ताजा फैसला पटना हाई कोर्ट से आया है जिसमें जस्टिस संदीप कुमार ने स्पष्ट किया है कि “किसी सोती हुई महिला के ऊपर लेट कर उसका मुंह दबाना, जब तक कि शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में स्पष्ट सबूत न हों, दुष्कर्म के प्रयास को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है”। जज साहब ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए इसे लज्जा भंग करने के दायरे में माना। और आरोपी की 60 वर्ष की आयु को देखते हुए, उसकी मुख्य सजा के पहले काटी हुई अवधि तक सीमित कर दिया, साथ में 25 हजार का जुर्माना लगाया जो पीड़िता को मिलेगा। घटना 8 फरवरी 2010 बेगूसराय में हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 10 फरवरी, 2026 के फैसले में कहा था “that once an accused starts executing criminal intent (such as groping and untying clothing), it moves past preparation into an attempt to commit rape”. ये फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा के निर्णय पर था जिसमें उन्होंने कहा था 11 साल की बच्ची के स्तन दबाना और उसका नाड़ा खोलना बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता।
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एक नहीं अनेक मामले हैं जिनमें हाई कोर्ट के जज बिलकुल “रेप विशेषज्ञ” बनकर फैसले देते हैं। उनके पीड़ित महिलाओं के दर्द का अहसास तब तक नहीं हो सकता जब तक उनके घर की बहन बेटियों के साथ ऐसा न हो।
एक मामले में झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि “रात में किसी महिला के घर में घुसना, उसे पकड़ना और उसके कपड़े उतारना रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता (not an attempt to rape)। 28 साल पुराने केस में अभियुक्त 8 महीने जेल में बिता चुका था और जज साहब ने Trespass का केस मान कर सजा को 8 महीने कर दिया। यही काम पटना हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप कुमार ने किया।
रेप के मामलों में जज ऐसे “रेप विशेषज्ञ” बन गए है कि जैसे उन्होंने इस मामले में PhD कर रखी हो। कोई कह देता है, रेप का अभियुक्त तो 5 वक्त की नमाज पढता है और सजा कम कर देता है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेला त्रिवेदी (अब रिटायर्ड) ने कह दिया कि “Every Sinner has a future” और 4 वर्ष की बच्ची के बलात्कारी/हत्यारे की फांसी की सजा रद्द कर आजीवन कारावास में बदल दी।
छत्तीसगढ़ के ही जस्टिस नरेंद्र व्यास ने एक फैसले में कहा -” छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Chhattisgarh High Court) ने फरवरी 2026 में एक मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया था कि यदि प्राइवेट पार्ट (योनि) में प्रवेश (Penetration) नहीं हुआ है और केवल वीर्यपात (Ejaculation) हुआ है, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत 'बलात्कार' (Rape) नहीं माना जा सकता, बल्कि यह 'बलात्कार का प्रयास' (Attempt to Rape) की श्रेणी में आएगा।
ऐसे बहुत केस हैं जिनमें जज रेप के मामलों में अपनी expetise झाड़ते हैं, बिना लाज शर्म के।
सुप्रीम कोर्ट को हाई कोर्ट के जजों के लिए विशेष दिशा निर्देश जारी करने चाहिए कि रेप के मामलों में “अपना ज्ञान देने की बजाय न्याय करें नाकि पीड़ित महिलाओं के सम्मान से खिलवाड़ करें”।


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