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बिहार में एक्टिव आतंकवाद का ‘स्लीपर सेल’ : मोहम्मद अहद से लेकर सद्दाम तक

                                                                                                                             प्रतीकात्मक 
बिहार में हाल के दिनों में सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी से कई ऐसे चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जिन्होंने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को पूरी तरह अलर्ट पर डाल दिया है। केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA), स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और बिहार पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में कटिहार से मोहम्मद अहद नाम के एक संदिग्ध युवक की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सीमा पार बैठे भारत विरोधी तत्व लगातार देश को दहलाने की साजिश रच रहे हैं।

मोहम्मद अहद को पाकिस्तानी आतंकी संगठन का एक सक्रिय ‘स्लीपर सेल’ बताया जा रहा है, जो सोशल मीडिया के जरिए सीधे पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में था, लेकिन यह कोई इकलौता मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों के भीतर बिहार के अलग-अलग जिलों जैसे मधुबनी, मुंगेर और मुजफ्फरपुर से भी इसी तरह के संदिग्धों को दबोचा गया है।

                                       पुलिस की गिरफ्त में मोहम्मद अहद (फोटो साभार: जागरण)

इन सभी मामलों की कड़ियों को आपस में जोड़ने पर एक बेहद खतरनाक और सुव्यवस्थित पैटर्न उभर कर सामने आता है। ये गिरफ्तारियाँ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि बिहार आतंकियों के निशाने पर हैं, जहाँ वे स्थानीय युवाओं का ब्रेनवॉश कर एक बड़ा नेटवर्क खड़ा करने की साजिश रच रहे हैं।

गिरफ्तारियों में ‘कॉमन फैक्टर’ और पाकिस्तानी गैंगस्टर्स का कनेक्शन

अगर हम हाल के दिनों में बिहार से हुई तमाम गिरफ्तारियों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो इन सब में कुछ बेहद खतरनाक और समान बातें देखने को मिलती हैं। सबसे बड़ी समानता यह है कि इन सभी संदिग्धों के तार सीधे तौर पर सीमा पार यानी पाकिस्तान में बैठे आकाओं से जुड़े हुए हैं।

चाहे वह कटिहार का मोहम्मद अहद हो, मुंगेर का मोहम्मद सद्दाम हो या फिर मुजफ्फरपुर से पकड़ा गया मोहम्मद अली, ये सभी लोग किसी न किसी रूप में पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में थे। कटिहार से पकड़े गए अहद के मामले में सुरक्षा एजेंसियों ने खुलासा किया कि वह पाकिस्तानी गैंगस्टर राणा हुसैन और शहजाद भट्टी के नेटवर्क से लगातार संपर्क में था।

मुंगेर से गिरफ्तार मोहम्मद सद्दाम के तार भी ‘राणा भाई’ गैंग से जुड़े पाए गए थे, जो सीमा पार के एक संदिग्ध नेटवर्क का संचालन करता था। यह इस बात का सबूत है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियाँ और आतंकी संगठन अब वहाँ के स्थानीय गैंगस्टर्स और अपराधियों के नेटवर्क का इस्तेमाल भारत में स्लीपर सेल बनाने और हथियारों की सप्लाई के लिए कर रहे हैं।

दूसरा सबसे बड़ा कॉमन फैक्टर इन सभी का डिजिटल कनेक्शन है। ये सभी संदिग्ध आम तौर पर समाज के बीच बेहद सामान्य जिंदगी जी रहे थे, लेकिन डिजिटल दुनिया में ये देश के खिलाफ एक अघोषित युद्ध लड़ रहे थे। वॉट्सएप, फेसबुक, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए इन्हें सीमा पार से निर्देश मिल रहे थे।

इनका मुख्य काम बिहार के अन्य पिछड़े इलाकों के गरीब और कम पढ़े-लिखे युवाओं को ढूँढना, मजहबी आधार पर उनका ब्रेनवॉश करना और उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों के लिए भड़काकर एक नया नेटवर्क तैयार करना था।

पिछले कुछ महीनों के प्रमुख मामले: बिहार में आतंकी नेटवर्क की सक्रियता

 बिहार में पिछले एक-दो महीनों के भीतर सुरक्षा एजेंसियों ने ताबड़तोड़ कार्रवाइयाँ करते हुए कई बड़े मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। हाल ही में बिहार ATS और स्थानीय पुलिस ने एक बड़े कट्टरपंथी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए मधुबनी जिले के पंडौल थाना क्षेत्र से 50 साल के मदरसा संचालक मौलाना इजहार-उल-हक को गिरफ्तार किया।

इजहार को एक पाकिस्तानी एजेंट बताया गया है जो बिहार में स्लीपर सेल तैयार करने और कट्टरपंथी मॉड्यूल की फंडिंग का काम संभाल रहा था। उसके पास से कई भड़काऊ वीडियो मिले, जिनमें भारत में शरीयत कानून लागू करने की बातें कही गई थीं। इस मॉड्यूल के तार पाँच राज्यों से जुड़े थे और इजहार की गिरफ्तारी इस सिलसिले में छठी बड़ी कामयाबी थी।

इसी तरह मुंगेर पुलिस ने तारापुर थाना क्षेत्र के मिलिक थानपुर गाँव में देर रात छापेमारी कर मोहम्मद सद्दाम नाम के युवक को गिरफ्तार किया। सद्दाम पिछले दो-तीन साल से मुंबई में रह रहा था और वहीं वह ‘राणा भाई’ नामक पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में आया था। मुंबई में जब सुरक्षा एजेंसियों की धर-पकड़ बढ़ी, तो वह भागकर मुंगेर आ गया।

पुलिस ने उसके पास से एक देसी पिस्तौल और मोबाइल बरामद किया है। वह अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर किसी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने की फिराक में था। इसके अलावा 2 साल पहले गुजरात की सूरत स्पेशल ब्रांच की टीम ने बिहार पुलिस के सहयोग से मुजफ्फरपुर के सकरा थाना क्षेत्र से मोहम्मद अली को गिरफ्तार किया।

मोहम्मद अली पर भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा और हिंदू नेता उमेश्वर राणा को जान से मारने की धमकी देने और साजिश रचने का आरोप था। वह नेपाल में बैठकर इंटरनेट के माध्यम से आपत्तिजनक टिप्पणियाँ और साजिशें रचता था। उसका नेटवर्क सूरत के एक मौलाना और पाकिस्तान के कट्टरपंथी सदस्यों से जुड़ा हुआ था।

इसी तरह बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया में पुलिस ने पाकिस्तान से जुड़े संदिग्ध वॉट्सऐप चैट के मामले में 25 वर्षीय खुर्शीद आलम को गिरफ्तार किया था। पुलिस के मुताबिक, आरोपित के मोबाइल फोन में पाकिस्तान के फोन नंबरों के साथ बातचीत और कई क्यूआर कोड मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई थी।

बिहार के सीमावर्ती जिले मधुबनी में सुरक्षा एजेंसियों ने अंतरराष्ट्रीय जाली नोट नेटवर्क के शातिर अपराधी अबुल इनाम उर्फ लादेन को गिरफ्तार किया था। अबुल इनाम पर केवल जाली नोट चलाने का ही नहीं, बल्कि एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद मस्तान को सुरक्षित नेपाल के रास्ते भगाने का भी गंभीर आरोप था।

पुलिस के मुताबिक, लादेन इस गैंग का मुख्य लोकल ऑपरेटर था। वह सीमा पार से आने वाले संदिग्धों को पनाह और रास्ता मुहैया कराता था। आंध्र प्रदेश और दिल्ली पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुए अंतर-राज्यीय ऑपरेशन में 12 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें बिहार के शादमान दिलकुश, अजमनुल्लाह खान भी शामिल थे।

पुलिस की छानबीन में इनके संबंध अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) और ISIS से जुड़े सामने आए। जाँच में ये भी पता चला है कि ये आतंकी एक गेमिंग ऐप के जरिए विदेशी हैंडलरों के संपर्क में थे और इनके तार ISIS से संबंध रखने वाले Benex Com नामक एक समूह से भी जुड़े थे।

PFI का ‘मिशन 2047’: बिहार से ही खुला था देश को इस्लामिक मुल्क बनाने की साजिश का राज

बिहार का आतंकी कनेक्शन आज का नहीं है, बल्कि देश को हिला देने वाली कई बड़ी साजिशों के तार इसी राज्य से खुले हैं। इसका सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत साल 2022 में तब मिला, जब पटना के फुलवारी शरीफ में पुलिस ने एक संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था।

इस छापेमारी के दौरान पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े दो मुख्य आरोपितों, अथर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से जो दस्तावेज बरामद हुए, उसने पूरे देश के सुरक्षा महकमे को हिलाकर रख दिया।

इस दस्तावेज का नाम ‘India Vision 2047’ था, जिसकी टैगलाइन ‘Towards Rule of Islam in India’ थी। इस गुप्त दस्तावेज में साल 2047 तक, यानी भारत की आजादी के 100 साल पूरे होने तक, भारत को एक पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र में बदलने की एक बहुत ही खतरनाक और चरणबद्ध योजना तैयार की गई थी।

इस योजना के पहले चरण में देश के अलग-अलग मुस्लिम संप्रदायों को PFI के झंडे तले इकट्ठा करने और एक ऐसी कट्टरपंथी पहचान बनाने पर जोर था जो राष्ट्रीय पहचान से ऊपर हो। युवाओं को लाठी, रॉड, तलवार और अन्य हथियारों को चलाने का आक्रामक प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी।

दूसरे चरण में अपने विरोधियों के मन में डर पैदा करने और अपनी ताकत दिखाने के लिए चुनिंदा हिंसा का सहारा लेने का प्रस्ताव था। जिन कार्यकर्ताओं में ज्यादा आक्रामकता दिखाई दे, उन्हें उन्नत हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण देने की योजना थी।

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इस अंतिम हिंसक उद्देश्य को छुपाने के लिए कार्यकर्ताओं को भारतीय संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और डॉ बीआर आंबेडकर जैसे प्रतीकों और शब्दों का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया था ताकि वे कानून की नजरों से बच सकें।

इसके बाद तीसरे चरण में PFI अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाना चाहता था ताकि बहुसंख्यक समाज को आपस में लड़ाया जा सके। संगठन का लक्ष्य खुद को अल्पसंख्यकों और वंचितों का एकमात्र मसीहा साबित करना था।

इसी चरण में भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक जमा करने और विरोधियों पर सुनियोजित हमले करने की बात भी शामिल थी। चौथे और आखिरी चरण में PFI ने खुद को देश के मुसलमानों का निर्विवाद नेता बनाने और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हथियाने की कल्पना की थी।

सत्ता के करीब पहुँचते ही अपने वफादार लोगों को कार्यपालिका, न्यायपालिका, पुलिस और सेना में भर्ती करने की योजना थी। इसके बाद मौजूदा लोकतांत्रिक संविधान को हटाकर देश में इस्लामिक संविधान लागू करने का अंतिम लक्ष्य था।

इसके लिए हर मुस्लिम परिवार से एक सदस्य की भर्ती और एक समर्पित सशस्त्र बल तैयार करने का खाका खींचा गया था, जो जरूरत पड़ने पर तुर्की जैसे विदेशी इस्लामिक मुल्कों की मदद से भारतीय राज्य के साथ अंतिम संघर्ष कर सके।

इस दस्तावेज के सामने आने के बाद ही केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए सितंबर 2022 में गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के तहत PFI और उससे जुड़े 8 अन्य संगठनों पर 5 साल का प्रतिबंध लगा दिया था।

स्लीपर सेल के खुलासों और भंडाफोड़ के पुराने मामले

मध्य प्रदेश से गिरफ्तार इजहार उल हक ने पूछताछ में यह कबूला था कि उनके स्लीपर सेल पूरे देश में शांत बैठे हुए हैं, जो सिर्फ सही समय और ऊपर से मिलने वाले आदेश का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे बाहर निकलकर बड़ी तबाही मचा सकें। स्लीपर सेल का यह खतरा कोई नया नहीं है। भारत में पिछले दो दशकों से यह पैटर्न लगातार देखा जा रहा है।

स्लीपर सेल ऐसे प्रशिक्षित आतंकवादी या समर्थक होते हैं जो किसी भी आम नागरिक की तरह समाज में रहते हैं और कोई नौकरी, दुकान या पढ़ाई करते हैं जिससे किसी को शक न हो। वे तब तक कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं करते जब तक कि उन्हें आकाओं द्वारा किसी विशेष हमले को अंजाम देने का निर्देश न मिले।

2012 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के समय भी देश के भीतर इंडियन मुजाहिदीन और सिमी जैसे संगठनों के स्लीपर सेल्स का एक बड़ा नेटवर्क सामने आया था।

उस दौरान दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद और बोधगया में हुए सिलसिलेवार धमाकों की जाँच में यह बात साफ हुई थी कि आतंकियों को स्थानीय स्तर पर इन्हीं स्लीपर सेल्स ने लॉजिस्टिक्स, रहने की जगह और रेकी करने में मदद पहुँचाई थी।

उस समय भी बिहार के दरभंगा और समस्तीपुर जैसे जिलों से कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने दरभंगा मॉड्यूल का नाम दिया था। इसके बाद साल 2020 के दौरान देश में ISIS के कई डिजिटल मॉड्यूल्स का पता चला।

जाँच में सामने आया कि सीरिया और इराक में बैठे हैंडलर्स भारत के पढ़े-लिखे युवाओं को इंटरनेट के माध्यम से प्रभावित कर रहे थे और इस दौरान भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में छापेमारी कर ऐसे युवाओं को पकड़ा गया जो ऑनलाइन माध्यमों से कसम लेकर देश में अकेले दम पर हमला करने की फिराक में थे।

वहीं साल 2023 में भी NIA ने देश के कई राज्यों में एक साथ छापेमारी कर अल-कायदा और ISIS से प्रेरित मॉड्यूल्स का भंडाफोड़ किया था। इस दौरान भारी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य, प्रतिबंधित साहित्य और हथियार बरामद किए गए थे, जिसमें बिहार से हुई कई गिरफ्तारियों ने यह साबित किया कि स्लीपर सेल्स का जाल समय के साथ और अधिक फैल चुका है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म: आतंकियों का नया और सुरक्षित ‘हथियार’

आज के समय में आतंकवादियों को अपना नेटवर्क चलाने के लिए किसी गुप्त जगह पर आमने-सामने मिलने की जरूरत नहीं रह गई है। आधुनिक तकनीक और इंटरनेट ने उनके काम को बेहद आसान और सुरक्षित बना दिया है, यही कारण है कि अब सुरक्षा एजेंसियाँ आतंकवाद के इस नए रूप को डिजिटल जिहाद का नाम दे रही हैं।

टेलीग्राम, सिग्नल, थ्रेमा और वॉट्सएप जैसे एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स इन आतंकियों के सबसे बड़े मददगार बन गए हैं क्योंकि इन ऐप्स पर होने वाली बातचीत को आसानी से ट्रैक नहीं किया जा सकता, जिससे ये कानून और सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचे रहते हैं। आतंकी इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बहुत ही शातिराना तरीके से करते हैं।

जैसे टेलीग्राम और सिग्नल पर वे सीक्रेट चैट का उपयोग करते हैं, जहाँ संदेश अपने आप नष्ट हो जाते हैं और बिना नंबर दिखाए बड़े-बड़े ग्रुप्स का संचालन किया जाता है। वहीं फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भड़काऊ और प्रोपेगैंडा वीडियो शेयर करके समाज से असंतुष्ट युवाओं की पहचान की जाती है।

इन सब के साथ डार्क वेब और वीपीएन तकनीक का सहारा लेकर वे अपनी पहचान पूरी तरह छुपा लेते हैं और विदेशी आकाओं से बात करने के साथ-साथ क्रिप्टोकरेंसी के जरिए फंड ट्रांसफर का काम भी करते हैं। इन डिजिटल टूल्स की वजह से भारत के भोले-भाले युवाओं को निशाना बनाना बहुत आसान हो गया है।

पाकिस्तानी हैंडलर्स सोशल मीडिया पर लगातार नजर रखते हैं कि कौन से युवा देश की नीतियों या धार्मिक\मजहबी मुद्दों पर ज्यादा आक्रामक या असंतुष्ट हैं और फिर उन्हें निशाना बनाया जाता है। शुरुआत में उन्हें धार्मिक साहित्यों और वीडियो के जरिए जोड़ा जाता है और धीरे-धीरे उनके मन में देश के प्रति नफरत का बीज बो दिया जाता है।

उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और इसका एकमात्र उपाय व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना है। जब युवा पूरी तरह उनके मानसिक नियंत्रण में आ जाता है, तब उसे टेलीग्राम या सिग्नल के किसी गुप्त ग्रुप में शामिल कर लिया जाता है, जहाँ उसे हथियार चलाने, प्रोपेगैंडा फैलाने या स्लीपर सेल के रूप में काम करने के निर्देश दिए जाते हैं।

कटिहार के मोहम्मद अहद और मुंगेर के सद्दाम के मोबाइल से मिले पाकिस्तानी नंबर और चैट इसी डिजिटल ब्रेनवाशिंग की कहानी बयां करते हैं। बिहार में लगातार मिल रहे स्लीपर सेल्स के सुराग यह दिखाते हैं कि देश के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौती कितनी गंभीर है, हालाँकि सुरक्षा एजेंसियाँ एक-एक कर इनका सफाया कर रही हैं।

मध्य प्रदेश : फराज को मिली थी बैचलर युवाओं के ब्रेनवॉश की जिम्मेदारी, नईम अब्दुल्ला से मिलकर शरिया लागू करने का था टारगेट: पढ़ें- भोपाल ATS ने और क्या बताया

           आरोपित फराज और नईम पर थी बैचलर्स के ब्रेन वॉश की जिम्मेदारी (फोटो साभार: MSN, एक्स)
मध्य प्रदेश के भोपाल के काजी कैंप इलाके से गिरफ्तार किए गए मोहम्मद फराज उर्फ खालिद सैफुल्लाह से पूछताछ में जाँच एजेंसियों को कई ऐसे इनपुट मिले हैं, जिनसे मामले की गंभीरता बढ़ गई है। जाँच एजेंसियों के अनुसार, फराज और नईम अब्दुल्ला साल 2047 तक देश में शरिया कानून लागू करने की कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित थे।

फराज को पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स की ओर से मध्य प्रदेश में नेटवर्क खड़ा करने, बैचलर युवकों का ब्रेन वॉश करने और सोशल मीडिया के जरिए कट्टरपंथी सोच फैलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। वह आर्थिक रूप से कमजोर, बेरोजगार, अविवाहित और आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने की कोशिश कर रहा था।

एजेंसियों का दावा है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं तक पहुँच बनाकर उन्हें जिहादी बनाने की योजना पर काम किया जा रहा था।

सोशल मीडिया बना नेटवर्क का माध्यम, डिजिटल जाँच तेज

जाँच एजेंसियों की शुरुआती पड़ताल में सामने आया है कि फराज पिछले करीब चार वर्षों से टेलीग्राम और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय था। आरोप है कि वह अलग-अलग ग्रुप्स बनाकर युवाओं को जोड़ता था और उनमें वीडियो व अन्य सामग्री साझा करता था। इसी के जरिए युवाओं को प्रभावित करने और नेटवर्क तैयार करने की कोशिश की जा रही थी।

ATS ने उसका मोबाइल जब्त कर लिया है और फोरेंसिक जाँच शुरू कर दी गई है। मोबाइल डेटा, चैट रिकॉर्ड, सोशल मीडिया गतिविधियाँ, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और संपर्क सूची की जाँच की जा रही है। साथ ही बैंकिंग रिकॉर्ड और विदेशी फंडिंग के पहलू भी जाँच के दायरे में हैं।

देवबंद कनेक्शन और नईम की गिरफ्तारी से खुलीं नई परतें

फराज की निशानदेही पर उत्तर प्रदेश के देवबंद से नईम अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया गया। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, नईम की भूमिका फराज को विदेशी संपर्कों तक पहुँचाने और विचारधारात्मक रूप से जोड़ने में अहम मानी जा रही है। दोनों को कोर्ट में पेश करने के बाद 16 जून तक रिमांड पर भेजा गया है।

जाँच में यह भी सामने आया कि फराज ने देवबंद में मजहबी तालीम हासिल की थी और इसी दौरान उसकी मुलाकात नईम से हुई थी। बाद में दोनों संपर्क में बने रहे। ATS ने गुरुवार (11 जून 2026) की तड़के करीब 3:30 बजे भोपाल के काजी कैंप इलाके में फराज के घर पर कार्रवाई की।

करीब एक दर्जन अधिकारियों की टीम, जिसमें महिला पुलिसकर्मी भी शामिल थीं, पहले घर के पास पहुँची और फिर अंदर जाकर उसे हिरासत में लिया। अगले दिन उसके घर और जिस क्लीनिक में वह काम करता था, दोनों जगह ताले लगे मिले। फराज लंबे समय से बैटरी रिपेयरिंग का काम करता था और साथ ही एक क्लीनिक में कंपाउंडर के रूप में भी कार्यरत था।

स्थानीय पहचान, पारिवारिक जीवन और गतिविधियों की पड़ताल जारी

स्थानीय लोगों के अनुसार, फराज इलाके में मजहबी गतिविधियों में सक्रिय माना जाता था। बताया गया कि वह घर पर बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाता था और परिवार के साथ रहता था। कुछ लोगों ने यह भी बताया कि घर पर समय-समय पर मजहबी कक्षाएँ आयोजित होती थीं।

जाँच एजेंसियाँ अब उसके परिचितों, सामाजिक दायरे, कार्यस्थल और संपर्कों से जुड़े लोगों से पूछताछ कर रही हैं। यह भी जाँच की जा रही है युवाओं तक पहुँच बनाने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल किया गया और वास्तव में उससे कितने लोग जुड़े थे। फिलहाल एजेंसियाँ पूरे मामले की अलग-अलग एंगल से जाँच कर रही हैं।

कांग्रेस ने जिन कर्नल पुरोहित को बनाया ‘भगवा आतंकवाद’ का शिकार, अब बनेंगे ब्रिगेडियर: सेना ने दी मंजूरी, सहना पड़ा था अत्याचार


करीब 17 साल तक चले मालेगाँव ब्लास्ट केस में बरी होने के बाद भारतीय सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को अब बड़ी राहत मिली है। उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए मंजूरी दे दी गई है।

यह फैसला उस लंबे दौर के बाद आया है। जब वह आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए जेल में रहे, कोर्ट में लड़ाई लड़ी और अपने करियर को लगभग ठहरता हुआ देखा।

जुलाई 2025 में NIA की विशेष अदालत ने उन्हें और अन्य आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। इस केस में पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत कुल सात लोग आरोपित थे, जिन्हें अदालत ने दोषमुक्त कर दिया।

कर्नल पुरोहित ने अपने करियर को हुए नुकसान को लेकर आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक चले मुकदमे और हिरासत के कारण उन्हें सेना में प्रमोशन के अवसर नहीं मिल पाए।

ट्रिब्यूनल ने उनकी बात को गंभीरता से लेते हुए उनके रिटायरमेंट पर रोक लगा दी थी। अब जब उन्हें प्रमोशन की मंजूरी मिल गई है।

क्या था मालेगाँव ब्लास्ट मामला

मालेगाँव ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुआ था। रमजान के दौरान एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर लगाए गए बम में विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और लगभग 95 लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद देशभर में हड़कंप मच गया था और जाँच एजेंसियों पर भारी दबाव था कि जल्द से जल्द आरोपित को पकड़ा जाए।

शुरुआत में इस मामले की जाँच महाराष्ट्र ATS ने की और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में साल 2011 में जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई। इस केस में श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी समेत कई लोगों को आरोपित बनाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि यह एक संगठित साजिश थी, लेकिन अदालत में यह आरोप टिक नहीं पाए।

कैसे अदालत में कमजोर पड़ा पूरा केस

जब यह मामला अदालत में पहुँचा और गवाहों व सबूतों की जाँच शुरू हुई, तो धीरे-धीरे अभियोजन पक्ष का केस कमजोर होता चला गया। NIA कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।

कर्नल पुरोहित पर आरोप था कि वे कश्मीर से RDX लेकर आए थे और उसका इस्तेमाल इस धमाके में किया गया, लेकिन कोर्ट में यह तक साबित नहीं हो पाया कि वे उस समय कश्मीर में तैनात थे। उनके घर से भी कोई विस्फोटक सामग्री नहीं मिली। फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी आरडीएक्स के कोई निशान नहीं पाए गए।

इसी तरह साजिश से जुड़ी कथित बैठकों, कॉल रिकॉर्ड या किसी भी ठोस प्लानिंग का कोई प्रमाण अदालत में पेश नहीं किया जा सका। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सबूतों के अभाव में सभी आरोपितों को बरी करना जरूरी है।

कोर्ट ने क्या कहा

NIA की विशेष अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जो इस पूरे मामले की दिशा और निष्कर्ष को समझने के लिए बेहद अहम हैं। अदालत ने साफ कहा कि “आतंकवाद एक गंभीर अपराध है और इसे किसी भी धर्म या विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य संदेह से परे दोष सिद्ध करने के मानक पर खरे नहीं उतरते। कोर्ट ने कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया। उदाहरण के तौर पर, विस्फोटक सामग्री की जब्ती और उसके परीक्षण की प्रक्रिया में स्पष्टता का अभाव था।

कथित कबूलनामों को लेकर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपित से दबाव या प्रताड़ना के तहत बयान लिया गया है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में असंगतियाँ और विरोधाभास भी अदालत के सामने स्पष्ट रूप से सामने आए।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि केवल एक नैरेटिव या थ्योरी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इसी आधार पर सभी आरोपितों को बरी किया गया।

कर्नल पुरोहित को क्या-क्या झेलना पड़ा

लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के लिए यह मामला सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत, पेशेवर और मानसिक स्तर पर एक लंबा संघर्ष था। उनकी गिरफ्तारी नवंबर 2008 में हुई थी और उन्हें करीब 9 साल तक जेल में रहना पड़ा।

इस दौरान उनके खिलाफ मीडिया ट्रायल भी चला, जिससे उनकी छवि को काफी नुकसान पहुँचा। उनके परिवार को भी सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

कर्नल पुरोहित ने बाद में आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उनसे जबरन कबूलनामे लेने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी कहा कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक ऑपरेशन के तहत कुछ संगठनों के संपर्क में थे, लेकिन उनकी इस भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।

उनकी सेवा के दौरान मिलने वाले प्रमोशन और अन्य लाभ भी इस केस के चलते रुक गए। यही कारण था कि बरी होने के बाद उन्होंने AFT का रुख किया और अपने करियर की बहाली की माँग की।

भगवा आतंकवाद नैरेटिव और कॉन्ग्रेस की साजिश

इस केस के दौरान ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द काफी चर्चा में आया। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी और इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार किया गया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के बयानों को लेकर भी काफी विवाद हुआ। बाद में खुद शिंदे ने माना कि आतंकवाद को किसी धर्म या रंग से जोड़ना सही नहीं था।

अदालत ने भी अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी भी थ्योरी को केवल नैतिक आधार पर नहीं बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर ही साबित किया जाना चाहिए।

कांग्रेस (UPA) की नेतृत्व वाली केंद्र की तत्कालीन UPA सरकार ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जानबूझकर फँसाया था, जबकि सरकार को जानकारी थी कि वह ड्यूटी पर थे और खुफिया जानकारी जुटा रहे थे। हाल ही में सामने आए खुफिया दस्तावेजों से इसका खुलासा हुआ है।

मालेगाँव विस्फोट मामले में 2008 में गिरफ्तार किए गए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को उस समय की सरकार और मीडिया ने ‘हिंदू आतंकवाद‘ की विचार को स्थापित करने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को देशद्रोही बताया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस द्वारा ‘नो इनपुट अवेलेबल’ शब्द का इस्तेमाल सत्य के रूप में किया गया था। बाद में डीजीएमआई ने अधिक इनपुट के लिए परिणामी कार्यालयों को लिखा, लेकिन सरकार ने कोई फॉलोअप कार्रवाई नहीं की।

पेज 2 पर 4 लाइनें बताती हैं कि पूरा कांग्रेस नेतृत्व कर्नल पुरोहित के बारे में झूठ बोल रहा था। सेना के पत्र की लाइन 1 में कथित तौर पर निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक सोर्स नेटवर्क का संचालन कर रहे थे, जिसके माध्यम से उन्होंने खुफिया जानकारी प्राप्त की थी’। यह उस बात के विपरीत है, जिसे हमें यह मानने के लिए प्रेरित किया गया था कि ‘कोई इनपुट नहीं’ था।

दिल्ली ब्लास्ट के बाद UP सरकार का बड़ा कदम, मदरसों के बाहरी मौलाना-छात्रों का डेटा ATS को देना अनिवार्य

                 मदरसों के लिए बना नया नियम, ATS को देनी होगी जरूरी जानकारी (साभार: इंडिया टीवी)
कहते हैं "जहां न पहुंचे रवि, कहां पहुंचे कवि" जिसे 1958 में चरितार्थ किया कवि प्रदीप ने। प्रदीप के रचित इस गीत "कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से, संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से..." से तत्कालीन नेहरू सरकार इतनी भयभीत हो गयी कि इसके प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन उस प्रतिबंध को 1965 में हुए इंडो-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने। दूसरे, भारत में पल रहे गद्दारों को पकड़ने का शंखनाद शास्त्री जी ने कर दिया था। लेकिन उनके निधन के बाद मुस्लिम कट्टरपंथी और पाकिस्तानपरस्त नेताओं ने इस देशहित काम को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। 

अगर शास्त्री जी द्वारा देशहित के काम पर काम होता देश आतंकवाद, पत्थरबाज़ी और अब हुए दिल्ली ब्लास्ट नहीं होते। मुस्लिम कट्टरपंथियों को मालूम था कि हमारी हरकतों को बचाने हमारी गुलाम सियासती पार्टियां है। ये मुस्लिम कट्टरपंथियों की गुलाम पार्टियां जो पहलगाम में धर्म पूछकर महिलाओं को विधवा बनाने पर Operation Sindoor होने पर हत्यारों को पकडे जाने पर पूछने वाले आज दिल्ली ब्लास्ट करने वाले डॉक्टरों को भटका हुआ, गुमराह और बेगुनाह बताने वालों पर भी सरकार को कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं, पत्थरबाज़ी करने वालों में शामिल बच्चों को भी बच्चा समझ नहीं छोड़ना चाहिए। इन पर भी उसी तरह कार्यवाही करनी चाहिए जिस तरह बड़ों पर की जाती है। इन्हें आतंकवादियों का स्लीपर सेल मान कार्यवाही करनी होगी।         

दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके और इसमें फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन सामने आने के बाद पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट मोड पर हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए मदरसों की निगरानी को और मजबूत करने का फैसला किया है।

अब प्रदेश के सभी मदरसों, चाहे वे मान्यता प्राप्त हों या बिना मान्यता के, उसको अपने कर्मचारियों, मौलानाओं और छात्रों का पूरा विवरण ATS (Anti-Terrorism Squad) को उपलब्ध कराना होगा।

15 नवंबर 2025 को जारी एक पत्र में UP ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों (DWO) को निर्देश दिए कि वे अपने-अपने जिलों के सभी मदरसों के छात्रों और शिक्षकों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराएँ।

सरकार के अनुसार यह केवल सर्वे या साधारण जानकारी एकत्रित करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा ऑडिट है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे या मजहबी संस्थान में कोई संदिग्ध व्यक्ति छिपकर आतंकी गतिविधियाँ न चला सके।

इस कदम की पृष्ठभूमि में है अल-फलाह यूनिवर्सिटी का मामला, जिसमें विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को यह दिख चुका है कि एक निजी विश्वविद्यालय कैसे आतंक-संबंधी गतिविधियों के नेटवर्क के केंद्र के रूप में उभर सकता है।

यूपी सरकार ने मदरसों के लिए क्या नया नियम बनाया?

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के अनुसार, राज्य के सभी मदरसों, चाहे वो मान्यता प्राप्त हों या मान्यता प्राप्त ना हो, उसे यह सुनिश्चित करना है कि उन संस्थाओं में पढ़ने वाले सभी छात्रों तथा वहाँ कार्यरत मौलानाओं और शिक्षकों की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, मोबाइल नंबर, आधार-संख्या, स्थायी पता आदि की जानकारी UP ATS को समय-बद्ध रूप से उपलब्ध कराई जाए।
इसमें छात्रों के नाम, उनके पिता के नाम, पते और मोबाइल नंबर जैसी जानकारियाँ शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे का इस्तेमाल असामाजिक या आतंकी गतिविधियों के लिए न हो सके। फिलहाल यह आदेश सिर्फ इन आठ जिलों के लिए लागू किया गया है।
प्रयागराज के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि जिले के लगभग 206 मदरसों की जानकारी ATS को भेज दी गई है और अब इन जानकारियों का जमीनी सत्यापन शुरू हो चुका है।
इस आदेश को लेकर यूपी पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बताया कि पहले भी प्रदेश के कई मदरसों में अवैध गतिविधियों के मामले सामने आए हैं, इसलिए यह निगरानी जरूरी है।

 उन्होंने कहा, “समय-समय पर मदरसों से अलग-अलग मामले सामने आते रहते हैं। जैसे, प्रयागराज में करेंसी छापने के मामले सामने आए, और इसी तरह कुशीनगर में भी। बहराइच में विदेशियों और बाहरी लोगों के मदरसों में रहने का इंतजाम पाया गया। इसी तरह, हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके में एक डॉक्टर का नाम सामने आया और उसके आधार पर जाँच शुरू हुई।”

इस आदेश में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह सिर्फ डेटा जमा करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक सुरक्षा-ऑडिट है, ताकि किसी भी मदरसे में बाहरी राज्यों या देशों से आने वाले छात्रों-मौलानाओं की आवाजाही, संदिग्ध गतिविधियाँ व सुरक्षा-रिस्क पहले-से पकड़ी जा सके।

मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार की कोशिशें

इस दिशा में यूपी सरकार का दृष्टिकोण सिर्फ सुरक्षा-निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह प्रयास भी करने लगी है कि मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक स्वीकार्यता के साथ जोड़ा जाए।
मदरसों में पढ़ने-वाले छात्रों व वहाँ पढ़ाने-वाले मौलानाओं की जानकारी जुटाना और ATS को उपलब्ध कराना: इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होगा कि मदरसे सिर्फ मजहबी शिक्षा का केंद्र न बनें बल्कि उनकी संरचना, छात्र-छात्राओं की पृष्ठभूमि और भविष्य-संभावनाएँ भी ज्ञात हों।
बाहर-राज्यों या विदेशी छात्रों की आवाजाही पर विशेष ध्यान देना: यह देखा जा रहा है कि कुछ मदरसों में बाहरी राज्यों से आए छात्रों की संख्या काफी अधिक है, जिसे अब खुफिया एजेंसियों ने सन्देह के घेरे में लिया है।
मदरसों को आधुनिक पाठ्यक्रम अपनाने, मान्यता प्राप्त करने, मुख्यधारा की शिक्षा-संस्थाओं से तालमेल बिठाने की दिशा में प्रेरित करना: ताकि मदरसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से स्वीकार्य बने और उनके छात्र आगे-व्यावसायिक या विश्वविद्यालय-स्तर पर भी सहजता से आगे बढ़ सकें।

अवैध मदरसों पर कार्रवाई और दिल्ली ब्लास्ट के बाद जाँच-तेजी

मदरसों पर निगरानी पहले से चल रही थी, लेकिन हाल के में सामने आई घटनाओं, विशेष रूप से 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए ब्लास्ट ने जाँच-प्रक्रिया को और अधिक तीव्र कर दिया है।
इस ब्लास्ट के बाद राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों ने निर्देश दिया कि मजहबी और शैक्षणिक संस्थानों में आने-जाने वालों की पहचान और आवाजाही पर विशेष नजर रखी जाए। इसी सिलसिले में यूपी ATS ने मदरसों से डेटा जमा करने का अभियान शुरू किया है।
इसका मतलब यह है कि अब मदरसों के कार्य-प्रभावों के साथ-साथ, सुरक्षा-विचारों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है, ताकि कोई भी संस्थान अनियंत्रित रूप से आतंकी गतिविधियों का माध्यम न बने।
दिल्ली के लालकिले धमाके के बाद से सुरक्षा एजेंसियों की नजर फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी पर टिकी हुई है। इस यूनिवर्सिटी को संदेह के घेरे में रखा गया है क्योंकि यहाँ कई ऐसे प्रोफेसर और बाहरी लोग सक्रिय पाए गए हैं, जिन पर आतंकियों को पनाह देने और उनके साथ मिलकर खुफिया तौर पर गतिविधियाँ करने का शक है।

मुस्लिम और विपक्ष कर रहा नए नियम का विरोध

मदरसों के लिए बनाए गए इन नियमों का मुस्लिम लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सरकार उनकी प्रोफाइलिंग करने की कोशिश कर रही है। जबकि एजेंसियाँ पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि यह सब कुछ केवल सुरक्षा की दृष्टि से किया जा रहा है।
वहीं इस कार्रवाई पर विपक्ष ने भी नाराजगी जताई है। कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शहजाद आलम ने कहा कि सरकार सुरक्षा के नाम पर डर पैदा कर रही है और हर मुस्लिम को शक की निगाह से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अगर ATS इतनी जाँच कर रही है तो उसे अपने मामलों के नतीजों पर भी श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, क्योंकि कई मामलों में कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अमीक जामेई ने भी कहा कि देश आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह एकजुट है, लेकिन मदरसों को ATS से जाँच के दायरे में लाना अनावश्यक कदम है और इससे भ्रम और माहौल खराब होगा।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब एक मकान मालिक किसी नए किराएदार को घर में रहने की अनुमति देता है तो उससे पहले उससे न सिर्फ उसकी जानकारी लेता है बल्कि कुछ जरूरी दस्तावेज भी अपने पास जमा करवाता है। जाहिर सी बात है कि अगर मदरसों में देश के नहीं बल्कि बाहरी छात्रों की संख्या भी अधिक देखने मिल रही है, तो ऐसे में उनकी जानकारी आवश्यक है।
उस पर अल-फलाह जैसे विश्वविद्यालयों से सामने आ रही कश्मीरी छात्रों की संख्या, विश्वविद्यालय के अंदर पढ़ा रहे जिहादी प्रोफेसर इन नियमों को लागू करना और भी आवश्यक बना देते हैं।

अफगानिस्तान जाकर ISKP में शामिल होने वाले थे सुमैरा बानो समेत 4 कश्मीरी आतंकी, गुजरात ATS ने पोरबंदर से किया गिरफ्तार

मेरी उम्र के जितने भी है उनको 1965 में इंडो-पाक युद्ध के दौरान चर्चित गायक मोहम्मद रफ़ी ने तब बहुचर्चित एक गैर-फ़िल्मी देशभक्ति गीत "कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से, संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से..." जिसे पाकिस्तानपरस्त और मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले नेताओं और पार्टियों ने नज़रअंदाज़ तो कर दिया लेकिन 60 सालों बाद भी वही गीत चीख-चीखकर देश के सामने सच्चाई ला रहा है। दूसरे, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान में भूतपूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो कहते थे कि "भारत के साथ हज़ार सालों तक लड़ते रहेंगे।", इतना ही नहीं बटवारे के समय पाकिस्तान जाते समय मुसलमानों का नारों का था "हंस के लिए पाकिस्तान लड़के लेंगे हिन्दुस्तान", पाकिस्तान के हुक्मरान आज तक इस जहनियत पर चल रही है, जबकि हमारे पाकिस्तानपरस्त नेता और उनकी पार्टियां पाकिस्तान के साथ खड़ी नज़र आ रही है। आखिर हमारे ऐसे नेता और उनकी पार्टियां कब तक भारतीयों की जानों से खिलवाड़ करते रहेंगे। 

गुजरात एटीएस ने इस्लामिक आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया। इस मामले में 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिसमें एक महिला भी शामिल है। इनमें से तीन श्रीनगर के रहने वाले हैं जबकि महिला सूरत की रहने वाली है। पुलिस ने उसके सूरत स्थित आवास पर छापेमारी कर जिहादी साहित्य सामग्री और एक टैबलेट भी जब्त किया है।

गुजरात के गृहमंत्री हर्ष सांघवी ने गुजरात पुलिस को टेरर मॉड्यूल का पता लगाने के लिए तारीफ की है।

एटीएस को मिली जानकारी के अनुसार, पकड़े गए सभी आरोपी आईएस आतंकी मॉड्यूल से जुड़े थे। शुक्रवार (7 नवंबर 2025) देर रात पोरबंदर में डीआईजी दीपन भद्रन और एसपी सुनील जोशी की अगुवाई में पुलिस ने कार्रवाई शुरू हुई और आतंकियों को गिरफ्तार किया।

ये लोग अफगानिस्तान भागने की फिराक में थे। वहाँ से ISIS से जुड़े संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ़ खुरासान (ISKP) में शामिल होने की योजना बना रहे थे। पोरबंदर पहुँचने के बाद इनलोगों ने एक नाव किराए पर लेने की योजना बनाई।

पुलिस ने बताया कि छापेमारी के दौरान तीनों कश्मीरी आरोपियों के पास से जिहादी साहित्य से जुड़ी सामग्री बरामद किए।

पुलिस ने मोबाइल फोन से सुमैरा बानो के सूरत के घर पर छापेमारी की। जहाँ से एक टैबलेट के साथ जिहादी साहित्य बरामद की गई। आरोपित पोरबंदर में मजदूरी कर रहे थे। इस दौरान ये लोग मछली पकड़ने वाली नावों पर कैप्टन और जीपीएस को कॉओडिनेट करते थे। पुलिस ने गिरफ्तार कर इनके पास से कई हथियार भी जब्त किए।

पुलिस ने यह भी खुलासा किया कि पिछले एक साल से आरोपित आतंकवादी संगठनों के संपर्क में थे।

गुजरात ATS का खुलासा :जिस जहर से डोनाल्ड ट्रंप को मारने की हुई थी साजिश, उसी के इस्तेमाल की थी तैयारी

जिस तरह अब जिन आतंकियों को पकड़ा जा रहा है वह कोई बेरोजगार या पंचर लगाने वाले नहीं शिक्षित सामने आ रहे हैं। जो कहते हैं कि आतंकवाद का कोई मजहब/धर्म नहीं होता, बताएं इन आतंकियों का कौन-सा मजहब है। आखिर भारत में बैठे इनके आका जिन्हें हम भावी नेता कहकर सम्मान देते कुछ बोलेंगे। क्या ऐसे नेताओं का सामाजिक बहिष्कार करने का भी समय आ गया है? अपना नाम छुपाकर हिन्दू देवी-देवताओं का नाम रख ढाबे चलाने वालों को जब अपना असली नाम लिखने को कहने पर पाखंडी नेता और सुप्रीम कोर्ट भी बचाव में खड़ी हो जाती है। लेकिन सच्चाई को छुपाने में सुप्रीम कोर्ट का अपराधियों के साथ खड़े होने का ही अंजाम है कि भारत में आतंकवाद पनप रहा है।       

हादसे और विस्फोटक पदार्थों के साथ पकड़े गए लोगों के नाम और पेशे पढ़ रहा था- ना जाने कितने डॉक्टर है, सब पढ़े लिखे है। फ़ोटो वाला आदमी भी डॉक्टर है जो ज़हर बनाने की तैयारी में जुटा था। ऐसे डॉक्टर भी समाज में एक्सिस्ट करते है जिनकी शक्ल देख कर ही आम इंसान पास ना फटके- किंतु है ये डॉक्टर ही।
जब खबरें आती हैं — डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर जैसे शिक्षित लोग विस्फोटक बनाते पकड़े जाते हैं — तो दिल एक अजीब सवाल पूछता है: क्या शिक्षा वाक़ई इंसान को विवेक देती है, या सिर्फ़ साधन देती है जिसके सहारे वह अपने अंधविश्वास को और नुकीला बना लेता है?
अब यदि कोई बोले- शिक्षा की कमी से ये कट्टरपन पनपता है- तो एक बार फिर ये बात सरासर ग़लत साबित हुई है। क़ौम के किसी नेता, बड़े आदमी, सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर, लंबरदार, मज़हबी आलिम ने एक भी बयान जारी कर इस सब की भर्त्सना नहीं की, एक शब्द भी नहीं कहा- ये लोग हमारे समुदाय को रिप्रेजेंट नहीं करते। माफ़ी तो घुस गई ऐसी तैसी में, उल्टे कुतर्क देने में लगे है कि आरडीएक्स नहीं अमोनियम नाइट्रेट था, सिलिंडर फटा है, सरकार क्या कर रही थी, मंत्री क्या कर रहे थे, गुप्तचर एजेंसी क्या कर रही थी। तमाम बहाने किंतु एक भी शब्द संवेदना का नहीं, एक भी अल्फ़ाज़ माफ़ी का नहीं, एक भी हर्फ़ अफ़सोस का नहीं।
और ऐसा ना होने के पीछे सबसे बड़ा कारण है- बहुसंख्यक समाज के चुनिंदा सेक्युलर लोग जो अब भी उस पक्ष के लिए बैटिंग कर रहे है, चुनाव के लिए ये विस्फोट करवाया गया, जैसे इल्ज़ाम लगा रहे है। जब सब नाम पेशे वाले लोग फ़ोटो समेत मीडिया में घूम रहे है- उसके बावजूद भी बेशर्मी से बहुसंख्यक सेक्युलर इन्हें वो कवर फायर दे रहे है जिसे अनेकों वर्षों से बढ़िया इस्तेमाल किया जा रहा है।
गुजरात एटीएस ने देश में बड़े आंतकी हमले की साजिश रच रहे संदिग्धों के पास से राइसिन (ricin) को बरामद किया है। यह वही जहर जिससे दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति डोनाल्ड ट्रंप को मारने की कोशिश की गई थी। राइसिन को बेहद खतरनाक जहर माना जाता है। दुनिया में इसकी कोई दवा नहीं है। सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप ही नहीं बल्कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी राइसिन के जरिए मारने की कोशिश हुई थी। इस जहर को दो बार लिफाफों में भेजा गया था। गुजरात एटीएस की गिरफ्त में आए तीन संदिग्धों में एक जहां एमबीबीएस डॉक्टर है तो वहीं अन्य में एक छात्र और दूसरा सिलाई का काम करता है।

कैसे तैयार होता है रिसिन?
अरंडी के बीच में जहरीला प्रोटीन राइसिन पाया जाता है। अरंडी के एक बीच यह 5 से 10 फीसदी तक हो सकता है। यह जहर शरीर की जिस कोशिका के संपर्क में आता है। उसके अंदर प्रोटीन सिंथेसिस को बंद कर देता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस जहर से अगर किसी तरीके से व्यक्ति बच भी जाए तो उसके अंग काम करने बंद कर देते हैं। दुनिया में अभी कोई इस जहर से बचाने के लिए कोई एंटीडोट नहीं बनी है। इस जहर की सबसे खास बात यही है कि इसे बनाना बेहद आसान है। केमिस्ट्री की ठीक-ठाक जानकारी रखने वाला कोई भी आम इंसान इसे बना सकता है. इसके लिए ना किसी हाई-फाई केमिकल की जरूरत होती है, और ना ही इक्विपमेंट्स से लैस हाई-टेक लैब की। एटीएस अधिकारी के अधिकारी के अनुसार हैदराबाद के डॉ. अहमद मोहियुद्दीन सैयद ने बड़ी मात्रा में राइसिन तैयार किया था। वह अपने पाकिस्तान स्थित आकाओं से आतंकवादी हमले में बड़े पैमाने पर जनहानि के लिए इसका इस्तेमाल करने के निर्देश का इंतज़ार कर रहा था। अधिकारी ने कहा आरोपी से पूछताछ की जा रही है।
इस बार साजिश इतनी प्रचंड थी कि यदि आतंकी सफल हो जाते तो समूचा विश्व एक ऐसा विनाश भारत में देखता जिसे आज तक कभी सोचा भी न गया हो मगर दुआएं दीजिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिनकी सजग चौकीदारी की वजह से आप और आपका परिवार एक बहुत बड़े विनाश से सुरक्षित बच पाया है। 

Gujarat ATS Arrested Hyderabad Doctor
                        डॉ. अहमद मोहिउद्दीन सैय्यद पर जहर बनाने का है आरोप 
गुजरात एटीएस के शिकंजे में आए संदिग्ध
1. अहमद मोहिउद्दीन सैय्यद (35)
पेशा: डॉक्टर, पता: पहली मंजिल, अशद मंजिल, स्ट्रीट नंबर 9, फोर्टव्यू कॉलोनी, स्कोडा शोरूम के सामने, राजेंद्रनगर, हैदराबाद, तेलंगाना।
2. आज़ाद सुलेमान शेख (20)
पेशा: सिलाई का काम, पता: क़स्बा जिंजाना, शेखा मेदान, सलारा, तालुका: कैराना, जिला: शामली, उत्तर प्रदेश।
3. मोहम्मद सुहैल मोहम्मद सलीम खान (23)
पेशा: छात्र, पता: वार्ड नंबर 1, पश्चिमी चमरौधा, कस्बा सिंगाही कलां, तालुका: निघासन, जिला: लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश।

इस बार कोई छोटी मोटी मछली नहीं बल्कि गुजरात ATS ने 11 नवंबर को आतंकी डॉक्टर मोहिउद्दीन के रूप में बहुत बड़े मगरमच्छ को पकड़ा है जिसने कैस्टर ऑयल से रेज़िन नाम का ऐसा तरल पदार्थ बनाया जो साइनाइड से भी 600 गुना ज़्यादा खतरनाक है। इस रेजिन की न तो कोई गंध है और न ही कोई स्वाद यदि इस रेजिन को फल सब्जियों के अंदर या मांस मछली के अंदर इंजेक्ट करके हिन्दू बाहुल्य क्षेत्रों में यदि बेच दिया जाता तो क्या हश्र होता? यह जनसंहार सीधे सीधे मोदी जी के स्वर्णिम कार्यकाल पर एक बदनुमा दाग लगा जाता

गुजरात ATS के डिप्टी एसपी एस एल चौधरी को कुछ समय पहले एक खुफिया टिप मिली कि देश में खतरनाक आतंकी मॉड्यूल एक्टिव हो रहा है। अब पूरे भारत में कौन कहां कहां एक्टिव है यह मालूम करना भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। मगर जब टिप के आधार पर जांच की गई तो पता चला कि कोई आंध्र प्रदेश का एक शख्स संदिग्ध है

उस संदिग्ध को मॉनिटर कर 24X7 निगरानी की गई शुरू में तो ये मेहनत बेकार लगी मगर एक दिन कुछ चीजे इनपुट से मेल खाती दिखी तो एक डॉक्टर का पता चला निगरानी और बढ़ाने पर उसका नाम डॉ मोहिउद्दीन अहमद सैयद मालूम हुआ। उसकी लोकेशन सर्विलांस पर लगा दी गई एक दिन उसकी लोकेशन गुजरात के मेहसाना से अहमदाबाद की तरफ मिली जिसके बाद गुजरात ATS एक्टिव हो गई

गुजरात ATS ने अड़ालज टोल प्लाजा पर घेराबंदी कर दी और एक फोर्ड गाड़ी को रोका। पूछताछ में गाड़ी में मौजूद उस शख्स ने अपना वही नाम बताया जिसकी निगरानी काफी समय से ATS कर रही थी। ATS ने तुरंत उसका फोन अपने कब्जे में लेकर फोन की जांच करनी शुरू की तो उसमें काफी डेटा डिलीट मिला जिसे रिकवर कर लिया गया। मगर कुछ ऐप डिलीट नहीं हो सकी थी क्योंकि डॉक्टर सैयद को ये अंदेशा ही नहीं था कि वो इस तरह से पकड़ा भी जाएगा। फोन की जांच से पता चला कि डॉक्टर अफगानिस्तान से ऑपरेट हो रहे ISIS के ही एक ग्रुप ISKP के कुछ बड़े लोगों के साथ कनेक्टेड था और उसके आका यानि आमिर का नाम 'अबू खदिजा' है

गाड़ी की चेकिंग के दौरान उसमें तीन हथियार मिले जिसमें दो Glock पिस्टल, एक बेरेट पिस्टल और 30 जिंदा कारतूस मिले पर इसके साथ 10 लीटर केमिकल भी मिला। पूछताछ में डॉक्टर ने बताया कि इस केमिकल से वो रेजिन बना रहा था जो केस्टर बीन्स से बनता है

हथियार के बारे में पूछताछ करने पर दो नाम सामने आए आजाद सैफी और मोहम्मद सुहेल जो कि उत्तर प्रदेश के रहने वाले है दोनों को ट्रेस करने पर उनकी लोकेशन राजस्थान बोर्डर के पास बनासकांठा में मिली जिसके बाद तुरंत दोनों को वहां से गिरफ्तार किया गया। इन दोनों ने ये सभी हथियार राजस्थान के हनुमानगढ़ी से लिए थे जिसे पाकिस्तानी शख्स ने ड्रोन की सहायता से पाकिस्तान से हथियार पहुंचाए थे

यह सभी किसी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने वाले थे इन सभी ने दिल्ली, लखनऊ और अहमदाबाद की रेकी की थी हमला कब कहाँ कितने बजे करना था? 

जहरीले केमिकल का इस्तेमाल कैसे और कहां-कहां किस पर करने वाले थे? बाकी कौन-कौन लोग इस हमले में शामिल है? किस-किस शख्स ने क्या-क्या मदद इन्हें इस हमले को करने के लिए दी, यह सभी सवाल अभी फिलहाल गुजरात ATS की डायरी में दर्ज है

आप सिर्फ कल्पना कीजिए कि देश किन हालातों में सांस ले रहा है और यदि नरेंद्र मोदी जैसा चौकीदार भारत की रक्षा न कर रहा होता तो आज क्या अंजाम होता? इसलिए चौकस रहिए क्योंकि वो ठान चुके हैउत्तर प्रदेश के 2027 चुनाव से पूर्व कुछ भी बड़ा करने की 2027 तक का ये समय बेहद संभल कर चलने का है 

मालेगाँव ब्लास्ट केस में ATS अधिकारी शेखर बागड़े ने बनाए थे फर्जी सबूत, NIA कोर्ट ने दिए जाँच के आदेश

मालेगाँव विस्फोटकेस में गुरुवार (31 जुलाई 2025) को मुंबई की एक विशेष NIA कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित सहित कुल 7 आरोपियों को बरी कर दिया है। वहीं अब विशेष जज एके लाहोटी ने आरोपितों को फँसाने के लिए झूठे सबूत पेश करने के आरोप में ATS के ACP शेखर बागड़े के खिलाफ जाँच के आदेश दिए हैं।

इस केस की शुरुआती जाँच महाराष्ट्र ATS ने की थी, लेकिन 2011 में मामला NIA को सौंपा गया। जाँच के दौरान दो सेना अधिकारियों ने बताया कि ATS के अधिकारी (अब ACP) शेखर बगड़े 3 नवंबर 2008 को आरोपित सुधाकर चतुर्वेदी की गैरमौजूदगी में उनके घर में घुसे थे। दोनों सैन्य अधिकारियों ने गवाही दी कि बगड़े ने वहाँ चुपचाप जाकर RDX जैसे विस्फोटक रखे, और उन्हें यह बात किसी को न बताने को कहा।

दो दिन बाद ATS की टीम ने उस घर पर छापा मारा और RDX मिलने का दावा किया। NIA की जाँच और कोर्ट में दी गई जानकारी से यह स्पष्ट हुआ कि बगड़े ने घर में जबरन घुसकर फर्जी सबूत रखे थे। कोर्ट ने कहा कि ATS की तरफ से इस मामले में कोई संतोषजनक सफाई नहीं दी गई और पूरे मामले में ‘सबूतों की प्लांटिंग’ की आशंका है।

इतना ही नहीं कोर्ट को यह भी पता चला कि विस्फोट के कथित घायलों के मेडिकल सर्टिफिकेट बिना मान्यता प्राप्त डॉक्टरों से बनवाए गए थे। कुछ सर्टिफिकेट जानबूझकर बदले भी गए थे। कोर्ट ने इस पर भी जाँच का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही 2017 में कर्नल पुरोहित को जमानत देते हुए बगड़े की संदिग्ध भूमिका पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा था कि आर्मी की जाँच में भी अलग कहानी सामने आई थी और बगड़े का आरोपित के घर में जाना सवाल खड़ा करता है।

अब कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि ATS और NIA दोनों ही आरोपितों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं ला सके और पूरा मामला संदेह के घेरे में है। कोर्ट का 1000 पन्नों का यह फैसला महाराष्ट्र के DGP, ATS प्रमुख और NIA को भेजा गया है ताकि फर्जी सबूत और मेडिकल रिकॉर्ड की गहराई से जाँच हो सके।

ATS ने जाँच में कैसे की गड़बड़ी?

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूशन) किसी भी आरोपित के खिलाफ ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया। कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि ATS यह साबित नहीं कर पाई कि धमाके में इस्तेमाल की गई बाईक प्रज्ञा ठाकुर की थी।

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि प्रज्ञा ठाकुर धमाके से कम से कम दो साल पहले ही साध्वी बन चुकी थीं और अभियोजन यह नहीं दिखा सका कि उनका धमाके की साजिश से कोई संबंध था। कर्नल पुरोहित के मामले में भी अदालत ने कहा कि कोई ऐसा सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि उनके घर में कभी विस्फोटक सामग्री रखी गई थी।

जाँच एजेंसी ने मूलभूत जाँच प्रक्रियाओं का भी पालन नहीं किया। उदाहरण के तौर पर, जिस कमरे में विस्फोटक रखने का दावा किया गया, उसकी स्केच तक नहीं बनाई गई और फॉरेंसिक सैंपल भी दूषित (contaminated) पाए गए।

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कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘अभिनव भारत’ नाम की जिस दक्षिणपंथी संस्था की बात की गई थी, जिसे प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित से जोड़ा गया था, उसके बारे में भी यह साबित नहीं हो सका कि वह किसी आतंकवादी गतिविधि में शामिल थी या उसके फंड का इस्तेमाल इस तरह के कामों के लिए हुआ था।

एक साध्वी को पोर्न दिखाने, अंडा खिलाने, निर्वस्त्र करने वाले पुरुष पुलिस वालों को दंड कब? रात भर पिटाई, रीढ़ की हड्डी तोड़ दी, 24 दिनों तक रखा भूखा… आज भी ‘कांग्रेस का टॉर्चर’ भोग रहीं प्रज्ञा सिंह ठाकुर

                   साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर (फाइल फोटो- facebook- sadhvi pragya singh thakur)
मालेगांव ब्लास्ट पर जुलाई 31 को आया निर्णय मामूली निर्णय नहीं। इन निर्णय ने कांग्रेस ही इसकी सारी समर्थक पार्टियों UPA से लेकर INDI गठबंधन सभी को बेनकाब कर दिया है। इतना ही नहीं, हिन्दू और मुसलमान सभी के लिए आंखे और दिमाग खोलने वाला है। किस तरह देश में हिन्दू-मुस्लिम फसाद बनाये रखा था। जो पार्टियां अपने धर्म की नहीं हो सकती किसी की नहीं हो सकती। हिन्दुओं कांग्रेस, वामपंथियों और INDI गठबंधन को वोट देने से पहले इन फसादी पार्टियों से पूछो कि क्या कसाब समेत जितने भी इस्लामिक आतंकवादियों को पकड़ जेलों में रखने पर उन्हें हलाल खिलाया था या झटका? जब उनके मजहब देखते हुए हलाल परोसा गया फिर एक साध्वी को अंडा खिलाकर क्यों साध्वी की सात्विकता को बर्बाद किया? किसके कहने पर ऐसा घिनौना अत्याचार किया गया था? जब साध्वी एक महिला थी फिर क्यों पुरुष पुलिस कर्मियों को उसे निर्वस्त्र करने को कहा गया? क्या देश में महिला पुलिसकर्मियों का अकाल पड़ गया था? 
समाचार है कि इस फैसले के खिलाफ कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट जाने का प्लान कर रहे हैं, हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट उपरोक्त प्रश्नों का भी जवाब इन हिन्दू विरोधियों, ATS और सरकार से पूछे। साध्वी प्रज्ञा कसूरवार थी या नहीं एक महिला थी। क्यों एक महिला वो भी एक साध्वी को पोर्न दिखाई?   

  

मालेगाँव ब्लास्ट 2008 मामले में NIA की विशेष अदालत ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत सभी 7 आरोपितों को बरी कर दिया है। 17 वर्षों बाद भले ही ‘भगवा आतंकवाद’ की कहानी झूठी साबित हो गई हो लेकिन आरोपित बनाई गईं साध्वी प्रज्ञा को मिली प्रताड़ना कांग्रेस के काले कारनामों का चिट्ठा दिखाती है।

कोर्ट के निर्णय आने के बाद साध्वी प्रज्ञा ने जज के सामने अपनी बात भी रखी। उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा ही कहा कि जिन्हें भी जाँच के लिए बुलाया जाता है, उसके पीछे कोई आधार होना चाहिए। मुझे बिना किसी आधार के जाँच के लिए बुलाया गया और गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया गया। मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो गया। मैं एक साधु का जीवन जी रही थी, पर मुझे फँसाकर झूठे आरोप लगाए गए। कोई भी हमारे साथ खड़ा होने को तैयार नहीं था।”

अपनी बात जारी रखते हुए साध्वी प्रज्ञा ने आगे कहा, “मैं जिंदा हूँ क्योंकि मैं एक संन्यासी हूँ। एक साजिश के तहत भगवा को बदनाम किया गया। आज भगवा की जीत हुई है, हिंदुत्व की जीत हुई है और ईश्वर उन आरोपितों के दंड देगा। हालाँकि, जिन्होंने भारत और भगवा को बदनाम किया, उन्हें अभी तक आपने गलत साबित नहीं किया है।”

गौरतलब है कि 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगाँव में भिक्खू चौक मस्जिद के पास धमाका हुआ। मोटरसाइकिल में बांधकर किए गए इस धमाके में 6 लोग मारे गए थे और 100 से भी अधिक लोग घायल हुए थे। इसके तहत साध्वी प्रज्ञा समेत 7 लोगों पर UAPA, आतंकवाद, आर्म्स एक्ट और IPC की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। 17 वर्षों तक इसे लेकर मुकदमा चला। 323 गवाह पेश किए गए। इनमें से 37 गवाह अपने बयान से मुकर गए। इसके अलावा बचाव पक्ष के भी 8 गवाह पेश हुए।

प्रताड़ना के 17 वर्ष

मध्य प्रदेश के भोपाल से भाजपा की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा को ब्लास्ट के बाद 23 अक्टूबर 2008 को ATS ने गिरफ्तार किया। साध्वी प्रज्ञा पर आरोप लगा कि विस्फोट में इस्तेमाल की गई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल के इंजन और चेसिस नंबर से पता चला कि वह बाइक साध्वी प्रज्ञा के नाम पर रजिस्टर्ड थी। हालाँकि रजिस्ट्रेशन नंबर फर्जी पाया गया था।

महाराष्ट्र ATS ने दावा किया था कि उस मोटरसाइकिल का इस्तेमाल विस्फोटक लगाने के लिए किया गया और इसी आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया। इस दौरान उन्हें इस कदर प्रताड़ित किया गया कि मेडिकल इमरजेंसी के तहत वह वेंटिलेटर तक पहुँच गईं।

अप्रैल 2011 में यह मामला राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया, जिसने ATS की जाँच में कई खामियाँ पाईं। NIA ने अपनी जाँच में ये भी कहा कि मोटरसाइकिल भले ही प्रज्ञा के नाम पर थी, लेकिन उसका इस्तेमाल रामचंद्र कलसांगरा नामक फरार आरोपित कर रहा था।

UAPA के तहत साध्वी पर की गई कार्रवाई भी दोषपूर्ण मानी गई। NIA ने जब जमानती वारंट जारी किया तब साध्वी प्रज्ञा ने साल 2020 में अपने साथ हुए अमानवीय व्यवहार को लेकर रिपब्लिक टीवी को एक साक्षात्कार दिया।

इसमें उन्होंने बताया था कि मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह के सामने 3-4 पुलिसकर्मियों ने उन्हें बहुत अधिक प्रताड़ना दी थी। उन्हें हिरासत में लेकर पूरी रात बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और उन्हें वेंटिलेटर पर जाना पड़ा था।

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने बताया कि हिरासत के दौरान उनको पुरुष कैदियों के साथ रखकर पॉर्न वीडियो दिखाया जाता था और साध्वी होने का लिहाज किए बिना उनसे भद्दे सवाल किए जाते थे। उन्होंने बताया था कि पहले उनको भगवा आतंकी कहा गया, फिर भारत को आतंकवादी देश घोषित करवाने का प्रयास किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये सारा षड्यंत्र कॉन्ग्रेस का था।

भूख, मार और बिजली के झटके

साध्वी प्रज्ञा ने बताया था कि उन्हें चमड़े की बेल्ट से पीटा जाता था। उन्हें 24 दिनों तक भूखा रखा गया था। उनको बिजली के झटके दिए जाते थे। गाली-गलौज तो उनके साथ आम बात हो गई थी। उनको लगातार पीटने के लिए 5-6 पुलिस वाले लगाए जाते थे और जब वह थक जाते थे तो दूसरे पुलिसकर्मी उनको पीटने लग जाते थे। इनके पैरे के तलवे तक में बेल्ट से पीटा गया। पिटाई के दौरान उनका पूरा नर्वस सिस्टम सुन्न पड़ जाता था।

साध्वी प्रज्ञा की यातनाएँ सिर्फ बेल्ट की मार तक ही सीमित नहीं रहीं थीं। उन्हें उल्टा लटकाकर मारा जाता था और हाथों को गर्म पानी में नमक डालकर डुबोया जाता था। हाथ फट जाते थे तो जख्मों पर नमक छिड़का जाता था।

उन्होंने बताया कि जेल में उन्हें इतनी गंदी-गंदी गालियां दी जाती थीं जिन्हें कोई स्त्री सुन भी नहीं सकती। उन्हें निर्वस्त्र किए जाने की बार-बार धमकी दी जाती थी। भोजन में उन्हें अंडा खाने के लिए मजबूर किया जाता था जबकि वे शाकाहारी हैं।

साध्वी प्रज्ञा को मिली प्रताड़नाओं से उनके पूरे शरीर में सूजन आ गई थी। कई हिस्सो में पस पड़ गया था। आज भी वह कई शारीरिक परेशानियों से जूझ रही हैं। उन्हें कैंसर और न्यूरो की बीमारी तक हो गई। अपनी प्रताड़ना के बारे में बताते हुए साध्वी प्रज्ञा कोर्ट में रो पड़ी थीं।

अवलोकन करें:-

आज जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत सभी आरोपितों के बरी किया गया तो साध्वी ने कहा कि षडयंत्र के तहत भगवा को बदनाम किया गया, आज हिंदुत्व की जीत हुई है।