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25 सालों बाद हिन्दू आतंकवाद की सच्चाई सामने आई :‘कांग्रेस ने भगवा आतंकवाद बोलने को कहा’: UPA सरकार में मंत्री रहे सुशील शिंदे ने खोल दी पार्टी की असलियत, पुराना वीडियो Viral

कांग्रेस आलाकमान सोनिया गाँधी के साथ पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे (फोटो साभार: IndiaToday)
केंद्र में कांग्रेस की सरकार में 2012 से 2014 तक गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ को लेकर बड़ा बयान दे रहे हैं। उन्होंने माना कि यह शब्द इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था और इसके पीछे पार्टी का हाथ बताया। अब सच्चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग कांग्रेस को खूब लताड़ लगा रहे हैं।

वीडियो में सुशील कुमार शिंदे से जब पूछा गया कि ‘भगवा आतंकवाद' टर्म सही था या नहीं तब वह कहते हैं, “पार्टी (कांग्रेस) ने बताया था कि भगवा आतंकवाद बोलना है, मैंने वही किया। गलत तो था। मैं यह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। ऐसा नहीं होना चाहिए था। ये उस पार्टी की विचारधारा होती है। ये चाहे भगवा हो या रेड हो या सफेद हो। ऐसा कोई आतंकवाद नहीं होता है।”

हालाँकि, सुशील शिंदे का यह बयान डेढ़ साल पुराना है। जब यूट्यूबर और पत्रकार शुभांकर मिश्रा ने सुशील कुमार शिंदे के साथ पॉडकास्ट किया था। अब इस वीडियो के एक अंश वायरल हो रहा है, जिसमें शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे भद्दे प्रोपेगेंडा को गलत बताकर अपना कबूलनामा सौंप रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

अब डेढ़ साल बाद सोशल मीडिया पर शिंदे के इस बयान का वीडियो वायरल होने के बाद बवाल मच गया है। लोग इसे कांग्रेस की ‘झूठों’ से पर्दा उठाने और कांग्रेस की हिंदू-घृणा जैसी बातें कह रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का कबूलनामा बताया है। बीजेपी ने सवाल उठाया कि क्या यह सनातन संस्कृति को बदनाम करने की कांग्रेस की एक सोची-समझी साजिश थी?

बीजेपी नेता डॉ. निखिल आनंद कहते हैं कि सुशील कुमार शिंदे का बयान कांग्रेस की वैचारिक सोच को उजागर करता है। उनके मुताबिक कांग्रेस और उससे जुड़ी विचारधारा ने हमेशा भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सनातन आस्था को निशाना बनाया है तथा राजनीतिक हितों के लिए कट्टरपंथी ताकतों के साथ समझौता किया है। उन्होंने लोगों से ऐसे तत्वों के प्रति सतर्क रहने और लोकतांत्रिक तरीके से उनका जवाब देने की बात कही।

कपिल बिश्नोई कहते हैं, “कांग्रेस पार्टी की हिंदुओं और भगवा रंग से नफरत किसी से ढकी छिपी नहीं है। रह रह कर ये नफरत किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाती है।”

एक्स हैंडल ‘जनार्दन मिश्रा’ ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा, “अब तो पूर्व कांग्रेसी भी सच बोलने लगे लेकिन चमचे फिर भी नहीं मानेगे…!!”

‘भगवा आतंकवाद’ पर शिंदे ने क्या कहा था?

भारत के गृहमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने साल जनवरी 2013 में कहा था कि भाजपा और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। इस बयान को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी। हालाँकि, इन आलोचनाओं के बाद भी वे अपने बयान पर कायम थे।

तब गृहमंत्री शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है, कोई दूसरी बात नहीं कही है।” दरअसल, 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान शिंदे ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाया था।

अपने बयान के पीछे शिंदे ने एक कथित रिपोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था, “हमारे पास रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं। समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि ऐसी कोशिशों से देश को सतर्क रहना चाहिए। शिंदे के इस बयान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें मुबारकवाद दी थी। इससे पहले गृहमंत्री रहते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने साल 2010 में सबसे पहले भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था।

भगवा आतंकवाद पर केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में 25 अगस्त 2010 को डीजीपी और आईजी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा था, “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।”

खामेनेई की मौत पर रोने वाली सोनिया गाँधी 'गद्दाफी, सद्दाम और बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्याओं पर क्यों खामोश रहीं?


कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर मोदी सरकार की चुप्पी को लेकर केंद्र पर निशाना साधा
 उन्होंने कहा कि सरकार का ये रुख भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है सोनिया गांधी के इस हमले पर बीजेपी ने पलटवार किया है। 2011 में लीबिया में गद्दाफी की मौत के समय यूपीए की सरकार थी, लेकिन तब सरकार ने गद्दाफी की मौत पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया था और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई थी

"2011 में जब लीबिया में नाटो हमलों के बीच भागते समय मुअम्मर गद्दाफी की हत्या हुई थी, तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी उस समय भारत और लीबिया के बीच मजबूत संबंध थे वर्ष 2004 से 2007 के बीच भारत के सात मंत्रियों ने लीबिया का दौरा किया था, जिनमें तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे इसके बावजूद गद्दाफी की मृत्यु पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया गया और न ही कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई उस समय न तो 'नैतिक जिम्मेदारी' पर भाषण दिए गए और न ही 'सभ्यतागत संबंधों' का हवाला देकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया "


विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति का संचालन भावनात्मक या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर किया जाता है भारत ने वर्तमान संकट के दौरान संयम, संप्रभुता के सम्मान और तनाव कम करने की अपील लगातार दोहराई है यह कहना कि भारत चुप है, तथ्यों का सरलीकरण है कूटनीति सार्वजनिक मंचों पर आक्रामक बयान देने का नाम नहीं, बल्कि परदे के पीछे संतुलित और सावधान संवाद की प्रक्रिया है

कहा गया कि आज खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक रह रहे हैं इनमें बड़ी संख्या केरल से है उनकी सुरक्षा, रोजगार और परिवारों की स्थिरता भारत सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय है क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण कुछ स्थानों पर सीबीएसई स्कूलों की परीक्षाएं स्थगित होने की खबरें भी सामने आईं, जिससे भारतीय छात्रों के शैक्षणिक जीवन पर असर पड़ा ऊर्जा क्षेत्र और समुद्री परिवहन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के सामने भी प्रत्यक्ष जोखिम की स्थिति बनी ऐसे में कोई भी गैर-जिम्मेदाराना बयान सीधे भारतीय समुदाय को प्रभावित कर सकता है

कांग्रेस नेतृत्व पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह चुनिंदा मुद्दों पर ही मुखर होता है आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के समय वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं दिखी, जैसी आज सरकार की कूटनीतिक भाषा पर दिखाई जा रही है. विदेश नीति को सांप्रदायिक या चुनावी नजरिए से देखना क्या उचित है, यह भी बहस का विषय बना हुआ है

ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई का रिकॉर्ड भी चर्चा में है बीते वर्षों में उन्होंने कई बार भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की दिल्ली दंगों को लेकर बयान, कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर टिप्पणियां, तथा नागरिकता संशोधन अधिनियम पर प्रतिक्रिया—इन सब पर भारत ने सार्वजनिक आक्रामकता से बचते हुए संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया 2017 में उन्होंने कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन की अपील की थी इसके बावजूद भारत ने संबंधों को पूरी तरह से तनावपूर्ण दिशा में नहीं जाने दिया

2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी तेहरान की प्रतिक्रिया को लेकर भारत में निराशा रही थी उस समय की रिपोर्टों में संकेत मिले थे कि ईरानी मीडिया के कुछ हिस्सों ने पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति दिखाई थी इसके बावजूद भारत ने संवाद के दरवाजे बंद नहीं किए

इतिहास के एक और अध्याय की ओर इशारा किया जा रहा है यूपीए सरकार के दौरान भारत ने 2005, 2006 और 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ मतदान किया था उस समय भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर वार्ता चल रही थी और भारत ने पश्चिमी देशों के साथ कदम मिलाया तब “सभ्यतागत संबंधों” की चर्चा उतनी प्रमुख नहीं थी, जितनी आज की राजनीतिक बहसों में दिखाई देती है

वैश्विक परिप्रेक्ष्य भी महत्वपूर्ण है. मौजूदा घटनाक्रम पर दुनिया के अधिकांश प्रमुख देशों ने अत्यधिक तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है रूस जैसे देश, जिन्हें ईरान का करीबी माना जाता है, उन्होंने भी संतुलित भाषा का प्रयोग किया है यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों ने भी संयम बरता है ऐसे में भारत पर यह अपेक्षा करना कि वह सबसे मुखर और आक्रामक बयान दे, क्या व्यावहारिक है?

विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश नीति को “चयनात्मक आक्रोश” के आधार पर नहीं चलाया जा सकता राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय स्थिरता और नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि होती है भारत की ऊर्जा जरूरतें, खाड़ी देशों के साथ आर्थिक संबंध और वहां बसे करोड़ों भारतीयों का भविष्य किसी भी बयान से जुड़ा होता है

अंततः यह बहस ईरान या लीबिया से अधिक घरेलू राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है सवाल यह है कि क्या विदेश नीति को नैतिकता की सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनाया जाए या रणनीतिक संतुलन का उपकरण समझा जाए? 2011 में भी भारत ने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी थी और आज भी वही सिद्धांत लागू होता दिखाई देता है

भारत कब और कैसे बोलेगा, यह उसका संप्रभु निर्णय है हर स्थिति में ऊंची आवाज ही प्रभावी कूटनीति का प्रमाण नहीं होती कई बार संयम ही सबसे सशक्त संदेश होता है। यही राज्यकला है, और यही परिपक्व कूटनीति की पहचान भी

ममता बनर्जी के ‘दखल’ से चर्चा में आया 49 साल पुराना किस्सा : CBI का छापा, सोनिया का पास्ता मेकर और इंदिरा गाँधी

                                   बंगाल मुख्यमंत्री की दखल से चर्चा में आया इंदिरा गाँधी वाला किस्सा
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के चुनावी प्रबंधन का काम देखने वाली I-PAC कंपनी पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान जो ड्रामा हुआ, उसे ऑन टीवी हर किसी ने देखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कंपनी के मालिक के घर पहुँची और जरूरी फाइलें, लैपटॉप और अन्य दस्तावेज लेकर निकल गईं। उनका यह रवैया देख हर कोई हैरान रह गया कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ऐसा कैसे किया जा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक नाम ने जाँच एजेंसियों से बचने के लिए असामान्य कदम उठाए हों। इतिहास में ऐसा एक बड़ा उदाहरण 1977 का है जिसका जिक्र कैथरीन फ्रैंक की किताब- इंदिरा- द लाइन ऑफ इंदिरा नेहरू में पढ़ने को मिलता है।

                             फ्रैंक कैथरीन की किताब, जिसमें घटना का जिक्र है (फोटो साभार: अमेजन)

जब इंदिरा गाँधी के घर पड़ी CBI की रेड

ये वो समय था जब 1977 में आपातकाल के बाद जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों और दुरुपयोग की जाँच करना था। आयोग ने इंदिरा गाँधी को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन वह हर बार अपने वकील फ्रैंक एंथनी की सलाह पर आयोग के समक्ष पेश होने से इनकार करती रहीं और इसे असंवैधानिक और गैरकानूनी भी ठहरा दिया।

एक तरफ इंदिरा गाँधी लगातार शाह कमीशन से बचने की कोशिशों में लगी हुईं थीं। दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों की पड़ताल शुरू थी। किताब में लिखे अंश के अनुसार, 3 अक्तूबर 1977 का दिन आया। उनके घर 12 विलिंगडन क्रेसेंट पर सीबीआई की रेड पड़ी। उनके बेटे संजय और बहू मेनका लॉन पर बैडमिंटन खेल रहे थे। दो सीबीआई अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने आए और इंदिरा गाँधी से कहा कि वे हिरासत में ली जाती हैं। हालाँकि, इंदिरा ने ऐसा होने की उम्मीद लगाई हुई थी और शायद इससे निपटने की उनकी रणनीति भी तैयार थी।

सीबीआई अधिकारियों से उस समय इंदिरा गाँधी ने पैकिंग के लिए समय माँगा और घर के भीतर चली गईं। करीबन 5 घंटे वह घर में रहीं और शाम के 8 बजे वह सफेद साड़ी (हरी बॉर्डर वाली) पहनकर भीड़ के आगे आईं। बताया जाता है कि इन पाँच घंटों में इंदिरा गाँधी ने घर के भीतर बहुत कुछ किया। उन्होंने अपने समर्थकों को बुलाया, प्रेस को सूचित किया, परिजनों से बात की और सामान बाँधा, जिसमें सबसे हैरान करने वाली चीज थी सोनिया गाँधी का एक पास्ता मेकर।

                                                 कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

किताब में एक अफवाह के तौर पर ही सही, लेकिन ये बताया गया है इंदिरा गाँधी के सामान में उस समय पास्ता मेकर मिलने की कोई वजह नहीं थी सिवाय इसके कि उन्होंने इससे उन दस्तावेजों को नष्ट किया जो उनके लिए समस्या बन सकते थें।

                                           कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

इसके बाद क्या सब हुआ ये इतिहास में दर्ज है। इंदिरा गाँधी ने तब इस गिरफ्तारी को अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भुनाया। बाद में सुनवाई हुई। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ठोस सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर दिया। और ये चर्चा कभी नहीं हुई कि वो कागज क्या थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने पास्ता मेकर में डालकर काट दिया।

आज जब मीडिया में ममता बनर्जी से जुड़ी खबरें आई है तो ये किस्सा और भी प्रांसगिक हो गया कि कैसे इंदिरा गाँधी ने चालाकी से न केवल 5 घंटे में अपने लिए समर्थन बटोरा बल्कि अपने खिलाफ रखें सबूतों को भी नष्ट कर दिया। ये सच है कि उस समय इंदिरा के पक्ष में जैसे लोग आए 1978 में उन्हें उसका सीधा फायदा हुआ, मगर बंगाल में स्थिति ऐसी नहीं देखने को मिल रही। लोग ममता बनर्जी की हरकत पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। ईडी उनकी हरकत के खिलाफ हाई कोर्ट चला गया है। वहीं बंगाल सीएम ने भी इस मामले में अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत दी है। देखना यही है कि इस घटना को बंगाल की जनता कैसे लेगी?

आखिर सोनिया नेहरू के पत्र क्यों नहीं वापस कर रही? सोनिया गाँधी के पास मौजूद इन दस्तावेजों में दफन है क्या राज?

             सोनिया गाँधी के पास है जवाहरलाल नेहरू के 51 बक्से पत्र (फोटो साभार : RGF/News18)
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ’51 बक्से पत्रों’ को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्मा गई है। सोनिया गाँधी के पास मौजूद नेहरू-एडविना समेत कई हस्तियों के पत्रों के कॉन्टेंट को लेकर अक्सर चर्चा होती है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) लंबे वक्त से इन पत्रों को माँग रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस इनकी मौजूदगी से इनकार करती रही है। अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में नेहरू के पत्रों से जुड़े सरकार के एक जवाब के बाद खुद की ‘जीत’ की डुगडुगी बजाकर बीजेपी पर आरोप लगा दिया। लेकिन कॉन्ग्रेस की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और केंद्र सरकार ने सारा सच सामने रखते हुए कॉन्ग्रेस की खुशी पर पानी फेर दिया। अब इस मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

कैसे शुरु हुआ विवाद?

हालिया विवाद की शुरुआत हुई 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से। संबित ने संस्कृति मंत्रालय से पूछा कि ‘क्या वर्ष 2025 में पीएमएमएल के वार्षिक निरीक्षण के दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कतिपय दस्तावेज संग्रहालय से गायब पाए गए हैं। इसके जबाव में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘निरीक्षण के दौरान संग्रहालय से जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया है’।

कॉन्ग्रेस का ‘मनगढ़ंत’ नैरेटिव: ‘गायब’ शब्द के सहारे बचने की कोशिश

कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर को अपनी ढाल बनाया है। बस, इसी एक शब्द ‘गायब’ को पकड़कर कॉन्ग्रेस ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि भाजपा का प्रोपेगेंडा धराशायी हो गया।
कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने X पर (ट्वीट) पोस्ट कर पूछा, “कल आखिरकार लोकसभा में सच्चाई सामने आ ही गई। क्या अब माफी माँगी जाएगी?”

संस्कृति मंत्रालय का ‘पोस्ट वार’: कॉन्ग्रेस को दिखाया आईना

कॉन्ग्रेस के शोर के बीच संस्कृति मंत्रालय ने सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। मंत्रालय ने बताया कि 29 अप्रैल 2008 को सोनिया गाँधी के प्रतिनिधि एमवी राजन ने बकायदा पत्र लिखकर माँग की थी कि सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सभी निजी पारिवारिक पत्र और नोट्स वापस लेना चाहती हैं।
इसके बाद, 5 मई 2008 को 51 कार्टन (बक्से) भरकर नेहरू पेपर्स सोनिया गाँधी के आवास पर भेज दिए गए थे। मंत्रालय ने यह भी लिखा कि PMML पेपर्स को वापस पाने के लिए सोनिया गाँधी के ऑफिस के साथ लगातार संपर्क में है।
मंत्रालय ने दो तारीख ’28 जनवरी 2025 और 3 जुलाई 2025′ को बताते हुए लिखा कि नेहरू पेपर्स PMML से ‘गायब’ नहीं हैं क्योंकि उनकी लोकेशन (whereabouts) का पता है- वे सोनिया गाँधी के पास हैं।
मंत्रालय का सबसे कड़ा प्रहार यह था कि ये दस्तावेज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से संबंधित हैं और राष्ट्र की ‘दस्तावेजी विरासत’ हैं, न कि किसी की ‘निजी संपत्ति’ (Private Property)। इनका PMML की कस्टडी में होना और नागरिकों एवं विद्वानों के लिए उपलब्ध होना शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन 51 बक्सों में आखिर क्या है?

विवाद की सबसे बड़ी जड़ वे दस्तावेज हैं जो इन 51 बक्सों के भीतर कैद हैं। PMML के रिकॉर्ड बताते हैं कि इन कागजातों में नेहरू जी द्वारा विभिन्न महान हस्तियों को लिखे गए पत्र और नोट्स शामिल हैं। संबित पात्रा ने ट्वीट कर पूछा कि आखिर एडविना माउंटबेटन को लिखे गए उन पत्रों में ऐसा क्या है जिसे ‘सेंसर’ करने की जरूरत पड़ गई? एडविना के अलावा, इन बक्सों में जयप्रकाश नारायण, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के साथ हुए पत्राचार भी शामिल हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में देश के विभाजन, तत्कालीन कूटनीति और नेहरू के व्यक्तिगत विचारों के ऐसे पहलू हो सकते हैं जो कॉन्ग्रेस के बनाए ‘महिमा मंडित’ इतिहास को चुनौती दे सकें। अहमदाबाद के इतिहासकार रिजवान कादरी ने पत्र लिखकर इन पत्रों तक पहुँच माँगी। उनका कहना है कि गाँधी जी और पटेल के रिकॉर्ड तो व्यवस्थित हैं, लेकिन नेहरू के रिकॉर्ड का एक बड़ा हिस्सा (जो सोनिया गाँधी के पास है) शोध के लिए उपलब्ध नहीं है। क्या कॉन्ग्रेस डरती है कि अगर ये 51 बक्से सार्वजनिक हुए, तो नेहरू की वह छवि धूमिल हो जाएगी जो दशकों से पेश की जाती रही है?

पहले भी हुआ है विवाद: क्या इतिहास पर किसी एक परिवार का एकाधिकार है?

नेहरू के दस्तावेजों पर कब्जे का विवाद कोई नया नहीं है। 1971 के बाद इंदिरा गाँधी ने ये कागजात नेहरू मेमोरियल को सौंपे थे, लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह थी कि इंदिरा गाँधी ही इन दस्तावेजों की ‘मालकिन’ रहेंगी और उनकी अनुमति के बिना कोई भी शोधकर्ता इन्हें देख नहीं पाएगा।
1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों की ‘ट्रस्टी-गार्जियन’ बन गईं। PMML सोसाइटी अब इस पर कानूनी राय ले रही है कि क्या कोई दान की गई चीज इस तरह वापस ली जा सकती है और क्या राष्ट्रीय इतिहास के दस्तावेजों पर किसी परिवार का मालिकाना हक हो सकता है।
हाल ही में ‘द नेहरू आर्काइव‘ के नाम से एक डिजिटल प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें नेहरू के 104 खंडों के कार्यों को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सोनिया गाँधी के पास रखे 51 बक्से वापस नहीं आते, तब तक यह आर्काइव अधूरा रहेगा। भाजपा का तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा इतिहास को ‘कंट्रोल’ करने की कोशिश की है।
नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) करने पर भी कॉन्ग्रेस ने खूब विरोध किया था, क्योंकि वे नेहरू को केवल एक परिवार तक सीमित रखना चाहते हैं, जबकि सरकार उन्हें देश के सभी प्रधानमंत्रियों की विरासत का हिस्सा मानती है।

माफी किसे माँगनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस ने ‘गायब’ शब्द के पीछे छिपकर जिस तरह भाजपा से माफी की माँग की है, वह ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ जैसा मामला है। सरकार के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए, बल्कि सोनिया गाँधी ने उन्हें ‘होल्ड’ कर रखा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री के पत्र किसी निजी अलमारी में बंद होने चाहिए या राष्ट्रीय पुस्तकालय में?
अगर कॉन्ग्रेस पारदर्शी है, तो उसे ये 51 बक्से तुरंत वापस करने चाहिए। माफी भाजपा को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस को माँगनी चाहिए जिसने 2008 में राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को एक निजी आवास की संपत्ति बना दिया।

कानून/संविधान की धज्जियां उड़ाना कांग्रेस के DNA में शामिल; भारत का नागरिक बनने से पहले वोटर कैसे बन गईं? सोनिया गाँधी से दिल्ली की कोर्ट ने माँगा जवाब

मतदान प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाते गाँधी परिवार और उम्मीदवार राजेश खन्ना 
कहते हैं कि ज्यादा बड़बड़ करना अक्सर नुकसानदेय ही साबित होता है। कांग्रेस शहजादा राहुल गाँधी जिस तरह टूलकिट के हाथों कठपुतली बन नाचते हुए जो बोल रहे हैं कांग्रेस का ही बेड़ागर्क कर रहे हैं। कांग्रेस की जिन कारगुजारियों से आज की युवा पीढ़ी अनजान थी, उन्हें राहुल के बडबोल जगजाहिर कर रहे हैं। वोट चोरी के नाम पर मोदी सरकार को घेरने के चक्कर में कांग्रेस की ही पोलें खुल रही हैं कि जवाहर लाल नेहरू से लेकर सोनिया तक कांग्रेस खुद वोट चोरी करती रही है और महामूर्खों का झुण्ड INDI गठबंधन राहुल का पिछलग्गू बना हुआ है। 


दूसरे, कोई भी कानून हो या फिर संविधान उसकी धज्जियां कैसे उड़ाई जाती है, वह कांग्रेस से सीखने की जरुरत है। देश का जब सबसे पहला चुनाव हुआ था तब उत्तर प्रदेश के रामपुर से नेहरू के लाडले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को हिन्दू महासभा के उम्मीदवार विशन सेठ ने 6000 वोट से हरा दिया जो नेहरू से बर्दाश्त नहीं हुआ। पढ़िए नीचे दिए लिंक में:-     

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असल....

दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य सोनिया गाँधी को नोटिस जारी किया है। कोर्ट में दायर अर्जी में दावा किया गया है कि उनका नाम नई दिल्ली से 1980 वोटर लिस्ट में जोड़ा गया, फिर 1982 में हटा दिया गया। नोटिस नागरिकता लेने से पहले वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने को लेकर है। सोनिया गाँधी और राजीव गाँधी की शादी 25 फरवरी 1968 को हुई थी। दावा किया जा रहा है कि उन्होंने 1983 में देश की नागरिकता ली।

अर्जी में कहा गया है कि सोनिया गाँधी का नाम 3 साल पहले वोटर लिस्ट में जोड़ दिया गया था। इस संबंध में एक अर्जी मजिस्ट्रेट कोर्ट में खारिज की गई थी, जिसके खिलाफ रिवीजन अर्जी दायर की गई थी। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देने से मना कर दिया था।

फर्जी दस्तावेज का किया गया होगा इस्तेमाल- याचिकाकर्ता

याचिका में कहा गया है कि पहली बार नाम जोड़ने में फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया होगा। क्योंकि उस वक्त उनके पास देश की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज नहीं थे। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि ये अपराध है इसलिए प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया जाए।

स्पेशल जज (PC Act) विशाल गोगने ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन पर सीनियर एडवोकेट पवन नारंग की शुरुआती दलीलें सुनीं और सोनिया गाँधी और दिल्ली पुलिस से जवाब माँग लिया। इस मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी, 2026 को होगी।

अपनी अर्जी में त्रिपाठी ने कहा है कि सोनिया गाँधी का नाम 1980 में नई दिल्ली चुनाव क्षेत्र के इलेक्टोरल रोल में शामिल किया गया था, जबकि वह अप्रैल 1983 में भारत की नागरिक बनी थीं। अर्जी में जानकारी दी गई है कि सोनिया गाँधी का नाम 1980 में जोड़ा गया, 1982 में हटाया गया और फिर 1983 में जोड़ा गया।

इससे पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि कोर्ट याचिकाकर्ता की माँग के अनुसार जाँच शुरू नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति की नागरिकता से जुड़े मामले केंद्र सरकार के खास अधिकार क्षेत्र में आते हैं और किसी व्यक्ति को इलेक्टोरल रोल में शामिल करने या बाहर करने की योग्यता तय करने का अधिकार भारत के चुनाव आयोग (ECI) के पास है।

कोर्ट ने माँगा सोनिया गाँधी से जवाब

नागरिक बने बगैर वोटर लिस्ट में नाम होने के फर्जीवाड़े को लेकर कोर्ट ने सोनिया गाँधी के खिलाफ दाखिल रिवीजन पिटीशन पर नोटिस जारी किया और जवाब माँगा। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को भी इस मामले में नोटिस जारी किया है।

सोनिया गाँधी ने 30 अप्रैल 1983 को भारत की नागरिक बनीं। 1980 में सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट में शामिल किया गया। जबकि 1982 में उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया। याचिका में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का भी जिक्र किया गया है। अब सवाल यह है कि 1980 में नागरिकता किस आधार पर दी गई।

क्या है सोनिया गाँधी के वोटर लिस्ट का मामला

सोनिया गाँधी का नाम पहली बार 1980 में मतदाता सूची में दिखाई दिया था, उस वक्त उनके पास इटली की नागरिकता थी। इसके तीन साल बाद वो भारत की नागरिक बनीं। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था।

 बीजेपी नेता अमित मालवीय के मुताबिक, 1980 से पहले पीएम आवास के पते पर पंजीकृत मतदाता सूची में इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, संजय गाँधी और मेनका गाँधी के नाम थे। नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में 1 जनवरी, 1980 को अर्हता तिथि मानकर 1980 में संशोधन किया गया था। संशोधन के बाद सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 145 के क्रमांक 388 पर जोड़ा गया। यह प्रक्रिया उस कानून का स्पष्ट उल्लंघन थी, जिसके अनुसार मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए किसी व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।”

नाम हटा, फिर 2 साल बाद जुड़ा

सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने और फिर जोड़ने को लेकर अमित मालवीय ने कहा कि 1982 में भारी विरोध के बाद सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया और 1983 में फिर से नाम जोड़ दिया गया। इस बार भी नाम जोड़ने पर सवाल उठे थे। 1983 के मतदाता सूची के संशोधन में सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 140 के क्रम संख्या 236 पर दर्ज था। पंजीकरण की अर्हता तिथि 1 जनवरी, 1983 थी। जबकि उन्हें 30 अप्रैल, 1983 को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई।

कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मालवीय ने कहा, “सोनिया गाँधी का नाम नागरिकता के लिए अनिवार्य शर्तें पूरी किए बिना ही दो बार मतदाता सूची में दर्ज हुआ। पहली बार 1980 में , जब वह एक इतालवी नागरिक थीं और दूसरी बार 1983 में जब कानूनी रूप से वह भारत की नागरिक नहीं बनी थीं।”

सोनिया गाँधी ने शादी के तुरंत बाद नागरिकता क्यों नहीं ली? इस पर सवाल खड़ा न करते हुए बीजेपी नेता ने कहा, “हम यह भी नहीं पूछ रहे हैं कि राजीव गाँधी से शादी करने के बाद उन्हें भारतीय नागरिकता स्वीकार करने में 15 साल क्यों लग गए? लेकिन यह घोर चुनावी धाँधली नहीं है, तो और क्या है?”

भ्रष्टाचार की नींव पर टिके नेशनल हेराल्ड की नई गुत्थी ने बढ़ाया राहुल-सोनिया के लिए संकट, INDI गठबंधन की एकता और बंगाल के चुनावी समीकरण पर पड़ेगा प्रभाव

नेशनल हेराल्ड में फैले भ्रष्टाचार की जैसे-जैसे परतें खुल रही है जिसमें जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान सोनिया गाँधी परिवार डूबा नज़र आ रहा है। फिर जिस तरह EOW ने इस केस में हाथ डाला है सुब्रमण्यम स्वामी के हाथों से पूरा केस छीन लिया। पलटू राम सुब्रमण्यम स्वामी अब अगर पलटी मार केस को वापस लेना चाहे तो ले नहीं सकते। पलटू राम इसलिए कहा है कि इन्होने कई बार पलटी मार राजनीतिक उथल-पुथल मचा चुके हैं।  
आज जिस तरह सुब्रमण्यम स्वामी हर दिशा में तड़पते और छटपटाते नज़र आ रहे हैं, उससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि उनकी राजनीति का खेल अब पूरी तरह उलट चुका है।उन्हें पहला झटका तब लगा था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त मंत्रालय से संबंधित मामलों से उन्हें न केवल दूर रखा, बल्कि उनकी पहुँच को पाँच हज़ार किलोमीटर की दूरी तक सीमित कर दिया था, जिससे उनकी वर्षों पुरानी महत्त्वाकांक्षाएँ वहीँ ढह गई थीं।
अब उन्हें दूसरा और उससे भी बड़ा झटका नेशनल हेराल्ड केस में तब लगा है जब ED ने पूरी तरह अपनी शिकायत, अपने सबूत और अपनी जाँच के आधार पर नई FIR दर्ज कर दी है, जिसका किसी निजी याचिकाकर्ता से कोई लेना-देना नहीं है।इसका साफ़ और सीधा अर्थ यह है कि यदि स्वामी जी अपनी पुरानी याचिका वापस लेने की कोशिश भी करें, तब भी इस केस की दिशा में रत्ती भर बदलाव नहीं होगा, क्योंकि अब केस ED की कानूनी ढाँचे पर खड़ा है, न कि किसी व्यक्ति की इच्छा या राजनीति पर।
पिछले ग्यारह वर्षों में इस केस की धीमी रफ्तार के पीछे जिन “व्यक्तिगत लाभों” और “राजनीतिक सौदों” की चर्चा होती रही है, वे अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं, क्योंकि ED ने दिल्ली पुलिस को इस केस को तेज़ गति से आगे बढ़ाने के लिए औपचारिक निर्देश दे दिए हैं, जिससे स्वामी जी की बेचैनी कई गुना बढ़ गई है।
आज उनकी हर प्रतिक्रिया, हर टिप्पणी और हर तीरछी बात यह साबित करती है कि वह नियंत्रण खो चुके हैं और उन्हें समझ आ चुका है कि अब न तो बर्गेनिंग की गुंजाइश बची है और न ही किसी पार्टी से किसी कथित “राज्यसभा सीट डील” का सपना वास्तविकता में बदल सकता है।
नेशनल हेराल्ड केस अब उनकी पकड़ से पूरी तरह बाहर निकल चुका है, क्योंकि इस बार केस किसी के व्यक्तिगत स्वार्थ पर नहीं बल्कि संस्थागत जाँच और ठोस सबूतों पर आगे बढ़ रहा है, और यही बात स्वामी जी की सबसे गहरी बेचैनी बन गई है।
आज यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि नेशनल हेराल्ड केस काअंतिम और निर्णायक दौर शुरू हो चुका है, और इस बार मंच पर केवल एक ही शक्ति निर्णायक भूमिका निभाने जा रही है…ED और उसका कठोर कानून, जिसे न झुकाया जा सकता है और न खरीदा जा सकता है।
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नेशनल हेराल्ड का बहुचर्चित मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में है। प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा दर्ज किए गए नए मामले ने इस लंबे विवाद की कहानी को फिर से एक नई दिशा दे दी है। एजेंसियों का दावा है कि उन्हें वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी नई सूचनाएं मिली हैं। ये जानकारियों ऐसी हैं, जिनसे साफ पता चलता है कि नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी मे मिलीभगत की है। सोनिया-राहुल के साथ-साथ कई अन्य प्रमुख व्यक्तियों के खिलाफ नेशनल हेराल्ड मामले में दिल्ली पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की है। यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय की शिकायत पर की गई है, जो इस हाई-प्रोफाइल मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही है। आरोप है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने पद का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत लाभ उठाया है। नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी करतूतों के चलते घिर चुके हैं।

दशकों बाद अब सच हो रही है सरदार पटेल की चेतावनी
दशकों बाद सरदार पटेल की ये चेतावनी अब लोगों के सामने आ रही है, जब ईडी इस मामले की जांच कर रही है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की जो चेतावनी पत्र के रूप में तब शुरू हुई थी, वह अब एक बड़े घोटाले में बदल गई है। ईडी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ इस मामले में आरोपपत्र दायर किया है। इसमें उन पर यंग इंडिया लिमिटेड के जरिए 5,000 करोड़ रुपए की संपत्ति का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया गया है, जो उनके नियंत्रण में है और नेशनल हेराल्ड और उसकी मूल कंपनी एसोसिएट जर्नल लिमिटेड से जुड़ी है। 5 मई 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर चिंता जताई कि नेशनल हेराल्ड ने हिमालयन एयरवेज से जुड़े दो व्यक्तियों से 75,000 रुपए से अधिक की रकम स्वीकार की है। उन्होंने बताया कि एयरलाइन ने भारतीय वायुसेना की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए अवैध रूप से रात्रि हवाई डाक सेवा के लिए सरकारी अनुबंध इसके जरिए हासिल किया है। उसी पत्र में सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को आगाह किया कि नेशनल हेराल्ड ने अखानी नामक एक व्यवसायी से धन स्वीकार किया था, जो उनकी विमानन कंपनी के लिए रात्रि डाक अनुबंध हासिल करने में शामिल था। सरदार पटेल ने उल्लेख किया कि अखानी टाटा और एयर सर्विसेज ऑफ इंडिया जैसी फर्मों से भी धन जुटा रहा था।

नेशनल हेराल्ड के लिए धन जुटाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग
सरदार पटेल ने पत्र में आगे नेहरू को लिखा था कि अखानी पर बैंकों से धोखाधड़ी करने के लिए विभिन्न अदालतों में पहले से ही कई आरोप हैं। उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अहमद किदवई द्वारा नेशनल हेराल्ड के लिए धन जुटाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने के बारे में भी चेतावनी पत्र के जरिए दी थी, जिसमें जेपी श्रीवास्तव जैसे लखनऊ स्थित व्यापारियों से धन इकट्ठा करना भी शामिल है। उसी दिन, 5 मई 1950 को नेहरू ने पटेल को ऐसे लहजे में जवाब दिया था, जिससे लगता था कि उन्हें शांत करने की कोशिश की जा रही थी। नेहरू ने अपने पत्र में उल्लेख किया था कि उन्होंने अपने दामाद फिरोज गांधी, जो उस समय नेशनल हेराल्ड के महाप्रबंधक थे, से इस अवैध धन संग्रह के आरोपों की जांच करने के लिए कहा है।

सरदार पटेल ने नेहरू के रुख पर स्पष्ट असंतोष जताया था
इसके ठीक अगले ही दिन 6 मई को पटेल ने नेहरू के दावों का दृढ़ता से खंडन करते हुए फिर से नेहरू को जवाब दिया। उन्होंने साफ कहा कि अवैध धन की उगाही पूरी तरह से जारी है। फिर पटेल को शांत करने का प्रयास किया गया। लेकिन सरदार पटेल के द्वारा अवैध फंडिंग के बारे में जो चिंता व्यक्त की गई थी, उसे दरकिनार कर दिया गया। हालांकि, तब नेहरू ने यह स्वीकार किया था कि इसमें कुछ गलतियां हुई होंगी। इसके बाद 10 मई, 1950 को लिखे अपने अंतिम पत्र में सरदार पटेल ने नेहरू के इस रुख पर स्पष्ट असंतोष व्यक्त किया था। गृह मंत्री के रूप में उन्होंने भुगतानों से जुड़ी बेईमानी और नेशनल हेराल्ड के वित्तपोषण से जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।

गांधी परिवार पर बढ़ता दबाव, नेतृत्व का बोझ और कानूनी चुनौतियां
करीब 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में “अधिग्रहित” करने से जुड़े इस मामले का सबसे सीधा असर सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर पड़ रहा है। Young Indian कंपनी से जुड़े वित्तीय विवाद पहले भी कांग्रेस की राजनीति को भीतर तक हिलाते रहे हैं। नए मामले ने नेतृत्व की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। जब किसी राजनीतिक दल का सर्वोच्च नेतृत्व लगातार कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाता है, तो संगठन का मनोबल प्रभावित होना लाजिमी ही है। उस दल की अपने ही सहयोगी गठबंधन में भूमिका कमजोर पड़ जाती है। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा वर्षों से चलती रही है कि नेतृत्व का दबाव और मुकदमों का बोझ पार्टी के पुनर्निर्माण की राह में एक स्थायी रुकावट बन जाता है।

एफआईआर में सोनिया-राहुल के साथ सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के नाम
इस नई एफआईआर में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस नेता सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के साथ-साथ यंग इंडियन (वाईआई), डॉटैक्स मर्चेंडाइज लिमिटेड (Dotex Merchandise Ltd), डॉटैक्स प्रमोटर सुनील भंडारी और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) तथा अज्ञात अन्य को आरोपी बनाया गया है। ईडी सूत्रों के अनुसार, संघीय एजेंसी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 66(2) के तहत उपलब्ध शक्तियों का उपयोग करके पुलिस FIR दर्ज कराई। यह धारा केंद्रीय एजेंसी को कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा आपराधिक पूर्ववर्ती अपराध के पंजीकरण के लिए सबूत साझा करने की अनुमति देती है, ताकि बाद में मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया जा सके और जांच को आगे बढ़ाया जा सके। यह एफआईआर ईडी के मामले को मजबूत करेगी, जिसका आरोप पत्र एक मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली के आदेश से उत्पन्न हुआ है।

दो हजार करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में अधिग्रहीत
बता दें कि यह आदेश भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 26 जून, 2014 को एजेएल की संपत्तियों से जुड़ी कथित अनियमितताओं के संबंध में दायर एक निजी शिकायत पर संज्ञान लेते हुए दिया गया था। एफआईआर में ईडी द्वारा 4 सितंबर को ईओडब्ल्यू को भेजे गए एक पत्र में लगाए गए आरोपों का संज्ञान लिया गया है। ईडी के इस संचार की सामग्री वही है, जो केंद्रीय एजेंसी ने अपने आरोप पत्र में बताई है। ईडी ने अपने आरोप पत्र में आरोप लगाया था कि एक “आपराधिक साजिश” कांग्रेस पार्टी के पहले परिवार के नेतृत्व में, जिसमें सोनिया गांधी, उनके बेटे राहुल गांधी, दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीस, सैम पित्रोदा और एक निजी कंपनी यंग इंडियन शामिल हैं। एजेएल की 2000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियों के धोखाधड़ी वाले अधिग्रहण से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग योजना में शामिल थे। सोनिया-राहुल यंग इंडियन के बहुसंख्यक शेयरधारक हैं, जिनमें से प्रत्येक के पास 38 प्रतिशत शेयर हैं। ईडी का दावा है कि उसकी जांच ने “निर्णायक रूप से” पाया है कि यंग इंडियन ने एजेएल की 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में “अधिग्रहित” किया, जो उसके मूल्य से काफी कम था।

यह राजनीतिक हमला नहीं, करोड़ों की जालसाजी का प्रत्यक्ष प्रमाण
कांग्रेस की पहली प्रतिक्रिया हमेशा यही रही है कि यह “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” है। सवाल यह है कि क्या जनता इसे मानने को तैयार है? जब बार-बार करोड़ों की संपत्तियों, वित्तीय लेनदेन और कथित जालसाज़ी के आरोप सामने आते हैं, तब किसी भी दल को नैतिक रूप से खुद को साफ सिद्ध करना आसान नहीं रहता। जनता यह मानने लगती है कि जिन नेताओं के ऊपर पार्टी का मूल ढांचा खड़ा है, वे लगातार कानूनी विवादों में क्यों फंसे रहते हैं। कांग्रेस का संकट सिर्फ कानून या अदालत तक सीमित नहीं है। यह उसकी राजनीतिक छवि, जनविश्वास और विपक्ष में उसकी भूमिका पर सीधा प्रभाव डालती है। इसलिए यह शीशे की तरह साफ है कि यह कोई राजनीतिक हमला नहीं है, बल्कि कांग्रेस द्वारा किए गए धृत कर्मों का दुष्परिणाम है।

पहले से ही टूट रहे INDIA गठबंधन की एकता पर पड़ेगा असर
INDIA गठबंधन पहले ही कई असहमतियों और रणनीतिक मतभेदों से जूझ रहा है। राहुल गांधी और कांग्रेस को गठबंधन का “मुख्य चेहरा” बनाने का प्रयास कई क्षेत्रीय दलों को रास नहीं आ रहा। ममता बनर्जी से लेकर तेजस्वी यादव तक इसका विरोध कर चुके हैं। तेजस्वी ने तो बिहार में कांग्रेस का साथ देने का हश्र देख ही लिया। अब ममता को बंगाल चुनाव को लेकर चिंता है। दरअसल, नए मामले ने उन सभी दलों को और भी अधिक ताकत दे दी है जो पहले से ही कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में विपक्षी गठबंधन की एकता अब और भी कठिन होती जाएगी, क्योंकि सहयोगी दलों को कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से पहले राजनीतिक जोखिमों का मूल्यांकन करना होगा।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का आधार और कमजोर होगा
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले ही लगातार बदल रहा है। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति में अपनी स्वतंत्र भूमिका स्थापित करने की कोशिश करती रही हैं। वे कई बार राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठा चुकी हैं। अब नेशनल हेराल्ड का नया प्रकरण उनके लिए एक ताज़ा राजनीतिक हथियार का काम करेगा। कांग्रेस पहले ही बंगाल में सीमित उपस्थिति रखती है। अब यह मामला तृणमूल को कांग्रेस को “कमजोर, नेतृत्वहीन और समस्याग्रस्त पार्टी” के रूप में पेश करने का अवसर देगा। इससे कांग्रेस का बंगाल में आधार और कमजोर पड़ने की पूरी संभावना है। इसका फायदा 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिल सकता है।

बिहार के राजनीतिक बदलाव और विपक्ष की भ्रष्टाचारी छवि का लाभ
भाजपा वर्षों से जिस सच्चाई को उजागर करती आई है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार और परिवारवाद से घिरी पार्टी है, उसे यह मामला पुनः नई ऊर्जा देता नजर आ रहा है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, जहां भ्रष्टाचार, घोटालों और कटमनी की राजनीति पर जनता बेहद संवेदनशील है, वहां भाजपा इसे एक बड़ा मुद्दा बना सकती है। भाजपा की नीतिगत स्थिरता और “साफ़-सुथरी राजनीति” का संदेश, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के विवादों के चलते इसका फायदा अगले चुनाव में भाजपा को मिलने वाला है। हाल ही में बिहार में हुए राजनीतिक उतार-चढ़ाव ने विपक्ष की एकता को हिलाकर रख दिया है। भाजपा की वापसी और गठबंधन समीकरणों में हुए बदलाव ने पहले ही विपक्ष को कमजोर किया है। अब नेशनल हेराल्ड केस का नया अध्याय इस कमजोरी को और उजागर करता है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष अब कई हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। बिहार की तरह अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय दल कांग्रेस से दूरी बनाए रखने की वजह तलाश रहे हैं। पीएम मोदी ने इसीलिए कांग्रेस को परजीवी नाम दिया है, जो जिसके साथ जुड़ती है, उसे ही खत्म कर देती है।

गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार कांग्रेस के लिए नुकसानदेह
यह सवाल अब पार्टी के भीतर भी पहले से अधिक तीखे रूप में पूछा जा रहा है। नेशनल हेराल्ड मामला पहले भी कांग्रेस के लिए नकारात्मक धारणा बनाता रहा है। अदालत का फैसला जो भी आए, लेकिन जनता की नजर में गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार, परिवारवाद, असफलता और विवादों की पुनरावृत्ति कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित होगी। बंगाल में ममता बनर्जी की दूरी, सहयोगी दलों की सतर्कता और कांग्रेस की अपनी सीमाएं, ये फैक्टर इस धारणा को और मजबूत करते हैं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका है। कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती सिर्फ बाहरी नहीं, आंतरिक भी है। कई कांग्रेस नेता वर्षों से कह रहे हैं कि पार्टी को नए नेतृत्व या व्यापक संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता है। लेकिन पार्टी शीर्ष नेतृत्व पर निर्भरता कम नहीं कर पाई है। जब भी कोई नया केस सामने आता है, यह बहस फिर ज़िंदा हो जाती है। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन इसलिए खो रही है क्योंकि राहुल-सोनिया के नेतृत्व कमजोर पड़ता जा रहा है। 

करोड़ों के कांग्रेसी घपले वाला नेशनल हेराल्ड केस क्या है?
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 2012 में दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में एक याचिका दाखिल करते हुए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के ही मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीज, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे पर घाटे में चल रहे नेशनल हेराल्ड अखबार को धोखाधड़ी और पैसों की हेराफेरी के जरिए हड़पने का आरोप लगाया था। आरोप के मुताबिक, कांग्रेसी नेताओं ने नेशनल हेराल्ड की संपत्तियों पर कब्जे के लिए यंग इंडियन लिमिटेड ऑर्गेनाइजेशन बनाया और उसके जरिए नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन करने वाली एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (AJL) का अवैध अधिग्रहण कर लिया।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तो बकायदा चार्जशीट फाइल कर दी है। ईडी की चार्जशीट में राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भी आरोपी बनाया गया है। चार्जशीट में कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा और राजीव गांधी फाउंडेशन के ट्रस्टी सुमन दुबे भी अभियुक्त हैं। दरअसल, नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) करती है। इसका मालिकाना हक यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के पास है। यही वह कंपनी है जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों की हिस्सेदारी है। यही वजह है कि ईडी की जांच की आंच इन दोनों तक जा पहुंची है। नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी करतूतों के चलते घिर चुके हैं। इस मामले में एक रोचक तथ्य यह भी है कि अगर 75 साल पहले सरदार पटेल की बात जवाहर लाल नेहरू मान लेते और बाद में ये लोग साजिश ना करते तो शायद आज राहुल गांधी और सोनिया गांधी को यह दिन ना देखने पड़ते।

करोड़ों की संपत्तियों पर यंग इंडियन ने कब्जा किया – ED
प्रवर्तन निदेशालय ने 15 अप्रैल को नेशनल हेराल्ड अखबार और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) से जुडे मनी लॉन्ड्रिंग केस में पहली चार्जशीट दाखिल कर दी। इसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे के नाम शामिल हैं। मामले की सुनवाई दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में होगी। कोर्ट ने ED से मामले की केस डायरी भी मांगी है। ED का आरोप है कि कांग्रेस नेताओं ने साजिश के तहत एसोसिएटेड जर्नल्स लि. (एजेएल) की 2,000 करोड़ रुपए की संपत्तियों पर कब्जे के लिए उसका अधिग्रहण निजी स्वामित्व वाली कंपनी ‘यंग इंडियन’ के जरिए केवल 50 लाख रुपए में कर लिया। इस कंपनी के 76प्रतिशत शेयर सोनिया व राहुल के पास हैं। इस मामले में ‘अपराध से अर्जित आय’ 988 करोड़ रुपए की मानी गई। साथ ही संबद्ध संपत्तियों का बाजार मूल्य 5,000 करोड़ रुपए बताया गया है। जून 2022 में नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी से 5 दिनों में 50 घंटे पूछताछ हुई थी। फिर 21 जुलाई 2022 में नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी से 3 दिन में 12 घंटे सवाल हुए थे। इस दौरान उनसे 100 से ज्यादा सवाल किए गए।

आजादी से पहले शुरु हुए थे नेशनल हेराल्ड समेत तीन अखबार
इतिहास की बात करें तो 1937 में एसोसिएट जर्नल का गठन हुआ। इसके बाद 9 सितंबर 1938 को जवाहर लाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड अखबार शुरू किया। यह बात आजादी मिलने के ठीक 9 साल पहले की है। इस अखबार को शुरू करने में हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने अहम भूमिका निभाई थी। इसके तहत तीन अखबार थे, अंग्रेजी में ‘नेशनल हेराल्ड’, हिंदी में ‘नवजीवन’ और उर्दू में ‘कौमी आवाज’.यही नेशनल हेराल्ड आज सुर्खियों में बना हुआ है। नेशनल हेराल्ड केस में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत कई लोगों पर ईडी ने 988 करोड़ रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग मामले को लेकर चार्जशीट दायर की है। इसे लेकर ही बवाल है।

फिरोज के कमजोर संचालन से अखबार आर्थिक संकट में आया
जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव ओ. एम. मथाई ने अपनी किताब में सरदार पटेल और नेहरू की कहानी का जिक्र है। इसमें इस बात का भी जिक्र है कि फिरोज गांधी इस कंपनी के संचालन में बहुत अच्छे नहीं थे। इसलिए यह नेशनल हेराल्ड आर्थिक संकट में फंस गया। इसे आर्थिक संकट से उबारने के लिए जनहित निधि ट्रस्ट के रूप में बदल दिया गया। इस नए ट्रस्ट पर भी नेहरू परिवार का ही कब्जा रहा। इस ट्रस्ट के सभी ट्रस्टी नेहरू और उनके परिवार के बेहद करीबी लोग बनाए गए। उस समय विज्ञापन के नाम पर कई बड़े औद्योगिक घरानों से लाखों की रकम एक साल में इस अखबार ने हासिल की।

बड़ौदा के महाराजा से ही मांग ली थी दो लाख की रिश्वत
अपनी किताब में ओ. एम. मथाई ने तो यहां तक दावा किया कि नेशनल हेराल्ड के लिए बड़ौदा के महाराजा से पूरे दो लाख रुपए की रिश्वत मांग ली गई थी। सरदार वल्लभभाई पटेल को जब इसकी सूचना मिली थी तो उन्होंने इसकी शिकायत नेहरू से की थी। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते ही दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर नेशनल हेराल्ड को ऑफिस बनाने के लिए जमीन भी आवंटित की गई। 1950 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर नेशनल हेराल्ड का समर्थन करने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करने के साथ ही संदिग्ध धन उगाही के बारे में भी चेतावनी दी थी। सरदार पटेल के पत्राचार में दर्ज इन चिंताओं को नेहरू ने खारिज कर दिया था, जबकि वह इसके दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में आशंकित थे।