मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस पीबी बालाजी की खंडपीठ ने 25 जून को एक फैसले में तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च, 2024 के आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया और कहा कि मतांतरण करने वालों को बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के रूप में आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। एक हिंदू ने इस्लाम अपना कर अपना नाम समीर अहमद रख लिया और उसके बाद उसने स्वयं को मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का बता कर पिछड़े वर्ग का सदस्य बताते हुए प्रमाण पत्र की मांग की जो तहसीलदार ने स्वीकार नहीं की। इसी के सन्दर्भ में दोनों जजों ने यह फैसला सुनाया।
अब चलते हैं आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के 2007 के फैसले की तरफ। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 5:2 के बहुमत के फैसले में आंध्र प्रदेश सरकार के ANDHRAPRADESH RESERVATION FOR SOCIALLY BACKWARD AND EDUCATIONALLY BACKWARD CLAUSES OF MUSLIM ACT 2007 को ख़ारिज करते हुए कहा कि IT IS UNSUSTAINABLE AND VILOLATIVE OF ARTICLE 14 OF (EQUALITY BEFORE LAW), 15(4) AND 16(4) AND OTHER PROVISIONS PERTAINING TO PROHIBITION OF DISCRIMATION BY STATE ON THE GROUNDS OF RELIGION, RACE, CAST, SEX OR PLACE OF BIRTH”.
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| लेखक चर्चित YouTuber |
अब आप देखिए 16 साल से वह संविधान पीठ गठित नहीं हुई है। कल को अगर संविधान पीठ भी आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रख देती है और राज्य सरकार के 4% आरक्षण को अवैध कह देती है तो जो लोग 16 साल से आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, उन्हें क्या सुप्रीम कोर्ट नौकरी से निकालने के भी आदेश देगा और जो सैलरी उन्होंने 16 साल में ली है, वो क्या वापस करने के भी आदेश सुप्रीम कोर्ट देगा।
देश के अलग अलग राज्यों में “सेक्युलर दलों” से मुस्लिम आरक्षण मांगते हैं और उनका वोट लेने के लिए ये दल उन्हें आरक्षण देने का भरोसा भी दे देते हैं जो संविधान के अनुसार वैध नहीं है। लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट 16 साल तक ऐसे मामले को लटकाए बैठा रहेगा तो देश में अराजकता बढ़ना स्वाभाविक है। सेक्युलर दलों को मरोड़ उठती है मुस्लिमों को आरक्षण देने की जैसे तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश सरकार को उठी थी।
इस लेख में मैंने सुप्रीम कोर्ट के लिए कुछ अशोभनीय नहीं लिखा है। मेरा मकसद सुप्रीम कोर्ट तक यह बात पहुंचाना है कि इस तरह की न्याय व्यवस्था देश के लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकती है। यह कहना बड़ा आसान है कि सोशल मीडिया पर हम ध्यान नहीं देते और whatsapp university की बात हमारे सामने मत कीजिए लेकिन ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया और whatsapp पर सब कुछ बकवास लिखा जाता है। हो सकता है कुछ बातें गलत भी होती होंगी लेकिन मैंने जो विषय उठाया है, उसे तो चीफ जस्टिस को पढ़ना चाहिए।

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