क्या चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं है? तो फिर CJI की बेंच ममता बनर्जी के आयोग द्वारा पक्षपात करने के आरोपों को क्यों ठुकरा रही है?

सुभाष चन्द्र

मुझे समझ नहीं आता कि सुप्रीम कोर्ट के जज उन विषयों पर क्यों बयानबाजी करते हैं जिससे उनका कोई सरोकार नहीं है? कुछ दिन पहले जस्टिस उज्जवल भुइयां ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी थी कि वह कॉलेजियम के फैसलों को दरकिनार नहीं कर सकता फिर उन्होंने UAPA की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए, वह कानून जो संसद से पारित हुआ जबकि कॉलेजियम कभी संसद से पारित नहीं हुआ और उसका जिक्र संविधान में भी कहीं नहीं है

अब जस्टिस बी वी नागरत्ना ने नया शिगूफा छेड़ दिया उन्होंने पटना में डॉ राजेंद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए कहा कि “चुनाव आयोग को स्वतंत्र होना चाहिए यदि चुनाव कराने वाली संस्थाएं चुनाव लड़ने वालों पर ही निर्भर होंगी, तो मतदान की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती चुनाव आयोग को उच्च महत्व वाला संवैधानिक प्राधिकरण बताते हुए कहा कि चुनाव केवल एक सामयिक घटना नहीं है बल्कि राजनीतिक सत्ता के गठन का आधार है और चुनावी प्रक्रिया पर नियंत्रण का अर्थ वास्तव में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की स्तिथियों पर नियंत्रण करना है”

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जस्टिस नागरत्ना के बयान का अर्थ समझने के लिए we have to read between the lines और उनका मतलब साफ़ है कि वर्तमान चुनाव आयोग “स्वतंत्र” नहीं है और न निष्पक्षता से चुनाव करा रहा है उन्हें शायद मालूम नहीं चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 45 से ज्यादा याचिकाएं दायर हो चुकी है और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ख़ारिज किया था आखिर चुनावी प्रक्रिया पर चुनाव आयोग का नियंत्रण नहीं होगा तो किसका होगा?

उन्हें शायद यह भी आभास नहीं है कि SIR को लेकर समूचा विपक्ष और खासकर ममता बनर्जी आए दिन चुनाव आयोग पर आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव आयोग भाजपा की B Team के रूप में काम कर रहा है लेकिन चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच हर सुनवाई पर ममता को फटकार मार रही है और पीठ ने चुनाव आयोग के SIR कराने की शक्तियों और प्रक्रिया पर कोई कमी नहीं निकाली यानी चीफ जस्टिस और उनकी बेंच चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहे लेकिन जस्टिस नागरत्ना को चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं दिखाई दे रहा 

क्या जस्टिस नागरत्ना के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और उनकी पीठ से सदस्यों से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी कार्यशैली को लेकर मतभेद हैं? उनके बयान से लगता है कि अगर SIR का मामला उनके हाथ में होता तो वे तो ममता बनर्जी और विपक्ष की बल्ले बल्ले करा देती और चुनाव आयोग की बखिया उधेड़ देती

जस्टिस नागरत्ना को पता है चुनावों की घोषणा के बाद राज्य का प्रशासन चुनाव आयोग के पास होता है और सुप्रीम कोर्ट भी उसके कार्य में दखल नहीं देता ऐसे में क्या जस्टिस नागरत्ना को लगता है कि 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना कर उन पर हमला करना जायज था?

क्या चुनाव आयोग ने निष्पक्षता से काम नहीं किया? उन्हें यह याद रहे कि आयोग अगर निष्पक्ष न होता तो कई राज्यों में विपक्षी दलों की कभी कोई सरकार नहीं बनती वे कृपया कांग्रेस के समय में चुनाव आयोगों और आज के चुनाव आयोग की कार्य शैलियों का अवलोकन करें जिससे वे अपने विचारों की समीक्षा कर सकें लेकिन आज जब मामला चीफ जस्टिस देख रहे हैं, तब उन्हें चुनाव आयोग पर बयान नहीं देना चाहिए था

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