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कांग्रेस ने जिन कर्नल पुरोहित को बनाया ‘भगवा आतंकवाद’ का शिकार, अब बनेंगे ब्रिगेडियर: सेना ने दी मंजूरी, सहना पड़ा था अत्याचार


करीब 17 साल तक चले मालेगाँव ब्लास्ट केस में बरी होने के बाद भारतीय सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को अब बड़ी राहत मिली है। उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए मंजूरी दे दी गई है।

यह फैसला उस लंबे दौर के बाद आया है। जब वह आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए जेल में रहे, कोर्ट में लड़ाई लड़ी और अपने करियर को लगभग ठहरता हुआ देखा।

जुलाई 2025 में NIA की विशेष अदालत ने उन्हें और अन्य आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। इस केस में पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत कुल सात लोग आरोपित थे, जिन्हें अदालत ने दोषमुक्त कर दिया।

कर्नल पुरोहित ने अपने करियर को हुए नुकसान को लेकर आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक चले मुकदमे और हिरासत के कारण उन्हें सेना में प्रमोशन के अवसर नहीं मिल पाए।

ट्रिब्यूनल ने उनकी बात को गंभीरता से लेते हुए उनके रिटायरमेंट पर रोक लगा दी थी। अब जब उन्हें प्रमोशन की मंजूरी मिल गई है।

क्या था मालेगाँव ब्लास्ट मामला

मालेगाँव ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुआ था। रमजान के दौरान एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर लगाए गए बम में विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और लगभग 95 लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद देशभर में हड़कंप मच गया था और जाँच एजेंसियों पर भारी दबाव था कि जल्द से जल्द आरोपित को पकड़ा जाए।

शुरुआत में इस मामले की जाँच महाराष्ट्र ATS ने की और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में साल 2011 में जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई। इस केस में श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी समेत कई लोगों को आरोपित बनाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि यह एक संगठित साजिश थी, लेकिन अदालत में यह आरोप टिक नहीं पाए।

कैसे अदालत में कमजोर पड़ा पूरा केस

जब यह मामला अदालत में पहुँचा और गवाहों व सबूतों की जाँच शुरू हुई, तो धीरे-धीरे अभियोजन पक्ष का केस कमजोर होता चला गया। NIA कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।

कर्नल पुरोहित पर आरोप था कि वे कश्मीर से RDX लेकर आए थे और उसका इस्तेमाल इस धमाके में किया गया, लेकिन कोर्ट में यह तक साबित नहीं हो पाया कि वे उस समय कश्मीर में तैनात थे। उनके घर से भी कोई विस्फोटक सामग्री नहीं मिली। फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी आरडीएक्स के कोई निशान नहीं पाए गए।

इसी तरह साजिश से जुड़ी कथित बैठकों, कॉल रिकॉर्ड या किसी भी ठोस प्लानिंग का कोई प्रमाण अदालत में पेश नहीं किया जा सका। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सबूतों के अभाव में सभी आरोपितों को बरी करना जरूरी है।

कोर्ट ने क्या कहा

NIA की विशेष अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जो इस पूरे मामले की दिशा और निष्कर्ष को समझने के लिए बेहद अहम हैं। अदालत ने साफ कहा कि “आतंकवाद एक गंभीर अपराध है और इसे किसी भी धर्म या विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य संदेह से परे दोष सिद्ध करने के मानक पर खरे नहीं उतरते। कोर्ट ने कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया। उदाहरण के तौर पर, विस्फोटक सामग्री की जब्ती और उसके परीक्षण की प्रक्रिया में स्पष्टता का अभाव था।

कथित कबूलनामों को लेकर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपित से दबाव या प्रताड़ना के तहत बयान लिया गया है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में असंगतियाँ और विरोधाभास भी अदालत के सामने स्पष्ट रूप से सामने आए।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि केवल एक नैरेटिव या थ्योरी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इसी आधार पर सभी आरोपितों को बरी किया गया।

कर्नल पुरोहित को क्या-क्या झेलना पड़ा

लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के लिए यह मामला सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत, पेशेवर और मानसिक स्तर पर एक लंबा संघर्ष था। उनकी गिरफ्तारी नवंबर 2008 में हुई थी और उन्हें करीब 9 साल तक जेल में रहना पड़ा।

इस दौरान उनके खिलाफ मीडिया ट्रायल भी चला, जिससे उनकी छवि को काफी नुकसान पहुँचा। उनके परिवार को भी सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

कर्नल पुरोहित ने बाद में आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उनसे जबरन कबूलनामे लेने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी कहा कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक ऑपरेशन के तहत कुछ संगठनों के संपर्क में थे, लेकिन उनकी इस भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।

उनकी सेवा के दौरान मिलने वाले प्रमोशन और अन्य लाभ भी इस केस के चलते रुक गए। यही कारण था कि बरी होने के बाद उन्होंने AFT का रुख किया और अपने करियर की बहाली की माँग की।

भगवा आतंकवाद नैरेटिव और कॉन्ग्रेस की साजिश

इस केस के दौरान ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द काफी चर्चा में आया। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी और इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार किया गया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के बयानों को लेकर भी काफी विवाद हुआ। बाद में खुद शिंदे ने माना कि आतंकवाद को किसी धर्म या रंग से जोड़ना सही नहीं था।

अदालत ने भी अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी भी थ्योरी को केवल नैतिक आधार पर नहीं बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर ही साबित किया जाना चाहिए।

कांग्रेस (UPA) की नेतृत्व वाली केंद्र की तत्कालीन UPA सरकार ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जानबूझकर फँसाया था, जबकि सरकार को जानकारी थी कि वह ड्यूटी पर थे और खुफिया जानकारी जुटा रहे थे। हाल ही में सामने आए खुफिया दस्तावेजों से इसका खुलासा हुआ है।

मालेगाँव विस्फोट मामले में 2008 में गिरफ्तार किए गए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को उस समय की सरकार और मीडिया ने ‘हिंदू आतंकवाद‘ की विचार को स्थापित करने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को देशद्रोही बताया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस द्वारा ‘नो इनपुट अवेलेबल’ शब्द का इस्तेमाल सत्य के रूप में किया गया था। बाद में डीजीएमआई ने अधिक इनपुट के लिए परिणामी कार्यालयों को लिखा, लेकिन सरकार ने कोई फॉलोअप कार्रवाई नहीं की।

पेज 2 पर 4 लाइनें बताती हैं कि पूरा कांग्रेस नेतृत्व कर्नल पुरोहित के बारे में झूठ बोल रहा था। सेना के पत्र की लाइन 1 में कथित तौर पर निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक सोर्स नेटवर्क का संचालन कर रहे थे, जिसके माध्यम से उन्होंने खुफिया जानकारी प्राप्त की थी’। यह उस बात के विपरीत है, जिसे हमें यह मानने के लिए प्रेरित किया गया था कि ‘कोई इनपुट नहीं’ था।

भगवा आतंकवाद साबित करने की जिद में जुटे परमबीर सिंह पर कब होगी कार्रवाई? कांग्रेस के इशारे पर खेला था हिंदुओं को बदनाम करने का खेल: 26/11 पर ड्यूटी से भागा, फिर गायब किया था कसाब का फोन

                                                  IPS परमबीर सिंह (फाइल फोटो)
मालेगांव ब्लास्ट कांड की अगर गंभीरता से जाँच की गयी तो गूंज बहुत दूर तक जाएगी। ऐसी गूंज जिससे INDI गठबंधन, यूपीए, मुस्लिम कट्टरपंथी और विदेशों में बैठे इनके आकाओं तक की नींद, रोटी और पानी तक हराम हो जाएगा। भारत की दशा और दिशा ही बदल जाएगी। सनातन को अपमानित करने वालों को भी सनातन के खिलाफ बोलने मुंह खोलने से हज़ार बार सोंचना होगा। बशर्ते हिन्दुओं को किसी कोर्ट में जाने की बजाए सड़क से लेकर संसद तक उनका विरोध कर उन्हें ही ऐसा कलंकित करना होगा कि उनका परिवार ही नहीं उनकी आने वाली पीढ़ियां भी पानी पी-पीकर उनको कोसे। अब हिन्दुओं को ही जागना होगा। "सिर तन से जुदा गैंग" के भी खिलाफ हर हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं को सीमा में रहकर आवाज़ बुलंद करनी होगी, ताकि कोई कोर्ट "सिर तन से जुदा गैंग" को तारीख पर तारीख देने में उनकी कलम भी कांपे। अपराध अपराध ही होता है। फिर तारीख पर तारीख क्यों? 
मालेगाँव ब्लास्ट मामले की शुरुआती जाँच में शामिल रहे महाराष्ट्र ATS के रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर मेहबूब मुजावर ने एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि उस वक्त उन्हें कुछ खास लोगों को गिरफ्तार करने के गुप्त आदेश दिए गए थे, जिनमें RSS प्रमुख मोहन भागवत का नाम भी शामिल था।

खास बात ये है कि ये आदेश देने वाले IPS का नाम है- परमबीर सिंह। इंस्पेक्टर मेहबूब मुजावर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि परमवीर सिंह ने ही उनसे कहा था कि ‘भगवा आतंकवाद’ की झूठी कहानी तैयार करो जबकि असल में उस समय जो कुछ हुआ वह गलत था। अंत में उन्होंने साफ कहा कि कोई ‘भगवा आतंकवाद’ नहीं था, यह सब कुछ फर्जी था।

मुजावर ने सवाल करते हुए ये भी कहा कि उन्हें अब तक समझ नहीं आया कि परमबीर को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है।

साध्वी प्रज्ञा ने बताई प्रताड़ना की कहानी

इस दावे के अलावा मालेगाँव ब्लास्ट में बाइज्जत बरी हुई साध्वी प्रज्ञा ने भी परमबीर सिंह पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रज्ञा ने कहा था कि मालेगाँव केस में उन्हें हिरासत में टॉर्चर किया गया, उन्हें बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उन्हें वेंटीलेटर तक पर जाना पड़ा।

प्रज्ञा ने आरोप लगाया कि उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट गई। उन्हें पोर्न दिखाकर भद्दे सवाल पूछे गए। साध्वी का दावा है कि परमबीर ने ‘भगवा आतंक’ का झूठा नैरेटिव बनाने के लिए ये सब किया।

IPS परमबीर सिंह पर लगाए गए आरोप और दावे पहली बार नहीं हैं। सिंह पर कई बार कानून को ताक पर रखने और हिंदुओं के खिलाफ साजिश करने के आरोप लग चुके हैं। परमबीर का नाम 26/11 के आतंकी हमलों समेत कई बड़े मामलों में आ चुका है, जहाँ उन पर कानूनी अनियमितताओं और हिंदुओं को फँसाने के गंभीर इल्जाम लगे हैं।

मालेगाँव में ‘हिंदू आतंक’ साबित करने की कोशिश

साल 2008 के मालेगाँव बम धमाके में जबरन गिरफ्तार की गईं साध्वी प्रज्ञा ने कहा था कि मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह के कहने पर 3-4 पुलिसकर्मियों उन्हें बहुत अधिक प्रताड़ना देते थे। थी। उन्हें हिरासत में लेकर पुलिसकर्मी उन्हें घेर कर मारते थे। उन्हें पूरी रात बेल्ट से इस कदर पीटा गया कि उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और उन्हें वेंटिलेटर पर जाना पड़ा था।

परमबीर सिंह की देखरेख में ही साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को हिरासत के दौरान पुरुष कैदियों के साथ रखकर पोर्न वीडियो दिखाया जाता था और भद्दे सवाल किए जाते थे। उन्होंने बताया था कि पहले उनको भगवा आतंकी कहा गया, फिर भारत को आतंकवादी देश घोषित करवाने का प्रयास किया गया।

मालेगाँव ब्लास्ट में ही कर्नल श्रीकांत पुरोहित पर भी आरोप लगाए गए। उन्हें पुलिस कस्टडी में रखा गया और प्रताड़ित किया गया था। कर्नल ने कोर्ट में बताया कि परमबीर सिंह और ATS के अफसरों ने उन्हें टॉर्चर किया।

उनके साथ मारपीट, गालियाँ और प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया गया, ताकि वो ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव कबूल लें। कर्नल का कहना है कि परमबीर ने कॉन्ग्रेस की शह पर उन्हें फँसाया और उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी।

26/11 में ड्यूटी करने से किया मना

26/11 आतंकी हमलों के दौरान मुंबई के पुलिस कमिश्नर हसन गफूर थे। उन्होंने परमबीर सिंह पर आरोप लगाया था कि उन्होंने इस दौरान ड्यूटी करने से मना कर दिया था। गफूर ने कहा था कि कानून-व्यवस्था के संयुक्त आयुक्त केएल प्रसाद, अपराध शाखा के अतिरिक्त आयुक्त देवेन भारती, दक्षिणी क्षेत्र के अतिरिक्त आयुक्त के वेंकटेशम और आतंकरोधी दस्ते के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह मुंबई आतंकी हमले के दौरान अपनी ड्यूटी निभाने में विफल रहे थे।

कसाब के फोन को किया गायब जो कभी नहीं मिला

2008 में हुए इसी हमले को लेकर महाराष्ट्र के रिटायर्ड एसीपी शमशेर खान पठान ने भी परमबीर सिंह पर गंभीर आरोप लगाए। पठान ने मुंबई पुलिस कमिश्नर को लिखे पत्र में कहा कि 26/11 के बाद कसाब के पास से मिले फोन को परमबीर सिंह ने अपने पास रख लिया था। इसे उन्होंने कभी जाँच अधिकारियों को दिया ही नहीं।
कथित तौर पर इसी फोन पर कसाब को उसके आका पाकिस्तान से ऑर्डर दे रहे थे। पठान का दावा था कि इस फोन से पाकिस्तान और हिंदुस्तान के हैंडलर्स का पता चल सकता था।
पठान ने बताया था कि हमले वाले दिन वो पाईधूनी पुलिस स्टेशन में थे और उनके बैचमेट एनआर माली बतौर सीनियर इंस्पेक्टर डीबी मार्ग पुलिस थाने में कार्यरत थे। उन्होंने लिखा कि 26/11 के दिन अजमल आमिर कसाब को गिरगाँव चौपाटी इलाके में पकड़ा गया था। ऐसे में उन्होंने अपने साथी एनआर माली से फोन पर बात की।
इस दौरान उन्हें पता चला कि कसाब के पास एक फोन मिला है, जो पहले कॉन्स्टेबल कांबले के पास था और बाद में उससे परमबीर सिंह ने ले लिया।
पूर्व एसीपी के मुताबिक, इस मामले में उनकी माली से बातचीत आगे भी होती रही। उन्हें पता चला कि परमबीर सिंह ने जाँच अधिकारी को फोन नहीं दिया है। माली ने शमशेर को ये भी बताया था कि उन्होंने दक्षिण क्षेत्र के आयुक्त वेंकटेशम से मुलाकात की थी और उस फोन के बारे में बताया था।
हालाँकि इसके बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं हुई। जब पूछने के लिए माली परमबीर के पास गए तो सिंह उन पर चिल्लाने लगे और कहा कि इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है।

कांग्रेस ने गढ़ा ‘सैफरन टेरर’ का नैरेटिव, उनके ही नेता ने खोली पोल

29 सितंबर 2008 को हुए मालेगाँव ब्लास्ट और 26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई आतंकी हमले के दौरान केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। वहीं, महाराष्ट्र में कांग्रेस और NCP की गठबंधन सरकार थी। पी चिदंबरम उस समय केंद्रीय गृह मंत्री थे।
ये वही कांग्रेस सरकार है जिसने मालेगाँव ब्लास्ट के बाद से ही हिंदू समुदाय को बदनाम करने के लिए ‘हिंदू आतंकवादी’ या ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग शुरू कर दिया था। चिदंबरम ने गृह मंत्री रहते हुए ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था। यहाँ तक कि कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे और दिग्विजय सिंह ने इन शब्दों का इस्तेमाल सार्वजनिक रूप से किया।
केंद्रीय गृह मंत्री के तौर पर कार्य करते हुए 25 अगस्त 2010 को पी चिदंबरम में कहा था,  “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।”

                                                       फोटो साभार- X (@LeNonDuMonde)
सितंबर 2010 में दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ‘हिंदू आतंकवाद’ से देश को खतरा बता दिया था। विकीलीक्स खुलासे में ये बात सामने आई थी कि भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोशी रोमर को 2010 में राहुल गांधी ने कहा था कि भारत को पाकिस्तान से आने वाले इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ा खतरा हिंदू आतंकवाद से है।
इसके बाद गृह मंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बीजेपी और आरएसएस के कैंप में हिंदू आतंकवादियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। उनके बयान के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर ने उन्हें मुबारकबाद दी थी।
लगभग 11 वर्षों बाद पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और कॉन्ग्रेस के राजनेता सुशील कुमार सिंह ने 2024 में भगवा आतंकवाद पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि शब्द को इस्तेमाल करने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने ही उन पर दबाव डाला था। एक पॉडकास्ट में उन्होंने कहा, “भगवा के पीछे आतंकवाद शब्द क्यों लगाया गया मुझे आज तक पता नहीं है। यह नहीं लगना चाहिए था, ये गलत था।”

कॉन्ग्रेस की माफी माँगने की उठी माँग

NIA कोर्ट ने मालेगाँव ब्लास्ट के सभी आरोपितों को बरी करते हुए कहा कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता और अभियोजन पक्ष उन पर आरोप साबित करने में भी नाकाम रहा। इसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में चिदंबरम, सोनिया गांँधी और अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं से सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए सार्वजनिक माफी की माँग उठने लगी है। साथ ही परमबीर सिंह और कॉन्ग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी की बात भी नेटिजन्स तेजी से सोशल मीडिया पर उठा रहे हैं।
अवलोकन करें:-
मालेगाँव ब्लास्ट केस में ATS अधिकारी शेखर बागड़े ने बनाए थे फर्जी सबूत, NIA कोर्ट ने दिए जाँच के आदे
सवाल ये उठता है कि ‘हिंदू आतंकवाद’ या ‘सैफरन टेरर’ का नैरेटिव गढ़ने और इसे हर हाल में साबित करने पर तुले परमबीर सिंह ने खुद ही ये पूरा खेल खेला? या फिर चिदंबरम और सोनिया गाँधी ने मिलकर इस नैरेटिव को धरातल पर लाने के लिए और हिंदुओं को बदनाम करने के लिए इस पूरी साजिश का कर्ताधर्ता परमबीर सिंह को बना दिया?

कोर्ट ने खोल दिए कांग्रेस के ‘भगवा आतंकवाद’ के धागे, कहा- मालेगाँव ब्लास्ट पर थ्योरी तो गढ़ ली, पर सबूत एक भी नहीं; अभिनव भारत, कर्नल ने दिए RDX, साध्वी प्रज्ञा की बाइक…

                                पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित - (फाइल, फोटो साभार: First Post)
मालेगाँव ब्लास्ट केस में आये फैसले ने कांग्रेस समर्थिक यूपीए के साथ-साथ मीडिया को भी बेनकाब कर दिया। आज जो मीडिया फैसले को लेकर कांग्रेस पर प्रहार कर रही है, ये वही मीडिया है जो उस समय कांग्रेस के इशारे पर "हिन्दू और भगवा आतंकवाद" को खूब प्रचारित कर रही थी। कोई खोजी पत्रकार सच्चाई सामने लाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका, जिस वजह से हिन्दू चुपचाप अपने आपको अपमानित होते बर्दाश्त करता रहा। समय बड़ा बलवान होता है। सारे पासे पलट गए। जो सबके सामने है। कल तक कांग्रेस के इशारे पर 
"हिन्दू और भगवा आतंकवाद" का शोर मचाने वाली मीडिया आज कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर रही है।   

मुंबई की स्पेशल एनआईए कोर्ट ने 31 जुलाई को 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपितों को बरी कर दिया। इनमें पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित भी शामिल हैं।

स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा और सबूतों में कई असंगतियाँ हैं। कोर्ट ने ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हुए जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर होनी चाहिए।

यह फैसला 17 साल पुराने केस में आया है, जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी विवादास्पद रहा है। ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा घायल हुए थे। कोर्ट ने विक्टिम्स के लिए मुआवजे का भी ऐलान किया है।

मालेगाँव ब्लास्ट में कोई सबूत नहीं पेश कर पाया अभियोजन पक्ष

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने 500 पेज से ज्यादा के अपने फैसले में विस्तार से बताया कि अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने में कई गलतियाँ कीं। उन्होंने कहा, “पूरी जाँच के बाद यह साफ है कि अभियोजन कोई ठोस सबूत लाने में विफल रहा है। सबूतों में कई असंगतियाँ हैं, इसलिए सभी आरोपितों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।”

जज ने आगे जोड़ा, “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं की जा सकती। यहाँ सबूतों की कमी है, इसलिए बरी करना जरूरी है।”

कोर्ट ने विशेष रूप से ‘हिंदू आतंकवाद’ के आरोप को खारिज किया, जो अभियोजन की मुख्य थ्योरी थी। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि यह ब्लास्ट ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की साजिश थी और इसमें हिंदू आतंकवाद शामिल है। लेकिन कोई सबूत नहीं मिला कि आरोपित हिंदू आतंकवाद में लिप्त थे। आतंकवाद किसी धर्म से जुड़ा नहीं है। नैतिकता से फैसला नहीं लिया जा सकता; सबूत जरूरी हैं। यहाँ साजिश साबित नहीं हुई, इसलिए हिंदू आतंकवाद जैसी कोई अवधारणा यहाँ लागू नहीं होती।”

जज ने अभियोजन के दावों को एक-एक करके तोड़ा। उन्होंने कहा, “अभियोजन ने सात आरोपितों के बीच साजिश का आरोप लगाया, लेकिन कोई मीटिंग, कॉल रिकॉर्ड या प्लानिंग का सबूत नहीं पेश किया। सबूत असंगत हैं और पुलिस ने घटनास्थल को ठीक से सुरक्षित नहीं किया, जिससे फॉरेंसिक जाँच प्रभावित हुई।”

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर क्या कहा कोर्ट ने?

फैसले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ लगे आरोपों को विस्तार से खारिज किया गया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन का मुख्य दावा था कि ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल साध्वी ठाकुर की थी, जिस पर बम बंधा था। लेकिन फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने बाइक के चेसिस का पूरा सीरियल नंबर रिकवर नहीं किया। इसलिए, यह साबित नहीं होता कि बाइक उनकी थी।”
जज ने आगे कहा, “इसके अलावा, साध्वी ठाकुर ने ब्लास्ट से दो साल पहले संन्यास ले लिया था और सभी भौतिक चीजें त्याग दी थीं। ऐसे में बाइक उनके पास कैसे हो सकती है? अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह फेल रहा।”
कोर्ट ने ठाकुर के संन्यासी जीवन पर भी टिप्पणी की, जिसमें कहा गया, “उन्होंने दो साल पहले सब छोड़ दिया था, इसलिए मटेरियल संपत्ति से उनका कोई लेना-देना नहीं था। आरोप बेबुनियाद हैं।”

कर्नल पुरोहित के खिलाफ आरोप भी हुए धराशाई

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित पर लगे गंभीर आरोपों को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। जज ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि पुरोहित ने कश्मीर से आरडीएक्स मँगवाया और बम असेंबल किया। लेकिन कोई सबूत नहीं – न गवाह, न डॉक्यूमेंट। यह आरोप निराधार है।”
फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस पर बात करते हुए जज लाहोटी ने बताया, “पुरोहित और आरोपित अजय रहीरकर के बीच पैसे के लेन-देन हुए थे, क्योंकि वे अभिनव भारत के पदाधिकारी थे। लेकिन यह पैसा पुरोहित ने अपने घर की निर्माण और एलआईसी पॉलिसी पर खर्च किया, न कि किसी आतंकी गतिविधि पर। अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि पैसा गलत काम में लगा। इसलिए, कोई केस नहीं बनता।”

अन्य आरोपितों पर कोर्ट का रुख

कोर्ट ने बाकी आरोपितों मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहीरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ भी सबूतों की कमी बताई। जज ने कहा, “इन सभी के बीच कोई साजिश साबित नहीं हुई। अभियोजन ने मीटिंग्स या प्लानिंग के सबूत नहीं दिए। एक आरोपित सुधाकर द्विवेदी ने तो दावा किया कि कोई ब्लास्ट हुआ ही नहीं, जिसके बाद अभियोजन ने 100 से ज्यादा विक्टिम्स की जाँच की, लेकिन फिर भी केस कमजोर रहा।”

विक्टिम्स और मुआवजे पर फैसला

कोर्ट ने ब्लास्ट के विक्टिम्स को न्याय देते हुए मुआवजे का ऐलान किया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि छह लोग मारे गए, जो कोर्ट मानता है। लेकिन घायलों की संख्या 101 बताई गई, जबकि कुछ मेडिकल सर्टिफिकेट्स में हेराफेरी पाई गई। इसलिए सिर्फ 95 घायलों को मान्यता दी जाती है।”
मुआवजे पर उन्होंने आदेश दिया, “मारे गए छह लोगों के परिवारों को 2 लाख रुपये प्रत्येक और 95 घायलों को 50,000 रुपये प्रत्येक मुआवजा मिलेगा। यह राज्य सरकार देगी। विक्टिम्स को न्याय मिलना चाहिए, भले ही आरोपित बरी हों।”

क्या था पूरा मामला, जो 17 साल तक चला

यह केस 29 सितंबर 2008 को हुआ था, जब मालेगाँव के एक चौराहे पर रमजान के दौरान ब्लास्ट हुआ। मुस्लिम बहुल इलाके में मोटरसाइकिल पर रखे आईईडी से विस्फोट हुआ था। महाराष्ट्र एटीएस ने शुरुआती जाँच की और 12 लोगों को गिरफ्तार किया। एटीएस ने जिन 12 लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी शामिल थे। एटीएस ने दावा किया था कि यह विस्फोट अभिनव भारत संगठन की साजिश का हिस्सा था।
इस मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आरोप लगाए गए थे।
साल 2010 में जाँच एनआईए को सौंपी गई। एनआईए ने 2016 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और एमसीओसीए हटाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा कि कुछ आरोपितों के खिलाफ सबूत कम हैं। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने सात आरोपितों पर ट्रायल का आदेश दिया, जबकि तीन को डिस्चार्ज कर दिया। ट्रायल दिसंबर 2018 में शुरू हुआ, जिसमें 323 गवाहों की जाँच हुई। 34 गवाह होस्टाइल हो गए और 30 से ज्यादा मर चुके थे। अप्रैल 2024 में अंतिम बहस खत्म हुई और 19 अप्रैल को फैसला रिजर्व किया गया।
अभियोजन की तरफ से स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अविनाश रसल थे, जबकि आरोपितों की तरफ से कई वकील, जैसे जेपी मिश्रा (ठाकुर और रहीरकर), पासबोला समेत अन्य (उपाध्याय), फड़के और बाबर (पुरोहित), रंजीत सांगले (द्विवेदी), और पुनालेकर समेत अन्य (चतुर्वेदी) ने अपनी दलीलें पेश की।

कोर्ट ने अभियोजन की कमियाँ की उजागर

जज ने पुलिस और अभियोजन की कई कमियों पर उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “पुलिस ने घटनास्थल को सुरक्षित नहीं किया, जिससे सबूत खराब हुए। फॉरेंसिक जाँच में गड़बड़ियाँ हैं। गवाहों की मौत और होस्टाइल होना भी केस को कमजोर किया। कुल मिलाकर अभियोजन का केस असंगत है।”
फिर से हिंदू आतंकवाद पर जज साहब ने दोहराया। “टेररिज्म का कोई धर्म नहीं। लेकिन यहाँ प्रॉसीक्यूशन ने हिंदू आतंकवाद की थ्योरी बनाई, जो सबूतों पर नहीं टिकी। नैतिक आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सबूत जरूरी हैं, और यहाँ सबूत नहीं हैं। इसलिए, सभी आरोपितों को बरी किया जाता है।”
एनआईए कोर्ट के फैसले के बाद सुधाकर धर द्विवेदी के वकील रंजीत साँगले ने कहा, “ये साबित नहीं हुआ कि ब्लास्ट में इस्तेमाल मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी। घायलों के सर्टिफिकेट नकली थे। डीजी एटीएस को आदेश दिया गया है कि वो जाँच करें कि ये नकली सर्टिफिकेट किसने बनाए। सुधाकर चतुर्वेदी के घर पर रखा गया आरडीएक्स की भी जाँच डीजी एटीएस को करने को कहा गया है। सभी आरोपितों को यूएपीए और दूसरी धाराओं से बरी कर दिया गया है। अभियोजन यूएपीए के तहत आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा।”
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फैसला खत्म होने पर कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। आरोपित खुश दिखे, प्रॉसीक्यूशन वाले निराश। यह पूरा फैसला दिखाता है कि कानून सबूतों पर चलता है, नैतिकता पर नहीं। जज साहब ने हर बयान को विस्तार से दिया, ताकि कोई शक न रहे।

क्या कांग्रेस के DNA में ही हिन्दू जहर है? कांग्रेस ने जहर उगलना नहीं किया बंद: कांग्रेस MP रेणुका चौधरी बोलीं- हिंदू होते हैं आतंकवादी


मालेगांव बम धमाका मामले में करीब 17 साल बाद एनआईए की विशेष अदालत ने गुरुवार को फैसला सुना दिया। कोर्ट ने कहा कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता। कोर्ट ने ब्लास्ट के सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। जैसे ही ये फैसला आया बीजेपी ने इसे ऐतिहासिक करार दिया। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हिंदू आतंकवाद को देश के ऊपर जबरन थोपने का जो कांग्रेस पार्टी का षडयंत्र था, वो आज धराशायी हो गया। भले ही बीजेपी भगवा आतंकवाद के मुद्दे पर कांग्रेस को टारगेट कर रही हो। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की एक राज्यसभा सांसद ने फिर से 'हिंदू आतंकवाद' शब्द का जिक्र किया है।

मालेगांव ब्लास्ट केस में कोर्ट का फैसला आने के बाद भी कांग्रेस ने जहर उगलना बंद नहीं किया है। मामले में सांसद रेणुका चौधरी ने कहा है कि मैं नहीं मानती कि हिंदू आतंकवादी नहीं होते हैं।

रेणुका चौधरी ने क्या कहा जानिए

कांग्रेस से राज्यसभा सांसद रेणुका चौधरी ने मालेगांव केस पर आए कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी की। एक न्यूज चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अभी जो सरकार है, उसमें इन लोगों का छूटना तो तय ही था। वो छूट गए हैं, देखते हैं कि आगे क्या होता है। उन्होंने आगे कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। जब हम मुस्लिम आतंकवादी कहते हैं, तो हिंदू आतंकवाद कहने की जरूरत पड़ जाती है। इसलिए वह सिर्फ आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल करती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, मालेगांव ब्लास्ट के बाद कांग्रेस ने इसे ‘भगवा आतंकवाद’ का नाम दिया था। कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने कहा, “ये तो हमें पता था कि ये होने वाला है। अक्लमंद को इशारा काफी है। कल गृहमंत्री के बयान के बाद ये तय था।”

सांसद ने कहा, “आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता। लेकिन मुस्लिम आतंकवाद कहते हैं तो हिंदू आतंकवाद कहने की मजबूरी हो जाती है। मैं नहीं मानती कि हिंदू आतंकवादी नहीं होते हैं। हिंदू धर्म में कई लोग होते हैं। हर मजहब के आतंकवादी होते हैं।

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मालेगांव ब्लास्ट केस में NIA की विशेष अदालत ने गुरुवार (31 जुलाई 2025) को सभी सात आरोपितों को बरी कर दिया। आदेश पढ़ते हुए अभय लहौटी ने कहा, “कोर्ट ने कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, क्योंकि कोई भी मजहब हिंसा की वकालत नहीं करता।”