Showing posts with label #NIA. Show all posts
Showing posts with label #NIA. Show all posts

कश्मीर : जब गैंगरेप करके सड़क पर फेंकी गई हिंदू नर्स की क्षत-विक्षत लाश… सरला भट्ट केस में 36 साल बाद आतंकी यासीन मलिक समेत 5 के खिलाफ चार्जशीट दायर

                     यासीन मलिक पर सरला भट हत्याकांड में चार्जशीट दायर (फोटो साभार- दैनिक भास्कर)
वो भी क्या दिन थे जब शेख जी फाख्ता उड़ाते थे यानि आतंकवाद को बढ़ावा, सेना के जवानों को मारने और हिन्दुओं को मारने वालों को कांग्रेस से लेकर यूपीए(यानि वर्तमान INDI गठबंधन) बहुत सम्मान दिया करते थे, प्रधानमंत्री आवास में किसी सम्मानित की तरह आओभगत होती थी। वक़्त का चक्र ऐसा घुमा आज जेल में ज़िंदगी काटने को मजबूर।

टेरर फंडिंग के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा जेकेएलएफ का पूर्व प्रमुख यासीन मलिक के खिलाफ 36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्याकांड में बड़ी कार्रवाई हुई है। जम्मू-कश्मीर की एसआईए ने 36 साल पुराने मामले में 737 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। इसमें उसे मुख्य आरोपितों में शामिल किया है।

इसके तीन आरोपितों, अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद युसूफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है। चौथा आरोपित मुख्य शूटर खुर्शीद अहमद चालको फरार है और उसके पीओके में छिपे होने की आशंका है। सरला को उसी ने गोली मारी थी। चार्जशीट के मुताबिक, यासीन मलिक और उसके 4 साथियों ने अप्रैल 1990 में सरला भट्ट को अगवा किया और उसकी हत्या की साजिश रची।

सरला भट्ट कौन थी?

कश्मीरी पंडित सरला भट्ट उस वक्त श्रीनगर के शेर ए कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (SKIMS) में स्टाफ नर्स थीं। 36 साल पहले उनका अपहरण किया गया। उन्हें यातनाएँ दी गईं। बाद में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। सरला अनंतगाग की रहने वाली थी।

18 अप्रैल 1990 को सरला ड्यूटी पर जा रही थीं। इसी दौरान अस्पताल परिसर के पास से उन्हें उठा लिया गया। चार दिन तक अलग-अलग जगह रख कर बुरी तरह टॉर्चर किया गया। बाद में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका शव श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में मिला। शरीर पर गोलियों के साथ साथ उन यातनाओं के भी निशान थे, जो चार दिनों तक उन्हें दिए गए।

शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उसे ‘सुरक्षाबलों का मुखबिर’ होने की बात कही गई थी। इतना ही नहीं सरला के परिवार वालों पर भी जुल्म ढाए गए। उसके घर पर ग्रेनेड से हमला किया गया और कश्मीर से पलायन के लिए मजबूर किया गया। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि इस हत्या का उद्देश्य कश्मीरी पंडितों में भय पैदा करना था, ताकि उनका घाटी से पलायन तेज हो।

एसआईए ने 737 पन्नों की चार्जशीट विशेष अदालत में दाखिल की। इसमें यासीन मलिक सहित 5 लोगों को आरोपी बनाया गया। चार्जशीट में प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य, मेडिकल और फॉरेंसिक सामग्री तथा नई जाँच के आधार पर आरोप तय किए गए।

यासीन मलिक पर अब तक किन-किन मामलों में कार्रवाई हुई?

यासीन मलिक आतंकियों की फंडिंग का दोषी है। इस मामले में उसे उम्रकैद की सजा मिली है। NIA ने 2017 में यह मामला दर्ज किया था। उसने घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए हवाला के जरिए धन जुटाया। 2022 में यासीन मलिक ने अदालत में कई आरोप स्वीकार किए। दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।

उस पर आतंकवाद, आपराधिक साजिश और UAPA के तहत भी कई मामले दर्ज हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े आरोप है।

इन मामलों में भी उन्हें दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई।

जनवरी 1990 में श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के जवानों पर हुए हमले के मामले में भी यासीन मलिक का नाम आया था।

इस मामले में भी NIA ने कार्रवाई की है और मुकदमा न्यायिक प्रक्रिया में है।

1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के मामले में भी यासीन मलिक का नाम जाँच के दौरान आया। इस मामले में भी अदालत में मुकदमा चल रहा है और अंतिम फैसला नहीं आया है।

1990 के दशक में उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुई थीं। जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ दर्जनों आपराधिक और आतंकवाद संबंधी मामले अलग-अलग वक्त पर दर्ज हुए हैं। इनमें से कुछ में वह दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि कुछ अभी भी न्यायालय में लंबित हैं।

फिलहाल यासीन मलिक आतंकवाद फंडिंग मामले में तिहाड़ में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। NIA ने उनकी सजा बढ़ाकर मृत्युदंड किए जाने की भी अपील की है, जिस पर उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। सरला भट्ट हत्याकांड की नई चार्जशीट उनके खिलाफ एक अलग और महत्वपूर्ण कानूनी कार्रवाई है, जिसकी सुनवाई आगे होगी।

बंगाल : पाकिस्तानी औरत से निकाह कर कोलकाता का जफर रियाज बना ISI का जासूस, 20 साल तक भारत के इनपुट आतंकी मुल्क को बेचे: सरकार बदलने के बाद NIA ने दबोचा


जिस तरह बंगाल में सत्ता बदलने के बाद मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी काम कर रहे हैं उनसे दिल्ली की महिला मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखने की जरुरत है। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री "मामाजी" शिवराज सिंह के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत सरमा अपने काम के बलबूते पर मोदी के हाथ मजबूत कर मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। जिस तरह बंगाल में वामपंथी सरकारों से लेकर ममता बनर्जी के राज में हुए अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा हुआ, उसी तरह दिल्ली में भी शीला दीक्षित से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक जो अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीनों पर कब्जे हुए हैं लेकिन रेखा गुप्ता द्वारा मुख्यमंत्री बनने के इतने दिनों राज करने पर भी कोई कार्रवाही नज़र नहीं आ रही। यमुना नदी वही गन्दी।  

क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स का? कहाँ गए बांग्लादेशी, रोहिंग्या और पाकिस्तानी घुसपैठिये? चुनावों में बहुत शोर मचाया था। कुर्सी मिल गयी जाए जनता भाड़ में। लगभग हर मेट्रो और लाल बत्ती(चौक)पर रिक्शाओं और थ्री-व्हीलर का जमावड़ा। चावड़ी बाजार, लाल कुआँ, नई सड़क, जामा मस्जिद और अन्य क्षेत्रों में पटरियों पर कब्जे। जनता पटरी पर चलने की बजाए सड़क पर चलने को मजबूर। पुराने समय में निकले छज्जों के नीचे सरकारी जमीन पर कब्ज़ा कर दुकानों, ढाबे और होटलों में शामिल आदि आदि।   

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले जफर रियाज उर्फ रिजवी को गिरफ्तार किया है। वह कोलकाता का रहने वाला है और उसने पाकिस्तानी से निकाह किया है। फिलहाल जफर की बीवी और बच्चे पाकिस्तान में ही रहते हैं।

मंगलवार (20 मई 2026) देर रात NIA ने जानकारी दी कि जफर रियाज के खिलाफ पहले से ही लुक आउट सर्कुलर जारी था। साथ ही उसे अपराधी घोषित करने की प्रक्रिया भी चल रही थी। इसी दौरान एजेंसी ने उसे गिरफ्तार कर लिया। आरोपित पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) , आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत केस दर्ज किया गया है।

पाकिस्तानी एजेंसियों से कैसे बिठाए संपर्क?

जाँच एजेंसी के अनुसार जफर रियाज का निकाह एक पाकिस्तानी औरत से हुआ था और उसके बच्चे भी पाकिस्तान के नागरिक हैं। NIA की जाँच में सामने आया कि वह साल 2005 से लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच यात्रा करता रहा। इसी दौरान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के अधिकारियों ने उसे अपने संपर्क में लिया और जासूसी की ट्रेनिंग दी।

पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों ने जफर को पैसों का लालच दिया था। इसके अलावा उसे पाकिस्तान की नागरिकता दिलाने का भी वादा किया गया था। इसके बदले आरोपित भारत से जुड़ी संवेदनशील और गोपनीय सुरक्षा जानकारियाँ पाकिस्तान तक पहुँचाने का काम कर रहा था।

जासूसी के आरोप में पहले भी गिरफ्तार हो चुका जफर

NIA ने बताया कि जफर रियाज पहले भी जासूसी के एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। उस समय उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कार्रवाई हुई थी। इसके बावजूद वह लगातार पाकिस्तान के संपर्क में बना रहा।

NIA अब इस पूरे जासूसी नेटवर्क की गहराई से जाँच कर रही है। एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इस रैकेट में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और भारत-विरोधी साजिश कितनी बड़ी थी। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

बंगाल : दूसरे चरण के मतदान से पहले तृणमूल कांग्रेस(TMC) के कार्यकर्ता रफीकुल इस्लाम के घर मिला क्रूड बमों का जगीरा

                   NIA ने शुरू की TMC कार्यकर्ता के घर मिले बम मामले की जाँच (साभार: न्यूज18/एनडीटीवी)

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से दूसरे चरण से पहले पश्चिम बंगाल में 79 क्रूड बम बरामद होने के मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने केस दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। यह कदम केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर उठाया गया है।

कोलकाता पुलिस ने दक्षिण 24 परगना जिले के भांगड़ इलाके में रफीकुल इस्लाम के घर से ये बम और दूसरी आपत्तिजनक सामग्री बरामद की थी। बीजेपी ने आरोपित को तृणमूल कांग्रेस(TMC) का कार्यकर्ता बताया है। इन विस्फोटकों को इस तरह रखा गया था जिससे आम लोगों की जान और संपत्ति को सीधा खतरा था।

इससे पहले चुनाव आयोग ने रविवार (26 अप्रैल 2026) को पश्चिम बंगाल पुलिस को निर्देश दिया कि राज्य में बम बनाने की गतिविधियों में शामिल लोगों को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार किया जाए और ऐसी सभी सामग्री जब्त की जाए।

आयोग ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर, सभी डीसीपी, एसपी और थाना स्तर तक के अधिकारियों को कड़ा संदेश दिया है कि अगर उनके क्षेत्र में विस्फोटक बरामद हुए या धमकी की कोई घटना सामने आई तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। आयोग ने साफ कहा है कि संबंधित अधिकारियों को सीधे जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उन्हें ‘बख्शा नहीं जाएगा।’

सभी जिलों में विशेष अभियान पहले से शुरू हो चुका है। आयोग ने यह भी तय किया है कि बम बनाने से जुड़े सभी मामलों की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) करेगी ताकि चुनावी माहौल शांतिपूर्ण बना रहे। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के लिए चुनाव प्रचार सोमवार (27 अप्रैल 2026) को खत्म हो जाएगा। दूसरे चरण में 29 अप्रैल को 142 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होगा।

कांग्रेस ने जिन कर्नल पुरोहित को बनाया ‘भगवा आतंकवाद’ का शिकार, अब बनेंगे ब्रिगेडियर: सेना ने दी मंजूरी, सहना पड़ा था अत्याचार


करीब 17 साल तक चले मालेगाँव ब्लास्ट केस में बरी होने के बाद भारतीय सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को अब बड़ी राहत मिली है। उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए मंजूरी दे दी गई है।

यह फैसला उस लंबे दौर के बाद आया है। जब वह आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए जेल में रहे, कोर्ट में लड़ाई लड़ी और अपने करियर को लगभग ठहरता हुआ देखा।

जुलाई 2025 में NIA की विशेष अदालत ने उन्हें और अन्य आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। इस केस में पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत कुल सात लोग आरोपित थे, जिन्हें अदालत ने दोषमुक्त कर दिया।

कर्नल पुरोहित ने अपने करियर को हुए नुकसान को लेकर आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक चले मुकदमे और हिरासत के कारण उन्हें सेना में प्रमोशन के अवसर नहीं मिल पाए।

ट्रिब्यूनल ने उनकी बात को गंभीरता से लेते हुए उनके रिटायरमेंट पर रोक लगा दी थी। अब जब उन्हें प्रमोशन की मंजूरी मिल गई है।

क्या था मालेगाँव ब्लास्ट मामला

मालेगाँव ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुआ था। रमजान के दौरान एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर लगाए गए बम में विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और लगभग 95 लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद देशभर में हड़कंप मच गया था और जाँच एजेंसियों पर भारी दबाव था कि जल्द से जल्द आरोपित को पकड़ा जाए।

शुरुआत में इस मामले की जाँच महाराष्ट्र ATS ने की और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में साल 2011 में जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई। इस केस में श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी समेत कई लोगों को आरोपित बनाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि यह एक संगठित साजिश थी, लेकिन अदालत में यह आरोप टिक नहीं पाए।

कैसे अदालत में कमजोर पड़ा पूरा केस

जब यह मामला अदालत में पहुँचा और गवाहों व सबूतों की जाँच शुरू हुई, तो धीरे-धीरे अभियोजन पक्ष का केस कमजोर होता चला गया। NIA कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।

कर्नल पुरोहित पर आरोप था कि वे कश्मीर से RDX लेकर आए थे और उसका इस्तेमाल इस धमाके में किया गया, लेकिन कोर्ट में यह तक साबित नहीं हो पाया कि वे उस समय कश्मीर में तैनात थे। उनके घर से भी कोई विस्फोटक सामग्री नहीं मिली। फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी आरडीएक्स के कोई निशान नहीं पाए गए।

इसी तरह साजिश से जुड़ी कथित बैठकों, कॉल रिकॉर्ड या किसी भी ठोस प्लानिंग का कोई प्रमाण अदालत में पेश नहीं किया जा सका। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सबूतों के अभाव में सभी आरोपितों को बरी करना जरूरी है।

कोर्ट ने क्या कहा

NIA की विशेष अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जो इस पूरे मामले की दिशा और निष्कर्ष को समझने के लिए बेहद अहम हैं। अदालत ने साफ कहा कि “आतंकवाद एक गंभीर अपराध है और इसे किसी भी धर्म या विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य संदेह से परे दोष सिद्ध करने के मानक पर खरे नहीं उतरते। कोर्ट ने कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया। उदाहरण के तौर पर, विस्फोटक सामग्री की जब्ती और उसके परीक्षण की प्रक्रिया में स्पष्टता का अभाव था।

कथित कबूलनामों को लेकर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपित से दबाव या प्रताड़ना के तहत बयान लिया गया है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में असंगतियाँ और विरोधाभास भी अदालत के सामने स्पष्ट रूप से सामने आए।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि केवल एक नैरेटिव या थ्योरी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इसी आधार पर सभी आरोपितों को बरी किया गया।

कर्नल पुरोहित को क्या-क्या झेलना पड़ा

लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के लिए यह मामला सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत, पेशेवर और मानसिक स्तर पर एक लंबा संघर्ष था। उनकी गिरफ्तारी नवंबर 2008 में हुई थी और उन्हें करीब 9 साल तक जेल में रहना पड़ा।

इस दौरान उनके खिलाफ मीडिया ट्रायल भी चला, जिससे उनकी छवि को काफी नुकसान पहुँचा। उनके परिवार को भी सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

कर्नल पुरोहित ने बाद में आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उनसे जबरन कबूलनामे लेने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी कहा कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक ऑपरेशन के तहत कुछ संगठनों के संपर्क में थे, लेकिन उनकी इस भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।

उनकी सेवा के दौरान मिलने वाले प्रमोशन और अन्य लाभ भी इस केस के चलते रुक गए। यही कारण था कि बरी होने के बाद उन्होंने AFT का रुख किया और अपने करियर की बहाली की माँग की।

भगवा आतंकवाद नैरेटिव और कॉन्ग्रेस की साजिश

इस केस के दौरान ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द काफी चर्चा में आया। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी और इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार किया गया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के बयानों को लेकर भी काफी विवाद हुआ। बाद में खुद शिंदे ने माना कि आतंकवाद को किसी धर्म या रंग से जोड़ना सही नहीं था।

अदालत ने भी अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी भी थ्योरी को केवल नैतिक आधार पर नहीं बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर ही साबित किया जाना चाहिए।

कांग्रेस (UPA) की नेतृत्व वाली केंद्र की तत्कालीन UPA सरकार ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जानबूझकर फँसाया था, जबकि सरकार को जानकारी थी कि वह ड्यूटी पर थे और खुफिया जानकारी जुटा रहे थे। हाल ही में सामने आए खुफिया दस्तावेजों से इसका खुलासा हुआ है।

मालेगाँव विस्फोट मामले में 2008 में गिरफ्तार किए गए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को उस समय की सरकार और मीडिया ने ‘हिंदू आतंकवाद‘ की विचार को स्थापित करने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को देशद्रोही बताया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस द्वारा ‘नो इनपुट अवेलेबल’ शब्द का इस्तेमाल सत्य के रूप में किया गया था। बाद में डीजीएमआई ने अधिक इनपुट के लिए परिणामी कार्यालयों को लिखा, लेकिन सरकार ने कोई फॉलोअप कार्रवाई नहीं की।

पेज 2 पर 4 लाइनें बताती हैं कि पूरा कांग्रेस नेतृत्व कर्नल पुरोहित के बारे में झूठ बोल रहा था। सेना के पत्र की लाइन 1 में कथित तौर पर निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक सोर्स नेटवर्क का संचालन कर रहे थे, जिसके माध्यम से उन्होंने खुफिया जानकारी प्राप्त की थी’। यह उस बात के विपरीत है, जिसे हमें यह मानने के लिए प्रेरित किया गया था कि ‘कोई इनपुट नहीं’ था।

भारत के खिलाफ आतंकी साजिश रचने के आरोप में 6 यूक्रेनी और 1 अमेरिकी गिरफ्तार, यूरोप से ड्रोन मँगाकर म्यांमार भेज रहे

        यूरोप से ड्रोन मंगवाकर म्यांमार भेज रहे थे विदेशी, भारत में रची आतंकी साजिश (साभार : Moneycontrol)
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने के आरोप में 7 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। इनमें 6 यूक्रेन के और 1 अमेरिका का नागरिक शामिल है। इन आरोपितों को दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता एयरपोर्ट से पकड़ा गया है।

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी विधानसभा में पुष्टि की कि अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई विदेशी नागरिक मिजोरम के रास्ते म्यांमार जाकर उग्रवादियों को हथियारों की ट्रेनिंग दे रहे हैं। इनमें से कुछ के रूस-यूक्रेन युद्ध में शामिल होने की भी खबर है।

NIA के मुताबिक, ये लोग यूरोप से ड्रोन की बड़ी खेप मँगाकर भारत के रास्ते म्यांमार के विद्रोही समूहों को सप्लाई कर रहे थे, जो भारतीय उग्रवादियों की मदद करते हैं। जाँच में सामने आया है कि ये सभी आरोपित वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन अनिवार्य ‘प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट’ (RAP) के बिना मिजोरम पहुँच गए।

वहाँ से इन्होंने सीमा पार कर म्यांमार में भारत विरोधी जातीय समूहों से मुलाकात की। NIA ने कोर्ट को बताया कि ये आरोपित ड्रोन की सप्लाई के साथ-साथ आतंकी ट्रेनिंग और हथियारों के नेटवर्क में भी शामिल थे।

पटियाला हाउस कोर्ट ने साजिश की गहराई और फंडिंग के स्रोतों का पता लगाने के लिए आरोपितों की हिरासत 27 मार्च तक बढ़ा दी है। एजेंसी अब इनके मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया अकाउंट्स को खंगाल रही है ताकि भारत में छिपे इनके अन्य साथियों और विदेशी हैंडलर्स का पर्दाफाश किया जा सके।

पश्चिम बंगाल : लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी सैयद इरदीस को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी


राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

                                                     सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

                                                             सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।

शोभा यात्राओं पर पत्थरबाज़ी करने वाले Sleeper cells पर कार्यवाही की होती शायद दिल्ली ब्लास्ट नहीं होता : कश्मीर में NIA की तीन मुख्य आरोपियों के इलाके में ताबड़तोड़ बड़ी छापेमारी, मौलवी इरफान डॉक्टर अदील और डॉक्टर मुजम्मिल के घर हुई तलाशी

कहते हैं देर आए दुरुस्त आए, अगर 10 नवंबर को दिल्ली ब्लास्ट नहीं हुआ होता केंद्र सरकार से लेकर कौन-सी राज्य सरकार ने शोभा यात्राओं और मन्दिरों पर हो रही पत्थरबाज़ी और हमलों के समय ही सचेत हो गयी होती, ब्लास्ट टल सकता था। क्यों नहीं सरकारों ने पुलिस को इन उपद्रवियों या कहा जाए आतंकवादियों के Sleeper cells को गिरफ्तार कर सख्ती से कार्यवाही की गयी होती संभव है इन आतंकियों के सुराग मिल जाते। शोभा यात्राओं पर पत्थरबाज़ी और मन्दिरों पर होते हमलों से चिंगारियां छोड़कर सुरक्षा के पैमाने को मापा जा रहा था। सरकार से लेकर अदालतों को इस बात का संज्ञान लेना था कि घरों और मस्जिदों में क्या इतना पत्थर एकदम आया था? नहीं यह पहले से सुनियोचित षड़यंत्र था।   
दिल्ली में लाल किला ब्लास्ट को लेकर चल रही जाँच के बीच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने सोमवार (1 दिसंबर 2025) को दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में छापेमारी अभियान चलाया है। NIA की टीम ने कई जिलों में तलाशी अभियान चलाया है।

दिल्ली में हुए आतंकी धमाके के सिलसिले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कश्मीर घाटी के काजीगुंड समेत कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर छापेमारी की है। दिल्ली ब्लास्ट के आरोपी डॉ. अदील, डॉ. मुजफ्फर और आरोपी जसिफ उसी इलाके के हैं जहां रेड चल रही है। 

काजीगुंड में डॉ. अदील और जासिर बिलाल के घर, शोपियां में मौलवी इरफ़ान के घर, पुलवामा के कोइल में डॉ. मुझम्मिल के घर और सांबूरा, पुलवामा में आमिर रशीद के घर की तलाशी ली जा रही है। इन सभी स्थानों की पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस और SIA द्वारा भी तलाशी ली जा चुकी है, जो जैश के अंतरराज्यीय व्हाइट कॉलर कॉलर मॉड्यूल की साज़िश की जांच कर रही है। 

यह बड़ा एक्शन तब आया है जब हाल ही में एक अंतर्राज्यीय "व्हाइट-कॉलर" आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश हुआ था। इस मॉड्यूल से जुड़े लोगों के पास से, मुख्य रूप से हरियाणा के फरीदाबाद से, अमोनियम नाइट्रेट सहित लगभग 3,000 किलोग्राम विस्फोटक बरामद किया गया था। 

इससे पहले, दिल्ली में 10 नवंबर को हुए धमाके और "व्हाइट कॉलर" मॉड्यूल से जुड़े हथियारों की बरामदगी के मद्देनजर, पुलिस ने पिछले हफ्ते सोमवार को जम्मू और कश्मीर के पुलवामा और श्रीनगर जिलों में अस्पतालों के लॉकरों का औचक निरीक्षण किया था। NIA की यह ताजा कार्रवाई, घाटी में सक्रिय आतंकवादी तत्वों के नेटवर्क को ध्वस्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 

एनआईए लगातार कर रही है छापेमारी

दिल्ली ब्लास्ट से जुड़े आतंकी मॉड्यूल को तह तक उजागर करने में जुटी NIA अब जांच को कई राज्यों में विस्तार दे चुकी है शुरुआती सुरागों के आधार पर एजेंसी डॉक्टर शाहीन को फरीदाबाद लेकर गई, जहां उसके पुराने नेटवर्क, बैकअप सपोर्ट और संभावित सुरक्षित ठिकानों की गहराई से गहराई से पड़ताल की गई

जांच को आगे बढ़ाते हुए NIA ने लखनऊ, कानपुर, सहारनपुर, फरीदाबाद और जम्मू-कश्मीर को ‘कोर ज़ोन’ चिह्नित किया है इन इलाकों में हाई-इंटेंसिटी रेड, इंटेलिजेंस ऑपरेशन और स्थानीय स्तर पर नेटवर्क मैपिंग का काम जारी है 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शोपियाँ जिले के नदिगाम इलाके में NIA की टीम ने मौलवी इरफान, डॉक्टर अदील और डॉक्टर मुजम्मिल के आवास पर तलाशी ली। इस दौरान सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई थी। NIA की जाँच टीम ने घर के भीतर कई दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जाँच की।

शनिवार (29 नवंबर 2025) को ही कोर्ट ने इन तीनों को 10 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा है। ये सभी दिल्ली के लाल किले के पास हुए विस्फोट के बाद गिरफ्तार किए गए थे।

इसके साथ ही पुलवामा में भी एक साथ तलाशी अभियान चलाया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई दिल्ली में हुए ब्लास्ट मामले में संदिग्ध नेटवर्क और संभावित सहयोगियों की तलाश के लिए की जा रही है।

हालाँकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि छापेमारी के दौरान किसी को हिरासत में लिया गया है या नहीं। NIA की ओर से इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि दिल्ली लाल किला ब्लास्ट के बाद से एजेंसी देशभर में कई जगहों पर लगातार छापेमारी कर रही है और आतंकी नेटवर्क की संलिप्तता की जाँच कर रही है। 

दिल्ली लाल किला कार ब्लास्ट : चर्चा में ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’, सुरक्षा एजेंसियों को तोड़ना ही होगा ये मकड़जाल; देखिए वीडियो

कांग्रेस के कार्यकाल से जब White Collar जिहाद शुरू हुआ तब किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। उसका कारण था क्योकि तब की सरकारें मुस्लिम कट्टरपंथ के हाथों बिकी पड़ी थी, हैं तो आज भी है। ज़ाकिर नायक क्या अनपढ़ था? नहीं, इमाम जिसने इन डॉक्टरों को आतंकवाद की ओर धकेला क्या अनपढ़ था? कई बार इस ब्लॉग पर लिखा जा चुका है और सोशल मीडिया में भी चर्चा होती है कि जब तक आतंकवाद और दंगे में शामिल और इनको संरक्षण देने वालों-चाहे अदालतें क्यों न हो-को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाना चाहिए।
 
        
दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास 10 नवंबर 2025 की शाम हुआ विस्फोट केवल एक साधारण शरद संध्या को नहीं बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा की प्रकृति को भी झकझोर गया। जाँच एजेंसियों का कहना है कि यह कोई अकेला, अशिक्षित आतंकी द्वारा किया गया हमला नहीं था बल्कि एक व्यापक, गुप्त लॉजिस्टिक्स और तकनीकी मॉड्यूल का हिस्सा था, जिसमें उच्च शिक्षित, पेशेवर रूप से प्रशिक्षित लोग जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर और विश्वविद्यालय-शिक्षित ऑपरेटिव शामिल थे।
इन लोगों ने विस्फोटक सामग्री की खरीद, छिपाने और तकनीकी सहायता जैसे कार्यों को अंजाम दिया। सुरक्षा विश्लेषक अब इस प्रवृत्ति को ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’ कह रहे हैं, अर्थात शिक्षा और पेशेवर विश्वास का दुरुपयोग कर देश के भीतर ऐसी हिंसा को अंजाम देना, जिसे नकारा जा सके और जिसका प्रभाव घातक हो।

प्रारंभिक जाँच और फोरेंसिक निष्कर्ष

विस्फोट के कुछ ही दिनों बाद बहु-एजेंसी छापों और जाँचों का दायरा दिल्ली से बाहर तक फैल गया। अधिकारियों ने ऐसे नमूने बरामद किए, जिनमें प्रयुक्त विस्फोटक सामान्य अमोनियम नाइट्रेट से कहीं अधिक शक्तिशाली थे। प्रेस ब्रीफिंग्स और मीडिया रिपोर्टों में विभिन्न राज्यों से बड़ी मात्रा में बम बनाने की सामग्री और रसायनिक घटकों की बरामदगी का विवरण आया।
समेकित रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली-NCR, श्रीनगर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में हुए इन ऑपरेशनों से सैकड़ों किलो विस्फोटक जब्त किए गए। कुछ रिपोर्ट्स ने इस पूरी मात्रा को टन स्तर तक बताया। गिरफ्तार लोगों में कुछ डॉक्टर और शिक्षण संस्थानों से जुड़े व्यक्ति भी शामिल थे।

रणनीतिक संदर्भ: ऑपरेशन सिंदूर और प्रॉक्सी वॉर की दिशा

सुरक्षा विश्लेषक इस मॉड्यूल को सीधे तौर पर साल 2025 के मध्य में भारत की सीमा-पार की कार्रवाई, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जोड़कर देखते हैं। इस अभियान के तहत कई आतंकी ढाँचों को तबाह किया गया था। उसके बाद यह साफ दिखा कि प्रतिपक्ष ने अपनी रणनीति बदल ली है।
जब भारत की सीधी सैन्य कार्रवाइयाँ उसके लिए महँगी और कठिन साबित हुईं, तब उसने ‘डिनाएबल’ यानी नकारे जा सकने वाले स्थानीय प्रॉक्सी नेटवर्क सक्रिय कर दिए। दूसरे शब्दों में कहें तो जब बाहरी विकल्प सीमित हो जाते हैं, तो बाहरी सरगनाओं के लिए यह आसान हो जाता है कि वे भीतर के कम-संदिग्ध चेहरों को सक्रिय करें और हिंसा को अंदर से अंजाम दें।

शिक्षित पेशेवरों को क्यों बनाया जाता है हथियार?

लक्षित समूह के रूप में शिक्षित लोगों को चुनने के पीछे कठोर तर्क है। डॉक्टर, इंजीनियर और विश्वविद्यालय-प्रशिक्षित व्यक्ति समाज में भरोसेमंद माने जाते हैं। उनके पास तकनीकी दक्षता, गतिशीलता, सप्लाई-चेन तक पहुँच और सामाजिक विश्वसनीयता होती है। ये सभी गुण उन्हें कम संदिग्ध बनाते हैं जबकि आतंकी नेटवर्क के लिए उन्हें अधिक उपयोगी बना देते हैं।
इनकी पेशेवर पहचान उन्हें औद्योगिक रसायनों की वैध खरीद, परिवहन, भंडारण और विस्फोटक प्रणालियों की संरचना में सहायता देती है। कई मामलों में यह भी पाया गया है कि जो तथाकथित ‘प्रेरक’ या कट्टर मौलवी स्वयं तकनीकी रूप से अनपढ़ हैं, वे शिक्षित युवाओं को प्रभावित करने में सफल हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, शिक्षा और कट्टरता का यह संयोजन अत्यंत घातक रूप ले लेता है।

घरेलू चुनौती: वैध अवसरों का दुरुपयोग

भारत सरकार की छात्रवृत्तियाँ, लैपटॉप वितरण, उच्च शिक्षा का विस्तार और कौशल विकास योजनाएँ देश की ताकत हैं। लेकिन इन्हीं अवसरों का दुरुपयोग भी कट्टर तत्व अपने प्रचार और हिंसा के औजारों में बदल रहे हैं।
जाँच में सामने आया है कि कुछ मामलों में सरकारी योजनाओं से मिले संसाधनों जैसे उपकरण, डिजिटल एक्सेस या यात्रा की सुविधा को आतंकी कार्यों के लिए प्रयोग किया गया। नीति निर्धारकों के सामने यह दोहरी चुनौती है। एक ओर अवसरों को जारी रखना और दूसरी ओर संस्थागत सुरक्षा के ऐसे उपाय सुनिश्चित करना जो इन अवसरों के दुरुपयोग को रोक सकें।

देश कितनी बड़ी त्रासदी से बचा?

अधिकारियों की ब्रीफिंग और मीडिया रिपोर्टे्स इस बात पर जोर देती हैं कि इस मामले में रोकथाम और तबाही के बीच की दूरी बेहद कम थी। जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पकड़े गए विस्फोटक पदार्थों का नेटवर्क यदि सफलतापूर्वक सक्रिय होता तो यह देश के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों पर व्यापक हमलों की क्षमता रखता था।
जाँच में संकेत मिले हैं कि नियोजित लक्ष्य उच्च जनसंख्या घनत्व वाले और प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण स्थल थे। यदि खुफिया एजेंसियों ने समय रहते कार्रवाई न की होती तो परिणाम भयानक हो सकते थे। यह सफलता संयोग नहीं थी। यह लंबे समय तक की गई मानवीय खुफिया निगरानी, कई एजेंसियों के समन्वय और फोरेंसिक विश्लेषण का परिणाम थी।

मौन प्रहरी: इंटेलिजेंस ब्यूरो की निर्णायक भूमिका

इन घटनाओं के पीछे जो सबसे निर्णायक और अदृश्य शक्ति रही, वह भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) है। जो देश की सबसे पुरानी और गुप्त सुरक्षा एजेंसी है। इस पूरे अभियान में IB की मानव स्रोतों से मिली जानकारी, राज्यों के बीच समन्वय और विश्लेषणात्मक कड़ियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
IB के अधिकारी बिना किसी प्रशंसा या पुरस्कार की अपेक्षा के दिन-रात काम करते हैं। वे महीनों तक सूचनाओं को जोड़ते हैं, संपर्कों को विकसित करते हैं और गुप्त निगरानी से जमीनी हकीकत तक पहुँचते हैं। इन्हीं मौन रक्षकों के कारण कई बड़े हमले समय रहते विफल कर दिए जाते हैं। उनकी पेशेवर निष्ठा और मौन सेवा ही देश की वास्तविक ढाल है। यह ‘शांत सुरक्षा’ भारत की रक्षा का सबसे सशक्त स्तंभ है।

सामुदायिक जिम्मेदारी और शिक्षित वर्ग की भूमिका

यह प्रवृत्ति केवल सुरक्षा नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक चुनौती भी है। भारत के मुस्लिम इस राष्ट्र की आत्मा, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उनमें से विशाल बहुमत हिंसा को अस्वीकार करता है और देश की प्रगति में भागीदार बनना चाहता है। लेकिन जब कट्टर तत्व शिक्षित युवाओं को लक्ष्य बनाते हैं तो समाज और परिवारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों, प्रोफेशनल संस्थाओं और धार्मिक संगठनों को सतर्क निगरानी तंत्र और परामर्श प्रणाली विकसित करनी चाहिए। स्कॉलरशिप या डिजिटल कार्यक्रमों में नागरिक नैतिकता और डिजिटल सुरक्षा के तत्वों को शामिल करना आवश्यक है ताकि युवाओं को ब्रेनवॉश होने से बचाया जा सके। शिक्षित वर्ग को न केवल स्वयं सचेत रहना चाहिए बल्कि अपने ज्ञान और विवेक से दूसरों को भी जागरूक करना चाहिए।

नीति-स्तर पर दोहरी रणनीति

इस चुनौती से निपटने के लिए जवाब भी दो स्तरों पर होना चाहिए:
  • खुफिया नेटवर्क को और गहराई देना ताकि लॉजिस्टिक चैन जल्दी पकड़ी जा सके।
  • शैक्षणिक और कल्याणकारी योजनाओं में डिजिटल सुरक्षा और पारदर्शिता के नए मानक बनाना।
  • सामुदायिक स्तर पर ऐसे प्रयासों को बढ़ावा देना जो असहिष्णुता के बजाए संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करें।
  • और राष्ट्रीय विमर्श को इस दिशा में ले जाना कि अहिंसा, नागरिक उत्तरदायित्व और साझा समृद्धि ही असली राष्ट्र-धर्म हैं।
लालकिला क्षेत्र में हुआ विस्फोट और उससे जुड़े मॉड्यूल ने यह दिखा दिया है कि आधुनिक आतंकवाद अब शिक्षा, तकनीकी दक्षता और सामाजिक विश्वास का भी हथियार बना रहा है। इसका उत्तर भय या बहिष्कार नहीं है बल्कि दोहरी क्षमता में है। एक ओर मौन, पेशेवर खुफिया काम जो खतरे को जड़ से रोक सके और दूसरी ओर समाज की वह सजीव चेतना जो कट्टरता को अस्वीकार करे।
यदि हमारे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षित नागरिक राष्ट्रनिर्माण की दिशा में अपनी भूमिका निभाएँ और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी संस्थाएँ उसी निष्ठा से अपने कार्य करती रहें, तो ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’ जैसी विकृत प्रवृत्तियों को समाप्त किया जा सकता है। शांत खुफिया कौशल और जागरूक नागरिकता- यही भारत की सबसे मजबूत सुरक्षा की ढाल है।

10% मुस्लिमों के दम पर भारत को इस्लामी मुल्क बनाने की साजिश, RSS-PM मोदी का जिक्र: महबूब आलम की गिरफ्तारी से चर्चा में आए PFI के ‘इंडिया विजन 2047’ की कहानी

                                                  प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार - द हिंदू )
कांग्रेस ने अपने आपको सत्ता में बनाए रखने के हिन्दू-मुस्लिम को लड़वाने का हर सामान रखा हुआ था, लेकिन समय कालचक्र के घूमते हर सामान बेनकाब होता रहा है। मुस्लिम तुष्टिकरण करते हर हिन्दू धार्मिक स्थल को विवादित बनाना, कोट पर जनेऊ पहन सनातन धर्म को अपमानित करना, फिरोज जहांगीर के वंशज होते हुए हिन्दू चोला पहनकर घूमना और मुस्लिम कट्टरपंथियों को समर्थन भारत विरोधी विदेशियों की कठपुतली बन उनके इशारे पर काम करना 
आदि आदि।      

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने शनिवार (14 सितंबर 2025) को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के बिहार राज्य अध्यक्ष महबूब आलम उर्फ महबूब आलम नदवी को गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई 2022 के फुलवारीशरीफ़ आपराधिक साजिश मामले से जुड़ी हुई है।

महबूब आलम, जो बिहार के कटिहार जिले के हसनगंज इलाके के रहने वाले हैं, उनको किशनगंज से पकड़ा गया। वह इस मामले में गिरफ्तार और चार्जशीट किए गए कुल 26 आरोपितों में से 19वें व्यक्ति हैं। यह केस PFI की उन गतिविधियों से जुड़ा है, जिनका मकसद धार्मिक नफरत फैलाकर समाज में डर और आतंक का माहौल बनाना और देश विरोधी साजिशों को अंजाम देना था।

NIA के मुताबिक, यह मामला शांति और सौहार्द बिगाड़ने, लोगों में असंतोष फैलाने और देश के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने से जुड़ा है। यह मुकदमा सबसे पहले स्थानीय पुलिस ने 26 संदिग्धों के खिलाफ दर्ज किया था। एजेंसी ने बताया कि आरोपित अवैध और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल थे, जिनका लक्ष्य था, धार्मिक उन्माद भड़काना, समाज में अशांति फैलाना और हिंसा को हथियार बनाकर अपने मकसद पूरे करना।

जाँच एजेंसी ने खुलासा किया कि महबूब आलम और दूसरे आरोपित PFI के उस विजन डॉक्यूमेंट पर काम कर रहे थे, जिसे 11 जुलाई 2022 को फुलवारीशरीफ़ स्थित अहमद पैलेस से बरामद किया गया था। इसी दस्तावेज में संगठन की गुप्त योजना का जिक्र था।

NIA ने बताया कि महबूब आलम इस साजिश का हिस्सा था और उसने भर्ती, ट्रेनिंग, बैठकों और अन्य देशविरोधी गतिविधियों में भाग लिया। इतना ही नहीं, उसने फंड भी जुटाया और इसे अपने साथियों और PFI कार्यकर्ताओं तक पहुँचाया। एजेंसी ने कहा कि इस मामले की जाँच BNS और UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत जारी है।

जाँच में पता चला कि आलम और उसके साथी एक गुप्त विजन डॉक्यूमेंट पर काम कर रहे थे। इसका नाम इंडिया विजन 2047 था।

क्या है इंडिया विजन 2047

बिहार पुलिस ने जुलाई 2022 में आठ पन्नों का एक दस्तावेज जब्त किया था। जिस दस्तावेज का मकसद साफ था, वे 2047 तक भारत में इस्लामी शासन स्थापित करने की योजना बना रहे थे। इसमें कहा गया कि अगर कुल मुस्लिम आबादी का मात्र 10% भी उनका साथ दे दे तो वे बहुसंख्यक समुदाय को दबाकर अपना वर्चस्व कायम कर लेंगे।

डायरेक्ट रोडमैप में भर्ती और प्रशिक्षण पर जोर था। खासकर एक PE विंग बनाकर उन्हें तलवार, डंडे और अन्य हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि आक्रमक व रक्षात्मक दोनों काम कर सकें। साथ ही सरकारी विभागों, कोर्ट, पुलिस और सेना में विश्वासी मुसलमान घुसाने की रणनीति बताई गई थी। दस्तावेज ने विरोधियों को अलग-थलग करने और जरूरत पड़ी तो हटा देने तक की बात कही थी।

                                                                 PFI का डॉक्यूमेंट

रणनीति में मीडिया-आउटरीच, हर इलाके में PFI की मौजूदगी और संघ या परिवार के नेताओं के खिलाफ जानकारी इकट्ठा करने जैसे कदम भी बताए गए थे। आखिरी हिस्से में कहा गया कि सीधी लड़ाई की स्थिति में विदेशों, खासकर तुर्की जैसे मित्र इस्लामी देशों से मदद ली जाएगी।

इस दस्तावेज में लिखा था कि 2047 तक भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना है। इस दस्तावेज में पीएम मोदी पर हमले की साजिश का भी जिक्र था। दस्तावेज में साफ लिखा था कि सिर्फ 10% मुस्लिमों की मदद से भी ‘कायर हिंदुओं’ को दबाया जा सकता है।

योजना में विदेशी इस्लामी देशों, खासकर तुर्की से मदद लेकर भारत के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह खड़ा करने की बात थी। इसके बाद NIA ने 17 राज्यों में छापेमारी की। इसमें बम बनाने के मैनुअल, ट्रेनिंग मॉड्यूल, विजन 2047 डॉक्यूमेंट और एक सीडी जब्त की गई।

इन सबका मकसद था भारत में दहशत फैलाना और इस्लामी शासन थोपना। इन खुलासों के बाद सितंबर 2022 में केंद्र सरकार ने PFI और उसके सहयोगी संगठनों पर 5 साल का बैन लगा दिया।

सरकार ने साफ कहा कि ये सभी संगठन यूएपीए कानून के तहत अवैध गतिविधियों में शामिल हैं। बैन किए गए संगठनों में ऑल इंडिया इमाम्स काउंसिल, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI), रहाब इंडिया फाउंडेशन, NCHRO, नेशनल वीमेन फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन और रहाब फाउंडेशन, केरल भी शामिल हैं।

एक साध्वी को पोर्न दिखाने, अंडा खिलाने, निर्वस्त्र करने वाले पुरुष पुलिस वालों को दंड कब? रात भर पिटाई, रीढ़ की हड्डी तोड़ दी, 24 दिनों तक रखा भूखा… आज भी ‘कांग्रेस का टॉर्चर’ भोग रहीं प्रज्ञा सिंह ठाकुर

                   साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर (फाइल फोटो- facebook- sadhvi pragya singh thakur)
मालेगांव ब्लास्ट पर जुलाई 31 को आया निर्णय मामूली निर्णय नहीं। इन निर्णय ने कांग्रेस ही इसकी सारी समर्थक पार्टियों UPA से लेकर INDI गठबंधन सभी को बेनकाब कर दिया है। इतना ही नहीं, हिन्दू और मुसलमान सभी के लिए आंखे और दिमाग खोलने वाला है। किस तरह देश में हिन्दू-मुस्लिम फसाद बनाये रखा था। जो पार्टियां अपने धर्म की नहीं हो सकती किसी की नहीं हो सकती। हिन्दुओं कांग्रेस, वामपंथियों और INDI गठबंधन को वोट देने से पहले इन फसादी पार्टियों से पूछो कि क्या कसाब समेत जितने भी इस्लामिक आतंकवादियों को पकड़ जेलों में रखने पर उन्हें हलाल खिलाया था या झटका? जब उनके मजहब देखते हुए हलाल परोसा गया फिर एक साध्वी को अंडा खिलाकर क्यों साध्वी की सात्विकता को बर्बाद किया? किसके कहने पर ऐसा घिनौना अत्याचार किया गया था? जब साध्वी एक महिला थी फिर क्यों पुरुष पुलिस कर्मियों को उसे निर्वस्त्र करने को कहा गया? क्या देश में महिला पुलिसकर्मियों का अकाल पड़ गया था? 
समाचार है कि इस फैसले के खिलाफ कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट जाने का प्लान कर रहे हैं, हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट उपरोक्त प्रश्नों का भी जवाब इन हिन्दू विरोधियों, ATS और सरकार से पूछे। साध्वी प्रज्ञा कसूरवार थी या नहीं एक महिला थी। क्यों एक महिला वो भी एक साध्वी को पोर्न दिखाई?   

  

मालेगाँव ब्लास्ट 2008 मामले में NIA की विशेष अदालत ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत सभी 7 आरोपितों को बरी कर दिया है। 17 वर्षों बाद भले ही ‘भगवा आतंकवाद’ की कहानी झूठी साबित हो गई हो लेकिन आरोपित बनाई गईं साध्वी प्रज्ञा को मिली प्रताड़ना कांग्रेस के काले कारनामों का चिट्ठा दिखाती है।

कोर्ट के निर्णय आने के बाद साध्वी प्रज्ञा ने जज के सामने अपनी बात भी रखी। उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा ही कहा कि जिन्हें भी जाँच के लिए बुलाया जाता है, उसके पीछे कोई आधार होना चाहिए। मुझे बिना किसी आधार के जाँच के लिए बुलाया गया और गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया गया। मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो गया। मैं एक साधु का जीवन जी रही थी, पर मुझे फँसाकर झूठे आरोप लगाए गए। कोई भी हमारे साथ खड़ा होने को तैयार नहीं था।”

अपनी बात जारी रखते हुए साध्वी प्रज्ञा ने आगे कहा, “मैं जिंदा हूँ क्योंकि मैं एक संन्यासी हूँ। एक साजिश के तहत भगवा को बदनाम किया गया। आज भगवा की जीत हुई है, हिंदुत्व की जीत हुई है और ईश्वर उन आरोपितों के दंड देगा। हालाँकि, जिन्होंने भारत और भगवा को बदनाम किया, उन्हें अभी तक आपने गलत साबित नहीं किया है।”

गौरतलब है कि 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगाँव में भिक्खू चौक मस्जिद के पास धमाका हुआ। मोटरसाइकिल में बांधकर किए गए इस धमाके में 6 लोग मारे गए थे और 100 से भी अधिक लोग घायल हुए थे। इसके तहत साध्वी प्रज्ञा समेत 7 लोगों पर UAPA, आतंकवाद, आर्म्स एक्ट और IPC की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। 17 वर्षों तक इसे लेकर मुकदमा चला। 323 गवाह पेश किए गए। इनमें से 37 गवाह अपने बयान से मुकर गए। इसके अलावा बचाव पक्ष के भी 8 गवाह पेश हुए।

प्रताड़ना के 17 वर्ष

मध्य प्रदेश के भोपाल से भाजपा की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा को ब्लास्ट के बाद 23 अक्टूबर 2008 को ATS ने गिरफ्तार किया। साध्वी प्रज्ञा पर आरोप लगा कि विस्फोट में इस्तेमाल की गई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल के इंजन और चेसिस नंबर से पता चला कि वह बाइक साध्वी प्रज्ञा के नाम पर रजिस्टर्ड थी। हालाँकि रजिस्ट्रेशन नंबर फर्जी पाया गया था।

महाराष्ट्र ATS ने दावा किया था कि उस मोटरसाइकिल का इस्तेमाल विस्फोटक लगाने के लिए किया गया और इसी आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया। इस दौरान उन्हें इस कदर प्रताड़ित किया गया कि मेडिकल इमरजेंसी के तहत वह वेंटिलेटर तक पहुँच गईं।

अप्रैल 2011 में यह मामला राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया, जिसने ATS की जाँच में कई खामियाँ पाईं। NIA ने अपनी जाँच में ये भी कहा कि मोटरसाइकिल भले ही प्रज्ञा के नाम पर थी, लेकिन उसका इस्तेमाल रामचंद्र कलसांगरा नामक फरार आरोपित कर रहा था।

UAPA के तहत साध्वी पर की गई कार्रवाई भी दोषपूर्ण मानी गई। NIA ने जब जमानती वारंट जारी किया तब साध्वी प्रज्ञा ने साल 2020 में अपने साथ हुए अमानवीय व्यवहार को लेकर रिपब्लिक टीवी को एक साक्षात्कार दिया।

इसमें उन्होंने बताया था कि मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह के सामने 3-4 पुलिसकर्मियों ने उन्हें बहुत अधिक प्रताड़ना दी थी। उन्हें हिरासत में लेकर पूरी रात बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और उन्हें वेंटिलेटर पर जाना पड़ा था।

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने बताया कि हिरासत के दौरान उनको पुरुष कैदियों के साथ रखकर पॉर्न वीडियो दिखाया जाता था और साध्वी होने का लिहाज किए बिना उनसे भद्दे सवाल किए जाते थे। उन्होंने बताया था कि पहले उनको भगवा आतंकी कहा गया, फिर भारत को आतंकवादी देश घोषित करवाने का प्रयास किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये सारा षड्यंत्र कॉन्ग्रेस का था।

भूख, मार और बिजली के झटके

साध्वी प्रज्ञा ने बताया था कि उन्हें चमड़े की बेल्ट से पीटा जाता था। उन्हें 24 दिनों तक भूखा रखा गया था। उनको बिजली के झटके दिए जाते थे। गाली-गलौज तो उनके साथ आम बात हो गई थी। उनको लगातार पीटने के लिए 5-6 पुलिस वाले लगाए जाते थे और जब वह थक जाते थे तो दूसरे पुलिसकर्मी उनको पीटने लग जाते थे। इनके पैरे के तलवे तक में बेल्ट से पीटा गया। पिटाई के दौरान उनका पूरा नर्वस सिस्टम सुन्न पड़ जाता था।

साध्वी प्रज्ञा की यातनाएँ सिर्फ बेल्ट की मार तक ही सीमित नहीं रहीं थीं। उन्हें उल्टा लटकाकर मारा जाता था और हाथों को गर्म पानी में नमक डालकर डुबोया जाता था। हाथ फट जाते थे तो जख्मों पर नमक छिड़का जाता था।

उन्होंने बताया कि जेल में उन्हें इतनी गंदी-गंदी गालियां दी जाती थीं जिन्हें कोई स्त्री सुन भी नहीं सकती। उन्हें निर्वस्त्र किए जाने की बार-बार धमकी दी जाती थी। भोजन में उन्हें अंडा खाने के लिए मजबूर किया जाता था जबकि वे शाकाहारी हैं।

साध्वी प्रज्ञा को मिली प्रताड़नाओं से उनके पूरे शरीर में सूजन आ गई थी। कई हिस्सो में पस पड़ गया था। आज भी वह कई शारीरिक परेशानियों से जूझ रही हैं। उन्हें कैंसर और न्यूरो की बीमारी तक हो गई। अपनी प्रताड़ना के बारे में बताते हुए साध्वी प्रज्ञा कोर्ट में रो पड़ी थीं।

अवलोकन करें:-

आज जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत सभी आरोपितों के बरी किया गया तो साध्वी ने कहा कि षडयंत्र के तहत भगवा को बदनाम किया गया, आज हिंदुत्व की जीत हुई है।

कर्नल का पैर तोड़ा, नंगा कर प्राइवेट पार्ट पर मारा; भगवा आतंकी का लगा लें ठप्पा, बेगुनाही के बावजूद बन जाएँ मालेगाँव ब्लास्ट के गुनाहगार: कैसे कांग्रेस की सरकार में सेना के अधिकारियों पर ढाया गया जुल्म, पत्नी-बेटी के रेप की देते थे धमकी

कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित (बाएँ) और मेजर रमेश उपाध्याय (दाएँ) (साभार: Hindustan Times/Navbharat times)
कोर्ट से सच्चाई छिपाने का कांग्रेस का एक लम्बा इतिहास है। याद हो, सच्चाई जानने जब कोर्ट के आदेश पर अयोध्या में राममन्दिर परिसर में खुदाई हुई, इतने प्रमाण मिले सब छुपा लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में सबूत के तौर पर दिखाया सिर्फ एक खम्बा। ये तो तत्कालीन उत्तर प्रदेश पुरातत्व निदेशक के के मोहम्मद ने सेवानिर्वित होने के बाद स्पष्ट लिखा कि मन्दिर कभी का बन गया होता अगर कांग्रेस और वामपंथियों ने कोर्ट में झूठ नहीं बोला होता। खुदाई में मन्दिर होने के बहुत प्रमाण मिले जो कोर्ट में पेश नहीं किये गए। ठीक वही हिन्दू विरोधी नीति देश में हो रहे धमाकों में इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने निर्दोष और बेगुनाह हिन्दुओं चाहे वह साधु, संत, साध्वी या फौजी ही क्यों न हो, को पकड़ हिन्दू-भगवा आतंकवाद कहा जाता था।       

देशभक्ति और देश को आज़ादी दिलवाने की दुहाई देने वाली कांग्रेस और इसकी समर्थक पार्टियों ने इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने हमारे फौजियों को भी अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। आर्मी चीफ बिपिन रावत(स्व) को तो कांग्रेस के एक नेता ने "सड़क का गुंडा" तक बोल दिया था। 

मालेगांव धमाके को अंजाम देने वाले इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने बेगुनाह हिन्दुओं को जेल में डाल यूपीए सरकार में अपनी महत्वकांक्षा बनाये रखने के लिए तत्कालीन ATS हेमंत करकरे ने इन बेगुनाह साधु, साध्वी और फौजियों पर जुल्म करने हैवानियत की परिकाष्ठा तक को तार-तार कर दिया था। ये तो परमपिता परमेश्वर का इन पर आशीर्वाद था कि आज हमारे बीच है। अन्यथा इनकी राम नाम सत्य करने की करकरे ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उस प्राणी की तकलीफ का अनुमान लगाया जा सकता है जब उसके प्राइवेट पार्ट पर प्रहार किया जाए। 

तरस आता है उन हिन्दुओं पर जो कांग्रेस को समर्थन और वोट देते हैं। यूपीए समय में मुस्लिम तुष्टिकरण अपनी चरम पर था। हिन्दुओं को गुलाम बनाए जाने Communal Violence Bill बनाया गया। ये तो हिन्दुओं का भाग्य था कि 2014 चुनावों में यूपीए सत्ता से बाहर हो गयी। अगर दुर्भाग्य से 2014 में यूपीए सरकार वापस आ गयी होती हिन्दू त्राहिमाम कर रहा होता। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं यूपीए में शामिल जितनी भी पार्टियां है हिन्दू एकजुट होकर पूछे कि इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने क्यों "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" कहकर हिन्दुओं को अपमानित किया गया था?

 

कांग्रेस अपनी नीचता से अभी भी बाज नहीं आ रही। कल(31 जुलाई) को IndiaTV पर आज की बात में समाचार था कि कांग्रेस नेता पृथ्वी राज चौहान कह रहा है कि हिन्दू नहीं सनातन आतंकवाद कहना चाहिए।          

मालेगाँव बम धमाका मामले में गुरुवार (31 जुलाई, 2025) को साध्वी प्रज्ञा, कर्नल श्रीकांत पुरोहित और मेजर रमेश उपाध्याय समेत 7 लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया। कोर्ट को इन लोगों के खिलाफ मालेगाँव धमाके में कोई सबूत नहीं मिले। इसी के साथ पिछले 17 वर्षों से चली आ रही ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी का अंतिम संस्कार हो गया।

17 वर्षों तक इन हिन्दुओं को केवल इसलिए प्रताड़ित किया जाता रहा ताकि कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति चमक सके। कांग्रेस की इस तुष्टिकरण की राजनीति का शिकार भारतीय सेना के दो अफसर भी हुए। उनके परिवारों तक को नहीं छोड़ा गया, उनके सैन्य करियर बर्बाद कर दिए गए, देश की दशकों तक सेवा के बावजूद उन्हें जनता में शर्मिंदगी झेलनी पड़ी और वामपंथी मीडिया ने उनका वर्षों तक पीछा किया।

कर्नल का पैर तोड़ा, नंगा कर प्राइवेट पार्ट पर मारा

भारतीय सेना में देश की सेवा करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को कांग्रेस  सरकार ने आतंकवादी साबित करने की कोशिश की। उन्हें मालेगाँव ब्लास्ट 2008 की जिम्मेदारी लेने के लिए यातनाएँ दी गईं थी। कर्नल से सेना की खुफिया जानकारी जुटाने की कोशिश की गई। कर्नल के साथ पाकिस्तान पहुँचे विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान से भी बुरा बर्ताव किया गया।

यहाँ तक कि कर्नल का पैर तोड़ा गया, नंगा कर प्राइवेट पार्ट पर मारा गया, बाल पकड़कर खींचे जाता था। उन्हें वर्षों तक जेल में रखा। इस दौरान उन्हें सेना की नौकरी से भी हाथ धोना पड़ गया। महाराष्ट्र ATS गवाहों को भी बंदूक की नोक पर बयान दिलवाती थी। कोर्ट को कर्नल पुरोहित ने बताया था कि यह सब तत्कालीन UPA सरकार और राज्य की कांग्रेस NCP सरकार के इशारे पर किया गया था।

कोर्ट के सामने कर्नल पुरोहित ने बयान दिया था कि कांग्रेस सरकार ने तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों को फँसाने की साजिश की थी। कर्नल से भी मामले में उनका नाम लेने का दबाव डाला गया था। कर्नल के परिवार को भी फँसाने की धमकी दी गई थी।

अवलोकन करें:-

क्या कांग्रेस के DNA में ही हिन्दू जहर है? कांग्रेस ने जहर उगलना नहीं किया बंद: कांग्रेस MP रेणुका च
क्या कांग्रेस के DNA में ही हिन्दू जहर है? कांग्रेस ने जहर उगलना नहीं किया बंद: कांग्रेस MP रेणुका च
 

मेजर की बेटी से रेप और पत्नी को नंगा करने की दी गई थी धमकी

मेजर रमेश उपाध्याय के सेनानी थे। उन्हें भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मालेगाँव बम धमाका मामले में फँसाया गया था। कांग्रेस सरकार के इशारे पर ATS उन्हें प्रताड़ित करती थी। यहाँ तक कि उनकी पत्नी को नंगा घुमाने और बेटी के रेप तक की धमकी दी गई। मेजर उपाध्याय को भी बम धमाके की जिम्मेदारी लेने के लिए मानसिक और शारीरिक शोषण किया गया था।
ATS ने मेजर उपाध्याय को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। मेजर पर MCOCA लगाने की धमकी देकर आतंकवादी करार दिया गया, उनके किराए के घर को भी खाली करवाया गया। मेजर का परिवार सड़क पर आ गया था। मेजर के शादीशुदा बेटियों के घर पर भी ATS ने छापा मारा। मेजर का पॉलीग्राफ और नारको टेस्ट भी करवाया गया और क्लीन चिट मिलने के बाद कोर्ट के सामने पेश नहीं की।