सुप्रीम कोर्ट अगर फालतू याचिकाएं सुनेगा तो लंबित केस तो बढ़ेंगे ही; सोचिए क्या सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड कर सकता है, नहीं, तो फिर याचिका क्यों?

सुभाष चंद्र 

आजकल जो लोग चुनाव आयोग की निष्पक्षता और ईवीएम (EVM) पर दिन-रात ज्ञान बांटते फिर रहे हैं, वे जरा इस तस्वीर को ध्यान से देखें। यह 1991 की वो ऐतिहासिक तस्वीर है, जब नई दिल्ली में सोनिया गांधी जी वोट डालने पहुंची थीं। जरा देखिए कि कैसे उनके साथ राजीव गांधी, चुनाव के उम्मीदवार राजेश खन्ना और समर्थकों का पूरा लश्कर सीधे मतपेटी तक ही पहुंच गया था! "लोकतंत्र के 'सुनहरे दिन' और 'सामूहिक' वोटिंग का यह अद्भुत ऐतिहासिक नजारा! 
क्या गजब का 'सहयोगात्मक लोकतंत्र' था, जहां गुप्त मतदान की गोपनीयता पर वीआईपी नेताओं का रसूख भारी पड़ता था। आज के चुनाव आयोग ने तो नियम-कायदे बनाकर सारा खेल ही बदल दिया है। अब एक नागरिक को अकेले बूथ में भेजकर वोट डलवाया जाता है। जिन लोगों को पूरे लाव-लश्कर के साथ 10-15 लोगों की भीड़ जुटाकर एक साथ मतपेटी में पर्ची सरकाने की पुरानी आदत रही हो, उन्हें आज की ये सख्त और पारदर्शी व्यवस्था भला कैसे हजम होगी? आखिर बिना भीड़ के वोट डालने में वो पुराना स्वाद कहां!

सितम्बर 29 को सुप्रीम कोर्ट में किसी राकेश कुमार सिंह ने याचिका दायर की और उसके वकीलों विकास सिंह, सुदीप चंद्र और मुदित गुप्ता ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत से तुरंत सुनवाई की अर्जी लगाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट CEC ज्ञानेश कुमार के, याचिका पर सुनवाई तक के लिए काम करने पर रोक लगाए। याचिका में ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त होने के नाते किए गए कामों के खिलाफ आरोप लगाए और उनके निलंबन किए जाने की मांग की।

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सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका (जो अपने आप में तुच्छ -Frivolous, है) लिस्ट करने और जल्द सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली।

सुप्रीम कोर्ट के पास CEC को पद से हटाने या सस्पेंड करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। CEC को संसद में महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है जैसे संविधान के अनुच्छेद 324(5) में सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जा सकता हैं। सुप्रीम कोर्ट केवल ऐसी याचिकाओं की सुनवाई कर सकता है जिनमें चुनाव आयोग के प्रशासनिक कार्यों की वैधता को चुनौती दी गई हो या किसी कार्य को करने पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई हो।

कल को कोई याचिका राष्ट्रपति के पास लगा दी जाए कि चीफ जस्टिस को सस्पेंड किया जाए तो क्या राष्ट्रपति उस पर कार्रवाई करेंगे? नहीं, क्योंकि यह कानून सम्मत नहीं है। फिर चीफ जस्टिस सूर्यकांत को CEC को सस्पेंड करने की मांग करने वाली याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करने का क्या औचित्य है? सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसी शक्तियां नहीं हैं, यह बात वकील विकास सिंह (जो SCBA अध्यक्ष भी रहे हैं) और चीफ  जस्टिस को भी पता है, फिर भी याचिका में मांग की गई और याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार भी कर ली गई। 

ऐसी ही याचिकाएं स्वीकार होने की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित केसों की संख्या बढ़ रही है।

आजकल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट बिना वजह उसका हिस्सा बन रहा है। मुझे यह पता है सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड करने के आदेश न दे सकता है और न देगा तो फिर याचिका को admission stage पर ही ख़ारिज कर देना चाहिए था। ऐसे कोर्ट का समय बर्बाद करने का क्या फायदा है? 

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