आज पश्चिमी सभ्यता हमारे पर इतनी हावी हो चुकी है कि अपने सनातनी संस्कार ही भूल गए। सनातन में प्रत्येक त्यौहार और दान का अपना महत्व है। ज्येष्ठ माह की एकादशी पर लोग प्याऊ लगाते थे और दूध-दही की लस्सी बांटते थे। इतना ही नहीं गर्मी के दिनों में जगह-जगह प्याऊ लगवाते थे ताकि गर्मी में पथिक को दो घूंट पानी मिलने पर लू के प्रकोप से बच सके। बदलते परिवेश में सब इतिहास बन गए। क्योकि लोगों को ही पीने का पानी नहीं मिल रहा प्याऊ कहाँ से लगवाएं। सनातन परम्परा को धूमिल करने में जितनी पश्चिमी सभ्यता है उससे कहीं अधिक हमारी सरकारें और सनातन को बदनाम करते कालनेमि बने फिर रहे हिन्दू। एक समय था जब श्राद्ध प्रारम्भ होते ही हिन्दू त्योहारों का आगमन मानते थे, जबकि श्राद्ध अच्छे दिन नहीं होते इन दिनों कोई शुभ काम नहीं होते फिर ख़ुशी-ख़ुशी श्राद्ध मनाते थे, क्योकि जिसके घर में श्राद्ध होता था वह अपने परिवार, निजी रिश्तेदार और मौहल्ले में खास मिलने वालों को बुलाकर श्राद्ध को त्यौहार की भांति मनाते थे, अनाथालय या निकट के मन्दिर में अपने पितरों के नाम से घर में बने पकवान का भोग देते थे, लेकिन सब बेमानी हो गया। श्राद्ध तो लगभग ख़त्म हुए बराबर समझो। पितरों पर अहसान कर किसी मंदिर में रूपए देकर बला टाल अपने आपको धन्य मानना शुरू कर दिया। वर्तमान पीढ़ी को नहीं मालूम कि उनके नाम से भोजन दान करने से हमारे पितृ कितने खुश होते हैं अपना आशीष देते हैं परमपिता परमेश्वर अपनी फुलवारी पर अपनी अनुकम्पा बनाये रखने की विनती करते हैं। घर-परिवार और अतिथि जब भोजन उपरांत जल पीते हैं वह जल उनके माध्यम से हमारे पितृ पीकर अपनी फुलवारी की मंगल कामना करते हैं।
श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि आत्मा कभी मरती नहीं, ये बस एक शरीर से दूसरे शरीर में बदलती है। इसलिये आप अपने पूर्वजों को जब भी कुछ अर्पित करते हो तो वो उन्हें मिलता है।
महाभारत की कथा के अनुसार मृत्यु के उपरांत जब दानवीर कर्ण को चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से इंकार कर दिया था। तब कर्ण ने चित्रगुप्त से पूछा कि मैंने अपनी सारी सम्पदा सदैव दान पुण्य में ही समर्पित की है तो फिर मुझ पर यह कैसा ऋण शेष रह गया है, तब चित्रगुप्त ने बताया, राजन आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुकता कर दिया परंतु आप पर पितृ ऋण शेष है। आपने अपने काल में सम्पदा एवं सोने का दान किया है। अन्न का दान नहीं किया। जब तक आप यह ऋण नहीं उतारते आपको मोक्ष मिलना संभव नहीं। इसके उपरांत धर्मराज ने दानवीर कर्ण को व्यवस्था दी कि आप 16 दिन के लिए पृथ्वी पर जाकर अपने ज्ञात एवं अज्ञात पितरों को प्रसन्न करने के लिए विधिवत श्राद्ध-तर्पण तथा पिंड दान करके आइए तभी आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी। दानवीर कर्ण ने वैसा ही किया तभी उन्हें मोक्ष मिला। किंवदंती है कि तभी से श्राद्ध की प्रथा आरंभ हुई।
पितृपक्ष में संत, गुरुजन और रोगी वृद्ध या जरूरतमंदों की जितनी सेवा हो सके करना चाहिए। साथ ही अपने परलोक सुधार के लिए भी दान-पुण्य करना चाहिए। त्योहारों पर दान करना इसलिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। श्राद्ध के दिनों में घर पर कोई भिक्षा मांगने आए तो उसे कभी खाली हाथ नहीं भेजना चाहिए। मान्यता है कि यदि पितृ प्रसन्न नहीं होते तो परिवार में बाधाएं आती हैं। अकाल मृत्यु का भय बना रहता है।
पितृ पक्ष की पौराणिक कथा के अनुसार जोगे तथा भोगे दो भाई थे। दोनों अलग-अलग रहते थे। जोगे धनी था और भोगे निर्धन। दोनों में परस्पर बड़ा प्रेम था। जोगे की पत्नी को धन का अभिमान था, किंतु भोगे की पत्नी बड़ी सरल हृदय थी।
पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य समझकर टालने की चेष्टा करने लगा, किंतु उसकी पत्नी समझती थी कि यदि ऐसा नहीं करेंगे तो लोग बातें बनाएंगे। फिर उसे अपने मायके वालों को दावत पर बुलाने और अपनी शान दिखाने का यह उचित अवसर लगा।
अतः वह बोली- 'आप शायद मेरी परेशानी की वजह से ऐसा कह रहे हैं, किंतु इसमें मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। मैं भोगे की पत्नी को बुला लूंगी। दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी।' फिर उसने जोगे को अपने पीहर न्यौता देने के लिए भेज दिया।
दूसरे दिन उसके बुलाने पर भोगे की पत्नी सुबह-सवेरे आकर काम में जुट गई। उसने रसोई तैयार की। अनेक पकवान बनाए फिर सभी काम निपटाकर अपने घर आ गई। आखिर उसे भी तो पितरों का श्राद्ध-तर्पण करना था।
इस अवसर पर न जोगे की पत्नी ने उसे रोका, न वह रुकी। शीघ्र ही दोपहर हो गई। पितर भूमि पर उतरे। जोगे-भोगे के पितर पहले जोगे के यहां गए तो क्या देखते हैं कि उसके ससुराल वाले वहां भोजन पर जुटे हुए हैं। निराश होकर वे भोगे के यहां गए। वहां क्या था? मात्र पितरों के नाम पर 'अगियारी' दे दी गई थी। पितरों ने उसकी राख चाटी और भूखे ही नदी के तट पर जा पहुंचे।
थोड़ी देर में सारे पितर इकट्ठे हो गए और अपने-अपने यहां के श्राद्धों की बढ़ाई करने लगे। जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपनी आपबीती सुनाई। फिर वे सोचने लगे- अगर भोगे समर्थ होता तो शायद उन्हें भूखा न रहना पड़ता, मगर भोगे के घर में तो दो जून की रोटी भी खाने को नहीं थी। यही सब सोचकर उन्हें भोगे पर दया आ गई। अचानक वे नाच-नाचकर गाने लगे- 'भोगे के घर धन हो जाए। भोगे के घर धन हो जाए।'
सांझ होने को हुई। भोगे के बच्चों को कुछ भी खाने को नहीं मिला था। उन्होंने मां से कहा- भूख लगी है। तब उन्हें टालने की गरज से भोगे की पत्नी ने कहा- 'जाओ! आंगन में हौदी औंधी रखी है, उसे जाकर खोल लो और जो कुछ मिले, बांटकर खा लेना।'
बच्चे वहां पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि हौदी मोहरों से भरी पड़ी है। वे दौड़े-दौड़े मां के पास पहुंचे और उसे सारी बातें बताईं। आंगन में आकर भोगे की पत्नी ने यह सब कुछ देखा तो वह भी हैरान रह गई।
इस प्रकार भोगे भी धनी हो गया, मगर धन पाकर वह घमंडी नहीं हुआ। दूसरे साल का पितृ पक्ष आया। श्राद्ध के दिन भोगे की स्त्री ने छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाएं। ब्राह्मणों को बुलाकर श्राद्ध किया। भोजन कराया, दक्षिणा दी। जेठ-जेठानी को सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन कराया। इससे पितर बड़े प्रसन्न तथा तृप्त हुए।।
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