बैंकों से लोन लो, मत चुकाओ मौज करो; बैंकों को उन्हें पकड़ने का भी अधिकार नहीं है

सुभाष चन्द्र

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस पुष्पेंद्र कुमार कौरव ने 10 मई को एक फैसले में कहा है कि सिर्फ ऋण न चुकाने के आधार पर किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध लुकआउट सर्कुलर (LOC) जारी नहीं किया जा सकता।  उन्होंने कहा कि “LOC एक अंतिम कार्रवाई के रूप में की जाने वाली दंडात्मक कार्यवाही है और बैंक ऋण अदा करने में चूक या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए गए ऋण के हर मामले में LOC जारी नहीं किया जा सकता जहां LOC जारी करने के मामले में व्यक्ति को गबन या हेराफेरी के किसी अपराध में आरोपी नहीं बनाया गया, वहां LOC मान्य नहीं हो सकता” 

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न्यायमूर्ति कौरव ने अलग अलग मामलों में वित्तीय संस्थानों, बैंकों और जांच एजेंसियों के अनुरोध पर 23 याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जारी किए गए LOCs को रद्द कर दिया LOC जारी करने की कानूनी वैधता को सही ठहराने की जिम्मेदारी पूरी तरह उसे जारी करने वाली एजेंसी की होती है

23 याचिकाकर्ताओं के खिलाफ LOC ED, CBI, FFIO और विभिन्न बैंकों के कहने पर जारी किया गया था

इसका मतलब तो साफ़ हो गया कि व्यवसायी बैंकों से ऋण लें, अदा ना करें, तब भी उन्हें कोई हाथ नहीं लगा सकता जब तक वित्तीय संस्थाएं हाई कोर्ट के अनुसार कार्रवाई करेंगी, तब वो चुपचाप देश छोड़ कर भाग सकते हैं 

बात बड़ी स्पष्ट है कि जिन लोगों के खिलाफ LOC जारी किया गया होगा, उन्होंने कुछ हजारों में तो ऋण नहीं लिए होंगे, लाखों में होंगे और हो सकता है करोड़ों में हों ऐसे आदेश से तो उन ऋण अदा न करने वालों की मौज हो गई

LOC जारी करने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है, यह गृह मंत्रालय के 2018 में जारी किए गए निर्देशों पर यह जारी किया जाता है जिससे wilful defaulters/Economic Offenders देश छोड़ कर न भाग सके जिनका ऋण अदा न करना देश के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचा सकता है इसके लिए 2018 में Fugitive Economic Offenders Act भी बना था जिसके अनुसार जो देश छोड़ कर भाग जाते हैं उनकी संपत्ति भी जब्त की जा सकती है

दिल्ली हाई ने यह भी कहा कि “LOC cannot be used as a ‘strong-arm Tactics’ to restrict the right to travel under article 21”.

प्रश्न यह है कि आप इस article 21 के अधिकार तो अपराधियों समेत सबको देना चाहते हैं लेकिन उनके कर्तव्यों पर कभी कोई बात नहीं करते 

इस निर्णय की विवेचना सही मायने में ऐसे की जा सकती है कि हाई कोर्ट यह स्वीकार कर रहा है कि ऋण अदा करने वाले लोग रसूकदार हैं और देश छोड़ने की मंशा रखते हैं जिसकी छूट हाई कोर्ट ने दे दी

फिर विजय माल्या और नीरव मोदी को भी वापस लाने की क्या जरूरत है जिस पर सरकार लाखों रुपए खर्च चुकी है? क्या हाई कोर्ट यह चाहता है कि ये 23 लोग भी देश छोड़ कर भाग जाएं और फिर सरकार उनके प्रत्यर्पण के लिए भागती फिरे और करदाताओं का पैसा व्यर्थ में खर्च होता रहे

मुझे समझ नहीं आता अदालतें चाहती क्या हैं? क्या ऐसे आदेश से अराजकता नहीं फैलेगी वह भी तब, जब व्यक्ति जानबूझकर ऋण नहीं लौटा रहा आप तो आर्थिक अपराधियों को संरक्षण देने का काम कर रहे हैं जबकि LOC जारी करने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है लेकिन आप केवल अपनी Interpretation पर उसे रोक रहे हैं

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस उज्जवल भुइया की खंडपीठ ने एक नया कानून बना दिया कि अदालत के पास किसी अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने का तो अधिकार है, लेकिन वे उसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि ऐसा करना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है उस निर्णय ने भी अपराधियों की मौज करा दी थी क्योंकि आरोपी खुद तो कोर्ट में सरेंडर करेगा नहीं, आप सरेंडर करने के लिए कह नहीं सकते   

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