सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि अगर कोई दलित ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत केस नहीं कर सकता।
पीठ ने कहा “जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा, किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर SC का दर्जा ख़त्म हो जाता है”।
एक ईसाई पादरी चिंथाडा आनंद ने अक्काला रामिरेड्डी के खिलाफ SC/ST एक्ट में केस दर्ज किया और FIR भी। रेड्डी हाई कोर्ट चला गया और कहा कि आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है और उसका SC दर्जा ख़त्म हो गया है। हाई कोर्ट ने रेड्डी के पक्ष में फैसला दिया। इसके खिलाफ पादरी सुप्रीम कोर्ट चला गया लेकिन वहां भी उसकी याचिका ख़ारिज हो गई।
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तीसरी बात कोर्ट ने यह भी कही कि मूल धर्म में वापसी के बाद उसके समुदाय को भी उसे अपने सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी।
लोग कानूनी दाव पेच में लगे रहते है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कुछ नया नहीं है। सरकार के Brochure on Reservation for SC/ST में ये सब नियम पहले से ही दिए हुए हैं। यह मुझे इसलिए भी पता है क्योंकि मैंने अपनी नौकरी में रहते हुए Corporate level पर Reservation मामले पर 10 वर्ष काम किया है - कुछ लोग ग़लतफ़हमी में आरक्षण का लाभ लेने के लिए शादी भी SC/ST से कर लेते हैं जबकि आरक्षण का लाभ किसी गैर SC/ST को शादी करने के बाद भी नहीं मिलता। पिता की जाति से ही बच्चो की जाति तय होती है और अगर कोई लड़की SC है लेकिन उसका पति SC नहीं है तो उसके बच्चो को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दे दिया है कि ईसाई या इस्लाम के मानने वाले को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता तो फिर आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को 4% पिछड़े वर्ग का होने के बहाने आरक्षण कैसे दिया जा रहा है। हाई कोर्ट ने उसे गैर कानूनी घोषित किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice K. G.Balakrishnan,Justice J.M.Panchal और Justice B. S. Chauhan की पीठ ने 25 मार्च, 2010 को अपने अंतरिम आदेश में न तो कानून पर रोक लगाई, न वैध करार दिया और न ख़ारिज किया लेकिन 4% आरक्षण को तब तक जारी रखने के आदेश दे दिए जब तक संविधान पीठ उस पर निर्णय न ले ले।
यानी आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण 16 साल से मिल रहा है और अब कल के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार वह आरक्षण रद्द होता है तो कोर्ट क्या ऐसे गैर कानूनी रूप से भर्ती लोगों को नौकरी से कैसे निकालेगा।
इस विषय को 16 साल से लटकाना अपने आप में एक फ्रॉड सा लगता है। कल की पीठ ने एक वर्ष में फैसला दे दिया लेकिन 4% आरक्षण का मामला 16 साल से लटकाया हुआ है। एक मामला प्रशांत भूषण भी लड़ रहा है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण मिलते रहना चाहिए जो अभी लंबित है।

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