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बंगाल : ममता के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे Rahul, चुनाव से पहले इंडी गठबंधन टूटा


पश्चिम बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने वामपंथी दलों के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया है। इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। अब तक विपक्षी राजनीति में जो संभावित तालमेल दिखता था, वह अचानक बिखरता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस रणनीतिक फैसले से किसे लाभ होगा और किसे नुकसान? राहुल गांधी के इस कदम का कांग्रेस पार्टी को फायदा हो या ना हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस को जरूर नुकसान होने वाला है। क्योंकि कांग्रेस को जो भी वोट मिलेगा, वह तृणमूल कांग्रेस के हिस्से का होगा। ऐसे में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की एकला चलो की लड़ाई का फायदा बीजेपी को अगले विधानसभा चुनाव में मिलने जा रहा है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम सवाल ये है कि कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का दांव का क्या उसके लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा नहीं होगा? कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में जीरो सीट मिली थी। ऐसे में अगले चुनाव में जीरो से शुरुआत करने वाली कांग्रेस का बिना किसी राजनीतिक बैसाखी के अपना सफर तय कर पाएगी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी समीकरण फिर उफान पर

राज्य से तृणमूल कांग्रेस सरकार का कुशासन हटाने और बीजेपी का सुशासन लाने के लिए नौ अलग-अलग स्थानों कूचबिहार, कृष्णानगर, कुल्टी, गरबेटा, रैदिघी, इस्लामपुर, हसनाबाद, संदेशखाली और आमता से BJP की परिवर्तन यात्रा का शानदार आगाज हो गया है। यात्रा को मिले जनता-जनार्दन के अपार समर्थन ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को एक नए जोश से भर दिया है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक तीन और चार मार्च को ‘डोल यात्रा’ और 4 मार्च को ‘होली’ के कारण कहीं रैली का आयोजन नहीं होगा। परिवर्तन यात्रा इसके बाद पांच मार्च से फिर से शुरू होगी। यह पश्चिम बंगाल के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने के बाद पूरी होगी। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी ने राज्यव्यापी ‘परिवर्तन यात्रा’ की शुरुआत कर चुनावी रणभूमि को नई दिशा दे दी है। नौ दिशाओं से एक साथ यात्रा का आगाज को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं,  बल्कि एक व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। यह पहल बीजेपी के लिए संगठनात्मक ऊर्जा, राजनीतिक संदेश और चुनावी रणनीति तीनों का संगम बनती दिखाई दे रही है।

कांग्रेस की बड़ी चुनौती खोए जनाधार को पुनर्जीवित करना
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शून्य सीटों पर सिमटना पड़ा था। यह परिणाम केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का संकेत भी था। ऐसे में, शून्य से शुरुआत करने वाली पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने खोए हुए जनाधार को पुनर्जीवित करना है। बिना मजबूत गठबंधन के मैदान में उतरना, कुछ विश्लेषकों के अनुसार, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कदम भी साबित हो सकता है। क्योंकि फिलहाल तो पार्टी मतदाताओं को ठोस विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करती नजर नहीं आती। ऐसे में कांग्रेस का वामपंथी दलों से अलग होकर चुनावी मैदान में उतरना बेहत चुनौतीपूर्ण निर्णय है। यह तर्क भी अपने आप में ही दिलचस्प है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी और पश्चिम बंगाल में राज करने के बाद भी अब स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस को किसी सहारे के साथ नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए लड़ना पड़ रहा है। “एकला चलो” की यह रणनीति जितनी चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं ज्याद जोखिम भरी भी है। आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि “एकला चलो” की रणनीति कांग्रेस के लिए कितनी आत्मघाती साबित होती है। इतना निश्चित है कि बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले से अधिक रोचक और प्रतिस्पर्धी हो चुका है।

तृणमूल कांग्रेस बनान कांग्रेस का असर ममता बनर्जी पर
कांग्रेस के अलग रास्ता चुनने से सबसे अधिक असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को मिलने वाला हर अतिरिक्त वोट कहीं न कहीं तृणमूल के संभावित समर्थन आधार से कटेगा। बंगाल में विपक्षी वोटों का बिखराव पहले भी निर्णायक साबित हुआ है। यदि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक विशेषकर कुछ क्षेत्रों में अल्पसंख्यक और पारंपरिक समर्थकों को वापस खींचने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर तृणमूल की सीटों पर पड़ सकता है। बंगाल की राजनीति में केवल वोट प्रतिशत नहीं, बल्कि उसका वितरण अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में 5–10 प्रतिशत वोट भी जुटा लेती है, तो वह परिणामों को प्रभावित कर सकती है। भले ही उसे सीटें न मिलें, पर उसका वोट शेयर बीजेपी की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार तय कर सकता है। यही कारण है कि गठबंधन टूटने को केवल कांग्रेस का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे चुनावी परिदृश्य में संभावित बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

कांग्रेस और टीएमसी के “एकला चलो” से बीजेपी को लाभ
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच “एकला चलो” की प्रतिस्पर्धा का लाभ भाजपा को मिल सकता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्य में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच माना जा रहा है। यदि विपक्षी वोटों में विभाजन होता है, तो भाजपा को कई सीटों पर सीधे लाभ की संभावना बन सकती है। बहुकोणीय मुकाबले में अक्सर वह दल आगे निकल जाता है, जिसका कोर वोट बैंक अपेक्षाकृत स्थिर और संगठित हो। भाजपा ने बूथ लेवल पर अपना कोर वोटर बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को पुनर्जीवित करने की है। बिना मजबूत बूथ स्तर की संरचना के, केवल राजनीतिक संदेश के सहारे चुनावी सफलता हासिल करना कठिन होता है। कांग्रेस को पहले अपने पुराने कार्यकर्ताओं को पुनः सक्रिय करना होगा और युवाओं को जोड़ने की कवायद करनी होगी। क्योंकि आज की राजनीति के दौर में महिला और युवा वर्ग पूरी तरह से बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है।

केरल में अलग समीकरण, बंगाल में पड़ेगा बहुत गहरा असर
हालाँकि केरल और बंगाल दोनों राज्यों में गठबंधन टूटने की खबर है, लेकिन दोनों जगह राजनीतिक समीकरण भिन्न हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी हैं और सत्ता का सीधा मुकाबला करते रहे हैं। वहीं बंगाल में परिस्थिति अधिक जटिल है, जहाँ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख शक्ति है और भाजपा मुख्य चुनौती के रूप में उभरी है। ऐसे में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना बंगाल में अधिक जोखिमपूर्ण माना जा रहा है। गठबंधन टूटने के बाद तृणमूल कांग्रेस को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका परंपरागत वोट बैंक खिसके नहीं। साथ ही, भाजपा की चुनौती से निपटने के लिए उसे अपने संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करना होगा। कांग्रेस और वाम दलों की मौजूदगी से कई सीटों पर बहु-कोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है, जो चुनावी गणित के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जाएगा।

नौ दिशाओं से एक संदेश: सत्ता परिवर्तन की तूफानी तैयारी
राज्य के नौ अलग-अलग हिस्सों से एक साथ शुरुआत करने का निर्णय प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों है। इससे भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका अभियान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे बंगाल की आकांक्षाओं को समेटने का प्रयास है। उत्तर से दक्षिण और ग्रामीण से शहरी इलाकों तक समानांतर रैलियाँ संगठन की व्यापकता और चुनावी गंभीरता को रेखांकित करती हैं। यात्रा में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी इसे और अहम बनाया है। प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित कोलकाता रैली, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति से यह स्पष्ट है कि पार्टी बंगाल को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर भाजपा ने खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। अब वह उसी आधार को विधानसभा चुनाव में व्यापक समर्थन में बदलने जा रही है। चुनावी अभियान को सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों के साथ संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है। इसी के चलते दो दिन के विराम के बाद पांच मार्च से रैलियों का पुनः आरंभ कर अभियान को और तेज गति दी जाएगी।

मतदाता सूची संशोधन में 63 लाख फर्जी नाम हटने का मिलेगा फायदा
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद संशोधित मतदाता सूची के प्रकाशन के तुरंत बाद यात्रा का आरंभ होना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। लगभग 63 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाता संरचना में बदलाव आया है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने समर्थन आधार को पुनर्गठित करने में जुटे हैं। भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह नए मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करे। राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए युवा और महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा रोजगार, स्टार्टअप, कौशल विकास और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस को तुष्टिकरण और बढ़ते महिला अपराध और भ्रष्टाचार के आरोपरों से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में दोनों दलों के बीच यह प्रतिस्पर्धा चुनावी दंगल को और रोचक बनाएगी।

INDI गठबंधन में तकरार, राहुल के खिलाफ मणिशंकर अय्यर बने स्टालिन के समर्थक, ममता-लालू पहले ही विरोधी

एक कहावत है जहां जहां पैर पड़े अभागे के वहां वहां बंटाधार और यह गाँधी परिवार पर सटीक बैठ रहा है। जब से परिवार गुलामों ने सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने तत्कालीन अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था कांग्रेस बैसाखियों के सहारे सरकार बनाती रही। और 2014 के बाद से तो सत्ता के लिए इस तरह तड़प रही है जिस तरह पानी से बाहर मछली। और उस तड़पन में सोनिया के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी-अमित और बीजेपी का विरोध करते करते देश विरोध करने लगे हैं। जो देशहित में नहीं और जनता को वोट देते समय कांग्रेस और इसको समर्थन देने वाले INDI गठबंधन से दूरी बनानी होगी।   
पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी राजनीति के भीतर दबे हुए अंतर्विरोध सतह पर आने लगे हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बना INDI गठबंधन अब नेतृत्व के सवाल पर उलझता दिखाई दे रहा है। यह केवल पद का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि “सत्ता से पहले सहमति।” लेकिन आज जो दृश्य उभर रहा है, वह इस कहावत को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। विपक्षी INDI गठबंधन अब अपने ही नेतृत्व के प्रश्न पर उलझता नजर आ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को ही इंडिया गठबंधन के संयोजक के लिए राहुल गांधी के बजाए एम.के स्टालिन ज्यादा उपयुक्त नजर आते हैं। लालू यादव ने भी इंडी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अपना वोट राहुल गांधी के बजाए ममता बनर्जी को दिया है। ममता बनर्जी की खुद की भी चाहत संयोजक बनने की है, लेकिन उनकी राह में रोड़ा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बना हुए हैं। और खुद राहुल गांधी कांग्रेस की ही डूबती नैया को नहीं बचा पा रहे हैं। ऐसे में पद को लेकर उठती आवाजें, पुराने नेताओं की असहमति, और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं, ये सब मिलकर उस अंतर्विरोध को उजागर कर रहे हैं जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया है। लेकिन आंतरिक विरोध के इस गुब्बारे की हवा पश्चिम बंगाल के चुनाव में निकल सकती है।

अब इंडिया गठबंधन का ‘कप्तान’ बदलने का वक्त आ गया
दरअसल, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चौतरफा मुसीबतों में घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गांधी पर अमेरिकी उद्योगपति जॊर्ज सोरोस के साथ कनेक्शन का बड़ा खुलासा हुआ है, तो दूसरी ओर इंडिया ब्लॊक के अंदर से ही राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बगावत जैसे हालात पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर जांच पहले से ही चल रही है। इंडिया ब्लॊक की पांच प्रमुख पार्टियों ने गठबंधन की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने का समर्थन कर कांग्रेस खासकर, राहुल गांधी के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना मुश्किल होगा। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल दिया है। दावा यही है कि अब इंडिया गठबंधन का कप्तान बदलने का वक्त आ गया है। राहुल गांधी की कैप्टेंसी में इंडिया गठबंधन के लिए लगातार मजबूत हो रही भाजपा को हराना असंभव होगा।

पांच प्रमुख दलों ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठाए सवाल
लोकसभा चुनाव में टीम एनडीए का स्कोर कार्ड 293 रहा, जो स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा है। एनडीए के कप्तान नरेन्द्र मोदी ने अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। वहीं, टीम इंडिया गठबंधन का स्कोर 235 ही रहा। लगातार तीसरी हार के बाद अब विपक्षी टीम की कैप्टेंसी को लेकर नई जंग छिड़ गई है। टीएमसी की मांग है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस का स्कोर कार्ड ऐसा है कि अब टीम इंडिया का कप्तान बदलना होगा। मतलब टीम इंडिया में कैप्टन की कुर्सी को लेकर अंदरूनी झगड़ा शुरू हो गया है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बाद पांच प्रमुख दल राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व से कोई खास उम्मीद नहीं की जा रही। क्योंकि इस राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया हुआ है।

राहुल की भूमिका पर अय्यर की असहमति ने हलचल मचाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही चुनाव ना जितवा पा रहे हैं, लेकिन लंबे समय से विपक्ष का प्रमुख चेहरा है। भारत जोड़ो यात्रा और संसद में नारेबाजी और नंगे प्रदर्शन से कांग्रेसी चाहे बदनाम हुए, लेकिन सुर्खियों में आए। लेकिन गठबंधन राजनीति का गणित केवल जनसभाओं और नारों से तय नहीं होता। चुनावी साल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है क्या नेतृत्व पर सहयोगी दलों की सहमति है? इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा राहुल की भूमिका को लेकर व्यक्त की गई असहमति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को लेकर शंकाएं सामने आती हैं, तो विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। चुनावी रणनीति में “धारणा” ही सबसे बड़ा हथियार होती है, और फिलहाल धारणा यह बन रही है कि विपक्ष अभी भी अपने चेहरे को लेकर आश्वस्त नहीं है।

राहुल गांधी में न “पीएम मटेरियल” और न ही संयोजक के योग्य

बिहार की राजनीति के दिग्गज लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दिए हैं। ममता बनर्जी स्वयं भी संयोजक पद को लेकर खुली दावेदारी के संकेत दे चुकी हैं। बंगाल में चुनावी समीकरणों को देखते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। उनके लिए यह केवल गठबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राष्ट्रीय पहचान का विस्तार है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भाजपा चुनावी मोड में पूरी ताकत से उतर चुकी है। एक मार्च से भाजपा की पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर परिवर्तन यात्रा शुरू होने जा रही है। बीजेपी ने इस मतभेद को तुरंत मुद्दा बनाया है। उसका तर्क सीधा और आक्रामक है कि जब कांग्रेस के अपने वरिष्ठ नेता ही राहुल गांधी को “पीएम मटेरियल” या संयोजक के योग्य नहीं मानते, तो देश क्यों माने? भाजपा की रणनीति विपक्ष की आंतरिक असहमति को “अस्थिरता” के प्रतीक के रूप में पेश करने की है।

लालू-ममता को भी नहीं भा रहा है राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगें—जैसे मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक असहमति जताना तो यह संकेत मात्र व्यक्तिगत मतभेद का नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन जाता है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष सवाल उठा चुके हैं और ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दे चुके हैं। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संभावित संयोजक के रूप में उभर रहा है। यह परिदृश्य बताता है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर एकमतता नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं कि कौन अधिक सक्षम है, बल्कि यह है कि क्या गठबंधन किसी स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है? यदि संयोजक पद को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और व्यक्तिगत समीकरण निर्णायक बनेंगे, तो क्या यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अस्थिर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाएगा?

लोकसभा चुनाव में दोस्ती और विधानसभा चुनावों में परस्पर दुश्मन

इंडिया गठबंधन की मूल अवधारणा भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की थी। लेकिन क्या केवल “विरोध” ही पर्याप्त है? किसी भी गठबंधन को टिकाऊ बनाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम, स्पष्ट नेतृत्व संरचना और आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है। लेकिन गठबंधन के दलों में ना तो आपसी विश्वास है और ना ही नैतिकता। क्योंकि गठबंधन के यही दल लोकसभा चुनाव में एकजुट होने की कस्मे खाते हैं और विधानसभा के चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जनता इनकी चालें खूब देख रही है। यहां तक कि अब तो संयोजक के नाम पर ही मतभेद सार्वजनिक हो गया है। वह भी किसी अन्य दल की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से ही एक वरिष्ठ नेता के माध्यम से आया है। इससे साफ संदेश जाता है कि सत्ता से पहले ही इंडिया गठबंधन में असहमति चरम पर है।

 स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का चाहते हैं विस्तार

दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का विस्तार देख रहे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। ऐसे में कांग्रेस का “स्वाभाविक नेतृत्व” दावा चुनौती में बदल जाता है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों को बराबरी का स्पेस देने को तैयार है? या वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी होने के अंध-विश्वास में नेतृत्व को अपना अधिकार मानती है? राहुल गांधी के सामने भी चुनौती है। उन्हें केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के नेताओं का भी विश्वास जीतना होगा। गठबंधन राजनीति में व्यक्तिगत छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण सामूहिक स्वीकार्यता होती है। यदि सहयोगी दलों को लगे कि नेतृत्व एकतरफा है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए संतुलन साधना आसान नहीं
दक्षिण भारत से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संयोजक के रूप में चर्चा में है। स्टालिन अपेक्षाकृत कम विवादित नेता माने जाते हैं। यदि उनका नाम आगे बढ़ता है, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष नेतृत्व को कांग्रेस-केंद्रित ढांचे से बाहर निकालना चाहता है। लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए असहज हो सकता है—क्या वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नेतृत्व साझा करने को तैयार है? दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने दुविधा है। यदि वह नेतृत्व पर अड़ती है, तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं। यदि वह पीछे हटती है, तो उसके कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका खो रही है। चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। चुनावी साल में मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा गठबंधन आंतरिक रूप से कितना स्थिर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी ऐसे ही जारी रहती है, तो विपक्ष का संदेश बिखरा हुआ प्रतीत होगा।
विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा होने के दम भरने वाले राहुल गांधी के दिन क्या अब लदने वाले हैं? क्या इंडिया गठबंधन का चेहरा राहुल गांधी के बजाए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनने जा रही हैं? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, लेकिन ये अब शीशे की तरह साफ हो गया है कि इंडी ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी को लेकर खटपट का समंदर लहरा रहा है। इंडिया गठबंधन के ज्यादातर खिलाड़ी कैप्टन बदलने के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की मांग है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का कैप्टन बनाया जाए। ममता बनर्जी की दावेदारी के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह खेमों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। वैसे यदि दिमाग पर थोड़ा-सा जोर डालें तो याद आएगा कि पीएम मोदी ने तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इंडी गठबंधन के दल सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए जुड़े हैं। चुनाव होने के बाद गठबंधन के दल आपस में टकराने लग जाएंगे। वही अब हो रहा है। केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली है। 
चुनाव हार रहे राहुल गांधी इंडी गठबंधन को आगे कैसे ले जा सकते हैं
टीएमसी के सांसद कीर्ति आजाद ने कुछ समय पहले यह बयान दिया था कि अब इंडिया ब्लॊक की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए। क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खुद बुरी तरह हार का सामना कर रही है। ऐसे में वह इंडिया गठबंधन को आगे लेकर कैसे जा सकती है। अपने सांसद के इस बयान पर पहली प्रतिक्रिया ममता बनर्जी ने ही दी। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सभी दल राजी हों तो वे ‘इंडिया’ की कमान संभालने को तैयार हैं। इसके बाद तो ममता बनर्जी को समर्थन की झड़ी सी लग गई। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, शिवसेना (उद्धव) और अब लालू यादव ने भी मांग कर दी कि इंडिया ब्लॊक की कमान ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए।
अब गठबंधन के कई घटक दल राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं
इंडिया गठबंधन में चल रही उठापटक के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से चुप्पी साध ली गई है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के सत्र में गौतम अडानी का अपना वही पुराना मुद्दा उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर टीएमसी और समाजवादी पार्टी का उसे समर्थन ना मिलने से समझा जा सकता है कि इंडिया के कई प्रमुख घटक दल राहुल गांधी को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इंडिया ब्लॊक के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी को इंडिया का नेतृत्व सौंपने की मांग कर एक प्रकार से कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। पटना में पत्रकारों ने जब लालू यादव से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी को दे देना चाहिए, हम सहमत हैं।” कांग्रेस की आपत्ति से जुड़े सवाल पर लालू ने कहा, “कांग्रेस के आपत्ति जताने से कुछ नहीं होगा। ममता बनर्जी को नेतृत्व दे देना चाहिए।”
ममता का नाम आगे करने के बयानों से सियासी पारा चढ़ा
भले ही कहने को कांग्रेस की ओर से इंडिया ब्लॊक की कमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संभाल रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल मानते हैं कि इंडिया की कमान अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में ही है। मल्लिकार्जुन तो कठपुतली मात्र हैं। कांग्रेस की ओर से मुख्य चेहरा राहुल गांधी ही हैं। ऐसे में इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों का निशाना सीधे-सीधे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही है। सहयोगी दलों ने एक प्रकार से राहुल गांधी के प्रति बगावत कर उनके प्रति अविश्वास व्यक्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व देने के लेकर कई दलों के बयान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। अब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेता इस बयानबाजी में शामिल हो गए हैं। इंडी गठबंधन के नेतृत्व पर लालू-शरद-उद्धव आदि नेताओं का साथ मिलने ममता बनर्जी फूली नहीं समा रही हैं। लालू यादव, शरद पवार से लेकर संजय राउत ने भी ममता बनर्जी को प्रमुख भूमिका देने की बात कही है। इस बीच ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व में बदलाव की चर्चाओं पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने इस पद के लिए उनका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को धन्यवाद दिया है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने भी ममता बनर्जी को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार बताया।

राहुल का ‘किताब कांड’ पड़ा उल्टा: क्या आंच शशि थरूर तक पहुंचेगी? पब्लिशर के बयान ने खोली पोल, अब FIR के फंदे में फंसी कांग्रेस, हिली राहुल की चूलें!


बर्बाद करने को एक ही उल्लू काफी है यहाँ INDI गठबंधन में उल्लुओं की कोई कमी नहीं अन्जामें इनकी मतमारी सियासत का क्या होगा? जनता को कब तक पागल बनाते रहेंगे ये महामूर्ख गैंग? CAA विरोध से लेकर अब 
पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ पर किए बबाल ने कांग्रेस समेत पूरे INDI गठबंधन को चारों खाने चित कर दिया। आखिर कौन पागल इन महामूर्खों को ऐसी सलाह दे रहा है? दरअसल भारत विरोधी विदेशी आकाओं के इशारों पर नाचने वाले INDI गठबंधन में देश में बढ़ती सोने और चांदी की कीमतें एवं महंगाई आदि समस्याओं पर सरकार को घेरने की बजाए उन मुद्दों से संसद का समय बर्बाद कर करदाताओं के धन को भी बर्बाद कर रहे हैं। आने वाले चुनावों में जनता को इन बिकाऊ पार्टियों का बहिष्कार कर इनको इनकी औकात दिखानी चाहिए।  
 

दिल्ली की सियासत में इन दिनों एक किताब ने ऐसा बवाल मचाया है कि कांग्रेस और लोकसभा मे विपक्ष के नेता राहुल गांधी खुद सवालों के घेरे में आ गए हैं। मामला है पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ का, जिसे लेकर संसद से लेकर सोशल मीडिया तक हंगामा मचा हुआ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में इस किताब के कुछ हिस्सों का हवाला देकर सरकार पर हमला करने की कोशिश की। मगर यहीं पर खेल उल्टा पड़ गया।

दूसरे, क्या इस किताब से लगी आंच शशि थरूर तक भी पहुंचेगी? किताब कांड से दो दिन पहले ही थरूर की मल्लिकार्जुन खड़के और राहुल के साथ होती है। फिर सोशल मीडिया पर चर्चा है कि किताब का प्रेफरस शशि ने लिखा है, इसमें कितनी सच्चाई है, पुष्टि नहीं, यह जाँच में ही सामने आएगा।    

राजनीति में कहावत है- आधी-अधूरी जानकारी सेहत के लिए हानिकारक होती है, लेकिन कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के लिए यह सिर्फ सेहत नहीं, बल्कि कानूनी मुसीबत का सबब बनती दिख रही है। दरअसल में संसद में जिस किताब को ‘ब्रह्मास्त्र’ बनाकर राहुल गांधी सरकार पर वार कर रहे थे, अब उसी किताब के पब्लिशर ने उनके दावों की हवा निकाल दी है। पब्लिशर ने साफ कह दिया- किताब छपी ही नहीं है। पब्लिशर पेंगुइन रैंडम हाउस ने आधिकारिक बयान जारी कर सबको चौंका दिया है। पेंगुइन ने साफ कहा कि किताब न तो अभी पब्लिश हुई है, न ही इसकी कोई कॉपी (डिजिटल या प्रिंट) जनता के लिए जारी की गई है।

कंपनी ने यह भी कहा कि अगर कोई कॉपी कहीं घूम रही है, तो वह सीधा-सीधा कॉपीराइट का उल्लंघन है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर पब्लिशर ने किताब छापी ही नहीं, तो राहुल गांधी सदन में क्या लहरा रहे थे? क्या राहुल गांधी के पास किताब की कोई गैर-कानूनी कॉपी है? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में पहले ही कहा था कि किताब अभी पब्लिश नहीं हुई है, जिसे राहुल ने ‘झूठ’ करार दिया था। लेकिन अब पब्लिशर की सफाई ने राहुल गांधी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।

अब मामला सिर्फ राजनीतिक तू-तू मैं-मैं तक सीमित नहीं रहा। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस मामले में FIR दर्ज कर ली है। जांच इस बात की हो रही है कि जो किताब अभी रक्षा मंत्रालय के रिव्यू में है और पब्लिश नहीं हुई, उसकी ‘टाइपसेट पीडीएफ’ इंटरनेट पर कैसे पहुंची? अगर राहुल गांधी उसी लीक कॉपी का इस्तेमाल कर रहे थे, तो उन पर कॉपीराइट एक्ट और आईटी एक्ट के तहत गाज गिर सकती है।

साफ है कि कांग्रेस जिस नैरेटिव के जरिए सरकार को घेरना चाहती थी, वह अब उसके अपने ही गले की फांस बन गया है। अब सोशल मीडिया पर तो जैसे मीम्स और आलोचनाओं की बाढ़ आ गई है। लोग राहुल गांधी को ट्रोल कर रहे हैं, तो कई लोग पूछ रहे हैं कि संसद को सर्कस क्यों बनाया गया? यूजर्स पूछ रहे हैं कि क्या राहुल गांधी ने देश की सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी वाली किताब को गैर-कानूनी तरीके से हासिल किया? कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि उन पर ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ लगना चाहिए। कुछ लोग इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे घटिया विपक्ष का सबसे घिनौना चेहरा बता रहे हैं। आप भी देखिए लोग सोशल मीडिया पर किस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं…


जिस किताब से राहुल गाँधी फैला रहे ‘चीनी प्रोपेगेंडा’, वह अब तक किसी भी फॉर्मेट में नहीं छपी: पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने दिया स्पष्टीकरण, सार्वजनिक कॉपियों पर कानूनी कार्रवाई की दी चेतावनी; पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे खामोश क्यों?

पब्लिशर 'पेंगुइन' ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब पर स्पष्टीकरण देते हुए बयान जारी किया (फोटो साभार: IndiaToday/X)
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की जिस ‘फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी’ किताब को संसद में दिखाया, वह अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। यह स्पष्ट तौर पर किताब की पब्लिकेशन कंपनी ‘पेंगुइन रेंडम हाउस इंडिया’ ने आधिकारिक तौर पर दी है। इस मामले में दिल्ली पुलिस भी FIR दर्ज कर चुकी है।

पब्लिशर ने यह भी कहा कि न ही सिर्फ किताब, बल्कि अब तक किताब की कोई भी कॉपी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। पब्लिशर ने कहा कि जो भी कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, वह गैर-कानूनी है। यह बयान सोशल मीडिया पर किताब के कुछ अंशों की वैधता पर सवाल उठाने जाने के बाद सामने आया है। इसी के चलते पिछले हफ्ते संसद में खूब हंगामा भी हुआ था।

ऐसे में सवाल यह भी होता है कि नरवणे की जो किताब प्रकशित ही नहीं हुई, उस पर हो रहे विवाद और राहुल द्वारा उस किताब को लोकसभा में दिखाने पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की चुप्पी क्यों? बल्कि विवाद शुरू होते ही सबसे पहले इन्ही को FIR करवानी चाहिए थी। क्या इस साज़िश में नरवणे भी शामिल हैं? रक्षा मंत्रालय को पूर्व सेनाध्यक्ष से प्रश्न करना चाहिए।

      

पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने किताब के स्टेटस की दी जानकारी

किताब के पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने बयान जारी कर कहा, “हाल में इस पुस्तक को लेकर सार्वजनिक चर्चा और मीडिया रिपोर्टिंग सामने आई है। इस संबंध में पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया यह स्पष्ट करना चाहता है कि ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’, जो भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा है, उसके प्रकाशन के सभी अधिकार केवल पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के पास हैं।”

                                     ‘पेंगुइन’ द्वारा जारी किया गया बयान (फोटो साभार: X)

पब्लिशर ने बयान में आगे कहा, हम साफ तौर पर यह बताना चाहते हैं कि यह पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया की ओर से इस किताब की कोई भी प्रति- चाहे वह प्रिंट हो या डिजिटल, न तो छापी गई है, न वितरित की गई है और न ही बिक्री या किसी अन्य रूप में सार्वजनिक की गई है।

पब्लिशर ‘पेंगुइन’ कानूनी कार्रवाई करेगा

विवाद पर पब्लिशर ने कहा, “अगर इस पुस्तर की कोई प्रति, पूरी या आंशिक रूप में, प्रिंट, डिजिटल, PDF या किसी अन्य फॉर्मेट में, ऑनलाइन या ऑफलाइन, किसी भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है, तो वह पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के कॉपीराइन का उल्लंघन है। ऐसे सभी फॉर्मेट को तुरंत बंद किया जाना चाहिए।”

                                   ‘पेंगुइन’ द्वारा जारी किया गया बयान (फोटो साभार: X)

पब्लिशर ने इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने की बात भी कही। उन्होंने कहा, “पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया इस पुस्तर के अवैध और अनाधिकृत प्रसार के खिलाफ कानून के तहत उपलब्ध सभी कानूनी कदम उठाएगा।” पब्लिशर ने स्पष्ट किया कि यह बयान प्रकाशक की स्थिति को बताने और रिकॉर्ड पर रखने के लिए जारी किया गया है।

क्या राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस बन गई है ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया गैंग? प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।


लगातार चुनावों में हार झेल रही कांग्रेस सत्ता के लिए ऐसे तरप रही है जैसे बिना पानी के मछली। और चुनावों में मिल रही हार की जिम्मेदार है सोनिया परिवार। चर्चा यह है कि राहुल की उद्दंता पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आंखें मिचने के पीछे भी बहुत राजनीति है। वह यह कि राहुल जितना ऊलजलूल बोलेगा कांग्रेस को उतना ही नुकसान होगा। जबसे राहुल सक्रीय हुए है कांग्रेस 100 का अंक भी पार सकी। विपरीत इसके इसका जनाधार भी कम होने लगा है। वह दिन भी दूर नहीं जब कांग्रेस की स्थिति क्षेत्रीय दलों से भी बदतर होने वाली है।  

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपनी विचारधारा को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। राजनीति में विरोध लाजमी है, लेकिन क्या विरोध के नाम पर देश को अस्थिर करना सही है? दरअसल में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन में जो खुलासा किया है वह चौंकाने वाला है। बुधवार, 4 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण टाले जाने के पीछे की वजह बताते हुए बिरला ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री के साथ ‘मिसहैप’ (कोई अप्रिय घटना) करने की फिराक में थे। स्पीकर ने खुद अपनी आंखों से सांसदों को पीएम की कुर्सी की तरफ हिंसक तरीके से बढ़ते देखा, जिसके बाद उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से पीएम को सदन में न आने की सलाह दी।

क्या कांग्रेस का एजेंडा अब विदेशों से तय हो रहा है? क्या राहुल के इशारे पर प्रधानमंत्री को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है?

इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक ही चर्चा है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अब ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया अड्डा बन चुकी है? राहुल गांधी के हालिया बयानों और कांग्रेस की नई रणनीतियों ने जनता के मन में यह खौफ पैदा कर दिया है कि क्या सत्ता की लालच में देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है?

प्रमाण

इस ट्वीट में साफ दिख रहा है कि कैसे कांग्रेस का नैरेटिव देश विरोधी ताकतों से मेल खा रहा है। प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।

 संस्थानों पर हमला: नक्सलियों जैसी रणनीति?

अर्बन नक्सल का पहला काम होता है देश की संवैधानिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा उठाना। राहुल गांधी आज वही कर रहे हैं। कभी चुनाव आयोग, कभी सुप्रीम कोर्ट, तो कभी भारतीय सेना पर सवाल उठाकर वह सिस्टम को पंगु बनाना चाहते हैं। यह वही अराजकता की थ्योरी है, जो नक्सली जंगलों में इस्तेमाल करते हैं और अर्बन नक्सल शहरों में। जानकारों का कहना है कि जब एक राष्ट्रीय नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत की छवि खराब करता है, तो वह सीधे तौर पर उसी नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देता है।
राहुल गांधी की ‘बांटो और राज करो’ वाली नीति का असली चेहरा यहां बेनकाब हो रहा है। महिला सांसदों को ढाल बनाकर पीएम पर हमला करने की कोशिश? क्या कांग्रेस अब प्रोफेशनल नक्सलियों की तरह ट्रेनिंग ले रही है?
विदेशी फंडिंग और बाहरी मदद का शक
डिजिटल मीडिया पर यह बहस छिड़ी है कि राहुल गांधी के सुर अचानक विदेशों में जाकर क्यों बदल जाते हैं? क्या भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने के लिए किसी ‘इंटरनेशनल टूलकिट’ का इस्तेमाल हो रहा है? अडानी-हिंडनबर्ग जैसे मुद्दों पर देश में आग लगाने की कोशिश करना, इसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है।
‘मोहब्बत की दुकान’ में ‘नफरत का सामान’?
जनता अब जागरूक हो चुकी है। राहुल गांधी जिसे ‘मोहब्बत की दुकान’ कहते हैं, आलोचक उसे ‘अर्बन नक्सलवाद का शोरूम’ बता रहे हैं। जाति के नाम पर समाज को तोड़ना और माओवादी भाषा का इस्तेमाल करना सीधे तौर पर देश की अखंडता के लिए खतरा है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो पार्टियों की नहीं, बल्कि भारत की एकता बनाम ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग की है।

Rahul Gandhi के नेतृत्व और ‘वोट चोरी’ से कतरा रहे हैं सहयोगी दल


कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लगातार उठाया जा रहा ‘वोट चोरी’ का मुद्दा अब उनके लिए ही बोझ बनता जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का स्पष्ट रूप से यह कहना कि “वोट चोरी मुद्दे का INDI गठबंधन से कोई लेना-देना नहीं”, सीधे-सीधे राहुल गांधी को अलग-थलग करता है। यह बयान बताता है कि राहुल गांधी का नैरेटिव ना तो गठबंधन की साझा रणनीति है और न ही सहयोगी दलों की प्राथमिकता। बिहार में करारी हार, उमर अब्दुल्ला की दूरी, महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में कांग्रेस की अनिश्चित भूमिका और ममता बनर्जी की चुप्पी ये सभी संकेत एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि INDIA गठबंधन ना केवल कमजोर हो रहा है, बल्कि राहुल गांधी उसके केंद्र से धीरे-धीरे बाहर धकेले जा रहे हैं। जब किसी गठबंधन के प्रमुख चेहरे ही सार्वजनिक रूप से दूरी बना लें तो नेतृत्व की विश्वसनीयता स्वतः कमजोर हो जाती है। यही हाल रहे तो पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से पहले ही यह गठबंधन केवल चुनावी अंकगणित तक सिमट जाएगा।

INDI गठबंधन पर उमर का साफ संदेश,‘वोट चोरी’ मुद्दा नहीं

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस द्वारा उठाए जा रहे ‘वोट चोरी’ के मुद्दे से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा कि विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA का वोट चोरी अभियान से कोई लेना देना नहीं है। क्योंकि गठबंधन में कभी भी इस मुद्दे पर कोई आम सहमति नहीं बनी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का यह विस्फोटक बयान ऐसे समय में आया है, जबकि एक दिन पहले ही कांग्रेस ने दिल्ली में ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ रैली निकाली थी। जब उमर अब्दुल्ला से कांग्रेस के ‘वोट चोरी’ और कथित चुनावी अनियमितताओं के आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “INDIA गठबंधन का इससे कोई लेना-देना नहीं है। हर राजनीतिक दल को अपना एजेंडा तय करने की आजादी है। कांग्रेस ने ‘वोट चोरी’ और एसआईआर (मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण) को अपना मुख्य मुद्दा बनाया है, लेकिन हम इसके पक्ष में नहीं है।

उमर अब्दुल्ला के बयान से गठबंधन के अंदर खलबली

नेशनल कॉन्फ्रेंस INDI गठबंधन की एक अहम घटक पार्टी है। लोकसभा में विपक्षी सांसदों की संख्या के लिहाज से कांग्रेस इस गठबंधन की अहम पार्टी है। इसके बावजूद उमर अब्दुल्ला का यह बयान साफ संकेत देता है कि INDI गठबंधन के भीतर सभी दल हर मुद्दे पर एक जैसी रणनीति नहीं अपना रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि उसने ‘वोट चोरी’ के खिलाफ देशभर में अभियान चलाया है और विपक्षी दल उसके साथ हैं। लेकिन उमर की स्वीकारोक्ति ने कांग्रेस और राहुल गांधी के वोट चोरी कैंपेन की पोल खोलकर रख दी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के इस बयान से इंडिया गठबंधन के अंदर खलबली मच गई है। गठबंधन के सहयोगी दल ही आमने-सामने आ गए हैं। इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टी आरजेडी नेता मनोज झा इस मुद्दे पर उमर के खिलाफ बयानबाजी पर उतर आए हैं। यह अलग बात है कि बिहार में आरजेडी को हराने में कांग्रेस की भी अहम भूमिका रही थी। मनोज झा ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया में कहा है कि नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला बार-बार विवादों में घिर रहे हैं, और हमें जवाब देना पड़ रहा है।’ झा को कहना पड़ा कि ‘जब हम वोटिंग में धांधली और चुनाव आयोग की बात करते हैं, तो सभी दलों को एक साथ आना चाहिए। क्योंकि यह मुद्दा सभी के लिए बहुत अहम हो जाता है।

 बिहार की हार राहुल गांधी के नेतृत्व की स्वीकार्यता पर उठता सवाल

बिहार में कांग्रेस की करारी पराजय ने सिर्फ एक राज्य की सियासत नहीं बदली, बल्कि INDIA गठबंधन के भविष्य पर ही बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह हार संगठनात्मक कमजोरी से कहीं अधिक राहुल गांधी के नेतृत्व की स्वीकार्यता पर उठता सवाल है। जिस कांग्रेस को गठबंधन का वैचारिक स्तंभ बताया जा रहा था, वही बिहार में न तो भरोसा जगा सकी और न ही निर्णायक भूमिका निभा पाई। नतीजा यह हुआ कि हार के बाद राहुल गांधी पार्टी के भीतर और गठबंधन के बाहर, दोनों जगह घिरते चले गए।
राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ एकाकी नैरेटिव, बिखरने लगे दल
INDIA गठबंधन को भाजपा के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट दिखाई दे रही है। यह गठबंधन साझा कार्यक्रम से ज्यादा साझा मजबूरी का परिणाम बनता जा रहा है। हर दल अपनी क्षेत्रीय राजनीति में उलझा है और राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर कोई स्पष्ट सहमति नहीं दिखती। राहुल गांधी को स्वाभाविक नेता मानने की धारणा अब केवल कांग्रेस तक सीमित रह गई है। उमर अब्दुल्ला का बयान केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की उस सोच को दर्शाता है, जहां राहुल गांधी की राजनीति को अब निर्णायक नहीं माना जा रहा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दल, जो कभी कांग्रेस के स्वाभाविक सहयोगी रहे हैं, अब अपने हितों को पहले रख रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि INDIA गठबंधन के भीतर नेतृत्व का केंद्र बिखर चुका है।
BMC चुनाव, ठाकरे भाई और कांग्रेस की हाशिए की भूमिका
महाराष्ट्र की राजनीति में आने वाले BMC चुनाव INDIA गठबंधन की कमजोरी को और उजागर कर रहे हैं। शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता संजय राउत का यह कहना कि “कांग्रेस BMC चुनाव में हमारे साथ होगी या नहीं, इस पर संदेह है।” राउत का बयान गठबंधन की जमीनी हकीकत बयान कर देता है। मुंबई जैसे देश के सबसे बड़े नगर निगम में अगर गठबंधन दल साथ नहीं उतर पाते, तो राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का दावा खोखला प्रतीत होता है। संजय राउत का यह संकेत कि इस हफ्ते ठाकरे भाइयों की ओर से BMC चुनाव को लेकर औपचारिक घोषणा हो सकती है, कांग्रेस के लिए और भी असहज स्थिति पैदा करता है। यदि ठाकरे गुट कांग्रेस के बिना ही आगे बढ़ता है, तो यह साफ हो जाएगा कि क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस को अनिवार्य सहयोगी नहीं मानते। यह वही कांग्रेस है जो खुद को विपक्ष की धुरी बताती रही है।
ममता बनर्जी ने कभी राहुल के नेतृत्व को खुलकर स्वीकार किया
INDIA गठबंधन को कमजोर करने वाले सबसे अहम कारकों में ममता बनर्जी की भूमिका भी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने ना तो राहुल गांधी के नेतृत्व को खुलकर स्वीकार किया और ना ही कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने में रुचि दिखाई है। कई मौकों पर ममता बनर्जी ने संकेत दिए हैं कि कांग्रेस की कमजोरी भाजपा से लड़ाई को कठिन बनाती है। यहां तक कि ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन का नेतृत्व राहुल गांधी से छीनकर उन्हें देने के भी संकेत दिए। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इसका राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी का समर्थन किया था। ममता बनर्जी की यह चुप्पी और दूरी राहुल गांधी के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में उनकी क्या भूमिका रहने वाली है।

राष्ट्रीय एकता यानि जातिगत घिनौनी सियासत का नंगा नाच; अब ‘सन ऑफ मल्लाह’ ने महागठबंधन में फंसाया महापेच! आधी रात को तेजस्वी-मुकेश की मुलाकात के बाद VIP नाराज

जब भी चुनाव होते हैं सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष सभी मुस्लिम और जातियों के मकड़जाल में उल्छे नज़र आते बड़ी-बड़ी बातें करते हैं राष्ट्रीय एकता का। लगता है किसी भी पार्टी को secularism की ABC तक नहीं आती, अगर आती होगी तो जाति के नाम पर जनता को पागल नहीं बनाया जाता। इस कटु सच्चाई को कुर्सी की भूखी पार्टियों और जनता को भी समझना होगा। रेवड़ियां बांट जनता को पागल बनाया जा रहा है। जब जातिगत घिनौनी सियासत करनी है फिर किसी की जाति से बुलाने पर कानून क्यों?   
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर खींचतान खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी 25 सीटों की मांग पर अड़े हैं, जबकि RJD ने केवल 14 सीटों का ऑफर दिया है। इस ऑफर के साथ तेजस्वी यादव के साथ देर रात हुई मुलाकात के बाद मुकेश सहनी सख्त नाराज हैं। रात दो बजे के बाद जब मुकेश सहनी बैठक से निकले, तो उनके चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी। सहनी ने मीडिया से कोई बात तक नहीं की और सीधे अपने आवास लौट गए। तब से लेकर अब तक उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सहनी अब अपनी पार्टी की अगली रणनीति बना रहे हैं। यदि महागठबंधन से बातचीत पटरी पर नहीं बैठी तो वे अपनी पार्टी के 40 उम्मीदवारों को विधानसभा में उतारने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मुकेश सहनी इस बार अपनी राजनीतिक हैसियत दिखाने के मूड में हैं। उनका कहना है कि सहनी का मल्लाह और निषाद समाज की राजनीति में वोट बैंक है और सहनी उसी को लेकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।

हमारे जनाधार और मेहनत का सम्मान होना चाहिए-सहनी
मुकेश सहनी और तेजस्वी यादव के बीच देर रात राजधानी पटना में एक अहम बैठक हुई। तेजस्वी यादव के आवास पर करीब 2 बजे रात तक दोनों नेताओं के बीच बातचीत चली। बताया जा रहा है कि बैठक का माहौल शुरुआत में सकारात्मक था, लेकिन सीट शेयरिंग पर चर्चा आते ही टकराव बढ़ गया। तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखने की बात कहते हुए वीआईपी को 14 सीटें देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन मुकेश सहनी ने साफ कहा कि ‘हमारे जनाधार और मेहनत का सम्मान होना चाहिए, 25 से कम सीट पर VIP चुनाव नहीं लड़ेगी।’ इसके अलावा सहनी ने सरकार बनने के बाद उसमें डिप्टी सीएम पद की भी डिमांड की। बताते हैं कि तीन डिप्टी सीएम के फार्मूले में सहनी को सैट किया जा सकता है, इस पर तेजस्वी ने स्वीकृति दी, लेकिन ज्यादा सीटें देने पर उन्होंने मना कर दिया।

अब ‘सन ऑफ मल्लाह’ सहनी बना रहे नई रणनीति
विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख और ‘सन ऑफ मल्लाह’ के नाम से मशहूर मुकेश सहनी इसके बाद अब खुलकर अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक मुकेश सहनी किसी भी हालत में 25 सीटों से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने उन्हें सिर्फ 14 सीटों का ऑफर दिया है। रात दो बजे के बाद जब मुकेश सहनी बैठक से निकले, तो उनके चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी। सहनी ने मीडिया से कोई बात नहीं की और सीधे अपने आवास लौट गए. तब से लेकर अब तक उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सहनी अब इस पर मन बना रहे हैं कि यदि तेजस्वी यादव ने उन्हें महागठबंधन में 25 सीटें नहीं दीं, तो वे अपनी पार्टी के 40 उम्मीदवारों को सियासी मैदान में उतारेंगे।

महागठबंधन की बैठक टली, RJD की आपात मीटिंग
महागठबंधन की एक अहम बैठक प्रस्तावित थी, जिसमें सीट शेयरिंग पर अंतिम सहमति बनने की उम्मीद थी। लेकिन VIP की नाराज़गी के चलते यह बैठक फिलहाल टाल दी गई है। अब RJD ने अपनी आपात बैठक बुलाई है, जिसमें तेजस्वी यादव पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ आगे की रणनीति तय करेंगे। मुकेश सहनी की नाराजगी महागठबंधन के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई है। पहले भी वे NDA और महागठबंधन के बीच पाला बदल चुके हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने महागठबंधन छोड़कर NDA के साथ तालमेल किया था, लेकिन बाद में फिर विपक्षी खेमे के करीब आ गए। महागठबंधन के नेताओं को यह भी चिंता सता रही है कि यदि सहनी फिर एनडीए के पाले में जाते हैं तो उनका पूरा खेल बिगड़ सकता है।

VIP का बिफरना गठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव से निराश होकर मुकेश सहनी इस बार अपनी राजनीतिक हैसियत दिखाने के पूरे-पूरे मूड में हैं। उनका कहना है कि मल्लाह और निषाद समाज में उनकी भारी पैठ है। बिहार की सियासत में निषाद और मल्लाह भी एक बड़ा वोट बैंक है और सहनी उन्हीं को लेकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। VIP के रुख से महागठबंधन के अन्य घटक दलों में भी असमंजस की स्थिति है। कांग्रेस और वाम दल पहले ही अपने हिस्से को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। अब VIP का बिफरना गठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘सन ऑफ मल्लाह’ अपने लिए मनचाही सीटें हासिल करते हैं या एक बार फिर ‘VIP’ पार्टी की किस्मत की नाव किसी नए किनारे लगती है।

महागठबंधन पर दबाव बनाने की सहनी की रणनीति
हालांकि मुकेश सहनी के इस रुख को महागठबंधन पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि सहनी अपनी दो प्रमुख मांगों पर अड़े हुए थे, जिसके कारण सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा अटकी हुई है।
1. 25 सीटों की मांग: वीआईपी प्रमुख महागठबंधन में अपने कोटे के लिए 25 विधानसभा सीटों की मांग पर मजबूती से खड़े थे, जिसे RJD और अन्य सहयोगियों द्वारा अत्यधिक माना जा रहा था।
2. उपमुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी: सहनी की दूसरी बड़ी जिद यह थी कि उन्हें महागठबंधन की ओर से उपमुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया जाए।
सूत्रों का कहना है कि उप मुख्यमंत्री पद पर तो महागठबंधन में सहमति बन सकती है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर मामला अटका हुआ है। नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाने के बावजूद भी सीट बंटवारे की घोषणा न होने से महागठबंधन में पहले से ही तनाव था, और अब मुकेश सहनी का ‘नॉट रिचेबल’ हो जाना गठबंधन की एकता के लिए बड़ा झटका है। क्योंकि सीटों पर देरी से उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार पर बुरा असर पड़ रहा है।

लालू और तेजस्वी पर आंखे तरेरने लगी है कांग्रेस

उधर कांग्रेस भी महागठबंधन की कमजोर कड़ी होने के बावजूद लालू-तेजस्वी पर आंखे तरेर रही है। आलाकमान की शह पर कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव को भी भाव नहीं दे रहे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना पहुंच चुके हैं। लेकिन उन्होंने जानबूझकर लालू और तेजस्वी से मुलाकात नहीं की। इससे महागठबंधन पर महा-संकट आने के आसार नजर आने लगे हैं। यदि दो-तीन दिन में सियासी पेच ना सुलझा तो दरार और बढ़ सकती है। दूसरी ओर पहली बार चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर भी विवादों में घिर गए हैं। उनकी जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ही पीके पर पैसे लेकर सीटें बांटने के आरोप लगाए हैं। ऐन चुनाव से पहले ऐसी पोल खुलने के बीच मानहानि मामले में नोटिस ने पीके की टेंशन और बढ़ा दी है।

राहुल के पीछे लग तेजस्वी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी
दरअसल, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा के दौरान अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली थी। इस यात्रा में राहुल गांधी 17 दिनों तक बिहार में रहे। तेजस्वी ने ही राहुल को लीड करने का मौका दिया और वे पहली बार राहुल गांधी के पीछे-पीछे घूमे। तेजस्वी ने यात्रा में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इससे बिहार में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस की कुछ सांसें चलने लगीं। राहुल गांधी को गुमान हो गया कि यह सब उनकी वजह से है। इसलिए इसके बाद से कांग्रेस अब आरजेडी को आंखे दिखाने लगी है। तेजस्वी के सीएम फेस पर भी एतराज जताने के बाद अब कांग्रेस ने सीट बंटवारा के लिए राजद को अल्टीमेट तक दे दिया है। यदि दो-तीन दिन में दोनों दलों में सहमति नहीं बनी तो कांग्रेस अपनी पहली सूची जारी कर सकती है। कांग्रेस ने पहले 15 उम्मीदवारों की सूची बना ली है। यदि कांग्रेस आम सहमति के पहले लिस्ट जारी कर देती है तो महागठबंधन पर महा-संकट के बादल छा सकते हैं।

कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू-तेजस्वी को नहीं दे रहे भाव
कांग्रेस ने भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटें जीतकर सबसे कमजोर प्रदर्शन किया हो। इसके बावजूद वह अगले माह होने वाले चुनाव के लिए राजद की आंख में आंख मिला कर बात कर रही है। यही वजह है कि कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव और तेजस्वी को भी भाव नहीं दे रहे। हाइकमान के आदेश पर अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना आए। लेकिन उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी से मुलाकात करने की जरूरत ही नहीं समझी। भूपेश बघेल ने तो सीधे-सीधे तेजस्वी यादव को चुनौती ही दे डाली। उन्होंने कहा, तेजस्वी खुद को अपनी ओर से सीएम फेस बता रहे हैं, लेकिन सीएम का चेहरा उनकी पार्टी का हाईकमान घटक दलों की सहमति से तय करेगा।

महागठबंधन उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से चुनाव पर असर
चुनाव के लिए पहले चरण के नामांकन की शुरुआत 10 अक्टूबर से हो चुकी है। लेकिन 10 अक्टूबर तक महागठबंधन का सीट बंटवारा फाइनल नहीं हो सका है। संभावित प्रत्याशियों में इसको लेकर रोष है कि पिछली बार उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से तैयारी का समय नहीं मिला था। पहले चरण के चुनाव के नामांकन की अंतिम तारीख से एक दिन पहले प्रत्याशियों के नाम घोषित किये गये। कांग्रेस ने आंतरिक गुटबाजी और संभावित असंतोष से निपटने के लिए यह देरी की थी। लेकिन इस कोशिश में उम्मीदवारों को हड़बड़ी में आधी अधूरी तैयारी के साथ चुनाव में उतरना पड़ा। टिकट को लेकर भी असंतोष था। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता केके तिवारी ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कर टिकट वितरण में धांधली का आरोप लगाया था। उन्होंने चुनाव प्रबंधन से जुड़े नेताओं की जांच कराये जाने की मांग की थी।

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क्या भारत में नेपाल-बांग्लादेश की तरह उपद्रव करने का जाल बिछाया जा रहा है?  

राहुल गाँधी अपने चाचा संजय गाँधी की राह चल कह रहे हैं कि "जो बोल दिया वही ठीक है", लेकिन बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं कि उस समय देश में आपातकाल था और प्रधानमंत्री उसकी माँ इंदिरा गाँधी थी, लेकिन आज सरकार किसी इंदिरा गाँधी की नहीं मोदी की सरकार है। आखिर झूठे आरोपों का शोर मचाकर राहुल गाँधी क्या जहर फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैं? अगर राहुल के आरोपों में दम है तो लिखित में चुनाव आयोग को क्यों नहीं देते? राहुल को मालूम है कि जिस दिन लिख कर दे दिया कांग्रेस समर्थक वकीलों की भीड़ और कोई कोर्ट राहुल को जेल जाने से नहीं रोक सकता। दूसरे, अगर जिस तरह अपने ट्विटर पर Gen Z का जिक्र कर जिस ओर इशारा किया है, अगर उपद्रव हुआ तो राहुल को इस बात को भी ध्यान रखना होगा कि INDI गठबंधन में शामिल कोई पार्टी संभावित उपद्रव में शामिल नहीं होगी। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि INDI गठबंधन में शामिल पार्टियां भी उपद्रव होने की स्थिति में कांग्रेस के खिलाफ सरकार के साथ खड़ा होने पर गंभीरता से विचार कर रही है। 
साभार सोशल मीडिया 
                                                                  साभार सोशल मीडिया 
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एक बार फिर देश की संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। 18 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक के अलंद विधानसभा क्षेत्र में 6018 वोटर डिलीट किए गए, और यह कार्य सॉफ्टवेयर के जरिए ऑटोमेटेड प्रक्रिया में किया गया, जिसमें कांग्रेस समर्थकों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ही उनके बयानों में बार-बार विरोधाभास सामने आए, जिससे उनकी बातों की गंभीरता और सच्चाई दोनों पर सवाल उठने लगे हैं।

जनता को गुमराह करने की राजनीति?
राहुल गांधी के इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो यह साफ झलकता है कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है जिसमें तथ्यों की जगह भावनाओं का सहारा लिया गया, संस्थाओं को बदनाम किया गया और वोटबैंक को भड़काने का प्रयास किया गया। साफ है कि जब एक राष्ट्रीय नेता बार-बार बिना सबूत के संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करता है, तो वह न केवल लोकतंत्र की नींव को हिला रहा होता है, बल्कि जनता के भरोसे के साथ भी खिलवाड़ कर रहा होता है।

पहले दावा, फिर पलटी: राहुल गांधी के विरोधाभासी बयान
प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में राहुल गांधी ने कहा कि 6018 वोट डिलीट किए गए हैं, लेकिन थोड़ी ही देर में उन्होंने यह भी कहा कि “हमें यह नहीं पता कि अलंद में कुल कितने वोट हटाए गए।” ऐसे परस्पर विरोधी बयानों ने एक बार फिर यह साबित किया कि राहुल गांधी बिना तथ्यात्मक आधार के सनसनीखेज बयान देने के आदी हो चुके हैं।

कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार, तो जिम्मेदार कौन?
यह बात भी हैरान करने वाली है कि राहुल गांधी जिस अलंद क्षेत्र में वोटर लिस्ट से नाम हटाने की बात कर रहे हैं, वह कर्नाटक राज्य में है, जहां कांग्रेस की सरकार है। यानी जिन पर वह आरोप लगा रहे हैं, वे उनकी अपनी पार्टी की सरकार की जिम्मेदारी में आते हैं।

राहुल गांधी के आरोपों पर सबसे करारा जवाब खुद कांग्रेस सरकार में मंत्री केएन राजन्ना ने दिया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि मतदाता सूची में अनियमितताओं को दूर करने में कांग्रेस विफल रही। मतदाता सूची में संशोधन उस समय हुआ जब हमारी ही सरकार सत्ता में थी। ऐसे में यह हमारी जिम्मेदारी है कि हमने इस पर समय रहते ध्यान क्यों नहीं दिया? इस बयान के लिए राजन्ना को मंत्री पद से हटा दिया गया।

इस स्वीकारोक्ति से साफ है कि अगर कोई गड़बड़ी हुई भी है, तो वह कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे, और शायद उसकी निष्क्रियता की वजह से हुई। ऐसे में कांग्रेस एक तरह से खुद पर आरोप लगा रही है।

वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने का काम करता है BLO
राहुल गांधी के आरोपों की सच्चाई को और भी कमजोर करता है वह तथ्य जो हर जागरूक नागरिक जानता है कि वोटर लिस्ट से नाम जोड़ने या हटाने का कार्य Booth Level Officer (BLO) द्वारा किया जाता है। BLO आमतौर पर स्थानीय लोग होते हैं, जो राजनीतिक दलों से जुड़े होते हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के कारण तो वहां के BLO पार्टी पदाधिकारियों के काफी करीबी भी होंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर 6018 वोट गलत तरीके से हटाए गए, तो कांग्रेस ने उसी वक्त अपने स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं की? कांग्रेस ने अपने स्तर पर ब्लॉक या जिला प्रशासन से इसकी तत्काल जांच क्यों नहीं करवाई? चुनाव आयोग या अदालत में सबूतों के साथ शिकायत क्यों नहीं की गई?

आपको एक और बात जानने की है कि 2023 में ही अलंद विधानसभा में नाम काटने की खबर सामने आने के तुरंत बाद चुनाव आयोग ने ही FIR दर्ज कराई थी। इतना ही नहीं चुनाव आयोग ने मोबाइल नंबर और आईपी एड्रेस भी उपलब्ध करा दिए थे।

सवाल ये है कि इतना सब करने के बाद भी कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार और उसकी CID ने अब तक क्या किया?

हाइड्रोजन बम की धमकी निकली सियासी स्टंट?
प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले कई दिनों से राहुल गांधी द्वारा जिस ‘हाइड्रोजन बम’ की बात की जा रही थी, वह मंच पर पहुंचते ही निराशा में बदल गई। राहुल ने कहा कि यह हाइड्रोजन बम नहीं है, असली तो अभी आना बाकी है। ध्यान देने वाली बात है कि राहुल गांधी ने 1 सितंबर को पटना में ‘वोट अधिकार यात्रा’ के समापन पर पहली बार ‘हाइड्रोजन बम’ शब्द का इस्तेमाल किया था। फिर रायबरेली में भी उन्होंने यह दोहराया था। लेकिन जब सबकी निगाहें इस तथाकथित बड़े खुलासे पर टिकी थीं, तब उन्होंने खुद ही अपनी बात को कमजोर कर दिया। क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा था, जिसका उद्देश्य मीडिया की सुर्खियां बटोरना भर था?

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने ऐसे दावे पहले भी किए हैं- राफेल डील, ‘चौकीदार चोर है’, ईवीएम पर सवाल- जो बाद में पूरी तरह से फुस्स साबित हुए। और अब ‘हाइड्रोजन बम’ का यह नया बयान भी उसी श्रेणी में जाता दिख रहा है।

संवैधानिक संस्थाओं पर बार-बार हमला, लोकतंत्र पर चोट
राहुल गांधी का यह व्यवहार नया नहीं है। इससे पहले भी उन्होंने चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं पर सवाल उठाए हैं। ये वही संस्थाएं हैं जो लोकतंत्र की रीढ़ हैं और सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती हैं। चौंकाने वाली बात यह रही कि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं है, यह भारत की संस्थाओं का काम है।

जब एक वरिष्ठ सांसद, जो लोकसभा में विपक्ष का नेता भी हो, यह मानता है कि लोकतंत्र को बचाना उसकी जिम्मेदारी नहीं है, तो सवाल उठता है कि फिर बार-बार संस्थाओं पर आरोप क्यों क्या यह रणनीति जानबूझकर देश में अराजकता फैलाने और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने की है?