अगर सच सहन करने की क्षमता हो तो ही आगे पढ़े वरना यहीं से छोड़ दे.क्योंकि मेरे पास वो सत्य होता है, जिसे पढ़ कर आपकी।आत्मा कांप सकती है अगर बची हो तो और वो सत्य जो हवा में उड़ते बिना अधार वाले उन लोगों को जमीन पर ला सकता है, जो बात बात में मोदी चोर है, मोदी चोर है के नारे लगाते फिरते हैं.
कल जब संसद में घुसते हुए प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस ने हल्का बल पप्रयोग किया, और उन चार डंडों पर पूरे विपक्ष को घड़ियाली आंसू बहाते देखा, और छाती पीटते देखा, तब आप सबको लगा होगा कि विपक्ष कितना इमोशनल है बच्चों के लिए.
पर कल के पूरे हंगामे में एक और घटना घट रही थी, दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर. किसी का ध्यान नहीं गया. वो घटना घट रही थी बंगाल में, कलकत्ता विधान सभा में. जहां बंगाल के मुख्य मंत्री सुभेंदू अधिकारी एक 33 साल पुरानी हत्याकांड की रिपोर्ट, जो कहीं दबा दी गई थी, उसे विधान सभा के पटल पर रख रहे थे.
मैंने भी नहीं सुना था, शायद हमारी पीढि में से किसी ने भी ये चीज़ नहीं सुनी, कि आज से 33 साल पहले बंगाल में क्या हुआ था,
किसकी रिपोर्ट थी ये. और 33 साल बाद क्यों बाहर आई?
अब जरा धैर्य से पढ़िये.
जैसे कल जंतर-मंतर से चलकर संसद में घुसने के लिए वामपंथ, आम आदमी पार्टी, कॉंग्रेस, का कोकटेल, छात्रों के नाम पर संसद की तरफ बढ़ा, उसी तरह 21 जुलाई 1993 को बंगाल के कलकत्ता के धरमतला क्षेत्र में, युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता और नेता लोग राइटर्स बिल्डिंग की तरफ बढ़ रहे थे. उस वक्त सत्ता में थे वामपंथी, ज्योति बसु की सरकार थी. और जब वो युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दल राइटर्स बिल्डिंग की तरफ बढ़ रहा था,
अभी वो राइटर्स बिल्डिंग से बहुत काफी दूर थे, तभी अचानक उन कार्यकर्ताओं पर पुलिस की गोलिया चलती हैं, और उनमें 13 कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं की मौत हो जाती है.
सन्नाटा पसर जाता है पूरे बंगाल में. जब हल्ला मचता है, तो सरकार की तरफ से एक आयोग गठित किया जाता है, जिसको चटर्जी आयोग कहा गया था.
चटर्जी आयोग की रिपोर्ट आती है, और अलमारी में धूल फांकती है. उसी धरमतला हत्याकांड को राजनीती का मुद्धा बनाकर ममता बनर्जी कांग्रेस से अलग होती है, और बंगाल की सत्ता में आती है.
और जिस दिन ये हत्याकांड हुआ था, उसी 21 जुलाई को शहीद दिवस घोषित करती है, और हर साल tmc शहीद दिवस मनाती है. लेकिन 15 साल सत्ता में रहने के बाद भी ममताबनर्जी ने उस रिपोर्ट को कभी संसद के पटल पर नहीं रखा, कभी उसको सार्वजनिक नहीं किया. क्यों?
क्योंकि आज जो तृणमूल कॉंग्रेस के बड़े बड़े नेता हैं, वो उस वक्त वामपंथ सरकार के हिस्से थे. और उन सब नेताओं का नाम उस रिपोर्ट में है.
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ये लिखा है कि उस वक्त स्वागत राय, ममताबनर्जी ये सब बड़े गवाहों की लिस्ट में थे, लेकिन पुलिस ने इनसे कभी पूछताछ ही नहीं करी.
ओर गोली चलाने के आदेश किसने दिए इसके दस्तावेज ज्योति बसु सरकार ने कभी आयोग को दिए ही नही
अब बताईए ऐसी रिपोर्ट ममताबनर्जी कैसे पटल कर सकती थी? जबकि उसी रिपोर्ट की कमाई खाकर ममताबनर्जी मजैसे लोग सत्ता में आये थे.
और कॉंग्रेस जो आज घडियाली आँसु बहा रही है, इन उग्र प्रदर्शन कारियों के और वामपंथी कोकटेल के लिए, उस कॉंग्रेस ने 33 साल में अपने युवा कार्यकर्ताओं की हत्या पर एक सवाल नहीं उठाया, ना बंगाल विधानसभा में, ना संसद में, और ना ही कहीं सड़क पर.
क्या वो किसी के बच्चे नहीं थे?
अरे प्रियंका गांधी जी वो आपकी सत्ता के पाए मजबूत करने के लिए मरे थे वहाँ.
आज संसद में घुसने से रोकने के लिए चार डंडे मारने वाले, मोदी को आप राक्षस और तानाशाह और पता नहीं क्या-क्या कह रहे हो. तो आप क्या हो?
उन 13 कार्यकर्ताओं, मरने वाले 13 कार्यकर्ताओं के घरों वालों को ना तो मुआवजा मिला, ना उनको न्याय मिला. लेकिन एक बात जो सुबेंदु अधिकारी ने बंगाल की विधानसभा में कल कही, उसने पूरे बंगाल में और पूरी बंगाल की राजनीती में खलबली मचा दी.
उन्होंने कहा कि उन 13 कार्यकर्ताओं, भले वो कॉंग्रेसी थे, लेकिन वो बंगाली थे. और अन्याय के शिकार हुवे थे. अगर उन 13 कार्यकर्ताओं के परिवार के लोग अगर आज चाहेंगे, तो हम दुबारा FIR लिख सकते हैं, और दुबारा उस केस की जाच कर सकते हैं. और उस रिपोर्ट में जो मुआवजा, 25-25 लाख रुपे देने के लिए चटरजी आयोग ने सिफारिश करी थी, अगर परिवार चाहेंगे, तो आज वो मुआवजा हम मुख्यमंत्री राहत कोस से देने की वादा कर सकते हैं.
ये है उस वामपंथ, कॉंग्रेस और तृणमूल कॉंग्रेस का असली खूनी सच जो आज तक देश की जनता से छुपाया गया था. लेकिन राजनीती इतनी घृणित होती है कि आज उन्ही कॉंग्रेस और तृणमूल कॉंग्रेस और वामपंथियों को जरा भी शर्म नहीं आती है. आज फिर वो वही खेल खेल रहे हैं. कॉलेज, स्टुडेंट और अपने कार्यकर्ताओं को अपनी राजनीती के पाए मजबूत करने के लिए उसी पुलिस के सामने खड़ा कर दे रहे हैं. और अराजकता के माहौल में उनको झोंक रहे हैं. और उपर से बात करते हैं कि मोदी सरकार संवेदनशील नही है.
आप की संवेदनशीलता तो चटरजी आयोग की फाइलों में दबी पड़ी है. जो सुभेंदू अधिकारी ने कल देश के सामने रख दी. इस विपक्ष को तो छात्रों, किसानों या किसी अन्याय के मुद्दे पर एक शब्द बोलने का अधिकार नहीं है. लेकिन सब चाटुकारिता में लगे हैं. किसे फुरसत है, एक कठोर सवालें नेताओं से पूछने की. और किसकी हिम्मत है?
आज पॉलिटिक्स का इकोसिस्टम इतना पावरफुल है कि आप चाहकर भी अपनी आवाज अपने हलक से निकाल नहीं सकते.
और हमारे जैसे जो लोग फेसबुक या यूट्यूब पर जो अपनी आवाज निकाल रहे हैं, वो आवाज इतनी धीमी और इतनी छोटी है कि उन कानों तक पहुँच ही नहीं पाती.
साभार : संजय पाण्डेय शास्त्री एडवोकेट जिला एवं सत्र न्यायालय प्रयागराज 9506157554
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