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INDI गठबंधन में तकरार, राहुल के खिलाफ मणिशंकर अय्यर बने स्टालिन के समर्थक, ममता-लालू पहले ही विरोधी

एक कहावत है जहां जहां पैर पड़े अभागे के वहां वहां बंटाधार और यह गाँधी परिवार पर सटीक बैठ रहा है। जब से परिवार गुलामों ने सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने तत्कालीन अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था कांग्रेस बैसाखियों के सहारे सरकार बनाती रही। और 2014 के बाद से तो सत्ता के लिए इस तरह तड़प रही है जिस तरह पानी से बाहर मछली। और उस तड़पन में सोनिया के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी-अमित और बीजेपी का विरोध करते करते देश विरोध करने लगे हैं। जो देशहित में नहीं और जनता को वोट देते समय कांग्रेस और इसको समर्थन देने वाले INDI गठबंधन से दूरी बनानी होगी।   
पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी राजनीति के भीतर दबे हुए अंतर्विरोध सतह पर आने लगे हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बना INDI गठबंधन अब नेतृत्व के सवाल पर उलझता दिखाई दे रहा है। यह केवल पद का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि “सत्ता से पहले सहमति।” लेकिन आज जो दृश्य उभर रहा है, वह इस कहावत को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। विपक्षी INDI गठबंधन अब अपने ही नेतृत्व के प्रश्न पर उलझता नजर आ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को ही इंडिया गठबंधन के संयोजक के लिए राहुल गांधी के बजाए एम.के स्टालिन ज्यादा उपयुक्त नजर आते हैं। लालू यादव ने भी इंडी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अपना वोट राहुल गांधी के बजाए ममता बनर्जी को दिया है। ममता बनर्जी की खुद की भी चाहत संयोजक बनने की है, लेकिन उनकी राह में रोड़ा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बना हुए हैं। और खुद राहुल गांधी कांग्रेस की ही डूबती नैया को नहीं बचा पा रहे हैं। ऐसे में पद को लेकर उठती आवाजें, पुराने नेताओं की असहमति, और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं, ये सब मिलकर उस अंतर्विरोध को उजागर कर रहे हैं जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया है। लेकिन आंतरिक विरोध के इस गुब्बारे की हवा पश्चिम बंगाल के चुनाव में निकल सकती है।

अब इंडिया गठबंधन का ‘कप्तान’ बदलने का वक्त आ गया
दरअसल, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चौतरफा मुसीबतों में घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गांधी पर अमेरिकी उद्योगपति जॊर्ज सोरोस के साथ कनेक्शन का बड़ा खुलासा हुआ है, तो दूसरी ओर इंडिया ब्लॊक के अंदर से ही राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बगावत जैसे हालात पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर जांच पहले से ही चल रही है। इंडिया ब्लॊक की पांच प्रमुख पार्टियों ने गठबंधन की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने का समर्थन कर कांग्रेस खासकर, राहुल गांधी के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना मुश्किल होगा। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल दिया है। दावा यही है कि अब इंडिया गठबंधन का कप्तान बदलने का वक्त आ गया है। राहुल गांधी की कैप्टेंसी में इंडिया गठबंधन के लिए लगातार मजबूत हो रही भाजपा को हराना असंभव होगा।

पांच प्रमुख दलों ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठाए सवाल
लोकसभा चुनाव में टीम एनडीए का स्कोर कार्ड 293 रहा, जो स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा है। एनडीए के कप्तान नरेन्द्र मोदी ने अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। वहीं, टीम इंडिया गठबंधन का स्कोर 235 ही रहा। लगातार तीसरी हार के बाद अब विपक्षी टीम की कैप्टेंसी को लेकर नई जंग छिड़ गई है। टीएमसी की मांग है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस का स्कोर कार्ड ऐसा है कि अब टीम इंडिया का कप्तान बदलना होगा। मतलब टीम इंडिया में कैप्टन की कुर्सी को लेकर अंदरूनी झगड़ा शुरू हो गया है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बाद पांच प्रमुख दल राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व से कोई खास उम्मीद नहीं की जा रही। क्योंकि इस राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया हुआ है।

राहुल की भूमिका पर अय्यर की असहमति ने हलचल मचाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही चुनाव ना जितवा पा रहे हैं, लेकिन लंबे समय से विपक्ष का प्रमुख चेहरा है। भारत जोड़ो यात्रा और संसद में नारेबाजी और नंगे प्रदर्शन से कांग्रेसी चाहे बदनाम हुए, लेकिन सुर्खियों में आए। लेकिन गठबंधन राजनीति का गणित केवल जनसभाओं और नारों से तय नहीं होता। चुनावी साल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है क्या नेतृत्व पर सहयोगी दलों की सहमति है? इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा राहुल की भूमिका को लेकर व्यक्त की गई असहमति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को लेकर शंकाएं सामने आती हैं, तो विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। चुनावी रणनीति में “धारणा” ही सबसे बड़ा हथियार होती है, और फिलहाल धारणा यह बन रही है कि विपक्ष अभी भी अपने चेहरे को लेकर आश्वस्त नहीं है।

राहुल गांधी में न “पीएम मटेरियल” और न ही संयोजक के योग्य

बिहार की राजनीति के दिग्गज लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दिए हैं। ममता बनर्जी स्वयं भी संयोजक पद को लेकर खुली दावेदारी के संकेत दे चुकी हैं। बंगाल में चुनावी समीकरणों को देखते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। उनके लिए यह केवल गठबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राष्ट्रीय पहचान का विस्तार है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भाजपा चुनावी मोड में पूरी ताकत से उतर चुकी है। एक मार्च से भाजपा की पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर परिवर्तन यात्रा शुरू होने जा रही है। बीजेपी ने इस मतभेद को तुरंत मुद्दा बनाया है। उसका तर्क सीधा और आक्रामक है कि जब कांग्रेस के अपने वरिष्ठ नेता ही राहुल गांधी को “पीएम मटेरियल” या संयोजक के योग्य नहीं मानते, तो देश क्यों माने? भाजपा की रणनीति विपक्ष की आंतरिक असहमति को “अस्थिरता” के प्रतीक के रूप में पेश करने की है।

लालू-ममता को भी नहीं भा रहा है राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगें—जैसे मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक असहमति जताना तो यह संकेत मात्र व्यक्तिगत मतभेद का नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन जाता है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष सवाल उठा चुके हैं और ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दे चुके हैं। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संभावित संयोजक के रूप में उभर रहा है। यह परिदृश्य बताता है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर एकमतता नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं कि कौन अधिक सक्षम है, बल्कि यह है कि क्या गठबंधन किसी स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है? यदि संयोजक पद को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और व्यक्तिगत समीकरण निर्णायक बनेंगे, तो क्या यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अस्थिर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाएगा?

लोकसभा चुनाव में दोस्ती और विधानसभा चुनावों में परस्पर दुश्मन

इंडिया गठबंधन की मूल अवधारणा भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की थी। लेकिन क्या केवल “विरोध” ही पर्याप्त है? किसी भी गठबंधन को टिकाऊ बनाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम, स्पष्ट नेतृत्व संरचना और आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है। लेकिन गठबंधन के दलों में ना तो आपसी विश्वास है और ना ही नैतिकता। क्योंकि गठबंधन के यही दल लोकसभा चुनाव में एकजुट होने की कस्मे खाते हैं और विधानसभा के चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जनता इनकी चालें खूब देख रही है। यहां तक कि अब तो संयोजक के नाम पर ही मतभेद सार्वजनिक हो गया है। वह भी किसी अन्य दल की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से ही एक वरिष्ठ नेता के माध्यम से आया है। इससे साफ संदेश जाता है कि सत्ता से पहले ही इंडिया गठबंधन में असहमति चरम पर है।

 स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का चाहते हैं विस्तार

दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का विस्तार देख रहे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। ऐसे में कांग्रेस का “स्वाभाविक नेतृत्व” दावा चुनौती में बदल जाता है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों को बराबरी का स्पेस देने को तैयार है? या वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी होने के अंध-विश्वास में नेतृत्व को अपना अधिकार मानती है? राहुल गांधी के सामने भी चुनौती है। उन्हें केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के नेताओं का भी विश्वास जीतना होगा। गठबंधन राजनीति में व्यक्तिगत छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण सामूहिक स्वीकार्यता होती है। यदि सहयोगी दलों को लगे कि नेतृत्व एकतरफा है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए संतुलन साधना आसान नहीं
दक्षिण भारत से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संयोजक के रूप में चर्चा में है। स्टालिन अपेक्षाकृत कम विवादित नेता माने जाते हैं। यदि उनका नाम आगे बढ़ता है, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष नेतृत्व को कांग्रेस-केंद्रित ढांचे से बाहर निकालना चाहता है। लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए असहज हो सकता है—क्या वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नेतृत्व साझा करने को तैयार है? दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने दुविधा है। यदि वह नेतृत्व पर अड़ती है, तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं। यदि वह पीछे हटती है, तो उसके कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका खो रही है। चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। चुनावी साल में मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा गठबंधन आंतरिक रूप से कितना स्थिर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी ऐसे ही जारी रहती है, तो विपक्ष का संदेश बिखरा हुआ प्रतीत होगा।
विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा होने के दम भरने वाले राहुल गांधी के दिन क्या अब लदने वाले हैं? क्या इंडिया गठबंधन का चेहरा राहुल गांधी के बजाए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनने जा रही हैं? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, लेकिन ये अब शीशे की तरह साफ हो गया है कि इंडी ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी को लेकर खटपट का समंदर लहरा रहा है। इंडिया गठबंधन के ज्यादातर खिलाड़ी कैप्टन बदलने के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की मांग है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का कैप्टन बनाया जाए। ममता बनर्जी की दावेदारी के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह खेमों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। वैसे यदि दिमाग पर थोड़ा-सा जोर डालें तो याद आएगा कि पीएम मोदी ने तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इंडी गठबंधन के दल सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए जुड़े हैं। चुनाव होने के बाद गठबंधन के दल आपस में टकराने लग जाएंगे। वही अब हो रहा है। केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली है। 
चुनाव हार रहे राहुल गांधी इंडी गठबंधन को आगे कैसे ले जा सकते हैं
टीएमसी के सांसद कीर्ति आजाद ने कुछ समय पहले यह बयान दिया था कि अब इंडिया ब्लॊक की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए। क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खुद बुरी तरह हार का सामना कर रही है। ऐसे में वह इंडिया गठबंधन को आगे लेकर कैसे जा सकती है। अपने सांसद के इस बयान पर पहली प्रतिक्रिया ममता बनर्जी ने ही दी। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सभी दल राजी हों तो वे ‘इंडिया’ की कमान संभालने को तैयार हैं। इसके बाद तो ममता बनर्जी को समर्थन की झड़ी सी लग गई। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, शिवसेना (उद्धव) और अब लालू यादव ने भी मांग कर दी कि इंडिया ब्लॊक की कमान ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए।
अब गठबंधन के कई घटक दल राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं
इंडिया गठबंधन में चल रही उठापटक के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से चुप्पी साध ली गई है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के सत्र में गौतम अडानी का अपना वही पुराना मुद्दा उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर टीएमसी और समाजवादी पार्टी का उसे समर्थन ना मिलने से समझा जा सकता है कि इंडिया के कई प्रमुख घटक दल राहुल गांधी को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इंडिया ब्लॊक के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी को इंडिया का नेतृत्व सौंपने की मांग कर एक प्रकार से कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। पटना में पत्रकारों ने जब लालू यादव से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी को दे देना चाहिए, हम सहमत हैं।” कांग्रेस की आपत्ति से जुड़े सवाल पर लालू ने कहा, “कांग्रेस के आपत्ति जताने से कुछ नहीं होगा। ममता बनर्जी को नेतृत्व दे देना चाहिए।”
ममता का नाम आगे करने के बयानों से सियासी पारा चढ़ा
भले ही कहने को कांग्रेस की ओर से इंडिया ब्लॊक की कमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संभाल रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल मानते हैं कि इंडिया की कमान अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में ही है। मल्लिकार्जुन तो कठपुतली मात्र हैं। कांग्रेस की ओर से मुख्य चेहरा राहुल गांधी ही हैं। ऐसे में इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों का निशाना सीधे-सीधे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही है। सहयोगी दलों ने एक प्रकार से राहुल गांधी के प्रति बगावत कर उनके प्रति अविश्वास व्यक्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व देने के लेकर कई दलों के बयान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। अब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेता इस बयानबाजी में शामिल हो गए हैं। इंडी गठबंधन के नेतृत्व पर लालू-शरद-उद्धव आदि नेताओं का साथ मिलने ममता बनर्जी फूली नहीं समा रही हैं। लालू यादव, शरद पवार से लेकर संजय राउत ने भी ममता बनर्जी को प्रमुख भूमिका देने की बात कही है। इस बीच ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व में बदलाव की चर्चाओं पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने इस पद के लिए उनका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को धन्यवाद दिया है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने भी ममता बनर्जी को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार बताया।

क्या इसी रमीज के कारण पिता लालू यादव को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य ने छोड़ा परिवार?

        पिता लालू यादव के साथ रोहिणी आचार्य (बाएँ) और तेजस्वी यादव के साथ रमीज बताया जा रहा शख्स (दाएँ)
बिहार चुनाव से दो पार्टियों-RJD और कांग्रेस- में बगावत हो गयी। सत्ता के गलियारों में यह भी चर्चा है कि INDI गठबंधन से भी कांग्रेस को अलग करने की मंत्रणा चल रही है। लोगों का कहना है कि जिस कांग्रेस के सहारे हम जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे थे वही हमारे कंधे पर अपने आपको बचा रही है और पुरानी पार्टी मान गले लगाते रहे। आज की सियासत में कम्युनिस्ट, कांग्रेस और केजरीवाल पार्टी तीनों डूबते जहाज है। कई पोलिंग स्टेशन पर केजरीवाल पार्टी NOTA से भी कम वोट ले पायी। खैर जमानत तो सभी की जब्त होना इस पार्टी के लिए कोई नयी बात नहीं। जमानत जब्त तो केजरीवाल पार्टी के लिए दाल-रोटी बन चुकी है। 
                                                                                                      साभार The NewsIn
                                                                                                     साभार 
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बिहार में राजद की हार के करारी हार के बाद लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने परिवार से रिश्ता तोड़कर राजनीति को अलविदा कह दिया है। लालू यादव को किडनी देने वाली रोहिणी ने X पर पोस्ट कर अपने फैसले जानकारी दी है और इसके लिए संजय यादव और रमीज को जिम्मेदार बताया है।

हरियाणा से आने वाले संजय यादव RJD के राज्यसभा सांसद हैं और तेजस्वी यादव के मित्र हैं। वह अक्सर तेजस्वी यादव के साथ नजर आते हैं और उन्हें तेजस्वी का राजनीतिक सलाहकार माना जाता है। हालाँकि, रमीज का नाम अभी लोगों के लिए अनजान है और वो सुर्खियों में कम ही रहा है।

कौन है रमीज?

‘द ललनटॉप’ के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा ने X पर एक पोस्ट में बताया है कि रमीज नेमत खान उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के रहने वाले हैं। उन्होंने लिखा है, “लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने जिन रमीज का जिक्र किया है। वे यूपी के बलरामपुर के रहने वाले हैं। जेल में बंद पूर्व सांसद रिजवान जहीर के दामाद हैं। इन पर हत्या समेत कई मुकदमें हैं। ये RJD का सोशल मीडिया और चुनाव प्रबंधन देखते हैं। इनकी पत्नी भी विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं।”

                                                               पंकज झा का X पोस्ट

पंकज झा ने एक अन्य फोटो भी X पर शेयर की है जिसमें रमीज नेमत खान और संजय यादव, तेजस्वी यादव व राहुल गाँधी के साछ नजर आ रहे हैं।

रमीज पर फिरोज पप्पू की हत्या का आरोप

रमीज नेमत और उनके ससुर व पूर्व सपा सांसद रिजवान जहीर पर बलरामपुर में नगर पंचायत तुलसीपुर के पूर्व चेयरमैन फिरोज पप्पू की हत्या का आरोप है। 4 जनवरी 2022 की रात पूर्व चेयरमैन फिरोज अहमद उर्फ पप्पू उनके घर से कुछ दूरी पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जाँच में नेमत समेत 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। आरोप था कि सपा के टिकट की दावेदारी के विवाद में इस हत्या की गई थी।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, रमीज नेमत फिलहाल जमानत पर बाहर है। फिरोज पप्पू हत्याकांड से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में आगामी 18 और 20 नवंबर को सुनवाई निर्धारित की गई है।

संजय ने कराई रमीज की RJD में एंट्री

सूत्रों के मुताबिक, संजय यादव ने ही रमीज नेमत की RJD में एंट्री कराई थी। बताया जाता है कि संजय यादव की रमीज के ससुर रिजवान जहीर से अच्छी तरह से जान पहचान थी और वहीं से उनकी पहचान रमीज नेमत से भी हुई थी। इसके कुछ समय बाद संजय ने रमीज की RJD में एंट्री करा दी।

TV9 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रमीज 2016 में आरजेडी से जुड़े थे। वो पहले पहले डिप्टी सीएम ऑफिस में बैकडोर का काम देखते थे और उसके बाद तेजस्वी के दफ्तर से जुड़ गए। बकौल रिपोर्ट, रमीज तेजस्वी के डेली रूटीन और कैंपेनिंग का काम देखते हैं।

तेजस्वी के साथ क्रिकेट भी खेला है रमीज

तेजस्वी और रमीज की दोस्ती सियासत से इतर क्रिकेट की भी है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि रमीज तेजस्वी यादव के साथ क्रिकेट खेलता था। IANS के पत्रकार सौरव राज ने X पर एक पोस्ट में लिखा है, “जिस रमीज का जिक्र रोहिणी आचार्य ने किया है वो तेजस्वी यादव का दोस्त है, UP का रहने वाला है, साथ में क्रिकेट खेलता था।”

रोहिणी के परिवार और राजनीति छोड़ने के बाद अब RJD में कलह और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। संजय यादव के कारण पहले से ही परिवार में कलह चल रही है। तेज प्रताप यादव आए दिन उन पर बिना नाम लिए हमला करते हैं। मीसा भारती ने उन पर परोक्ष रूप से हमला बोला है और अब रमीज नेमत का नाम भी इस कड़ी में जुड़ गया है।

भूरा बाल- ‘भू यानि भूमिहार’, ‘रा यानि राजपूत’, ‘बा यानि ब्राह्मण’, ‘ल यानि लाला (कायस्थ)’, जिस ‘नारे’ को मारिया शकील बता रही राजनीतिक ‘जरूरत’, उसकी आड़ में लालू-राबड़ी के ‘जंगलराज’ में किया गया सवर्णों का नरसंहार

                                            लालू के जंगलराज का नारा ‘भूरा बाल साफ करो’

जिस सनातन को कुर्सी के भूखे हिन्दू अपमानित करते है मुस्लिम कट्टरपंथी उसी को अपनी ढाल बनाकर हिन्दुओं पर हमले करते हैं। ये जो हिन्दू त्यौहारों और शोभा यात्राओं पर पत्थरबाज़ी होती ये सब इन्हीं सनातन विरोधी हिन्दुओं के देन है उनको मालूम है हमारे समर्थन में ये ढोंगी कालनेमि हिन्दू सरकार को घेर हमें बचाएंगे। फिर एक बात और, मारिया शकील को देखो, सनातनी वेष धारण किये हुए है और जब हिजाब या बुर्के पर विवाद होगा भांडों की तरह सडकों पर उतर आएगी। अगर इन हिन्दू विरोधियों को अभी भी जनता नहीं पहचानेगी उससे बड़ा महापागल और अँधा कोई नहीं। कहाँ है हिजाब/बुर्का? इसीका नाम है फिरकापरस्ती यानि साम्प्रदायिक लोग।     

मारिया शकील 'भूरा बाल साफ करो' नरसंहार को बता रही जरूरत (साभार : followup & samachar)

बिहार की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे पूर्व मंत्री शकील अहमद खान की बेटी मारिया शकील के एक कथित बयान से शुरू हुआ है। आरोप है कि मारिया शकील ने इंडिया टुडे के एक टीवी शो के दौरान, 1990 के दशक के उस कुख्यात नारे ‘भूरा बाल साफ करो’ को उस समय की ‘जरूरत’ (Need of the Hour) या ‘राजनीतिक मजबूरी’ बताया।

मारिया शकील के इस कथित बयान का सीधा मतलब यह है कि 1990 के दशक में लालू यादव की सरकार के दौरान ऊँची जाति के समुदाय (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला/कायस्थ) के खिलाफ जो बड़े बदलाव हो रहे थे, उसमें यह नारा एक जरूरी चाल या उपकरण था। इस तरह, मारिया शकील ने अप्रत्यक्ष रूप से लालू यादव के शासनकाल ‘जंगल राज’ में ऊँची जाति के लोगों पर हुए कथित अत्याचारों, हत्याओं (नरसंहार) और उन्हें सत्ता-संपत्ति से दूर कर दिए जाने को सही ठहराने की कोशिश की है। उनके इस बचाव ने सोशल मीडिया पर लोगों को भड़का दिया है, जो पूछ रहे हैं कि ऐसी हिंसा को कोई कैसे ‘जरूरत’ बता सकता है।

नीचे वीडियो इंडिया टुडे की यूट्यूब की है। इस वीडियो में 19:25 पर मारिया शकील ‘भूरा बाल साफ करो’ नारे को 1990 के दशक के लालू यादव के ‘जंगलराज’ की ‘राजनीतिक जरूरत’ बताती है।

मारिया शकील के बयान पर सोशल मीडिया का गुस्सा: ‘जंगल राज’ को बताया ‘जरूरत’

 मारिया शकील के कथित बयान ‘भूरा बाल साफ करो’ नारे को ‘राजनीतिक आवश्यकता’ बताया, पर सोशल मीडिया यूजर्स ने कड़ी आपत्ति जताई है। लोगों ने इस बयान को ‘जंगल राज’ और नरसंहार को सही ठहराने जैसा बताया है।

एक यूजर ने सीधे सवाल किया, “वाह! मारिया शकील जी के अनुसार, 90 के दशक में ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसा जातिवादी नारा बिहार की ‘जरूरत’ था। सवर्णों के नरसंहार के लिए दिए जाने वाले इस नारे को कोई पत्रकार कैसे सही ठहरा सकती है?”

एक अन्य यूजर ने गुस्से में कहा, “नेशनल टीवी पर ‘जंगल राज’ के जहर को ‘जरूरत’ बताना… ये बिहार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। मतलब, ‘जंगलराज’, ‘अपहरण-उद्योग’, ‘पलायन’… ये सब उस समय की माँग थी? और क्या भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला की हत्याएँ भी एक ‘आवश्यकता’ थीं?”

एक यूजर ने मारिया शकील को टैग करते हुए तीखी आलोचना की। यूजर ने लिखा, “अगर आपके लिए ‘भूरा बाल साफ करो’ एक राजनीतिक मजबूरी थी, तो क्या किसी समूह के नरसंहार को सामाजिक न्याय कहा जाएगा? इस तर्क से तो आप कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को भी सही ठहरा देंगी। मैं खुद ब्राह्मण नहीं हूँ, फिर भी इस बयान से बहुत आहत हूँ।”

‘भूरा बाल साफ करो’: बिहार की राजनीति का एक कड़वा नारा

‘भूरा बाल साफ करो’ नारा 1990 के दशक में बिहार की राजनीति में केवल एक नारा नहीं था, बल्कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हथियार था, जिसका उद्देश्य समाज को बाँटना था। यह बेहद विवादित और नफरत भरा प्रतीक था, जिसने सीधे-सीधे राज्य की चार सबसे प्रभावशाली ऊँची जातियों को निशाना बनाया। भूरा बाल- ‘भू यानि भूमिहार’, ‘रा यानि राजपूत’, ‘बा यानि ब्राह्मण’, ‘ल यानि लाला (कायस्थ)’।

इन चारों समुदायों ने लंबे समय तक बिहार की राजनीति और समाज पर अपना दबदबा बनाए रखा था। इस नारे का असली मकसद लालू प्रसाद यादव की ‘सामाजिक न्याय’ की आड़ में नफरत की राजनीति करना था। रणनीति साफ थी कि पिछड़ी जातियों, दलितों और मुसलमानों को एक साथ लाकर एक विशाल वोट बैंक तैयार करना और इस विभाजनकारी गठबंधन की मदद से इन ऊँची जातियों के पुराने राजनीतिक प्रभुत्व को पूरी तरह से ‘साफ’ या खत्म कर देना। यह बिहार के सवर्ण समाज को जातियों में तोड़ने और उनके बीच डर पैदा करने की एक गहरी चाल थी।

जंगल राज और अपर कास्ट पर अत्याचार

लालू प्रसाद यादव के 1990 के दशक के शासनकाल को अक्सर ‘जंगल राज’ कहकर पुकारते हैं। इस दौर में बिहार की कानून-व्यवस्था पूरी तरह से टूट चुकी थी। यह समय राज्य में जातीय हिंसा, बड़े पैमाने पर फिरौती के लिए अपहरण और लोगों के बड़े पैमाने पर एक जगह से दूसरी जगह चले जाने (पलायन) के लिए याद किया जाता है।

इस पूरे दौर में जमीन के विवाद और सामाजिक रुतबे की लड़ाई के चलते कई इलाकों में जातीय हिंसा भड़क उठी। गरीब और पिछड़ी जातियों तथा अमीर सवर्ण जमींदारों के बीच हिंसक टकराव हुए। नतीजतन, कई जगहों पर बड़ी संख्या में लोगों की हत्याएँ (नरसंहार) हुईं। इन घटनाओं ने राज्य को हिंसा के गहरे दौर में धकेल दिया।

‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे विभाजनकारी नारों के माहौल में, ऊँची जाति के समुदायों (सवर्णों) ने आरोप लगाया कि लालू यादव की सरकार में उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया। कई सवर्ण परिवारों को इस हिंसा में गंभीर जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा।

उनका यह मानना था कि उन्हें केवल राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं किया गया, बल्कि उनके खिलाफ हुई हिंसा पर भी सरकार ने कोई ख़ास कदम नहीं उठाया। कानून-व्यवस्था इतनी बिगड़ गई थी कि समाज के हर वर्ग में डर का माहौल था, लेकिन ऊँची जातियों के बीच यह डर सबसे ज़्यादा था कि उनकी जान-माल की सुरक्षा खतरे में थी। इसी वजह से राजधानी और राज्य के बाहर पलायन की खबरें आम हो गईं।

मारिया… ‘भूरा बाल साफ करो’ जरूरत नहीं, सिर्फ बिहार के जख्मों पर नमक

मारिया शकील का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि बिहार के अतीत के जख्मों को फिर से कुरेदने जैसा है। अगर कोई पत्रकार या सार्वजनिक बुद्धिजीवी इस हिंसक प्रतीक को ‘जरूरत’ कहे तो यह उस संवेदनशीलता की कमी दिखाता है जो लोकतंत्र की आत्मा है। राजनीति का असली मकसद किसी वर्ग को खत्म करना नहीं, बल्कि सबको बराबरी के साथ खड़ा करना है। ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे नारे बिहार को विभाजित कर गए थे और आज अगर कोई उन्हें सही ठहराता है तो यह संकेत है कि बिहार की राजनीति अभी भी उस अंधेरे दौर से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है।

महागठबंधन में दरार: लालू-तेजस्वी को आंखें दिखाने लगी कांग्रेस, RJD से नहीं मिले कांग्रेस नेता

जब राहुल गाँधी सिर्फ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में तेजस्वी के साथ अपना रोड शो कर रहे थे तभी इसी ब्लॉग पर लिखा था कि तेजस्वी ने अपनी जमीन और अपने ही कार्यकर्ताओं को लेकर राहुल को खुला मैदान देने से अपने ही पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है। दूसरे यह कि जब तक INDI गठबंधन राहुल को सिरमौर बनाकर रखेगा कांग्रेस के साथ-साथ अपना भी नुकसान करते रहेंगे। क्योकि जितना राहुल ही नहीं गाँधी परिवार बोलेगा बीजेपी को कोई नहीं हरा सकता।   
बिहार में विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद महागठबंधन में सीट और टिकटों के लेकर घमासान मच गया है। आरजेडी चीफ लालू यादव की कार की घेराबंधी कर डाली तो राबड़ी के आवास के बाहर नाराज कार्यकर्ताओं का अखाड़ा बन गया। उधर कांग्रेस भी महागठबंधन की कमजोर कड़ी होने के बावजूद लालू-तेजस्वी पर आंखे तरेर रही है। आलाकमान की शह पर कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव को भी भाव नहीं दे रहे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना पहुंच चुके हैं। लेकिन उन्होंने जानबूझकर लालू और तेजस्वी से मुलाकात नहीं की। इससे महागठबंधन पर महा-संकट आने के आसार नजर आने लगे हैं। यदि दो-तीन दिन में सियासी पेच ना सुलझा तो दरार और बढ़ सकती है। दूसरी ओर पहली बार चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर भी विवादों में घिर गए हैं। उनकी जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ही पीके पर पैसे लेकर सीटें बांटने के आरोप लगाए हैं। ऐन चुनाव से पहले ऐसी पोल खुलने के बीच मानहानि मामले में नोटिस ने पीके की टेंशन और बढ़ा दी है।

 राहुल के पीछे लग तेजस्वी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी

दरअसल, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा के दौरान अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली थी। इस यात्रा में राहुल गांधी 17 दिनों तक बिहार में रहे। तेजस्वी ने ही राहुल को लीड करने का मौका दिया और वे पहली बार राहुल गांधी के पीछे-पीछे घूमे। तेजस्वी ने यात्रा में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इससे बिहार में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस की कुछ सांसें चलने लगीं। राहुल गांधी को गुमान हो गया कि यह सब उनकी वजह से है। इसलिए इसके बाद से कांग्रेस अब आरजेडी को आंखे दिखाने लगी है। तेजस्वी के सीएम फेस पर भी एतराज जताने के बाद अब कांग्रेस ने सीट बंटवारा के लिए राजद को अल्टीमेट तक दे दिया है। यदि दो-तीन दिन में दोनों दलों में सहमति नहीं बनी तो कांग्रेस अपनी पहली सूची जारी कर सकती है। कांग्रेस ने पहले 15 उम्मीदवारों की सूची बना ली है। यदि कांग्रेस आम सहमति के पहले लिस्ट जारी कर देती है तो महागठबंधन पर महा-संकट के बादल छा सकते हैं।
कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू-तेजस्वी को नहीं दे रहे भाव
कांग्रेस ने भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटें जीतकर सबसे कमजोर प्रदर्शन किया हो। इसके बावजूद वह अगले माह होने वाले चुनाव के लिए राजद की आंख में आंख मिला कर बात कर रही है। यही वजह है कि कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव और तेजस्वी को भी भाव नहीं दे रहे। हाइकमान के आदेश पर अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना आए। लेकिन उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी से मुलाकात करने की जरूरत ही नहीं समझी। भूपेश बघेल ने तो सीधे-सीधे तेजस्वी यादव को चुनौती ही दे डाली। उन्होंने कहा, तेजस्वी खुद को अपनी ओर से सीएम फेस बता रहे हैं, लेकिन सीएम का चेहरा उनकी पार्टी का हाईकमान घटक दलों की सहमति से तय करेगा।
महागठबंधन उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से चुनाव पर असर
चुनाव के लिए पहले चरण के नामांकन की शुरुआत 10 अक्टूबर से हो चुकी है। लेकिन 10 अक्टूबर तक महागठबंधन का सीट बंटवारा फाइनल नहीं हो सका है। संभावित प्रत्याशियों में इसको लेकर रोष है कि पिछली बार उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से तैयारी का समय नहीं मिला था। पहले चरण के चुनाव के नामांकन की अंतिम तारीख से एक दिन पहले प्रत्याशियों के नाम घोषित किये गये। कांग्रेस ने आंतरिक गुटबाजी और संभावित असंतोष से निपटने के लिए यह देरी की थी। लेकिन इस कोशिश में उम्मीदवारों को हड़बड़ी में आधी अधूरी तैयारी के साथ चुनाव में उतरना पड़ा। टिकट को लेकर भी असंतोष था। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता केके तिवारी ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कर टिकट वितरण में धांधली का आरोप लगाया था। उन्होंने चुनाव प्रबंधन से जुड़े नेताओं की जांच कराये जाने की मांग की थी।
तीन साल पीके के साथ घूमी, अब कर दिया विश्वासघात 
जन सुराज पार्टी की लिस्ट की घोषणा होते ही कार्यकर्ताओं और संभावित प्रत्याशियों की नाराजगी और रोष सामने आ गया है। जन सुराज की महिला कार्यकर्ता पुष्पा सिंह ने टिकट ना देने पर पीके पर विश्वासघात का आरोप लगाया है। उन्होंने मीडिया से कहा कि तीन साल मैं घर में नहीं बैठी। अपना सारा सुख त्याग दिया और जन सुराज के लिए काम किया। घर की बेटी-बहू होकर भी मैंने हिम्मत जुटाई। वे पैदल चले तो मैं भी उनके साथ चल पड़ी। आज मेरे साथ अन्याय हुआ है। टिकट के लिए उन लोगों का नाम अनाउंस हुआ जो क्षेत्र में घूमे ही नहीं, जनता उनको पसंद तक नहीं करती है। बहुत उम्मीद लेकर आई थी, सब पर पानी फिर गया है। मैंने तो उम्मीदवार बनने का प्रोसेस भी पूरा कर लिया था। पुष्पा ने कहा कि बनियापुर-मशरख की जनता जन सुराज का हिसाब कर देगी।
जन सुराज पार्टी ने 21 हजार लिए, टिकट किसी और को दिया
पाटलिपुत्र ऑफिस के बाहर पहुंचे कार्यकर्ता अमर कुमार सिन्हा ने दावा किया, ‘पार्टी ने उनको कुम्हरार विधानसभा से टिकट देने की बात कही थी। इसके लिए 21000 रुपए भी लिए काम कराया। 5 जनसभाएं करवाई और एंड मोमेंट पर ये सीट केसी सिन्हा को दे दी। सिन्हा के मुताबिक RCP सिंह ने अपनी बेटी को टिकट दिलवा दिया। पीके ने काम करवाया और RCP सिंह ने भरोसा दिया। हमने जन सुराज पार्टी छोड़ दिया। ये आदमी (प्रशांत किशोर) बिहार बदलाव की बात कर रहा है और दूसरे को चोर बोलकर खुद को ईमानदार साबित करना चाहता है।
मुजफ्फरपुर की सीट पीके ने 40 लाख में बेची- केजरीवाल
दरअसल, गुरुवार को जन सुराज ने 51 सीटों पर कैंडिडेट्स के नाम की घोषणा की। नाम की घोषणा के साथ ही हंगामा शुरू हो गया। कई कार्यकर्ता टिकट नहीं मिलने से नाराज दिखे। मुजफ्फरपुर में जन सुराज के नेता संजय केजरीवाल ने पार्टी से त्यागपत्र देने के साथ-साथ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा की है। संजय केजरीवाल ने कहा कि जन सुराज में अब सिद्धांत-विचारधारा नहीं, बल्कि पैसे का बोलबाला हो गया है। मुजफ्फरपुर नगर विधानसभा की टिकट 40 लाख रुपए में बेची गई है।
125 करोड़ के मानहानि केस में नोटिस ने पीके की बढ़ाई टेंशन
दूसरी ओर 125 करोड़ के मानहानि केस में प्रशांत किशोर को कोर्ट से नोटिस जारी हुआ है। भाजपा सांसद डॉ. संजय जायसवाल की ओर से दायर मानहानि केस की सुनवाई सब जज 1 बेतिया के न्यायालय में हुई। कोर्ट ने मानहानि केस एडमिट कर लिया है। इसमें जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर को कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने प्रशांत किशोर को विशेष दूत से समन देने का आदेश दिया है। सांसद की तरफ से मैंडेटरी इंजेक्शन पिटीशन भी दाखिल किया गया था। जिस पर कोर्ट ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

सुनो कंचना यादव! जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, इसलिए आज भी डरता है बिहार: TV पर गों-गों मत करो, हाई कोर्ट ने लालू-राबड़ी राज को ‘नरक’ भी कहा था

लालू यादव के लिए जंगलराज का शब्द पटना हाई कोर्ट की तरफ से 1997 में कहा गया था (साभार : ABP & Kanchana Yadav)
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। एक बार फिर बिहार में नीतीश राज के विकास और लालू राज के ‘जंगलराज’ को लेकर जमीनी स्तर पर चर्चा होने लगी है। RJD के नेता और प्रवक्ता किसी भी तरह खुद को अपनी ‘जंगलराज’ की छवि से बचाने में लगे हैं। इसी बीच, RJD प्रवक्ता कंचन यादव ‘जंगलराज’ शब्द कहाँ से जन्मा है इसका सबूत आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से लाइव डिबेट में माँगा।

अब तक तेजस्वी यादव में जितना चुनावी प्रचार किया है अपने आपको प्रसारित किया है लालू का नाम तक नहीं लिया, क्योकि सच्चाई जानते हैं पिता का नाम लेने पर जनता के दिमाग में "जंगल राज" और "नौकरी के बदले जमीन घोटाला" आ गया तो चुनाव ही हाथ से निकल जाएगा।      

कहाँ से आया जंगलराज शब्द?- RJD प्रवक्ता

हाल ही में एक टीवी डिबेट में RJD प्रवक्ता कंचन यादव ने जब आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से यह सवाल किया गया कि ‘जंगलराज’ शब्द का जन्म कहाँ से हुआ?, तो अंजना ओम कश्यप ने जवाब दिया, “पटना हाई कोर्ट ने यह शब्द मौखिक रूप से इस्तेमाल किया था।”

आरजेडी प्रवक्ता कंचन यादव ने इस पर आपत्ति जताते हुए ट्वीट किया और चुनौती दी कि अगर कोर्ट ने ऐसा कहा हो तो आदेश निकालकर दिखाएँ। आरजेडी की प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह शब्द बीजेपी और मीडिया ने मिलकर फैलाया है, कोर्ट ने कभी ‘जंगलराज’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया।

जब हाईकोर्ट ने कहा था ‘बिहार में कोई सरकार नहीं, जंगलराज है’

सच्चाई यह है कि 1997 में पटना हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी में कहा था कि ‘बिहार में नाम के लायक कोई सरकार नहीं है, और यहाँ जंगलराज चल रहा है’। यह टिप्पणी जस्टिस बीपी सिंह और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा की बेंच ने की थी। टिप्पणी किसी राजनीतिक केस में नहीं, बल्कि पटना की बदहाल नगर व्यवस्था और जलजमाव को लेकर थी। जजों ने पटना को ‘Veritable Hell’ यानी ‘वास्तविक नरक’ कहा था।

यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता और शहर की गंदगी पर थी, न कि किसी आपराधिक मामले पर। कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया था कि पटना भारत की सबसे गंदी राजधानी होने का दावा कर सकता है। कोर्ट ने भ्रष्ट नौकरशाहों को प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

जंगलराज 2.0: अब भी डर कायम है?

आज तेजस्वी यादव खुद को ‘नई सोच का नेता’ कहकर पेश करते हैं। लेकिन सच यही है कि लालू यादव की RJD का नाम आते ही अब भी बिहार के कई हिस्सों में लोग डरने लगते हैं। पटना से गया तक कई जगहों पर युवाओं, व्यापारियों, महिलाओं में अब भी यह चिंता बनी रहती है कि अगर राजद सत्ता में लौटी तो क्या फिर वही 90 के दशक जैसा डर लौट आएगा?

 जंगलराज कोई अखबार की हेडलाइन नहीं, वह बच्चा है जो स्कूल जाने से पहले माँ की आँखों में डर देखता है। वह व्यापारी है जो दुकान की गल्ले पर बैठा हर आहट पर चौंकता है। वह बेटी है जो कॉलेज जाते वक्त हर मोड़ पर डरती है कि कहीं पीछे कोई बाइक न आ जाए।

और इसीलिए, जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, बिहार के उस दौर की बदनसीबी का नाम है… एक ऐसा नाम, जिसे आज भी सुनते ही लोग सिहर उठते हैं।

‘बह@$द, तुम आओ सा$, लतखोरी ठीक कर दूँगा’: बिहार के जिस जंगलराज ने सत्येंद्र दुबे को मार डाला, अब उसी जंगलराज की ‘पैदाइश’ पप्पू यादव का NHAI अधिकारी को धमकाने का ऑडियो वायरल

        पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव (बाएँ), मृतक सत्येंद्र दुबे की प्रोफाइल (फोटो साभार : Aajtak & indiatimes)
क्या आपको राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के इंजीनियर सत्येंद्र दुबे याद हैं। दुबे की हत्या इसलिए कर दी गई थी, क्योंकि वो बिहार में सड़कों के निर्माण में भ्रष्टाचार को लेकर काफी सख्त थे। अब एक ऑडियो सामने आया है जिसमें में पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव NHAI के ही एक अधिकारी को धमकाते हुए सुनाई दे रहे हैं।

इस वीडियो में पप्पू यादव NHAI अधिकारी पर एक एंबुलेंस ड्राइवर को नौकरी पर रखने का दवाब डाल रहे हैं। पप्पू यादव अधिकारी को धमकती देते हुए कहते की 2 मिनट में ‘लतखोरी’ खत्म कर दूँगा। जब अधिकारी उनके सासंद होने का हवाला देते हुए मर्यादित तरीके से बात करने की गुजारिश करते हैं, तब भी सासंद का लहजा नहीं बदलता है। वे अपने लोगों से इस अधिकारी के घर के बारे में पूछते हुए सुनाई देते है।

पप्पू यादव के वायरल ऑडियो में क्या हैं।

इस वायरल ऑडियों की पुष्टि ऑपइंडिया नहीं करता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह ऑडियों कब का है। इसमें पप्पू यादव NHAI अधिकारी को धमकाते हुए सुनाई देते हैं। फोन पर आते ही पप्पू यादव कहते है शेखर जी पप्पू यादव… NHAI अधिकारी जब कहते हैं, ‘हाँ’, तब पप्पू यादव कहते हैं कि इतना लूज मत होईये, हाँ… टाइट रहिए। फिर पप्पू यादव NHAI अधिकारी को कहते हैं एंबुलेंस में ड्राइवर थे मनीष को रख लो यार। जब अधिकारी कहते हैं कि हमारे अंदर का चीज नहीं है, तब पप्पू यादव भड़क जाते हैं और गुस्सा करते हुए कहते ‘जो है उसको रखो’

इसके बाद अधिकारी सासंद से कहते हैं कि ‘हम कहाँ से रखें’। आग बबूला हुए पप्पू यादव अधिकारी से पूछते हैं कि ‘अभी कहाँ हो’। अधिकारी जवाब देते हैं कि ‘दिल्ली में हैं’। पप्पू यादव अधिकारी से कहते हैं कि ‘लतखोरी’ और जो ‘पैसा इधर-उधर करते हो’ 2 मिनट में खत्म हो जाएगी। इसके बाद पप्पू यादव अपने आसपास खड़े लोगों से पूछते हैं ‘घर कहाँ है इस साले का’। पीछे खड़े लोग बताते हैं कि पूर्णिया में है हॉस्पिटल में हैं। पप्पू यादव पूछते हैं ‘हॉस्पिटल में क्या काम करता है’।

पप्पू यादव इसके बाद अधिकारी से पूछते है ‘कब आ रहे हैं इधर’। अधिकारी जवाब देते हुए कहते हैं ‘हम काहें आप को बोले’। पप्पू यादव 2 से 3 बार कहते हैं कि ‘तुम्हारा दिमाग खराब है क्या’। और अधिकारी उन्हें याद दिलाते हैं कि ‘आप सांसद है, तहजीब से बात कीजिए’। फिर पप्पू यादव गाली देते हुए बोलते है ‘बह@$द तुम्हारा दिमाग खराब है क्या’, तुम आओ सा$, तुम्हारा इलाज करवाकर सही करते हैं। लेकिन फिर भी अधिकारी कहते रहते हैं कि ‘आप सांसद है तमीज में बात कीजिए।’ इतने में पीछे से आवाज आती है कि ‘आने दो इसको’। पप्पू यादव और NHAI अधिकारी का ऑडियो क्लिप भी आप सुन सकते हैं।

क्या था सतेंद्र दुबे मामला?

इस ऑडियो के वायरल होने के बाद, कई लोगों को सत्येंद्र दुबे की याद आई। सत्येंद्र दुबे एक ईमानदार इंजीनियर थे जो NHAI के तहत काम कर रहे थे। सत्येंद्र दुबे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ PMO को पत्र लिखा था। पर वो गलती कर बैठे, पत्र में अपना नाम लिख दिया। सरकार की तरफ से उनकी पहचान उजागर कर दी। और फिर हुआ वही, जो बिहार के ‘जंगलराज’ में अक्सर होता था। बिहार के गया में सर्किट हाउस में 27 नवंबर 2003 को सत्येंद्र दुबे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

इस घटना ने देश भर में इंजीनियरों के बीच डर पैदा कर दिया था कि ईमानदारी से काम करने पर उन्हें भी इसी तरह का अंजाम भुगतना पड़ सकता है। हालाँकि, इस मामले में मुख्य आरोपित उदय मल्लाह को पकड़ा गया, लेकिन सत्येंद्र दुबे के भाई का मानना है कि असली अपराधी अभी भी बाहर हैं और सीबीआई ने इस मामले को ठीक से नहीं सुलझाया।

पप्पू यादव खुद को कांग्रेस का बताते हैं और हाल ही में उन्होंने तेजस्वी यादव को जननायक बताया है। बिहार में जंगलराज अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है। इनकी सरकार बनने के बाद क्या ही होगा। 90 से 2015 का दौर देखकर समझ सकते हैं। खुद को ‘गरीबों का मसीहा’ के तौर पर प्रचार करते हुए पप्पू यादव जी, लालू यादव के उसी जंगलराज की उपज है

बिहार : तेजस्वी यादव का हिन्दू विरोधी चेहरा उजागर, चंद्रशेखर यादव ने रामचरितमानस को बताया नफरती ग्रंथ


बिहार विधानसभा चुनाव के लिए बेवजह की कूद-फांद कर रहे तेजस्वी यादव का हिन्दू विरोधी चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। एक ओर तेजस्वी यादव मुस्लिम तुष्टिकरण की इंतेहा करते हुए वक्फ अधिनियम को कूड़ेदान में डालने की बात करते हैं, तो दूसरी ओर उनकी दिखावटी आस्था का भी पर्दाफाश हो गया है। तेजस्वी यादव सिर्फ मतलब पड़ने पर मंदिर जाते हैं और फिर बाहर निकलते ही तत्काल टीका मिटा देते हैं। ताकि टीका देखकर मुस्लिम कहीं नाराज ना हो जाएं और उनका MY फैक्टर एक बार फिर फेल हो जाए। जनता अब ऐसे फर्जी हिंदुओं को पहचान चुकी है। देवी मां के नवरात्रों में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को मटन बनाकर खिलाने वाले राजद सुप्रीमो लालू यादव और उनके पुत्र तेजस्वी यादव किस मुंह से सावन में नॉनवेज का जिक्र कर रहे हैं? राजद का सनातन विरोधी चेहरा इससे भी उजागर होता है कि राजद नेता और बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर यादव तो भगवान श्री राम के पावन ग्रंथ रामचरितमानस को ही नफरत फैलाने वाला ग्रंथ बता चुके हैं।

तेजस्वी यादव फर्जी हिंदू, मतलब के लिए मंदिर गए और फिर टीका मिटाया

राजद नेता तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी के सनातन का विरोध करने और फर्जी हिंदू बनने के एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं। कुछ समय पहले तेजस्वी यादव मिथिला में अहिल्या महोत्सव में शामिल हुए। वहां पर उन्होंने दिखावे के लिए टीका-चंदन किया। लेकिन, इनका दोहरा पैमाना देखिए कि वहां से निकलने के बाद ही इन्होंने टीका मिटा भी दिया। क्योंकि राजद नेता केवल दिखावे और जरूरत पड़ने पर मंदिर जाते हैं। बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री संजय सरावगी ने तेजस्वी यादव पर कड़ा प्रहार करते हुए विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को फर्जी हिंदू करार दिया। उन्होंने कहा कि यह जरूरत पड़ने पर मंदिर जाते हैं और निकलते ही टीका मिटा देते हैं। यह उनकी दिखावटी आस्था को दर्शाता है। जनता अब इन जैसे फर्जी हिंदुओं को पहचान चुकी है। उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव फर्जी हिंदू हैं, जिन पर किसी भी कीमत पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। राजनीति में अब तेजस्वी यादव की विश्वसनीयता खतरे में आ चुकी है। आज इन लोगों की साख राजनीति में पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। इसी वजह से इन्हें नकारा जा रहा है।

तुष्टिकरण की इंतेहा, वक्फ अधिनियम को कूड़ेदान में डालेंगे

राजद नेता तेजस्वी यादव ने मुस्लिम तुष्टिकरण की इंतेहा दिखाते हुए कहा कि बिहार में विपक्षी महागठबंधन सत्ता में आने पर वक्फ अधिनियम को कूड़ेदान में डाल देगा। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने आरोप लगाया कि वे केवल एक विशेष समुदाय के सशक्तिकरण के लिए शरिया कानून लाने की शक्ति हासिल करना चाहते हैं, जबकि एनडीए समाज के सभी वर्गों की प्रगति के लिए काम करता है। भाजपा ने वक्फ अधिनियम पर टिप्पणी को लेकर राजद नेता तेजस्वी यादव पर तीखा हमला किया। भाजपा नेता भाटिया ने उन्हें उन्हें “मौलाना” कहते हुए कहा कि वे बिहार में सांप्रदायिक आधार पर समाज का ध्रुवीकरण करने की साजिश कर रहे हैं। इससे यह साफ हो गया है कि इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों में विपक्षी महागठबंधन को “आसन्न” हार का अभी से आभास हो गया है। उन्होंने कहा मैं ‘नमाज़वादी’, ‘मलूणा’ और ‘तुष्टीकरण करने वालों’ के नेता तेजस्वी यादव से पूछता हूं कि क्या उन्होंने कभी संविधान पढ़ा है? क्या कभी संविधान की मूल भावना का पालन किया है? उन्होंने पूछा कि क्या कोई राज्य सरकार संसद द्वारा पारित कानून को रद्दी में डाल सकती है।

तेजस्वी यादव ने मुस्लिमों की सभा में संस्कारहीन भाषण दिया

बिहार की सियासत में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के एक बयान से हलचल मच गई है। तेजस्वी यादव ने पटना के गांधी मैदान में ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ सम्मेलन में कहा, ‘ये देश किसी के बाप का नहीं है!’ तेजस्वी यादव के इस बयान पर एनडीए नेताओं ने भी करारा जवाब देते हुए ‘संस्कारहीन’ तक बोल दिया। गांधी मैदान में इमारत-ए-शरिया द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में तेजस्वी ने वक्फ संशोधन बिल को सत्ता में आने के बाद फाड़ने तक की बात कही। दरअसल, तेजस्वी यादव का बयान उनकी मुस्लिस तुष्टिकरण की नीति को दर्शाता है। बिहार की 17 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, जिसमें 73 प्रतिशत पसमंदा मुस्लिम हैं और आरजेडी का परंपरागत ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों को एकजुट करने का है। जहां तक बिल की बात है तो हकीकत यह है कि यह बिल पारदर्शिता और पसमंदा मुस्लिमों के हित में है। बीजेपी और जेडीयू नेताओं का दावा है कि यह बिल पारदर्शिता के साथ ही पसमंदा मुस्लिमों को ताकत देगा।

लालू यादव ने बेटी के घर में राहुल को मटन बनाना सिखाया

तेजस्वी यादव के मटन वीडियो पर बिहार बीजेपी के नेता विजय कुमार सिन्हा और सम्राट चौधरी भी हमला बोल चुके हैं। तेजस्वी यादव के उस वीडियो की खूब आलोचना हो रही है। सियासी जानकार मानते हैं कि ऐसा नहीं है कि यादव नवरात्रि नहीं मनाते हैं। तेजस्वी यादव वो वीडियो शेयर करके खुद ही फंस गए हैं। बिहार क्या देश की आम जनता भी उस वीडियो से खुश नहीं है। तेजस्वी यादव को इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। सियासी जानकार मानते हैं कि नवरात्रि और चैती छठ के इस पावन पर्व पर तेजस्वी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। तेजस्वी यादव ने उसका वीडियो बनाकर लोगों को चिढ़ाने का काम किया है। चुनाव के दौरान छोटी से छोटी बातों का ख्याल रखना चाहिए। लोग किस बात से आहत हुए हैं। तेजस्वी यादव के इस कृत्य से लालू यादव भी खुश होंगे, क्योंकि वे खुद राहुल गांधी के साथ मटन बनाने को इंजॉय कर चुके हैं।

 राहुल ने लिख-मटन बनाने की सीक्रेट रेसिपी के साथ-साथ राजनीति

दरअसल, राहुल गांधी ने राजद सुप्रीमो लालू यादव से मटन बनाना सीखा था। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और नेता राहुल गांधी ने बकायदा इसका वीडियो अपने सोशल मीडिया पर शेयर भी किया। वो मटन बनाने की सीक्रेट रेसिपी के साथ-साथ राजनीति के गुर भी लालू यादव से सीखते नजर आ रहे हैं। जब लालू यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती के आवास पर राहुल गांधी पहुंचे थे। इस दौरान राहुल गांधी ने लालू परिवार संग न सिर्फ बिहारी मटन का स्वाद चखा था, बल्कि इसे बनाया भी था। वीडियो शेयर करते हुए राहुल गांधी ने कैप्शन लिखा- लालू जी की सीक्रेट रेसिपी और राजनीतिक मसाला। वीडियो में राहुल गांधी लालू यादव से मटन की रेसिपी के साथ राजनीतिक मसालों की टिप्स भी लेते नजर आ रहे हैं। इस दौरान लालू यादव की बड़ी बेटी मीसा और तेजस्वी भी वहां पर मौजूद थे।

महागठबंधन के दोस्त घोटालों के सरदार, सोनिया-राहुल ने रची 2000 करोड़ की संपत्ति हड़पने की साजिश, लालू ने चारे के साथ हफ्ता भी खाया; फिर भी आज़ाद घूम रहे हैं, क्यों? क्या इन बड़े घोटालेबाज़ों के लिए अलग कानून है? केजरीवाल ने औरतों को बनाया मूर्ख(देखिए वीडियो)

संविधान की शपथ लेने वाले ही जब संविधान की धज्जियाँ उड़ाएंगे फिर किस मुंह से संविधान बचाने की माला जपते हैं? ये जो संविधान की किताब लाल रंग की दिखाई जाती है ये संविधान या जादूटोने वाली "लाल किताब"? दूसरे, जनता भी ऐसे ही घोटालेबाज़ों को सिरमौर बनाये हुए हैं। जब जनता ही ऐसे घोटालेबाज़ों को सिरमौर बनाएगी तो घोटाले तो होंगे ही। आम आदमी पार्टी संयोजक अरविन्द केजरीवाल भी पीछे नहीं रहा। ईमानदारी का चोला ओढे घूमने वाला भी एक बड़ा घोटालेबाज़ निकला। दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री (अब स्व) शीला दीक्षित को भ्रष्टाचारों के आरोप में जेल भेजने सत्ता में आया, लेकिन दीक्षित को तो जेल भेज पाए खुद ही जेल घूम आये और जमानत पर घूम रहे हैं।    

   
महागठबंधन के पार्टनर बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीति के बजाए घोटालों के चलते ज्यादा सुर्खियों में आ रहे हैं। नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी करतूतों के चलते पहले ही घिर चुके हैं। अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि नेशनल हेराल्ड मामले में 2000 करोड़ की संपत्ति हड़पने की साजिश सोनिया-राहुल गांधी ने ही रची थी। ईडी ने यह बड़ा दावा बुधवार को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई के दौरान किया है। ईडी ने बताया कि कांग्रेस और राहुल-सोनिया की करीब 2,000 करोड़ रुपये की संपत्ति हड़पना चाहते हैं। इसके चलते इन्होंने साजिशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) का पूरा स्वामित्व मात्र 50 लाख देकर हासिल किया था। प्रवर्तन निदेशालय की चार्जशीट में कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा और राजीव गांधी फाउंडेशन के ट्रस्टी सुमन दुबे भी अभियुक्त हैं। 

लोगों के जेहन में अभी बड़ा सवाल यही है कि सोनिया-राहुल नेशनल हेराल्ड केस में कैसे फंसे? दरअसल, नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) करती है। इसका मालिकाना हक यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के पास है। यही वह कंपनी है, जिसमें सोनिया-राहुल की हिस्सेदारी है। यही वजह है कि ईडी की जांच की आंच इन दोनों तक जा पहुंची है। दूसरी ओर महागठबंधन के एक अन्य पार्टनर राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव भी करोड़ों के घोटाले में एक बार फिर सुर्खियों में हैं। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले 950 करोड़ रुपये के चारा घोटाले का जिन्न एक बार फिर निकल आया है।

आखिर इतने बड़े घोटाले करने के बाद भी घोटालेबाज़ नेता बने ऐश कर रहे हैं, क्या किसी आम नागरिक ने इन घोटालों का 1% प्रतिशत भी घोटाला किया होता क्या वह भी ऐसे खुला घूम ऐश कर रहा होता? क्या कोर्ट और सरकार इन घोटालेबाज़ों के आगे बौने हैं?    

 कंपनी पर कब्जे के लिए सोनिया-राहुल ने मात्र 50 लाख का भुगतान किया

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई के दौरान नेशनल हेराल्ड केस में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ा दावा किया है। ईडी ने साफ-साफ कहा कि कांग्रेस और सोनिया-राहुल गांधी नेशनल हेराल्ड की करीब 2,000 करोड़ रुपये की संपत्ति हड़पना चाहते थे। ईडी की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने कोर्ट में कहा, ‘नेशनल हेराल्ड की संपत्तियों पर कंट्रोल करने के लिए यंग इंडियन लिमिटेड बनाने की साजिश रची गई थी, जिसमें कांग्रेस संसदीय पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्षी नेता राहुल गांधी प्रमुख हिस्सेदार हैं। इसका लक्ष्य पार्टी नेतृत्व को व्यक्तिगत लाभ पहुंचाना था।’ एएसजी ने कहा कि दो हजार करोड़ रुपये की पूरी कंपनी को अपने कब्जे में लेने के लिए सोनिया-राहुल ने मात्र 50 लाख का भुगतान किया था।
कांग्रेस के बड़े नेताओं के निर्देश पर फर्जी तरीके से भुगतान किए गए
एएसजी राजू ने दावा किया कि कांग्रेस के कई सीनियर नेता एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को किए गए ‘फर्जी लेनदेन’ में शामिल थे। ईडी के मुताबिक, कांग्रेस के बड़े नेताओं के निर्देश पर कुछ लोगों ने फर्जी तरीके से किराए का भुगतान किया था। इन लेन-देन के साथ फर्जी किराया रसीदें तैयार की गई थीं। ईडी ने दावा किया कि साजिश थी कि यंग इंडिया के माध्यम से 2,000 करोड़ की संपत्ति कब्जे में लेकर 90 करोड़ का कर्ज लिया जाए। अतिरिक्त सालिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने कहा कि एजेएल के पास दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, पंचकूला, पटना और अन्य स्थानों पर संपत्तियां हैं। हालांकि, एजेएल का अधिग्रहण करने के तुरंत बाद यंग इंडिया (गांधी परिवार द्वारा नियंत्रित एक इकाई) ने घोषणा की कि वह नेशनल हेराल्ड सहित किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन में शामिल नहीं होगी। एएसजी राजू ने कोर्ट को बताया कि ईडी की जांच में यह भी सामने आया है कि यंग इंडिया पर राहुल गांधी और सोनिया गांधी का नियंत्रण था। दोनों ने मिलकर 76 प्रतिशत शेयर अपने पास रखे थे। वास्तव में ये कंपनियां उनके नियंत्रण में थीं और इनके संचालन के लिए वो जिम्मेदार थे।
करोड़ों की कंपनी को खरीदने और बेचने वाला एक ही पक्ष- भाजपा
अब भाजपा की तरफ से भी यही दावा किया गया है कि नेशनल हेराल्ड का मामला बड़ा विचित्र है, जिसमें हजारों करोड़ रुपए की संपत्तियों वाली एक कंपनी महज 90 करोड़ रुपए की देनदारी में बिक गई और इसे खरीदने और बेचने वाला दोनों एक ही पक्ष के थे। जो कांग्रेस देश में इतने साल तक सत्ता में रही, उसके रहते 2008 में यह अखबार बंद हो गया। यानी सत्ता में रहते हुए भी कांग्रेस अपनी इस विरासत को नहीं बचा पाई। भाजपा की तरफ से तो यह भी दावा किया गया है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेता चाहते ही नहीं थे कि यह अखबार चले। भाजपा की तरफ से यह भी कहा गया कि 5 मई से पहले 3 मई 1950 को भी सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेशनल हेराल्ड मामले को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा था, जिसका स्पष्ट उल्लेख कॉरेस्पोंडेंस ऑफ सरदार पटेल में मिलता है। इस पत्र में उन्होंने लिखा कि यदि यह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के द्वारा शुरू किया गया अखबार था, तो सरकार से जुड़े हुए लोगों की इसमें इतनी संलिप्तता आपत्तिजनक है।
2000 करोड़ रुपए की बिल्डिंग पर कब्जे की सरेआम साजिश
सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप था कि ऐसा दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित हेराल्ड हाउस की 2000 करोड़ रुपए की बिल्डिंग पर कब्जा करने के लिए किया गया था। स्वामी ने 2000 करोड़ रुपए की कंपनी को केवल 50 लाख रुपए में खरीदे जाने को लेकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत केस से जुड़े कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की थी। जून 2014 ने कोर्ट ने सोनिया, राहुल समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ समन जारी किया। अगस्त 2014 में ED ने इस मामले में एक्शन लेते हुए मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया। दिसंबर 2015 में दिल्ली के पटियाला कोर्ट ने सोनिया, राहुल समेत सभी आरोपियों को जमानत दे दी।

लालू यादव स्वयंभू अध्यक्ष बने और बेटों में उत्तराधिकार की लड़ाई, तेजस्वी सीएम फेस और तेजप्रताप किंगमेकर; तेजप्रताप को परिवार से बहिष्कृत करना गहरा षड़यंत्र

परिवार केन्द्रित पार्टियों में अध्यक्ष पद में और कोल्हू के बैल में कोई फर्क नहीं। जिस तरह कोल्हू का बैल तेल निकलने के लिए सुबह से शाम तक एक सीमा में चक्कर लगाता है, ठीक यही हालत परिवार केन्द्रित पार्टियों की है। परिवार से बाहर का नेता अध्यक्ष ही नहीं बन सकता। कांग्रेस गोलमाल कर सबको पागल बना गुमराह किये हुए है। परिवार से बाहर का बना कांग्रेस अध्यक्ष सिर्फ आँखों में धूल झोंकने से कम नहीं। क्योकि जो परिवार के हुक्म के बिना रोटी नहीं खा सकता ऐसे अध्यक्ष से क्या फायदा। देखा नहीं कांग्रेस अध्यक्ष खड़के कर्नाटक में विवाद होने पर बोलता है "फैसला high command करेगा", अब अक्ल से पैदल खड़के से पूछो कि अध्यक्ष से बड़ा high command कौन होता है? यानि खड़के ने खुद साबित कर दिया कि "कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष नहीं बल्कि गाँधी परिवार का गुलाम है।"     

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों के बीच उत्तराधिकार की लड़ाई जमीन पर आ गई है। हाल ही में लालू यादव ने बड़े बेटे तेज प्रताप को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निलंबित कर दिया। आरोप है कि वे तेजस्वी यादव को आगे बढ़ाने में लगे हैं। तेजस्वी भी चुनाव से पहले खुद को स्वंयभू सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करने में लगे हैं। हालांकि महागठबंधन की ओर से उन्हें सीएम फेस बनाने पर कोई सहमति नहीं बनी है। दूसरी ओर तेज प्रताप यादव ने भी चेतावनी भरे लहजे में बोल दिया है कि लालू यादव का असली उत्तराधिकारी कौन होगा, ये कोई और नहीं बल्कि बिहार की जनता तय करेगी। लेकिन इतना तो तय है कि बिहार में असली किंगमेकर की भूमिका में वे ही होंगे। तेज प्रताप यादव और राजद के अन्य वरिष्ठ नेताओं के बीच चल रही तनातनी महागठबंधन की चुनावी संभावनाओं को जरूर नुकसान पहुंचा सकती है। बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे तेज प्रताप पिछले कुछ समय से लालू यादव के उत्तराधिकारी और उनके छोटे भाई तेजस्वी प्रसाद यादव के लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं।

 बिहार की जनता ही लालू का उत्तराधिकारी तय करेगी – तेजप्रताप

लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे और राष्ट्रीय जनता दल से निष्कासित तेज प्रताप यादव ने कहा है कि लालू यादव का उत्तराधिकारी कौन है ये बिहार की जनता तय करेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि पिता लालू यादव का अंदाज जब मेरे अंदर आता है तो लोग पसंद करते हैं। जो जमीन से जुड़ा रहता है उसका बोली भी वैसा ही निकलता है। हम जमीन से जुड़े नेता हैं। कभी मीटिंग में जाते हैं, जनसभा करते हैं तो उस तरह का आवाज निकलता है। सब लोग कहते हैं कि आपका ठेठ लालू जी वाला आवाज है, अंदाज है। तेज प्रताप यादव ने आजतक से बातचीत में साफ-साफ कहा कि बिहार चुनाव में किंगमेकर की भूमिका में मैं ही रहूंगा। जैसे उनके पिता लालू यादव किंग मेकर की भूमिका निभाते रहे हैं। तेज प्रताप यादव ने कहा हमारे काम से दुश्मन का सफाया होगा. उन्होंने कहा कि वे कृष्ण के भक्त हैं और जो भी साजिश रचेगा उसे वे तोड़ेंगे और अपना काम करके तोड़ेंगे।
रिलेशनशिप उजागर होने पर तेजप्रताप को पार्टी से निकाला था
दरअसल, भाइयों की तनातनी के बीच बिहार चुनाव से पहले लालू यादव ने अपने एक ‘लाल’ से नाता तोड़ लिया। तेजप्रताप ने अपना रिलेशनशिप वाला शिगूफा क्या छोड़ा, उससे लालू समेत सारी पार्टी ही असहज हो गई। उन्हें लगा कि इससे चुनाव में विरोधियों को अच्छा मौका मिल जाएगा। इसलिए तेज प्रताप यादव को पार्टी से, परिवार से निकाले जाने की घोषणा लालू यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए की। लालू यादव ने अपने बेटे तेजप्रताप यादव को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया। जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। सवाल यह है कि तेज प्रताप यादव का अगला कदम क्या होगा, क्या वे नई पार्टी बनाएंगे या किसी अन्य दल में शामिल होंगे या फिर निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। हर सूरत में इसका नुकसान राजद को होगा। इस बीच लालू यादव की बहू ऐश्वर्या ने दावा किया कि उनके पति तेज प्रताप यादव को पार्टी से निष्कासित करना आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया एक ‘नाटक’ है। भाजपा और अन्य दलों ने भी लालू के इस कदम को चुनाव के लिए उठाया गया राजनीतिक स्टंट करार दिया है। यह तय है कि तेज प्रताप को लेकर लालू-तेजस्वी को विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ेगा।
मैं ही हूं सीएम फेस, बिहार को स्कॉटलैंड बना दूंगा- तेजस्वी
बिहार विधानसभा चुनावों से पहले तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावा पेश किया है, जिसमें इंडिया गठबंधन की सहमति का दावा भी किया गया है। साथ ही सरकार बनने पर बिहार को स्कॉटलैंड बनाने का वादा किया। उन्होंने अपने भाई तेजप्रताप यादव को लेकर भी प्रतिक्रिया दी। तेजस्वी यादव ने कहा कि तेजप्रताप यादव ने जो किया, वो मुझे पसंद नहीं है। सीएम फेस को लेकर तेजस्वी यादव से पहले कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार भी बयान दे चुके हैं। विधानसभा चुनाव को लेकर बिहार का सियासी पारा अभी से हाई हो चुका है। तमाम मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच घमासान मचा हुआ है। सीएम फेस का स्वयंभू ऐलान करने से पहले तेजस्वी यादव ने दावा किया कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने पर वक्फ अधिनियम को कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा।
राजद फिर पार्टी नहीं प्रॉपर्टी बनी, लालू यादव 13वीं बार अध्यक्ष
इस बीच बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव 13वीं बार राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए हैं। एक तरह से उन्होंने राजद को घर की पार्टी ही बना दिया है, जिसमें पार्टीगत लोकतंत्र नाम को कोई चीज नहीं है। उनके चयन की औपचारिक घोषणा आगामी पांच जुलाई को पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में होगी। पांच जुलाई 1997 को आरडेजी के अस्तित्व में आने के बाद से लालू यादव ही लगातार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। वे सेहत संबंधी बीमारियों के चलते सार्वजनिक मंचों पर कम ही दिखते हैं और राजनीतिक रूप से उनकी सक्रियता भी काफ़ी कम हुई है, लेकिन अध्यक्ष बनने का लोभ वे अभी भी संवरण नहीं कर पा रहे हैं। जेडीयू प्रवक्ता अंजुम आरा कहती हैं, “लालू प्रसाद यादव सज़ायाफ़्ता हैं और उनको अध्यक्ष बनाना ये साबित करता है कि आरजेडी में संविधान, लोकतांत्रिक मर्यादाएँ मायने नहीं रखती।” वहीं बीजेपी नेता और बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने राजद को “पार्टी नहीं प्रॉपर्टी” की संज्ञा दी है। वो कहते हैं, “ये बार-बार नामांकन की नौटंकी क्यों की जा रही है? जब राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद तो लालू के पास ही रहेगा।”
तेज प्रताप यादव के राजद के असली उत्तराधिकारी-जीवेश कुमार
तेजस्वी और तेजप्रताप के बीच उत्तराधिकार की लड़ाई के बीच नगर विकास एवं आवास विभाग के मंत्री जीवेश कुमार ने तार्किक रूप से अपनी बात रखी है। हाजीपुर सर्किट हाउस में मीडिया से बात करते हुए मंत्री जीवेश ने कहा कि तेज प्रताप यादव ही राजद और लालू के असली उत्तराधिकारी हैं। वे सही मायने में एक कुशल नेतृत्वकर्ता हैं, लेकिन लालू प्रसाद ने तेज प्रताप के साथ न सिर्फ नाइंसाफी की है बल्कि उन्हें हाशिए पर रखा है। आने वाले समय में उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा और उसे पाने के लिए युद्ध करना पड़ेगा। फाइटर प्लेन उड़ाने की ट्रेनिंग लेने और पीएम मोदी से युद्ध में जाने का मौका मांगने के तेज प्रताप के बयान पर उन्होंने कहा कि राजा-महाराजा के समय से यह परंपरा चली आ रही है, कि घर के बड़े बेटे को युवराज और परिवार की वारिस का उत्तराधिकारी बनाया जाता है, लेकिन परिवारवादी पार्टी राजद में छोटे पुत्र तेजस्वी को आगे कर उन्हें उत्तराधिकारी बना दिया गया।

बिहार : किसे कहते हैं ‘इराज’, लेकिन ‘चाराबुद्धि’ ही समझने को नहीं तैयार: तेजस्वी यादव ने हिंदुओं को कोसते हुए बेटे के नाम पर फिर फैलाया झूठ

तेजस्वी ने कहा बेटे का नाम हनुमान के नाम पर, नित्यानंद ने दिया प्रमाण, बताया हनुमान नहीं कामदेव का नाम (साभार: हिंदुस्तान, इंस्टाग्राम)
बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के घर में उनके बेटे के नाम पर जितनी चर्चा नहीं हुई होगी उससे अधिक चर्चा उस नाम को लेकर देश के अन्य हिस्सों में होने लगी है। कोई इसे संस्कृत का शब्द कह रहा है तो कोई ऊर्दू का। इतना ही नहीं कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने तो ‘इराज’ नाम का मजाक उड़ाते हुए तेजस्वी को ईरान और इराक नाम रखने की भी सलाह दे दी थी।

अब एक इंटरव्यू में तेजस्वी ने जहाँ फिर एक बार इस नाम को भगवान ‘हनुमान’ का नाम बताया है, वहीं दूसरी तरफ संस्कृति के जाने-माने विद्वान, शोधकर्ता और संपादक नित्यानंद मिश्रा ने तेजस्वी के बेटे के नाम ‘इराज’ को ‘कामदेव’ का नाम बताया है।

न्यूज एजेंसी ANI के तेजस्वी यादव से लिए गए एक इंटरव्यू की वीडियो में 31 मिनट 9 सेकेंड से 33 मिनट 10 सेकेंड तक उनके बेटे के इराज नाम पर चले सवाल-जवाब वाली क्लिप में तेजस्वी यादव से पूछा गया कि बीजेपी आप पर हमेशा आरोप लगाती है कि आप मुस्लिमों के हितैषी हैं, आपने बेटी का नाम कात्यायानी रखा है जो कि माँ दुर्गा के नाम पर है। वहीं बेटे का नाम इराज रखा है, जो कि भगवान हनुमान के नाम पर है। तो आप इसके जरिए क्या मैसेज देना चाह रहे हैं?

इस पर जवाब देते हुए तेजस्वी ने कहा कि जब हमने अपने बेटे का नाम इराज रखा और लालूजी ने सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। इसके बाद कई भक्त लोग ऐसे थे जिन्होंने कमेंट में लिखा कि इराज क्यों नाम रख रहे हो, एजाज खान नाम रख लेते। ईरान और इराक रख लेते।

तेजस्वी ने कहा “लोगों को ये नहीं पता है कि ‘इराज’ संस्कृत का शब्द है और इसका मतलब है ‘पवनपुत्र’। जो कि हनुमान जी का नाम है। उन लोगों को कोई ज्ञान नहीं है सनातन का।” भाजपा पर तंज कसते हुए तेजस्वी ने कहा कि पार्टी के लोगों को ना ही संविधान का ज्ञान है ना ही धर्म का।

वहीं हिंदू धर्म और संस्कृत पर एक दर्जन से अधिक किताबें लिख चुके संपादक नित्यानंद मिश्रा ने यूट्यूब पर एक वीडियो जारी करते हुए बताया है कि इराज नाम तो बेशक संस्कृत का शब्द है, लेकिन इसका भगवान हनुमान से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि लालू यादव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए इराज नाम रखने के पीछे कारण बताया था कि क्योंकि उनके पोते का जन्म मंगलवार को हुआ है और मंगलवार भगवान हनुमान का दिन माना जाता है, इसलिए उन्होंने हनुमान जी के ही एक नाम इराज पर अपने पोते का नाम रखा है।

 नित्यानंद ने कहा कि उसके बाद से लगातार उनसे सवाल किया जा रहा था कि इराज नाम को लेकर काफी चर्चा है, वो बताएँ कि असल में यह शब्द हिंदी का ही है या संस्कृत का। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को ये भी शक है कि ये उर्दू का शब्द है। नित्यानंद ने इस पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि इंटरनेट भी इराज को भगवान हनुमान का नाम बता रहा है जबकि इराज संस्कृत का शब्द तो है, लेकिन यह हनुमान जी का नहीं बल्कि कामदेव का नाम है।

नित्यानंद ने बकायदा प्रमाण देते हुए बताया, “संस्कृत के दो प्रामाणिक कोश शब्दकल्पद्रुम और वाचस्पत्यम में इराज शब्द है। इन दोनों कोशों में हलायुध कोश का उद्धरण देते हुए बताया गया है कि इराज का अर्थ है कन्दर्प अर्थात कामदेव। इस प्रकार इराज एक संस्कृत नाम तो है पर कामदेव का, ना कि हनुमान का।”  

एक नहीं नित्यानंद ने अपनी वीडीयो में अनेक ऐसे साक्ष्य पेश किए जो इराज नाम का संबंध कामदेव से होने की पुष्ट करते हैं। अपनी वीडियो में उन्होंने ‘आप्टे संस्कृत हिंदी कोश’ और ‘मोनियर विलियम्स संस्कृत अंग्रेजी कोश’ का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें ईरज शब्द है और उसका मतलब है जिसका जन्म वायु से हुआ है, अर्थात भगवान हनुमान। उनका कहना है कि एक जैसे लगने वाले इन शब्दों में ईरज हनुमान का नाम है और इराज कामदेव का।

सोचने वाली बात है कि जिन्हें हिंदू धर्म और संस्कृति पर ज्ञान देने का शौक हो कम से कम उन्हें तो इससे संबंधित फैसले भली-भाँति जाँच कर के ही लेने चाहिए। असल में बात तो ये है कि लोगों की मानसिकता इतने तक ही सिमट कर रह गई है कि हम समाज में अपने किसी फैसले से समाज में एक उदाहरण पेश करें, भले ही बाद में उसकी आलोचना हो या वह पूर्ण असत्य और निराधार ही साबित क्यों ना हो जाए।