुल झूठ है।
मध्यप्रदेश के शहडोल जनपद के बुढार थाना क्षेत्र में एक युवक द्वारा नशे की अवस्था में हंगामा किए जाने की घटना के वीडियो को भ्रामक रूप से जनपद गौतमबुद्ध नगर की घटना बताकर कतिपय सोशल मीडिया एकाउंट से प्रसारित किया जा रहा है, जो पूर्णतः असत्य एवं भ्रामक है।
पुलिस ने RJD प्रवक्ता प्रियंका भारती और कंचना यादव के अलावा भी भड़काऊ पोस्ट करने वाले कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है।
ऐसे में अदालतों से भी प्रश्न है कि हिंसा भड़काने वालों पर कानूनी डंडा चलेगा? ऐसे फेक वीडियो फैलाकर हिंसा भड़काने वालों के साथ कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। देश में अशांति फैलाना बहुत ही संगीन अपराध माना जाना चाहिए। ताकि भविष्य में कोई नेता या पार्टी ऐसा घिनौना काम नहीं कर सके। लेकिन देश का दुर्भाग्य यह है कि जिस अपराध के लिए आम नागरिक को आसानी से जमानत नहीं मिलती उसी अपराध में नेताओं को मिल जाती है, क्यों?
नोएडा में मजदूरों के वेतन वृद्धि समेत ज्यादातर माँगों को सरकार ने मान लिया है और उसे 1 अप्रैल 2026 से लागू भी कर दिया है। इसके बावजूद मजदूरों का हिंसक प्रदर्शन जारी है। मंगलवार (14 अप्रैल 2026) को प्रदर्शनकारियों ने 2 से 3 जगहों पर पुलिस की गाड़ियों पर पथराव किया और आगजनी की।
अब सवाल उठ रहा है कि सरकार जब मजदूरों के असंतोष का पता चलते ही एक्शन में आ गई, उनके साथ संवाद किया और सुनिश्चित किया कि उनकी माँगे पूरी हों, इसके बाद भी आगजनी और पथराव की घटनाएँ हो रही है, तो सवाल उठता है कि इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं…
हिंसा का नक्सली और पाकिस्तानी कनेक्शन की आशंका
साजिश का तो जाँच के बाद में पता चलेगा, लेकिन मुख्यमंत्री ने आशंका जताई है कि ये नक्सलवाद को फिर से जीवित करने का प्रयास हो सकता है। सीएम ने कहा कि देश में नक्सलवाद खात्मे के कगार पर है, लेकिन इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश हो सकती है।
प्रदर्शनकारियों में भ्रामक और विघटनकारी तत्व भी शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि जो वास्तव में मजदूर हैं, उनसे ही बातचीत की जानी चाहिए। अक्सर बाहरी लोग मजदूर के प्रतिनिधि बनकर आंदोलन में घुसपैठ करते हैं।
वहीं श्रम मंत्री अनिल राजभर ने हिंसक प्रदर्शन के मद्देनजर पाकिस्तान लिंक की भी जाँच करने की बात कही थी। उन्होंने हिंसा को सुनियोजित साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि मेरठ और नोएडा से 4 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनका पाकिस्तान कनेक्शन सामने आया है।
सरकार के आला अधिकारी आलोक कुमार ने कहा है कि मजदूरों का प्रदर्शन हिंसक होने के पीछे खुफिया जानकारी मिली है कि कुछ अराजक तत्व मजदूरों की आड़ में हिंसा फैला रहे हैं। राज्य में उद्योगों को लेकर योगी सरकार ने सकारात्मक माहौल बनाया है। कानून व्यवस्था दुरुस्त किया गया है। साजिश कर इसे बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है।
गलत वीडियो और जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की गई
डीजीपी राजीव कृष्ण, जो लखनऊ कंट्रोल रूम से मॉनिटरिंग कर रहे हैं, ने कहा है कि अफवाह फैलाने वाले कई ग्रुप को चिन्हित किया गया है। कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अलग-अलग जगहों पर भी पाए गए हैं। अफवाहें फैलाने वाले दो एक्स हैंडल के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसके अलावा 50 से अधिक एक्स हैंडल की पहचान की गई है, जिनमें से कई पिछले 24 घंटों में बनाए गए हैं। अब उनकी जाँच होगी।
इतना ही नहीं, यूपी पुलिस ने सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे वीडियो को गलत बताते हुए कहा है कि यह वीडियो मध्यप्रदेश के शहडोल जिले की घटना का है। इसे गौतमबुद्ध नगर का बताकर सोशल मीडिया अकाउंट्स से प्रसारित किया जा रहा है, जो पूर्णतः असत्य है।
यूपी पुलिस ने किसी भी वीडियो या जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सत्यता जानने की जरूरत पर बल दिया है। इसके अलावा NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, एक ऑडियो क्लिप में एक शख्स लोगों से कहता सुनाई दे रहा है कि मंगलवार को फिर से पुलिस पर हमला करना है और लाठीचार्ज करवाना है, क्योंकि कई लोग पहले दिन घायल हुए थे। इस ऑडियो में शख्स कह रहा है कि हमारे बहुत से बहन-भाई घायल हुए हैं और इसीलिए आप लोग सुबह आने की कृपा करें।
इसी के साथ कुछ चैट्स में प्रदर्शनकारियों को मिर्ची पाउडर साथ लाने की सलाह दी गई ताकि जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। एक मैसेज में लिखा गया कि अगर पुलिस लाठी उठाए तो मिर्ची पाउडर काम आएगा और ज्यादा से ज्यादा लोग इसे लेकर आएँ। वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं होंगी तब तक हड़ताल जारी रहेगी।
POLICE SOURCES CLAIM WHATSAPP NETWORK BEHIND MOBILISATION EVEN AS UNREST CONTINUES IN SECTOR 70 NOIDA TODAY. Police are facing continuous stone pelting. Efforts are underway to bring the crowd under control. POLICE SOURCES CLAIM PROTESTERS ADDED TO GROUPS OVERNIGHT VIA QR CODES.… pic.twitter.com/WtZnsZ8JRG
अब नोएडा का मामले में साजिश का पता तो जाँच पूरी होने के बाद चलेगा, लेकिन मानेसर को लेकर जो रिपोर्ट आई है उसने साफ हो गया है कि यहाँ मजदूरों की आड़ में साजिश के तहत हिंसा भड़काई गई।
मानेसर में रची गई गहरी साजिश का हुआ खुलासा
9 अप्रैल 2026 को गुरुगाम के मानेसर में आईएमटी कंपनी में वेतन वृद्धि की माँग लेकर मजदूरों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान 300 से 400 की भीड़ जमा हो गई और कंपनी प्रबंधन के साथ-साथ पुलिस पर पथराव किया। घटना की जाँच के दौरान पता चला है कि व्हाट्स एप पर ग्रुप बनाई गई थी, जिसमें मैनेजर रामबीर को मारने की बात थी और फिर दंगा भड़काने की साजिश की गई थी। इस मैसेज में लिखा था कि रामबीर को बाहर लेकर आओ।
दूसरे मैसेज में रात तक इंतजार करने और फिर आग लगाने को कहा गया था। दरअसल साजिशकर्ता चाहते थे कि रात के अंधेरे का फायदा उठा कर काम को अंजाम दिया जाए। इतना ही नहीं मैसेज से पता चलता है कि पेट्रोल बम से हमले की तैयारी की गई थी। मैसेज में कहा गया है कि ठेके से बीयर की बोतल लेकर आना और पेट्रोल भरकर कंपनी पर फेंक देना। इससे पता चलता है कि साजिश कर मजदूरों की आड में कंपनियों को जलाने और मैनेजर को मारने की योजना थी।
पुलिस का कहना है कि व्हाट्स एप में जिस तरह के मैसेज मिले हैं, उससे पता चलता है कि कितनी बड़ी साजिश रची गई थी। पुलिस इस मामले की गहनता से जाँच कर रही है। जल्द ही ऐसे नकाबपोशों को बेनकाब किया जाएगा, जिन्होंने मजदूरों की आड में हिंसा फैलाने की कोशिश की। इस घटना ने बता दिया है कि कैसे भोलेभाले मजदूरों को भड़का कर, उन्हें विरोध प्रदर्शन के लिए उकसा कर अपनी रोटी सेंकने की कोशिश अराजक तत्व करते हैं।
पवन खेड़ा के घर पहुँची पुलिस, गिरफ़्तारी से बचने के लिए हैदराबाद भागे (Aajtak & Prabhatkhabar) असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई FIR के बाद कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के घर असम पुलिस की एक टीम पूछताछ के लिए पहुँची थीं। लेकिन दिल्ली स्थित आवास पर पवन खेड़ा नहीं मिले।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने जानकारी दी कि पवन खेड़ा कल सुबह ही गुवाहाटी से निकल गए थे। दिल्ली में पुलिस की छापेमारी के दौरान पता चला कि वे अब हैदराबाद भाग गए हैं। मुख्यमंत्री हिमंता ने स्पष्ट कहा कि कानून अपना काम करेगा और कोई भी बच नहीं पाएगा।
#WATCH शिवसागर (असम): असम के सीएम और जालुकबारी विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी उम्मीदवार हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा,"हम आराम से 100 सीट जीतने वाले हैं...दोनों चुनाव हारने वाले हैं आपने माहौल देखा है वो लोग चुनाव जीतने वाले नहीं है...
पवन खेड़ा ने दो दिन पहले आरोप लगाया था कि असम के CM हिमंता की पत्नी रिंकी भुइयाँ सरमा के पास मिस्र, एंटीगा-बरबूडा और UAE के पासपोर्ट हैं। सीएम और उनकी पत्नी ने इन आरोपों को पूरी तरह गलत बताया है। इसी मामले में सोमवार(अप्रैल 7) को FIR दर्ज की गई थी।
आखिर झूठ पर झूठ बोलकर और फर्जीवाड़ा कर के कांग्रेस कब तक जनता को पागल बनाकर वोट लेती रहेगी? अगर पवन खेड़ा के आरोपों में दम था तो हैदराबाद क्यों भागा?
यूरोप से ड्रोन मंगवाकर म्यांमार भेज रहे थे विदेशी, भारत में रची आतंकी साजिश (साभार : Moneycontrol) राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने के आरोप में 7 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। इनमें 6 यूक्रेन के और 1 अमेरिका का नागरिक शामिल है। इन आरोपितों को दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता एयरपोर्ट से पकड़ा गया है।
मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी विधानसभा में पुष्टि की कि अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई विदेशी नागरिक मिजोरम के रास्ते म्यांमार जाकर उग्रवादियों को हथियारों की ट्रेनिंग दे रहे हैं। इनमें से कुछ के रूस-यूक्रेन युद्ध में शामिल होने की भी खबर है।
NIA के मुताबिक, ये लोग यूरोप से ड्रोन की बड़ी खेप मँगाकर भारत के रास्ते म्यांमार के विद्रोही समूहों को सप्लाई कर रहे थे, जो भारतीय उग्रवादियों की मदद करते हैं। जाँच में सामने आया है कि ये सभी आरोपित वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन अनिवार्य ‘प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट’ (RAP) के बिना मिजोरम पहुँच गए।
वहाँ से इन्होंने सीमा पार कर म्यांमार में भारत विरोधी जातीय समूहों से मुलाकात की। NIA ने कोर्ट को बताया कि ये आरोपित ड्रोन की सप्लाई के साथ-साथ आतंकी ट्रेनिंग और हथियारों के नेटवर्क में भी शामिल थे।
पटियाला हाउस कोर्ट ने साजिश की गहराई और फंडिंग के स्रोतों का पता लगाने के लिए आरोपितों की हिरासत 27 मार्च तक बढ़ा दी है। एजेंसी अब इनके मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया अकाउंट्स को खंगाल रही है ताकि भारत में छिपे इनके अन्य साथियों और विदेशी हैंडलर्स का पर्दाफाश किया जा सके।
आखिर राहुल गाँधी के गुलाम बन INDI गठबंधन देश को कहां ले जाना चाहता है? वैसे लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला जो अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने जा रहे हैं उसके जिम्मेदार वे स्वयं हैं। लोक सभा में हंगामा कर रोज के करोड़ों रूपए बर्बाद करने वालों को सदन से बाहर नहीं करना। आखिर मार्शल किस लिए हैं? लोक सभा अध्यक्ष की अपेक्षा विधान सभा के अध्यक्ष हंगामा करने वालों के विरुद्ध मार्शल को बुलाकर उन सदस्यों को सदन से बाहर करते हैं। बिरला को हंगामा करने वाले सदस्यों को बाहर निकलवाकर सदन की कार्यवाही को चालू रखना चाहिए। जब तक ईंट का जवाब पत्थर नहीं दिया जाएगा उपद्रवी बाज़ नहीं आने वाले। लोकसभा में विपक्ष लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी को संसद में बोलने नहीं देने का आरोप विपक्ष लगा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गाँधी पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए सरकार पर आरोप लगा रहे थे। उस वक्त स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का हवाला देते हुए राहुल गाँधी को रोका। इस मुद्दे पर कई दिनों तक विपक्ष ने सदन को नहीं चलने दिया।
कांग्रेस इस बात से भी नाराज है कि जब महिला सांसदों ने पीएम की सीट को सदन में घेरा, तो स्पीकर ओम बिरला ने कहा था कि कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी, इसलिए प्रधानमंत्री को सदन आने से उन्होंने रोका। लेकिन ऐसी घटनाएँ सदन में पहली बार हुई कि महिला सांसद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा को संबोधित नहीं कर पाए। इसकी वजह महिला सांसदों का इस तरह से पीएम की सीट को घेरना था। चर्चा यह है कि नरेंद्र मोदी पर हमले की सूचना ओम बिरला को कांग्रेस में इस घिनौनी हरकत के विरोधी सदस्यों ने दी थी।
विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे ने पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी और दूसरे प्रधानमंत्रियों पर आरोप लगाया। संसद में हंगामे के दौरान 8 विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। सासंदों के निलंबन और महिला सांसदों द्वारा पीएम की सीट घेरने को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगे थे। इस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बोलना चाहते हैं, लेकिन बोलने की अनुमति नहीं मिली।
स्पीकर के खिलाफ ‘हटाने का प्रस्ताव’ लाया जाता है
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया सरकार के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, उससे थोड़ा अलग होता है। इसमें लोकसभा स्पीकर को ‘हटाने का प्रस्ताव’ यानी मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर लाया जाता है। यह संविधान की अनुच्छेद 94 सी के तहत लाया जाता है। इस अनुच्छेद में लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है।
लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पेश करने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना होता है। ये नोटिस लिखित होना चाहिए। इस प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों का हस्ताक्षर होना जरूरी है यानी कोई भी सांसद लोकसभा में खड़े होकर अपने दम पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता। स्पीकर पर स्पष्ट और ठोस आरोप लगे हों। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद इस पर सदन में चर्चा होती है और फिर सांसद वोटिंग करते हैं। इस दौरान स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं करते हैं, बल्कि डिप्टी स्पीकर या सदन का वरिष्ठ सदस्य सदन की अध्यक्षता करते हैं।
हटाने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत
लोकसभा में प्रस्ताव सदन में उपस्थित सांसदों द्वारा बहुमत से पास होना जरूरी है, कोई दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती। स्पीकर को हटाने के लिए सिर्फ बहुमत की जरूरत होती है। जितने सांसद वोट दे रहे हों, उनका 50 फीसदी से एक ज्यादा जरूरी है।
अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो तुरंत ही स्पीकर पद से हट जाता है। वह सांसद बना रहता है, लेकिन स्पीकर नहीं और फिर सदन को दूसरा स्पीकर चुनना होता है।
स्पीकर को हटाने के लिए आज तक कभी वोटिंग नहीं हुई
सदन में स्पीकर को हटाने के लिए कई बार नोटिस दिया गया है। सदन में प्रस्ताव पर बहस भी हुई है, लेकिन वोटिंग नहीं हुई है।
पहली बार 1954 में तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था। इस पर सदन में बहस हुई। विपक्ष ने उनपर कांग्रेस का पक्ष लेने का आरोप लगाया था। सदन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और वोटिंग हुई नहीं।
दूसरी बार लोकसभा स्पीकर डॉक्टर नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ 1967 में हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इन पर कांग्रेस का पक्ष लेने का विपक्ष ने आरोप लगाया। विपक्ष का कहना था कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। इस वक्त भी मतदान नहीं हुआ।
तीसरी बार 8वीं लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड के खिलाफ विपक्ष ने 1987 में अविश्वास प्रस्ताव रखा। उस वक्त बोफोर्स को लेकर कांग्रेस सरकार पर विपक्ष हमलावर था। विपक्ष का आरोप था कि जाखड नियमों का हवाला देकर विपक्ष को बोलने से रोकते हैं और सरकार को बचाते हैं। इस प्रस्ताव पर भी वोटिंग की नौबत नहीं आई।
13वीं लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया। उस वक्त एनडीए की सरकार थी। 2001 में नोटिस दिया गया, लेकिन प्रस्ताव खारिज हो गई। उन पर आरोप था कि सरकार के पक्ष में स्थगन प्रस्ताव को वह खारिज कर देते हैं।
2011 में 15वीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें 2जी, सीडब्लूजी घोटालों को लेकर बहस में बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। स्पीकर सरकार का बचाव कर रही हैं। इस नोटिस को भी खारिज कर दिया गया और वोटिंग तक बात नहीं पहुँची।
17वीं लोकसभा में 2020 में वर्तमान स्पीकर ओम बिरला ने कृषि कानूनों को लेकर विपक्ष के जबरदस्त हंगामे पर विपक्षी सांसदों को निलंबित किया था। इसके विरोध में विपक्ष ने स्पीकर को हटाने का नोटिस देने की बात सार्वजनिक रूप से कीकांग्रेस लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने पर प्रस्ताव सदन में लाया ही नहीं जा सका।
पाकिस्तान को सबक सिखाने का वक्त, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT) T20 विश्वकप 2026 में भारत-पाकिस्तान मैच क्रिकेट का सबसे बड़ा त्योहार होता है। कोलंबो में 15 फरवरी को होने वाला यह मुकाबला अरबों दर्शकों की नजरों में होता, ब्रॉडकास्टर्स के लिए सोने की खान। लेकिन पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने आधिकारिक घोषणा कर दी कि वह इस मैच को नहीं खेलेगा। तटस्थ स्थल पर खेलने का बाध्यकारी अनुबंध होने के बावजूद पाकिस्तान सरकार और PCB ने राजनीतिक ड्रामा शुरू कर दिया।
पाकिस्तान द्वारा यह सिर्फ एक मैच का बहिष्कार नहीं, बल्कि ICC की पूरी व्यवस्था पर हमला है। बांग्लादेश के साथ जो हुआ- सुरक्षा कारणों का हवाला देकर भारत में मैच न खेलने पर उन्हें पूरे टूर्नामेंट से बाहर कर स्कॉटलैंड को जगह दे दी गई, ठीक वही या उससे कड़ी सजा पाकिस्तान को मिलनी चाहिए। अगर पाकिस्तान आखिरी समय पर यह नाटक करता है, तो उसे न सिर्फ विश्वकप से बाहर करना चाहिए, बल्कि आर्थिक रूप से ऐसा कुचलना चाहिए कि PCB कटोरा लेकर ICC के दरवाजे पर भीख माँगने लायक न रहे।
पहले भी मैच खेलने से मना कर चुकी हैं टीमें, लेकिन इस बार…
क्रिकेट इतिहास में कई बार टीमें सुरक्षा या अन्य गंभीर कारणों से मैच छोड़ चुकी हैं। सामान्य नियम यही रहा कि विरोधी टीम को दो पॉइंट्स दे दिए जाते हैं। जैसे- 1996 विश्वकप में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज ने श्रीलंका में सुरक्षा कारणों से इनकार किया, श्रीलंका को पॉइंट्स मिले। साल 2003 में न्यूजीलैंड ने केन्या में, इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे में राजनीतिक-सुरक्षा कारणों से मना किया। लेकिन यहाँ सिर्फ पॉइंट्स कटे। कुल 6-7 ऐसे बड़े मौके आए, जहाँ वजहें पहले से स्पष्ट थीं और टीमें पहले बता चुकी थीं।
लेकिन पाकिस्तान का मामला अलग है। यहाँ कोई ठोस सुरक्षा खतरा नहीं बल्कि सिर्फ राजनीतिक अडंगेबाजी है। ओलंपिक खेलों में ऐसी अडंगेबाजी में सीधे-सीधे देश को ही ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है। लेकिन आईसीसी ने अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।
दरअसल, ओलंपिक कमेटी अक्सर ऐसे देशों को ओलंपिक से बाहर कर देती है, जिनके खेल संघों में सरकारी दखल हो और वो निश्चित प्रक्रिया या मापदंडों को पूरा नहीं कर पाते हो। आपको याद न हो तो बता दें कि भारत की हॉकी कमेटी पहले लालफीताशाही के दौर पर ब्लैकलिस्ट हो चुकी है। ऐसे में इस बार पाकिस्तान को लेकर भी आईसीसी को यही कदम उठाना होगा। बता दें कि पीसीबी का चीफ मोहसिन नकवी खुद पाकिस्तान का गृहमंत्री है, तो ऐसे में यहाँ सीधे-सीधे राजनीतिक दखल ही है। आईसीसी इसे एक मुद्दा बनाकर भी कदम उठा सकती है।
चूँकि भारत-पाक मैच ICC का सबसे बड़ा रेवेन्यू जनरेटर है। इसमें विज्ञापन दरें 25-40 लाख रुपये प्रति 10 सेकंड की होती है। सिर्फ इसी मैच से 200 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो सकता है। ऐसे में आईसीसी को न सिर्फ कड़े फैसले लेने होंगे, बल्कि नुकसान की भरपाई भी करानी चाहिए। इसकी वजह ये है कि पहले के मामलों में टीमों के मना करने की वजहें वैध होती थी, इसलिए ढील दी जाती थी। लेकिन यहाँ सिर्फ ड्रामा है, जो क्रिकेट को राजनीति का शिकार बना रहा है।
बहरहाल, इसके लिए आईसीसी अब एक बैठक भी करने वाला है। इसी में तय किया जाएगा कि पाकिस्तान को टूर्नामेंट में खेलने की इजाजत मिलेगी या नहीं। अगर मिलती है तो भी कड़ी सजा होगी। लेकिन सवाल यह है कि पाकिस्तान को टी-20 विश्वकप में खेलने की इजाजत दी ही क्यों जाए?
बांग्लादेश को तो पूरी तरह बाहर कर दिया गया क्योंकि उसने आखिरी समय में भारत से मैच शिफ्ट करने की माँग की और ICC ने मना किया। लेकिन पाकिस्तान तटस्थ स्थल कोलंबो में भी नहीं खेलना चाहता। यह दोहरा मापदंड क्यों? ICC अगर ढील देता है, तो कल कोई और टीम भी यही करेगी। जैसे को तैसे का जवाब ही सही रास्ता है।
आईसीसी के पास पाकिस्तान को सबक सिखाने के कई हथियार
पहला: ICC के पास पाकिस्तान को सबक सिखाने के कई हथियार हैं। पहला और सबसे सख्त है- पाकिस्तान को पूरे टूर्नामेंट से प्रतिबंधित कर देगा। पाकिस्तान को बाहर कर युगांडा को जगह दी जा सकती है, जैसा बोर्ड बैठक के बाद तय होगा।
दूसरा: ICC का सालाना रेवेन्यू शेयर रोकना। चूँकि PCB पहले से आर्थिक संकट में है, यह राशि बंद होने से वे दिवालिया हो जाएँगे।
तीसरा: जियो-स्टार जैसे ब्रॉडकास्टर्स को हुए नुकसान की भरपाई PCB से कराना। जिसमें पाकिस्तान को लाखों डॉलर की रकम भरनी पड़ेगी और वो पूरी तरह से भिखारी बन कर हाथ में कटोरा थामने की नौबत में आ जाएगा।
चौथा: द्विपक्षीय सीरीज पर पूरी रोक, WTC अंकों में कटौती और ICC रैंकिंग गिराना।
पाँचवाँ और सबसे घातक: PSL में विदेशी खिलाड़ियों के लिए एनओसी पर ही रोक। यानी पाकिस्तान की लीग पर बाहरी खिलाड़ियों के लिए सीधे-सीधे बैन, हालाँकि सन्न्यास ले चुके या फ्री एजेंट्स पर ये रोक लागू नहीं होगी, लेकिन ऐसे कितने ही खिलाड़ी हैं? चूँकि ऐसे खिलाड़ियों पर आईसीसी से मान्यताप्राप्त सभी टूर्नामेंट्स से बाहर होने का डर रहेगा, तो वो भी पीएसएल से किनारा कर लेंगे।
PSL पाकिस्तान क्रिकेट की लाइफलाइन है। विदेशी स्टार न आएँ तो लीग फ्लॉप हो जाएगी। चूँकि स्पॉन्सर ही नहीं रहेंगे, तो PCB पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा और वो इसका आयोजन भी नहीं करना पाएगा।
ये सजाएँ सिर्फ दंड नहीं बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी भी होगी। क्योंकि भारत-पाकिस्तान मैच न होने से सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि क्रिकेट की गरिमा को भी ठेस पहुँची है। ऐसे में ICC अगर सख्त नहीं हुआ, तो उसकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी। बांग्लादेश के साथ जो हुआ, पाकिस्तान के साथ उससे कड़ा होना चाहिए। यानी उसे सीधे टूर्नामेंट से बाहर करना और दंडात्मक कार्रवाई करना। अगर तब भी पाकिस्तान अकड़ दिखाए, तो सीधे पीसीबी को आईसीसी से बैन कर देना।
देश में लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के माध्यम से मनमाफिक फेक नैरेटिव गढ़ने की आदत काफी पुरानी है। लेकिन हाल के वर्षों में यह एक संगठित, योजनाबद्ध और अंतरराष्ट्रीय साजिश के साथ सामने आई है। ‘एप्सटीन फाइल्स’ के नाम पर पीएम मोदी और मोदी सरकार को जानबूझकर घसीटने की कोशिश उसी रणनीति की ताजा कड़ी है। सोशल मीडिया से लेकर कुछ चुनिंदा डिजिटल प्लेटफॉर्म तक यह झूठ इस तरह फैलाया गया है, मानो कोई अकाट्य सच सामने आ गया हो। जबकि तथ्य यह है कि जिन दस्तावेजों और सूचियों का हवाला दिया गया, उनमें पीएम मोदी का नाम था ही नहीं। सवाल यह नहीं कि झूठ पकड़ा गया, सवाल यह है कि यह झूठ गढ़ा किसने, क्यों गढ़ा और किस मकसद से गढ़ा गया। यह दिलचस्प और ध्यान देने योग्य अकाट्य तथ्य है कि जब-जब भारत वैश्विक मंच पर मजबूत होता नजर आता है, वह चाहे जी-20 की अध्यक्षता हो, रणनीतिक साझेदारियां हों, आत्मनिर्भर भारत की नीति हो या फिर तेजी से बढ़ती इकोनॉमी हो, तब-तब इकोसिस्टम के जरिए ऐसे नैरेटिव तेज हो जाते हैं।मोदी का नाम महज संयोग नहीं, खतरनाक षड्यंत्र
पहले जरा यह जान लेते हैं कि यह ‘एप्सटीन फाइल्स’ आखिर हैं क्या। जेफरी एप्सटीन एक अमेरिकी अपराधी था, जिस पर यौन शोषण और मानव तस्करी जैसे गंभीर आरोप लगे। उसकी जांच से जुड़े कई दस्तावेज, संपर्क और अदालती कागजात समय-समय पर सार्वजनिक होते रहे हैं। लेकिन इन फाइल्स का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार की तरह करने की साजिशें रची जा रही हैं। यह महज संयोग नहीं हो सकता कि इस खतरनाक षड्यंत्र में भारत के लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी का नाम घसीटा जा रहा है। इस खेल के पीछे वही लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम दिखाई देता है, जो वर्षों से ‘अर्बन नक्सल’, ‘इंटेलेक्चुअल डिसेंट’ और ‘एक्टिविस्ट जर्नलिज्म’ के नाम पर भारत की संस्थाओं, सेना, लोकतंत्र और अब सीधे प्रधानमंत्री को निशाना बनाता रहा है।
लेफ्ट लिबरल गैंग सोशल मीडिया की साजिशों में लिप्त
दरअसल चुनावी हार, जनसमर्थन की कमी और वैचारिक दिवालियापन ने इस गैंग को सड़क की राजनीति से सोशल मीडिया की साजिशों तक सीमित कर दिया है। जब देश के भीतर मुद्दे नहीं मिलते, तब विदेशों में बैठकर ‘विदेशी रिपोर्ट’, ‘लीक दस्तावेज’ और ‘अज्ञात सूत्रों’ के सहारे भारत की छवि धूमिल करने की कोशिश होती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मोदी सरकार को बदनाम करने से इन्हें मिलेगा क्या? जवाब साफ है: राजनीतिक पुनर्जीवन की उम्मीद। जिस नेतृत्व को बार-बार जनता ने नकार दिया हो, उसके लिए नैरेटिव वॉर आखिरी हथियार बचा है। हालांकि इसमें भी उसे बुरी तरह मात मिली है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की साख को चोट पहुंचाना, निवेशकों में भ्रम फैलाना और देश के भीतर अविश्वास का माहौल बनाना यही इस पूरी मुहिम का लक्ष्य है।
अमेरिका से लौटे पत्रकार, एप्सटीन के नाम पर शुरू हुआ विवाद पिछले कुछ समय में भारतीय सोशल मीडिया पर यह दावा तेजी से फैलाया गया कि प्रधानमंत्री का नाम कुख्यात जेफरी एप्सटीन से जुड़ी फाइल्स में है। बाद में जब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों में ऐसा कोई उल्लेख सामने नहीं आया, तो सवाल उठा कि यह दावा किसने और क्यों फैलाया। इसी बिंदु की गहन पड़ताल की गई। इस सोशल मीडिया थ्रेड ने पूरे घटनाक्रम को और सुनियोजित साजिश की पोल खोलकर रख दी। थ्रेड में तथ्यों के माध्यम से यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि अक्टूबर 2025 में अमेरिका से लौटे कुछ भारतीय पत्रकारों ने मिलकर कैसे साजिश को अंजाम दिया। सुनियोजित प्लानिंग के तहत इन पत्रकारों ने लगभग एक ही समय पर, समान भाषा और समान लक्ष्यों के साथ केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ वीडियो और पोस्ट जारी किए। लोगों के बीच मिलकर भ्रम फैलाया गया।
संथाल परगना जिले में बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में जनजातीय समाज का अभियान (साभार: Dainik Jagran) झारखंड का संथाल परगना में जनजातीय समाज अपनी पहचान के लिए जागरूक हो गए हैं। सालों से दबे-दबे स्वर में कही जाने वाली बात अब खुले तौर पर सड़कों, गाँवों और बैठकों में गूँजने लगी है। संथाल परगना के जनजातीय समाज ने साफ शब्दों में यह ऐलान कर दिया है कि वे गैर समाज को अब न तो वे अपनी जमीन देंगे और न ही अपनी बेटियाँ सौंपेगे। जनजातीय समाज का यह संकल्प जमीन से उपजा हुआ जनआंदोलन है, जो साहिबगंज, पाकुड़, राजमहल, गोड्डा, दुमका और आसपास के इलाकों में तेजी से फैल रहा है।
जनजातीय समाज की जागरूकता
साहिबगंज इस पूरे अभियान का केंद्र बनकर उभरा है। ‘एभेन अखाड़ा जागवार बैसी’ संगठन के मुकेश सोरेन की अगुवाई में सकरीगली, छोटी भगियामारी, संताली टोला, मुस्लिम टोला, बिंद टोला महलदार टोला सहित अन्य गाँवों में ढोल-नगाड़े और डुगडुगी बजाकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। बैठकों में बुजुर्ग, युवा और महिलाएँ खुलकर अपनी बात रख रहे हैं।
समस्या है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए सालों से उनके इलाकों में बसते जा रहे हैं। इसीलिए कई लोगों ने गैर जनजातीय समाज के हाथ अपनी जमीन नहीं बेचने की बात कही। कई जनजातीय समाज के लोगों ने तालझारी थाने में आवेदन देकर इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। ग्रामीण उपायुक्त से मिलने की भी तैयारी कर रहे हैं।
जनजातीय समाज का बेटियों को नहीं सौंपने का संकल्प
बांग्लादेशी घुसपैठिए जनजातीय समाज की बेटियों को भी निशाना बनाकर जमीन हड़पने की साजिश रचते हैं। कई मामलों में जनजातीय बेटियों से शादी कर जमीन हड़पी गई और उन्हें मुस्लिम बना दिया गया। इसके विरोध में जनजातीय समाज ने फैसला लिया कि अब गैर समाज में बेटियों को नहीं सौंपा जाएगा यानी अब दूसरे समाज में बेटियों की शादी नहीं होने देंगे।
बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में जनजातीय समाज का अभियान
आखिर जनजातीय समाज को गैर समाज के खिलाफ यह अभियान चलाने की जरूरत क्यों पढ़ी। ग्रामीणों का कहना है कि बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से भारत में घुसकर उनके इलाके में बसते जा रहे हैं। पहले यह प्रक्रिया धीमी थी, लेकिन अब यह इतनी तेज हो चुकी है कि कई गाँवों में जनजातीय अपने ही क्षेत्र में हाशिए पर पहुँचते दिखाई दे रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ये बांग्लादेशी घुसपैठिए फर्जी आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी के सहारे ने सिर्फ सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं, बल्कि जनजातीय जमीनों पर कब्जा भी किया हुआ है। मोतीहारना में मुस्लिमों ने जनजातीय की जमीन पर पूरी बस्ती बसा ली है।
जनजातीय समाज का गुस्सा इसलिए भी फूटा क्योंकि जमीन उनके लिए केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान उनकी संस्कृति और उनकी जीवन पद्धति का आधार है। संथाल परगना में CNT और SPT जैसे कानूनों का उद्देश्य ही यही था कि जनजातीय जमीन किसी गैर-जनजातीय के हाथ में न जाए।
इसके बावजूद जमीनों के ट्रांसफर हुए, नाम बदले गए और धीरे-धीरे पूरे गाँवों का सामाजिक स्वरूप बदलने लगा। जनजातीय समाज अब इसे केवल जमीन हड़पने का मामला नहीं, बल्कि सुनियोजित डेमोग्राफिक बदलाव के रूप में देख रहा है।
स्थिति की गंभीरता तब और स्पष्ट होती है जब अफीम की खेती जैसे मामलों का खुलासा सामने आता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, संथाल परगना के तमाम इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों ने अफीम की खेती की हुई हैं, जिसकी तस्करी भी होती है।
झारखंड हाई कोर्ट का रुख
इन तमात तथ्यों को देखते हुए साल 2024 में झारखंड हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। अदालत ने जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दे चुकी है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाए और रिपोर्ट पेश की जाए। हाई कोर्ट की सख्ती के बाद साहिबगंज के डिप्टी कलेक्टर ने जाँच समिति का गठन भी किया।
प्रशासनिक स्तर पर यह कदम महत्वपूर्ण माना गया, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जाँच समितियाँ और आदेश तभी प्रभावी होंगे, जब जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखाई देगी। यह मामला अब तक कोर्ट में लंबित है। यही कारण है कि जनजातीय समाज ने तय किया कि अगर प्रशासन नहीं जाएगा, तो उन्हें खुद खड़ा होना पड़ेगा।
संजौली मस्जिद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन ( साभार- aajtak) इतिहास गवाह है कि कांग्रेस अपनी कुर्सी की खातिर मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक विवादों को खड़ा कर "गंगा जमुनी तहजीब" जैसे गुमराह करने वाले नारों से जनता को पागल बनाती रही है। वैसे इन विवादों में अदालतें भी पीछे नहीं। आखिर अयोध्या में राममन्दिर बनने में इतने साल क्यों लगे? कहते हैं एक डॉक्यूमेंट जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने अनुवाद करवाना था योगी सरकार से पहले सारी सरकारें तारीख पे तारीख लेती रही और हमारी अदालतें भी आंखें बंद कर तारीख पे तारीख देती रही। लेकिन 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार को उस डॉक्यूमेंट को अनुवाद करवा कोर्ट में दाखिल कर मुक़दमे में तेजी दिलवाई। अदालत को चाहिए था डॉक्यूमेंट के अनुवाद में देरी होने पर बाबरी के पक्षधर वकीलों और पार्टियों पर हर्ज़ाना क्यों नहीं लगाया? क्यों नहीं खुदाई में मिले मन्दिर के अवशेषों को छुपा के लिए नहीं दण्डित किया? अगर तत्कालीन पुरातत्व विभाग निदेशक के के मौहम्मद ने सेवानिर्वित होने पर लिखी पुस्तक में कांग्रेस और वामपंथियों के महापाप का रहस्योघाटन नहीं किया होता जनता भी बीजेपी, विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल को साम्प्रदायिक मान रही थी। मौहम्मद ने अपनी पुस्तक में साफ लिखा कि मन्दिर कभी का बन गया होता अगर कोर्ट में खुदाई में मिले सारे सबूत पेश कर दिए होते।
शिमला का संजौली सुर्खियों में हैं। वजह है एक पाँच मंजिला मस्जिद। इसका इतिहास करीब 30 साल पुराना है। अपने अस्तित्व में आने के साथ ही ये विवादित हो गया, क्योंकि ये अवैध तरीके से बनाया गया। यहाँ आसपास हिन्दू आबादी है। इनके बीच बहुमंजिला मस्जिद और यहाँ आने वाले बाहरी मुस्लिम, जो नमाज अदा करने के लिए खास तौर पर यहाँ आते हैं।
यहाँ की पूरी आबादी हिन्दू है। राजनीतिक लाभ के लिए कांग्रेस ने मस्जिद निर्माण को नजरअंदाज किया। पहले एक कमरा बनाया गया, फिर दूसरा बना और फिर धीरे-धीरे पाँच मंजिला मस्जिद तैयार हो गया। नगर निगम के कागजों में ये अवैध रहा। सरकारी आदेशों में उसे तोड़ने का फरमान जारी हुआ, लेकिन जैसे ही तोड़ने की बात आती है, आदेश पर स्टे लग जाता है।
शिमला और संजौली की हिन्दू आबादी स्टे और दूसरी कानून प्रक्रिया से परेशान हो चुकी है। हिन्दू संघर्ष समिति अब मस्जिद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है। समिति ने मस्जिद की बिजली पानी काट कर सील करने की माँग रखी थी। इसमें बिजली-पानी काटने की बात माँगी गई है। नगर निगम की ओर से कहा गया है कि बिजली-पानी काट दिया जाएगा । लेकिन अब तक उस पर अमल नहीं हुआ है।
विरोध प्रदर्शन कर रहे हिन्दू संगठनों का मंच संजौली पुलिस स्टेशन के पास में है। दिन तो धूप के साथ खुशनुमा रहता है, लेकिन रात में तापमान 3 से 4 डिग्री तक पहुँच जाता है। इसके बावजूद लोग टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं। हिमाचल की कांग्रेस सरकार और लोकल प्रशासन के रवैये से लोग खासे नाराज हैं।
ऑपइंडिया ने विरोध प्रदर्शन कर रहे हिन्दू समाज के लोगों से खास बातचीत की और उनकी समस्याओं को जाना। समिति से जुड़े कमल गौतम के मुताबिक, ये मामला दुनिया के सामने तब आया, जब 30 अगस्त 2024 को एक स्थानीय युवक के साथ 5-6 प्रवासी मुस्लिमों के समूह ने मारपीट की और सिर फोड़ दिया। आरोपित को मस्जिद ने पनाह दिया। इसी मस्जिद से उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।
हिन्दुओं के सब्र का बाँध टूट गया। हमेशा शांत रहने वाला पहाड़ इन दिनों बाहरी मुस्लिम आबादी के बढ़ते अपराध से त्रस्त हो गया है। अवैध मस्जिद इन अपराधियों के छिपने का ठिकाना बन गयी है।
डेमोग्राफी बदलने की साजिश
ऑपइंडिया ने जब स्थानीय व्यक्ति और विरोध प्रदर्शन में बढ़चढ़ कर भाग लेने वाले विजय शर्मा से बात की। उनका कहना है कि हिमाचल प्रदेश में बाहर से आने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। उनकी गतिविधियाँ संदिग्ध नजर आती है। हर दिन नए नए चेहरे देखने को मिल रहे हैं। हमारी माताओं बहनों की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।
विजय शर्मा के मुताबिक, पहले 3 फीसदी स्थानीय मुस्लिम थे, अब तो बढ़ गई है। बाहर से आने वाले घुसपैठिए चाहे वे अवैध बांग्लादेशी, रोहिग्या हों या दूसरे राज्यों से आए मुस्लिम भीड़। इनकी संख्या काफी तेजी से बढ़ी है।
उन्होंने कहा, “डेमोग्राफी बदल रही है पूरा साजिश के तहत। हिन्दुओं को दबाने के लिए सुनियोजित षडयंत्र हो रहा है। शिमला कोई बड़ा शहर नहीं है और संजौली तो छोटा-सा कस्बा है। शिमला से दूर संजौली जैसे छोटे इलाके में जाकर बसना कोई छोटी बात नहीं है। यहाँ पर मुस्लिम आबादी नहीं है इसलिए यहाँ धीरे धीरे भीड़ जमा होने लगी, ताकि डेमोग्राफी बदला जा सके। फल वाला भी सस्ते दाम में फल देने लगता है। अब हालात ये हो गए हैं कि स्थानीय लोगों से मारपीट शुरू हो गयी है। हमें तो भविष्य की चिंता है। आगे आने वाली पीढ़ी नमाज पढ़ने लगेगी, ऐसा मुझे लगता है।
मस्जिद बनाने वाला मोहम्मद सलीम सबसे बड़ा साजिशकर्ता
विजय शर्मा के मुताबिक, स्थानीय युवक का सिर फोड़े जाने के बाद लोगों का गुस्सा फूट गया। 5 सितंबर 2024 और 11 सितंबर 2024 को जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। ये वर्षों से दबी चिंगारी थी।
उनका कहना है कि 1990 में मोहम्मद सलीम संजौली पहुँचा। वह दर्जी था, उसने स्कूल के शिफ्ट होने के बाद सरकारी जमीन पर कब्जा कर एक ढाँचा बना लिया। एक मंजिल का ये ढाँचा धीरे धीरे दूसरी मंजिल तक पहुँच गया। इसे मस्जिद के रूप में विकसित करने लगा। राजनीतिक फायदे के लिए वक्फ बोर्ड से मस्जिद को NOC दिलवाया गया।
मस्जिद को पैसे मिले और धीरे धीरे उसका फ्लो बढ़ने लगा। जैसे जैसे मंजिल बढ़ी, यहाँ आने वाले नमाजियों की जमात भी बढ़ने लगी। 5 मंजिल का ये ढाँचा पूरी तरह मस्जिद की तरह इस्तेमाल होने लगा। यहाँ बड़ी संख्या में लोग नमाज अदा करने के लिए आने लगे। गौरतलब है कि यहाँ आसपास मुस्लिम बस्तियाँ नहीं है। बहुत मुश्किल से एकाध व्यक्ति नजर आता है। ऐसे में भीड़ बाहरी मुस्लिम की है, जो यहाँ पहुँच कर नमाज अदा करते हैं।
सबसे बड़ी बात है कि इतनी बड़ी मस्जिद में ग्राउंड पर सिर्फ दो टॉयलेट है। जब नमाज पढ़ने आते हैं तो बड़ी संख्या में नमाजी होते हैं। नमाज से पहले वजू करने के लिए दो टॉयलेट कम पड़ जाते है। ऐसे में ये लोग खुले में वजू करते हैं।
आसपास हिन्दू आबादी। दोपहर में महिलाएँ अपने बच्चों को लेकर स्कूल से आती हैं या दिनचर्चा के काम के लिए बाहर निकलती हैं। इन महिलाओँ को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। महिलाओं ने शुरुआत में खुले में वजू करने पर एतराज जताया, तो उन्हें गंदे कमेंट सुनने पड़े। हालाँकि महिलाओं ने पुलिस को इसकी शिकायत नहीं की। क्योंकि पहाड़ों पर आम प्रचलन है कि आपसी बातों में जल्दी पुलिस को शामिल नहीं करते हैं।
अमृता चौहान के मुताबिक, हमारी बहनें बच्चों को स्कूल से आती हैं, तो उन्हें नमाज के वक्त रोक दिया जाता है, जब तक कि नमाजी वहाँ से चले नहीं जाते। यहाँ तक कि मुस्लिमों की ठेले और रेडी की दुकानें बड़ी संख्या में लगने लगी है। महिलाओं के सामान खरीदने जाने पर भी गंदे कमेंट सुनने को मिलते हैं।
असिस्टेंट टाउन प्लानर बनते ही महबूब शेख ने मारी पलटी
अवैध मस्जिद की नींव रखने वाला मोहम्मद सलीम का कार्यकलाप संदिग्ध था। 1990 से 2024 के दौर में मुस्लिम भीड़ के जुटने और अवैध मस्जिद निर्माण को लेकर नगर निगम ने भी कहा था कि मोहम्मद सलीम के खिलाफ कार्रवाई की जाए। उस वक्त जेई महबूब शेख ने मोहम्मद सलीम को जाँच में दोषी ठहराया था लेकिन बाद में पलट गया।
ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि असिस्टेंट टाउन प्लानर बनते ही महबूब शेख ने अपनी रिपोर्ट में मोहम्मद सलीम को क्लीनचिट दे दी। उन्होंने कहा कि मोहम्मद सलीम का इससे कोई सरोकार नहीं है। उसने वक्फ बोर्ड को ‘पार्टी’ बनाने की बात कही।
स्थानीय नागरिक का कहना है कि मस्जिद को बड़ा बनाने में पैसों के इंतजाम में असिस्टेंट टाउन प्लानर महबूब शेख का बड़ा हाथ था। विजय शर्मा के मुताबिक, लोग माँग करते रह गए कि महबूब शेख के खिलाफ जाँच की जाए। उसकी संपत्तियों की जाँच की जाए, लेकिन किसी भी सरकार ने लोगों की नहीं सुनी।
हिन्दू विरोधी नैरेटिव सेट करने की कोशिश
कांग्रेस के शासन काल में हिन्दू विरोधी नैरेटिव सेट करने की कोशिश की गई। हाल ही में नामी गिरामी कॉन्वेंट स्कूल में छोटे छोटे बच्चों को मैसेज भेजा गया। ईद के दिन सफेद कुर्ता-पैजामा, जालीदार टोपी पहन कर, लंच में सेवईयाँ लेकर आने के लिए कहा गया।
अधिकांश बच्चों के पैरेंट्स बिफर गए। कमलेश मेहता के मुताबिक, खानपान में सेवइयाँ कोई ट्रेडिंशन नहीं है पहाड़ों की, लेकिन हमने पूछा कि क्या महावीर जयंती मनाई, दुर्गापूजा मनाई, जन्माष्टमी मनाई, अगर नहीं मनाई तो ईद क्यों मनाने के लिए बोल रहे हो। अंत में पैरेंट्स के दबाव में स्कूल ने निर्णय बदल दिया।
कमलेश का कहना है कि सनातन समाज अपने बच्चों और उनके भविष्य की चिंता कर रहा है। आगे आने वाली पीढ़ी की चिंता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस विधायक का वीडियो वायरल हो गया है जिसमें उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुस्लिम पक्ष से कह रहे थे कि मुझे धन्यवाद करना। दरअसल जब सीएम ने कहा कि हम 98 फीसदी हिन्दू विचारधारा को हरा कर सत्ता में आए हैं, तो हम क्या इनसे उम्मीद करें।