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सेलेक्टिव क्यों हैं राहुल गांधी और CJP? झारखंड में सड़क पर उतरे युवाओं का सवाल


झारखंड में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं में गड़बड़ी, घोटालों और पेपर लीक को लेकर बवाल मचा हुआ है। छात्र और युवा सड़क पर उतर कर परीक्षा रद्द करने और सीबीआई से जांच कराने की मांग कर रहे हैं। लेकिन 29 जुलाई,2026 को लोकसभा में 53 मिनट तक परीक्षा और पेपर लीक पर भाषण देने वाले राहुल गांधी ने एक बार भी झारखंड के छात्रों और युवाओं की मांगों का जिक्र नहीं किया। वहां पर परीक्षाओं में हो रही धांधली का मुद्दा नहीं उठाया, क्योंकि झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम की सरकार है। वहीं 29 जुलाई को ही झारखंड के बीजेपी सांसदों ने संसद भवन परिसर में झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान सांसदों ने हेमंत सरकार और सरकार में शामिल कांग्रेस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। सांसदों ने पूछा राहुल गांधी मौन क्यों है? इतना सब होने के बावजूद राहुल गांधी की आंखें क्यों नहीं खुलीं?

खड़गे, सोनिया, राहुल का दोहरा चरित्र – आदित्य साहू
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सह राज्यसभा सांसद आदित्य साहू ने कहा कि कांग्रेस दोहरी राजनीति करती है। दिल्ली में मांग करती है कि जांच हो और झारखंड में पूरी तरह मौन है। 19 अभ्यर्थी उत्पाद सिपाही दौड़ में मारे गए हैं। कांग्रेस झारखंड में मांग करे कि उन मृत बच्चों के परिजनों को हेमंत सरकार एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा तत्काल भुगतान करे। भाजपा की मांग है कि दिल्ली से कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी झारखंड की धरती पर जाएं, वहां की जनता इनका चेहरा देखना चाहती है और इनसे पूछना चाहती है कि आप लोगों का यह दोहरा चरित्र क्यों?

झारखंड में परीक्षा में धांधली के विरोध में सड़क पर उतरे छात्र और युवा
बुधवार 29 जुलाई को रांची में हजारों छात्रों ने जेपीएससी 14वीं प्रारंभिक परीक्षा के परिणामों में धांधली के विरोध में सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से अल्बर्ट एक्का चौक तक संविधान यात्रा निकाली। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं से युवाओं का भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने झारखंड सरकार और आयोग से भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने, परीक्षा प्रणाली में सुधार करने और अभ्यर्थियों के साथ न्याय सुनिश्चित करने की मांग की। छात्रों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। अब छात्र और युवा सवाल कर रहे हैं कि राहुल गांधी सेलेक्टिव क्यों है? जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं पर अपनी आखें खोलें, परीक्षा रद्द करें और सीबीआई से जांच कराएं।

सरकार ने छात्रों को प्रदर्शन में हिस्सा लेने से रोका, बस मालिकों को धमकी
झारखंड की कांग्रेस और जेएमएम सरकार युवाओं के इस प्रदर्शन को दबाना और कुचलना चाहती है।  छात्रों को प्रदर्शन स्थलों तक पहुंचने से रोकने और यातायात व बस सेवाओं को प्रभावित करने की खबरें सामने आईं। रांची, हजारीबाग और अन्य शहरों में परीक्षा में गड़बड़ी व पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रशासन द्वारा सुरक्षा का हवाला देकर छात्रों के जत्थों और वाहनों को रास्ते में ही रोका गया। प्रदर्शन स्थल की ओर जाने वाली कई बस सेवाओं और परिवहन के साधनों के मार्ग में फेरबदल किया गया या उन्हें बीच में ही रोक दिया गया। प्रशासन की ओर से बस सेवाएं बंद रखने या बदलने का दबाव, और धमकाने जैसी परिस्थितियाँ देखने को मिलीं।

विरोध के बीच JPSC की मुख्य परीक्षा अगले आदेश तक स्थगित
बढ़ते विवाद और विरोध के बीच झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) ने संयुक्त सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2025 को आगामी आदेश तक के लिए स्थगित कर दिया है। कथित अनियमितताओं की जांच सीआईडी (CID) द्वारा की जा रही है, जिसके तहत पूर्व उप परीक्षा नियंत्रक और अन्य संबंधित लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। लेकिन सवाल है छात्रों के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर हंगामा करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी कहां हैं? क्या छात्रों की आवाज़ सिर्फ वहीं सुनाई देती है, जहां राजनीतिक एजेंडा साधना हो? क्या झारखंड के छात्रों के अधिकार, उनका भविष्य और उनका इन पार्टियों के लिए कोई मायने नहीं रखता? जब मुद्दा राजनीति का नहीं, छात्रों के भविष्य का हो, तब यह चुनिंदा संवेदनशीलता और सुविधानुसार चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है।

JPSC की कुल 10 पुरानी भर्ती परीक्षाओं की जांच CBI के पास
झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की पहली और दूसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा सहित कुल 10 पुरानी भर्ती परीक्षाओं की जांच पहले से ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के पास है। 6 भर्ती जांच के दायरे में और 9 भर्ती परीक्षा स्थगित हो गई हैं। हालिया विवादों और 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों की जांच राज्य स्तर पर क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) द्वारा की जा रही है, जिसमें अब तक 10 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।


DU की advisory पर भड़क गए राहुल, DU को धमकाया:JNU छात्रों को बांग्लादेश की तर्ज पर उकसा रही जिहादन आरफा, छात्रों को हिंसा की तरफ ढकेल रहा इस्लामी-कांग्रेसी इकोसिस्टम

                      प्रदर्शन को लेकर यूनिवर्सिटी की एडवाइजरी से क्यों किलसे राहुल गाँधी और आरफा खानुम
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में पिछले 4 दिनों से लगातार हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं। इसी बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) ने अपने छात्रों के लिए एडवाइजरी जारी की है। दोनों यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि छात्र और शिक्षक जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल न हों और वहाँ जाने से भी बचें।

इससे पहले एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (AIU) ने भी सभी यूनिवर्सिटी को एडवाइजरी भेजी, जिसमें छात्रों से पढ़ाई पर ध्यान देने और अपनी ऊर्जा किसी और दिशा में न लगाने की सलाह दी गई।

छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जारी की गई इन एडवाइजरी के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और आरफा खानुम शेरवानी जैसे तथाकथित पत्रकारों को परेशानी हो गई। जहाँ राहुल गाँधी ने इन यूनिवर्सिटीज को छात्रों को रोकने के लिए धमकाया है, वहीं आरफा खानुम ने छात्रों को ‘वाइस चांसलर के इस्तीफे’ की माँग का नया एजेंडा सौंप दिया है।

यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी में क्या कहा गया?

JNU की एडवाइजरी में लिखा गया है कि यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षकों, छात्रों और अन्य सदस्यों को जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए और अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एडवाइजरी में साफ कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के सार्वजनिक प्रदर्शनों को लेकर दिए गए निर्देशों के मुताबिक, सभी को जंतर-मंतर पर या उसके आसपास होने वाले जमावड़ों में शामिल होने या वहाँ जाने से बचना चाहिए।

साथ ही सोशल मीडिया पर भी जिम्मेदारी से व्यवहार करने की सलाह दी गई है। एडवाइजरी में यह भी लिखा है कि अगर कोई इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ साथ यूनिवर्सिटी की आचार संहिता के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है। इसके अलावा छात्रों को शैक्षणिक जिम्मेदारी और जिम्मेदार नागरिकता के मूल्यों को बनाए रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है।

वहीं DU की एडवाइजरी में कहा गया कि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा यूनिवर्सिटी के लिए बहुत मायने रखती है। एडवाइजरी में बताया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाली किसी भी गैरकानूनी सभा या प्रदर्शन में शामिल होना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन माना जाएगा और इससे कानूनी कार्रवाई हो सकती है। साथ ही यह भी कहा गया है कि ऐसी गतिविधियाँ छात्रों की व्यक्तिगत सुरक्षा के साथ साथ उनकी पढ़ाई और आगे के करियर पर भी गंभीर असर डाल सकती हैं।

इसी वजह से सभी छात्रों से जंतर मंतर से दूर रहने और कानून का पालन करते हुए अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की गई है। इसके अलावा DU ने छात्रों को यह भी सतर्क किया है कि सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर काफी फर्जी और भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है, इसलिए छात्रों को सावधान रहना चाहिए।

AIU ने भी अपनी एडवाइजरी में यही संदेश दोहराया है कि छात्रों को अपनी ऊर्जा पढ़ाई में लगानी चाहिए, न कि किसी और दिशा में भटकानी चाहिए।

राहुल गाँधी और आरफा खानुम को हुई दिक्कत

इन एडवाइजरी के सामने आते ही कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि छात्रों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने की हिम्मत कैसे हो सकती है। उन्होंने आगे चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग आज छात्रों को धमका रहे हैं, आने वाले समय में उन्हें भी इसका हिसाब देना होगा।

वहीं तथाकथित पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने भी यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी का विरोध किया। आरफा ने छात्रों को उकसाते हुए कहा कि अब अपनी ‘इस्तीफे की सूची में एक और नाम जोड़ेंगे, और वह नाम है दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति का।”

एक तरफ यूनिवर्सिटी छात्रों को आगाह कर रही हैं कि प्रदर्शन में हो रही हिंसा और कानूनी कार्रवाई में पड़ने से उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है, पर दूसरी ओर राहुल गाँधी और आरफा खानुम को यह रास नहीं आ रहा है। क्योंकि अगर छात्रों ने यूनिवर्सिटी का आदेश पालन किया तो ये उनके मंसूबे पूरे नहीं करेगा। यह उसी प्रकार का मॉडल है, जो दो साल पहले बांग्लादेश में ‘छात्र आंदोलन’ के समय पर देखा गया था, जहाँ बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया था।

बांग्लादेश में शिक्षकों से लिए गए थे जबरन इस्तीफे, हुई थी हिंसा

जब साल 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार एक ‘छात्र आंदोलन’ के नाम पर गिराई गई थी, तब भी यही मॉडल सामने आया था। आंदोलन के नाम पर बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, प्रिंसिपल और हेड टीचर को इस्तीफा माँगा गया था। और रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैंकड़ों शिक्षकों को जबरन पद से इस्तीफा दिलावाया भी गया था।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, UGC के चेयरमैन प्रोफेसर काजी शाहीदुल्लाह, नेशनल यूनिवर्सीट के वाइस चांसलर प्रोफेसर मशियुर रहमान, जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. सादेका हलीम, बांग्लादेश एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर एमदादुल हक चौधरी, कोमिला यूनिवर्सिी के कुलपति प्रोफेसर एएफएम अब्दुल मोईन ने इस्तीफा दे दिया था और यह सामने आया था कि इनमें से कई को जबरन हटने के लिए मजबूर किया गया था।

इसीलिए राहुल गाँधी और आरफा खानुम का यूनिवर्सिटी की एडवाइजरी का न सिर्फ विरोध करना, बल्कि धमकाया और छात्रों को VCs के इस्तीफे के लिए उकसाना एकदम उसी तरह से है, जैसे बांग्लादेश में हुआ था।

वामपंथी और विपक्षी दल कैसे कर रहे छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल? विदेशी फंडिंग और खालिस्तानी कनेक्शन पर भी सवाल

CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब NEET पेपर लीक तक विपक्ष ने जितने भी धरने/प्रदर्शन हुए हैं सभी अपने असली मुद्दे से भटके हैं। दूसरे विपक्ष का किसी न किसी बहाने संसद को बाधित करना रहा है। तीसरे, अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मुग़ल आक्रांताओं के गुणगान की बजाए उनकी असलियत पुस्तकों में लाई गयी होती कोई प्रधान का इस्तीफा नहीं मांगता। सभी धरनों में भोजन मिलना पहली बार देखा गया है। जो इस बात को साबित करता है कि हमारा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथों बिका हुआ है। जनता समझती है ये नेता जनता के हित में काम कर रहे हैं जबकि संसद से लेकर सड़क तक जो भी उपद्रव हो रहा है सब विदेशी फंडिंग से हो रहा है। जिसका तक़रीबन हर चैनल पर जिक्र किया जा रहा है। चुनावों में जनता से मदद मांगी जाती है लेकिन धरनों में भारत विरोधियों की शरण में, ये क्या तमाशा है?     
राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर तमाशे, उपद्रव और घिनौनी राजनीति का गवाह बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के शुरू हुए एक व्यंग के मंच और तथाकथित छात्र संगठन के बैनर तले जो कुछ भी पिछले दिनों से रचा जा रहा है, उसने देश के जागरूक नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

परीक्षा सुधारों, रोजगार और छात्रों के निष्पक्ष भविष्य की जिन माँगों को लेकर यह आंदोलन शुरू होने का दावा किया गया था, वह असली मुद्दा अब बहुत पीछे छूट चुका है। https://www.facebook.com/share/r/1F4fka4oWh/

आज जंतर-मंतर का मंच छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजने की जगह विपक्षी दलों का ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ और ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’ बन गया है। लोकतंत्र में जनता द्वारा बार-बार खारिज की जा चुकी और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की हताशा में झुलस रही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ इस मंच का इस्तेमाल केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश, कतर से लेकर खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे भारत विरोधी तत्वों का इस आंदोलन में दिलचस्पी लेना और वित्तीय सहायता फंडिंग का ऐलान करना यह साफ दिखाता है कि इस पूरे ड्रामे के तार कितने खतरनाक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।

पृष्ठभूमि और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का उभार: व्यंग्य से शुरू हुआ खेल अब अराजकता का औजार

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सोशल मीडिया पर एक मजाकिया या व्यंग्यात्मक ग्रुप की तरह पेश किया गया था, वह रातों-रात विरोध प्रदर्शन का चेहरा कैसे बन गई? इस संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों ने जब NEET परीक्षा में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर जंतर-मंतर पर धरना देना शुरू किया, तो पूरे देश के आम छात्रों को लगा कि शायद यह उनकी आवाज है। लेकिन महज कुछ ही दिनों में इस पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ दी गई।

छात्रों के जायज सवालों को किनारे करके मंच से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी, राजनीतिक भाषणबाजी और व्यवस्था को अपाहिज बनाने की धमकियाँ दी जाने लगीं। व्यंग्य का चोला पहनकर उतरी CJP दरअसल वामपंथी इकोसिस्टम और मोदी विरोधी लॉबी का ही नया अवतार बनकर उभरी है, जिसका मकसद केवल देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाना है।

जो छात्र केवल निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के अवसर तलाश रहे थे, उन्हें समझने ही नहीं दिया गया कि उनके पीछे से एक सुनियोजित राजनीतिक और विचारधारात्मक एजेंडा चलाया जा रहा है।

राजनीति चमकाने की होड़: कॉन्ग्रेस, आप, सपा और TMC ने छात्रों के मंच पर डाला डेरा

जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने लगी, वैसे ही अपनी खोई साख तलाश रहे विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में जरा भी देर नहीं की। शिक्षा और छात्रों के हित का ढोंग रचने वाली राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गई कि कौन जंतर-मंतर जाकर CJP का सबसे बड़ा हमदर्द दिखेगा।
कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और उनके तमाम नेताओं ने संसद में काले कपड़े पहनने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन का नाटक करके इस मुद्दे को तुरंत भुनाने की कोशिश की और इसे अपनी डूबती नैया पार लगाने का जरिया बना लिया।

इसी होड़ में समाजवादी पार्टी भी पूरे तामझाम के साथ कूद पड़ी। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव खुद जंतर-मंतर पहुँचीं और CJP के प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई।

यही नहीं अखिलेश यादव और सपा के अन्य बड़े नेताओं से लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं तक, पूरी पार्टी ने CJP के इस आंदोलन को खुला राजनीतिक और नैतिक समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

जो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावों में हार के बाद अपनी जमीन तलाश रही है, उसने छात्रों के इस मंच का इस्तेमाल केवल केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोलने और अपनी पार्टी का राजनीतिक कद चमकाने के लिए किया।

उधर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके नेता खुद को चमकाने सीधे जंतर-मंतर के मंच पर पहुँच गए। जो आम आदमी पार्टी दिल्ली के युवाओं को रोजगार देने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने में नाकाम रही, वही आज छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी हिंसा पर मौन रहने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने भी इस मंच का पूरा इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया।

इन तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े चेहरों का अचानक जंतर-मंतर पर जमावड़ा होना यह साबित करता है कि इन्हें छात्रों के भविष्य की जरा भी चिंता नहीं है, बल्कि इन्हें केवल अपने चुनाव के लिए एक गरमा-गरम मुद्दा चाहिए।

भटक गया असली मुद्दा: छात्रों का दर्द पीछे छूटा, एजेंडा हावी हुआ

जो छात्र दूर-दराज के इलाकों से इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी परीक्षाओं की निष्पक्षता, NEET लीक मामलों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर सरकार से गंभीर संवाद होगा, वे आज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री होते ही पूरा ध्यान छात्रों की वास्तविक माँगों से हटकर अरविंद केजरीवाल के भाषणों, राहुल गाँधी के आरोपों और ममता बनर्जी के समर्थनों पर केंद्रित हो गया। मंच से अब परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने, संसद घेरने और प्रशासनिक व्यवस्था को ठप करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

वास्तविक और निर्दोष छात्र अब इस भीड़ में पूरी तरह गायब हो चुके हैं और उनकी जगह पेशेवर प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के नए चेहरों ने ले ली है। छात्रों के कंधों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करना और असली मुद्दों को दबा देना ही इन राजनीतिक आकाओं का असली मकसद बन चुका है।

लाइमलाइट बटोरने की होड़: छात्रों के दर्द पर अभिनय करते फिल्मी कलाकार

राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस आंदोलन में खुद को ‘क्रांतिकारी’ दिखाने और खोई हुई लाइमलाइट वापस पाने की होड़ फिल्मी गलियारों के कुछ चुनिंदा चेहरों में भी साफ देखी जा रही है।
स्वरा भास्कर, इमरान खान,हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा और प्रकाश राज जैसे अभिनेता, जिनका फिल्मी करियर लंबे समय से ढलान पर है या जो मुख्यधारा के सिनेमा से लगभग गायब हो चुके हैं, वे अब जंतर-मंतर के इस मंच को अपने पब्लिसिटी स्टंट का जरिया बना रहे हैं।
सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े ज्ञान देने वाले ये कलाकार अब छात्रों के हक की आड़ में अपनी ढहती साख को बचाने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं। प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसे चेहरे, जो हर सरकारी नीति के विरोध में कूदने के लिए जाने जाते हैं, वे एक बार फिर ‘मोदी विरोध’ के अपने पुराने एजेंडे को चमकाने आ गए हैं।
वहीं लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर इमरान खान और हाल ही में सुर्खियों में रहने की कोशिश कर रहीं सोनाक्षी सिन्हा जैसे लोग भी छात्रों की वास्तविक समस्याओं से दूर, केवल कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर खुद को ‘जनता का मसीहा’ साबित करने का खेल खेल रहे हैं।

विदेश से फंडिंग और ऑनलाइन सप्लाई: कतर, बांग्लादेश और खालिस्तानी एंगल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर चल रहे इस तथाकथित ‘गरीब और पीड़ित छात्र आंदोलन’ का असली चेहरा तब बेनकाब हुआ, जब इसके पीछे चल रहे संदिग्ध फंडिंग और सप्लाई नेटवर्क की परतें खुलीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के लिए बांग्लादेश और कतर जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के संदिग्ध खातों से भारी मात्रा में ऑनलाइन खाना और महंगे फूड डिलीवरी ऑर्डर्स भेजे गए। सवाल उठता है कि विदेशों में बैठे इन आकाओं को भारत के छात्रों के खाने-पीने की इतनी चिंता क्यों अचानक सताने लगी?

आंदोलन की देशविरोधी साँठगाँठ उस समय पूरी तरह उजागर हो गई जब अमेरिका में बैठे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने CJP आंदोलनकारियों के लिए 1 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने का खुला ऐलान कर दिया। यह सीधे तौर पर भारत में खालिस्तानी एजेंडे को घुसाने और युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।

यह साबित करने के लिए काफी है कि यह आंदोलन केवल भारत के अंदर की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत विरोधी वैश्विक ताकतें इसे ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की टूलकिट के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

हिंसा, बैरिकेडिंग तोड़ना और पुलिस पर हमला: ‘बांग्लादेशी मॉडल’ की खतरनाक पुनरावृत्ति

जंतर-मंतर पर हो रही गतिविधियों की तुलना अगर आप पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए तख्तापलट से करेंगे, तो आपको एक जैसा पैटर्न साफ दिखाई देगा। बांग्लादेश में भी इसी तरह छात्रों के आंदोलन की आड़ में उग्र तत्वों ने हिंसा फैलाकर चुनी हुई सरकार को निशाना बनाया था और अराजकता पैदा की थी।

जंतर-मंतर पर CJP के उपद्रवियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नकाब उतारकर जब ‘चलो संसद’ का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस के लगाए बैरिकेड्स को तोड़ा गया और कानून-व्यवस्था में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और बोतलें फेंकी गईं।

इस हिंसा में उत्तरी दिल्ली के DCP, पंजाबी बाग के ACP समेत 118 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। जब-जब पुलिस और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कानून के मुताबिक कदम उठाते हैं, तब-तब यह पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगता है।

ऑन-ड्यूटी जवानों और महिला पुलिसकर्मियों का खून बहाने वाले उग्र तत्वों के बचाव में उतरना यह दिखाता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि केवल हिंसा और टकराव है।

मोदी विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करने का टूलकिट: युवाओं को होना होगा सावधान

शाहीन बाग से लेकर लाल किले पर हिंसा वाले किसान आंदोलन और अब जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जारी यह प्रदर्शन सब एक ही सिक्के के पहलू हैं। जब-जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता का जनादेश नहीं मिलता, तब-तब ये हताश ताकतें सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाकर देश को बंधक बनाने की रणनीति अपनाती हैं।

निजी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल अपनी चमक खो चुकी राजनीति को चमकाने के लिए मासूम छात्रों को ह्यूमन शील्ड बना रहे हैं। देश का युवा अगर आज भी यह नहीं समझ पाया कि परीक्षा सुधार के नाम पर उसके कंधों का इस्तेमाल खालिस्तानी समर्थकों, विदेशी फंडिंग एजेंसियों और मोदी-विरोधी नेताओं द्वारा देश विरोधी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

देश के छात्रों को इस राजनीतिक टूलकिट से खुद को तुरंत अलग कर लेना चाहिए ताकि उनका भविष्य, उनकी मेहनत और देश की सुरक्षा तीनों सुरक्षित रह सकें।

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट ऐलान किया है कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा।

PM मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार फैसले ले रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इससे मामलों का जल्दी निपटारा होगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। सरकार चाहती है कि छात्रों का भरोसा परीक्षा व्यवस्था पर बना रहे।

मोदी के आवास के बाहर हंगामा कराने के लिए राहुल-प्रियंका गाँधी ने अपने ही सांसदों से बोला झूठ? रिपोर्ट में सामने आया कैसे बरगलाए गए MP

                               राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा को पुलिस ने हिरासत में लिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास 7 लोक कल्याण मार्ग के बाहर 21 जुलाई 2026 (मंगलवार) को उस समय बड़ा राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला, जब कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और पार्टी के कई सांसदों ने अचानक धरना शुरू कर दिया। राहुल गाँधी ने कहा कि उनका विरोध NEET पेपर लीक और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ है।

इससे पहले CJP के प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च निकालने निकले थे। इस दौरान भीड़ ने हिंसक रूप ले लिया, पुलिसकर्मियों पर हमला किया और संसद परिसर की ओर बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आँसू गैस के गोले छोड़े। बाद में PM आवास के बाहर धरना देने वाले राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और कई कांग्रेस नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

प्रधानमंत्री मोदी के आवास के बाहर राहुल गाँधी और कांग्रेस नेताओं का धरना सुरक्षा में बड़ी चूक माना गया। इसी वजह से पुलिस ने कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया। हालाँकि, अब सामने आई रिपोर्ट में राहुल गाँधी की साजिश को लेकर गंभीर दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राहुल गाँधी ने अपने ही नेताओं से झूठ बोलकर उन्हें इस सुरक्षा उल्लंघन में शामिल होने के लिए तैयार किया।

राहुल गाँधी ने अपने ही नेताओं से कैसे धरने के लिए बोला झूठ?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गाँधी के इस धरने की योजना आखिरी समय तक पूरी तरह गुप्त रखी गई थी। कांग्रेस सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार और एसपीजी (SPG) को इसकी भनक न लगे, इसलिए राहुल गाँधी ने अपने लगभग 25 सांसदों को यह तक नहीं बताया था कि वे प्रधानमंत्री के आवास के बाहर धरना देने जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा झूठ राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल ने मिलकर गढ़ा था।

रिपोर्ट के अनुसार, सांसदों से कहा गया था कि उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के जन्मदिन की शुभकामनाएँ देने उनके आवास पर जाना है। मल्लिकार्जुन खरगे का आवास 10 राजाजी मार्ग पर है, जो पीएम मोदी के 7 लोक कल्याण मार्ग स्थित आवास से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एक कांग्रेस सांसद ने बताया, “जन्मदिन का कार्यक्रम खत्म होने के बाद हमें कहा गया कि बिना कोई सवाल पूछे राहुल गांधी के काफिले के पीछे चलो। हमने ऐसा ही किया। जब हम 7 लोक कल्याण मार्ग पहुँचे, तब हमें बताया गया कि अब हमें यहीं बैठना है।”

सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई तो राहुल गाँधी ने बदल दीं अपनी माँगें

धरने के दौरान सरकार ने राहुल गाँधी से बातचीत करने का फैसला किया। यह बातचीत इसलिए शुरू की गई क्योंकि प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने से आम लोगों को भारी असुविधा हो रही थी और यह सुरक्षा के लिहाज से भी खतरा बन गया था। हालाँकि, सरकार के बातचीत के लिए आगे आने के बाद भी राहुल गाँधी ने अपना रुख बदल लिया।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस के धरने के दौरान राहुल गांधी ने अपनी पहली माँग मान लिए जाने के बाद एक नई माँग जोड़ दी।
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह करीब एक घंटे बाद प्रदर्शन स्थल पर पहुँचे और राहुल गाँधी से बातचीत की। इसके बावजूद कांग्रेस सांसदों ने बाद में कहा कि बातचीत से कोई समाधान नहीं निकला और सरकार उनकी माँगों को पूरा करने में विफल रही।
जितेंद्र सिंह ने X पर पोस्ट करते हुए कहा कि उन्हें और केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन को सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए भेजा गया था क्योंकि प्रदर्शन का नेतृत्व कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा जैसे वरिष्ठ नेता कर रहे थे।
जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि बातचीत के दौरान राहुल गाँधी ने उनसे कहा था कि यदि सरकार संसद में NEET विवाद, कथित पेपर लीक और देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर चर्चा कराने के लिए तैयार हो जाए तो धरना समाप्त कर दिया जाएगा।
जितेंद्र सिंह के अनुसार, उन्होंने तुरंत सरकार के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत की और वापस आकर राहुल गाँधी को बताया कि सरकार संसद में NEET और परीक्षा विवाद से जुड़े सभी मुद्दों पर चर्चा कराने के लिए तैयार है।
जितेंद्र सिंह ने कहा कि इसके बाद धरना समाप्त करने के बजाय राहुल गाँधी ने एक नई शर्त रख दी। उनके अनुसार, राहुल गाँधी ने कहा कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देंगे तब तक धरना खत्म नहीं होगा।
जितेंद्र सिंह ने कहा, “सरकार द्वारा संसद में चर्चा कराने पर सहमति देने की जानकारी मिलने के बाद राहुल गाँधी ने कहा कि केवल इतना काफी नहीं है और केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी चाहिए।”
मंत्री ने आगे दावा किया कि उन्होंने राहुल गाँधी को याद दिलाया कि कुछ मिनट पहले तक उनकी केवल एक ही माँग थी कि संसद में चर्चा हो। इस पर राहुल गाँधी ने जवाब दिया कि अब उनकी माँगें बदल गई हैं। बाद में राहुल गाँधी ने कहा कि अपनी माँगें बदलना उनका अधिकार है।

अब क्या हैं राहुल गाँधी की माँगें

इसके बाद जब राहुल गाँधी को हिरासत में लिया गया तो उन्होंने अपनी माँगों की सूची और बढ़ा दी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनकी नई माँगों में शामिल हैं-
  • गृह मंत्री अमित शाह और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।
  • सोमवार को छात्रों पर कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई और छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लेना।
  • सोमवार की पुलिस कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री से माफी।
  • संसद में इस पूरे मुद्दे पर चर्चा।
  • जल्द से जल्द शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार।
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी पर हिंसक तत्वों का समर्थन करने के आरोप लगे हैं। वर्ष 2020 के दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान भी राहुल गाँधी ने लगातार दंगाइयों का समर्थन किया था और सोनिया गाँधी के साथ मिलकर हिंसा भड़काने के आरोप लगे थे। इतना ही नहीं ऑपइंडिया की रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि राहुल गाँधी के करीबी सहयोगी सचिन राव उस व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा थे जहाँ इन दंगों की योजना बनाई गई थी।

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के सवाल से फंस गए राहुल गांधी, खुल गया कच्चा चिट्ठा

एक प्रसिद्ध कहावत है कि जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। यह कहावत कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत पर बिल्कुल सटीक बैठती है। सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया विदेशी दौरों को लेकर सवाल उठाया है।  सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए पोस्ट में उन्होंने लिखा कि एक ओर प्रधानमंत्री भारतीयों को विदेश यात्रा से बचने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री लगातार विदेशी दौरों पर हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने पिछले 57 दिनों में 11 देशों का दौरा किया है। सुप्रिया श्रीनेत के इस सवाल ने जहां राहुल गांधी को बुरी तरह फंसा दिया है, वहीं प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों से मिली उपलब्धियों को नजरअंदाज कर देश की 140 करोड़ जनता को गुमराह किया है।

57 दिनों में 11 देशों के दौरे का किया जिक्र
सुप्रिया श्रीनेत ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों की लिस्ट भी शेयर की। उनके मुताबिक, ‘प्रधानमंत्री ने 15-16 मई को UAE, 17 मई को नीदरलैंड, 18 मई को स्वीडन, 19 मई को नॉर्वे, 20 मई को इटली, 13-16 जून को फ्रांस, 17-18 जून को स्लोवाकिया, 27-29 जून को सेशेल्स, 6-7 जुलाई को इंडोनेशिया, 8-9 जुलाई को ऑस्ट्रेलिया और 10-11 जुलाई को न्यूजीलैंड का दौरा किया।’ कांग्रेस नेता ने आगे लिखा कि प्रधानमंत्री ने भारतीय नागरिकों को विदेश यात्रा से बचने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री स्वयं पिछले 57 दिनों में 11 देशों की यात्रा कर चुके हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों ने कांग्रेस की नाकामियों को किया उजागर 
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर सवाल तो उठाया दिया, लेकिन ये नहीं बताया कि इन विदेशी दौरों से देश को क्या हासिल हुआ। उन्होंने जनता को गुमराह करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को विरोधाभासी साबित करने की पूरी कोशिश की है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों से मिली कामयाबी ही कांग्रेस के प्रोपेगैंडा और झूठ को बेनकाब करने के लिए काफी है। अब प्रधानमंत्री मोदी के उन प्रमुख विदेशी दौरों पर एक नजर डालते हैं, जिन्होंने ना सिर्फ देश को लाभान्वित और सुरक्षित किया है, बल्कि पूर्ववर्ती कांग्रेस शासन की विदेश नीति और उसकी नाकामियों को भी उजागर किया है। 

न्यूजीलैंड दौरा : मुक्त व्यापार समझौता,20 बिलियन डॉलर के भारी निवेश
रिकॉर्ड 9 महीने के समय में हुए मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच बाजार की पहुंच, निवेश, टेक्नोलॉजी और सेवाओं के नए द्वार खुलेंगे। इसके तहत न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 बिलियन डॉलर के भारी निवेश का वादा किया है।

ऑस्ट्रेलिया दौरा : यूरेनियम और रेयर अर्थ मिनरल्स का समझौता
ऑस्‍ट्रेलिया में ऊर्जा सुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर बड़ा समझौता किया गया। भारत को यूरेनियम की आपूर्ति के लिए ‘इंडिया-ऑस्ट्रेलिया सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट’ को अंतिम रूप दिया गया। इसे भारत की एक बड़ी जीत माना जा रहा है। गौरतलब है कि साल 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम बेचने से साफ मना कर दिया था। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के कोकोस द्वीप पर अस्थायी स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल स्थापित किया जाएगा, जो भारत के गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन को तकनीकी सहयोग देगा।

इंडोनेशिया दौरा : ब्रह्मोस मिसाइल, समुद्री सुरक्षा और क्रिटिकल मिनरल्स
दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग और समुद्री सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण समझौते हुए। इंडोनेशिया भारत को क्रिटिकल मिनरल्स देगा। भारत और इंडोनेशिया ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए सहयोग का विस्तार किया है। 

सेशेल्स दौरा : समुद्री सुरक्षा लेकर दोनों देशों के बीच समझौत
इस ऐतिहासिक दौरे में भारत और सेशेल्स के बीच अगले 50 वर्षों के लिए रोडमैप तैयार हुआ तथा डिजिटल पेमेंट (UPI) सहित 9 महत्वपूर्ण समझौते किए गए। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, समुद्री सुरक्षा और रक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग और मजबूत हुआ। इसके साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की विश्वसनीय भागीदार की भूमिका और सशक्त होगी।

क्यों जरूरी थे प्रधानमंत्री मोदी के ये विदेशी दौरे 
प्रधानमंत्री मोदी का 4 देशों का दौरा यूं ही नहीं हुआ। इसका आधार 16 जून 2026 को अमेरिका में हुई एक घटना को माना जा रहा है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 जून को अपनी सबसे बड़ी सैन्य कमांड, ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड’ (USINDOPACOM) का नाम बदलकर फिर से ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ (USPACOM) कर दिया। माना जा रहा है कि अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्‍स को लेकर चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि रेयर अर्थ मिनरल्‍स सेमी-कंडक्‍टर निर्माण, बैटरी वाली गाड़ियों, स्मार्टफोन और डिफेंस सेक्‍टर के लिए काफी महत्‍वपूर्ण होते हैं। रेयर अर्थ मिनरल्‍स पर चीन का एकाधिकार है। इसके चलते हिंद और प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों ने आपसी कूटनीति को नई दिशा देने की शुरुआत कर दी है। इसी को धार देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने प्रशांत महासागर क्षेत्र के तीन देशों इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र के देश सेशेल्स की यात्रा की।

बीजेपी ने पेश किया पीएम मोदी के विदेश दौरों का ‘रिपोर्ट कार्ड’
बीजेपी ने रविवार (12 जुलाई,2026) को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया विदेश दौरों का ‘रिपोर्ट कार्ड’ पेश करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला। बीजेपी मुख्यालय में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के दौरों से देश को महत्वपूर्ण रणनीतिक, रक्षा और आर्थिक लाभ हुए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के सेशेल्स, इंडोनेशिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरों तथा जापान के शीर्ष नेतृत्व की भारत यात्रा का जिक्र करते हुए अपनी प्रस्तुति को ’10 कदम, 10 का दम’ नाम दिया। पात्रा ने कहा कि भारत हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्रों में एक ‘स्थिरता की ताकत’ के रूप में उभर रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि विदेश में मौजूद कांग्रेस नेता बंद कमरों में ‘साजिश’ रच रहे होंगे। पात्रा ने आरोप लगाया कि राहुल इस बात की ‘साजिशन’ रच रहे होंगे कि मोदी सरकार के अच्छे कामों में कैसे बाधा डाली जाए।

सुप्रिया श्रीनेत के सवाल से कैसे फंस गए राहुल गांधी ?
प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर सवाल उठने के बाद अब राहुल गांधी के विदेशी दौरों को लेकर बहस तेज हो गई है। अब पूछा जा रहा है कि राहुल गांधी अभी कहा है? केरल के वायनाड में हाल में हुए भूस्खलन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हादसे के कई दिन बाद भी राहुल गांधी प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने व पीड़ितों से मिलने नहीं पहुंचे। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दावा किया कि, ‘राहुल गांधी काफी समय से भारत से बाहर हैं और किसी को उनके ठिकाने के बारे में जानकारी नहीं है। उन्होंने सवाल पूछते हुए कहा, ‘क्या किसी को पता है कि राहुल गांधी कहां हैं? वह किस देश में छुट्टियां मना रहे हैं? वह किसके साथ हैं? वह अक्सर किससे मिलने जाते हैं?’

वायनाड में हालिया भूस्खलन, राहुल और प्रियंका गायब
वहीं एक अन्य पोस्ट में बीजेपी नेता ने लिखा कि ‘वायनाड में हालिया भूस्खलन में लोगों की जान गई और बड़े पैमाने पर तबाही हुई, लेकिन इसके बावजूद न राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रभावित इलाके में जाकर पीड़ितों से मुलाकात की।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘किसी भी जनप्रतिनिधि की संवेदनशीलता इस बात से मापी जाती है कि वह लोगों के सबसे कठिन समय में उनके साथ खड़ा हो, न कि केवल चुनाव के समय उनके बीच पहुंचे।’ बता दें कि 7 जुलाई को केरल के वायनाड में भूस्खलन हुआ था। भारी बारिश होने के कारण मिट्टी खिसकने से दुर्घटना हुई थी जिसमें जान-माल का नुकसान हुआ था।

राहुल गांधी की विदेश यात्रा अभी भी रहस्य के घेरे में
अमित मालवीय ने सोशल मीडिया एक्स पर एक और पोस्ट करते हुए सवाल उठाया कि 22 जून से 13 जुलाई के बीच राहुल गांधी की विदेश यात्रा अभी भी रहस्य के घेरे में है। वह कहाँ गए थे? उन्होंने किससे मुलाकात की? उनकी यात्रा और वहां ठहरने का खर्च किसने उठाया? ये कुछ ऐसे जायज सवाल हैं, जिन्हें लेकर नेता प्रतिपक्ष को खुलकर सामने आना चाहिए। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि क्या उनकी इन विदेशी मुलाकातों में ऐसी बैठकें शामिल थीं, जिनका भारत के राजनीतिक या रणनीतिक हितों पर कोई असर पड़ सकता है।

देश और पार्टी की जरूरत के समय राहुल गांधी की विदेश यात्रा
राहुल गांधी की विदेश यात्रा उस वक्त होती है जब कांग्रेस पार्टी को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। अब सवाल है कि पार्टी की स्थिति को ठीक करने के बजाए राहुल गुपचुप विदेश यात्राओं पर क्यों निकल जाते हैं? कांग्रेस द्वारा जारी प्रचार कार्यक्रम के अनुसार, देहरादून में अगले बड़े जनसभा से पहले 10 जुलाई को प्रयागराज (इलाहाबाद), 11 जुलाई को पटना और 14 जुलाई को दिल्ली में रैलियां होनी थीं। हालांकि, राहुल गांधी की विदेश यात्रा बढ़ने के कारण इन्हें स्थगित करना पड़ा है और उनके 17 जुलाई के आसपास लौटने की उम्मीद है। सूत्रों का यह भी कहना है कि राहुल गांधी पिछले 20 दिन से सार्वजनिक गतिविधियों में नजर नहीं आए हैं। अब सवाल उठ रहे हैं कि राहुल गांधी आखिर हैं कहां। सूत्रों का दावा है कि राहुल गांधी विदेश दौरे पर हैं। लेकिन इसे लेकर न तो कोई यात्रा कार्यक्रम जारी किया गया और ना ही उन्होंने खुद इसे लेकर सोशल मीडिया पर ही कोई पोस्ट किया। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान उनका अधिकांश समय इंग्लैंड और फिनलैंड सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों में बीता है। 

खास मौकों पर गायब रहे राहुल गांधी
सितंबर 2025 में, राहुल गांधी ने उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के शपथ ग्रहण समारोह में भाग नहीं लिया, जिस पर भाजपा ने आरोप लगाया कि वह उस समय विदेश यात्रा पर थे।

अक्टूबर 2024 में, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान चिली की उनकी यात्रा भी एक राजनीतिक विवाद का मुद्दा बन गई।

30 दिसंबर,2024 को राहुल गांधी वियतनाम में थे। राहुल गांधी का वियतनाम दौरा ऐसे समय पर हुआ था, जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निधन हुआ था और देश में सात दिन का शोक घोषित था। 

दिसंबर 2020 में, राहुल गांधी ने विदेश यात्रा की क्योंकि कांग्रेस ने किसानों के विरोध प्रदर्शन के समर्थन में अपना अभियान तेज कर दिया था।

2016 में, नए साल के मौके़ पर वह पाँच राज्यों के चुनाव से ठीक पहले विदेश यात्रा पर गए। इस मौके़ पर भी पंजाब कांग्रेस के नेताओं की ओर से काफ़ी नाराज़गी का भाव मीडिया में सामने आया।

2015 में, राहुल गांधी ने लगभग दो महीने की छुट्टी लेकर विदेश में अवकाश लिया, जिसके चलते वे संसद के बजट सत्र के एक महत्वपूर्ण हिस्से और विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक पर हुई बहस में शामिल नहीं हो पाए।

22 साल में 54 विदेश यात्रा, राहुल की ट्रिप पर 60 करोड़ खर्च
बीजेपी ने राहुल गांधी की विदेश यात्रा का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने रखते हुए विस्तृत जानकारी दी। राहुल गांधी ने साल 2004 से 2026 तक कुल 54 व्यक्तिगत विदेश यात्राएं की हैं, जिसमें अमेरिका, इटली, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, वियतनाम, कम्बोडिया, सिंगापुर, बहरीन, मालदीव, कतर, यूएई शामिल है। इसके अलावा वो 3 मई,2026 को बिना जानकारी के मस्कट ओमान भी गए, जिसकी फुटेज सोशल मीडिया पर मौजूद है। बीजेपी ने दावा किया कि राहुल गांधी 22 साल में 54 बार विदेश यात्रा पर गए, जिन पर 60 करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। अब सवाल उठ रहे कि राहुल की इन यात्राओं की फंडिंग किसने की।

सुरक्षा प्रोटोकॉल तोड़कर गोपनीय रूप से विदेश जाने का आरोप
राहुल गांधी के विदेशी दौरों को लेकर उन पर सुरक्षा प्रोटोकॉल तोड़कर गोपनीय रूप से यात्रा करने के आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस की तरफ से बचाव में कहा जाता है कि राहुल गांधी अपनी निजी जिंदगी को राजनीतिक जीवन से अलग रखते हैं। कई बार वह ध्यान (विपासना) लगाने, आराम करने या छुट्टियां बिताने के लिए एकदम गोपनीय तरीके से यात्रा करते हैं। उनके कई दौरों को लेकर सत्ता पक्ष और जानकारों का मानना है कि वे विदेशों में छिपी हुई राजनीतिक बैठकों, विचार-विमर्श या अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ संपर्क साधने के लिए जाते हैं। उनके लंबे विदेश दौरों के कारण कभी-कभी उनकी घरेलू राजनीति और संसद में उपस्थिति पर सवाल उठते हैं। बीजेपी अक्सर उन पर विदेशों में देश विरोधी ‘साजिश’ रचने का आरोप लगाती है, जबकि कांग्रेस उनके विचारों और संवादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बताती है।

माफीवीर राहुल गाँधी : 8 साल पहले पनामा पेपर्स लीक से शिवराज चौहान के बेटे का कनेक्शन ढूँढने वाले ने कहा- हो गई थी ‘गलतफहमी’

भारत को दो ऐसे माफीवीर नेता अरविन्द केजरीवाल और राहुल गाँधी मिले हैं जो hit and run पॉलिसी अपनाकर अपनी ही पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगता है दोनों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हुई है। अगर राहुल केजरीवाल पार्टी की हालत देख देश और पार्टी हित में काम नहीं करते Leader of Opposition पद छोड़ देना चाहिए। बार-बार माफ़ी मांगना LoP के लिए बहुत ही शर्म की बात है। शायद इसीलिए पब्लिक भी राहुल की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से उसी समय निकाल रही।   

लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कोर्ट में मानहानि के मामले में माफी माँगी है। उन्होने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह का पनामा पेपर्स लीक मामले में नाम लिया था। इसके खिलाफ कार्तिकेय सिंह ने राहुल गाँधी के खिलाफ भोपाल की एमपी-एमएलए कोर्ट में मानहानि का केस दर्ज कराया था। इसमें उन्होंने कहा था कि उनकी प्रतिष्ठा धुमिल हुई है।

इस मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में हुई। इस दौरान राहुल गाँधी के वकील ने बुधवार (24 जून 2026) को कोर्ट में एक आवेदन दाखिल किया। इसमें उन्होंने अपने मानहानि वाले बयान पर खेद जताया है और कहा कि उनका बयान कार्तिकेय सिंह से जुड़ा नहीं था। अर्जी में हाईकोर्ट से राहुल गाँधी के खिलाफ चल रही मानहानि की कार्यवाही से राहत देने की माँग की गई है।

राहुल गाँधी के वकील ने कोर्ट में साफ किया कि यह बयान केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के परिवार के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह एक गलतफहमी थी। राहुल गाँधी के इस लिखित सफाई पर कोर्ट ने कार्तिकेय सिंह से लिखित में प्रतिक्रिया देने के लिए कहा है।

क्या है मामला

करीब 8 साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 के प्रचार के दौरान राहुल गाँधी ने झाबुआ में चुनावी रैली के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा था कि चौहान के शासनकाल में राज्य में ‘बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार’ हुआ था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान का नाम पनामा पेपर्स में आया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस पर कार्तिकेय शर्मा ने भोपाल के एमपी एमएलए कोर्ट में आपराधिक मानहानि की शिकायत की, जो सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई करती है।

राहुल गाँधी ने कहा था, “पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का नाम पनामा पेपर्स में आया था। पाकिस्तान जैसे देश में उन्हें जेल हुई। यहाँ, एक मुख्यमंत्री के बेटे का नाम पनामा पेपर्स में आता है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती।”

अब राहुल गाँधी अपने आरोपों पर सफाई देते हुए कहते हैं कि उन्हें ‘गलतफहमी’ हुई थी और उन्होंने पनामा पेपर्स लीक मामले में गलती से कार्तिकेय का नाम ले लिया था, जबकि असल में शिवराज सिंह चौहान ‘व्यापम और ई-टेंडर घोटालों में शामिल’ हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गाँधी ने कार्तिकेय को पनामा पेपर्स मामले से गलत तरीके से जोड़कर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया। शिकायत के बाद, ट्रायल कोर्ट ने राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का समन जारी किया था।

इसके जवाब में, राहुल गाँधी ने समन और मानहानि के मामले को रद्द कराने के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच का रुख किया। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल इस याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। बुधवार को जब मामला सुनवाई के लिए आया, तो याचिकाकर्ता पक्ष ने पहले के निर्देशानुसार निचली अदालत के रिकॉर्ड पेश किए। शिकायतकर्ता कार्तिकेय सिंह की ओर से वकील संकल्प कोचर पेश हुए।

हाई कोर्ट में दायर नई अर्जी में राहुल गाँधी ने उस बयान पर खेद व्यक्त किया है और स्पष्ट किया है कि उनका इरादा कार्तिकेय सिंह का जिक्र करने का नहीं था।

राहुल का झूठ देश को पंहुचा रहा नुकसान: बार-बार पोल खुलने के बावजूद झूठ बोलने से बाज नहीं आ रहे राहुल गांधी

यह भारत का दुर्भाग्य है कि ऐसा Leader of Opposition मिला है जो देश को लाभ पहुँचाने की बजाए नुकसान ज्यादा कर रहा है। गौतम अडानी के विरुद्ध बोलने से जो लाभ भारत को मिला था केन्या ने वह अनुबंध Leader of Opposition के आका चीन को दे दिया। वैसे भी राहुल गाँधी जब भी कोई बात बोलते हैं उसकी पोल खुलने से पहले देश को नुकसान हो चूका होता है। समझ में नहीं आता जनता ऐसे नेता को वोट देती ही क्यों है? राहुल और उनकी पार्टी बताए कि Leader of Opposition द्वारा बोली गयी किसी भी बात में दम हो? झूठ का पिटारा से ज्यादा कुछ नहीं। Leader of Opposition और INDI गठबंधन को देशभक्ति ईरान और इजराइल से सीखनी चाहिए जहाँ युद्ध के दौरान विपक्ष भी सरकार के साथ खड़ा है, लेकिन यहाँ दुश्मन देश की बोली बोल जनता को गुमराह किया जाता है। 

क्या कोई युद्ध के दौरान अपने सरकार से नुकसान होने की बात पूछता है लेकिन हमारा Leader of Opposition और INDI गठबंधन पूछता है जो दुश्मन देश की सुर्खियां बन जाती है। कसूर राहुल का नहीं राहुल के इशारे पर नाचने वाली पार्टियों का भी है।    

भारत और मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए विदेशी ताकतें तरह-तरह के नैरेटिव बनाती हैं। इनको आगे बढ़ाने का काम बिना किसी तथ्य के कांग्रेस के युवराज और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी करते हैं। नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीति अब तथ्यों, तर्कों और जिम्मेदारी से ज्यादा सनसनी, भ्रम और झूठे नैरेटिव पर टिकती दिख रही है। संसद से सड़क तक वे लगातार ऐसे झूठे आरोप उछालते रहते हैं, जिनका या तो बाद में खुद उनके ही दावों से खंडन हो गया, या फिर अदालत, सेना, चुनाव आयोग और सरकारी रिकॉर्ड ने उनकी बातों की धज्जियां उड़ा दीं। कभी सेना के “हाथ बांध देने” का आरोप लगाकर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, तो कभी चुनाव आयोग को “वोट चोरी” का औजार बताकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला किया गया। संसद में बोलने नहीं देने का रोना रोने वाले राहुल गांधी की पोल खुद लोकसभा के रिकॉर्ड ने खोल दी।

कई महत्वपूर्ण बहसों में राहुल ने स्वयं हिस्सा तक नहीं लिया। यह सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि झूठ को हथियार बनाकर देश में अविश्वास फैलाने की राजनीति है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राहुल गांधी के आरोप अक्सर अधूरी जानकारी, गलत तथ्यों और भावनात्मक उकसावे पर आधारित होते हैं। राफेल से लेकर अग्निवीर, EVM से लेकर विदेशी नेताओं की मुलाकातों तक, बार-बार उनके दावों की हवा निकलती रही, लेकिन झूठ का सिलसिला नहीं रुका। कभी सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी, तो कभी सेना और चुनाव आयोग को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। यदि नेता प्रतिपक्ष ही बिना प्रमाण के आरोपों की राजनीति करेगा, तो इससे सिर्फ उसकी विश्वसनीयता नहीं गिरेगी, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा भी कमजोर होगा। हिट और रन की पॉलिटिक्स कभी भी मेहनत और परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकती।दरअसल, राहुल हर हार, हर विवाद और हर असफलता का दोष किसी न किसी संस्था पर डालते हैं, लेकिन आत्ममंथन से लगातार बचते रहते हैं। 

अवलोकन करें:-

कांग्रेस द्वारा अडानी पर वार ने अपने आका चीन को पहुँचा सीधा फायदा: भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधी
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EVM को बताया ब्लैक बॉक्स और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल
राहुल गांधी ने 16 जून 2024 को एक्स पर लिखा, “भारत में ईवीएम एक ‘ब्लैक बॉक्स’ है. किसी को भी इनकी स्क्रूटनी करने की अनुमति नहीं है. हमारी चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं. जब संस्थाओं में जवाबदेही की कमी होती है, तो लोकतंत्र एक दिखावा बन जाता है और धोखाधड़ी की संभावना बढ़ जाती है.” हकीकत में हमारी चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और EVM प्रणाली का लोहा दुनिया मान चुकी है। भारत का चुनाव आयोग लगातार कहता रहा है कि EVM मशीनें सुरक्षित हैं और VVPAT प्रणाली के कारण मतदान का सत्यापन संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने भी EVM को पूरी तरह हटाने की मांग को स्वीकार नहीं किया। चुनाव आयोग ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में ईवीएम से चुनाव हिंसा रहित कराए हैं।

संसद में बोलने नहीं दिया जाता
राहुल गांधी ने 26 मार्च 2025 को आरोप लगाते हुए कहा कि संसद में विपक्ष की और उनकी आवाज दबाई जाती है और उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने का अवसर नहीं मिलता। उनके इस झूठ की पोल खोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने उनके सदन से अनुपस्थित रहने के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए पलटवार किया है कि विपक्ष केवल हंगामा करना चाहता है, सार्थक चर्चा नहीं। सरकार और भाजपा नेताओं का आरोप है कि राहुल गांधी खुद सदन में नियमों के तहत नहीं बोलते या चर्चा से भागते हैं।

रक्षा बजट घटाने का आरोप, जबकि 15 प्रतिशत बढ़ा
राहुल गांधी ने कई मौकों पर कहा कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर गंभीर नहीं है और रक्षा तैयारियों में कमियां हैं। 12 नवंबर 2021 को राहुल ने फिर कहा कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा से आपराधिक खिलवाड़ किया जा रहा है, क्योंकि मोदी सरकार के पास कोई स्ट्रैटेजी नहीं है । दूसरी ओर हकीकत यह है कि भारत का रक्षा बजट पिछले वर्षों में लगातार बढ़ा है और यह विश्व के सबसे बड़े रक्षा व्ययों में शामिल है। मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय के केंद्रीय बजट 2026-27 में 7.85 लाख करोड़ रुपये का सर्वकालिक उच्च आवंटन किया, जो वित्त वर्ष 2025-26 के बजटीय अनुमानों से 15 प्रतिशत अधिक है।

लद्दाख में चरागाह और जमीन खोने का आरोप
राहुल गांधी ने 20 अगस्त 2023 को झूठा आरोप लगाते हुए कहा कि लद्दाख के लोगों के चरागाह क्षेत्र चीन के नियंत्रण में चले गए हैं। हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। चीनी कब्जे की तरह यह आरोप भी बेदम ही निकला। राहुल ने आरोप लगाया था कि लद्दाख के कुछ स्थानीय प्रतिनिधियों और चरवाहों ने उनसे चराई क्षेत्रों तक पहुंच कम होने की शिकायत की है। वहीं सरकार ने स्पष्ट किया कि सीमा पर भारत की स्थिति बेहद मजबूत है और संप्रभुता से समझौता नहीं किया गया। ना ही लद्दाख में चरवारों को जमीन का नुकसान हुआ है।

हिंडनबर्ग रिपोर्ट को लेकर सरकार पर सवाल
राहुल गांधी ने 11 अगस्त 2024 को आरोप लगाते हुए कहा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद सरकार को अडानी मामले पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि आम जनता के धन की रक्षा करने वाली नियामक संस्था SEBI की सत्यनिष्ठा गंभीर रूप से प्रभावित और समझौता-युक्त हो चुकी है। हकीकत में उनका झूठ पकड़ा गया। हिंडनबर्ग एक शॉर्ट-सेलिंग रिसर्च फर्म है, जिसकी रिपोर्ट ने अडानी समूह पर गंभीर आरोप लगाए थे। अडानी समूह ने इन आरोपों को खारिज किया। मामला SEBI और न्यायिक निगरानी में जांच का विषय रहा। बाद में कोर्ट से भी अडानी की हिंडनबर्ग के आरोपों में क्लीन चिट मिल गई।

LIC और बैंकों का पैसा खतरे में, रिपोर्ट में पैसा सुरक्षित
राहुल गांधी ने 9 सितंबर 2020 को एक बार फिर से अपने आरोप में कहा कि अडानी समूह में निवेश के कारण LIC और सरकारी बैंकों का पैसा खतरे में है। लेकिन उनके इस झूठ की भी कलई जल्द ही खुल गई। लाइफ इन्योरेंस कारपोरेशन ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया कि उसका निवेश कुल निवेश पोर्टफोलियो का छोटा हिस्सा है और वह वित्तीय रूप से बेहद सुरक्षित है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भी अपने एक्सपोजर को सुरक्षित सीमा में बताया।