राहुल गाँधी नया लड़का : गुलाम नबी आज़ाद, कांग्रेस वरिष्ठ नेता

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस ने अपने पतन की पटकथा उसी दिन लिख दी थी जब 2004 में प्रधानमंत्री प्रणब मुख़र्जी की बजाए मनमोहन सिंह को बनाने का निर्णय लिया था। दूसरे, 2014 में मोदी लहर को रोकने के अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी का गठन करवाना। लेकिन मोदी लहर प्रभावहीन नहीं हुई, पहली बार भारतीय जनता पार्टी बहुमत में आयी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए, और कांग्रेस का ग्राफ नीचे गिर गया। जो आज तक उठ नहीं पाया। 
कहते है, बुढ़ापे में ही सारी बीमारियां उभर कर आती हैं। ठीक वही स्थिति आज कांग्रेस की है। कल तक परिवार के इशारे पर नाचने वाले आज विरोधी स्वर बोल रहे हैं। कल राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा की वकालत करने वाले इन्ही के विरुद्ध आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। उसका कारण है, जो पार्टी में बैठकर कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी बताते हैं, लेकिन चुनावों में जनेऊ पहनते हैं, मंदिरों में माथा टेकते हैं, तो चुनावों उपरांत हिन्दुत्व विरोधी बयानबाज़ी करते हैं। मुसलमानों को "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम से डराने के साथ-साथ हिन्दुत्व को बदनाम किया जा रहा था। इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने बेकसूर हिन्दू साधु,संत और साध्वियों को धमाकों के आरोप में जेलों में बंद कर यातनायें देना, लगता है कांग्रेस को उन बेकसूर साधु, संत और साध्वियों की हाय खा रही हैं। वही हिन्दू विरोध कांग्रेस को धरातल में धकेल रहा है। 
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने तो अपनी पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि 'सोनिया गाँधी हिन्दू विरोधी है...' उन्होंने इतनी बड़ी बात ऐसे ही नहीं लिख दी। उसका कारण भी दिया है।
दूसरे जब राहुल गाँधी को अध्यक्ष को बनाने की चर्चा चल रही थी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूँही नहीं कहा था, अपने अनुभव के आधार पर कहा था कि "बनाइए जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाई।" राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद से आज विरोधी स्वर बोलने वाले खुश जरूर हो रहे थे, परन्तु पार्टी उतनी ही नीचे जानी शुरू हो गयी थी। राहुल ने आलू से सोने बनाने की बात तो बोल दी, लेकिन उसे चरितार्थ नहीं किया। अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में आलू चिप्पस की अगर फैक्ट्री ही लगवा दी होती, बेरोजगारों को रोजगार मिलता और आलू से सोना भी बन रहा होता। उनकी आवाज़ में भारीपन आ गया होता, लेकिन जिसे अँधेरे में तीर छोड़, जनता का मनोरंजन करना ही उद्देश्य हो, पार्टी धरातल में ही जाएगी।      
सबसे बड़ी समस्या पार्टी में गुलामी मानसिकता की है। आज किस आधार पर विरोध किया जा रहा है? उस समय इनकी बुद्धि कहाँ चली गयी थी, जब सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंक दिया था, उस समय इनकी बुद्धि कहां गयी हुई थी जब अपने ही वरिष्ठ नेता एवं भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शव को पार्टी ऑफिस के दरवाजे नहीं खोले गए थे। यदि समय रहते इन्हीं लोगों ने गुलामी मानसिकता को त्याग पार्टी और देशहित में काम किया होता, शायद कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती। खैर, विधि के विधान को कौन बदल सकता है 

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। 

को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ 

अस कहि लगे जपन हरिनामा। 

गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥   

फिर कई राष्ट्रीय मुद्दे भी तुष्टिकरण के चलते नहीं सुलझाए, विपरीत इसके उन्हें विवादित बना दिया। जैसे : जीएसटी, अयोध्या, काशी, मथुरा, नागरिकता संशोधक कानून, अनुच्छेद 370, पाकिस्तान द्वारा आतंकी गतिविधियों को संरक्षण देना, चीन से गुप्त समझौता करना, वर्तमान मोदी सरकार द्वारा पाकिस्तानी आतंकवादी ठिकानों पर सर्जिकल एवं एयर स्ट्राइक करने पर सबूत मांगकर पाकिस्तान की बोली बोलना, पाकिस्तान जाकर मोदी के विरुद्ध माहौल बनवाना आदि अनेको ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाने की बजाए विवादित करने में ही कांग्रेस ने अपना हित उचित समझा, जो आज पार्टी को खा रहे हैं।   
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पुत्रमोह और पार्टी में परिवारवाद के कारण कई वरिष्ठ नेता बगावती रुख अपना रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के बाद अब गुलाम नबी आजाद ने भी अपनी भड़ास निकाली है। उन्होंने सोनिया गांधी के बेटे और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को इशारों में ‘नया लड़का’ कहा है। एबीपी न्यूज के अनुसार आजाद ने कहा है कि कांग्रेस सबसे निचले स्तर पर खड़ी है। पार्टी के बड़े नेताओं का कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क टूट गया है। फाइव स्टार होटलों में बैठकर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नेता को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का ज्ञान होना चाहिए। केवल दिल्ली से जाना और पांच सितारा होटलों में रहना और दो-तीन दिन बाद दिल्ली लौटना पैसे की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है।

इससे पहले कांग्रेस के 23 नेताओं ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को लेकर सोनिया गांधी को चिट्‌ठी भी लिखी थी। इनमें गुलाम नबी आजाद के साथ कपिल सिब्बल भी शामिल थे। चिट्ठी में पार्टी में ऊपर से नीचे तक बदलाव करने की मांग की गई थी, जिससे काफी विवाद हो गया था। पिछले 72 साल में कांग्रेस सबसे निचले पायदान पर है। कांग्रेस के पास पिछले दो कार्यकाल के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद भी नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी पार्टी नेतृत्व में सवाल उठाने वाले नेताओं को विरोध का सामना करना पड़ता है। गांधी परिवार के नेतृत्व के तौर-तरीकों पर सवाल करने वालों को पार्टी में किनारे कर दिया जाता है।

कांग्रेस में सच बोलने वालों को किया जाता है परेशान
कांग्रेस में आलाकमान के प्रति निष्ठा रखने वाले नेताओं को अहम जिम्मेदारियां मिलती हैं, जबकि युवा और जमीन से जुड़े नेताओं को दरकिनार किया जाता है। जो भी नेता पार्टी की नकारात्मक राजनीति के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत करता है, उसकी आवाज दबा दी जाती है। कांग्रेस से एक के बाद एक कई युवा नेताओं के पार्टी छोड़ने या आलाकमान से नाराजगी से यह सवाल उठना जायज है कि क्या वाकई बिना जनाधार वाले नेता तानाशाही कर रहे हैं। आइए डालते हैं एक नजर-

खुशबू सुंदर
अभिनेत्री से राजनेता बनीं खुशबू सुंदर ने हाल ही में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे पत्र में खुशबू ने आरोप लगाया कि पार्टी में ऊपर बैठे जिन लोगों का जमीनी स्तर पर कोई जुड़ाव नहीं है और वे तानाशाही कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेरी तरह जो लोग काम करना चाहते हैं उन्हें दबाया जा रहा है। अपने पत्र में खुशबू सुंदर ने लिखा कि कांग्रेस के 2014 लोकसभा चुनाव हार जाने के बावजूद उन्होंने पार्टी ज्वाइन की थी, लेकिन यहां काम करने वाले लोगों की अनदेखी की जाती है।

संजय झा
इसके पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय झा ने एक न्यूज वेबसाइट को दिए इंटरव्यू और लेख के जरिए कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किया था। पार्टी की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से कांग्रेस प्रवक्ता पद से हटा दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने लेख और द प्रिंट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है। संजय झा ने दावा किया कि पार्टी के पास एक आंतरिक मजबूत तंत्र नहीं है। उन्होंने लिखा है कि पार्टी के अंदर सदस्यों की बात नहीं सुनी जाती है। अपने लेख में झा ने यह भी कहा कि पार्टी सरकार के विफल होने पर लोगों को शासन का कोई वैकल्पिक विवरण प्रस्तुत नहीं कर सकती।

सचिन पायलट
राजस्थान के युवा नेता सचिन पायलट ने पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई, लेकिन जब सरकार बनाने की बात आई तो सीएम की कुर्सी अशोक गहलोत को दे दी गई। नाराज सचिन को मनाने के लिए डिप्टी सीएम बना दिया गया। इस बीच गहलोत ने सचिन पायलट को किनारे करना शुरू कर दिया। इससे नाराज होकर सचिन पायलट को बागी रुख अपनाना पड़ा।

ज्योतिरादित्य सिंधिया
मध्य प्रदेश में जनाधार वाले लोकप्रिय युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस की अनदेखी के कारण हाल ही में बीजेपी में शामिल हो गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ राज्य के कई अन्य विधायक और युवा नेता भी बीजेपी का दामन थाम चुके हैं। इससे राज्य में कांग्रेस काफी कमजोर हो गई है।

हेमंत बिस्वा शर्मा
असम के लोकप्रिय नेता हेमंत बिस्वा शर्मा को भी मजबूर होकर पार्टी से निकलना पड़ा। यहां के बुजुर्ग कांग्रेसी नेता तरुण गोगोई के साथ मतभेदों के कारण उन्हों हाशिए पर डाल दिया गया था। 2001 से 2015 तक कांग्रेस के विधायक हेमंत बिस्वा शर्मा 2016 में बीजेपी में आ गए। राज्य में कांग्रेस को हराने में इनका अहम योगदान रहा है। हेमंत बिस्वा शर्मा अभी असम सरकार में मंत्री हैं।

प्रियंका चतुर्वेदी
कांग्रेस की एक तेजतर्रार युवा प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को भी पार्टी नेतृत्व की अनदेखी के कारण बाहर होना पड़ा। उन्हें पार्टी में दुर्व्यवहार का भी सामना करना पड़ा। आखिर में वे शिवसेना में शामिल हो गईं।

ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी एक समय पार्टी नेतृत्व की अनदेखी के कारण कांग्रेस छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था। पार्टी में किनारे किए जाने पर ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बना ली थी। ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी का राज्य से एक तरह से सफाया हो गया है।

वाईएस जगन मोहन रेड्डी
वाईएस जगन मोहन रेड्डी वर्तमान में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। इनके पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी दो बार राज्य के सीएम रह चुके हैं। 2009 में वाईएस राजशेखर रेड्डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के बाद लोगों ने जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की लेकिन पार्टी आलाकमान ने इसे ठुकरा दिया। आखिर में पार्टी से नाराज होकर इन्होंने 2010 में अलग पार्टी बना ली और आज राज्य में इनकी सरकार है।

मिलिंद देवड़ा
महाराष्ट्र के युवा नेता मिलिंद देवड़ा ने हाल में ही मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, लेकिन पार्टी आलाकमान के रवैये से नाराज चल रहे हैं।

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