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BBC ने कहा- ‘मेट्रो खाली’, हकीकत में रिकॉर्ड सवारी और बढ़ता नेटवर्क: अधूरे डेटा से गढ़े गए प्रोपेगेंडा का असली विश्लेषण

                                                                                                                   साभार : Aajtak & BBC
बीबीसी (BBC) ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था, “भारत ने मेट्रो पर अरबों खर्च कर दिए, लेकिन यात्री कहाँ हैं?” इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे भारत की मेट्रो परियोजनाएँ सही तरीके से काम नहीं कर रहीं और लोग उनका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे। लेकिन असल तस्वीर इससे अलग है। हकीकत यह है कि BBC ने दिल्ली मेट्रो जैसे बड़े और सफल मॉडल को ‘अपवाद’ कहकर किनारे कर दिया और नई मेट्रो लाइनों के शुरुआती कम उपयोग वाले डेटा को ही पूरी कहानी मान लिया। यह तरीका पूरा सच नहीं दिखाता।

सच्चाई यह है कि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट- जैसे मेट्रो, हाईवे या एयरपोर्ट को पूरी तरह चलने और लोगों की आदत में आने में समय लगता है। शुरुआत में लोग धीरे-धीरे जुड़ते हैं, नेटवर्क बढ़ता है और फिर उपयोग तेजी से बढ़ जाता है। 2025–26 के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में मेट्रो का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली मेट्रो करोड़ों यात्रियों को रोज सफर करा रही है और मुंबई मेट्रो की नई लाइनों पर भी यात्रियों की संख्या हर महीने बढ़ रही है।

दिल्ली मेट्रो से सीख: सिस्टम धीरे-धीरे मजबूत होता है

BBC का मुख्य तर्क है कि कई शहरों में मेट्रो में उम्मीद से कम यात्री सफर कर रहे हैं। लेकिन इस विश्लेषण में वह दिल्ली मेट्रो के पूरे सफर को नजरअंदाज कर देता है। जब दिल्ली मेट्रो शुरू हुई थी, तब भी इसे लेकर सवाल उठे थे। कई लोगों ने कहा था कि यह महँगा है और ज्यादा काम नहीं आएगा। शुरुआती समय में लोगों को मेट्रो स्टेशन तक पहुँचने में दिक्कत होती थी, क्योंकि फीडर बसें और ई-रिक्शा जैसी सुविधाएँ पूरी तरह विकसित नहीं थीं।

धीरे-धीरे हालात बदले। जैसे-जैसे नेटवर्क बढ़ा, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी मजबूत हुई और लोगों की निर्भरता बढ़ती गई। आज दिल्ली मेट्रो देश ही नहीं, दुनिया के सबसे सफल पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स में गिनी जाती है। साल 2025 में इसमें औसतन 64.6 लाख लोग रोज यात्रा कर रहे हैं और साल भर में यह 235 करोड़ से ज्यादा यात्राएँ पूरी करती है। यह आँकड़ा एक बड़े देश जैसे न्यूजीलैंड की पूरी आबादी से भी ज्यादा है।

अब दिल्ली मेट्रो कमाई के मामले में भी मजबूत स्थिति में है। 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, यह ₹412 करोड़ से ज्यादा का ऑपरेटिंग सरप्लस कमा रही है। इसका मतलब है कि मेट्रो सिर्फ चल ही नहीं रही, बल्कि अपने खर्च निकालकर मुनाफा भी दे रही है। यह साफ दिखाता है कि कोई भी मेट्रो सिस्टम शुरुआत में धीमा हो सकता है, लेकिन समय के साथ वह मजबूत, उपयोगी और आत्मनिर्भर बन जाता है।

मुंबई एक्वा लाइन की सच्चाई: ‘सुनसान’ नहीं, तेजी से बढ़ता इस्तेमाल

BBC ने मुंबई की नई एक्वा लाइन (मेट्रो-3) को ‘सुनसान’ बताने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। यह लाइन पूरी तरह अक्टूबर 2025 में शुरू हुई और अप्रैल 2026 तक इस पर 4 करोड़ से ज्यादा यात्री सफर कर चुके हैं। किसी भी नई मेट्रो लाइन के लिए इतने कम समय में यह बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

मुंबई की सभी मेट्रो लाइनों को मिलाकर अब रोज करीब 7.5 लाख लोग सफर कर रहे हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे लोग नई लाइन के बारे में जान रहे हैं और कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है, यात्रियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।

जहाँ तक किराए की बात है, 10 से 70 रुपए का खर्च मुंबई जैसे शहर में ज्यादा नहीं माना जाता। यहाँ लोग रोज ट्रैफिक में घंटों फँसते हैं। ऐसे में मेट्रो समय बचाती है और सफर आसान बनाती है। सरकार का काम सिर्फ आज की भीड़ संभालना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत ट्रांसपोर्ट तैयार करना भी है, ताकि सड़कों पर दबाव कम हो सके।

मेट्रो का बड़ा फायदा: सफर ही नहीं, जेब भी बचा रही है

मेट्रो का असर सिर्फ यात्रा तक सीमित नहीं है, यह लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधार रही है। जनवरी 2026 की ‘EAC-PM’ रिपोर्ट बताती है कि मेट्रो आने से लोगों का रोज का ट्रांसपोर्ट खर्च कम हुआ है। पेट्रोल, डीजल और टैक्सी पर होने वाला खर्च बच रहा है, जिससे लोगों के पास हर महीने कुछ अतिरिक्त पैसे बच रहे हैं।

इस बचत का सीधा फायदा घर के लोन (होम लोन) चुकाने में दिख रहा है। दिल्ली में मेट्रो वाले इलाकों में लोन न चुका पाने वाले लोगों की संख्या 4.42% कम हुई है। बेंगलुरु में EMI लेट करने वालों की संख्या 2.4% घटी है, जबकि हैदराबाद में समय से पहले लोन चुकाने वालों की संख्या 1.8% बढ़ी है।

सीधी भाषा में समझें तो मेट्रो लोगों की जेब में बचत डाल रही है। इससे उनका आर्थिक बोझ कम हो रहा है और जीवन आसान बन रहा है। लेकिन ऐसे बड़े फायदे अक्सर BBC जैसी कुछ रिपोर्ट्स में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

क्या मेट्रो घाटे में है?

अक्सर कहा जाता है कि मेट्रो प्रोजेक्ट घाटे का सौदा हैं। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। शुरुआत में हर मेट्रो सिस्टम ‘नेट लॉस’ दिखाता है, क्योंकि उस पर बड़े लोन और निर्माण का खर्च होता है। इसे ही डेप्रिसिएशन कहा जाता है। इसलिए सिर्फ कुल घाटा देखकर फैसला करना सही नहीं होता।

असल पैमाना होता है ‘ऑपरेटिंग सरप्लस’। यानी रोजमर्रा का खर्च निकालने के बाद क्या मेट्रो के पास पैसा बच रहा है या नहीं। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो ने 2024-25 में 1,191 करोड़ रुपए कमाए और 229 करोड़ रुपए का ऑपरेटिंग सरप्लस हासिल किया। इसका मतलब है कि मेट्रो अपना खर्च निकालकर बचत भी कर रही है।

अहमदाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में भी यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साफ है कि यह पैसा बर्बाद नहीं हुआ, बल्कि शहरों के लिए लंबी अवधि का मजबूत ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैयार हुआ है। इससे प्रदूषण कम हो रहा है और पर्यावरण को भी फायदा मिल रहा है।

BBC की रिपोर्ट पर सवाल: क्या पूरी तस्वीर दिखाई गई?

बीबीसी की रिपोर्ट को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसमें पूरी तस्वीर नहीं दिखाई गई। कुछ चुनिंदा आँकड़ों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष दिया गया, जैसे मेट्रो प्रोजेक्ट सही दिशा में नहीं हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे अलग है।

आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बन चुका है, जो 1,000 किलोमीटर से ज्यादा फैल चुका है। यह अपने आप में दिखाता है कि यह सिस्टम लगातार बढ़ रहा है और शहरों की जरूरत बनता जा रहा है। मेट्रो ने लोगों को लंबे ट्रैफिक जाम से राहत दी है और सफर को ज्यादा आसान और आरामदायक बनाया है।

लास्ट-माइल कनेक्टिविटी और फीडर बसों की दिक्कतें अभी भी कई शहरों में हैं, लेकिन इन पर तेजी से काम हो रहा है। दिल्ली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहाँ समय के साथ मेट्रो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।

साफ है कि भारत में मेट्रो सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि शहरी बदलाव का बड़ा जरिया बन रही है। यह धीरे-धीरे हर शहर की जरूरत और आदत बनती जा रही है, और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

‘See my Banana’: प्राइवेट पार्ट की फोटो भेज हिंदू लड़की से बोला अशरफ सिद्दीकी, जिहादी का सपा कनेक्शन आया सामने

                              आरोपित अशरफ सिद्दीकी का निकला सपा कनेक्शन  (साभार : Organiser)
मुंबई के एग्रीपाड़ा इलाके में एक 19 साल की हिंदू लड़की को उसके पूर्व मुस्लिम सहकर्मी ने अश्लील मैसेज, वीडियो और गंदी बातों से मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया। जानकारी के मुताबिक, पुलिस ने इस मामले में आरोपित अशरफ सिद्दीकी को गिरफ्तार कर लिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि आरोपित समाजवादी पार्टी की पार्षद इरम सिद्दीकी का भतीजा है।

व्हाट्सएप ग्रुप से नंबर चोरी कर शुरू की गंदी बातें

पीड़िता महालक्ष्मी स्थित पिरामल कंस्ट्रक्शन में टेलीकॉलर का काम करती थी। नौकरी छोड़ने के बाद, आरोपित अशरफ सिद्दीकी ने कंपनी के व्हाट्सएप ग्रुप से उसका नंबर निकाल लिया। 21 अप्रैल 2026 को उसने मैसेज कर अपनी पहचान ‘अशरफ पिरामल वाला’ के तौर पर दी।

शुरुआत में उसने लड़की को ‘क्यूट’ बताया, लेकिन जल्द ही वह अपनी औकात पर आ गया। उसने करीब एक घंटे तक लड़की से व्हाट्सएप कॉल पर बात की और बेहद गंदी माँगें रखीं। पीड़िता ने पड़ोसी के फोन से कॉल रिकॉर्ड कर ली, जिसमें अशरफ उसे ‘लव फ्रेंडशिप’ करने, लॉज चलने और शारीरिक संबंध (Sex) बनाने के लिए मजबूर कर रहा था। उसने फोन पर ओरल सेक्स जैसी घिनौनी बातें भी कीं।

प्राइवेट पार्ट की फोटो भेजी और कहा- ‘See my banana’

अगले दिन यानी 22 अप्रैल को अशरफ की बदतमीजी और बढ़ गई। उसने पीड़िता को अन्य लड़कियों की तस्वीरें भेजीं और दावा किया कि उसने उन सबके साथ संबंध बनाए हैं। हद तो तब हो गई जब उसने अपने प्राइवेट पार्ट की फोटो लड़की को भेजी और मैसेज में लिखा, “See my banana”।
इसके बाद उसने पीड़िता को कई अश्लील वीडियो भेजे और बेहद भद्दे मैसेज किए जैसे, “Show me your ass”। इन हरकतों से पीड़िता बुरी तरह डर गई और उसने अपने पिता को सब बताया।

‘हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़के पसंद हैं’

FIR में यह भी दर्ज है कि जब पीड़िता ने अपने धर्म का हवाला दिया, तो अशरफ ने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा, “आजकल हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़के पसंद आते हैं।” उसने लड़की को फँसाने के लिए यह भी कहा कि अगर वे शादी करते हैं, तो वह उसे धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं करेगा।

पीड़िता के पिता का आरोप है कि आरोपित ने कंपनी के डेटा का गलत इस्तेमाल कर कई हिंदू लड़कियों के नंबर निकाले थे। जब पीड़िता ने अपनी अन्य सहेलियों से बात की, तो पता चला कि अशरफ उन्हें भी ऐसे ही अश्लील मैसेज भेज चुका था, जिसके बाद उन्होंने उसे ब्लॉक कर दिया था।

पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक कनेक्शन

एग्रीपाड़ा पुलिस ने 23 अप्रैल 2026 को मामले की गंभीरता को देखते हुए FIR (नंबर 187/2026) दर्ज की। आरोपित पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75, 78(2), 79 और आईटी एक्ट की धारा 67(A) के तहत मामला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया है।

आरोपित के परिवार से जुड़े साजिद सिद्दीकी ने कहा है कि पुलिस को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। फिलहाल पुलिस कॉल रिकॉर्डिंग और चैट की जाँच कर रही है ताकि आरोपित को सख्त से सख्त सजा दिलाई जा सके।

कांग्रेस ने जिन कर्नल पुरोहित को बनाया ‘भगवा आतंकवाद’ का शिकार, अब बनेंगे ब्रिगेडियर: सेना ने दी मंजूरी, सहना पड़ा था अत्याचार


करीब 17 साल तक चले मालेगाँव ब्लास्ट केस में बरी होने के बाद भारतीय सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को अब बड़ी राहत मिली है। उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए मंजूरी दे दी गई है।

यह फैसला उस लंबे दौर के बाद आया है। जब वह आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए जेल में रहे, कोर्ट में लड़ाई लड़ी और अपने करियर को लगभग ठहरता हुआ देखा।

जुलाई 2025 में NIA की विशेष अदालत ने उन्हें और अन्य आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। इस केस में पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत कुल सात लोग आरोपित थे, जिन्हें अदालत ने दोषमुक्त कर दिया।

कर्नल पुरोहित ने अपने करियर को हुए नुकसान को लेकर आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक चले मुकदमे और हिरासत के कारण उन्हें सेना में प्रमोशन के अवसर नहीं मिल पाए।

ट्रिब्यूनल ने उनकी बात को गंभीरता से लेते हुए उनके रिटायरमेंट पर रोक लगा दी थी। अब जब उन्हें प्रमोशन की मंजूरी मिल गई है।

क्या था मालेगाँव ब्लास्ट मामला

मालेगाँव ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुआ था। रमजान के दौरान एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर लगाए गए बम में विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और लगभग 95 लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद देशभर में हड़कंप मच गया था और जाँच एजेंसियों पर भारी दबाव था कि जल्द से जल्द आरोपित को पकड़ा जाए।

शुरुआत में इस मामले की जाँच महाराष्ट्र ATS ने की और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में साल 2011 में जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई। इस केस में श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी समेत कई लोगों को आरोपित बनाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि यह एक संगठित साजिश थी, लेकिन अदालत में यह आरोप टिक नहीं पाए।

कैसे अदालत में कमजोर पड़ा पूरा केस

जब यह मामला अदालत में पहुँचा और गवाहों व सबूतों की जाँच शुरू हुई, तो धीरे-धीरे अभियोजन पक्ष का केस कमजोर होता चला गया। NIA कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।

कर्नल पुरोहित पर आरोप था कि वे कश्मीर से RDX लेकर आए थे और उसका इस्तेमाल इस धमाके में किया गया, लेकिन कोर्ट में यह तक साबित नहीं हो पाया कि वे उस समय कश्मीर में तैनात थे। उनके घर से भी कोई विस्फोटक सामग्री नहीं मिली। फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी आरडीएक्स के कोई निशान नहीं पाए गए।

इसी तरह साजिश से जुड़ी कथित बैठकों, कॉल रिकॉर्ड या किसी भी ठोस प्लानिंग का कोई प्रमाण अदालत में पेश नहीं किया जा सका। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सबूतों के अभाव में सभी आरोपितों को बरी करना जरूरी है।

कोर्ट ने क्या कहा

NIA की विशेष अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जो इस पूरे मामले की दिशा और निष्कर्ष को समझने के लिए बेहद अहम हैं। अदालत ने साफ कहा कि “आतंकवाद एक गंभीर अपराध है और इसे किसी भी धर्म या विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य संदेह से परे दोष सिद्ध करने के मानक पर खरे नहीं उतरते। कोर्ट ने कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया। उदाहरण के तौर पर, विस्फोटक सामग्री की जब्ती और उसके परीक्षण की प्रक्रिया में स्पष्टता का अभाव था।

कथित कबूलनामों को लेकर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपित से दबाव या प्रताड़ना के तहत बयान लिया गया है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में असंगतियाँ और विरोधाभास भी अदालत के सामने स्पष्ट रूप से सामने आए।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि केवल एक नैरेटिव या थ्योरी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इसी आधार पर सभी आरोपितों को बरी किया गया।

कर्नल पुरोहित को क्या-क्या झेलना पड़ा

लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के लिए यह मामला सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत, पेशेवर और मानसिक स्तर पर एक लंबा संघर्ष था। उनकी गिरफ्तारी नवंबर 2008 में हुई थी और उन्हें करीब 9 साल तक जेल में रहना पड़ा।

इस दौरान उनके खिलाफ मीडिया ट्रायल भी चला, जिससे उनकी छवि को काफी नुकसान पहुँचा। उनके परिवार को भी सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

कर्नल पुरोहित ने बाद में आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उनसे जबरन कबूलनामे लेने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी कहा कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक ऑपरेशन के तहत कुछ संगठनों के संपर्क में थे, लेकिन उनकी इस भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।

उनकी सेवा के दौरान मिलने वाले प्रमोशन और अन्य लाभ भी इस केस के चलते रुक गए। यही कारण था कि बरी होने के बाद उन्होंने AFT का रुख किया और अपने करियर की बहाली की माँग की।

भगवा आतंकवाद नैरेटिव और कॉन्ग्रेस की साजिश

इस केस के दौरान ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द काफी चर्चा में आया। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी और इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार किया गया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के बयानों को लेकर भी काफी विवाद हुआ। बाद में खुद शिंदे ने माना कि आतंकवाद को किसी धर्म या रंग से जोड़ना सही नहीं था।

अदालत ने भी अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी भी थ्योरी को केवल नैतिक आधार पर नहीं बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर ही साबित किया जाना चाहिए।

कांग्रेस (UPA) की नेतृत्व वाली केंद्र की तत्कालीन UPA सरकार ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जानबूझकर फँसाया था, जबकि सरकार को जानकारी थी कि वह ड्यूटी पर थे और खुफिया जानकारी जुटा रहे थे। हाल ही में सामने आए खुफिया दस्तावेजों से इसका खुलासा हुआ है।

मालेगाँव विस्फोट मामले में 2008 में गिरफ्तार किए गए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को उस समय की सरकार और मीडिया ने ‘हिंदू आतंकवाद‘ की विचार को स्थापित करने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को देशद्रोही बताया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस द्वारा ‘नो इनपुट अवेलेबल’ शब्द का इस्तेमाल सत्य के रूप में किया गया था। बाद में डीजीएमआई ने अधिक इनपुट के लिए परिणामी कार्यालयों को लिखा, लेकिन सरकार ने कोई फॉलोअप कार्रवाई नहीं की।

पेज 2 पर 4 लाइनें बताती हैं कि पूरा कांग्रेस नेतृत्व कर्नल पुरोहित के बारे में झूठ बोल रहा था। सेना के पत्र की लाइन 1 में कथित तौर पर निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक सोर्स नेटवर्क का संचालन कर रहे थे, जिसके माध्यम से उन्होंने खुफिया जानकारी प्राप्त की थी’। यह उस बात के विपरीत है, जिसे हमें यह मानने के लिए प्रेरित किया गया था कि ‘कोई इनपुट नहीं’ था।

PETA का Bombay High Court के फैसले के खिलाफ अभियान, ‘मुंबईकर’ को पहनाया कबूतर का मुखौटा: क्या कबूतर सेहत के लिए नुकसानदेह है?

              मुंबई में कबूतर को दाना डालने पर रोक के खिलाफ PETA का अभियान (साभार: PETA/TOI)
बुजुर्गों का कहना था कि "पक्षियों(कबूतर, चिड़िया और कौए) को दाना देने से दानी न दिखने वाले कष्टों से बचता है। लेकिन आज सनातन विरोधी इन्हे ही दाना देने के खिलाफ अदालत जा रहे हैं और अदालतें तो बैठी है इसी इंतज़ार में। इतना ही नहीं, जब कोई मरीज को अपनी अंतिम साँस लेने में दिक्कत हो रही होती है, उस स्थिति में उस मरीज के हाथों से रूपए छुआ कर कबूतरों को दाना या गाय को चारा खिलाया जाता है। जब कबूतर ही नहीं होगा किसको दान किया जाएगा। इस धरती पर कबूतर वो पक्षी है जो दाना नहीं मिलने पर मिट्टी या कंकड़ खा कर पेट भर लेता लेकिन कभी कीड़े मकोड़े नहीं खाएगा। क्योकि इस धरती पर समुद्र के दूसरा शुद्ध ब्राह्मण कबूतर ही है।         

कारों से लेकर घरों और दफ्तरों में लगे वातानुकूलित(AC) से निकलने की वजह से चिड़ियों का आभाव हो गया है।  

कबूतरों को दाना देने की परंपरा को बचाने के लिए पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) ने हाल ही में एक अभियान शुरू किया। खासतौर पर यह अभियान मुंबई में कबूतरों को दाना देने पर लगाए गए बैन को देखते हुए लॉन्च किया गया। अब इस अभियान के खिलाफ सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है।

दरअसल, पेटा इंडिया ने अभियान से जुड़ा एक वीडियो जारी किया, जिसमें मुंबई के लोग कबूतरों के मुखौटे पहनकर संदेश दे रहे हैं कि कबूतरों को भी प्यार और देखभाल की जरूरत है। इस वीडियो में यह भी दिखाया गया है कि कबूतरों को खाना देने पर बैन लगाने से ये पक्षी भूख से मर सकते हैं।

पेटा इंडिया ने वीडियो जारी कर लिखा, कबूतरों के बिना मुंबई का आसमान पहले जैसा नहीं रहा। फीडिंग पर लगे बैन के बाद ये कोमल पक्षी भुखमरी का सामना कर रहे हैं। सभी मुंबईवासियों ने ‘कबूतर’ बनकर सबको याद दिलाया कि कबूतर भी यहीं के हैं।

सोशल मीडिया पर पेटा के कबूतर अभियान का विरोध

सोशल मीडिया पर पेटा के इस अभियान की आलोचना शुरू हो गई। लोगों ने कबूतरों को इंसान के लिए खतरा बताया और कहा कि इससे कई बीमारियाँ होती है। इसके साथ पेटा को भारत-विरोधी भी बताया गया क्योंकि ये दिखावे का एक्टिविजम करता है। पेटा पर आर्टिकल 21 के तहत केस करने की भी माँग उठी।

ओपन लेटर नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “एक 400 ग्राम का कबूतर अपने जीवनकाल में लगभग 11 किलोग्राम बीट छोड़ता है। ये बीट सूखकर धूल में बदल जाती है और हवा में मिल जाती है। जब हम उस हवा में साँस लेते हैं तो धूल हमारे फेफड़ों तक पहुँच सकती है और निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसे संक्रमण पैदा कर सकती है।”

उन्होंने आगे बताया, “सिंगापुर में कबूतरों को खाना खिलाने पर आपको 500 डॉलर का जुर्माना लग सकता है। उनकी बीट अम्लीय भी होती है, जिसका मतलब है कि वे कारों, एयर कंडीशनर, इमारतों और स्मारकों को नुकसान पहुँचा सकती हैं। लेकिन जब मुंबई के दादर में कबूतरखाने बंद कर दिए गए तब भी कुछ लोग विरोध करने के लिए सामने आए और अब पेटा ऐसे ही बेतुके अभियान चला रहा है।”

एक्स पर राहुल देवधर लिखते हैं, “कबूतर अक्सर लोगों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं क्योंकि ये कई तरह की बीमारियाँ फैलाते हैं। इन्हें आमतौर पर ‘आसमान के चूहे’ कहा जाता है। कई शहरों में कबूतरों को सक्रिय रूप से मारा जा रहा है। पेटा सचमुच भारत विरोधी है।”

डिमेंटर नाम के एक्स यूजर लिखते हैं, “किसी को @PetaIndia के खिलाफ केस दर्ज करना चाहिए क्योंकि वे अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ जीवन के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। कबूतरों को खाना देना फेफड़ों की बीमारियों का कारण बनता है। पेटा वाले केवल दिखावे के लिए एक्टिविज्म कर रहे हैं।”

क्या है कबूतरों को दाना डालने पर रोक लगाने वाला फैसला ?

पेटा ने कबूतरों के समर्थन में ये अभियान मुबंई में कबूतरों को दाना डालने पर रोक के बाद शुरू किया। दरअसल, जुलाई 2025 में BMC ने शहरभर के कबूतरखानों में दाना डालने पर रोक लगा दी। यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं के मद्देनजर उठाया गया था क्योंकि कबूतरों के मल से फेफड़ों की बीमारियाँ फैलने का खतरा था। मामले में 31 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने BMC को निर्देश दिया कि वह कबूतरों को खाना देने वालों के खिलाफ FIR दर्ज करें।

क्या सचमुच कबूतर इंसान के लिए हानिकारक?

अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच कबूतर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं? तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कबूतरों के कारण स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं। खासकर, कबूतरों के मल में कई तरह के फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण मौजूद होते हैं, जो मनुष्यों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से हिस्टोप्लास्मोसिस (Histoplasmosis) इंफेक्शन है, जो Histoplasma capsulatum नाम के फंगस से फैलता है और बुखार, खाँसी, थकान और छाती में दर्द जैसे लक्षण पैदा करता है।
इसके अलावा क्रिप्टोकोकोसिस, जो Cryptococcus neoformans नाम का फंगस है, गंभीर स्थिति में दिमाग की सूजन यानी मेंनिंजाइटिस का कारण बनता है। साथ ही सिटिकोसिस नाम के बैक्टीरियल संक्रमण भी कबूतरों के मल से ही फैलता है, जो फ्लू जैसे लक्षण पैदा करता है।
बच्चों, बुजुर्गों और प्रेग्ननेंट महिलाओं में कबूतरों के मल और पंखों से एलर्जी और अस्थमा जैसे समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा कबूतरों के मल में Salmonella और E. coli बैक्टीरिया पाया जाता है, जो पाचन तंत्र में संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन स्वास्थ्य जोखिमों से बचने के लिए कबूतरों के मल के सीधे संपर्क से बचना चाहिए। खासकर जब यह सूखा हो और हवा में उड़ने लगे। अगर मल को साफ करना जरूरी हो तो मास्क और दस्ताने का उपयोग करना चाहिए।

केतन पारिख ने जिस Calcutta Stock Exchange में किया था घोटाला 117 साल बाद बंद


कभी 
Bombay Stock Exchange को टक्कर देती थी Calcutta Stock Exchange, ऐतिहासिक CSE ने 117 साल बाद समेटा काम: केतन पारेख घोटाला बना बर्बादी की वजह। 
                            कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (फोटो साभार - मिंट/indian-share-tips.com)

कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (Bombay Stock Exchange) से मुकाबला करने वाली 117 साल पुरानी कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) ने अपना काम समेट लिया है। कई सालों के कानूनी और नियामक अड़चनों के बाद CSE ने अपनी आखिरी काली पूजा और दिवाली का जश्न मनाया और सोमवार (20 अक्टूबर 2025) को स्थाई रूप से काम करना बंद कर दिया।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 2013 में CSE का ट्रेडिंग निलंबित कर दिया था क्योंकि यह नियामक मानकों का पालन नहीं कर पा रही थी। पिछले दस साल में ट्रेडिंग को पुनर्जीवित करने और SEBI के फैसले को चुनौती देने के प्रयासों के बावजूद एक्सचेंज ने पूरी तरह से बंद होने का निर्णय लिया।

पहले CSE ने SEBI के आदेशों को अदालत में चुनौती देने का इरादा रखा था, लेकिन अनुकूल फैसला पिछले साल तक संभव नहीं था। दिसंबर 2024 में CSE बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट और कोलकाता हाई कोर्ट में लंबित मामलों को वापस लेने का निर्णय लिया। इसके बाद उसने स्वयं से बाहर निकलने का अनुरोध किया।

CSE के चेयरमैन दीपंकर बोस ने कहा, “25 अप्रैल 2025 को आयोजित EGM (विशेष आम सभा) में शेयरधारकों से एक्सचेंज व्यवसाय से बाहर निकलने की मंजूरी प्राप्त की गई। इसके बाद CSE ने SEBI को बाहर निकलने के लिए आवेदन सौंपा, जिसने अब स्टॉक एक्सचेंज का मूल्यांकन करने के लिए एक वैल्यूएशन एजेंसी नियुक्त की है, जो फिलहाल प्रगति पर है।”

अगर SEBI CSE को बाहर निकलने की अनुमति दे देता है, तो CSE सिर्फ एक होल्डिंग कंपनी के रूप में ही बनी रहेगी। इसके तहत आने वाली सहायक कंपनी CSE कैपिटल मार्केट्स प्राइवेट लिमिटेड (CCMPL) अब भी NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) और BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) पर कारोबार करती रहेगी।

इसके अलावा, CSE की तीन एकड़ की EM बाईपास संपत्ति को सृजन ग्रुप को 253 करोड़ रुपए में बेचने की योजना को भी SEBI ने मंजूरी दे दी है। यह बिक्री तब पूरी होगी जब CSE का बाहर निकलना आधिकारिक रूप से पूरा हो जाएगा।

व्यापार के एक युग का अंत

CSE की स्थापना 1908 में हुई थी और यह कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की प्रतियोगी थी। यह कोलकाता के वित्तीय इतिहास और लाइयन्स रेंज के हब का भी प्रतीक माना जाता था।

CSE के लिए सबसे बड़ा झटका 2013 में आया, जब SEBI ने ट्रेडिंग रोकने का फैसला लिया। एक्सचेंज ने कई महत्वपूर्ण नियमों का उल्लंघन किया था, जिससे यह कदम उठाना पड़ा। इसके खिलाफ CSE ने कई बार अदालतों का रुख किया, लेकिन इसका नतीजा आर्थिक दबाव और ट्रेडिंग में गिरावट के रूप में सामने आया। यह गिरावट उस समय और भी ज्यादा महसूस हुई जब NSE और BSE पर ट्रेडिंग का बूम चल रहा था।

CSE के पतन के मुख्य कारणों में BSE और NSE का प्रभुत्व, प्रासंगिकता का कम होना और तकनीकी उन्नति के साथ तालमेल न बिठा पाना शामिल है। विशेष रूप से 2000 के दशक की शुरुआत में डॉट कॉम बूम के बाद, CSE तेजी से बदलती वित्तीय दुनिया में खुद को ढाल नहीं पाया और पीछे रह गया।

केतन पारेख घोटाले का खुलासा 2001 में CSE के लिए आखिरी बड़ा झटका साबित हुआ। पेशे से एक स्टॉक ब्रोकर पारेख ने कुछ स्टॉक्स जिन्हें K-10 स्टॉक्स कहा जाता था की कीमतें बढ़ाने के लिए एक्सचेंज की कमजोरियों का फायदा उठाया। इससे सख्त नियम लागू हुए और निवेशकों का विश्वास काफी घट गया। अंततः CSE का पतन इस कारण हुआ कि समय के साथ यह नियमों का पालन नहीं कर सका।

सीनियर स्टॉक ब्रोकरेर सिद्धार्थ थिरानी ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “हम हर दिन ट्रेडिंग शुरू करने से पहले देवी लक्ष्मी की पूजा करते थे, यह परंपरा अप्रैल 2013 तक चली जब ट्रेडिंग को रेगुलेटर ने निलंबित कर दिया। इस दिवाली का मतलब हमारे उस वैभवपूर्ण समय को अलविदा कहना है।”

शेयरधारकों ने औपचारिक प्रस्ताव को 25 अप्रैल को मंजूरी दी, जिसे पहले 18 फरवरी को SEBI को भेजा गया था। SEBI ने इसे पूरा करने के लिए राजवंशी एंड एसोसिएट्स को नियुक्त किया है और यह प्रक्रिया बाहर निकलने की अंतिम मंजूरी से पहले की आखिरी स्टेज है।

CSE में 1,749 सूचीबद्ध कंपनियाँ और 650 पंजीकृत सदस्य थे। चेयरमैन दीपंकर बोस ने FY25 रिपोर्ट में कहा कि एक्सचेंज ने भारत के पूँजी बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2024-2025 के दौरान उन्हें डायरेक्टर की बैठक फीस के रूप में 5.9 लाख रुपए मिले।

बाहर निकलने से पहले एक्सचेंज ने सभी कर्मचारियों को एक वॉलंटरी रिटायरमेंट स्कीम (VRS) का लाभ दिया। इसके तहत कर्मचारियों को एक बार का भुगतान 20.95 करोड़ रुपए और सालाना लगभग 10 करोड़ रुपए की बचत सुनिश्चित की गई। कुछ कर्मचारियों को केवल अनुपालन कार्यों के लिए अनुबंध पर रखा गया, लेकिन सभी ने इस ऑफर को स्वीकार कर लिया।

CSE के बाहर निकलने के साथ ही भारत के क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों का एक युग खत्म हो रहा है। पहले ये एक्सचेंज बहुत सक्रिय थे, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म्स के आने के बाद बाजार का केंद्र मुंबई चला गया।

CSE जैसी संस्थाएँ आज भी वित्तीय इतिहास की पहचान हैं, जो भारत के पूँजी बाजारों के विकास, तकनीकी आधुनिकीकरण और नियमों के सुदृढ़ीकरण का प्रतीक हैं। FY25 वार्षिक रिपोर्ट में चेयरमैन बोस ने कहा, “CSE ने भारत के पूँजी बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।)

कोर्ट ने खोल दिए कांग्रेस के ‘भगवा आतंकवाद’ के धागे, कहा- मालेगाँव ब्लास्ट पर थ्योरी तो गढ़ ली, पर सबूत एक भी नहीं; अभिनव भारत, कर्नल ने दिए RDX, साध्वी प्रज्ञा की बाइक…

                                पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित - (फाइल, फोटो साभार: First Post)
मालेगाँव ब्लास्ट केस में आये फैसले ने कांग्रेस समर्थिक यूपीए के साथ-साथ मीडिया को भी बेनकाब कर दिया। आज जो मीडिया फैसले को लेकर कांग्रेस पर प्रहार कर रही है, ये वही मीडिया है जो उस समय कांग्रेस के इशारे पर "हिन्दू और भगवा आतंकवाद" को खूब प्रचारित कर रही थी। कोई खोजी पत्रकार सच्चाई सामने लाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका, जिस वजह से हिन्दू चुपचाप अपने आपको अपमानित होते बर्दाश्त करता रहा। समय बड़ा बलवान होता है। सारे पासे पलट गए। जो सबके सामने है। कल तक कांग्रेस के इशारे पर 
"हिन्दू और भगवा आतंकवाद" का शोर मचाने वाली मीडिया आज कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर रही है।   

मुंबई की स्पेशल एनआईए कोर्ट ने 31 जुलाई को 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपितों को बरी कर दिया। इनमें पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित भी शामिल हैं।

स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा और सबूतों में कई असंगतियाँ हैं। कोर्ट ने ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हुए जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर होनी चाहिए।

यह फैसला 17 साल पुराने केस में आया है, जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी विवादास्पद रहा है। ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा घायल हुए थे। कोर्ट ने विक्टिम्स के लिए मुआवजे का भी ऐलान किया है।

मालेगाँव ब्लास्ट में कोई सबूत नहीं पेश कर पाया अभियोजन पक्ष

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने 500 पेज से ज्यादा के अपने फैसले में विस्तार से बताया कि अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने में कई गलतियाँ कीं। उन्होंने कहा, “पूरी जाँच के बाद यह साफ है कि अभियोजन कोई ठोस सबूत लाने में विफल रहा है। सबूतों में कई असंगतियाँ हैं, इसलिए सभी आरोपितों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।”

जज ने आगे जोड़ा, “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं की जा सकती। यहाँ सबूतों की कमी है, इसलिए बरी करना जरूरी है।”

कोर्ट ने विशेष रूप से ‘हिंदू आतंकवाद’ के आरोप को खारिज किया, जो अभियोजन की मुख्य थ्योरी थी। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि यह ब्लास्ट ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की साजिश थी और इसमें हिंदू आतंकवाद शामिल है। लेकिन कोई सबूत नहीं मिला कि आरोपित हिंदू आतंकवाद में लिप्त थे। आतंकवाद किसी धर्म से जुड़ा नहीं है। नैतिकता से फैसला नहीं लिया जा सकता; सबूत जरूरी हैं। यहाँ साजिश साबित नहीं हुई, इसलिए हिंदू आतंकवाद जैसी कोई अवधारणा यहाँ लागू नहीं होती।”

जज ने अभियोजन के दावों को एक-एक करके तोड़ा। उन्होंने कहा, “अभियोजन ने सात आरोपितों के बीच साजिश का आरोप लगाया, लेकिन कोई मीटिंग, कॉल रिकॉर्ड या प्लानिंग का सबूत नहीं पेश किया। सबूत असंगत हैं और पुलिस ने घटनास्थल को ठीक से सुरक्षित नहीं किया, जिससे फॉरेंसिक जाँच प्रभावित हुई।”

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर क्या कहा कोर्ट ने?

फैसले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ लगे आरोपों को विस्तार से खारिज किया गया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन का मुख्य दावा था कि ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल साध्वी ठाकुर की थी, जिस पर बम बंधा था। लेकिन फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने बाइक के चेसिस का पूरा सीरियल नंबर रिकवर नहीं किया। इसलिए, यह साबित नहीं होता कि बाइक उनकी थी।”
जज ने आगे कहा, “इसके अलावा, साध्वी ठाकुर ने ब्लास्ट से दो साल पहले संन्यास ले लिया था और सभी भौतिक चीजें त्याग दी थीं। ऐसे में बाइक उनके पास कैसे हो सकती है? अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह फेल रहा।”
कोर्ट ने ठाकुर के संन्यासी जीवन पर भी टिप्पणी की, जिसमें कहा गया, “उन्होंने दो साल पहले सब छोड़ दिया था, इसलिए मटेरियल संपत्ति से उनका कोई लेना-देना नहीं था। आरोप बेबुनियाद हैं।”

कर्नल पुरोहित के खिलाफ आरोप भी हुए धराशाई

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित पर लगे गंभीर आरोपों को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। जज ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि पुरोहित ने कश्मीर से आरडीएक्स मँगवाया और बम असेंबल किया। लेकिन कोई सबूत नहीं – न गवाह, न डॉक्यूमेंट। यह आरोप निराधार है।”
फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस पर बात करते हुए जज लाहोटी ने बताया, “पुरोहित और आरोपित अजय रहीरकर के बीच पैसे के लेन-देन हुए थे, क्योंकि वे अभिनव भारत के पदाधिकारी थे। लेकिन यह पैसा पुरोहित ने अपने घर की निर्माण और एलआईसी पॉलिसी पर खर्च किया, न कि किसी आतंकी गतिविधि पर। अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि पैसा गलत काम में लगा। इसलिए, कोई केस नहीं बनता।”

अन्य आरोपितों पर कोर्ट का रुख

कोर्ट ने बाकी आरोपितों मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहीरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ भी सबूतों की कमी बताई। जज ने कहा, “इन सभी के बीच कोई साजिश साबित नहीं हुई। अभियोजन ने मीटिंग्स या प्लानिंग के सबूत नहीं दिए। एक आरोपित सुधाकर द्विवेदी ने तो दावा किया कि कोई ब्लास्ट हुआ ही नहीं, जिसके बाद अभियोजन ने 100 से ज्यादा विक्टिम्स की जाँच की, लेकिन फिर भी केस कमजोर रहा।”

विक्टिम्स और मुआवजे पर फैसला

कोर्ट ने ब्लास्ट के विक्टिम्स को न्याय देते हुए मुआवजे का ऐलान किया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि छह लोग मारे गए, जो कोर्ट मानता है। लेकिन घायलों की संख्या 101 बताई गई, जबकि कुछ मेडिकल सर्टिफिकेट्स में हेराफेरी पाई गई। इसलिए सिर्फ 95 घायलों को मान्यता दी जाती है।”
मुआवजे पर उन्होंने आदेश दिया, “मारे गए छह लोगों के परिवारों को 2 लाख रुपये प्रत्येक और 95 घायलों को 50,000 रुपये प्रत्येक मुआवजा मिलेगा। यह राज्य सरकार देगी। विक्टिम्स को न्याय मिलना चाहिए, भले ही आरोपित बरी हों।”

क्या था पूरा मामला, जो 17 साल तक चला

यह केस 29 सितंबर 2008 को हुआ था, जब मालेगाँव के एक चौराहे पर रमजान के दौरान ब्लास्ट हुआ। मुस्लिम बहुल इलाके में मोटरसाइकिल पर रखे आईईडी से विस्फोट हुआ था। महाराष्ट्र एटीएस ने शुरुआती जाँच की और 12 लोगों को गिरफ्तार किया। एटीएस ने जिन 12 लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी शामिल थे। एटीएस ने दावा किया था कि यह विस्फोट अभिनव भारत संगठन की साजिश का हिस्सा था।
इस मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आरोप लगाए गए थे।
साल 2010 में जाँच एनआईए को सौंपी गई। एनआईए ने 2016 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और एमसीओसीए हटाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा कि कुछ आरोपितों के खिलाफ सबूत कम हैं। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने सात आरोपितों पर ट्रायल का आदेश दिया, जबकि तीन को डिस्चार्ज कर दिया। ट्रायल दिसंबर 2018 में शुरू हुआ, जिसमें 323 गवाहों की जाँच हुई। 34 गवाह होस्टाइल हो गए और 30 से ज्यादा मर चुके थे। अप्रैल 2024 में अंतिम बहस खत्म हुई और 19 अप्रैल को फैसला रिजर्व किया गया।
अभियोजन की तरफ से स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अविनाश रसल थे, जबकि आरोपितों की तरफ से कई वकील, जैसे जेपी मिश्रा (ठाकुर और रहीरकर), पासबोला समेत अन्य (उपाध्याय), फड़के और बाबर (पुरोहित), रंजीत सांगले (द्विवेदी), और पुनालेकर समेत अन्य (चतुर्वेदी) ने अपनी दलीलें पेश की।

कोर्ट ने अभियोजन की कमियाँ की उजागर

जज ने पुलिस और अभियोजन की कई कमियों पर उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “पुलिस ने घटनास्थल को सुरक्षित नहीं किया, जिससे सबूत खराब हुए। फॉरेंसिक जाँच में गड़बड़ियाँ हैं। गवाहों की मौत और होस्टाइल होना भी केस को कमजोर किया। कुल मिलाकर अभियोजन का केस असंगत है।”
फिर से हिंदू आतंकवाद पर जज साहब ने दोहराया। “टेररिज्म का कोई धर्म नहीं। लेकिन यहाँ प्रॉसीक्यूशन ने हिंदू आतंकवाद की थ्योरी बनाई, जो सबूतों पर नहीं टिकी। नैतिक आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सबूत जरूरी हैं, और यहाँ सबूत नहीं हैं। इसलिए, सभी आरोपितों को बरी किया जाता है।”
एनआईए कोर्ट के फैसले के बाद सुधाकर धर द्विवेदी के वकील रंजीत साँगले ने कहा, “ये साबित नहीं हुआ कि ब्लास्ट में इस्तेमाल मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी। घायलों के सर्टिफिकेट नकली थे। डीजी एटीएस को आदेश दिया गया है कि वो जाँच करें कि ये नकली सर्टिफिकेट किसने बनाए। सुधाकर चतुर्वेदी के घर पर रखा गया आरडीएक्स की भी जाँच डीजी एटीएस को करने को कहा गया है। सभी आरोपितों को यूएपीए और दूसरी धाराओं से बरी कर दिया गया है। अभियोजन यूएपीए के तहत आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा।”
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फैसला खत्म होने पर कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। आरोपित खुश दिखे, प्रॉसीक्यूशन वाले निराश। यह पूरा फैसला दिखाता है कि कानून सबूतों पर चलता है, नैतिकता पर नहीं। जज साहब ने हर बयान को विस्तार से दिया, ताकि कोई शक न रहे।

कर्नल का पैर तोड़ा, नंगा कर प्राइवेट पार्ट पर मारा; भगवा आतंकी का लगा लें ठप्पा, बेगुनाही के बावजूद बन जाएँ मालेगाँव ब्लास्ट के गुनाहगार: कैसे कांग्रेस की सरकार में सेना के अधिकारियों पर ढाया गया जुल्म, पत्नी-बेटी के रेप की देते थे धमकी

कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित (बाएँ) और मेजर रमेश उपाध्याय (दाएँ) (साभार: Hindustan Times/Navbharat times)
कोर्ट से सच्चाई छिपाने का कांग्रेस का एक लम्बा इतिहास है। याद हो, सच्चाई जानने जब कोर्ट के आदेश पर अयोध्या में राममन्दिर परिसर में खुदाई हुई, इतने प्रमाण मिले सब छुपा लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में सबूत के तौर पर दिखाया सिर्फ एक खम्बा। ये तो तत्कालीन उत्तर प्रदेश पुरातत्व निदेशक के के मोहम्मद ने सेवानिर्वित होने के बाद स्पष्ट लिखा कि मन्दिर कभी का बन गया होता अगर कांग्रेस और वामपंथियों ने कोर्ट में झूठ नहीं बोला होता। खुदाई में मन्दिर होने के बहुत प्रमाण मिले जो कोर्ट में पेश नहीं किये गए। ठीक वही हिन्दू विरोधी नीति देश में हो रहे धमाकों में इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने निर्दोष और बेगुनाह हिन्दुओं चाहे वह साधु, संत, साध्वी या फौजी ही क्यों न हो, को पकड़ हिन्दू-भगवा आतंकवाद कहा जाता था।       

देशभक्ति और देश को आज़ादी दिलवाने की दुहाई देने वाली कांग्रेस और इसकी समर्थक पार्टियों ने इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने हमारे फौजियों को भी अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। आर्मी चीफ बिपिन रावत(स्व) को तो कांग्रेस के एक नेता ने "सड़क का गुंडा" तक बोल दिया था। 

मालेगांव धमाके को अंजाम देने वाले इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने बेगुनाह हिन्दुओं को जेल में डाल यूपीए सरकार में अपनी महत्वकांक्षा बनाये रखने के लिए तत्कालीन ATS हेमंत करकरे ने इन बेगुनाह साधु, साध्वी और फौजियों पर जुल्म करने हैवानियत की परिकाष्ठा तक को तार-तार कर दिया था। ये तो परमपिता परमेश्वर का इन पर आशीर्वाद था कि आज हमारे बीच है। अन्यथा इनकी राम नाम सत्य करने की करकरे ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उस प्राणी की तकलीफ का अनुमान लगाया जा सकता है जब उसके प्राइवेट पार्ट पर प्रहार किया जाए। 

तरस आता है उन हिन्दुओं पर जो कांग्रेस को समर्थन और वोट देते हैं। यूपीए समय में मुस्लिम तुष्टिकरण अपनी चरम पर था। हिन्दुओं को गुलाम बनाए जाने Communal Violence Bill बनाया गया। ये तो हिन्दुओं का भाग्य था कि 2014 चुनावों में यूपीए सत्ता से बाहर हो गयी। अगर दुर्भाग्य से 2014 में यूपीए सरकार वापस आ गयी होती हिन्दू त्राहिमाम कर रहा होता। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं यूपीए में शामिल जितनी भी पार्टियां है हिन्दू एकजुट होकर पूछे कि इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने क्यों "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" कहकर हिन्दुओं को अपमानित किया गया था?

 

कांग्रेस अपनी नीचता से अभी भी बाज नहीं आ रही। कल(31 जुलाई) को IndiaTV पर आज की बात में समाचार था कि कांग्रेस नेता पृथ्वी राज चौहान कह रहा है कि हिन्दू नहीं सनातन आतंकवाद कहना चाहिए।          

मालेगाँव बम धमाका मामले में गुरुवार (31 जुलाई, 2025) को साध्वी प्रज्ञा, कर्नल श्रीकांत पुरोहित और मेजर रमेश उपाध्याय समेत 7 लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया। कोर्ट को इन लोगों के खिलाफ मालेगाँव धमाके में कोई सबूत नहीं मिले। इसी के साथ पिछले 17 वर्षों से चली आ रही ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी का अंतिम संस्कार हो गया।

17 वर्षों तक इन हिन्दुओं को केवल इसलिए प्रताड़ित किया जाता रहा ताकि कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति चमक सके। कांग्रेस की इस तुष्टिकरण की राजनीति का शिकार भारतीय सेना के दो अफसर भी हुए। उनके परिवारों तक को नहीं छोड़ा गया, उनके सैन्य करियर बर्बाद कर दिए गए, देश की दशकों तक सेवा के बावजूद उन्हें जनता में शर्मिंदगी झेलनी पड़ी और वामपंथी मीडिया ने उनका वर्षों तक पीछा किया।

कर्नल का पैर तोड़ा, नंगा कर प्राइवेट पार्ट पर मारा

भारतीय सेना में देश की सेवा करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को कांग्रेस  सरकार ने आतंकवादी साबित करने की कोशिश की। उन्हें मालेगाँव ब्लास्ट 2008 की जिम्मेदारी लेने के लिए यातनाएँ दी गईं थी। कर्नल से सेना की खुफिया जानकारी जुटाने की कोशिश की गई। कर्नल के साथ पाकिस्तान पहुँचे विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान से भी बुरा बर्ताव किया गया।

यहाँ तक कि कर्नल का पैर तोड़ा गया, नंगा कर प्राइवेट पार्ट पर मारा गया, बाल पकड़कर खींचे जाता था। उन्हें वर्षों तक जेल में रखा। इस दौरान उन्हें सेना की नौकरी से भी हाथ धोना पड़ गया। महाराष्ट्र ATS गवाहों को भी बंदूक की नोक पर बयान दिलवाती थी। कोर्ट को कर्नल पुरोहित ने बताया था कि यह सब तत्कालीन UPA सरकार और राज्य की कांग्रेस NCP सरकार के इशारे पर किया गया था।

कोर्ट के सामने कर्नल पुरोहित ने बयान दिया था कि कांग्रेस सरकार ने तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों को फँसाने की साजिश की थी। कर्नल से भी मामले में उनका नाम लेने का दबाव डाला गया था। कर्नल के परिवार को भी फँसाने की धमकी दी गई थी।

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मेजर की बेटी से रेप और पत्नी को नंगा करने की दी गई थी धमकी

मेजर रमेश उपाध्याय के सेनानी थे। उन्हें भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मालेगाँव बम धमाका मामले में फँसाया गया था। कांग्रेस सरकार के इशारे पर ATS उन्हें प्रताड़ित करती थी। यहाँ तक कि उनकी पत्नी को नंगा घुमाने और बेटी के रेप तक की धमकी दी गई। मेजर उपाध्याय को भी बम धमाके की जिम्मेदारी लेने के लिए मानसिक और शारीरिक शोषण किया गया था।
ATS ने मेजर उपाध्याय को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। मेजर पर MCOCA लगाने की धमकी देकर आतंकवादी करार दिया गया, उनके किराए के घर को भी खाली करवाया गया। मेजर का परिवार सड़क पर आ गया था। मेजर के शादीशुदा बेटियों के घर पर भी ATS ने छापा मारा। मेजर का पॉलीग्राफ और नारको टेस्ट भी करवाया गया और क्लीन चिट मिलने के बाद कोर्ट के सामने पेश नहीं की।

मुसलमानों आंखे खोलो, पहचानों अपने असली दुश्मनों को ; देखो तुम्हे भड़काने वाले किस तरह अपनी तिजोरियां भर रहे हैं: राणा अय्यूब ने कोरोना में किया जो करोड़ों का घपला : ITAT का आदेश; गरीबों के नाम पर हड़पे थे सारे रुपए, परिवार को दिया फायदा; 50 लाख रूपए की सिर्फ FD करवाई

आखिर मुसलमान कब तक कुँए का मेंढक बना रहेगा? कब कुँए से बाहर आकर अपने असली दुश्मनों को  पहचानेगा, क्योकि कट्टरपंथियों ने इतना डरा-धमका कर रखा हुआ जिस वजह से सच्चाई जानने की कोशिश नहीं करते। तुम्हारा दुश्मन कोई बीजेपी या आरएसएस नहीं ये ही मुस्लिम कट्टरपंथी हैं। इन्हे कट्टरपंथी अगर कहें कि बकरे की चार नहीं दो टांगें होती हैं ये सभी चार नहीं दो ही बोलेंगे। गुजरात दंगों में देखा कि किस तरह तीस्ता सीतलवाड़ ने दंगा पीड़ितों को मदद करने के लिए उगाए धन का अधिकतर अपने निजी रूप में  दुरूपयोग किया, उसी तरह राणा अयूब, जो अपने लेखों से तुम्हे भड़काती है, ने कोरोना काल में घपला किया है।    
कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश संकट से जूझ रहा था, उस समय पत्रकार राणा अय्यूब ने राहत कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये का फंड जुटाया। लेकिन इस पैसे का उपयोग राहत कार्यों से ज्यादा उन्होंने निजी कामों के लिए किया। इसके खुलासा मुंबई स्थित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (
ITAT) ने किया है।

ITAT का कहना है कि इस फंड का कुछ हिस्सा निजी उपयोग में लाने के साथ साथ विदेशी फंडिंग के नियमों का भी उल्लंघन किया गया है। ITAT ने राणा अय्यूब को पूरे फंड पर टैक्स जमा करने का आदेश दिया है।

राणा अय्यूब ने कोरोना महामारी के समय ‘केट्टो’ प्लेटफॉर्म पर तीन क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए कुल ₹2.69 करोड़ जुटाए थे। इस रकम में से ₹80.49 लाख की फंडिंग विदेश से मिली था, जो FCRA, 2010 का उल्लंघन था।

                     COVID-19 महामारी के दौरान राणा अय्यूब द्वारा जुटाई गई धनराशि का स्क्रीनग्रैब

राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत कार्यों के लिए जुटाई गई रकम में से ₹1.60 करोड़ अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख और ₹37.15 लाख अपनी बहन इफ़्फ़त शेख के बैंक खातों में जमा किए। उन्होंने आयकर विभाग को बताया कि उनका पैन कार्ड नहीं मिल रहा था, इसलिए केट्टो से फंड निकालने के लिए उन्होंने अपने पिता और बहन के पैन कार्ड का इस्तेमाल किया।

बाद में राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से ₹84.40 लाख और बहन के खाते से ₹36.40 लाख अपने निजी खाते में ट्रांसफर कर लिए। इस तरह उनके खाते में कुल ₹1.20 करोड़ से ज्यादा की राशि ट्रान्सफर।

अप्रैल 2022 में उन्होंने इस बड़ी रकम के गबन को सिर्फ 20,000 डॉलर की छोटी राशि’ बताकर गंभीरता को कम करने की कोशिश की, जबकि असल में मामला ₹2.69 करोड़ (करीब 3.14 लाख डॉलर) का था।

            राणा अय्यूब द्वारा अपने पिता और बहन के खाते से अपने निजी बैंक खाते में स्थानांतरित किया गया धन

ITAT ने कहा कि एक साल बाद भी क्राउडफंडिंग से जुटाए गए लगभग ₹2.4 करोड़ का उपयोग राहत कार्यों के लिए नहीं हुआ। पैसा राणा अय्यूब और उनके परिवार के व्यक्तिगत बचत खातों में जमा किया गया था। राहत कार्य करने के बजाय, राणा अय्यूब ने अपने नाम पर चालू खाता खोला, FD में निवेश किया और उसी खाते से निजी खर्च भी किए।

राणा अय्यूब द्वारा धन के दुरुपयोग का मामला उजागर

ITAT ने पत्रकार राणा अय्यूब के खिलाफ यह टिप्पणी की है कि उन्होंने COVID-19 राहत कार्यों और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए क्राउडफंडिंग से जुटाई गई राशि के लिए अलग-अलग बैंक खाते नहीं खोले।

ITAT के अनुसार, ये पैसा उनके पिता और उनकी बहन के व्यक्तिगत खातों में भेजा गया पहले और दूसरे क्राउडफंडिंग अभियान के दौरान उनके परिवार के सदस्यों के खातों में और तीसरे अभियान के दौरान सीधे उनके अपने खाते में।

राणा अय्यूब ने दावा किया कि वह इन पैसों का इस्तेमाल खुद के लिए नहीं किया हैं, लेकिन ITAT ने कहा कि यह साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होंने धन को निजी खातों में मिलाकर रखा और कोई अलग खाता नहीं बनाया।

उन्होंने यह भी कहा कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर लाभार्थी की पहचान स्पष्ट थी, लेकिन चूंकि पैसा सीधे उनके और उनके परिवार के खातों में गया, यह दलील भी स्वीकार नहीं की गई। ITAT ने यह भी बताया कि जब आयकर विभाग ने इस पर सवाल उठाए, तो राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से प्राप्त पूरी राशि को ‘अन्य स्रोतों से आय’ के रूप में घोषित कर दिया।

उन्होंने यह स्वीकार किया कि 2.69 करोड़ रुपये में से केवल 28 लाख रुपये ही राहत कार्यों जैसे कि प्रवासी मजदूरों की मदद, राशन, अस्पताल में भर्ती, परिवहन और पश्चिम बंगाल में बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किए गए।

ITAT की जाँच में यह भी सामने आया कि राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से मिले पैसों में से 19 लाख रुपए का इस्तेमाल अपने निजी खर्चों के लिए किया है। इसके अलावा, 50 लाख रुपए की राशि को अपने नाम से व्यक्तिगत फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में डाल दिया।

ITAT ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर उनकी मंशा वास्तव में राहत कार्यों की थी, तो उन्होंने अपने नाम से इतनी बड़ी FD क्यों करवाई? ITAT ने यह भी बताया कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर पहले क्राउडफंडिंग अभियान से राणा अय्यूब को 1.23 करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन उसमें से सिर्फ 18 लाख ही राहत कार्यों में खर्च किए गए।

उन्होंने यह तर्क दिया कि बची हुई रकम अस्पताल निर्माण के लिए रखी गई थी, जबकि फंडरेज़िंग के दौरान इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई थी। इसके अलावा, जब उन्हें टैक्स संबंधी कार्रवाई का डर हुआ, तब उन्होंने विदेशी स्रोतों से मिले कुछ धन को वापस लौटा दिया।

लेकिन पहले क्राउडफंडिंग अभियान के एक साल बाद तक वे केवल 18 लाख रुपए के खर्च का ही सबूत दे पाईं। ITAT ने इस आधार पर उनके दावों पर संदेह जताया और कई वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया।

FCRA नियमों का उल्लंघन

ITAT ने यह भी कहा कि राणा अय्यूब ने FCRA, 2010 का उल्लंघन किया है। ITAT के अनुसार, अय्यूब ने खुद को वाशिंगटन पोस्ट के लिए पत्रकार बताया था और FCRA की धारा 3(1)(H) के तहत पत्रकारों को विदेशी दान सीधे अपने खाते में प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि पत्रकार होने के नाते राणा अय्यूब को विदेशी फंड सीधे प्राप्त नहीं करने चाहिए थे, इसलिए यह कानून का उल्लंघन माना गया।

धर्मार्थ गतिविधियों के लिए एकत्रित धनराशि अप्रमाणित: आईटीएटी

ITAT  ने बताया कि राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों की मदद के नाम पर धन इकट्ठा किया था, लेकिन यह पूरा दान उनके और उनके परिवार के सदस्यों के निजी बैंक खातों में जमा किया गया।

उन्होंने कोई अलग खाता नहीं खोला और इस धन का इस्तेमाल निजी खर्चों और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश के लिए किया गया। बड़ी राशि लंबे समय तक बिना उपयोग के पड़ी रही। ITAT के अनुसार राणा अय्यूब का यह दावा कि यह धन धर्मार्थ कार्यों के लिए इस्तेमाल किया गया, साबित नहीं हो सका है।

जिस तरह से फंड एकत्र किया गया और उसे उनके रिश्तेदारों के खातों में जमा किया गया, इस बात का भी कोई ठोस सबूत नहीं है। ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि यह क्राउडफंडिंग की गई राशि ‘कर छूट’ (tax free) के योग्य नहीं है और इसे उनकी आय माना गया है, जिस पर आकलन वर्ष 2021-22 और 2022-23 में कर लगाया गया है।