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कर्नाटक : हिन्दुओं जागो और सेकुलरिज्म के नशे को छोड़ो ; जिस पीड़ित हिंदुओं को ही जेल में ठूँसने वाला ‘काला कानून’ बिल को सोनिया ला रही थी , रोहित वेमुला एक्ट से हिंदुओं को खंड-खंड करना चाहता है बेटा: बदले नहीं हैं कांग्रेस के इरादे

कर्नाटक में कांग्रेस जिस तरह हिन्दुओं के विरुद्ध काम करने जा रही है, हिन्दुओं को कांग्रेस और उन सभी पार्टियों से दूरी बनानी चाहिए जो इस हिन्दुओं के विरुद्ध बिल लाकर देश में शरीयत लाने में साथ दे रही हैं। इन हिन्दू विरोधियों को नगर निगम से लेकर संसद तक हर मोर्चे से कोसों मील दूर रखो। अगर हिन्दू और जितनी भी हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं अभी भी नहीं जागी बहुत देर हो जाएगी और आने वाली तुम्हारी पीडियां पानी पी-पीकर तुम्हे कोसेंगी। 
आज से लगभग 14 साल पहले देश में कांग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार थी। UPA की यह सरकार ‘अल्पसंख्यकों का संसाधनों पर पहला हक़’ वाली नीति पर चलती थी। मुस्लिम तुष्टिकरण की पिच पर रोज चौके-छक्के लगाने की मंशा रखने वाली कांग्रेस ने इसी दौरान Anti-Communal Violence Bill से देश का परिचय करवाया था। यह बिल देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को दंगाई घोषित करने का दस्तावेज था। तब यह पास नहीं हो पाया था। लेकिन 14 साल बाद ऐसा ही एक बिल कांग्रेस ने दूसरी शकल में पेश किया है।

कर्नाटक में रोहित वेमुला बिल के नाम से यह नया शिगूफा छेड़ा है। इस बिल के प्रावधानों को लगातार कुछ वैसा ही बताया जा रहा है, जैसा 14 वर्ष पहले Anti-Communal Violence Bill के प्रावधानों को बताया गया था। जैसे बिना किसी सुनवाई के तब बहुसंख्यक आबादी को दंगाई बताने का प्रयास हो रहा था, वैसे ही अब नए बिल में एक बाद वर्ग के बच्चों को डिफ़ॉल्ट तौर पर शोषक बताने का प्रयास किया गया है। एक बिल माँ सोनिया गाँधी के दौर में आया था, दूसरा उनके बेटे राहुल गाँधी के कहने पर लाया गया है।

जिस कानून से आज इस कर्नाटक के नए कानून की तुलना कर रहा हूँ, इसका मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC) ने बनाया था। यह NAC असल में और कुछ नहीं बल्कि देश की चुनी सरकार के ऊपर की सरकार थी, जिसकी मुखिया सोनिया गाँधी थीं और सदस्यों में योगेन्द्र यादव और हर्ष मांदर जैसे लोग शामिल थे। अगर ये क़ानून बन गया होता तो बहुसंख्यक हिन्दू पीड़ित होकर भी अपराधी की श्रेणी में आते और कथित अल्पसंख्यक दंगे कर के भी पीड़ित कहे जाते। हिन्दुओं को बिना कुछ किए ही सज़ा मिलती।

इस कानून के पास होने के बाद जिस भी इलाके में दंगा हो, वहाँ बहुसंख्यक आबादी ही दोषी मानी जाती। अब इस देश में बहुसंख्यक हिन्दू हैं, तो सब जगह वही दोषी होते। यहाँ तक कि अगर कोई हिन्दू किसी समुदाय विशेष वाले को अपना मकान बेचने से मना कर दे, फिर भी घृणा जैसे आरोप लग जाते। जघन्य अपराध कर के भी दंगाई बच निकलते तो पत्थरबाजी, गोलीबारी और बमबारी करने वालों के लिए ये क़ानून कितने बड़े ढाल का काम करता।

हिन्दुओं के पीड़ित होने के बाद भी उन्हें दोषी माना जाता। पुलिस आपकी सुनवाई तक नहीं करती। अब ये सब ‘गुण’ ‘कर्नाटक के इस नए कानून में मौजूद हैं। कर्नाटक सरकार के इस नए शिगूफा बिल के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्रों को छोड़कर बाकी सभी के लिए, यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अन्याय से बचाने’ के लिए प्रावधान बनाए गए हैं। इसके प्रावधान कहते हैं कि कोई भी पीड़ित या फिर उसके परिवार का व्यक्ति सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कर सकता है और बिना किसी सबूत के आरोप लगाया जा सकता है।

इसके बाद तुरंत एक्शन का भी नए कानून में प्रावधान है। बिल में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-जमानती और संगीन अपराध माना गया है। यानी आरोप लगते ही किसी भी छात्र को दोषी मान लिया जाएगा। अब आपने जो कर्नाटक के नए कानून में पढ़ा और सांप्रदायिक हिंसा बिल के बारे में पढ़ा था, उसमे समानता नजर आई होगी। एक बिल मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं को बिन सुनवाई दोषी बना रहा था, दूसरा छात्रों को बिन सुनवाई दोषी बनाता है।

यानी माँ सोनिया गाँधी जिस स्कीम को लागू करना चाहती थी उसे ही थोड़ा सा मोडिफाई करके अब बेटे राहुल गाँधी ने कर्नाटक में लागू करने का प्रयास किया है। दरअसल, बात यह है कि पहले कांग्रेस चाहती थी कि वह मुस्लिमों का तुष्टिकरण करके सत्ता हासिल करती रहे। 2014 के बाद देश की राजनीति ऐसी पलटी कि हिन्दू संगठित हो गए, वोटबैंक की राजनीति करने वालों को सर पकड़ना पड़ा। लगातार कई चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को समझ आया कि उसकी राह का रोड़ा यह हिन्दू एकता है।

फिर चाहे जातिगत जनगणना की बात हो, या फिर आरक्षण को 50% से ऊपर ले जाना और अब ये रोहित वेमुला बिल, यह सभी उसकी इसी नीति का एक टूल हैं। कांग्रेस की प्लेबुक कभी भी बदलती नहीं है। कभी वह शाह बानो तो कभी सांप्रदायिक हिंसा बिल तो कभी रोहित वेमुला के नाम पर बनाए गए कानून के रूप में सामने आती है।

मालेगांव की हिंसा और कांग्रेस का काला चेहरा

अजय कुमार, उगता भारत 
इतना ही नहीं देश की राजनीति का रंग-ढंग भी बदल गया है। जो नेता पहले चुनाव नजदीक आते ही मौलानाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं की चौखट पर पहुंच जाया करते थे, इफ्तार पार्टियां देना जिनका अपना शगल था, वह अब सत्ता के लिए मंदिर-मंदिर चक्कर लगा रहे हैं।

2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए बम विस्फोट का मामला एक बार फिर से सुर्खियां बटोर रहा है। वजह वही पुरानी है और निशाने पर एक बार फिर से कांग्रेस और उसके नेता हैं, जो करीब दो दशकों से देश में ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नैरेटिव सेट करने में लगे हैं। कांग्रेस का दोहरा चरित्र ही है कि जब कोई इस्लाम से ताल्लुक रखने वाला आतंकवादी पकड़ा जाता है तो वह चीखने चिल्लाने लगती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, लेकिन इसके उलट देश पर कथित तौर पर हिन्दू आतंकवाद का ‘लेबल’ लगाने के लिए 2008 में हुए महाराष्ट्र के मालेगांव विस्फोट के असली गुनाहागारों को छोड़कर हिन्दू नेताओं और साधु-संतों को फंसाने के लिए उसकी तरफ से साजिश रची जाने लगती है।

इतना ही नहीं इस कृत्य को अमलीजामा पहनाने के लिए कई कांग्रेसी नेता नहीं तत्कालीन महाराष्ट्र और दिल्ली की मनमोहन सरकार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इसी के बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, सुधाकर द्विवेदी, मेजर रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त), अजय रहीरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी आदि सभी को जेल भेज दिया गया था। आज की तारीख में यह सभी जमानत पर बाहर हैं। उस समय हालत यह थी कि इन्हें अपराध कबूलने के लिए बुरी तरह से टार्चर भी किया गया था। अब यह खुलासा हुआ है कि उस समय की कांग्रेस सरकारों ने तत्कालीन सांसद और मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता इंद्रेश कुमार को भी विस्फोट कांड में आरोपी बनाने का षड्यंत्र रचा था। रिपोर्टों के मुताबिक मालेगांव विस्फोट कांड के समय कांग्रेस के नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और उस समय के केन्द्रीय मंत्री पी. चिदंबरम कई पुलिस अधिकारियों और एटीएस के साथ मिलकर इस साजिश को अंजाम देने में लगे थे, इसमें काफी हद तक वह सफल भी हो गए थे, लेकिन समय बदला, सरकारें बदलीं और कांग्रेस की साजिश से पर्दा भी धीरे-धीरे हटने लगा है।
इतना ही नहीं देश की राजनीति का रंग-ढंग भी बदल गया है। जो नेता पहले चुनाव नजदीक आते ही मौलानाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं की चौखट पर पहुंच जाया करते थे, इफ्तार पार्टियां देना जिनका अपना शगल था, वह अब सत्ता के लिए मंदिर-मंदिर चक्कर लगा रहे हैं। माथे पर तिलक लगाए घूम रहे हैं। ऐसे समय में जब हिन्दुत्व की राजनीति चरम पर है तब मालेगांव विस्फोट कांड में हिन्दू नेताओं और धर्मगुरुओं के फंसाने की खबर का खुलासा होने के बाद कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस तरह के षड्यंत्र का पर्दाफाश होने के बाद वह बुद्धिजीवी चुप्पी साधे हुए हैं जो मुसलमानों के खिलाफ कथित उत्पीड़न के नाम पर हो-हल्ला मचाते रहते हैं। अब कोई पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राहुल गांधी, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, ओवैसी, फिल्म अभिनेता नसीरूद्दीन शाह, आमिर खान, शाहरूख खान, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव जैसे लोगों और नेताओं से यह कल्पना कैसे कर सकता है कि यदि यह प्रोपोगंडा करते मिल जाते हैं कि देश में मुसलमान डर हुआ है तो इस बात पर भी अपनी प्रतिक्रिया देंगे कि मालेगांव विस्फोट कांड में हिन्दू नेताओं को फंसाने की जो साजिश की गई थी, वह शर्मनाक थी।
दरअसल, मालेगांव विस्फोट कांड के एक गवाह के यह खुलासा करने के बाद राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ कि उसके ऊपर हिन्दू नेताओं का नाम लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। आश्चर्य नहीं कि मुंबई के तत्कालीन आतंकवाद निरोधक दस्ते यानी एटीएस ने उसे योगी आदित्यनाथ और आरएसएस के चार नेताओं का नाम लेने के लिए मजबूर भी किया था और प्रताड़ित भी। तब इस एटीएस के अतिरिक्त आयुक्त थे परमबीर सिंह, जो इस समय कई गंभीर आरोपों से घिरे हुए हैं और फिलहाल निलंबित हैं। मालेगांव मामले के गवाह ने एटीएस पर जो सनसनीखेज आरोप लगाया, वह एनआईए की विशेष अदालत के समक्ष लगाया। यह पहली बार नहीं, जब इस तरह की बातें सामने आई हैं। इससे पहले भी मालेगांव मामले के अन्य गवाह इसी तरह के आरोप लगा चुके हैं। यह भी ध्यान रहे कि महाराष्ट्र में गुजरात पुलिस के हाथों एक मुठभेड़ में मारी गई लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी इशरत जहां को किस प्रकार कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं द्वारा निर्दोष साबित करने की सियासी मुहिम चलाई गई थी। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 2008 के मालेगांव कांड में हुई गिरफ्तारियों के बाद तुष्टिकरण की सियासत करने वालों द्वारा ही कथित तौर पर हिंदू आतंकवाद का जुमला उछाला गया था।
यह पहली घटना नहीं थी। 2008 में ही मुंबई में भीषण आतंकी हमले के बाद एक पुस्तक लिखकर देश-दुनिया को दहलाने वाले इस हमले को आरएसएस की साजिश बताने की बड़ी बेशर्मी से कोशिश की गई थी। जिन्होंने भी ऐसी कोशिश की, उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, लेकिन इससे यह तो पता चल ही गया कि किस तरह से समय-समय पर कुछ नेताओं और सरकारों द्वारा हिंदू आतंकवाद का हौवा खड़ा करने की चेष्टा की जाती रही थी। इस कृत्य में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कई केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे। उनकी ओर से भी यह कहा जा रहा था कि हिंदू आतंकवाद उभर आया है। यह वह दौर था, जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि भारत को लश्कर और जैश सरीखे आतंकी संगठनों से ज्यादा खतरा हिंदू संगठनों के अतिवाद से है। इस सबको देखते हुए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि इस सवाल का जवाब तलाशने की कोई कोशिश की जाए कि मालेगांव मामले की जांच के नाम पर देश-दुनिया को गुमराह करने की कोशिश तो नहीं की गई? इस सवाल का जवाब इसलिए खोजा जाना चाहिए, क्योंकि आरोप-प्रत्यारोप से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह सामने आना ही चाहिए कि कहीं किसी साजिश या फिर संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तो हिंदू आतंकवाद का जुमला नहीं गढ़ा गया? यदि यह साबित होता है कि किसी राजनीतिक मकसद से हिंदू आतंकवाद का जुमला गढ़ा गया तो फिर यह भी साफ होगा कि आतंकवाद से लड़ने के नाम पर देश की सुरक्षा व्यवस्था और साथ ही जांच एजेंसियों से खिलवाड़ भी किया गया।

यह गलत नहीं है कि मालेगांव विस्फोट कांड में भाजपा और आरएसएस नेताओं को फंसाने और उनका चरित्र हनन की साजिश का खुलासा होने के बाद बीजेपी और आरएसएस नेता कांग्रेस के खिलाफ हमलावर हैं। इस हकीकत से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि कांग्रेस नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी, पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद देश में हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रहे हैं। सलमान खुर्शीद ने तो अपनी किताब में हिन्दुओं की तुलना आतंकवादी संगठन बोको हरम और आईएसआई तक से कर दी है। आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने तब सत्तारुढ़ और अब विपक्ष में बैठी कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि सबने मिलकर एक बड़ा पाप और अपराध किया था, हिन्दुओं को आतंकवादी ठहराने की साजिश रची गई थी। इंद्रेश कुमार ने कांग्रेस और उसकी गठबंधन सरकार के साथ खड़े नेताओं और दलों को भी गंदी राजनीति और झूठी साजिश के साथ खड़ा होने का गुनाहागार बताया ताकि तथाकथित भगवा आतंकी मामलों में भाजपा और आरएसएस के नेताओं को फंसाया जा सके। इंद्रेश कुमार ने अपने बयान में दावा किया कि एटीएस ने उसे प्रताड़ित किया और अपने कार्यालय में अवैध रूप से बैठाया। इस मामले में अब तक 220 गवाहों से पूछताछ हो चुकी है और उनमें से 15 मुकर गए हैं। इंद्रेश कुमार ने दावा किया कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने तथाकथित भगवा आतंकी मामलों में भाजपा और आरएसएस के नेताओं को घसीटने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन किसी भी प्राथमिकी में हमारे नाम नहीं जोड़ सकी, क्योंकि उनके पास कोई सबूत नहीं था।

स्थापना दिवस पर फहराने पहुँची सोनिया गाँधी, पोल से गिर गया कांग्रेस का झंडा,

कांग्रेस पार्टी के स्थापना दिवस (28 दिसंबर 1885) पर पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी झंडा लहराने चलीं, तो झंडा गिरकर उनके हाथ पर आ गया। अब इस वाकये की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। वीडियो में देख सकते है कि सोनिया गाँधी रस्सी खींच कर झंडा लहराने की कोशिश करती हैं लेकिन शुरू में रस्सी अटकती है और फिर झंडा नीचे गिर जाता है।

वहाँ खड़ी भीड़ हैरानी से इस पूरी घटना को देखती रहती है। इसके बाद झंडा लहराने की जगह सिर्फ उसे पकड़कर फैलाया जाता है और कांग्रेस समर्थक जिंदाबाद के नारे लगाने लगते हैं। अब इस वीडियो को देख लोग तरह-तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अंकुर दुबे कांग्रेस का मजाक उड़ाते हुए कहते हैं, “झंडा सँभल नहीं रहा देश संभालेंगे ये।”

द स्किन डॉक्टर तंज कसते हुए लिखते हैं, “जरूर इस झंडे के गिरने के पीछे पूंजीपतियों का हाथ है।”

गोपाल रावत लिखते हैं, “भगवान भी नहीं चाहते हैं कि ये लोग कभी झंडा फहराएँ। जय श्री राम।”

सेकुलर लिबरल के ट्विटर आईडी से कहा जाता है, “झंडा भी गवाही दे रहा है कि अब कांग्रेस  गिर चुकी है। पहले वाली कांग्रेस नहीं रही।”

दीप कुशवाहा इस वाकये पर और इस पर आने वाली नेटीजन्स की प्रतिक्रिया पर कहते हैं, “पूरी की पूरी पार्टी गिर गई है उसके बारे में कोई नहीं सोच रहा। एक पार्टी के झंडे के लिए इतनी चिंता।”

कांग्रेस पार्टी द्वारा लगातार चुनावों में हार झेलने के बाद अब पार्टी नेतृत्व अपने दल को मजबूत करने में लगा है। खबरों के मुताबिक, समिति सदस्यों ने बताया कि पार्टी देशभर में एक ट्रेनिंग अभियान शुरू कर चुकी है। इस अभियान के तहत जिला और ब्लॉक स्तर तक करीब 5500 ट्रेनर तैयार हो रहे हैं जो नुक्कड़ प्रवक्ता की भूमिका में सार्वजनिक जगहों पर होने वाली बहसों में पार्टी का पक्ष रखेंगे।

कांग्रेस Vs कांग्रेस : कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की लड़ाई का सोनिया गांधी बंद आंख से देख रही तमाशा

गाँधी परिवार को संरक्षण देने वाले नेताओं को कांग्रेस की कितनी चिंता होती है, उस ओर किसी का ध्यान नहीं। दो मुख्यमंत्रियों की लड़ाई में पार्टी और जनता को कितना नुकसान हो रहा है, किसी नेता को परवाह नहीं। 
कांग्रेस की ‘स्वयंभू’ अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने ही दो मुख्यमंत्रियों की लड़ाई का तमाशा बंद आंख से देखने में लगी हैं। गहलोत की चिट्ठी मिल जाने के बावजूद सोनिया गांधी ने न तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अनावश्यक रोड़े अटकाने के लिए डांट पिलाई है और न ही कोई बीच-बचाव का रास्ता सुझाया है। हालात यह हैं कि छत्तीसगढ़ में राजस्थान की पुरानी कोल माइंस में कोयला बिल्कुल खत्म हो गया है और नई माइंस में खनन की अनुमति छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दे नहीं रहे हैं। दो कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के झगड़े में कोयले की आपूर्ति न होने से राजस्थान में अब कभी भी बिजली संकट छा सकता है।

राजस्थान में कोयला संकट की स्थिति में छत्तीसगढ़ ने मदद से किया इनकार
कोयला खनन से जुड़े मुद्दे पर राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकारें आमने-सामने हैं. कोयले की एक खान को लेकर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच ठन गई है। राजस्थान में कोयला संकट की स्थिति है लेकिन छत्तीसगढ़ ने मदद करने से इनकार कर दिया है. राजस्थान को छत्तीसगढ़ में अलॉट पारसा कोल ब्लॉक खान में माइनिंग के लिए छत्तीसगढ़ सरकार मंजूरी नहीं दे रही है, जबकि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इसकी क्लीयरेंस पहले ही दे दी है।

बीजेपी सरकार के दो मंत्रालयों ने क्लीयरेंस दी, कांग्रेस सरकार ने अटकाई
बीते महीने कोयला संकट के दौर में मुख्यमंत्री गहलोत ने हाईलेवल की बातचीत कर 2 नवंबर को कोल मिनिस्ट्री से इस खनन के लिए क्लीयरेंस जारी करवाई थी। इससे पहले वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से 21 अक्टूबर को ही क्लीयरेंस ले ली गई थी। बीजेपी सरकार के दो केंद्रीय मंत्रालयों से राजस्थान 15 दिनों में दो महत्वपूर्ण क्लीयरेंस लेने में सफल रहा। अब अपनी ही पार्टी की कांग्रेस सरकार ने क्लीयरेंस फाइल अटका दी है और इस पर कोई स्पष्ट बातचीत भी नहीं की जा रही है।

सीएम गहलोत ने पहले बघेल को फिर सोनिया गांधी को लिखी चिट्ठी
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल को पत्र लिखकर जरूरी स्वीकृतियां जारी करने का आग्रह भी किया था। लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने टका सा जवाब दे दिया और अपने सियासी फायदे को देखते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया। इस पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप करने की गुजारिश की थी, ताकि उनके कहने पर भूपेश बघेल खनन की अनुमति दे दें। लेकिन अब तक सोनिया गांधी ने इस पर कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं की है।

राजस्थान महंगी बिजली खरीद का भार उपभोक्ताओं पर ही डालेगा
इस बीच पुरानी माइंस में कोयला खत्म होने से राजस्थान में बहुत जल्द बिजली संकट उत्पन्न हो सकता है। अन्यथा राजस्थान को दूसरे राज्यों से ज्यादा महंगी बिजली खरीदनी होगी। इसका खामियाजा उपभोक्ताओं को ही भुगतना पड़ेगा। बता दें कि कोयला की कमी से बिजली संकट झेल रहे राजस्थान के लिए यह माइन लाइफ लाइन की तरह है। इस कोल ब्लॉक से रोजाना 12 हजार टन यानी करीब 3 रैक कोयला मिलेगा। मोटे अनुमान के अनुसार यहां से 5 मिलियन टन कोयला हर साल निकाला जा सकेगा। इस नए ब्लॉक से सालाना 1 हजार रैक से ज्यादा कोयला मिलने की संभावना है। अगले 30 साल के लिए 150 मिलियन टन कोयले का भंडार है। इससे राजस्थान केंद्र की कोल इंडिया और सब्सिडियरी कंपनियों पर कम निर्भर रहेगा।

जयपुर में 12 दिसंबर को ही कांग्रेस की महंगाई के खिलाफ हुई रैली में छत्तीसगढ़ सीएम भूपेश बघेल और राजस्थान सीएम अशोक गहलोत के बीच मुलाकात हुई थी। इस रैली में सोनिया-गांधी और राहुल गांधी भी शामिल हुए थे। आपसी बातचीत में राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलोत ने कोल माइंस की मंजूरी का मुद्दा उठाया भी था। लेकिन तब बात नहीं बन पाई। दोनों राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद मामला फंसा हुआ है। दरअसल, बघेल स्थानीय सियासत के चलते नहीं दे रहे हैं मंजूरी। पारसा के सेकेंड ब्लॉक और एक दूसरे ब्लॉक में राजस्थान सरकार को माइंस अलॉट है। कोल माइंस का इलाका वन विभाग के अंडर आता है और वहां ग्रामीण-आदिवासी खनन का विरोध कर रहे हैं। स्थानीय हल्के-फुल्के विरोध के कारण छत्तीसगढ़ सीएम बघेल कोल माइंस का मंजूरी देने में देरी कर रहे हैं।

पंजाब में कांग्रेस सरकार ने काम किया नहीं! : नवजोत सिंह सिद्धू

आखिर पंजाब कांग्रेस में हो क्या रहा है? कभी अमरिंदर सिंह का विरोध, कभी अमरिंदर सिंह की तारीफ, कभी सीएम चन्नी का विरोध, कभी उनकी तारीफ, कभी कांग्रेस के 18 सूत्री एजेंडे का विरोध, कभी 13 सूत्री एजेंडे को लागू करने की मांग, कभी पंजाब मॉडल से सूबे को चमकाने का वादा तो अब पंजाब में गृहयुद्ध की चेतावनी, नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब में कांग्रेस को किस दिशा में हांकना चाह रहे हैं, इसे आम लोग तो क्या कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गजों को भी समझना मुश्किल है।

पंजाब में काम के बदले हर रोज कांग्रेस का नया शिगुफा

पंजाब में चुनाव में बेहद कम वक्त बचा है, लोग कांग्रेस से उसके कामों का हिसाब मांग रहे हैं, इधर कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू वोटरों को भरमाने के लिए हर रोज एक नया शिगुफा छोड़ देते हैं , कई बार तो सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को सिद्धू के बड़बोलेपन पर सफाई देनी पड़ी है।  लेकिन सिद्धू पर पंजाब कांग्रेस पर शिकंजा कसने का भूत इस कदर सवार  है कि वे बाज आने को तैयार नहीं है।

सीएम चन्नी पर बार-बार निशाना साध रहे सिद्धू 

चंद दिनों पहले ही सीएम चरणजीत सिंह चन्नी ने एलान किया था की पंजाब का खजाना भरा है, लोगों की भलाई के कामों के लिए सरकार के पास पैसों की कोई कमी नहीं है। लेकिन सीएम चरणजीत चन्नी के बयानों के उलट सिद्धू एक ही रट लगाकर कर बैठे हैं कि पंजाब कंगाल हो रहा है, पंजाब के लोगों पर साल 2024 तक 4 लाख करोड़ का कर्ज होगा और अगर उनका पंजाब मॉडल लागू नहीं किया गया , तो पंजाब का विकास नहीं हो सकता, पंजाब रहने लायक नहीं रह जाएगा, यहां तक की पंजाब में गृह युद्ध की नौबत भी आ सकती है। 

पहले महंगाई का रोना, अब पंजाब पर कर्ज का रोना 

सिद्धू ने प्रेस कांफ्रेंस कर पंजाब की आर्थिक स्थिति पर चर्चा की है, सिद्धू ने कहा कि अगर राज्य की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी तो पंजाब में हालात बेकाबू हो सकते हैं  सिद्धू ने पहले पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का रोनो रोया, अब कह रहे हैं कि इससे पंजाब पर छह हजार करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ पड़ेगा,  सस्ती व मुफ्त बिजली देने पर 3600 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। अब सिद्धू लोगों को ये डर दिखा रहे हैं कि कर्ज का बोझ बढ़ने से पंजाब तरक्की में राह में और पीछे चला जाएगा। 

कैसे होगा अन्नदाता का भला, कृषि कानून के खिलाफ प्रस्ताव 

नवजोत सिद्धू की मांग के मुताबिक चन्नी सरकार ने पंजाब विधानसभा में मोदी सरकार के कृषि कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास कर दिया है, अब पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में लोगों की कमाई कैसे बढ़ेगी, पंजाब का विकास कैसे होगा, इसकी कोई पुख्ता रोडमैन ना तो नवजोत सिंह सिद्धू के पास है और ना ही चन्नी सरकार के पास, ऐसे में सिद्धू पंजाब में आर्थिक बदहाली का रोना रोकर, पिछली सरकारों को कोस रहे हैं, लेकिन लोगों का सवाल है कि कांग्रेस पहले ये बताए कि उसने पंजाब के विकास के लिए क्या किया है और उसके पास भविष्य को लेकर क्या तैयारियां है।

पंजाब में मोदी विरोध के भरोसे कांग्रेस 

नवजोत सिद्धू ने कांग्रेस की जान सांसत में डाल रखी है, वे पार्टी के सामने अपनी मांग रखते हैं और हर हाल में उसे मनवाने की जिद पर अड़ जाते हैं , चंद दिनों पहले भी उन्होंने अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने के लिए कांग्रेस आलाकमान को इस्तीफा भेज दिया था। पंजाब में रिमोट कंट्रोल से चल रही कांग्रेस की सरकार मोदी विरोध के नाम पर वोटों की खेती करने में जुटी है , पंजाब के लोगों के विकास के लिए कांग्रेस का क्या एजेंडा है, पंजाब में नौकरियों के मौके बढ़ें, किसानों को कैसे लाभ पहुंचे, इसके लिए कांग्रेस की चन्नी सरकार के पास कोई रोडमैप नहीं है। पंजाब चुनाव में कांग्रेस की आस बस मोदी विरोध के नाम पर टिकी है।

मोदी विरोध के नाम पर कैसे होगा चुनावी बेड़ा पार

पंजाब विधानसभा में सीमा सुरक्षा बल के अधिकार क्षेत्र और केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पास कर दिए गए हैं। पंजाब सरकार इसे ऐतिहासिक फैसला बता रही है।

लेकिन चन्नी सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि इससे पंजाब के लोगों का किस तरह से फायदा होगा। उल्टा आरोप लग रहे हैं कि चन्नी सरकार के फैसले से पंजाब के लोगों का नुकसान होगा। दरअसल

  • कांग्रेस BSF के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के विरोध में खड़ी है
  • राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी कांग्रेस राजनीति कर रही है
  • मोदी विरोध के नाम पर पंजाब के लोगों का विरोध हो रहा है
  • पंजाब के लोगों की सुरक्षा खतर में डालने के आरोप लग रहे हैं
  • इससे सूबे में ड्रग माफियाओं को भी बढ़ावा मिल सकता है
  • घुसपैठिए और राष्ट्र विरोधी ताकतों इसका फायदा उठा सकती है

कांग्रेस को अपने ही नेताओं पर भरोसा नहीं

पंजाब में कांग्रेस को अपने ही नेताओं पर भरोसा नहीं है, अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद कांग्रेस की स्थिति और भी डांवाडोल है। पंजाब में कांग्रेस अलाकमान पार्टी के ईमानदार कार्यकर्ताओं के साथ खड़ी नहीं दिखती, यही वजह है कि बीजेपी छोड़ कांग्रेस में शामिल नवजोत सिंह सिद्धू पर भी पार्टी को पूरा भरोसा नहीं है। कांग्रेस ने सिद्धू को पंजाब की कमान तो थमा दी है। लेकिन वे जिस तरह से सरकार के फैसलों पर लगाम कसने की कोशिश करते दिख रहे हैं, उससे चन्नी सरकार का काम करना भी मुश्किल हो रहा है। 
सोनिया के सीधे मीडिया में न जाने के निर्देश की फिर धज्जियां
एक बार फिर सिद्धू पुराने तेवर में हैं। सोनिया गांधी के सीधे मीडिया में न जाने के निर्देश को धता बताते हुए सिद्धू ने अपनी भड़ास मीडिया के सामने ही निकाली। उन्होंने पत्रकार वार्ता में सीएम पर सवाल खड़ा किया कि एडवोकेट जनरल एपीएस देवल को कैसे लगाया गया ? जो सरकार के खिलाफ रहा है वो पैरवी कैसे करेगा ? अपनी ही दलील को कैसे ठुकराएगा ? यह कानून सम्मत नहीं है।

पंजाब : कांग्रेस ने अपने वादे पूरे करने के बजाए जनता को पकड़ाया झुनझुना

उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी कांग्रेस मनलुभावन प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। प्रियंका वाड्रा ने उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को सत्ता से दूर करने स्मार्टफोन आदि देने का वायदा किया, लेकिन वह भूल गयी कि राजस्थान में किसानों का कर्ज माफ़ी का वायदा पूरा नहीं हुआ, सत्ता में आने के लिए आतुर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी आजकल उत्तर प्रदेश में वादों की लॉलीपॉप दे रही हैं, लेकिन हकीकत में जनता के हाथ में झुनझुना ही आता है। दरअसल, कांग्रेस की यही परंपरा रही है। कांग्रेस के पंजाब में साढ़े चार साल के कार्यकाल में हुए कामों और जनता के किए गए वादों की पड़ताल करें तो वास्तविकता बेहद चौंकाती है। जनता ने जिन उम्मीदों के साथ कांग्रेस को सत्ता सौंपी, वह तो पूरी हुई नहीं…मुश्किलें और बढ़ती गईं। दिग्गज कांग्रेस नेता जनता का भला करने के बजाए, आपस में ही लड़ते रहे। आइये,  2017 में कांग्रेस द्वारा पंजाब के लोगों से किए टॉप टेन वादों और उसके नतीजों की पड़ताल करते हैं…

1. वादा – चार हफ़्ते में नशे का खात्मा..
नतीजा : साढ़े चार साल में और बढ़ गया
नशा पंजाब में बड़ा मुद्दा रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भटिंडा में प्रचार के दौरान हाथ में गटका साहिब उठा कर सरकार बनने पर चार हफ़्तों में नशा खत्म करने का वादा किया था…पर हकीकत यह है कि पंजाब में ड्रग्स का कारोबार अब भी जारी है. नवजोत सिंह सिद्धू और डिप्टी सीएम बने सुखजिंदर रंधावा तो पंजाब में नशे खासकर चिट्टे के लिए पूर्व कैबिनेट मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया को सीधे दोषी ठहराते हुए उन्हें जेल में डालने की मांग करते रहे हैं। सिद्धू खेमा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर आरोप लगाता रहा है कि उन्होंने जानबूझकर मजीठिया के खिलाफ सख्ती बरतने के ऑर्डर नहीं दिया। कैप्टन के कार्यकाल के दौरान विभिन्न जिलों में 50 से ज्यादा युवाओं की नशे से मौत के मामले दर्ज हुए हैं। यह संख्या और ज्यादा हो सकती है, क्योंकि ऐसे ज़्यादातर मामलों में पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं होती। कांग्रेस सरकार ने ड्रग्स के ख़िलाफ़ बड़ी मुहिम कभी छेड़ी ही नहीं।

2. वादा– किसानों की कर्ज़ा-कुर्की ख़त्म, फ़सल की पूरी रकम

नतीजा : 90 हजार करोड़ में से सिर्फ सिर्फ 5 हजार करोड़ की माफी
कर्ज़ा-कुर्की ख़त्म, फसल की पूरी रकम का नारा लगाकर सत्ता में आई अमरिंदर सरकार ने न तो वादे के मुताबिक सभी किसानों का पूरा कर्ज़ा माफ किया और न ही प्रदेश में किसानों की कुर्की बंद हुई। इसके विपरीत कर्ज़ के बोझ तले किसान प्रदेश में ख़ुदकुशी कर रहे हैं. सरकार बनने से पहले सारे किसानों के सभी प्रकार के 90 हज़ार करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ करने के वादा किया गया, लेकिन इसका परिणाम ऊंट के मुंह में जीरे के समान आया। कैप्टन सरकार ने कर्ज माफी की दिशा में जो थोड़ा-सा काम किया, उसमें बहुत ज्यादा शर्तें लगा दीं। नतीजा-कांग्रेस सरकार के साढ़े 4 साल के कार्यकाल में मात्र 5.64 लाख किसानों का 4623 करोड़ रुपए का कर्ज माफ हो पाया। 2.68 लाख मजदूरों का भी सिर्फ 526 करोड़ रुपए का लोन माफ किया गया।

3. वादा – घर घर नौकरी, हर घर नौकरी, हर साल 1.61 नौकरी
नतीजा : नौकरियां न दे पाने पर कांग्रेस ने ही कैप्टन की क्लास लगाई
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने चुनावी घोषणा पत्र में पंजाब के हर घर से एक व्यक्ति को नौकरी देने का वादा किया था. वादा किया गया था कि सरकार हर साल 1.61 लाख लोगों को नौकरियां देगी. पिछले साढ़े चार साल में घर घर नौकरी, हर घर नौकरी का वादा हवा-हवाई ही साबित हुआ है। दिखावे के लिए रोजगार मेले लगे, नियुक्ति पत्र भी बंटे, लेकिन लाखों की छोड़िए कुछ हजार युवाओं को ही नौकरी नसीब हो पाई। कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनकी सरकार पर ये वादा पूरा नहीं करने का आरोप लगता रहा है। जुलाई-2021 में सोनिया गांधी के बुलावे पर दिल्ली पहुंचे कैप्टन को जो 18 सूत्री कार्यक्रम दिया गया था, उसमें यह मुद्दा शामिल था। सिद्धू भी इसे लेकर कैप्टन सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं।

4. वादा – खनन माफिया खत्म कर पंजाब का खजाना भरेंगे
नतीजा : माफिया हावी, रद्दी की टोकरी में सिद्धू की रिपोर्ट
पंजाब कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र की शुरुआत में तत्कालीन अकाली-भाजपा सरकार को माफ़िया राज पर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। इसके साथ ही वादा किया था कि रेत माफ़िया, केबल माफ़िया, शराब माफ़िया, ड्रग्स माफ़िया औऱ ट्रांसपोर्ट माफ़िया को कांग्रेस सरकार बनने पर तुरंत खत्म किया जाएगा। लेकिन साढ़े चार साल में सरकार कुछ नहीं कर पाई। नवजोत सिंह सिद्धू और उनका खेमा इस बात को पूरी ताकत से उठाता रहा है कि पंजाब सरकार के पास रेत के अवैध खनन को रोकने के लिए न तो कोई पॉलिसी है और न ही सरकार ऐसी कोई पॉलिसी बनाना चाहती है। कांग्रेस सरकार ने खनन का खूनी खेल खेलने वाले किसी बड़े माफिया को जेल में नहीं पहुंचाया। इसके विपरीत कांग्रेस सरकार के ही एक मंत्री को गैरक़ानूनी खनन में नाम आने के कारण इस्तीफा देना पड़ा। 2017 में कैप्टन की कैबिनेट में मंत्री बनते ही सिद्धू, तेलंगाना और तमिलनाडू का मॉडल समझने के लिए खुद वहां गए और उसके बाद अपनी रिपोर्ट भी सरकार को दी, मगर कैप्टन ने उसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया।

5. वादा – सरकारी कर्मचारियों का रखेंगे पूरा ख्याल
नतीजा : लाखों कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत
कैप्टन ने सत्ता में आने के लिए ठेका भर्ती बंद करने, कर्मचारियों को रेगुलर करने, खाली पदों को भरने, बकाया भत्ते जारी करने के लिए महंगाई भत्ते की किस्त जारी करने के वादे किए थे. इनमें से वादे पूरे नहीं हुए. पंजाब में इस समय अध्यापक, आशा वर्कर, एएनएम, ठेका कर्मचारी, रोडवेज कर्मचारी और डीसी कार्यालय के कर्मचारी अपनी-अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इन कर्मचारियों की संख्या एक लाख से अधिक है। खुद सिद्धू का विरोध भी यही था कि कैप्टन सरकार को कर्मचारियों की मांगों को पूरा करना चाहिए।

6. वादा -नौजवानों, छात्रों को देंगा स्मार्टफ़ोन
नतीजा : प्रियंका गांधी के वादे जैसा ही लॉलीपॉप
प्रियंका गांधी अब यूपी स्मार्टफ़ोन देने का लॉलीपॉप दे रही हैं। पंजाब में चुनाव के दौरान स्मार्टफ़ोन देने का वादा करते हुए कांग्रेस ने युवाओं से फॉर्म तक भरवाए। अब तक उनमें से किसी को भी फ़ोन नहीं मिला है. सरकार के ख़िलाफ़ की जा रही पोल खोल रैलियों में अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल, कैप्टन के स्मार्टफ़ोन पर चुटकुले सुना रहे हैं..

7. वादा – आटा दाल के साथ चीनी चाय पत्ती
नतीजा : अब लोगों को केवल गेहूं ही मिल पा रहा है
कांग्रेस ने अकाली-भाजपा सरकार की प्रतिष्ठित आटा दाल योजना के साथ चाय पत्ती और चीनी देने का वादा किया था। लेकिन अब लोगों को केवल गेहूं ही मिल पा रहा है. इस योजना में दाल, चीनी और चायपत्ती अब तक नहीं मिली। 

8. वादा – शराब माफिया पर पूरी तरह के नकेल कसेंगे
नतीजा : घर-घर में नकली और अवैध शराब की फैक्ट्रियां
कांग्रेस का वादा शराब माफिया पर पूरी तरह के नकेल कसने का था। लेकिन विपक्ष की छोड़िए कैप्टन सरकार के कई कैबिनेट मंत्री और नवजोत सिंह सिद्धू कहते रहे हैं कि प्रदेश में शराब माफिया हावी है। जगह-जगह अवैध शराब बिक रही है। घर-घर में नकली फैक्ट्रियां लगाकर शराब निकाली और बेची जा रही है। इससे पंजाब का खजाना बर्बाद हो रहा है। कांग्रेस हाईकमान को शराब माफिया के खिलाफ कैप्टन अमरिंदर सिंह को काम करने के लिए कहना पड़ा, लेकिन कुछ हुआ नहीं। पंजाब में केबल कारोबार भी पहले जैसा ही चल रहा है और शराब और ट्रांसपोर्ट के कारोबार में भी कहीं कोई अंतर नहीं दिख रहा।

9. वादा- बेघर दलितों को देंगे अपने घर की सौगात
नतीजा : राज्य में दलितों के खिलाफ अपराध बढ़े
कैप्टन सरकार ने पंजाब में दलितों के सशक्तिकरण के लिए बेघरों को मकान, 50 हज़ार रुपये तक कर्ज़ माफ़ करने जैसे वादे किए थे जो जमीन पर पूरे होते नहीं दिख रहे हैं। दलितों के खिलाफ अपराधों में जरूर बढ़ोतरी हुई है।

10. वादा- कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की जान बचाएंगे
नतीजा : कर्ज के कारण किसानों की खुदकुशी अब भी जारी
कृषि प्रधान प्रदेश पंजाब का भूमिपुत्र बुरी तरह के कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। कर्ज पर कर्ज बढ़ने से परेशान किसान खुदकुशी को मजबूर है। कांग्रेस ने सत्ता पाने के लिए वादा किया कि वह किसानों की जान बचाने के लिए सारे जतन करेंगे। साढ़े चार साल के बाद भी न तो किसानों की कर्जमाफी हो पाई और न ही उन्हें अन्य मुश्किलों से छुटकारा मिल पाया है। इसके कारण पंजाब में किसानों की खुदकुशी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश चुनाव : प्रियंका वाड्रा के चुनावी वादे को यूजर्स ने लगा दी वाट

देश में जब भी चुनाव आते हैं, मतदाता को पागल बनाने का धंधा भी शुरू हो जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में कांग्रेस द्वारा स्वतंत्र भारत में दूध की नदियां बहाने का प्रलोभन दिया जाता था, ब्रिटिश युग में एक पैसे सेर बिकने वाला दूध आज 60 रूपए लीटर बिक रहा है। सेर लीटर/किलो  से अधिक होता है। अधिकतर शहरों से गौशाला ख़त्म कर दी गयीं हैं। 15/18 रूपए तोला बिकने वाला सोना आज किस भाव है, सभी परिचित हैं। इंदिरा गाँधी ने सत्ता से हाथ से निकलती देख "गरीबी हटाओ" का नारा दिया था, सत्ता तो मिल गयी, लेकिन गरीबी दूर नहीं हुई और न ही बेरोजगारी।  
सत्ता से बाहर रहने पर कांग्रेस बौखला गई है। सत्ता में वापसी के लिए पार्टी तरह-तरह के जतन करने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश में मतदाताओं को लुभाने के लिए कांग्रेस लुभावने वादे कर रही है। पार्टी कभी 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देने का वादा करती है, तो कभी फ्री का चुनावी लॉलीपॉप थमाने की कोशिश करती है। ताजा मामले में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की बेटियों को फ्री स्कूटर और स्मार्ट फोन देने का वादा किया, लेकिन आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि लोगों ने कांग्रेस के इस चुनावी वादे पर सोशल मीडिया पर वाट लगा दी। लोग कांग्रेस को निशाना बना रहे हैं। यूजर्स पूछ रहे हैं कि क्या यह वादा भी किसानों की लोन माफी की तरह ही पूरा किया जाएगा जो अभी तक नहीं हो पाया है। 

उत्तर प्रदेश में खिसक चुकी सियासी जमीन को फिर से हासिल करने के लिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने चुनावी वादों का पिटारा खोल दिया है। सत्ता में आने की बेसब्री और ललक की वजह से लोक लुभावन वादों की झड़ी लगा दी है। कभी 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देने का वादा करती है, तो कभी फ्री स्कूटर, स्मार्ट फोन देने और 10 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज का वादा करती है। लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में ये प्रतिज्ञाएं लागू हैं? क्या इन राज्यों में बेटियों को स्कूटी और स्मार्ट फोन दिए गए हैं ? क्या ये वादे भी राजस्थान के किसानों की कर्जमाफी की तरह है, जो अभी तक पूरा नहीं हो पायी है?

इसी तरह कांग्रेस शासित राज्यों में चुनाव से पहले कई वादे किए गए, लेकिन वो आज तक पूरे नहीं हो पाये हैं। जनता अब खुद को छला हुआ महसूस कर रही है। 6 महीने पहले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे, जिनमें कांग्रेस के टिकट बंटवारे और उसमें महिलाओं की हिस्सेदारी की पोल चुनाव के आंकड़े खोल रहे हैं। कम भागीदारी की वजह से कई राज्यों में कांग्रेस की महिला नेताओं ने विरोध दर्ज कराया था। केरल महिला कांग्रेस की प्रमुख रहीं लतिका सुभाष ने पद से इस्तीफा दे दिया था। टिकट नहीं मिलने के चलते उन्होंने राजधानी तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस कार्यालय के सामने अपना सिर मुंडवा लिया था। दरअसल कांग्रेस सत्ता में आने के लिए चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे करती है, लेकिन सत्ता मिलते ही उन वादों को भूल जाती है।

जानिए कांग्रेस ने कैसे दिया जनता को धोखा

  • राजस्थान में 10 दिन में कर्जमाफी का वादा किया, लेकिन 1,20,979 करोड़ रुपये में से सिर्फ 8,676 करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया।
  • राजस्थान में बैंकों ने कर्जमाफी के इंतजार में बैठे किसानों से वसूली में सख्ती दिखाना और जमीनें कुर्क करना शुरू कर दिया है।
  • राजस्थान में 3,500 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया, लेकिन 2021 तक 15 लाख बेरोजगारों में से 2.5 लाख को ही भत्ता दिया।
  • पंजाब में किसानों पर कुल 77,753.12 करोड़ रुपये कर्ज थे, लेकिन अब तक मात्र 4,624 करोड़ रुपये ही माफ किए गए हैं।
  • छत्तीसगढ़ में बेटियों को स्मार्ट फोन देने के लिए बीजेपी ने स्काई योजना बनाई थी, जिसे कांग्रेस ने बंद कर लाखों स्मार्टफोन कबाड़ में फेंक दिए।
  • 6 महीने पहले बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 10% से भी कम महिलाओं को टिकट दिया था।
  • 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सभी बीपीएल परिवारों को स्वास्थ्य बीमा का वादा किया था, जो पूरा नहीं कर पायी।
  • 2009 के लोकसभा चुनाव में तीन सालों के अंदर सभी बीपीएल परिवारों को स्वास्थ्य बीमा देने का वादा किया, लेकिन पूरा नहीं कर पायी।

नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की नसीहत की धज्जियां उड़ाईं

कांग्रेस में परिवार के विरुद्ध बोलने या चलने वाले को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है, लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू के सोनिया गाँधी की सलाह के विरुद्ध जाने पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं किए जाने पर हर कोई हैरान है। 
पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद के इस्तीफा देने और फिर नाटकीय तरीके से उसे वापस लेने वाले नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस में किसी के काबू में नहीं आ रहे हैं। उन्होंने हाल ही में पार्टी की पूर्णकालिक ‘स्वयंभू’ अध्यक्ष बनीं सोनिया गांधी की नसीहतों की भी धज्जियां उड़ाकर रख दीं।

कांग्रेस के पुनरुद्धार का यह आखिरी मौका

सिद्धू ने मीडिया के जरिए संवाद न करने की सख्त चेतावनी को खुलेआम चैलेंज कर दिया। नवजोत ने सोनिया की सीख को दरकिनार करते हुए न सिर्फ पार्टी अध्यक्ष को चिठ्ठी भेजी, बल्कि इसे ट्वीटर पर साझा भी कर दिया। उन्होंने लगभग चेतावनी भरे लहजे में लिखा है कि पंजाब में कांग्रेस के पुनरुद्धार का यह आखिरी मौका है।

अमरिंदर सिंह के सियासी लड़ाई जारी है

यह पहला मौका नहीं है, जबकि सिद्धू ने नाफरमानी की हो। अपनी मर्जी के मालिक सिद्धू पहले भी ऐसा कर चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर की बात तो वह कई बार काट चुके हैं। अमरिंदर के काफी सियासी लड़ाई के बाद पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए सिद्धू कुछ समय बाद ही रूठ गए। हाईकमान को बगैर विश्वास में लिए उन्होंने अचानक अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे डाला। इससे खुद कांग्रेस का थिंक टैंक सकते में आ गया।

एक सप्ताह में ही उड़ा डालीं धज्जियां
काफी लम्बे समय के बाद हाल ही में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में सोनिया गांधी ने पार्टी में आंतरिक अनुशासन बनाने पर जोर दिया और पार्टी में मीडिया प्लेटफार्म के जरिए संवाद न करने की सख्त नसीहत दी। सिद्धू ने एक सप्ताह के अंदर ही इस नसीहत की धज्जियां उड़ा डालीं। सिद्धू ने सोनिया गांधी को भेजी चिठ्ठी जस की तस सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्वीटर पर साझा कर दी।

अब फिर बोला चन्नी सरकार पर हमला
सिद्धू ने अपने 13 सूत्री एजेंडे में फिर चरणजीत सिंह चन्नी सरकार पर हमला बोला है। सिद्धू ने आरोप लगाया कि चन्नी सरकार ने मंत्रिमंडल में पिछड़ी जातियों की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि सिर्फ अनुसूचित जाति का सीएम बनाने से कुछ नहीं होगा, अनुसूचित जाति को सरकार में बराबर का प्रतिनिधित्व भी मिलना चाहिए।

कैप्टन ने कहा था-सिद्धू स्थिर व्यक्ति नहीं है
सिद्धू को जानने वाले यह जानते हैं कि वह बड़बोले और विवादित व्यक्तित्व के है. विवादों से उनका गहरा नाता है. अपने बयानों, चुटकुलों और अजब-गजब कारनामों से सिद्धू हमेशा चर्चा के केंद्र में रहे हैं. या यह कहा जा सकता है कि सिद्धू चर्चा में रहने का गुर जानते हैं. सिद्धू के इस्तीफा देने पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उनपर हमला बोला था। कैप्टन ने ट्वीट कर कहा कि मैंने तुमसे कहा था…वह स्थिर व्यक्ति नहीं है और पंजाब के सीमावर्ती राज्य के लिए उपयुक्त नहीं है.

  • बयानवीर सिद्धू की फितरत है विवादों में रहना
    नवजोत सिंह सिद्धू 2004 में अमृतसर से लोकसभा पहुंचे थे. उन पर उस वक्त एक पुराना मुक़दमा चल रहा था।
  • उन्होंने कथित तौर पर पाटियाला गुरनाम सिंह को पार्किंग को लेकर हुए विवाद के दौरान पीटा। सिंह की अस्पताल में मौत हो गई।
  • इस मामले में 2006 में सिद्धू को हाईकोर्ट ने तीन साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी। सिद्धू को तब अमृतसर के सांसद पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा।
  • सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे अरुण जेटली ने सिद्धू की ओर से पैरवी की थी और सिद्धू को जमानत मिली थी।
  • 2016 में सिद्धू राज्य सभा के सांसद बनाए गए, लेकिन उन्होंने तीन महीने बाद इस्तीफ़ा दे दिया।
  • सिद्धू आम आदमी पार्टी का दामन थामने वाले थे, इस बीच 2017 के विधानसभा चुनावों से कुछ सप्ताह पूर्व कांग्रेस का दामन थाम लिया।
  • 2017 में कांग्रेस पंजाब में सत्ता में आयी और सिद्धू कैबिनेट मंत्री बने। कुछ महीनों के बाद उन्होंने अमृतसर के मेयर चुनाव पर नाराज़गी जाहिर कर दी।
  • 2018 में इमरान ख़ान पाक के प्रधानमंत्री बने। कैप्टन अमरिंदर ने सिद्धू से पाकिस्तान नहीं जाने की अपील की। लेकिन सिद्धू पाकिस्तान गए। यही नहीं पाक सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले भी मिले।
  •  2019 में कैप्टन सिंह ने कैबिनेट में बदलाव करते हुए सिद्धू का मंत्रिमंडल बदल दिया। इसके विरोध में सिद्धू ने पदभार ग्रहण किए बिना इस्तीफ़ा दे दिया।
  •  सिद्धू ने कई मुद्दों पर सरकार की आलोचना की। इन मामलों को देखने के लिए आलाकमान ने एक समिति बनायी।
  • सिद्धू के कहने पर कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से इस्तीफा ले लिया।

क्या पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में कांग्रेस लुप्त हो जाएगी? राजीव गाँधी के खास रहे नटवर ने ‘गाँधी परिवार’ को बताया सत्यानाश का जिम्मेदार

                                                                                                                          साभार : जनसत्ता 
पंजाब सहित कई राज्यों में कांग्रेस आंतरिक लड़ाई से जूझ रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री पद से अमरिंदर सिंह की छुट्टी करने के फैसले को लेकर कई वरिष्ठ नेता अपनी नाराजगी जता चुके है। कपिल सिब्बल जैसे पार्टी नेता तो यहॉं तक कह चुके हैं कि पार्टी में फैसले कौन ले रहा इसकी किसी को खबर नहीं। इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित एक इंटरव्यू में पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने कहा है कि कांग्रेस का जो हाल है उसमें वह लुप्त हो जाएगी। उनका यह भी दावा है कि अगले साल जिन 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें कहीं भी पार्टी को सफलता नहीं मिलेगी। इस हालात के लिए उन्होंने पार्टी के शीर्ष परिवार को जिम्मेदार बताया है।

कांग्रेस और पार्टी में परिवारभक्तों को कोई प्रभावी अध्यक्ष ही दिखाई नहीं दे रहा, जबकि इस परिवार के कहीं अधिक नेता पार्टी में पहले भी थे और आज भी हैं, लेकिन परिवारभक्त हैं, किसी की सुनने को ही तैयार नहीं, पार्टी डूबती हो डूब जाए, इनको परिवार भक्ति से फुर्सत नहीं। जब पार्टी में राहुल को अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल ही रही थी, योगी आदित्यनाथ ने ऐसे ही नहीं कहा था कि जितनी जल्दी हो अध्यक्ष बनाइए। अंजाम सबके सामने है। और रही प्रियंका की बात उसका भी हाल देख रहे हैं, यानि परिवार ही कांग्रेस को ख़त्म करने में लगी है।  

उन्होंने कहा कि इन तीनों लोगों को कैप्टन के सामने अपनी गलती मान लेनी चाहिए थी लेकिन वह ऐसा करेंगे नहीं, क्योंकि वह तीनों खुद को तीस मार खां समझते हैं। पूर्व विदेश मंत्री ने कहा कि कांग्रेस में फिलहाल कुछ भी सही नहीं है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के पास कोई पद नहीं है, लेकिन पार्टी से जुड़े सभी मामलों में वह फैसले लेते हैं। कांग्रेस के पूर्व नेता ने कहा कि अब न तो CWC की मीटिंग होती है और न ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई जाती है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नटवर सिंह ने कहा कि राहुल गांधी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने का फैसला लिया, जबकि सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला प्रियंका गांधी का था। यह पहला मौका है, जब किसी सीनियर नेता द्वारा गांधी परिवार का नाम लेकर निशाना साधा गया हो। इससे पहले कपिल सिब्बल ने भी ऐसे ही तेवर दिखाते हुए पार्टी में बड़े बदलावों वकालत थी और एक एक नियमित अध्यक्ष चुने जाने की मांग की थी।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के करीबी रहे नटवर सिंह ने दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में पंजाब में हुए बदलाव को लेकर सवाल किया गया था। इस पर उन्होंने कहा कि पंजाब में जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि देश को इस समय एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है, लेकिन कांग्रेस कुछ नहीं कर रही है। राहुल गाँधी पर हमला बोलते हुए कहा कि जिनके पास पार्टी में कोई पद नहीं है, वो फैसला लेते हैं। इससे पार्टी में असंतोष फैलता है और जनता में गलत संदेश जा रहा है।

वहीं प्रियंका गाँधी को निशाने पर लेते हुए उन्होंने कहा कि उनका पंजाब की राजनीति में हस्तक्षेप करना सही नहीं था। वो यूपी की प्रभारी हैं तो पंजाब में दखलअंदाजी करना सही नहीं था। उन्होंने नवजोत सिंह सिद्धू के इतिहास को जाने बिना उन्हें पंजाब का अध्यक्ष बना दिया। हालाँकि अमरिंदर सिंह ने इसके लिए हाइकमान को मना किया था, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। उन्होंने कांग्रेस हाइकमान को ही पार्टी के सत्यानाश का कारण बताया।

भाजपा के कांग्रेस मुक्त नारे को लेकर पूछे जाने उन्होंने कहा कि अगर ऐसी ही स्थिति आगे भी बनी रही तो कांग्रेस का लुप्त होना लाजिमी है। उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि अभी भी चुनाव में कांग्रेस को 20 फीसदी वोट ही मिलता है। वहीं 5 राज्यों में होने वाले चुनावों को लेकर उन्होंने कहा कि अगर पार्टी जीत जाती है तो अच्छी बात है, लेकिन इसकी उम्मीद नहीं है। उनका मानना है कि पार्टी को पाँचों राज्यों में हार का मुँह देखना पड़ेगा।

नवजोत सिंह सिद्धू का पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा

आज कांग्रेस की स्थिति आगे कुआँ पीछे खाई वाली हो गयी है। जिसकी वजह से पंजाब के कद्दावर नेता अमरिंदर सिंह को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, आज उसी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर पंजाब में कांग्रेस के लिए संकट उत्पन्न कर दिया। 
पंजाब कांग्रेस में चल रहे घमासान के बीच 28 सितम्बर 2021 को पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से नवजोत सिद्धू ने 72 दिन बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

कुछ दिन पहले ही पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। उसके बाद से सिद्धू पर सुपर सीएम होने के भी आरोप लग रहे थे। सिद्धू ने सोनिया गाँधी को अपना इस्तीफा भेज दिया है। 

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को संबोधित अपने त्यागपत्र में सिद्धू ने लिखा, “समझौता करने से व्यक्ति का चरित्र खत्म हो जाता है। मैं पंजाब के भविष्य और पंजाब की जनता के कल्याण के एजेंडा से कभी समझौता नहीं कर सकता हूँ। उन्होंने आगे लिखा, इसलिए मैं पंजाब प्रदेश कांग्रेस  कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूँ। मैं कांग्रेस की सेवा करता रहूँगा।”

हालाँकि, सिद्धू ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखे खत में कहा कि वे कांग्रेस पार्टी के सदस्य बने रहेंगे।

 

पंजाब में आज ही नए मंत्रियों के बीच विभागों का बँटवारा हुआ है और इसके चंद घंटे बाद ही सिद्धू ने सोनिया गाँधी को इस्तीफा भेज दिया। इसके पीछे कुछ कारण खास है फिलहाल सबकुछ ठीक नहीं ये कयास लगाए जा रहे हैं।

सितम्बर 28 को ही पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात पर अटकलों का सिलसिला अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि नवजोत सिद्धू ने इस्तीफा देकर नया धमाका कर दिया। वहीं कई मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि सिद्धू इकबाल प्रीत सहोता को डीजीपी बनाए जाने से नाराज थे। इसके साथ ही कुछ और संभावित कारण बताए जा रहे हैं।

सिद्धू की नाराजगी के मुख्य कारण: रिपोर्ट्स

  1. राणा गुरजीत सिंह को नवजोत सिंह सिद्धू के विरोध के बावजूद मंत्री बनाना
  2. सुखजिंदर रंधावा को गृह विभाग देना
  3. एपीएस देयोल को एडवोकेट जरनल बनाना
  4. कुलजीत नागरा को मंत्रिमंडल में शामिल न करना
  5. मंत्रिमंडल के गठन ओर मंत्रियों के पोर्टफोलियो बँटवारे में सिद्धू की राय न लिया जाना
  6. सीएम न बनाए जाने से नाराजगी