सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) आवेदन कानून 1937 को चुनौती देते हुए उसके प्रावधानों को गैर संवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। यह याचिका पौलोमी पावनी शुक्ला और न्याय नारी फाउंडेशन ने दायर की है और उनका वकील है प्रशांत भूषण।
दरअसल, दिल से कोई मुस्लिम शरीयत लागू करना या करवाना नहीं चाहता। यहाँ तक शरीयत का शोर मचाने वाले। उनका मकसद बस शोर मचाकर अपनी तिजोरियां भरना है। वह अच्छी तरह जानता है कि इसके लागू होते ही उनकी आज़ादी, मनपसंद कपडे, फिल्में देखना और घरों में टीवी आदि आदि पर पाबन्दी। हाँ अपना दबदबा बनाये रखने के लिए शरीयत के लिए शोर या उपद्रव मचाने में कोई नुकसान नहीं। इतना ही नहीं, शरीयत लागू होते मुस्लिम महिलाओं की आज़ादी पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। फिर कोई कहने वाला नहीं होगा कि इस्लाम में औरतों को आज़ादी है।
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अब याचिका दायर करने वाले गैर मुस्लिम हैं, इसलिए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कुछ पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को भी पार्टी बनाएं।
प्रशांत भूषण ने दलील दी कि 1937 के इस पुराने कानून के कारण लगभग एक करोड़ मुस्लिम महिलाओं के साथ विरासत, संपत्ति और विवाह जैसे मामलों में भेदभाव किया जा रहा है। इस कानून के तहत महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस रद्द करता है तो वे भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या बदल सकते हैं।
प्रशांत भूषण ने इस कानून को अनुच्छेद 25 से भी अलग बता दिया और कहा कि मुस्लिम महिलाओं को कम हिस्सा मिलना अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं हो सकती।
याचिकाकर्ता का कहना था कि विरासत और उत्तराधिकार के मामलों में मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाला व्यवहार उन्हें “दोयम” दर्जे का नागरिक बनाता है और इसे अब ख़त्म किया जाना चाहिए। यह मामला सीधे तौर पर पर्सनल लॉ और संवैधानिक अधिकारों के बीच टकराव से जुड़ा है। यदि कोर्ट इस गैर संवैधानिक करार देता है तो यह मुस्लिम महिलाओं की कानूनी अधिकारों की बड़ी जीत होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार को 4 सप्ताह में उत्तर देने के लिए नोटिस जारी किया, अब केंद्र सरकार याचिका समर्थन करेगी तो मुस्लिम संगठन मोदी पर मुस्लिमों के अधिकारों पर हस्तक्षेप का आरोप लगा देंगे।
एक याचिका कभी हिंदू संगठन ने दायर की थी (शायद 2018 में) सबरीमाला मंदिर के फैसले के बाद जिसमें मांग की गई थी कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में जाने का अधिकार मिलना चाहिए। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने याचिकाकर्ता से पूछा था, आप कौन होते है ऐसी याचिका दायर करने वाले, इसे मुस्लिम महिलाओं को दायर करने दो। तब भी कहा जा सकता था कि कुछ मुस्लिम महिलाओं को पार्टी बनाएं लेकिन तब ऐसा नहीं कहा गया लेकिन अब कहा गया है।
अभी कुछ दिन पहले CJI सूर्यकांत ने एक सुनवाई के दौरान कहा है कि -
“UCC IS ABOUT CONSTITUTION, NOT RELIGION”
“UNIFORM CIVIL CODE IS A CONSTITUTIONAL GOAL AIMED AT EQUALITY, NOT LINKED TO ANY RELIGION”
प्रशांत भूषण को चाहिए कि वह मुस्लिम महिलाओं के साथ मुस्लिम समाज में होने वाले सभी तरह के भेदभावों को एक साथ कोर्ट के सामने प्रस्तुत करें और UCC लागू करने के लिए विपक्षी दलों से संपर्क कर उनका समर्थन जुटाए।

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