विपक्ष के नेता भाजपा से सीखें जो 2 सीट पर आ गई लेकिन टूटी नहीं और न देशद्रोह के मार्ग पर चली

सुभाष चन्द्र

आज ममता बनर्जी की पार्टी एक हार के बाद खंड खंड हो गई है और खुद ममता अपनी पार्टी को कांग्रेस में शामिल करने की सोच रही है। उसकी पार्टी की 80 सीट, भाजपा की 1984 की लोकसभा में 2 सीट से कहीं ज्यादा सम्मानजनक हैं

भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई। पहले यह भारतीय जनसंघ हुआ करती थी जिसने अपना सफर 1951 के लोकसभा चुनाव में 3 सीट से शुरू किया। 1957 में 4 हुई, 1962 में 14, 1967 में 35 और 1971 में 22 हुई

लोकसभा का 1977 का चुनाव 5 दलों ने एक जनता पार्टी बना कर लड़ा और 295 सीट जीत कर इंदिरा गांधी को पटक दिया जिसकी कांग्रेस को मात्र 153 सीट मिली। जनता पार्टी की 295 सीटों में जनसंघ घटक की सबसे अधिक 93 सीट थी। 1980 के चुनाव में जनता पार्टी की मात्र 31 सीट आई जिनमें मुझे याद पड़ता है जनसंघ की 15 या 16 सीट थी

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उसके बाद 1984 का चुनाव राजीव गांधी ने इंदिरा जी की लाश को कंधे पर ढो कर लड़ा और भाजपा को मात्र 2 सीट मिली। इतना ही नहीं उस समय चुनाव के दौरान Organiser Weekly में शीर्षक Lakhs of BJP voters removed from voter list रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। यानि खुलेआम वोट चोरी। लेकिन न तो भाजपा में कोई टूट हुई और न किसी और दल में विलय का ख्याल किया। 1989 में कांग्रेस पिछले चुनाव की 404 सीट से 197 और भाजपा 2 से बढ़ कर 85 पर पहुँच गई। 1984 के बाद कभी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला लेकिन 2014 में 30 साल बाद मोदी के नेतृत्व में भाजपा को बहुमत मिला और 282 सीट मिली लेकिन कांग्रेस 44 सीट पर सिमट गई। भाजपा का आधारभूत ढांचा मजबूत है जबकि कांग्रेस का खोखला है

भाजपा ने 2 सीट आने पर भी और 1951 से 1996 तक जब वाजपेयी के पहली बार प्रधानमंत्री बनने तक 45 साल विपक्ष में बैठने के बावजूद कभी नहीं कहा कि कांग्रेस ने वोट चोरी की, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कब्जे में ले लिया। लोकतंत्र खत्म कर दिया कांग्रेस ने। 1989 से 2014 तक भाजपा की तरफ से विपक्ष के नेता की कुर्सी पर अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी जी और सुषमा स्वराज रहे लेकिन कभी किसी ने स्वयं सत्ता पक्ष के खिलाफ नारेबाजी नहीं की लेकिन आज विपक्ष के नेता राहुल गांधी का व्यवहार देख लीजिए। मैंने किसी मुख्यमंत्री को विधानसभा में स्वयं नारे लगाते हुए नहीं देखा लेकिन ममता बनर्जी ऐसी मुख्यमंत्री थी जिसने सदन में नारे लगाए -”मोदी चोर, भाजपा चोर”। नारेबाजी केजरीवाल ने भी कम नहीं की

राहुल गांधी ने देश में ही नहीं विदेशों में भी भारत का अपमान किया और एक बात तोते की तरह रट कर बोली कि भारत में लोकतन्त्र ख़तम हो चुका है, आप लोकतंत्र बहाल करने में मदद करें। इतना ही नहीं मणिशंकर अय्यर ने तो 2014 में ही पाकिस्तान में जाकर उससे कहा आप मोदी को हटाएं और हमें लाएं। कांग्रेस के जयराम रमेश ने मोदी द्वारा नेहरू के चुने हुए प्रधानमंत्री काल को पार करने पर भी एक बकवास की है कि “मोदी का दूसरा पहलू है कि वो लोकतंत्र की हत्या के लिए जिम्मेदार है” 

अगर मोदी ने लोकतंत्र की हत्या की होती तो तुम ऐसी बकवास करने की हिम्मत न करते। लोकतंत्र की हत्या तो तुम्हारी दादी इंदिरा गांधी ने की थी जब इमरजेंसी लगाई थी। क्या चाहते हो मोदी भी वही करे जो इंदिरा ने किया? 

कांग्रेस वो कर ही नहीं सकती जो विपक्ष का नेता होते हुए वाजपेयी ने किया। 1994 में जिनेवा में कश्मीर पर भारत का पक्ष जिस तरह उन्होंने रखा वो आज की कांग्रेस के मुंह पर तमाचा है

इतना ही नहीं वाजपेयी से प्रधानमंत्री के तौर पर जब अमेरिका में कांग्रेस के बारे सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया - “while the ruling party and the opposition might have their differences at home, ‘in foreign countries, we are all Indians first.’ He consistently maintained that political disputes should remain within India’s borders. दूसरी तरफ राहुल गांधी है जो विदेशों में जाकर भाजपा, आरएसएस और मोदी को गाली बकता फिरता है

विपक्ष कभी भी भाजपा से कुछ नहीं सीख सकता। 

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