ट्रंप ईरान के साथ कथित समझौते में भरोसेमंद साथी इज़रायल के साथ धोखा कर रहे हैं जबकि उन्हें पता है कि ईरान खुद और उसके पाले हुए आतंकी संगठन हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती इज़रायल को दुनिया के मानचित्र से मिटा देना चाहते है। ट्रंप नेतन्याहू को कहते हैं कि लेबनान पर हमले बंद करें लेकिन हिज़्बुल्लाह को नहीं कहते कि वो इज़रायल के खिलाफ हथियार न चलाए।
क्या धोखा देना अमेरिका के DNA में है? इजराइल को हिजबुल्लाह के खिलाफ हथियार न चलाए की नसीयत देने वाले ट्रम्प ने हिजबुल्लाह को आतंकी हमले नहीं करने के लिए क्यों नहीं बोला? ये वही अमेरिका है जिसने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की मदद से सोवियत यूनियन को तोड़ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को भी धोखा देने में देरी नहीं की। आज इन दोनों मुल्कों की क्या हालत है दुनिया के सामने है। क्या नागों को दूध पिलाना अमेरिका की फितरत में है? दूसरे, यह कि जब पाकिस्तान द्वारा भारत पर आतंकी हमले करने पर भारत उसका जवाब देता है तो अमेरिका परदे के पीछे से पाकिस्तान की मदद करता है। अब इसे अमेरिका का दोगलापन ही कहा जाएगा।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
ट्रंप पिछले कुछ दिनों में नेतन्याहू पर 5 बार बरसे हैं, नेतन्याहू को पागल तक कह दिया और यह भी कह दिया कि “अगर मैं न होता तो तुम जेल में होते”। ऐसे ही अहंकार भरे शब्द ट्रंप ने आज भी कहे हैं कि इज़रायल अमेरिका की वजह से है, इज़रायल बहुत पहले तबाह हो गया होता, ईरान के पास परमाणु हथियार होता तो वह उससे जंग के दौरान इज़रायल पर हमला करता”। तो क्या इज़रायल के पास परमाणु हथियर सजाने के लिए रखे हैं, वह क्या उपयोग नहीं करता ईरान पर?
ट्रंप भूल रहे हैं कि इज़रायल जितने अवरोध झेल कर युद्ध कर खड़ा हुआ है, वह आज तक कोई देश नहीं कर सका। अमेरिका ने एक बार पहले भी धमकी दी थी कि हम इज़रायल को हथियार देना बंद कर देंगे और तब नेतन्याहू ने कहा था कि अगर हमारे पास हथियार नहीं भी होंगे तो अपने हाथों की नाखूनों से युद्ध करेंगे। यह जज्बा है इज़रायल का और आज कहते है इज़रायल का पूरा विपक्ष नेतन्याहू के साथ खड़ा है।
ये समझौता देखा जाए तो एक दिखावा है और उसके टिके रहने की संभावना बहुत कम है। ट्रंप अपनी ही हाँक रहे हैं कि ईरान के साथ हुए समझौते का अहम यह है कि तेहरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और उन्होंने इस पर सहमति दी है जबकि ईरान की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया।
ट्रंप ने यह भी कहा है कि होर्मुज समुद्री मार्ग जल्द खुल जाएगा और ईरान को वहां से निकलने वाले जहाजों से टैक्स वसूलने का अधिकार नहीं होगा लेकिन ईरान ने कहा है कि वह समुद्री मार्ग उसकी व्यवस्था के तहत खुलेगा। कितना बड़ा विरोधाभास है!
उधर ईरान के विदेश मंत्री अरघाची ने कहा है कि इस MOU में दो पार्टी हैं। एक तरफ अमेरिका और इज़रायल है और दूसरी तरफ ईरान और हिज़्बुल्लाह और लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध बंद होना चाहिए लेकिन लेबनान पर हमले से समझौते का उल्लंघन माना जाएगा। इज़रायल कैसे पार्टी हो गया और हिजबुल्लाह क्या कोई देश है जिसे ईरान MOU में पार्टी बता रहा है? अलबत्ता लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध रोकने की बात MOU में कही गई है जबकि लेबनान का मामला इज़रायल का है और अमेरिका को उस पर दखल देने का अधिकार नहीं है।
MOU में 60 दिन में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत होगी। जब बात होनी है तो ट्रंप का दावा सही नहीं है कि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने के लिए सहमति दी है।
यह भी कहा गया है ईरान के फ्रीज़ आधे Assets 12 बिलियन डॉलर के अमेरिका समझौता होने से पहले मुक्त कर देगा और आधे बाद में।
इसके अलावा ईरान ने पुनर्निर्माण के लिए 300 बिलियन डॉलर की भी मांग की है जिसके बारे में MOU में कुछ नहीं स्पष्ट नहीं है लेकिन जो ईरान को विजई कह रहे हैं उन्हें यह जानना जरूरी है कि कितना भारी नुकसान हुआ है ईरान का जिसके लिए इतनी मोटी रकम मांग रहा है।
मूर्ख और चालाक ईरान के लिए अमेरिका का इज़रायल को त्यागना उसके लिए ही हानिकारक सिद्ध होगा।

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