लोक सभा के बाद यही झुनझुना विधान सभा और फिर नगर निगमों तक बोझा बढ़ाएगा। इस नौटंकी से दूर रहना होगा। फर्क बस इतना ही है कि विपक्ष वास्तविक बिंदुओं को उठाने में पूर्णरूप से फेल रहा। समाजवादी पार्टी तो हिन्दू-मुस्लिम करने में लगी रही। हिन्दू-मुस्लिम मानसिकता से अखिलेश यादव यानि समाजवादी पार्टी इसलिए दूर नहीं हो पायी क्योकि सच्चाई बोलने से निगम पार्षद से लेकर 543 सांसद बेनकाब हो जाते।
भगोने में बहुत सारे चावल होते है लेकिन एक चावल से देखा जाता है कि चावल पका है या नहीं। एक मिसाल दिल्ली की लो। कुछ वर्ष पहले तक नगर निगम में लगभग 100 पार्षद होते थे और आज 300 के लगभग; महानगर परिषद् वर्तमान विधानसभा में 50 महानगर पार्षद होते थे, वर्तमान में उन्हें विधायक कहते हैं और आज हैं 70, समस्याएं कम नहीं हुई। बल्कि अर्थव्यवस्था पर बोझ जरूर बढ़ गया। बहते सीवर, भ्रष्टाचार का बोलबाला, बढ़ते अतिक्रमण आदि आदि। घर-घर पीने का पानी पहुँचाने की माला जपी जाती है लेकिन दिल्ली में ही 30 मिनट से 45 मिनट ही पानी पहुँचता है। लेकिन कई क्षेत्रों में वही पानी भी साफ नहीं होता। शायद दिल्ली सरकार या जल बोर्ड का पानी माफिया/RO कंपनी से गुप्त समझौता हो।
याद करिए, तत्कालीन बीजेपी सांसद ताराचन्द खंडेलवाल की मृत्यु। यमुना तब भी मैली थी और आज भी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने निगम बोधघाट पर शव को अंतिम स्नान करवाने संगम घाट जरूर बनवा दिया लेकिन आज भी यमुना मैली ही है। बल्कि पहले से कहीं ज्यादा।
अभी 543 सांसद हैं, हर एक पर सरकार महीने का लगभग 8 से 12 लाख खर्च करती है। मतलब एक सांसद साल का लगभग 1 करोड़ के आसपास बैठता है। अब 300 नए सांसद जोड़ दे तो हर साल 500 से 700 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ सीधे आपके टैक्स से जाएगा।
ये तो सिर्फ वेतन-भत्ते हैं, अगर बंगले, सुरक्षा, हवाई यात्रा, मुफ्त बिजली 50,000 यूनिट, पानी लाखों लीटर जोड़ दे, तो सालाना खर्च 1500 करोड़ पार जाएगा केवल एक सांसद का। और सोच रहे हो देश आगे बढ़ रहा है।
भाजपा ने महिला आरक्षण के लिए 2023 में कानून पास किया, ढोल पीटा कि 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं को देंगे। लेकिन अंदर ऐसा जाल बिछाया कि पहले जनगणना, फिर परिसीमन, होगा तब जाकर लागू किया जाएगा। यानी सीधा-सीधा 2029 तक ठंडे बस्ते में डाल दिया।
अगर नीयत साफ होती तो अभी 543 में से करीब 180 सीटें महिलाओं को दे देते। लेकिन ऐसा करते ही आधे बड़े-बड़े नेताओं की कुर्सी जाती और पार्टी में बगावत खड़ी हो जाती। क्योंकि 543 सांसदों में 180 महिला सांसदों को एडजस्ट करते तो बीजेपी के लगभग 120 पुरुष सांसद घर पर बैठते।
तो क्या किया सीटें 850 कर दो और 280 सीटें महिलाओं के नाम पर दे दो, बाकी में पुराने नेता भी सेट हो जाएंगे। मतलब जनता को लगा क्रांति हो गई, और नेताओं का भी कुछ नहीं बिगड़ा। राजनीति में इसे कहते हैं “दोनों तरफ माल”।
आज भी पंचायत में महिला सरपंच जीतती है, लेकिन कुर्सी पर उसका पति बैठता है। “प्रधान पति” नाम यूं ही नहीं पड़ा। उसमें आज तक सरकार ने कोई सुधार नहीं किया और वही मॉडल अब संसद में लागू होगा। बड़े नेता अपनी पत्नी-बेटी को टिकट देंगे और खुद पीछे से रिमोट से चलाएंगे। नाम महिला का, सत्ता आदमी की होगी। ये सशक्तिकरण नहीं, ये सेटिंग है।
ये वही सरकार है जो खुद को महिला हितैषी बताती है। लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है? लड़कियों का बलात्कार हो रहा है, लव जिहाद के नाम पर लड़कियों की ज़िंदगियां बर्बाद हो रही हैं। गेस्ट हाउस कांड होते हैं, बच्चे हैं गलती हो जाती है कहने वाले को सर्वोच्च सांसद के इनाम से सम्मानित किया जाता है, क्या है ये सब ड्रामा? महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े हर साल बढ़ रहे हैं, लेकिन भाषणों में “नारी शक्ति” का जप चलता रहता है।
जिन राज्यों ने जनसंख्या कंट्रोल किया, जैसे तमिलनाडु, केरल उनकी सीटें कम बढ़ेंगी। और जहां आबादी बेकाबू बढ़ी, जैसे यूपी, बिहार वहां सीटों की बरसात होगी। मतलब जिसने जिम्मेदारी निभाई वो सजा पाएगा, जिसने लापरवाही की वो इनाम ले जाएगा।
कल को सिर्फ हिंदी बेल्ट जीतकर कोई भी सरकार बना लेगा, दक्षिण की आवाज साइड में डाल दी जाएगी।
जिन राज्यों में विपक्ष की पकड़ है, वहां सीटें कम बढ़ेंगी। जहां भाजपा मजबूत है, वहां सीटें ज्यादा। मतलब चुनाव शुरू होने से पहले ही मैदान झुका दिया गया।
अभी 543 सांसदों में ही बहस का टाइम नहीं मिलता, 850 में क्या होगा? संसद नहीं, मेला लगेगा। कानून ऐसे पास होंगे जैसे टिकट कटते हैं बस स्टैंड पर।
ये महिला आरक्षण नहीं है, ये 2029 का चुनावी ट्रैप है। ये सीटें बढ़ाना नहीं है, ये नेताओं की फौज खड़ी करना है। ये सुधार नहीं है, ये सिस्टम को अपने हिसाब से मोड़ना है।
अगर अभी भी किसी को लग रहा है कि ये सब महिलाओं के भले के लिए हो रहा है, तो वो या तो भक्ति में डूबा है या फिर उसे सच सुनने की हिम्मत नहीं है।
भाजपा ने महिला आरक्षण के लिए 2023 में कानून पास किया, ढोल पीटा कि 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं को देंगे। लेकिन अंदर ऐसा जाल बिछाया कि पहले जनगणना, फिर परिसीमन, होगा तब जाकर लागू किया जाएगा। यानी सीधा-सीधा 2029 तक ठंडे बस्ते में डाल दिया।
अगर नीयत साफ होती तो अभी 543 में से करीब 180 सीटें महिलाओं को दे देते। लेकिन ऐसा करते ही आधे बड़े-बड़े नेताओं की कुर्सी जाती और पार्टी में बगावत खड़ी हो जाती। क्योंकि 543 सांसदों में 180 महिला सांसदों को एडजस्ट करते तो बीजेपी के लगभग 120 पुरुष सांसद घर पर बैठते।
तो क्या किया सीटें 850 कर दो और 280 सीटें महिलाओं के नाम पर दे दो, बाकी में पुराने नेता भी सेट हो जाएंगे। मतलब जनता को लगा क्रांति हो गई, और नेताओं का भी कुछ नहीं बिगड़ा। राजनीति में इसे कहते हैं “दोनों तरफ माल”।
आज भी पंचायत में महिला सरपंच जीतती है, लेकिन कुर्सी पर उसका पति बैठता है। “प्रधान पति” नाम यूं ही नहीं पड़ा। उसमें आज तक सरकार ने कोई सुधार नहीं किया और वही मॉडल अब संसद में लागू होगा। बड़े नेता अपनी पत्नी-बेटी को टिकट देंगे और खुद पीछे से रिमोट से चलाएंगे। नाम महिला का, सत्ता आदमी की होगी। ये सशक्तिकरण नहीं, ये सेटिंग है।
ये वही सरकार है जो खुद को महिला हितैषी बताती है। लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है? लड़कियों का बलात्कार हो रहा है, लव जिहाद के नाम पर लड़कियों की ज़िंदगियां बर्बाद हो रही हैं। गेस्ट हाउस कांड होते हैं, बच्चे हैं गलती हो जाती है कहने वाले को सर्वोच्च सांसद के इनाम से सम्मानित किया जाता है, क्या है ये सब ड्रामा? महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े हर साल बढ़ रहे हैं, लेकिन भाषणों में “नारी शक्ति” का जप चलता रहता है।
जिन राज्यों ने जनसंख्या कंट्रोल किया, जैसे तमिलनाडु, केरल उनकी सीटें कम बढ़ेंगी। और जहां आबादी बेकाबू बढ़ी, जैसे यूपी, बिहार वहां सीटों की बरसात होगी। मतलब जिसने जिम्मेदारी निभाई वो सजा पाएगा, जिसने लापरवाही की वो इनाम ले जाएगा।
कल को सिर्फ हिंदी बेल्ट जीतकर कोई भी सरकार बना लेगा, दक्षिण की आवाज साइड में डाल दी जाएगी।
जिन राज्यों में विपक्ष की पकड़ है, वहां सीटें कम बढ़ेंगी। जहां भाजपा मजबूत है, वहां सीटें ज्यादा। मतलब चुनाव शुरू होने से पहले ही मैदान झुका दिया गया।
अभी 543 सांसदों में ही बहस का टाइम नहीं मिलता, 850 में क्या होगा? संसद नहीं, मेला लगेगा। कानून ऐसे पास होंगे जैसे टिकट कटते हैं बस स्टैंड पर।
ये महिला आरक्षण नहीं है, ये 2029 का चुनावी ट्रैप है। ये सीटें बढ़ाना नहीं है, ये नेताओं की फौज खड़ी करना है। ये सुधार नहीं है, ये सिस्टम को अपने हिसाब से मोड़ना है।
अगर अभी भी किसी को लग रहा है कि ये सब महिलाओं के भले के लिए हो रहा है, तो वो या तो भक्ति में डूबा है या फिर उसे सच सुनने की हिम्मत नहीं है।
ये कहना कि किसी संसदीय क्षेत्र में इतने लाख वोटर है एक सांसद सबके पास नहीं जा सकता, लेकिन जब वोट लेने की बात होती है हर गली-कूचे में पहुँच जाता है। दूसरे, निगम पार्षद ही जीतने के बाद कितनी गलियों में घूमकर समस्याएं सुनता है।
जनता को भावनाओं में उलझाओ, आंकड़ों से डराओ, और फिर टैक्स के पैसे से अपना साम्राज्य बढ़ाओ यही चल रहा है इस समय देश में। जनता को नई दुकानें खोलकर लुटने की बजाए महंगाई, भ्रष्टाचार और अतिक्रमण से राहत दो।
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