राममन्दिर चंदा घोटाले की एक सोंची समझी साज़िश है। मुस्लिम कट्टरपंथियों से लेकर राम विरोधी पार्टियों की सबसे बड़ी परेशानी भव्य राममन्दिर का जीणोद्धार होना और बाबरी के नाम पर मिली जमीन पर अभी तक नींव तक नहीं पड़ी। बाबरी मस्जिद को बचाने के नाम पर अरबों रूपए पानी में बहा दिए लेकिन उस मस्जिद की नींव तक नहीं खुदी जिसके नाम पर मुसलमानों को इतने सालों तक भारतीय जनसंघ वर्तमान बीजेपी, हिन्दू महासभा, विश्व हिन्दू परिषद् और अन्य हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं को मुस्लिम समाज को हिन्दुओं के खिलाफ भड़काते रहे। कुछ मुस्लिमों का कहना है कि कपिल सिबल ने मस्जिद के नाम पर मुसलमानों के अरबों रूपए कमा लिए। लेकिन अंजाम वही ढाक के तीन पात। कहने का मतलब यह है कि चंदा घोटाला कर हिन्दुओं के दिलो दिमाग में राममन्दिर के विरुद्ध जहर फैलाया जा रहा है। बंगाल में बाबरी में नाम पर मस्जिद बनाने के नाम पर हुमायूँ कबीर रुपयों की हुई बारिश से नींव खुदवा सकता है, लेकिन अयोध्या में ढेंगा। कहाँ है दंगाइयों और आतंकियों की पैरवी पर कपिल जैसे महंगे वकील खड़े करने वाली जमात ए इस्लामी। भड़काना अलग काम है असलियत में मुसलमानों के लिए काम करना अलग।
जब 2019 में अयोध्या की राम जन्म भूमि का निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था तब मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए राज्य सरकार को 5 एकड़ भूमि भी देने के आदेश दिए गए थे। राम मंदिर निर्माण के लिए धन भी इकठ्ठा हो गया, मंदिर भी बन गया और 22 जनवरी, 2024 को प्राण प्रतिष्ठा भी हो गई और 5 फरवरी, 2020 से 5 फरवरी, 2025 के 5 साल के दौरान मंदिर ने सरकार को 400 करोड़ टैक्स भी दे दिया।
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सुप्रीम कोर्ट के मुसलमानों को 5 एकड़ भूमि देने के फैसले पर असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था “कि मुसलमानों को सुप्रीम कोर्ट की दी हुई जमीन स्वीकार नहीं करनी चाहिए (reject कर देनी चाहिए)। ये जमीन मुसलमानों के लिए “खैरात” है जिसे नहीं लेना चाहिए। मुस्लिम कौम के पास इतना पैसा है कि वह खुद अपनी जमीन खरीद कर मस्जिद बना सकती है और सरकार की जमीन की कोई जरूरत नहीं है”।
धन्नीपुर में मस्जिद बनाने का कार्य इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट को मिला था और मस्जिद के साथ सामूहिक रसोई और अन्य जन सुविधाओं से युक्त परिसर निर्माण का प्रस्तावित बजट 300 करोड़ रुपए था। लेकिन 7 साल बाद भी केवल 1.5 करोड़ रुपए का चंदा ही प्राप्त हुआ है।
अब ट्रस्ट ने परियोजना का दायरा छोटा करने का निर्णय लिया है और अपेक्षाकृत छोटी मस्जिद बनाने की योजना पर काम हो रहा है। उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जुफर फारूकी ने जानकारी दी है कि नक्शा छोटा करने पर मस्जिद 3 करोड़ रूपए में बन कर तैयार हो जाएगी।
कहां मस्जिद 300 करोड़ में बननी थी और कहां अब केवल 3 करोड़ में बनाने की बात हो रही है?
हुमायूँ कबीर ने ही अपनी “बाबरी” के 3.5 करोड़ एकत्र कर लिए थे। वो ही अपना पैसा धन्नीपुर मस्जिद के किये दे दे।
अब दो प्रश्न उठते हैं कि जो ओवैसी कहता था कि मुसलमानों के पास इतना पैसा है कि वो जमीन खरीद कर मस्जिद बना सकते हैं, फिर 7 साल में केवल डेढ़ करोड़ ही क्यों आया? कोई कहता है मुसलमान 15 करोड़ हैं कोई कहता है 20-25 करोड़ हैं और कोई तो 30 करोड़ बताता है - क्या हर मुसलमान 10 रूपए भी मस्जिद के लिए नहीं दे सकता था जिससे 300 करोड़ जुटाए जा सकते थे। फिर वक्फ बोर्ड के पास तो करोड़ों रुपए हैं और खुद ओवैसी करोड़ों का मालिक है, तब भी मस्जिद के लिए 300 करोड़ नहीं जुटा सके।
लेकिन मुसलमानों को मस्जिद से कोई मतलब नहीं है। वो उनके प्रोजेक्ट और है लव जिहाद है, डॉक्टर जिहाद, लैंड जिहाद है और विदेशों से कॉकरोचों के लिए दंगा करने के लिए धन भेजना।
जो सेक्युलर दल मुसलमानों की वोटों के लिए मरे जाते हैं और कुछ तो खुद को मुस्लिमों की पार्टी कह रहे हैं, वो मुसलमानों की मस्जिद बनाने में मदद क्यों नहीं करते? उन्हें केवल मुस्लिम वोटों से मतलब है उनकी कल्याणकारी किसी योजना से नहीं। यह बात मुसलमानों के दिमाग में नहीं आती।

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