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कश्मीर : जब गैंगरेप करके सड़क पर फेंकी गई हिंदू नर्स की क्षत-विक्षत लाश… सरला भट्ट केस में 36 साल बाद आतंकी यासीन मलिक समेत 5 के खिलाफ चार्जशीट दायर

                     यासीन मलिक पर सरला भट हत्याकांड में चार्जशीट दायर (फोटो साभार- दैनिक भास्कर)
वो भी क्या दिन थे जब शेख जी फाख्ता उड़ाते थे यानि आतंकवाद को बढ़ावा, सेना के जवानों को मारने और हिन्दुओं को मारने वालों को कांग्रेस से लेकर यूपीए(यानि वर्तमान INDI गठबंधन) बहुत सम्मान दिया करते थे, प्रधानमंत्री आवास में किसी सम्मानित की तरह आओभगत होती थी। वक़्त का चक्र ऐसा घुमा आज जेल में ज़िंदगी काटने को मजबूर।

टेरर फंडिंग के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा जेकेएलएफ का पूर्व प्रमुख यासीन मलिक के खिलाफ 36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्याकांड में बड़ी कार्रवाई हुई है। जम्मू-कश्मीर की एसआईए ने 36 साल पुराने मामले में 737 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। इसमें उसे मुख्य आरोपितों में शामिल किया है।

इसके तीन आरोपितों, अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद युसूफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है। चौथा आरोपित मुख्य शूटर खुर्शीद अहमद चालको फरार है और उसके पीओके में छिपे होने की आशंका है। सरला को उसी ने गोली मारी थी। चार्जशीट के मुताबिक, यासीन मलिक और उसके 4 साथियों ने अप्रैल 1990 में सरला भट्ट को अगवा किया और उसकी हत्या की साजिश रची।

सरला भट्ट कौन थी?

कश्मीरी पंडित सरला भट्ट उस वक्त श्रीनगर के शेर ए कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (SKIMS) में स्टाफ नर्स थीं। 36 साल पहले उनका अपहरण किया गया। उन्हें यातनाएँ दी गईं। बाद में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। सरला अनंतगाग की रहने वाली थी।

18 अप्रैल 1990 को सरला ड्यूटी पर जा रही थीं। इसी दौरान अस्पताल परिसर के पास से उन्हें उठा लिया गया। चार दिन तक अलग-अलग जगह रख कर बुरी तरह टॉर्चर किया गया। बाद में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका शव श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में मिला। शरीर पर गोलियों के साथ साथ उन यातनाओं के भी निशान थे, जो चार दिनों तक उन्हें दिए गए।

शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उसे ‘सुरक्षाबलों का मुखबिर’ होने की बात कही गई थी। इतना ही नहीं सरला के परिवार वालों पर भी जुल्म ढाए गए। उसके घर पर ग्रेनेड से हमला किया गया और कश्मीर से पलायन के लिए मजबूर किया गया। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि इस हत्या का उद्देश्य कश्मीरी पंडितों में भय पैदा करना था, ताकि उनका घाटी से पलायन तेज हो।

एसआईए ने 737 पन्नों की चार्जशीट विशेष अदालत में दाखिल की। इसमें यासीन मलिक सहित 5 लोगों को आरोपी बनाया गया। चार्जशीट में प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य, मेडिकल और फॉरेंसिक सामग्री तथा नई जाँच के आधार पर आरोप तय किए गए।

यासीन मलिक पर अब तक किन-किन मामलों में कार्रवाई हुई?

यासीन मलिक आतंकियों की फंडिंग का दोषी है। इस मामले में उसे उम्रकैद की सजा मिली है। NIA ने 2017 में यह मामला दर्ज किया था। उसने घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए हवाला के जरिए धन जुटाया। 2022 में यासीन मलिक ने अदालत में कई आरोप स्वीकार किए। दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।

उस पर आतंकवाद, आपराधिक साजिश और UAPA के तहत भी कई मामले दर्ज हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े आरोप है।

इन मामलों में भी उन्हें दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई।

जनवरी 1990 में श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के जवानों पर हुए हमले के मामले में भी यासीन मलिक का नाम आया था।

इस मामले में भी NIA ने कार्रवाई की है और मुकदमा न्यायिक प्रक्रिया में है।

1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के मामले में भी यासीन मलिक का नाम जाँच के दौरान आया। इस मामले में भी अदालत में मुकदमा चल रहा है और अंतिम फैसला नहीं आया है।

1990 के दशक में उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुई थीं। जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ दर्जनों आपराधिक और आतंकवाद संबंधी मामले अलग-अलग वक्त पर दर्ज हुए हैं। इनमें से कुछ में वह दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि कुछ अभी भी न्यायालय में लंबित हैं।

फिलहाल यासीन मलिक आतंकवाद फंडिंग मामले में तिहाड़ में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। NIA ने उनकी सजा बढ़ाकर मृत्युदंड किए जाने की भी अपील की है, जिस पर उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। सरला भट्ट हत्याकांड की नई चार्जशीट उनके खिलाफ एक अलग और महत्वपूर्ण कानूनी कार्रवाई है, जिसकी सुनवाई आगे होगी।

दिल्ली में गिरफ्तार ISIS आतंकी अबू मुहरिब पहले भी हुआ था अरेस्ट, ज्ञानवापी सर्वे का आदेश देने वाले ‘काफिर’ जज को मारने की दी थी धमकी: सिर्फ 4 माह में मिल गई थी जमानत

                             दिल्ली में ISIS के 2 आतंकी गिरफ्तार (साभार: OPIndia English)
राष्ट्रीय राजधानी में शुक्रवार (24 अक्टूबर 2025) की सुबह एक आतंकवादी साजिश को नाकाम कर दिया गया। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) के एक आतंकवादी मॉड्यूल को तोड़ दिया। इस ऑपरेशन में दो आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक का नाम मोहम्मद अदनान खान उर्फ अबू मुहरिब है, जो दिल्ली का रहने वाला है। दूसरा अदनान खान उर्फ अबू मोहम्मद है, जो मध्य प्रदेश का रहने वाला था। मुहरिब की उम्र 19 साल तो अबू मोहम्मद की उम्र 20 साल है

इससे पहले, ऑपइंडिया ने अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में खुलासा किया था कि ISIS के एक आतंकवादी मोहम्मद अदनान खान उर्फ अबू मुहरिब को उत्तर प्रदेश ATS ने पहले भी गिरफ्तार किया था।

वो 2024 से जमानत पर बाहर था। उसे उत्तर प्रदेश ATS ने UAPA के तहत गिरफ्तार किया था। दिल्ली स्पेशल सेल ने कहा, “भोपाल से एक संदिग्ध को पहले UP ATS ने अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था; 2024 में जमानत मिलने के बाद उसने आतंकवादी गतिविधियां फिर शुरू कर दीं, मुख्य रूप से ऑनलाइन भर्ती और प्रोपगैंडा फैलाने के जरिए। निगरानी से पता चला कि मॉड्यूल ने इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) बनाने के लिए सामग्री जुटानी शुरू कर दी थी।”

दिल्ली स्पेशल सेल ने बताया कि मोहम्मद को सख्त UAPA एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था, लेकिन कोर्ट ने 2024 में उसे जमानत दे दी थी। 

जमानत पर बाहर आने के बाद उसने अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ फिर शुरू कर दीं और ISIS से जुड़ाव बढ़ा लिया। उसने सोशल मीडिया के जरिए इस्लामिक प्रोपगैंडा सामग्री फैलानी शुरू की और ISIS के लिए आतंकवादियों की भर्ती शुरू करती। उसने आतंकी हमलों के लिए IED बनाने की सामग्री भी जुटानी शुरू कर दी थी।

ऑपइंडिया ने अब वो केस ढूँढ निकाला है जिसमें अदनान को UP ATS ने गिरफ्तार किया था और बाद में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्पेशल NIA कोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी।

ISIS आतंकवादी ने ज्ञानवापी केस में ‘काफिर’ जज को मारने की दी थी धमकी

दिल्ली स्पेशल सेल ने अब जिस ISIS आतंकी मोहम्मद अदनान को गिरफ्तार किया है, उसने ज्ञानवापी केस से जुड़े एक जज को धमकी दी थी। उसने इंस्टाग्राम पर लिखा, “THE KAFIRS BLOOD IS HALAL FOR YOU THOSE WHO FIGHT AGAINST YOUR DEEN.” तस्वीर में जज की आंखों के ऊपर लाल रंग में ‘KAFIR’ लिखा हुआ था।
FIR के मुताबिक, मोहम्मद अदनान ने अतिरिक्त जिला जज (फास्ट ट्रैक कोर्ट) बरेली, रवि कुमार दीवाकर की फोटो शेयर की थी, जिन्होंने 2022 में विवादित ज्ञानवापी ढाँचे के वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश दिया था।
UP ATS की FIR में लिखा है, “उनके विचारधारा से जुड़े लोग ज्ञानवापी केस सुन रहे जज को मारने के लिए प्रेरित हो रहे हैं और ये पोस्ट दूसरी धर्मों वालों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा रही है और वर्गों के बीच दुश्मनी व नफरत फैलाने के लिए राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ की जा रही हैं।”

जमानत देते वक्त कोर्ट ने क्या कहा था?

स्पेशल NIA जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने 26 सितंबर 2024 को मोहम्मद अदनान को जमानत दी। उन्होंने जमानत देने के दो मुख्य कारण बताए। पहला ये कि अदनान पर लगा अपराध 7 साल से कम सजा वाला था। वो जून 2024 से जेल में था, इसलिए उसे जमानत का हक था।
दूसरा कारण ये था कि उसका कोई पुराना क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था।
अदनान पर IPC की धारा 153A, 115 और 506 के साथ UAPA की धारा 13 लगी थी। उस केस में जमानत मिलने के बाद उसने कथित तौर पर चरमपंथी गतिविधियाँ फिर शुरू कर दीं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और दूसरी प्लेटफॉर्म्स पर चैनल बनाकर चरमपंथी सामग्री पोस्ट की और समान विचार वाले लोगों की भर्ती की। उसने सीरिया में बैठे हैंडलर अबू इब्राहिम अल-कुरैशी से संपर्क होने की बात भी कबूल की।

अरुंधति रॉय पर 13 साल पुराने मामले में केस क्यों चला रहे हैं, वामपंथी यह सवाल उठा रहे हैं; लेकिन MJ Akbar पर 20 साल पुराना metoo केस में आरोप लग सकता था

 सुभाष चन्द्र

कल(जून 14) दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने अरुंधति रॉय और कश्मीर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर  Sheikh Showkat Hussain के खिलाफ UAPA में मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी इस मामले में FIR सुशील पंडित ने कराई थी दो नामजद chairman of Tehreek-e-Hurriyat Syed Ali Shah Geelani और former Delhi University professor Syed Abdul Rehman Geelani मर चुके हैं एक और आरोपी था माओवादी वारा वारा राव जो भीमा कोरेगांव मामले में भी शामिल है सईद अली शाह गिलानी वही था जो नारा लगाता था -”मेरी जान मेरी जान, पाकिस्तान पाकिस्तान” यह अरुंधति उसके साथ थी

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इन लोगों पर आरोप है कि उन्होंने Committee for Release of Political Prisoners (CRPP)’ द्वारा आयोजित सभा,  ‘Azadi - The Only Way’ पर बोलते हुए  October 21, 2010  को  LTG Auditorium, Copernicus Marg, New Delhi में उकसाने वाले और देश को तोड़ने हेतु भाषण दिए सम्मेलन भी कश्मीर को भारत से अलग करने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया गिलानी और अरुंधति पर आरोप है कि “उन्होंने इस बात का जोर शोर से प्रचार किया कि -

“कश्मीर कभी भी भारत का हिस्सा नहीं था और सशस्त्र बलों ने जबरन कब्ज़ा किया हुआ है, जम्मू कश्मीर की आज़ादी के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए 

अरुँधति रॉय के खिलाफ जिस भाषण को लेकर केस चलाया जा रहा है, वो भाषण 21 अक्टूबर 2010 को दिल्ली में आयोजित ‘आजादी: द ओनली वे’ नाम के सेमिनार में दिया गया था, जिसमें भारत विरोधी सैयद अली शाह गिलानी, शेख शौकत हुसैन, वरवर राव जैसे लोग मौजूद थे।

इस केस की जांच चल रही थी जिसके पूरा होने पर उप राज्यपाल ने मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है अरुंधति रॉय अभी 62 वर्ष की है और मुकदमा चलते चलते 10 साल लग जाएंगे नए कानून जो लागू होंगे 1 जुलाई से, उनकी वजह से मुकदमा जल्दी भी निपट सकता है मगर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तो कोई समय सीमा नहीं है अपील जल्दी निपटाने के लिए इसका मतलब ये मुकदमा ख़त्म होने तक अरुंधति 75 वर्ष की हो जायेगी और अगर सजा मिली तो लालू के तरह अस्पताल में रह कर कुछ दिन में बाहर आ जाएगी

कल LG का आदेश आते ही वामपंथी news portals और कुछ अख़बार भी विधवा विलाप करने लगे कि सरकार 13 साल पुराने केस को क्यों शुरू कर रही है ले लोग बताएं कि MJ Akbar के खिलाफ एक महिला 20 साल पुराना metoo का केस शुरू कर सकती है तो अरुंधति का मामला तो 13 साल पुराना है, वो जांच के बाद क्यों शुरू नहीं हो सकता 

अपने भाषण में अरुँधति रॉय दावा कर रही है कि भारत सरकार ने गरीबों के खिलाफ जंग छेड़ा हुआ है। देश के आदिवासी इलाकों में असंतोष को हवा देते हुए तत्कालीन यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए अरुँधति ने कहा, “मैं हप्ते या 10 दिन पहले राँची में थी, जहाँ ऑपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ पीपल्स ट्रिब्यूनल चल रहा है। ऑपरेशन ग्रीन हंट देश के सबसे गरीब लोगों के खिलाफ भारत राज्य की लड़ाई है।”

इस सेमिनार का आयोजन दिल्ली में CRPP ने किया था। इस सेमिनार में 15 मिनट लंबा भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने भारत देश के खिलाफ जमकर जहर उगला था। ऑपइंडिया के पास अरुँधति रॉय का दिया पूरा भाषण मौजूद है। जिसमें भारत विरोधी उसके भाषण पर उसके समर्थक जमकर तालियाँ बजा रहे थे। इसमें से 8 मिनट का वीडियो यहाँ देख सकते हैं।

 

 देश में जातीय और सांप्रदायिक मतभेद पैदा करने की कोशिश

इस दौरान अरुँधति रॉय ने दावा किया कि भारतीय राज्य सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से भारत के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा कर रहा है। जिसमें अल्पसंख्यकों और कुछ जातीय समूहों को ‘उच्च जाति हिंदू राज्य’ द्वारा ‘उत्पीड़ित’ किया जा रहा है।
“अंग्रेजों ने 1899 में भारत का नक्शा बनाया। जैसे ही वो आजाद हुआ, वो खुद औपनिवेशिक ताकत (अंग्रेजों की तरह) बन गया। भारतीय राज्य ने मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम, कश्मीर, तेलंगाना, नक्सलवाड़ी असंतोष, पंजाब, हैदराबाद, गोवा, जूनागढ़ में हस्तक्षेप किया। भारत राज्य, भारत का अमीर वर्ग और भारत के अमीर लोग नक्सलियों पर युद्ध छेड़ने के आरोप लगाते हैं, लेकिन खुद भारत राज्य ने अपने ही लोगों के खिलाप 1947 से लगातार युद्ध छेड़ा हुआ है। चाहे वो नगा हों, मिजो हों, मणिपुरी हो, असल के लोग हों, हैदराबाद, कश्मीर या पंजाब हो। हमेशा अल्पसंख्यों, जिसमें मुस्लिम, आदिवासी, ईसाई और दलित, वनवासी हैं, उनके खिलाफ उच्च जाति के हिंदू राज्य ने युद्ध छेड़ा हुआ है। यही हमारे देश का आधुनिक इतिहास है।”
भारत के आंतरिक लोगों को भड़काने के बाद विवादास्पद लेखिका ने खुलेआम जम्मू-कश्मीर को भारत संघ से अलग करने की वकालत की। उसने ‘आजादी’ के पाकिस्तानी नरेटिव को आगे बढ़ाता और बताया कि कैसे भारत ने कश्मीर और कश्मीरियों पर कब्जा किया है।
एक पत्रकार के साथ 2007 की बातचीत को याद करते हुए, अरुंधति रॉय ने कहा, “भारत को कश्मीर से आजादी की उतनी ही जरूरत है जितनी कश्मीर को भारत से आजादी की जरूरत है।” और जब मैंने भारत कहा, तो मेरा मतलब भारतीय राज्य से नहीं था, मेरा मतलब भारतीय लोगों से था क्योंकि मुझे लगता है कि कश्मीर पर कब्जा – आज 12 मिलियन लोगों की उस घाटी में 700,000 सुरक्षाकर्मी तैनात हैं – यह दुनिया का सबसे अधिक सैन्यीकृत क्षेत्र है – और हमारे लिए, भारत के लोगों के लिए, उस कब्जे को बर्दाश्त करना हमारे रक्तप्रवाह में एक तरह के नैतिक क्षरण को अनुमति देने जैसा है।”
यह जानते हुए भी कि उसके राजधानी दिल्ली में दिए भड़काऊँ भाषण से कश्मीर घाटी में लॉ एंड ऑर्डर की समस्या पैदा हो सकती है, उसने आगे कहा, “कश्मीरी बिना एक-47 की नाल से निकलते धुएँ के साँस भी नहीं ले सकते। बहुत कुछ यहाँ किया गया है। हर बार एक चुनाव होता है। लोग वोट देते हैं और भारत सरकार वहाँ जाकर बोलती है, ‘तुम्हें रेफरेंडम क्यों चाहिए? यहाँ लोग भारत के लिए वोटिंग करते हैं।”

कश्मीरी अलगाववाद की भारत की आजादी की लड़ाई से तुलना गलत

अरुँधति रॉय ने एक बेहद गलत व्याख्या करते हुए दावा किया कि कश्मीर में ‘आजादी’ की लड़ाई भारत देश की औपनिवेशिक ताकत ब्रिटेन के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई की तरह ही है। अरुँधति रॉय ने कहा, “अब, कभी-कभी यह जानना बहुत मुश्किल होता है कि औपचारिक रूप से भारत के नागरिक के रूप में कोई व्यक्ति किस स्थान पर खड़ा है, कोई क्या कह सकता है, उसे क्या कहने की अनुमति है, क्योंकि जब भारत ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आज़ादी के लिए लड़ रहा था – कश्मीर में आज़ादी की समस्याओं को लेकर लोग जो भी तर्क देते हैं, वे निश्चित रूप से भारतीयों के खिलाफ़ इस्तेमाल किए गए थे। मोटे तौर पर कहें तो, “मूल निवासी आज़ादी के लिए तैयार नहीं हैं, मूल निवासी लोकतंत्र के लिए तैयार नहीं हैं।”
“औपनिवेशिक राज्य चाहे वो भारत में ब्रिटिश राज्य रहा हो या कश्मीर, नगालैंड या फिर छत्तीसगढ़ में भारतीय राज्य, उसके एलीट लोग इस कब्जे को मैनेज करते हैं। तो तुम्हें अपने दुश्मनों और उन्हें कैसे जवाब देना है, इस बारे में पता होना चाहिए। तुम होशियार हो, चाहे वो इंटरनेशनल लेवल पर राजनीति की बात हो या स्थानीय स्तर पर किसी भी स्तर पर, तुम्हें अपने साथी बनाने होंगे। वर्ना तुम लोग टैंक में फँसी मछलियों जैसे होंगे, जो टैंक की दीवारों पर बमबारी कर के थक जाओगे, क्योंकि दीवारें बहुत मजबूत हैं।”

कांग्रेस तो नरेंद्र मोदी को गोधरा मामले में 15 साल तक उलझा कर सकती है और सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बाद भी उठाते रहती है लेकिन अरुंधति का केस शुरू नहीं होना चाहिए अरुंधति रॉय से अगर आप आज भी पूछेंगे तो उनके विचार आज भी वैसे ही होंगे जैसे 2010 में थे और हो सकता है, उससे भी खतरनाक हों ऐसे लोगों को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाते हैं जिन्हें देख कर जज साहब थोड़ा दबाव में आ जाएं

देश के खिलाफ विद्रोह करने वालों को ऐसे छोड़ दिया जाता है ; देश के विरुद्ध साज़िशकर्ताओं पर मीलॉर्ड कब गंभीर होंगे?

सुभाष चन्द्र

मई 16 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने न्यायप्राणी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सुप्रीम कोर्ट पर भी प्रहार कर दिया, जिससे सुप्रीम कोर्ट में हड़कंप मचना स्वाभाविक है। जिस आधार पर अरविन्द केजरीवाल को interim bail दी, तिहाड़ में बंद अन्य मुख्यमंत्रियों/नेताओं को क्यों नहीं दी? अगर चुनाव केजरीवाल के लिए प्रमुख है अन्यों के लिए क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने कल(मई 15) Newsclick के editor प्रबीर पुरकायस्थ की UAPA में गिरफ्तारी अवैध कहते हुए रिहा कर दिया। जस्टिस बी आर गवई और संदीप मेहता ने उसका कारण बताया कि उसे गिरफ़्तारी के कारण लिख कर नहीं दिए गए 

यानी 2021 जुलाई से पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी गिरफ़्तारी पर रोक लगाई थी और बड़ी मुश्किल से दिल्ली पुलिस के हाथ लगा था ये चीन पैसा लेकर भारत की Stability & Integrity के साथ खिलवाड़ करने वाला और उसे छोड़ कर जैसे उसके देश के खिलाफ सभी कामों को भी जैसे ठीक बता दिया। मीलॉर्ड ने कहा कि UAPA में गिरफ़्तारी के कारण बताना जरूरी है और नहीं बताए तो गिरफ़्तारी अवैध है

लेखक 
चर्चित यूटूबर 
पुरकायस्थ पर चीन से 75 करोड़ रुपए मंगवाने का गंभीर आरोप है

इसके अलावा सबसे खतरनाक आरोप इन पर था कि इसने उत्तर भारत के borders का ऐसा नक्शा बनाया जिसमें अरुणाचल प्रदेश और J&K को भारत का हिस्सा नहीं दिखाया लेकिन मीलॉर्ड ने इस पर कुछ ध्यान नहीं दिया और तकनीकी आधार पर रिहा कर दिया

पुरकायस्थ 3 अक्टूबर, 2023 को गिरफ्तार हुआ था तब मजिस्ट्रेट को इसे 7 दिन की रिमांड पर भेजते हुए यह देखना चाहिए था कि Grounds of Arrest बताये गए हैं या नहीं तुषार मेहता ने हाई कोर्ट में कहा था कि UAPA guidelines में अरेस्ट के ग्राउंड के written copy देना जरूरी नहीं है वैसे मजिस्ट्रेट के सामने grounds बता दिए गए थे

पुरकायस्था ने हाई कोर्ट में अपील की थी लेकिन हाई कोर्ट ने 10 अक्टूबर को उसकी अपील खारिज कर दी यह कहते हुए कि उसमे कोई Merit नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिहाई के लिए पंकज बंसल के केस का जिक्र किया है लेकिन वह केस UAPA का नहीं था बल्कि PMLA का था और दोनों कानून अलग है वैसे भी वह फैसला दिसंबर, 2023 का था जबकि पुरकायस्था गिरफ्तार अक्टूबर, 23 में हुआ। उसको backdate में कैसे apply कर सकते हैं

ये तो मतलब साफ़ हो गया कि सुप्रीम कोर्ट हर किसी को छोड़ने में आगे रहेगा चाहे वह देश का दुश्मन ही क्यों न हो दूसरे शब्दों में जो भी मोदी सरकार के खिलाफ होगा, अदालत उसके साथ होगी जैसे केजरीवाल के साथ थी जिसे अनैतिक रूप से बेल दे दी गई आज(मई 16) अमित शाह से सुन ही लिया न कि अदालत द्वारा उसे special Treatment दिया गया एक गृह मंत्री इससे ज्यादा और सख्त नहीं कह सकता अदालत के आचरण पर 

मजिस्ट्रेट ने परवाह नहीं की और न ही हाई कोर्ट ने परवाह नहीं की आपको चिंता थी तो पुलिस को हिदायत दे सकते थे कि 2 दिन में उसको लिखित में गिरफ़्तारी के आधार बताये जाएं मगर आपने तो उसे छोड़ना ही बेहतर समझा

आप उसे कह रहे हैं कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करना आपने कह दिया और उसने मान लिया, ऐसा होगा क्या? वो सारे पैसे और ख़ुफ़िया  जानकारी सात तालों में बंद कर छुपा कर चीन से मंगवा लाया और उससे आप उम्मीद कर रहे हो कि सबूतों से छेड़छाड़ न करे

पुरकायस्थ तो मौका मिलते ही सबूतों को नष्ट कर देगा इतना गंभीर केस सुप्रीम कोर्ट ने मिट्टी मिला दिया जिसका मतलब यह भी निकलता है कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट को इशारा है सोच कर फैसले करना हम बैठे हैं ऊपर 

पाकिस्तान जाकर हथियारों की ट्रेनिंग केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने दे दी जमानत, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला, कहा – तुरंत हिरासत में लो

एक शख्स हथियारों के प्रशिक्षण के लिए सीमा पार कर पाकिस्तान जाने की योजना बना रहा था। उस पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत केस दर्ज किया गया। आरोपित शख्स को दिल्ली हाईकोर्ट ने डिफॉल्ट जमानत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को पलट दिया है। फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आंतक संबंधित केसों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को अदालतों को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि ये आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े मामले हैं।

SC की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस राजेश बिंदल की बेंच ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट टाडा मामले में शीर्ष अदालत के 1994 के फैसले पर गलत तरीके से निर्भर रहा और उसने यूएपीए मामले में उसके 2019 के फैसले को नजरअंदाज किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के इस फैसले में कहा था कि यूएपीए मामलों में जाँच के लिए अधिकतम 180 दिनों तक का वक्त लिया जा सकता है। दरअसल जिस आरोपित को दिल्ली हाईकोर्ट ने डिफॉल्ट जमानत दी गई थी, उस पर आईपीसी, यूएपीए और शस्त्र अधिनियम के कई प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए थे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस केस में जाँच पूरी करने में हो रही देरी के आधार पर आरोपित को डिफ़ॉल्ट जमानत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, “एक और पहलू पर विचार किया जाना चाहिए कि अपराध आतंकवादी गतिविधियों की प्रकृति का है। इससे न केवल पूरे भारत पर असर पड़ता है बल्कि ये अन्य दुश्मन देशों के असर से भी जुड़ा है। मामले को इतने हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए था।”

इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिफॉल्ट जमानत पर रिहा आरोपित को तुरंत हिरासत में लेने का निर्देश दिया। बताते चलें कि दिल्ली पुलिस ने खालिस्तान समर्थन के आरोप में लवप्रीत के खिलाफ यूएपीए की धारा 13, 18, 20 के साथ ही आईपीसी की धारा 201/120 बी और अन्य कानूनों के तहत केस दर्ज किया था। इसी के तहत उसे गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उसे 90 दिन की हिरासत में भेजा गया था और इस हिरासत का वक्त खत्म होने के बाद जाँच अधिकारी ने विशेष अदालत में जाँच का वक्त बढ़ाने की अर्जी दी थी, जिसे मंजूर कर ली गई थी।

जब बढ़ाए गए वक्त के दौरान भी जाँच पूरी नहीं हुई तो लोक अभियोजक ने यूएपीए की धारा 43डी(2)(बी) के तहत अदालत में जाँच के वक्त को और बढ़ाने को लेकर फिर से अर्जी दी थी। इस अर्जी को भी विशेष अदालत ने मान लिया और जाँच के लिए वक्त बढ़ा दिया।

इसके बाद जाँच पूरी हुई और बढ़ा हुआ वक्त खत्म होने से पहले ही दिल्ली पुलिस ने सीआरपीसी की धारा (173)(2) के तहत रिपोर्ट पेश कर दी थी। लेकिन इस रिपोर्ट के पेश किए जाने से पहले ही आरोपित ने विशेष अदालत में डिफॉल्ट जमानत की याचिका दे दी थी। हालाँकि विशेष अदालत ने उसे डिफॉल्ट जमानत देने से इनकार कर दिया था।

इसके खिलाफ आरोपित ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दी थी। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस की दलीलों को नजरअंदाज कर आरोपित को डिफॉल्ट जमानत दे दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।