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क्या The Hindu भारत विरोधियों के साथ है? The Hindu, दिल्ली को दहलाने वाले TERRORIST हैं… आदमी-आरोपित या संदिग्ध नहीं: वामपंथी मीडिया कब सुधारेगी अपनी भाषा, आतंकियों की पहचान छिपाने का इतिहास बहुत पुराना

                                   द हिंदू ने अपनी खबरो में दिल्ली ब्लास्ट के आतंकियों को अक्यूज लिखा है
दिल्ली के रेड फोर्ट के पास 10 नवंबर 2025 को हुए भयानक कार ब्लास्ट ने पूरे राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया। एक सफेद ह्युंडई i20 कार में भारी मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट और अन्य विस्फोटक लादकर सुसाइड बॉम्बर डॉक्टर उमर उन नबी ने धमाका किया। इस धमाके में 15 निर्दोष लोग मारे गए और 20 से अधिक घायल हुए।

दिल्ली पुलिस ने तत्काल यूएपीए और एक्सप्लोसिव्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया, जबकि केंद्र सरकार ने इसे साफ तौर पर आतंकी हमला घोषित कर दिया। एनआईए की जाँच में सामने आया कि उमर पुलवामा का डॉक्टर था, जो फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर था और जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवात-उल-हिंद जैसे इस्लामिक मिलिटेंट ग्रुप्स से जुड़ा था।

उसके सहयोगी डॉक्टर मुजम्मिल अहमद गनई, अदील मजीद राथर, शकील और शाहीन सईद भी गिरफ्तार हुए, जो ‘टेरर डॉक्टर्स’ के नेटवर्क का हिस्सा थे। इस घटना ने ‘व्हाइट-कॉलर टेररिज्म’ को सबके सामने उजागर किया।

इसके बाद तो इसे आतंकी हमला कहने में कोई भी गुंजाइश भी नहीं बची। केंद्र सरकार की कैबिनेट ने भी इसे ‘एंटी-नेशनल फोर्सेस’ द्वारा किया गया हेसियन टेरर एक्ट करार दिया। जाँच में सीसीटीवी फुटेज से ये भी सामने आया कि उमर ने कार को रेड फोर्ट मेट्रो स्टेशन के पास पार्क किया और ट्रैफिक सिग्नल पर विस्फोट किया।

डीएनए टेस्ट से उमर की पहचान हुई, जो फरीदाबाद रेड्स के बाद घबराकर दिल्ली की ओर भागा था। एनआईए ने 2900 किलो विस्फोटक बरामद किए, जो जैश के हैंडलरों से जुड़े थे। यह साफ हो गया था कि पाकिस्तान में पल रहे टेरर मॉड्यूल एक्टिव हैं और उन्होंने ही देश में अशांति फैलाने की कोशिश की।

आतंकी शब्द से परहेज करता ‘द हिंदू’

ऐसे स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद ‘द हिंदू’ जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अपने पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स में ‘आतंकी’ शब्द लिखने से पूरी तरह परहेज किया।

द हिंदू ने ब्लास्ट के बाद से लेकर अब तक उमर को ‘डॉक्टर’, ‘आरोपित’, ‘संदिग्ध’ या ‘मैन’ ही लिखा है। 17 दिन बीतने के बाद भी उनकी हेडलाइंस अब तक अस्पष्ट हैं। हेडलाइन्स में ‘डॉक्टर उमर की कार में ब्लास्ट’, ‘आरोपित डॉक्टर गिरफ्तार’, ‘रेड फोर्ट ब्लास्ट में संदिग्ध की भूमिका’ लिखा गया है।

यहाँ तक कि जहाँ ‘टेररिस्ट’ लिखा, वहाँ इस शब्द को सिंगल कोट्स में डाल दिया, मानो अब तक उन्हें संदेह ही है। और ये वह पाठक के मन में भी पैदा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स में भी ‘कार ब्लास्ट’, ‘एक्सप्लोडिंग कार’ आदि का पैटर्न रहा बिना ‘आतंकवादी हमला’ लिखे।एक तरह से यह पत्रकारिता नहीं बल्कि टेरर सिम्पैथी कहा जाना चाहिए।​

पहले भी दिखा वामपंथ का नैरेटिव पैटर्न

यह कोई पहली बार नहीं है। द हिंदू की रिपोर्टिंग में अक्सर यह पैटर्न दिखता है कि जब भी किसी घटना को धो-पोंछना होता है, किसी आरोपित को पाक साफ दिखाना होता है को तो शब्दों से खेला जाता है। दिल्ली ब्लास्ट में भी द हिंदू की अब तक रिपोर्ट्स की हेडलाइंस इसी पैटर्न को दर्शाती हैं।
  • पहली– ‘रेड फोर्ट के पास कार ब्लास्ट, डॉक्टर संदिग्ध’- पर आतंकी नहीं।
  • दूसरी– ‘फरीदाबाद डॉक्टर आरोपित के रूप में नामित’
  • तीसरी– ‘ब्लास्ट जाँच में मैन की भूमिका’
  • चौथी– ‘उमर नबी- डॉक्टर जो कार चला रहा था’
  • पाँचवीं– ‘आरोपित डॉक्टरों का नेटवर्क’
  • छठी– ‘रेड फोर्ट इंसिडेंट में संदिग्ध गिरफ्तार’
  • सातवीं– ‘डॉक्टर उमर की आखिरी ड्राइव’
  • आठवीं– ‘ब्लास्ट के मैन की पहचान’
  • नौवीं– ‘आरोपित का बैकग्राउंड’
  • दसवीं– ‘संदिग्ध डॉक्टरों पर नजर’
ये हेडलाइंस द हिंदू की दुविधा साफ तौर पर दिखाती हैं। सरकार आतंकी कह रही, NIA यूएपीए (UAPA) लगा रही, लेकिन द हिंदू 27 नवंबर 2025 तक भी ‘टेररिस्ट’ बोलने से हिचक रही।​ उनकी रिपोर्ट्स में अक्सर ‘terrorist’ की जगह ‘militant’, ‘gunman’, ‘accused’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। यह वही अप्रोच है जो अल-जजीरा जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखती है। वहाँ भी आतंकी कहने से बचा जाता है और भाषा को इस तरह गढ़ा जाता है कि पाठक के मन में संदेह पैदा हो।

पुराने ढर्रे पर चल रहा द हिंदू

द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउसेज का ये पुराना हथकंडा है। पुलवामा अटैक, 26/11 या ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी इन्होंने टेररिस्ट को ‘मिलिटेंट’, ‘आरोपित’ कहा। शब्दों से खेलकर ये वामपंथी मीडिया हाउस अलग नैरेटिव बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं- आतंकवादी हमले को ‘इंसिडेंट’ और हमलावर को आतंकी के बजाय ‘डॉक्टर’ और आरोपित लिखते हैं जैसे उसने लोगों को मारा नहीं बल्कि सिर्फ चप्पल चुराई हो।
द हिंदू, अल जजीरा की तर्ज पर ही काम करता है। जैसे अल-जजीरा हमास को ‘मिलिटेंट’ कहता है वैसे ही द हिंदू भी आतंकी को मानवीकरण करता दिखता है। इसके पीछे उसका उद्देश्य साफ है- पाठकों में संदेह डालना कि ‘क्या बंदा सच में टेररिस्ट था?’
वामपंथी मीडिया की कलाबाजी अब भी जारी है, भले आम जनता जाग चुकी हो। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स इन्हें आड़े हाथों ले रहे हैं, लेकिन ये अपनी लाइन नहीं छोड़ते।​ इनकी कोशिश यही रहती है कि किसी भी घटना को इस तरह पेश किया जाए कि पाठक के मन में सरकार और एजेंसियों की बात पर सवाल उठे।
द हिंदू की यह मानसिकता कहीं न कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करती है। जब NIA जैश लिंक बता रही, तो ‘डॉक्टर नेटवर्क’ कहना आंतक को ग्लोरिफाई करता है फरीदाबाद में 2900 किलो आईईडी बरामद हुए, जो कार बॉम्ब में इस्तेमाल किए गए, फिर भी द हिंदू उसे ‘ब्लास्ट’ लिखता है। यह पत्रकारिता नहीं, प्रोपगैंडा है।
ऐतिहासिक संदर्भों को देखा जाए तो ‘द हिंदू’ का वामपंथी झुकाव साफ है। नेहरू युग से ये कॉन्ग्रेस-समर्थक रहे। इमरजेंसी में भी चुप्पी साधे रखी। अब मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बुनते रहते हैं।

जाँच में दिखा जैश से संपर्क, द हिंदू ने छिपाया

रेड फोर्ट ब्लास्ट पर भी पाकिस्तान से जुड़ा लिंक और तथ्यों को छिपाया और जैश-ए-मोहम्मद को महज एक ‘ग्रुप’ कहा। दिल्ली ब्लास्ट में पकड़े गए सभी आरोपितों का सीधा जुड़ाव पाकिस्तान-स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से था।
जाँच एजेंसियों ने पाया कि ‘हंजुल्ला’ नामक जैश हैंडलर ने डॉक्टरों और छात्रों को बम बनाने के वीडियो भेजे और उन्हें कट्टरपंथी बनाया। डॉक्टर उमर उन नबी, मुजफ्फर अहमद राठर और शहीन शाहिद जैसे आरोपितों ने छात्रों को भर्ती कर ‘व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल’ तैयार किया।
2019 में हुए पुलवामा हमलों में आरोपित तुफैल अहमद भी इसी नेटवर्क का हिस्सा था और दिल्ली हमलों में भी इसका हाथ था। इस मॉड्यूल को 26 लाख रुपये की फंडिंग मिली थी। इस लिहाज से ये पूरी तरह साफ है कि यह हमला कोई स्थानीय घटना या दुर्घटना नहीं थी बल्कि जैश का संगठित आतंकी ऑपरेशन था। इसके बावजूद द हिंदू संशय में दिख रहा है।
अल जजीरा फिलिस्तीन कवरेज में इजरायल को ‘ऑक्यूपायर’ कहता है वैसे ही द हिंदू भारत को ‘ऑप्रेसर’। दोनों का पैटर्न विक्टिम कार्ड खेलना है। लेकिन राष्ट्रहित में पत्रकारिता होनी चाहिए, न कि संदेह फैलाना।​
अल जजीरा फिलिस्तीन कवरेज में इजरायल को ‘ऑक्यूपायर’ कहता है वैसे ही द हिंदू भारत को ‘ऑप्रेसर’। दोनों का पैटर्न विक्टिम कार्ड खेलना है। लेकिन राष्ट्रहित में पत्रकारिता होनी चाहिए, न कि संदेह फैलाना।​

जनता को दिख रहा द हिंदू का सच

जब किसी को संदिग्ध कहा जाता हो तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जिसके बारे में शक हो कि उसने अपराध किया है, लेकिन उसके खिलाफ औपचारिक आरोप या सबूत अभी तक पुख्ता नहीं हुए। संदिग्ध शब्द पाठक के मन में और भी ज्यादा अनिश्चितता पैदा करता है। यह बताता है कि व्यक्ति पर शक है, लेकिन यह पक्का नहीं कि उसने अपराध किया।
इसके अलावा जब हम किसी को अक्यूज्ड या आरोपित लिखते हैं तो इसका मतलब है कि उसके ऊपर अपराध का महज आरोप लगा है। वह आतंकी नहीं हो सकता या कोर्ट ने उसे दोषी नहीं ठहराया तो वह सही भी हो सकता है।
इसके अलावा द हिंदू का ‘मैन’ शब्द का उपयोग अपराध की गंभीरता को कम करने जैसा है। यह व्यक्ति को सिर्फ एक आम इंसान की तरह पेश करता है, न कि आतंकी या अपराधी की तरह। इससे पाठक के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या वह सच में आतंकी था या सिर्फ एक आम आदमी जिसे फँसाया गया।
अब पाठकों के सोचने का तरीका बदल चुका है। वे सही और गलत लिखने का फर्क समझने लगे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर #HinduHidesTerror ट्रेंड हुआ। इस पर लोग द हिंदू की हेडलाइंस को साझा कर रहे थे।
ज्यादातर पाठक अब डिजिटल न्यूज पढ़ते हैं, जिसमें स्पष्ट रिपोर्टिंग और बात शामिल हो। मीडिया की भूमिका लोकतंत्र का चौथा खंभा है, लेकिन द हिंदू इसे तोड़ रहा। अगर आतंकी को ‘डॉक्टर’ कहा/लिखा जाएगा तो युवाओं में रेडिकलाइजेशन/ कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा। द हिंदू को आईना देखना चाहिए कि 17 दिन बाद भी वह किस दुविधा में है कि आतंकी को आतंकी लिखने में डर रहा है।
भले ही आज पाठक ज्यादा जागरूक हो गए हैं और उनके सोचने का तरीका बदल गया है, लेकिन द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अब भी अपने पैंतरे दिखाने से बाज नहीं आते। इनकी कोशिश यही रहती है कि लोगों के दिमाग में शक की परत छोड़ दी जाए।

दिल्ली ब्लास्ट के बाद UP सरकार का बड़ा कदम, मदरसों के बाहरी मौलाना-छात्रों का डेटा ATS को देना अनिवार्य

                 मदरसों के लिए बना नया नियम, ATS को देनी होगी जरूरी जानकारी (साभार: इंडिया टीवी)
कहते हैं "जहां न पहुंचे रवि, कहां पहुंचे कवि" जिसे 1958 में चरितार्थ किया कवि प्रदीप ने। प्रदीप के रचित इस गीत "कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से, संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से..." से तत्कालीन नेहरू सरकार इतनी भयभीत हो गयी कि इसके प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन उस प्रतिबंध को 1965 में हुए इंडो-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने। दूसरे, भारत में पल रहे गद्दारों को पकड़ने का शंखनाद शास्त्री जी ने कर दिया था। लेकिन उनके निधन के बाद मुस्लिम कट्टरपंथी और पाकिस्तानपरस्त नेताओं ने इस देशहित काम को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। 

अगर शास्त्री जी द्वारा देशहित के काम पर काम होता देश आतंकवाद, पत्थरबाज़ी और अब हुए दिल्ली ब्लास्ट नहीं होते। मुस्लिम कट्टरपंथियों को मालूम था कि हमारी हरकतों को बचाने हमारी गुलाम सियासती पार्टियां है। ये मुस्लिम कट्टरपंथियों की गुलाम पार्टियां जो पहलगाम में धर्म पूछकर महिलाओं को विधवा बनाने पर Operation Sindoor होने पर हत्यारों को पकडे जाने पर पूछने वाले आज दिल्ली ब्लास्ट करने वाले डॉक्टरों को भटका हुआ, गुमराह और बेगुनाह बताने वालों पर भी सरकार को कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं, पत्थरबाज़ी करने वालों में शामिल बच्चों को भी बच्चा समझ नहीं छोड़ना चाहिए। इन पर भी उसी तरह कार्यवाही करनी चाहिए जिस तरह बड़ों पर की जाती है। इन्हें आतंकवादियों का स्लीपर सेल मान कार्यवाही करनी होगी।         

दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके और इसमें फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन सामने आने के बाद पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट मोड पर हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए मदरसों की निगरानी को और मजबूत करने का फैसला किया है।

अब प्रदेश के सभी मदरसों, चाहे वे मान्यता प्राप्त हों या बिना मान्यता के, उसको अपने कर्मचारियों, मौलानाओं और छात्रों का पूरा विवरण ATS (Anti-Terrorism Squad) को उपलब्ध कराना होगा।

15 नवंबर 2025 को जारी एक पत्र में UP ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों (DWO) को निर्देश दिए कि वे अपने-अपने जिलों के सभी मदरसों के छात्रों और शिक्षकों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराएँ।

सरकार के अनुसार यह केवल सर्वे या साधारण जानकारी एकत्रित करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा ऑडिट है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे या मजहबी संस्थान में कोई संदिग्ध व्यक्ति छिपकर आतंकी गतिविधियाँ न चला सके।

इस कदम की पृष्ठभूमि में है अल-फलाह यूनिवर्सिटी का मामला, जिसमें विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को यह दिख चुका है कि एक निजी विश्वविद्यालय कैसे आतंक-संबंधी गतिविधियों के नेटवर्क के केंद्र के रूप में उभर सकता है।

यूपी सरकार ने मदरसों के लिए क्या नया नियम बनाया?

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के अनुसार, राज्य के सभी मदरसों, चाहे वो मान्यता प्राप्त हों या मान्यता प्राप्त ना हो, उसे यह सुनिश्चित करना है कि उन संस्थाओं में पढ़ने वाले सभी छात्रों तथा वहाँ कार्यरत मौलानाओं और शिक्षकों की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, मोबाइल नंबर, आधार-संख्या, स्थायी पता आदि की जानकारी UP ATS को समय-बद्ध रूप से उपलब्ध कराई जाए।
इसमें छात्रों के नाम, उनके पिता के नाम, पते और मोबाइल नंबर जैसी जानकारियाँ शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे का इस्तेमाल असामाजिक या आतंकी गतिविधियों के लिए न हो सके। फिलहाल यह आदेश सिर्फ इन आठ जिलों के लिए लागू किया गया है।
प्रयागराज के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि जिले के लगभग 206 मदरसों की जानकारी ATS को भेज दी गई है और अब इन जानकारियों का जमीनी सत्यापन शुरू हो चुका है।
इस आदेश को लेकर यूपी पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बताया कि पहले भी प्रदेश के कई मदरसों में अवैध गतिविधियों के मामले सामने आए हैं, इसलिए यह निगरानी जरूरी है।

 उन्होंने कहा, “समय-समय पर मदरसों से अलग-अलग मामले सामने आते रहते हैं। जैसे, प्रयागराज में करेंसी छापने के मामले सामने आए, और इसी तरह कुशीनगर में भी। बहराइच में विदेशियों और बाहरी लोगों के मदरसों में रहने का इंतजाम पाया गया। इसी तरह, हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके में एक डॉक्टर का नाम सामने आया और उसके आधार पर जाँच शुरू हुई।”

इस आदेश में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह सिर्फ डेटा जमा करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक सुरक्षा-ऑडिट है, ताकि किसी भी मदरसे में बाहरी राज्यों या देशों से आने वाले छात्रों-मौलानाओं की आवाजाही, संदिग्ध गतिविधियाँ व सुरक्षा-रिस्क पहले-से पकड़ी जा सके।

मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार की कोशिशें

इस दिशा में यूपी सरकार का दृष्टिकोण सिर्फ सुरक्षा-निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह प्रयास भी करने लगी है कि मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक स्वीकार्यता के साथ जोड़ा जाए।
मदरसों में पढ़ने-वाले छात्रों व वहाँ पढ़ाने-वाले मौलानाओं की जानकारी जुटाना और ATS को उपलब्ध कराना: इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होगा कि मदरसे सिर्फ मजहबी शिक्षा का केंद्र न बनें बल्कि उनकी संरचना, छात्र-छात्राओं की पृष्ठभूमि और भविष्य-संभावनाएँ भी ज्ञात हों।
बाहर-राज्यों या विदेशी छात्रों की आवाजाही पर विशेष ध्यान देना: यह देखा जा रहा है कि कुछ मदरसों में बाहरी राज्यों से आए छात्रों की संख्या काफी अधिक है, जिसे अब खुफिया एजेंसियों ने सन्देह के घेरे में लिया है।
मदरसों को आधुनिक पाठ्यक्रम अपनाने, मान्यता प्राप्त करने, मुख्यधारा की शिक्षा-संस्थाओं से तालमेल बिठाने की दिशा में प्रेरित करना: ताकि मदरसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से स्वीकार्य बने और उनके छात्र आगे-व्यावसायिक या विश्वविद्यालय-स्तर पर भी सहजता से आगे बढ़ सकें।

अवैध मदरसों पर कार्रवाई और दिल्ली ब्लास्ट के बाद जाँच-तेजी

मदरसों पर निगरानी पहले से चल रही थी, लेकिन हाल के में सामने आई घटनाओं, विशेष रूप से 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए ब्लास्ट ने जाँच-प्रक्रिया को और अधिक तीव्र कर दिया है।
इस ब्लास्ट के बाद राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों ने निर्देश दिया कि मजहबी और शैक्षणिक संस्थानों में आने-जाने वालों की पहचान और आवाजाही पर विशेष नजर रखी जाए। इसी सिलसिले में यूपी ATS ने मदरसों से डेटा जमा करने का अभियान शुरू किया है।
इसका मतलब यह है कि अब मदरसों के कार्य-प्रभावों के साथ-साथ, सुरक्षा-विचारों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है, ताकि कोई भी संस्थान अनियंत्रित रूप से आतंकी गतिविधियों का माध्यम न बने।
दिल्ली के लालकिले धमाके के बाद से सुरक्षा एजेंसियों की नजर फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी पर टिकी हुई है। इस यूनिवर्सिटी को संदेह के घेरे में रखा गया है क्योंकि यहाँ कई ऐसे प्रोफेसर और बाहरी लोग सक्रिय पाए गए हैं, जिन पर आतंकियों को पनाह देने और उनके साथ मिलकर खुफिया तौर पर गतिविधियाँ करने का शक है।

मुस्लिम और विपक्ष कर रहा नए नियम का विरोध

मदरसों के लिए बनाए गए इन नियमों का मुस्लिम लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सरकार उनकी प्रोफाइलिंग करने की कोशिश कर रही है। जबकि एजेंसियाँ पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि यह सब कुछ केवल सुरक्षा की दृष्टि से किया जा रहा है।
वहीं इस कार्रवाई पर विपक्ष ने भी नाराजगी जताई है। कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शहजाद आलम ने कहा कि सरकार सुरक्षा के नाम पर डर पैदा कर रही है और हर मुस्लिम को शक की निगाह से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अगर ATS इतनी जाँच कर रही है तो उसे अपने मामलों के नतीजों पर भी श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, क्योंकि कई मामलों में कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अमीक जामेई ने भी कहा कि देश आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह एकजुट है, लेकिन मदरसों को ATS से जाँच के दायरे में लाना अनावश्यक कदम है और इससे भ्रम और माहौल खराब होगा।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब एक मकान मालिक किसी नए किराएदार को घर में रहने की अनुमति देता है तो उससे पहले उससे न सिर्फ उसकी जानकारी लेता है बल्कि कुछ जरूरी दस्तावेज भी अपने पास जमा करवाता है। जाहिर सी बात है कि अगर मदरसों में देश के नहीं बल्कि बाहरी छात्रों की संख्या भी अधिक देखने मिल रही है, तो ऐसे में उनकी जानकारी आवश्यक है।
उस पर अल-फलाह जैसे विश्वविद्यालयों से सामने आ रही कश्मीरी छात्रों की संख्या, विश्वविद्यालय के अंदर पढ़ा रहे जिहादी प्रोफेसर इन नियमों को लागू करना और भी आवश्यक बना देते हैं।

‘मजहब’ के नाम पर फिदायीन बनते हैं, पर लिबरल-इस्लामी गैंग चाहता है कि ‘मजहब’ की बात न हो; अजित भारती द्वारा 'डॉक्टरों' की गिरफ्तारी पर बिलखती 'बुआओं' का धुंआधार रोस्ट, देखिए वीडियो

   दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी के वायरल वीडियो पर उदारवादी-मुस्लिम और इस्लामी कट्टरपंथी तिलमिलाए (फोटो साभार: NDTV)
कैसी अजीब विडंबना है कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करेंगे लेकिन उनके गुर्गे कहते हैं इस्लाम का नाम मत लो। भारत में जयचन्दों की कभी कमी नहीं रही। एक ढूंढने निकलोगे हज़ार मिल जाएंगे। जयचन्द तो मर गया लेकिन अपने वंशज छोड़ गया। हिन्दू राज में जयचन्द चंद चांदी के टुकड़ों के लालच में मुग़ल आक्रांताओं को भारत में घुसा गया। खैर अब आतंकवादियों के साथ-साथ इन जयचन्दों का हिसाब होना शुरू हो चुका है। अगर आतंकी और उनके गुर्गे भारत को गजवा-ए-हिन्द बनाने का असफल प्रयास कर रहे हैं जब 2014 से पहले नहीं कर पाए तो अब क्या क्या करेंगे। 2014 चुनावों से पहले कोशिश तो बहुत हुई थी लेकिन तपस्वियों के तप ने उनके नापाक मंसूबे पूरे नहीं होने दिए। ये भारत ऋषि-मुनियों के तप की भूमि है। उसी तप ने सनातन की समर्पण किए वेद, पुराण, भागवत गीता, शास्त्र, उपनिषद, महर्षि वाल्मीकि ने रामायण, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत और  अनेकों महाकाव्य आदि।       

दिल्ली में लाल किला के पास धमाका करने वाले आतंकी उमर नबी का हाल ही में एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में उमर ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ यानी फिदायीन बनने को सही ठहरा रहा है। वह इसे ‘शहादत का ऑपरेशन’ बताकर पेश करता है। यह वीडियो उन उदारवादी-बुद्धिजीवियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों पर ढकी उस सच्चाई को दिखाता है, जो दावा करती हैं कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ है। शायद इसीलिए ऐसे लोगों को वीडियो बाहर आने से परेशानी हो रही है।

आज(21 नवम्बर) को TimesNow नवभारत के अनुसार 7 महीनों में 40 करोड़ का लेन-देन होने के साथ-साथ बम बनाने के वीडियो बरामद हुए।   

ये लोग मीडिया पर इस वीडियो को प्रसारित करने के लिए सवाल उठा रहे हैं और चाहते हैं कि मजहब की बात न हो। वीडियो सामने आने पर मजहब के लिए फिदायीन बनने वाले उमर नबी का महिमामंडन करने में भी लगे कुछ कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को यकीन नहीं हो रहा कि एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच में शामिल कैसे हो सकता है? वे आतंकवादी की मुस्लिम पहचान को अब भी नकार रहे हैं।

उमर नबी के वीडियो का अनुवाद

उमर नबी ने यह रोंगटे खड़े करने वाला वीडियो दिल्ली में धमाका करने से ठीक पहले रिकॉर्ड किया था। वीडियो में वह बिल्कुल प्रोफेशनल अंग्रेजी भाषा में बात कर रहा है। यह उस ‘व्हाइट कॉलर आतंकवाद’ का सबूत है, जिसका पिछले कई दिनों से जाँच एजेंसियाँ पर्दाफाश करने में लगी हुई हैं। फरीदाबाद, सहारनपुर से लेकर कश्मीर तक अब तक 5 से अधिक डॉक्टर पेशे आतंकी पकड़े जा चुके हैं।

वीडियो में उमर नबी कहता है, “आत्मघाती हमलों का सबसे अहम मुद्दा यह है कि जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि वह किसी तय समय और स्थान पर निश्चित रूप से मरने जा रहा है तो वह एक खतरनाक मानसिकता में चला जाता है। वह खुद को एक ऐसी स्थिति में रखता है, जहाँ वह मान लेता है कि मौत ही उसकी एकमात्र मंजिल है।”

उमर नबी आगे कहता है, “हकीकत यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय व्यवस्था में ऐसी सोच या ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह जीवन, समाज और कानून तीनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”

ऐसा पहली बार हुआ है जब आत्मघाती हमले के आतंकी का वीडियो सामने आया है। वीडियो सामने आने से काफी लोगों को परेशानी तो हुई, लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि ऐसे वीडियो समाज में फैलने चाहिए ताकि भारत का हर नागरिक इस्लामी कट्टरपंथी की सोच वाली ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले लोगों से बचकर रह सके। क्या पता ऐसे इस्लामी कट्टरपंथी हमारे आसपास ही घूम रहे हों।

लिबरल का ‘इस्लाम से आतंकी विचारधारा’ को ढकने की तमाम कोशिश

वहीं आतंकी उमर नबी की इस वीडियो पर कुछ लिबरल और बुद्धिजीवी तिलमिला गए। ऐसे लोगों ने वीडियो को ‘संवेदनशील’ बताया और आतंकी की छवि पर पर्दा डालने के साथ-साथ इस ‘इस्लाम’ से जोड़ने पर नाराजगी जाहिर की। यह उनका हमेशा वाला प्रोपेगेंडा है। जो सिर्फ ‘मुस्लिमों की हिंसा और क्राइम’ पर आम लोगों को भटकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये लोग सबसे पहले मीडिया को निशाना बनाते हैं।

ऐसी ही एक इस्लामी कट्टरपंथी RJ सैयमा ने आतंकी उमर नबी की वीडियो सामने लाने वाली मीडियो को निशाना बनाया लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले इस आतंकी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखने से कतराई। सैयमा ने लिखा, “मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया आतंकी का वो वीडियो क्यों शेयर कर रहे हैं! ये बहुत ही विचलित करने वाला है और मैं सोच भी नहीं सकती कि इसे देखकर पीड़ितों के परिवारों पर क्या बीत रही होगी! सनसनीखेज TRP का ये दौर कितना विचलित करने वाला है! बिल्कुल निंदनीय।”

                                           सैयमा के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @_sayema)

यहाँ सैयमा की ही तरह द हिंदू (The Hindu) की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह लिखती हैं, “उस आत्मघाती हमलावर का वीडियो पोस्ट करना बंद करो, तुम बस उसके जहरीले बयान को बढ़ावा दे रहे हो।”

 विजेता सिंह के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X-@vijaita)

इसी क्रम में लिबरल सोच वाली ऋचा द्विवेदी भी अपनाी ‘अलोकप्रिय राय’ लिखती हैं, “डॉक्टर से आत्मघाती हमलावर बने व्यक्ति का वीडियो सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए और इसे निश्चित रूप से टेलीविजन पर प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए।”

                            ऋचा द्विवेदी के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @RichhaDwivedi)

कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को वीडियो सामने आने से ‘असहज’ हो जाते हैं और सवाल करते हैं, “जब जाँच पूरी नहीं हुई है तो यह वीडियो, निगरानी फुटेज, जाँच संबंधी जानकारी आदि मीडियो को कौन दे रहा है?”   

                                         एक्स यूजर का स्कीनशॉट (साभार: @salman_sayyid)                                   

वहीं इन इस्लामी कट्टरपंथियों को यकीन नहीं होता कि आखिर एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच वाला कैसे हो सकता है। ये लोग ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ वाले मनगढ़ंत बयान को उछालने में लग जाते हैं। एक एक्स यूजर ने लिखा, “यह वीडियो एक स्पष्ट चेतावनी है कि आतंकवाद धर्म, शिक्षा या पेशेवर पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है। यह एक खतरनाक विकृति है, एक सामाजिक रोग है जो हमारे युवाओं के मन में घर कर गया है और हमारे समाज के ताने-बाने के लिए खतरा बना हुआ है।”

                            एक्स यूजर के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X- @tabishhaji)

इन लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों ने आतंकवाद एक धर्म तक सीमित नहीं है वाले प्रोपेगेंडा को बढ़ाने की तमाम कोशिश की। यहाँ तक कि मीडिया पर वीडियो उजागर करने को लेकर सवाल उठाया। ये लोग दिल्ली ब्लास्ट में मारे गए 15 लोगों की जान गवाने वाले परिवारों का दर्द तो समझ रहे हैं लेकिन इस्लामी कट्टरपंथ से बढ़ते आतंक को नजरअंदाज कर देते हैं।

लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों का दोहरा सच

इससे यह साफ हो गया कि उमर नबी का वीडियो सामने आते ही लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों को जो बेचैनी दिखी, वह दरअसल उनकी अपनी दोहरी राजनीति का पर्दाफाश है। यह वही लोग हैं जो हर मंच पर सच दिखाने का दावा करते हैं लेकिन जैसे ही कोई वीडियो उनकी पसंदीदा कथाओं पर चोट करता है, तुरंत उसे छिपाने में लग जाते हैं।

आतंकी उमर नबी का वीडियो ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराता है, उसे इस्लाम में जरूरी बताता है और युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलने के लिए प्रभावित करता है। लेकिन इस जहर पर इन कथित लिबरल की जुबान अचानक सिल जाती है। इनके लिए आतंक का समर्थन करने वाला ‘भटका हुआ नौजवान‘ होता है, जबकि यही लोग गुजरात दंगों में ‘बाबू बजरंगी’ के स्टिंग ऑपरेशन की क्लिप्स दुनिया को दिखाना चाहते हैं। क्योंकि वहाँ एजेंडा पूरा होता है।

ये वही लोग है जो हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर आंतकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ कहकर भावनात्मक एंगल देते हैं और लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले उमर नबी पर खामोश रहते हैं। उमर नबी का ठीक दिल्ली ब्लास्ट से पहले ‘सुसाइड-बॉम्बिंग’ पर वीडियो बनाने की यही वजह होगी, क्योंकि इन आतंकियों को पता है कि भारत के लिबरल इनके अपराध को ‘शहादत’ बताने के लिए अब भी बैठे हैं।

ड्रोन से हमले कर दिल्ली को दहराने की कोशिश को किया नाकाम; ‘जूता बम’ की भी हो रही जाँच

जैसे-जैसे बिलों में छिपे आतंकवादियों को गिरफ्तार किया जा रहा है, और उनसे पूछताछ की जा रही है चौकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े जितने भी डॉक्टर हैं सभी पर होती कार्यवाही से देश स्तब्ध है। चर्चा यह भी हो रही है कि क्या अल-फलाह यूनिवर्सिटी आतंकवाद का अड्डा है?

दिल्ली ब्लास्ट केस में ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। अब रोहतक की रहने वाली प्रियंका शर्मा जो कश्मीर के पुलवामा के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में लेक्चरर थी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। डॉक्टर प्रियंका शर्मा अशांति दूतो के बीच रहते-रहते घोर सेकुलर बन चुकी थी। 

डॉक्टर नदीम ने उनसे कहा कि वह कुछ समस्या में है उसे 8,00,000 रूपए की जरूरत है और डॉक्टर प्रियंका ने उसके अकाउंट में 8,00,000 ट्रांसफर कर दिया। 

फिर वह पैसे मेवात में विस्फोटक खरीदने के लिए ट्रांसफर किए गए

और इस तरह डॉक्टर प्रियंका इस मामले में फंस गई

समाचार है कि डॉक्टर प्रियंका के ऊपर भी वही धाराएं लगा दी गई है जो आतंकवादी फंडिंग केस में लगती है

मां बाप ने एमबीएस कराया एमडी कराया गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में जॉब मिली लेकिन सेकुलरिज्म की घुट्टी पीने की वजह से माथे पर आतंकवादी का ठप्पा लग गया 

अब देखना है कि इस आतंकवादी गिरोह की जड़ें कितनी गहरी और कहां-कहां तक फैली हुई है। अगर समय रहते इस गिरोह को नहीं पकड़ा जाता है दिल्ली ही नहीं पूरे भारत को बारूद के ढेर पर बैठा दिया होता। अभी कुछ दिन पहले किसी चैनल पर बीजेपी प्रवक्ता, शायद शहजाद पूनावाला, ने बताया कि एक महीने में हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने कम से कम 30 हमलों को नाकाम किया है। यानि Operation Sindoor के बाद से हमारी सुरक्षा एजेंसियों खामोश नहीं बैठी है। बल्कि जनता को चैन की सोने के लिए अपनी नींद हराम किए हुए हैं।         

दिल्ली में लाल किले के करीब 10 नवंबर को हुए आत्मघाती कार धमाके की जाँच में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को एक और चौंकाने वाला सुराग मिला है। इस हमले को लेकर पकड़े गए आतंकी मॉड्यूल ने न सिर्फ आत्मघाती धमाके की योजना बनाई थी बल्कि यह मॉड्यूल हमास की तर्ज पर ड्रोन और छोटे रॉकेट का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर हमला करने की तैयारी भी कर रहा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जाँच में सामने आया है कि यह मॉड्यूल भीड़भाड़ वाले इलाकों में ड्रोन के जरिए बम गिराने की साजिश पर भी काम कर रहा था। यह हमला ठीक वैसे करने की योजना थी जैसे हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर किया था।

जाँच एजेंसी ने जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के काजीगुंड के रहने वाले जसीर बिलाल वानी उर्फ दानिश को गिरफ्तार किया है। NIA की टीम ने उसे चार दिन पहले श्रीनगर से उठाया था जिसके बाद पूछताछ में सामने आई जानकारी से इस हमले को लेकर कई नए खुलासे हुए हैं।

दानिश को सोमवार (17 नवंबर 2025) को गिरफ्तार किया गया। एजेंसी का कहना है कि दानिश छोटे ड्रोन हथियार बनाने में सक्षम था और उसे बड़ी बैटरियों से लैस ऐसे ड्रोन डिजाइन करने का अनुभव था जो कैमरे और भारी विस्फोटक सामग्री दोनों को ढो सकें।

NIA के अनुसार दानिश ने आत्मघाती हमलावर डॉ. उमर उन नबी को तकनीकी सहायता दी थी। वह ड्रोन को मॉडिफाई करने और रॉकेट बनाने की कोशिशों में से शामिल था। एजेंसी का कहना है कि मॉड्यूल का मकसद भीड़भाड़ वाले इलाकों में ड्रोन से बम गिराकर अधिक से अधिक लोगों को मारना था। यह पद्धति सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और इजरायल में हमास तथा ISIS जैसे संगठनों द्वारा किए जाने वाले हमलों से मिलती-जुलती है।

जाँच में सामने आया है कि जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा यह मॉड्यूल छोटे रॉकेट भी बनाने पर काम कर रहा था। इन रॉकेट्स को सीरियल ब्लास्ट में इस्तेमाल किया जा सकता था। एजेंसी को आशंका है कि मॉड्यूल का उद्देश्य सिर्फ एक आत्मघाती हमला ही नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर मल्टी-स्टेज आतंकी हमला करना था। जाँच टीम को धमाके वाली जगह से एक जूता भी मिला है। इस जूते में विस्फोटक होने की आशंका जताई गई है। इस कथित ‘जूता बम’ को लेकर भी फॉरेंसिक की जाँच चल रही है। 

लाल किला ब्लास्ट : संदेह में सुनहरी मस्जिद? 3 घंटे वहां कार क्यों रुकी रही? क्या सरकार को देश में भी Operation Sindoor चलाने का समय आ गया है? जम्मू-कश्मीर से पकड़े गए आमिर और तारिक

 

आतंकियों ने जो दिल्ली में धमाका किया है देखना यह है कि अब इस धमाके की लपेटे में कौन-कौन आएगा? आए दिन वोट चोरी को लेकर जो धमाकों की बात कही जाती थी यह बयान भी अब सबकी जबानों पर आ गया है। अगर मोदी सरकार ने इस धमाके की अति गंभीरता से जाँच की भारत में पल रहे पाकिस्तान और उनके समर्थकों की भी अब शायद खैर नहीं होगी। इस धमाके ने केंद्र सरकार ही नहीं जितनी भी गुप्तचर संस्थाएं हैं सभी को ऐसी हरकत में ला दिया है कि जिसे अंजाम तक पहुंचाए बगैर कोई चैन की नींद नहीं सोयेगा। इन लोगों ने Operation Sindoor के दूरगामी परिणामों को नहीं समझा। पूर्व सेना अध्यक्ष बिपिन रावत ने ठीक कहता था कि बाहरी दुश्मन से लड़ने के साथ हमें ढाई मोर्चे पर लड़ना होगा। ये वही रावत है जिन्हे एक कांग्रेस नेता ने सड़क का गुंडा कहा था। मुस्लिम तुष्टिकरण में कितना नीचे गिर जाते हैं अपने आपको देश रक्षक कहलाने वाले नेता। क्या सरकार को देश में भी Operation Sindoor चलाने का समय आ गया है?  

देशप्रेमी भारतीयों को याद करना होगा कि मुस्लिम आक्रांता अपने साथ कोई लम्बी-चौड़ी फ़ौज लेकर नहीं आए थे क्योकि उनको मालूम था कि भारत में बिकाऊ जयचन्दों की कोई कमी नहीं। क्या तुष्टिकरण करने वाले नेता जिन्हे जनता अपना हितैषी समझती है इतिहास को दोहरा रहे हैं?       

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास सोमवार (10 नवंबर 2025) शाम को एक चलती कार में जोरदार धमाका हुआ था। इस हमले में लगभग 8 लोगों की मौत हो गई है और कई अन्य घायल हुए हैं। इसे संदिग्ध आतंकी हमला माना जा रहा है। जाँच एजेंसियाँ अब धमाके से कुछ देर पहले के एक CCTV फुटेज पर फोकस कर रही हैं।

चर्चा यह भी है दिल्ली पुलिस सुनहरी मस्जिद में भी कार्यवाही कर रही है क्योकि कार पहले यहीं 3 घंटे तक रुकी हुई थी। संदेह किया जा रहा है कि क्या आतंकी मस्जिद में बैठ विस्फोट की योजना को अंजाम देने की प्लानिंग कर रहे थे?  

फुटेज में विस्फोट वाली I-20 कार और उसमें काला मास्क पहने संदिग्ध ड्राइवर मोहम्मद उमर नजर आ रहा है। यह फुटेज और कार की जटिल खरीद-फरोख्त की कड़ी, जाँच में अहम सुराग साबित हो रहे हैं।

जाँच का केंद्र बनी संदिग्ध I-20 कार

 धमाके से कुछ देर पहले का एक CCTV फुटेज सामने आया है। इस फुटेज में सफेद रंग की I-20 कार भीड़ वाले ट्रैफिक से गुजरते हुए दिख रही है। कार चला रहे शख़्स ने काले रंग का मास्क पहना हुआ था। यह शख्स आतंकी मोहम्मद उमर बताया जा रहा है। जाँच एजेंसियाँ फुटेज में दिख रही इस संदिग्ध कार और मास्क पहने ड्राइवर की पहचान पक्की कर रही हैं। वे तकनीकी और मानवीय खुफिया जानकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

कार की लंबी खरीद-फरोख्त और पुलवामा कनेक्शन

जिस I-20 कार में धमाका हुआ, उसकी खरीद-फरोख्त की कड़ी लंबी है। यह कार पहले मोहम्मद सलमान की थी। सलमान ने इसे नदीम को बेचा था। नदीम ने इसे फरीदाबाद के एक यूज्ड कार डीलर, रॉयल कार जोन को बेच दिया।
इसके बाद तारिक अहमद ने इसे खरीदा और फिर उमर ने लिया। जानकारी के मुताबिक, दो लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। उनका नाम आमिर राशिद और तारिक अहमद है। तारिक जम्मू और कश्मीर के पुलवामा का रहने वाला है। जाँचकर्ता फरीदाबाद के एक आतंकी मॉड्यूल से उसके कनेक्शन की जाँच कर रहे हैं। माना जा रहा है कि इस मॉड्यूल ने ही बम धमाके की साजिश रची थी।
पहाड़गंज-दरियागंज से 4 संदिग्ध हिरासत में लिए गए: लाल किला मेट्रो स्टेशन किया गया बंद
दिल्ली ब्लास्ट का संदिग्ध डॉक्टर उमर फिदायीन बम हो सकता है। वह पुलवामा का रहने वाला है। न्यूज 18 के मुताबिक उसकी माँ और उसके भाई को जम्मू कश्मीर पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। ब्लास्ट स्थल से धमाके वाली कार के पास से क्षतिग्रस्त हाथ के टुकड़े मिले हैं।
इस बीच दिल्ली पुलिस ने पहाड़गंज, दरियागंज और आसपास के इलाकों के होटलों में रात भर तलाशी ली। पुलिस टीम ने होटलों के रजिस्टरों की जाँच की। तलाशी के दौरान, चार संदिग्धों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया।
इस बीच दिल्ली पुलिस ने पहाड़गंज, दरियागंज और आसपास के इलाकों के होटलों में रात भर तलाशी ली। पुलिस टीम ने होटलों के रजिस्टरों की जाँच की। तलाशी के दौरान, चार संदिग्धों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया।
डीसीपी नॉर्थ राजा बंथिया के मुताबिक, “कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई है। यूएपीए, विस्फोटक अधिनियम और बीएनएस की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। एनएसजी, दिल्ली पुलिस और एफएसएल की टीमें मौके पर मौजूद हैं और पूरे क्राइम सीन की जाँच कर रही हैं। जाँच जारी है। जिस कार में धमाका हुआ था, उसमें कुछ बॉडी पार्ट्स हैं। एफएसएल टीम उन्हें इकट्ठा कर रही है, देखते हैं कि ये कैसे जुड़ते हैं।”
न्यूज 18 के मुताबिक, कश्मीर में दो लोगों को हिरासत में लिया गया है। पुलवामा के संबूरा निवासी तारिक अहमद डार और उमर उर्फ ​​आमिर। तारिक ने दावा किया कि उसने कार आमिर को सौंप दी थी।

कार का पता पुलवामा से चला

जाँचकर्ताओं ने कार का पता जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के एक व्यक्ति से लगाया है, जिससे संभावित आतंकी संबंध का पता चला है। सीएनएन न्यूज़18 के सूत्रों के अनुसार, कार मूल रूप से गुरुग्राम में HR26 नंबर के तहत पंजीकृत थी और पहले मोहम्मद सलमान के पास थी। कथित तौर पर यह चार बार बदली गई। सलमान से देवेंद्र, देवेंद्र से सोनू और अंत में सोनू से पुलवामा के शंभूरा गाँव के तारिक के पास आई।
दिल्ली पुलिस ने तारिक और उसके साथियों के बारे में जानकारी की पुष्टि के लिए एक विशेष टीम श्रीनगर भेजी है। कार को कथित तौर पर फरीदाबाद के एक कार डीलर के माध्यम से अवैध रूप से खरीदा गया था।

विस्फोट में आईईडी का इस्तेमाल

प्रारंभिक जाँच से पता चलता है कि विस्फोट में एक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) का इस्तेमाल किया गया था।विस्फोट की वजह से कार के परखच्चे उड़ गए। कश्मीरी गेट, दरियागंज, सुनहरी मस्जिद और लाल किलाविस इलाकों से 50 से ज़्यादा सीसीटीवी फुटेज इकट्ठा किए गए हैं। इससे कार के बारे में पता चला कि दोपहर से ही उत्तरी दिल्ली में कार घूम रहा था। विस्फोट से पहले वह कई घंटों तक कार सुनहरी मस्जिद के पास खड़ी थी।

दिल्ली : ISIS आतंकी ने पहले वर्दी पहनकर ली शपथ, फिर Videos सीरिया हैंडलर को भेजा: लैपटॉप-फोन से मिली चैट्स से हुए कई खुलासे, पुलिस ने बताया- दिल्ली के मॉल में धमाके की थी साजिश

दिल्ली के मॉल में ISIS धमाके की साजिश करने वाले आतंकी गिरफ्तार (साभार : aajtak & X_@PBSHABD)

दिल्ली पुलिस ने राजधानी में एक बड़ा आतंकी हमला होने से पहले ही रोक लिया। पुलिस ने ISIS से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक मोहम्मद अदनान खान उर्फ अबू मुहरिब पहले भी UAPA के तहत जेल जा चुका था और जमानत पर बाहर आने के बाद फिर से आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गया था। उसने ISIS की शपथ ली थी, दिवाली पर मॉल में धमाका करने की योजना बनाई थी और सोशल मीडिया पर चरमपंथी प्रचार करता था।

ISIS के लिए निष्ठा की शपथ और नया नाम

जानकारी के अनुसार, जाँच में सामने आया कि अदनान ने आतंकी संगठन ISIS की शपथ ली थी। यह शपथ ‘Bayah’ कहलाती है। इस प्रक्रिया में आतंकी संगठन का सदस्य अपने ‘खलीफा’ या कमांडर के प्रति वफादारी की कसमें खाता है। अदनान ने ISIS की वर्दी पहनकर यह शपथ ली और उसकी तस्वीर अपने विदेशी हैंडलर को सीरिया भेजी। शपथ के बाद उसे नया कोड नाम ‘अबू मुहरिब’ दिया गया।

सोशल मीडिया से बना कट्टरपंथी

अदनान सोशल मीडिया के जरिए ISIS के संपर्क में आया। वह धीरे-धीरे कट्टरपंथी सोच से प्रभावित हुआ। फिर उसने ऑनलाइन आतंकियों से बात करनी शुरू की और विदेशी हैंडलरों के संपर्क में आ गया। अदनान के फोन और लैपटॉप से कई खतरनाक चैट्स, फोटो और वीडियो मिले हैं, सीरिया-तुर्की बॉर्डर से संचालित ID के संपर्क में थे। इसके अलावा, आतंकियों के पास से एक टाइमर, एक ISIS का झंडा, और लिटरेचर मिला। इन्होंने ‘वॉइस ऑफ मुसलमान’ नामक ग्रुप बनाया हुआ था।

अब दिल्ली पुलिस अदनान से लगातार पूछताछ कर रही है। एजेंसियाँ यह पता लगाने में लगी हैं कि उसके नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हैं। बरामद डिजिटल सबूतों से कई और संदिग्धों की पहचान हो सकती है।

अवलोकन करें:-

दिल्ली में गिरफ्तार ISIS आतंकी अबू मुहरिब पहले भी हुआ था अरेस्ट, ज्ञानवापी सर्वे का आदेश देने वाले

दिल्ली में गिरफ्तार ISIS आतंकी अबू मुहरिब पहले भी हुआ था अरेस्ट, ज्ञानवापी सर्वे का आदेश देने वाले
 

ISIS से जुड़ी बड़ी साजिश का खुलासा

दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने 24 अक्टूबर 2025 की सुबह ऑपरेशन में ISIS के दो आतंकियों को पकड़ा था। मोहम्मद अदनान खान उर्फ अबू मुहरिब दिल्ली का रहने वाला और दूसरा आतंकी अबू मोहम्मद मध्य प्रदेश का रहने वाला है। दोनों ही करीब 19 और 20 साल के हैं। इन दोनों ने मिलकर दिवाली के समय दिल्ली के एक बड़े मॉल में धमाका करने की योजना बनाई थी। उनका मकसद त्योहार के दौरान भीड़भाड़ वाले इलाके में हमला कर दहशत फैलाना था। अदनान को जून 2024 में उत्तर प्रदेश ATS ने UAPA एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था। सितंबर 2024 में उसे जमानत मिल गई। जमानत पर आने के बाद उसने फिर से ISIS से कनेक्शन बनाया था।

UNSC ने आतंकी सैंक्शन रिपोर्ट में TRF का नाम किया शामिल: पाकिस्तान ने करवाया पहलगाम में हिंदुओं का नरसंहार; भारत को मिली बड़ी कूटनीतिक जीत


भारत को कूटनीतिक फ्रंट पर एक बड़ी जीत हासिल हुई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आतंक प्रतिबन्ध निगरानी समिति ने The Residents Front(TRF) को अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है। TRF को पहलगाम आतंकी हमला करने का जिम्मेदार इस रिपोर्ट में बताया गया है। यह इसलिए भी बड़ी जीत हैं क्योंकि वर्तमान में पाकिस्तान UNSC का सदस्य है। इससे पहले अमेरिका ने TRF पर प्रतिबन्ध लगाए थे।

UNSC की समिति ने क्या कहा?

29 जुलाई, 2025 को जारी की गई UNSC की प्रतिबन्ध निगरानी समिति रिपोर्ट में TRF पर बात की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है, “22 अप्रैल को, 5 आतंकवादियों ने जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में एक पर्यटन स्थल पर हमला किया। इसमें 26 नागरिक मारे गए। उसी दिन हमले की ज़िम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली, जिसने घटनास्थल की एक तस्वीर भी जारी की। इसके अगले दिन दोबारा जिम्मेदारी का दावा किया गया।”

 रिपोर्ट में आगे बताया गया है, “हालाँकि, 26 अप्रैल को, TRF ने अपना दावा वापस ले लिया। TRF की ओर से कोई और जानकारी इस पर नहीं आगे दी गई। किसी और ने इस हमले की जिम्मेदारी भी नहीं ली। इसके चलते इस क्षेत्र में तनाव अभी नाजुक मोड़ पर हैं, जिसका फायदा आतंकी उठा सकते हैं।”

इस रिपोर्ट के अनुसार,”एक सदस्य देश ने कहा कि यह हमला लश्कर-ए-तैयबा के समर्थन के बिना नहीं हो सकता था, और कि लश्कर तथा TRF के बीच कनेक्शन है। एक और देश ने कहा कि यह हमला TRF ने ही किया जो लश्कर का ही पर्याय है। एक और सदस्य देश ने इन विचारों को खारिज कर दिया और दावा किया कि लश्कर अब निष्क्रिय हो चुका है।”

यह क्यों भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत?

UNSC की रिपोर्ट में TRF का जिक्र और उसे पहलगाम हमले से सीधे तौर पर लिंक किया जाना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता है। भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद UNSC को विशेष तौर पर TRF और उसके पाकिस्तान से लिंक के विषय में बताया था। भारत ने इस दौरान UNSC से TRF को वैश्विक आतंकी संगठन लिस्ट में शामिल करने की माँग की थी। भारत ने इस दौरान UNSC में इसके मददगारों पर भी एक्शन की माँग की थी।

अब UNSC की इस महत्वपूर्ण समिति कि रिपोर्ट में TRF का स्पष्ट तौर पर जिक्र है। यह जिक्र तब किया गया है जब UNSC के 15 सदस्यों में वर्तमान में पाकिस्तान भी शामिल है। पाकिस्तान वर्तमान में UNSC के 10 अस्थायी सदस्यों में से एक है। वह लगातार चीन के साथ मिलकर भारत के आतंक के खिलाफ एक्शन को रोकने के प्रयास करता रहा है। हालाँकि, भारत के कूटनीतिक प्रयासों के चलते उसकी एक नहीं चली और TRF को इस रिपोर्ट में शामिल किया गया।

पाकिस्तान ने इसका विरोध किया है, यह रिपोर्ट की एक लाइन से भी स्पष्ट होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक सदस्य देश ने लश्कर-ए-तैयबा के खत्म होने की बात कही है। ऐसे दावे पाकिस्तान करता आया है। उसका दावा रहा है कि आतंक की नर्सरियों को बंद कर चुका है। हालाँकि, यह स्पष्ट है कि वह लगातार आतंकियों को खाद-पानी देता है। लश्कर और जमात उद दावा जैसे आतंकी समूह लगातार उसकी जमीन से चलते हैं।

अमेरिका ने भी लगाया था प्रतिबन्ध

अमेरिका ने भी जुलाई, 2025 में TRF को एक वैश्विक आतंकी संगठन घोषित किया था। अमेरिका की इस कार्रवाई को भारत ने एकदम सही कहा था और पाकिस्तान ने भी दबाव में माना था कि यह लश्कर से जुड़ा हुआ है। TRF पहलगाम आतंकी हमले के अलावा और भी कई हमलों में शामिल रही है।

पहलगाम आतंकी हमला करने वाले आतंकियों को पनाह देने वाले परवेश और बशीर को NIA ने दबोचा: पूछताछ में आतंकियों के नाम उगले


पहलगाम हमले में एनआईए को बड़ी कामयाबी मिली है। एजेंसी ने पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों को पनाह देने वाले दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इन दोनों आरोपियों के नाम परवेज अहमद और बशीर अहमद है। दरअसल, एनआईए ने रविवार को बड़ी सफलता हासिल की है। पहलगाम आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाले आतंकवादियों को शरण देने के आरोप में दो गुनहगारों को गिरफ्तार किया है। गौरतलब है कि पहलगाम में आतंकियों ने 26 निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। जबकि 16 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने बड़ी सफलता हासिल करते हुए दो संदिग्ध व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है। दोनों ने पहलगाम में आतंकी हमला करने वाले आतंकवादियों की सहायता की थी। पूछताछ में आरोपितों ने पहलगाम में निर्दोष हिंदुओं को मारने वाले तीनों हमलावरों की भी जानकारी दी है।

गिरफ्तार आरोपितों की पहचान पहलगाम के बटकोट के परवेज अहमद जोथर और पहलगाम स्थित हिल पार्क के बशीर अहमद जोथर के रुप में हुई है। दोनों ने खुलासा किया है कि पहलगाम हमला करने वाले तीनों आतंकवादियों के रहने खाने की व्यवस्था इन्हीं दोनो ने की थी।

पूछताछ के दौरान परवेज और बशीर ने तीनों हमलावरों की पहचान बताते हुए जानकारी दी कि हमलावर प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा संगठन से जुड़े पाकिस्तानी नागरिक हैं।

पहलगाम में 22 अप्रैल, 2025 को हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष हिंदू पर्यटकों की हत्या कर दी गई थी। वहीं इस हमले में 16  लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए थे।

पाकिस्तानी ही थे आतंकी

एनआईए के अनुसार, पहलगाम के बटकोट के परवेज अहमद जोथर और पहलगाम के हिल पार्क के बशीर अहमद जोथर ने हमले में शामिल तीन सशस्त्र आतंकवादियों की पहचान का खुलासा किया है। यह भी पुष्टि की है कि वे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) से जुड़े पाकिस्तानी नागरिक थे। 

दोनों ने की थी सब व्यवस्था

एनआईए की जांच के अनुसार, परवेज और बशीर ने हमले से पहले हिल पार्क में मौसमी ढोक (झोपड़ी) में तीन हथियारबंद आतंकवादियों को जानबूझकर शरण दी थी। दोनों लोगों ने आतंकवादियों को भोजन, आश्रय और रसद सहायता प्रदान की थी, जिन्होंने उस दुर्भाग्यपूर्ण दोपहर को धर्म की पहचान के आधार पर पर्यटकों को चुन-चुन कर मार डाला था।
यह अब तक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला था। एनआईए ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 19 के तहत दोनों को गिरफ्तार किया है। 22 अप्रैल 2025 को दुनिया को हिला देने वाले हमले के बाद दर्ज किए गए आरसी-02/2025/एनआईए/जेएमयू मामले की आगे की जांच कर रही है। मामले में आगे की जांच जारी है।