क्रोकरोच जनता पार्टी के सदस्य सिर्फ बीजेपी सरकार वाली राज्यों के स्कूलों में निरीक्षण के नाम पर जिस अभियान पर निकल रही है उसमें शिक्षा में सुधार से ज्यादा अपनी राजनीति चमकाने की बू साफ साफ देखी जा सकती है। बीजेपी के शासन में आने से पहले सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छुपी नहीं है। आज यद्यपि सरकार के सामने शिक्षा में सुधार के क्षेत्र में काफी कुछ करना बाकी है फिर भी भवन, पोशाक, साइकिल, मिड डे मिल कुछ अपवादों को छोड़कर काफी उन्नत हुआ है।
बिना प्रशासनिक अनुमति के स्कूलों के निरीक्षण का अधिकार क्या किसी भी अराजक ग्रुप या हुल्लड़बाज कार्यकर्ताओं का प्रजातांत्रिक अधिकार है यह आज का मौलिक प्रश्न है?
आज स्कूलों के शिक्षक, अभिभावक, छात्र और छात्राएं काफी सशंकित रहते हैं कि कब कोई अराजक टोली उन्हें निशाना बनाने आ धमकेगी और हुल्लड़बाजी पर उतर आएगी ऐसे में पठन पाठन का कार्य बाधित हो चला है।
आज उपद्रवियों ने मुस्लिम कट्टरपंथियों की हरकत अपना रही है कि बच्चे और महिलाओं को आगे कर पीछे कर हंगामा करो और जब पुलिस एक्शन में आएगी तो बच्चों और महिलाओं के चोटिल होने पर सरकार को घेर अपनी तिजोरियां भर सके। इस षड़यंत्र पर निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को गंभीरता से लेना चाहिए कि मर्दों की मौजूदगी में बच्चों और महिलाओं को क्यों आगे किया गया? किस जहनियत के चलते इनको बलि का बकरा बनने को मजबूर किया? पिछले कई सालों से यह देखा गया है कि उपद्रव में जमा भीड़ ही चोटिल होती है कोई इनका नेता नहीं। सब नेता पीछे रहते हैं, क्यों? नेता क्यों नहीं आगे होते?
आज ऐसे संगठनों ने अपनी अग्रिम पंक्ति में महिला सदस्यों को रखकर योजनाबद्ध तरीके से आक्रामक अभियान छेड़ रखा है। स्थानीय जागरूक लोगों, अभिभावकों, शिक्षकों के किसी प्रतिरोध या झड़प के बाद इन अराजक तत्वों का सर्वसुलभ आरोप होता है कि उनके महिला कार्यकर्ताओं के प्राइवेट पार्ट को निशाना बनाया गया अथवा उसे टच किया गया। ऐसे में उनका उद्देश्य महिलाओं के प्राइवेट पार्ट का बचाव कहीं से उनकी मंशा में नहीं देखा जाता। यदि उन्हें अपनी महिला कमांडो के प्राइवेट पार्ट की अस्मिता की चिंता होती तो उन्हें पीछे की पंक्ति में रख कर स्वयं आगे निकल कर आते! वस्तुस्थिति तो यह लगती है कि वे महिला प्राइवेट पार्ट का ढाल की तरह उपयोग करते हैं।
वैसे तो मुझे महिलाओं के प्राइवेट पार्ट शब्द पर ही घोर ऐतराज है। क्या महिलाओं के कुछ ही पार्ट प्राइवेट होते हैं और शेष अंग प्राइवेट नहीं बल्कि सार्वजनिक होते हैं? यदि आपकी किसी सामाजिक लड़ाई में महिलाओं का साथ आवश्यक है तो उनके अंगों का वर्गीकरण कर अपनी कुत्सित मंशा की तुष्टि करना बंद करें!
जब आपकी महिला ब्रिगेड आगे बढ़ कर किसी सम्मानित व्यक्ति के गिरेबान पकड़ना चाहती है तो आप कैसे आशा रखते हैं कि उसका प्राइवेट पार्ट अनछुआ रह जायेगा? सामने वाला व्यक्ति क्या इसीलिए अपना बचाव करना छोड़ देगा कि कही उसका हाथ किसी फीमेल कॉकरोच के प्राइवेट पार्ट से टच न कर जाए!
कल्पना कीजिए यदि उस स्कूल की छात्राओं ने आपके वंदे मातरम राष्ट्रगीत की अवमानना के विरोध में आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया तो उन्हें झांसी की रानी की तरह अपने प्राइवेट पार्ट की कोई चिंता नहीं रह जाएगी और आपको दलबल सहित नंगे पांव वापस भागना पड़ सकता है।
नारीवादी महिलाएं तो स्वयं स्वीकारती हैं कि अंगों या पार्टों में अश्लीलता नहीं होती, देखने वाले की नजरों में होती है तो फिर किसी अंग को प्राइवेट कहकर उसके बचाव में अलग दृष्टि क्यों अपनाई जाय! पूरी की पूरी महिला को इन हुल्लड़ प्रलापों से दूर रखें तो आपकी मंशा सही लगे!
किसी जागरूक संगठन के लिए आवश्यक है कि पहले शिक्षा के उत्थान के लिए अपना कोई सामाजिक योगदान देना सुनिश्चित करे ताकि उनकी बात असरकारक हो सके।
यह सही है कि शिक्षा और मिड डे मिल में काफी विसंगतियां हैं पर इसका निवारण उच्च अधिकारियों और सक्षम पदाधिकारियों के द्वारा ही संभव है। किसी संगठन को उन पदाधिकारियों से बातचीत कर हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए।
कोई संगठन बैंकों में व्याप्त अनियमितता के लिए कैश रूम में या स्ट्रांग रूम में तो नहीं घुस सकता। यदि उसे चिकित्सा के क्षेत्र की अनियमितता या भ्रष्टाचार दिखाना है तो धड़ल्ले से आईसीयू में घुस सकता है क्या? फिर तो वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, शोधशालाओं और गोपनीय सुरक्षा कक्षों तक भी उनकी पहुंच बेरोकटोक कर दी जाए!
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