सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर दिए गए निर्णय बड़े विचित्र हैं जो वास्तविक जीवन में अमल होने संभव नहीं है। कई जगह कहा गया है कि अगर व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं भी है (जन्मदाता नहीं है) तब भी वह बच्चे के भरण पोषण के लिए जिम्मेदार होगा क्योंकि उसका जन्म माता पिता के वैवाहिक जीवन के दौरान हुआ है (section 112 Indian Evidence Act), भले ही उस बच्चे का पिता कोई और हो यानी माँ के किसी के साथ संबंधों से जन्म हुआ हो।
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इस केस में पत्नी को किसी गैर मर्द से औलाद थी लेकिन कोर्ट ने उसके भरण पोषण के लिए पिता को जिम्मेदार ठहरा दिया और असली जनम देने वाले की मौज करा दी। चंद्रचूड़ ने तो पत्नियों को वैसे भी Sexual Autonomy का अधिकार दे दिया था जिसका मतलब था कि पति से अगर संतुष्टि नहीं मिलती तो वह किसी और से भी संबंध बना सकती है। कैसा फैसला था सूर्यकांत जी का? यह क्या किसी के वास्तविक जीवन में अमल हो सकता है?
एक दूसरे केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता देने से मना कर दिया क्योंकि DNA रिपोर्ट में साबित हुआ कि पति बच्चे का पिता नहीं है। मामला सुप्रीम कोर्ट गया जहां 29 मई, 2026 को जस्टिस संजय करोल एंड जस्टिस कोटेश्वर सिंह की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को उचित ठहरा दिया क्योंकि पत्नी ने DNA टेस्ट के लिए सहमति दी थी और क्योंकि पति बच्चे का पिता साबित नहीं हुआ, गुजारा भत्ता मान्य नहीं है।
ये मामला बड़ा अजीब था। पत्नी आदमी के घर में नौकरानी थी और उसका आरोप था कि उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए। दोनों ने फिर 2 मार्च 2016 को शादी कर ली और 1 अप्रैल, 2016 को यानी ठीक एक महीने बाद बच्चे का जन्म हो गया। शायद इसलिए ही वो DNA टेस्ट के लिए राजी हुई लेकिन मामला कुछ और ही निकला। लेकिन कोर्ट ने एक तुर्रा फिर भी लगा दिया कि बच्चे को सामाजिक कलंक से बचाने के लिए पिता उसी को माना जाएगा क्योंकि उसका जन्म शादी के बाद हुआ। फिर तो गुजारा भत्ता भी देना चाहिए जैसे जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के फैसले का मतलब था।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल ने 4 दिन पहले एक अलग व्यवस्था दी है। इस केस में किसी ने बच्चे को कथित पिता की संपत्ति में हिस्सा दिलाने के लिए ट्रायल कोर्ट में दीवानी मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट और फिर हाई कोर्ट ने DNA के आदेश दिए लेकिन वह व्यक्ति (जिसे पिता कहा गया) सुप्रीम कोर्ट चला गया कि DNA टेस्ट से मेरी निजता भंग होगी।
बच्चे के कथित माता पिता के जनवरी, 1999 में संबंध थे और सितंबर, 1999 में बच्चे का जन्म हुआ लेकिन व्यक्ति ने उसका पिता होने से इंकार कर दिया।
जस्टिस करोल की पीठ ने उसकी अपील ख़ारिज करते हुए कहा कि “बच्चे का अपने पिता के बारे में जानने का अधिकार, किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है और DNA टेस्ट के आदेश दे दिए। इस केस में बस यह लगता है कि महिला और उस व्यक्ति की शादी नहीं हुई थी क्योंकि पूरी रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया। कोर्ट ने कहा निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है (कहीं अधिकार को पूर्ण कह दिया जाता है)। बिना DNA बच्चा उस अधिकारों से हमेशा वंचित रह जाएगा जिसका वह हक़दार हो सकता है और इसलिए हित संतुलन माँ के पक्ष में है।
एक ही विषय पर अलग अलग फैसले देना क्या उचित है?

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