सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 में प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हाई कोर्टों को दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा है कि सुनवाई पूरी होने के बाद 3 महीने में फैसला सुनाया जाना चाहिए। ये निर्देश फैसलों में देरी रोकने के लिए दिए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि फैसलों में देरी से मुकदमों में शामिल लोगों को ऐसा नुकसान होता है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती।
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दूसरी तरफ तत्कालीन चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने 7 साल पुराने Electoral Bonds केस का फैसला 2 नवंबर, 2023 को सुरक्षित किया था और 19 अप्रैल 2024 को शुरू होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक 2 महीने पहले 15 फरवरी को सुना दिया (यानी 3 महीने बाद) क्योंकि उससे मोदी को नुकसान हो सकता था। ये राजनीति खेली थी चंद्रचूड़ ने लेकिन फिर भी निराशा हाथ लगी और मोदी प्रधानमंत्री बन गए।
सुनवाई न शुरू होने के कई उदाहरण हैं। झारखंड हाई कोर्ट में 2012 से अब तक 10 चीफ जस्टिस रहे हैं और उनमे 2 तो सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए लेकिन लालू यादव की सजा के खिलाफ 5 अपीलों पर 12 साल में कोई सुनवाई नहीं हुई है। पहली अपील लालू ने 13 दिसंबर 2013 को दायर की थी। हर सजा के खिलाफ जमानत पर है और मौज ले रहा है जबकि उसे 32 साल की सजा हुई थी।
दूसरा मामला 2G का है जिसमें A Raja और कनिमोझी समेत सभी आरोपियों को 21 दिसंबर, 2017 को बरी कर दिया गया था। CBI और ED ने मार्च, 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। 8 साल में भी सुनवाई का नामोनिशान नहीं है। उसके बाद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत कर वो सांसद बने हुए हैं। अगर अपील स्वीकार हो जाती हैं और ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट कर हाई कोर्ट उन्हें दोषी करार देता है तो इतने समय तक वो फ़ालतू में सांसद रहेंगे जबकि अयोग्य हो सकते थे।
सुप्रीम कोर्ट में सलमान खान के Hit n Run केस में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उसे बरी किये जाने के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की अपील 2016 से लंबित है जिस पर सुनवाई नहीं हुई। जब सुनवाई ही नहीं हुई तो फैसला कब होगा।
जयपुर हाई कोर्ट ने 17 मार्च, 2023 को 2008 के जयपुर धमाकों के 4 अभियुक्तों की फांसी की सजा रद्द करते हुए बरी कर दिया था। उन धमाकों में 63 लोगों की जान गई थी। परिजनों ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपीलें दायर की हुई है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चारों को रिहा तो कर दिया लेकिन 3 साल से अपीलों पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
हाई कोर्टों से अलावा ट्रायल कोर्टों में देखिए क्या हाल है। राहुल गांधी के खिलाफ 12-12 साल से मुक़दमे चल रहे हैं। एक मुकदमा बस सिरे चढ़ा था लेकिन कांग्रेस परिवार से आने वाले जस्टिस गवई ने उसे बचा लिया। हेराल्ड केस में सोनिया और राहुल जमानत पर हैं लेकिन 14 साल से केस पटियाला हाउस कोर्ट में पता नहीं किस स्टेज पर पड़ा है। केजरीवाल का 2014 से सुल्तानपुर में केस लटका है।
सुनवाई के बाद 3 महीने में फैसला देने का आदेश तो ठीक है लेकिन केस या अपील दायर होने के बाद 3 महीने में सुनवाई भी शुरू होनी चाहिए जिसे 6 महीने में समाप्त भी होनी चाहिए। तब काम चलेगा। अक्सर देखा जाता है कि मामले को लटकाने-भटकाने के लिए अपील दायर की जाती है। दूसरे, यह कि अगर जज ही केस फाइल को गंभीरता से पढ़ ले तो कई केस तो पहली/दूसरी तारीख में ही ख़त्म हो सकता है। जिन केसों में मुर्दों(जो अपने जीवन काल में उस मकान को कई पहले छोड़ अपने स्थाई मकान में अंतिम सांस ले चुका है, फिर भी उसको जीवित अपराधी दिखाया जाता है) को पार्टी बनाया गया हो, जब डिफेन्डन्ट का वकील पहली तारीख पर जज से सवाल करता है कि "क्या अब मुर्दों को भी नोटिस दिए जाएंगे?" और पेटिशनर और उसका वकील जब एक-दूसरे की बगलें झाँकने लगे साबित करता है कि "केस झूठा और दूसरी पार्टी को ब्लैकमेल करने के इरादे से किया गया है "क्यों नहीं ऐसे केसों को उसी समय ख़ारिज किया जाता?"

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