डॉ राकेश कुमारआर्य
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| लेखक |
भाजपा को अपनी रणनीति में इस बात को सम्मिलित करना पड़ेगा कि वह संस्कृतनिष्ठ हिंदी की समर्थक है और दक्षिणी की सभी भाषाओं के संस्कृतनिष्ठ शब्दों को हिंदी शब्दों के रूप में स्वीकृति देने को तैयार है। इसी मत के प्रतिपादक सावरकर जी थे। भाजपा को दक्षिण के लोगों को यह भली प्रकार समझाना होगा कि कांग्रेस उर्दूनिष्ठ खिचड़ी भाषाओं की समर्थक रही है। कांग्रेस की इसी नीति का विरोध दक्षिण भारत करता है। लोगों को मान्यता है कि भाजपा की हिंदी का अभिप्राय कांग्रेस की इसी उर्दूनिष्ठ हिंदी से है अर्थात दक्षिण भारत उस उर्दूनिष्ठ खिचड़ी हिन्दी का विरोधी है, जो उसकी अपनी भाषाओं से कहीं भी मेल नहीं खाती है। भाजपा को ध्यान रखना चाहिए कि उसके अंग्रेजी या उर्दू के नारे दक्षिण भारत के लोगों को रास नहीं आते हैं।
भाजपा ने भाषा के नाम पर तुष्टिकरण का खेल खेलते हुए दक्षिण को उन्हीं की अपनी भाषा में संबोधित करने का क्रम चलाया है अर्थात पार्टी हंस की चाल चली तो अपनी चाल भूल गई। भाजपा को सावरकर जी के भाषा संबंधी चिंतन को क्रियान्वित करने के लिए ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे कि दक्षिण की सभी भाषाओं के संस्कृतनिष्ठ शब्दों को हिंदी के संस्कृतनिष्ठ स्वरूप के साथ समन्वित किया जा सके। कांग्रेस ने भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम मान लिया है। जबकि भाषा राष्ट्रीय एकता की सजग प्रहरी होती है। इसी स्वरूप में भाजपा को अपना भाषा संबंधी चिंतन स्पष्ट करना चाहिए।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि दक्षिण भारत के इन 6 राज्यों में लोकसभा की 130 सीटें आती हैं। जिनमें से भाजपा के पास ढाई दर्जन भी नहीं हैं। इससे पता चलता है कि भाजपा को दक्षिण में पैर जमाने के लिए अभी बहुत कुछ करना होगा।
कर्नाटक में भाजपा के लिए बहुत अनुकूल अवसर हैं। वहां पर उसकी सरकार भी रही है। भविष्य में वहां पर भाजपा की सरकार आने की प्रबल संभावनाएं हैं। कर्नाटक को आधार बनाकर दूसरे प्रान्तों को जीतने की एक सफल योजना बनाई जा सकती है। कर्नाटक को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जाए। जिसमें विशेष रूप से भाषा के प्रति उदार दृष्टिकोण रखा जाए। कर्नाटक के लोगों को यह विश्वास दिलाया जाए कि भाजपा ' सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय' में विश्वास रखती है और वह भाषा को राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम मानती है। तमिलनाडु में जिस प्रकार से वहां के स्थानीय दल सत्ता में आते रहे हैं, उससे पता चलता है कि यहां के लोग क्षेत्रीय पार्टियों को प्राथमिकता देते हैं। अब उन्होंने तमिलनाडु में टीवीके को एक विकल्प के रूप में स्वीकार कर लिया है। भारतीय जनता पार्टी को इन तीनों के विकल्प के रूप में अपने आप को स्थापित करना है। इसके लिए भाजपा को चाहिए कि वह जिस प्रकार बंगाल को लगभग डेढ़ लाख छोटी-छोटी बैठकों का आयोजन करके विजय करने में सफल हुई है, उसी प्रकार उसे तमिलनाडु में भी करना होगा। मंचों पर दिए गए भाषणों से अधिक यह छोटी-छोटी बैठकर प्रभावशाली होती हैं। भाजपा को तमिलनाडु के लोगों को भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में इस प्रान्त के महत्वपूर्ण योगदान से परिचित कराना होगा। यह भी दिखाना होगा कि राम हमारी आस्था के और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। उन्हें स्थानीय स्तर पर तमिलनाडु के लोग रावण के दृष्टिकोण से देखना बंद करें। दक्षिण में जिस प्रकार भाजपा के पास लोकसभा के लिए सीटों का अकाल पड़ा हुआ है, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यहां के लोगों ने भाजपा को अभी कांग्रेस जैसा भी सम्मान देना ठीक नहीं माना है। यही कारण है कि दक्षिण भारत के लोग भाजपा को वोट भी बहुत कम देते हैं। यह भी एक तथ्य है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश में बीजेपी को मात्र एक प्रतिशत वोट मिले थे।
ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत के लोग सनातन से दूर हैं, वहां पर कार्यरत ईसाई मिशनरीज स्थानीय लोगों को भारत के सनातनी स्वरूप से दूर ले जाने का हर संभव प्रयास करती रही हैं, परंतु इसके उपरांत भी बहुसंख्यक लोग भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आस्था रखते हैं। भाजपा को इसी आस्था को पकड़ना चाहिए। वहां के मंदिरों के माध्यम से लोगों को जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। मंदिरों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर अच्छे भाषण करने वाले लोगों को वक्ता के रूप में स्थापित किया जाए। इनका विशेष कार्य उत्तर दक्षिण का भेद मिटाना होना चाहिए।
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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