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सेना युद्ध में, RSS सेवा मोर्चे पर: 1947 से 71 तक युद्ध में राष्ट्रसेवा की कहानी जिसे वाम इतिहास ने किया अनदेखा, नेहरू ने भी संघ को रिपब्लिक डे परेड के लिए भेजा था न्योता

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुस्लिम कट्टरपंथी और उनका समर्थन करने वाली सियासतखोर पार्टियां क्यों विरोध करती हैं, सच्चाई जानने के लिए थोड़ा-सा पीछे जाकर इतिहास को खोलना चाहिए। 1947 में बटवारे के बाद पाकिस्तान के बहुचर्चित दैनिक इंग्लिश Dawn ने लिखा था कि "अगर आरएसएस 1925 से पहले बन जाती तो शायद बटवारा नहीं होता।" दूसरे, हर वो संस्था इन पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स और मुस्लिम कट्टरपंथियों की दुश्मन है जो इनके रास्ते का पत्थर बनता है। अगर घमंडी तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने संघ के खिलाफ कि "बीजेपी को संघ की जरुरत नहीं..." नहीं बोला होता बीजेपी 400 पार कर गयी होती।

मुस्लिम लीग के अरमानों पर पानी फेरने बनी आरएसएस की तर्ज पर कांग्रेस ने भी कांग्रेस सेवा दल बनाया, लेकिन किन्ही कारणों से धूमिल हो गयी, लेकिन संघ बराबर चर्चित हो रहा है। 

1963 चीन-इंडो युद्ध के दौरान वामपंथियों ने सैनिकों के खून देने से मना कर दिया था, लेकिन संघ जनसेवा के साथ-साथ जवानों के लिए खून देने में भी पीछे नहीं रहा। संघ की इस सेवा भावना से तत्कालीन नेहरू कांग्रेस सरकार और फ़ौज ने संघ की तारीफों के पुल बांधते नहीं थके। 

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने शताब्दी वर्ष में है। संघ का राष्ट्रसेवा का 100 साल का लंबा सफर संघर्षों वाला रहा है और इस मौके पर संघ से जुड़े कई पुराने किस्से फिर से चर्चा में हैं। उन्हीं में एक किस्सा संघ की 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में भागीदारी से जुड़ा है। दिलचस्प बात यह कि इस भागीदारी का निमंत्रण किसी और ने नहीं बल्कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिया था। वामपंथी इतिहास के दौर में RSS से जुड़ी ऐसे किस्सों पर धूल जम गई, उन्हें यादों से मिटाने की पूरी कोशिशें की गईं। जानिए युद्धकाल में संघ की सेवा की कहानी-

1962 का युद्ध और RSS की मदद

1962 का भारत-चीन युद्ध देश के लिए एक कठिन दौर था। नेहरू चीन को पक्का दोस्त माने बैठे तो वहीं RSS के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर देश को चेता चुके थे। गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ के अध्याय ‘Fight to Win‘ में लिखा था कि चीन का इतिहास विस्तारवाद से भरा रहा है। उन्होंने नेपोलियन और स्वामी विवेकानंद के उन कथनों का उल्लेख किया जिनमें चीन को भविष्य में मानवता और भारत के लिए खतरा बताया गया था।

1962 में गुरुजी की आशंका सच साबित हुआ और चीन ने भारत पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद जहाँ सैनिक चीन से लोहा ले रहे थे तो वहीं RSS के स्वयंसेवक पूरे देश में सेवा कार्यों में जुट गए। कहीं वे ट्रैफिक व्यवस्था संभाल रहे थे, तो कहीं सिविल डिफेंस में मदद कर रहे थे। बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने रक्तदान किया और सैनिकों के परिवारों की सहायता की। पूर्वोत्तर भारत में जहाँ युद्ध का सीधा असर पड़ा था वहाँ RSS के स्वयंसेवक सेना और स्थानीय लोगों की मदद के लिए बड़ी संख्या में पहुँचे।

स्वयंसेवकों की अनुशासित कार्यप्रणाली और बिना किसी स्वार्थ के की गई सेवा ने सरकार और आम लोगों दोनों पर गहरा असर डाला। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से RSS के राजनीतिक मतभेद रहे, फिर भी 1962 के युद्ध के दौरान संघ की सेवा को उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया।

इसी कारण एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया। वर्ष 1963 के गणतंत्र दिवस पर RSS के स्वयंसेवकों को परेड में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक खास क्षण था, जब सरकार ने पहली बार सार्वजनिक रूप से RSS की भूमिका और योगदान को मान्यता दी।

गणतंत्र दिवस परेड में पहुँचे संघ के स्वयंसेवक

RSS की वेबसाइट के मुताबिक, 26 जनवरी को दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में RSS को भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। बहुत कम समय की सूचना के बावजूद 3000 स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश और बैंड के साथ इस परेड में शामिल हुए थे।

                      तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के आग्रह पर 1963 गणतंत्र परेड में RSS          

उस दिन की याद करते हुए विजय कुमार ने ऑर्गनाइजर को बताया कि वे उस समय शाहदरा के फर्श बाजार में रहते थे और मंडल कार्यवाह की जिम्मेदारी निभा रहे थे। उनके अनुसार, पंडित नेहरू सरकार की ओर से मार्च-पास्ट में शामिल होने का निमंत्रण आया था।

उन्होंने कहा, “उस समय सोहन सिंह पूरे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के संभाग प्रचारक थे। जब सरकारी प्रतिनिधि यह प्रस्ताव लेकर पहुँचे, तो सोहन सिंह ने साफ कहा कि RSS स्वयंसेवक पूरे गणवेश, दंड और घोष के साथ ही परेड में शामिल होंगे। सरकार की ओर से इस शर्त पर विचार करने की बात कहकर प्रतिनिधि लौट गए।”

विजय कुमार बताते हैं कि परेड में RSS को पूर्ण गणवेश में शामिल होने की अनुमति की सूचना केवल 24 घंटे पहले मिली। इसके बाद सोहन सिंह जी ने पूरी रात फोन कर-करके स्वयंसेवकों को सूचना दी और बसों की व्यवस्था करवाई। उस दौर में फोन और यातायात के साधन बहुत सीमित थे फिर भी स्वयंसेवकों ने रातभर मेहनत कर सभी को तैयार किया।

उन्होंने बताया, “निर्धारित समय से पहले सभी बसें भर गईं और कई स्वयंसेवक जगह न मिलने के कारण पीछे रह गए। फिर भी लगभग 3000 स्वयंसेवक सुबह 8 बजे तक परेड स्थल पहुँच गए। RSS का दस्ता सबसे अंत में मार्च करने वाला था लेकिन इंतजार के दौरान कोई भी बोर नहीं हुआ क्योंकि शाखाओं की तरह सभी देशभक्ति के गीत जा रहे थे। जब RSS का दस्ता संघ बैंड की धुन पर आगे बढ़ा, तो कमेंटेटर ने कहा कि ‘आप इन अनुशासित लोगों को अच्छी तरह जानते हैं’ यह टिप्पणी स्वयंसेवकों के लिए बेहद प्रेरणादायक थी।”

‘विश्वकर्मा संकेत’ के संपादक के.एल. पाथेला भी उस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी थे। पाथेला बताते हैं कि 26 जनवरी 1963 का दिन वे आज भी नहीं भूले हैं। जब जनकपुरी शाखा के स्वयंसेवकों को परेड में शामिल होने की खबर मिली तो सभी रोमांचित हो उठे। जब RSS का दस्ता सलामी मंच से गुजरा तो दर्शकों ने जोरदार तालियों से स्वागत किया। वे इंडिया गेट तक मार्च करते हुए गए।

पाथेला के अनुसार, 1962 के युद्ध के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। वे गोलाबारी के बीच भी बंकरों तक पहुंचे और जवानों को खीर परोसी। दिल्ली के स्वयंसेवकों ने जवानों के लिए धन इकट्ठा किया, फल खरीदे और रेलवे स्टेशन पर जाकर सैनिकों में वितरित किए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संघ को परेड में बुलाने पर कई लोगों ने नेहरू की आलोचना भी की थी। इस पर नेहरू ने कहा, “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।”

देश सेवा और सुरक्षाबलों के प्रति संघ के समर्पण की यह इकलौती कहानी नहीं है। जब-जब भारत संकट में रहा था, तब-तब संघ के स्वयंसेवकों ने आगे बढ़कर राष्ट्रसेवा में योगदान दिया है। 1947 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध से लेकर 1965, 1971 और कारगिल वॉर तक, संघ के स्वयंसेवक हमेशा देश सेवा में जुटे रहे हैं।

1947 में पाकिस्तान का कश्मीर पर हमला और संघ की भूमिका

अक्टूबर 1947 से ही संघ के स्वयंसेवक बिना किसी सैन्य प्रशिक्षण के कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे हुए थे। यह काम न तत्कालीन नेहरू सरकार कर रही थी और न ही महाराजा हरिसिंह की रियासत सरकार।

22 अक्टूबर 1947 को जब पाकिस्तान प्रायोजित कबीलाइयों के लश्करों ने मुज्जफराबाद के रास्ते श्रीनगर की ओर बढ़ना शुरू किया, तब संघ के स्वयंसेवक हरीश भनोट ने इस हमले की सटीक जानकारी बलराज मधोक तक पहुँचाई। बलराज मधोक ने तत्काल महाराजा हरिसिंह को स्थिति से अवगत कराया। उस समय मुस्लिम सैनिकों की बगावत के कारण महाराजा के पास कबीलाइयों का सामना करने के लिए पर्याप्त सेना नहीं बची थी।

भारतीय सेना के पहुँचने में देरी को देखते हुए महाराजा हरिसिंह ने संघ से सहायता माँगी। एक संकेत पर 200 से अधिक स्वयंसेवक तुरंत कश्मीर पहुँचे। इन्हें बादामीबाग छावनी ले जाया गया, जहाँ उस समय उपयोग में आने वाली .303 राइफलों को चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। बताया जाता है कि ये युवा स्वयंसेवक रियासत की सेना के साथ मोर्चे पर तब तक डटे रहे जब तक भारतीय सेना कश्मीर नहीं पहुँच गई।

भारतीय सेना द्वारा मोर्चा संभालने के बाद भी संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता में लगातार लगे रहे और इस दौरान कई स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी।

कश्मीर का संपर्क भारत से बनाए रखने के लिए श्रीनगर एयरस्ट्रिप पर हर हाल में कब्जा जरूरी था। दिल्ली के निर्देश पर बर्फ हटाने के लिए मजदूरों को लगाने की कोशिश हुई लेकिन भय और अनिश्चितता के कारण कोई तैयार नहीं हुआ। हालात की गंभीरता देखते हुए सेना ने RSS से मदद माँगी। 150 स्वयंसेवकों की माँग पर संघ ने मात्र आधे घंटे में 500 स्वयंसेवक भेज दिए। कड़ाके की ठंड में रात डेढ़ बजे काम शुरू हुआ और कुछ ही घंटों में पूरा रनवे साफ कर दिया गया जिससे एयरस्ट्रिप चालू रह सकी।

सरदार पटेल ने RSS की तारीफ करते हुए गुरुजी को लिखा था, “भारत के लोगों ने अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की वास्तविक प्रकृति और उसकी गतिविधियों को समझ लिया है। विशेष रूप से कश्मीर से जुड़े अभियानों तथा पंजाब और बंगाल में संघ द्वारा किए गए कार्यों ने यह साबित किया है कि RSS एक सुव्यवस्थित और अनुशासित संगठन है, जो देश की सेवा में बड़ी भूमिका निभाने में सक्षम है।”

1965 के युद्ध में संघ के सेवा कार्य

पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध के बीच प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया गया और इस सम्मेलन में RSS के सरसंघचालक गुरुजी को भी निमंत्रण दिया गया। गुरुजी ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए सरकार को हर प्रकार से पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया। यह आश्वासन केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा बल्कि युद्ध के पूरे कालखंड में जमीन पर उसका असर देखने को मिला।

युद्ध के 22 दिनों तक दिल्ली में संघ के स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण काम संभाले। राजधानी में यातायात नियंत्रण जैसे आवश्यक नागरी कार्यों में स्वयंसेवक सक्रिय रूप से जुटे रहे। इसका सीधा लाभ यह हुआ कि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को इन कार्यों से मुक्त कर सेना और युद्ध-संबंधी कामों में लगाया जा सका। उस समय दिल्ली की सड़कों पर यातायात व्यवस्था बनाए रखना, भीड़ नियंत्रण और आपात स्थितियों में त्वरित सहयोग जैसे कार्य स्वयंसेवकों द्वारा अनुशासन के साथ किए गए।

युद्ध के दौरान घायल सैनिकों की सहायता के लिए रक्त की आवश्यकता एक बड़ी चुनौती थी। इस समय सबसे पहले आगे आकर रक्तदान करने वालों में संघ के स्वयंसेवक शामिल रहे। स्वयंसेवकों ने आवश्यक स्थानों पर रक्तदान किया। केवल राजधानी ही नहीं बल्कि युद्ध से सीधे प्रभावित क्षेत्रों में भी स्वयंसेवकों की भूमिका सामने आई। कश्मीर में हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का कठिन कार्य भी संघ के स्वयंसेवकों ने किया।

1971: जब फील्ड मार्शल करियप्पा ने की संघ की तारीफ

1971 तक पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान के दमन ने एक भीषण मानवीय संकट को जन्म दिया। हालात इतने खराब हो गए कि लाखों लोग जान बचाकर भारत की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। इस संकट की घड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने राहत और सेवा कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। RSS के स्वयंसेवकों ने पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में शरणार्थी शिविर बनाए। इन शिविरों में विस्थापित परिवारों को भोजन, रहने की व्यवस्था और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई। इन सेवाओं से लाखों शरणार्थियों को राहत मिली।

1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी RSS स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका सामने आई। स्वयंसेवकों ने देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी सेवाएँ देने की पेशकश की। बताया जाता है कि 1971 में सबसे पहले रक्तदान करने वालों में RSS के स्वयंसेवक शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने सेना की सहायता के लिए खाइयाँ खोदने जैसे कार्यों में भी सहयोग किया। इन प्रयासों की सराहना करते हुए तत्कालीन फील्ड मार्शल करियप्पा ने RSS को लेकर कहा, “RSS मेरा हृदय का कार्य है, देश को आपकी सेवाओं की आवश्यकता है।”

देश पर जब-जब संकट आया, तब-तब संघ के स्वयंसेवक बिना किसी बुलावे सबसे पहले मैदान में दिखाई दिए। बाढ़ हो या भूकंप, चक्रवात हो या महामारी संघ के स्वयंसेवकों ने इसे कभी ‘सरकारी जिम्मेदारी’ कहकर टालने का प्रयास नहीं किया। उनके लिए यह सवाल कभी नहीं रहा कि कौन बुला रहा है बल्कि यह रहा कि देश को हमारी जरूरत है।

आपदाओं के समय, जब व्यवस्थाएँ चरमराने लगती हैं और संसाधन सीमित हो जाते हैं, तब संघ के स्वयंसेवक राहत शिविर लगाते हैं, भोजन पहुँचाते हैं, घायल लोगों को अस्पताल तक पहुँचाते हैं, शवों के अंतिम संस्कार से लेकर अनाथ हुए बच्चों की देखभाल तक का दायित्व निभाते हैं। कोविड महामारी इसका ताजा उदाहरण है, जब स्वयंसेवकों ने ऑक्सीजन, दवाइयों, भोजन और रक्तदान के माध्यम से लाखों लोगों की सहायता की।

देश की जरूरत के वक्त संघ की यह निरंतर उपस्थिति यह बताती है कि राष्ट्रसेवा कोई अवसरवादी चीज नहीं बल्कि एक संस्कार है। एक ऐसा संस्कार, जो शाखा से समाज तक और समाज से राष्ट्र तक की यात्रा करता है।

भ्रष्टाचार की नींव पर टिके नेशनल हेराल्ड की नई गुत्थी ने बढ़ाया राहुल-सोनिया के लिए संकट, INDI गठबंधन की एकता और बंगाल के चुनावी समीकरण पर पड़ेगा प्रभाव

नेशनल हेराल्ड में फैले भ्रष्टाचार की जैसे-जैसे परतें खुल रही है जिसमें जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान सोनिया गाँधी परिवार डूबा नज़र आ रहा है। फिर जिस तरह EOW ने इस केस में हाथ डाला है सुब्रमण्यम स्वामी के हाथों से पूरा केस छीन लिया। पलटू राम सुब्रमण्यम स्वामी अब अगर पलटी मार केस को वापस लेना चाहे तो ले नहीं सकते। पलटू राम इसलिए कहा है कि इन्होने कई बार पलटी मार राजनीतिक उथल-पुथल मचा चुके हैं।  
आज जिस तरह सुब्रमण्यम स्वामी हर दिशा में तड़पते और छटपटाते नज़र आ रहे हैं, उससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि उनकी राजनीति का खेल अब पूरी तरह उलट चुका है।उन्हें पहला झटका तब लगा था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त मंत्रालय से संबंधित मामलों से उन्हें न केवल दूर रखा, बल्कि उनकी पहुँच को पाँच हज़ार किलोमीटर की दूरी तक सीमित कर दिया था, जिससे उनकी वर्षों पुरानी महत्त्वाकांक्षाएँ वहीँ ढह गई थीं।
अब उन्हें दूसरा और उससे भी बड़ा झटका नेशनल हेराल्ड केस में तब लगा है जब ED ने पूरी तरह अपनी शिकायत, अपने सबूत और अपनी जाँच के आधार पर नई FIR दर्ज कर दी है, जिसका किसी निजी याचिकाकर्ता से कोई लेना-देना नहीं है।इसका साफ़ और सीधा अर्थ यह है कि यदि स्वामी जी अपनी पुरानी याचिका वापस लेने की कोशिश भी करें, तब भी इस केस की दिशा में रत्ती भर बदलाव नहीं होगा, क्योंकि अब केस ED की कानूनी ढाँचे पर खड़ा है, न कि किसी व्यक्ति की इच्छा या राजनीति पर।
पिछले ग्यारह वर्षों में इस केस की धीमी रफ्तार के पीछे जिन “व्यक्तिगत लाभों” और “राजनीतिक सौदों” की चर्चा होती रही है, वे अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं, क्योंकि ED ने दिल्ली पुलिस को इस केस को तेज़ गति से आगे बढ़ाने के लिए औपचारिक निर्देश दे दिए हैं, जिससे स्वामी जी की बेचैनी कई गुना बढ़ गई है।
आज उनकी हर प्रतिक्रिया, हर टिप्पणी और हर तीरछी बात यह साबित करती है कि वह नियंत्रण खो चुके हैं और उन्हें समझ आ चुका है कि अब न तो बर्गेनिंग की गुंजाइश बची है और न ही किसी पार्टी से किसी कथित “राज्यसभा सीट डील” का सपना वास्तविकता में बदल सकता है।
नेशनल हेराल्ड केस अब उनकी पकड़ से पूरी तरह बाहर निकल चुका है, क्योंकि इस बार केस किसी के व्यक्तिगत स्वार्थ पर नहीं बल्कि संस्थागत जाँच और ठोस सबूतों पर आगे बढ़ रहा है, और यही बात स्वामी जी की सबसे गहरी बेचैनी बन गई है।
आज यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि नेशनल हेराल्ड केस काअंतिम और निर्णायक दौर शुरू हो चुका है, और इस बार मंच पर केवल एक ही शक्ति निर्णायक भूमिका निभाने जा रही है…ED और उसका कठोर कानून, जिसे न झुकाया जा सकता है और न खरीदा जा सकता है।
संस्कार बेच किया संविधान अपनी जेब में! महामहिम राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष सब खड़े हैं और बिगड़ैल शहजादा बैठ गया
नेशनल हेराल्ड का बहुचर्चित मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में है। प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा दर्ज किए गए नए मामले ने इस लंबे विवाद की कहानी को फिर से एक नई दिशा दे दी है। एजेंसियों का दावा है कि उन्हें वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी नई सूचनाएं मिली हैं। ये जानकारियों ऐसी हैं, जिनसे साफ पता चलता है कि नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी मे मिलीभगत की है। सोनिया-राहुल के साथ-साथ कई अन्य प्रमुख व्यक्तियों के खिलाफ नेशनल हेराल्ड मामले में दिल्ली पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की है। यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय की शिकायत पर की गई है, जो इस हाई-प्रोफाइल मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही है। आरोप है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने पद का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत लाभ उठाया है। नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी करतूतों के चलते घिर चुके हैं।

दशकों बाद अब सच हो रही है सरदार पटेल की चेतावनी
दशकों बाद सरदार पटेल की ये चेतावनी अब लोगों के सामने आ रही है, जब ईडी इस मामले की जांच कर रही है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की जो चेतावनी पत्र के रूप में तब शुरू हुई थी, वह अब एक बड़े घोटाले में बदल गई है। ईडी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ इस मामले में आरोपपत्र दायर किया है। इसमें उन पर यंग इंडिया लिमिटेड के जरिए 5,000 करोड़ रुपए की संपत्ति का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया गया है, जो उनके नियंत्रण में है और नेशनल हेराल्ड और उसकी मूल कंपनी एसोसिएट जर्नल लिमिटेड से जुड़ी है। 5 मई 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर चिंता जताई कि नेशनल हेराल्ड ने हिमालयन एयरवेज से जुड़े दो व्यक्तियों से 75,000 रुपए से अधिक की रकम स्वीकार की है। उन्होंने बताया कि एयरलाइन ने भारतीय वायुसेना की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए अवैध रूप से रात्रि हवाई डाक सेवा के लिए सरकारी अनुबंध इसके जरिए हासिल किया है। उसी पत्र में सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को आगाह किया कि नेशनल हेराल्ड ने अखानी नामक एक व्यवसायी से धन स्वीकार किया था, जो उनकी विमानन कंपनी के लिए रात्रि डाक अनुबंध हासिल करने में शामिल था। सरदार पटेल ने उल्लेख किया कि अखानी टाटा और एयर सर्विसेज ऑफ इंडिया जैसी फर्मों से भी धन जुटा रहा था।

नेशनल हेराल्ड के लिए धन जुटाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग
सरदार पटेल ने पत्र में आगे नेहरू को लिखा था कि अखानी पर बैंकों से धोखाधड़ी करने के लिए विभिन्न अदालतों में पहले से ही कई आरोप हैं। उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अहमद किदवई द्वारा नेशनल हेराल्ड के लिए धन जुटाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने के बारे में भी चेतावनी पत्र के जरिए दी थी, जिसमें जेपी श्रीवास्तव जैसे लखनऊ स्थित व्यापारियों से धन इकट्ठा करना भी शामिल है। उसी दिन, 5 मई 1950 को नेहरू ने पटेल को ऐसे लहजे में जवाब दिया था, जिससे लगता था कि उन्हें शांत करने की कोशिश की जा रही थी। नेहरू ने अपने पत्र में उल्लेख किया था कि उन्होंने अपने दामाद फिरोज गांधी, जो उस समय नेशनल हेराल्ड के महाप्रबंधक थे, से इस अवैध धन संग्रह के आरोपों की जांच करने के लिए कहा है।

सरदार पटेल ने नेहरू के रुख पर स्पष्ट असंतोष जताया था
इसके ठीक अगले ही दिन 6 मई को पटेल ने नेहरू के दावों का दृढ़ता से खंडन करते हुए फिर से नेहरू को जवाब दिया। उन्होंने साफ कहा कि अवैध धन की उगाही पूरी तरह से जारी है। फिर पटेल को शांत करने का प्रयास किया गया। लेकिन सरदार पटेल के द्वारा अवैध फंडिंग के बारे में जो चिंता व्यक्त की गई थी, उसे दरकिनार कर दिया गया। हालांकि, तब नेहरू ने यह स्वीकार किया था कि इसमें कुछ गलतियां हुई होंगी। इसके बाद 10 मई, 1950 को लिखे अपने अंतिम पत्र में सरदार पटेल ने नेहरू के इस रुख पर स्पष्ट असंतोष व्यक्त किया था। गृह मंत्री के रूप में उन्होंने भुगतानों से जुड़ी बेईमानी और नेशनल हेराल्ड के वित्तपोषण से जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।

गांधी परिवार पर बढ़ता दबाव, नेतृत्व का बोझ और कानूनी चुनौतियां
करीब 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में “अधिग्रहित” करने से जुड़े इस मामले का सबसे सीधा असर सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर पड़ रहा है। Young Indian कंपनी से जुड़े वित्तीय विवाद पहले भी कांग्रेस की राजनीति को भीतर तक हिलाते रहे हैं। नए मामले ने नेतृत्व की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। जब किसी राजनीतिक दल का सर्वोच्च नेतृत्व लगातार कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाता है, तो संगठन का मनोबल प्रभावित होना लाजिमी ही है। उस दल की अपने ही सहयोगी गठबंधन में भूमिका कमजोर पड़ जाती है। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा वर्षों से चलती रही है कि नेतृत्व का दबाव और मुकदमों का बोझ पार्टी के पुनर्निर्माण की राह में एक स्थायी रुकावट बन जाता है।

एफआईआर में सोनिया-राहुल के साथ सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के नाम
इस नई एफआईआर में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस नेता सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के साथ-साथ यंग इंडियन (वाईआई), डॉटैक्स मर्चेंडाइज लिमिटेड (Dotex Merchandise Ltd), डॉटैक्स प्रमोटर सुनील भंडारी और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) तथा अज्ञात अन्य को आरोपी बनाया गया है। ईडी सूत्रों के अनुसार, संघीय एजेंसी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 66(2) के तहत उपलब्ध शक्तियों का उपयोग करके पुलिस FIR दर्ज कराई। यह धारा केंद्रीय एजेंसी को कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा आपराधिक पूर्ववर्ती अपराध के पंजीकरण के लिए सबूत साझा करने की अनुमति देती है, ताकि बाद में मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया जा सके और जांच को आगे बढ़ाया जा सके। यह एफआईआर ईडी के मामले को मजबूत करेगी, जिसका आरोप पत्र एक मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली के आदेश से उत्पन्न हुआ है।

दो हजार करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में अधिग्रहीत
बता दें कि यह आदेश भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 26 जून, 2014 को एजेएल की संपत्तियों से जुड़ी कथित अनियमितताओं के संबंध में दायर एक निजी शिकायत पर संज्ञान लेते हुए दिया गया था। एफआईआर में ईडी द्वारा 4 सितंबर को ईओडब्ल्यू को भेजे गए एक पत्र में लगाए गए आरोपों का संज्ञान लिया गया है। ईडी के इस संचार की सामग्री वही है, जो केंद्रीय एजेंसी ने अपने आरोप पत्र में बताई है। ईडी ने अपने आरोप पत्र में आरोप लगाया था कि एक “आपराधिक साजिश” कांग्रेस पार्टी के पहले परिवार के नेतृत्व में, जिसमें सोनिया गांधी, उनके बेटे राहुल गांधी, दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीस, सैम पित्रोदा और एक निजी कंपनी यंग इंडियन शामिल हैं। एजेएल की 2000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियों के धोखाधड़ी वाले अधिग्रहण से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग योजना में शामिल थे। सोनिया-राहुल यंग इंडियन के बहुसंख्यक शेयरधारक हैं, जिनमें से प्रत्येक के पास 38 प्रतिशत शेयर हैं। ईडी का दावा है कि उसकी जांच ने “निर्णायक रूप से” पाया है कि यंग इंडियन ने एजेएल की 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में “अधिग्रहित” किया, जो उसके मूल्य से काफी कम था।

यह राजनीतिक हमला नहीं, करोड़ों की जालसाजी का प्रत्यक्ष प्रमाण
कांग्रेस की पहली प्रतिक्रिया हमेशा यही रही है कि यह “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” है। सवाल यह है कि क्या जनता इसे मानने को तैयार है? जब बार-बार करोड़ों की संपत्तियों, वित्तीय लेनदेन और कथित जालसाज़ी के आरोप सामने आते हैं, तब किसी भी दल को नैतिक रूप से खुद को साफ सिद्ध करना आसान नहीं रहता। जनता यह मानने लगती है कि जिन नेताओं के ऊपर पार्टी का मूल ढांचा खड़ा है, वे लगातार कानूनी विवादों में क्यों फंसे रहते हैं। कांग्रेस का संकट सिर्फ कानून या अदालत तक सीमित नहीं है। यह उसकी राजनीतिक छवि, जनविश्वास और विपक्ष में उसकी भूमिका पर सीधा प्रभाव डालती है। इसलिए यह शीशे की तरह साफ है कि यह कोई राजनीतिक हमला नहीं है, बल्कि कांग्रेस द्वारा किए गए धृत कर्मों का दुष्परिणाम है।

पहले से ही टूट रहे INDIA गठबंधन की एकता पर पड़ेगा असर
INDIA गठबंधन पहले ही कई असहमतियों और रणनीतिक मतभेदों से जूझ रहा है। राहुल गांधी और कांग्रेस को गठबंधन का “मुख्य चेहरा” बनाने का प्रयास कई क्षेत्रीय दलों को रास नहीं आ रहा। ममता बनर्जी से लेकर तेजस्वी यादव तक इसका विरोध कर चुके हैं। तेजस्वी ने तो बिहार में कांग्रेस का साथ देने का हश्र देख ही लिया। अब ममता को बंगाल चुनाव को लेकर चिंता है। दरअसल, नए मामले ने उन सभी दलों को और भी अधिक ताकत दे दी है जो पहले से ही कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में विपक्षी गठबंधन की एकता अब और भी कठिन होती जाएगी, क्योंकि सहयोगी दलों को कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से पहले राजनीतिक जोखिमों का मूल्यांकन करना होगा।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का आधार और कमजोर होगा
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले ही लगातार बदल रहा है। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति में अपनी स्वतंत्र भूमिका स्थापित करने की कोशिश करती रही हैं। वे कई बार राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठा चुकी हैं। अब नेशनल हेराल्ड का नया प्रकरण उनके लिए एक ताज़ा राजनीतिक हथियार का काम करेगा। कांग्रेस पहले ही बंगाल में सीमित उपस्थिति रखती है। अब यह मामला तृणमूल को कांग्रेस को “कमजोर, नेतृत्वहीन और समस्याग्रस्त पार्टी” के रूप में पेश करने का अवसर देगा। इससे कांग्रेस का बंगाल में आधार और कमजोर पड़ने की पूरी संभावना है। इसका फायदा 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिल सकता है।

बिहार के राजनीतिक बदलाव और विपक्ष की भ्रष्टाचारी छवि का लाभ
भाजपा वर्षों से जिस सच्चाई को उजागर करती आई है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार और परिवारवाद से घिरी पार्टी है, उसे यह मामला पुनः नई ऊर्जा देता नजर आ रहा है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, जहां भ्रष्टाचार, घोटालों और कटमनी की राजनीति पर जनता बेहद संवेदनशील है, वहां भाजपा इसे एक बड़ा मुद्दा बना सकती है। भाजपा की नीतिगत स्थिरता और “साफ़-सुथरी राजनीति” का संदेश, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के विवादों के चलते इसका फायदा अगले चुनाव में भाजपा को मिलने वाला है। हाल ही में बिहार में हुए राजनीतिक उतार-चढ़ाव ने विपक्ष की एकता को हिलाकर रख दिया है। भाजपा की वापसी और गठबंधन समीकरणों में हुए बदलाव ने पहले ही विपक्ष को कमजोर किया है। अब नेशनल हेराल्ड केस का नया अध्याय इस कमजोरी को और उजागर करता है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष अब कई हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। बिहार की तरह अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय दल कांग्रेस से दूरी बनाए रखने की वजह तलाश रहे हैं। पीएम मोदी ने इसीलिए कांग्रेस को परजीवी नाम दिया है, जो जिसके साथ जुड़ती है, उसे ही खत्म कर देती है।

गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार कांग्रेस के लिए नुकसानदेह
यह सवाल अब पार्टी के भीतर भी पहले से अधिक तीखे रूप में पूछा जा रहा है। नेशनल हेराल्ड मामला पहले भी कांग्रेस के लिए नकारात्मक धारणा बनाता रहा है। अदालत का फैसला जो भी आए, लेकिन जनता की नजर में गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार, परिवारवाद, असफलता और विवादों की पुनरावृत्ति कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित होगी। बंगाल में ममता बनर्जी की दूरी, सहयोगी दलों की सतर्कता और कांग्रेस की अपनी सीमाएं, ये फैक्टर इस धारणा को और मजबूत करते हैं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका है। कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती सिर्फ बाहरी नहीं, आंतरिक भी है। कई कांग्रेस नेता वर्षों से कह रहे हैं कि पार्टी को नए नेतृत्व या व्यापक संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता है। लेकिन पार्टी शीर्ष नेतृत्व पर निर्भरता कम नहीं कर पाई है। जब भी कोई नया केस सामने आता है, यह बहस फिर ज़िंदा हो जाती है। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन इसलिए खो रही है क्योंकि राहुल-सोनिया के नेतृत्व कमजोर पड़ता जा रहा है। 

करोड़ों के कांग्रेसी घपले वाला नेशनल हेराल्ड केस क्या है?
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 2012 में दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में एक याचिका दाखिल करते हुए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के ही मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीज, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे पर घाटे में चल रहे नेशनल हेराल्ड अखबार को धोखाधड़ी और पैसों की हेराफेरी के जरिए हड़पने का आरोप लगाया था। आरोप के मुताबिक, कांग्रेसी नेताओं ने नेशनल हेराल्ड की संपत्तियों पर कब्जे के लिए यंग इंडियन लिमिटेड ऑर्गेनाइजेशन बनाया और उसके जरिए नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन करने वाली एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (AJL) का अवैध अधिग्रहण कर लिया।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तो बकायदा चार्जशीट फाइल कर दी है। ईडी की चार्जशीट में राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भी आरोपी बनाया गया है। चार्जशीट में कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा और राजीव गांधी फाउंडेशन के ट्रस्टी सुमन दुबे भी अभियुक्त हैं। दरअसल, नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) करती है। इसका मालिकाना हक यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के पास है। यही वह कंपनी है जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों की हिस्सेदारी है। यही वजह है कि ईडी की जांच की आंच इन दोनों तक जा पहुंची है। नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी करतूतों के चलते घिर चुके हैं। इस मामले में एक रोचक तथ्य यह भी है कि अगर 75 साल पहले सरदार पटेल की बात जवाहर लाल नेहरू मान लेते और बाद में ये लोग साजिश ना करते तो शायद आज राहुल गांधी और सोनिया गांधी को यह दिन ना देखने पड़ते।

करोड़ों की संपत्तियों पर यंग इंडियन ने कब्जा किया – ED
प्रवर्तन निदेशालय ने 15 अप्रैल को नेशनल हेराल्ड अखबार और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) से जुडे मनी लॉन्ड्रिंग केस में पहली चार्जशीट दाखिल कर दी। इसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे के नाम शामिल हैं। मामले की सुनवाई दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में होगी। कोर्ट ने ED से मामले की केस डायरी भी मांगी है। ED का आरोप है कि कांग्रेस नेताओं ने साजिश के तहत एसोसिएटेड जर्नल्स लि. (एजेएल) की 2,000 करोड़ रुपए की संपत्तियों पर कब्जे के लिए उसका अधिग्रहण निजी स्वामित्व वाली कंपनी ‘यंग इंडियन’ के जरिए केवल 50 लाख रुपए में कर लिया। इस कंपनी के 76प्रतिशत शेयर सोनिया व राहुल के पास हैं। इस मामले में ‘अपराध से अर्जित आय’ 988 करोड़ रुपए की मानी गई। साथ ही संबद्ध संपत्तियों का बाजार मूल्य 5,000 करोड़ रुपए बताया गया है। जून 2022 में नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी से 5 दिनों में 50 घंटे पूछताछ हुई थी। फिर 21 जुलाई 2022 में नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी से 3 दिन में 12 घंटे सवाल हुए थे। इस दौरान उनसे 100 से ज्यादा सवाल किए गए।

आजादी से पहले शुरु हुए थे नेशनल हेराल्ड समेत तीन अखबार
इतिहास की बात करें तो 1937 में एसोसिएट जर्नल का गठन हुआ। इसके बाद 9 सितंबर 1938 को जवाहर लाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड अखबार शुरू किया। यह बात आजादी मिलने के ठीक 9 साल पहले की है। इस अखबार को शुरू करने में हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने अहम भूमिका निभाई थी। इसके तहत तीन अखबार थे, अंग्रेजी में ‘नेशनल हेराल्ड’, हिंदी में ‘नवजीवन’ और उर्दू में ‘कौमी आवाज’.यही नेशनल हेराल्ड आज सुर्खियों में बना हुआ है। नेशनल हेराल्ड केस में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत कई लोगों पर ईडी ने 988 करोड़ रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग मामले को लेकर चार्जशीट दायर की है। इसे लेकर ही बवाल है।

फिरोज के कमजोर संचालन से अखबार आर्थिक संकट में आया
जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव ओ. एम. मथाई ने अपनी किताब में सरदार पटेल और नेहरू की कहानी का जिक्र है। इसमें इस बात का भी जिक्र है कि फिरोज गांधी इस कंपनी के संचालन में बहुत अच्छे नहीं थे। इसलिए यह नेशनल हेराल्ड आर्थिक संकट में फंस गया। इसे आर्थिक संकट से उबारने के लिए जनहित निधि ट्रस्ट के रूप में बदल दिया गया। इस नए ट्रस्ट पर भी नेहरू परिवार का ही कब्जा रहा। इस ट्रस्ट के सभी ट्रस्टी नेहरू और उनके परिवार के बेहद करीबी लोग बनाए गए। उस समय विज्ञापन के नाम पर कई बड़े औद्योगिक घरानों से लाखों की रकम एक साल में इस अखबार ने हासिल की।

बड़ौदा के महाराजा से ही मांग ली थी दो लाख की रिश्वत
अपनी किताब में ओ. एम. मथाई ने तो यहां तक दावा किया कि नेशनल हेराल्ड के लिए बड़ौदा के महाराजा से पूरे दो लाख रुपए की रिश्वत मांग ली गई थी। सरदार वल्लभभाई पटेल को जब इसकी सूचना मिली थी तो उन्होंने इसकी शिकायत नेहरू से की थी। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते ही दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर नेशनल हेराल्ड को ऑफिस बनाने के लिए जमीन भी आवंटित की गई। 1950 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर नेशनल हेराल्ड का समर्थन करने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करने के साथ ही संदिग्ध धन उगाही के बारे में भी चेतावनी दी थी। सरदार पटेल के पत्राचार में दर्ज इन चिंताओं को नेहरू ने खारिज कर दिया था, जबकि वह इसके दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में आशंकित थे।

फिर सामने आया कांग्रेस का चीन प्रेम: राहुल के सियासी गुरु पित्रोदा ने कहा- चीन हमारा दुश्मन नहीं, पड़ रही है लताड़; लेकिन राहुल संसद में मोबाइल दिखाकर क्या चीन का विरोध कर रहे थे?

राहुल गाँधी द्वारा संसद में मोबाइल लेकर इसके कलपुर्जों को Made in China बताकर क्या साबित करना चाहा रहे हैं, एक, चीन से व्यापार बंद कर भारत में ही उत्पादन कर चीन का विरोध कर रहे हैं। दो, देश में बिकने वाला हर उत्पाद Made in China नहीं बल्कि Made in India हो। दरअसल सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो राहुल ने चीन का विरोध किया है। कहते हैं हर बुराई के पीछे कोई अच्छी बात जरूर छिपी होती है। क्या राहुल नहीं चाहते कि चीन से किसी भी तरह का व्यापार किया जाए? लेकिन राहुल के गुरु पित्रोदा ने चीन प्रेम दिखाकर राहुल को बचा लिया। और बाज़ी पलट दी।     

कांग्रेस का चीन प्रेम एक बार फिर खुलकर सामने आया है। इस बार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के सियासी गुरु सैम पित्रोदा ने विवादित बयान देते हुए कहा है कि मुझे चीन से खतरा समझ में नहीं आता। उन्होंने कहा कि भारत को चीन को दुश्मन मानना बंद कर देना चाहिए। इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष पित्रोदा ने कहा कि मुझे लगता है कि इस मुद्दे को हमेशा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। हमारा दृष्टिकोण शुरू से टकराव वाला रहा है। ये दुश्मनी पैदा करता है। हमें अपना रवैया बदलना होगा और यह मानना बंद करना होगा कि चीन हमारा दुश्मन है।

सैम के बयान पर सियासी संग्राम शुरू हो गया है। बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा है कि ‘जो कुछ कांग्रेस और उनके थिंक टैंक कहे जाने वाले लोग समय-समय पर कहते आ रहे हैं, वो चीजे अब पूरी तरह से जनता के सामने आती जा रही हैं। ओवरसीज कांग्रेस के प्रेसिडेंट सैम पित्रोदा ने चीन को लेकर आज जिस प्रकार का बयान दिया है, उससे यह बात बहुत साफ हो गई है कि कांग्रेस पार्टी के चीन के साथ हुए करार का इजहार वो दिनदहाड़े कर रहे हैं। गंभीर बात ये है कि जिस प्रकार की बात सैम पित्रोदा ने कही है, वो भारत की अस्मिता, कूटनीति और भारत की संप्रभुता पर बहुत गहरा आघात है। उन्होंने कहा है कि चीन के साथ तो किसी प्रकार का विवाद ही नहीं है, यानी भारत ही आक्रामक मुद्रा लिए हुए है। इसी भाव और इसी विचार के अनेक स्टेटमेंट राहुल गांधी भी पहले दे चुके हैं। कुछ समय पहले उन्होंने अपने विदेश दौरे पर कहा कि चीन ने बेरोजगारी की समस्या को बहुत अच्छे से दूर किया है। गलवान में हमारे 20 सैनिक शहीद हो गए और उसके बाद आपके नेता इस प्रकार की भाषा बोलता हैं तो यह निंदनीय है।’

चीन और कांग्रेस का गुप्त समझौता

राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) और चीन के बीच वित्तीय लेन-देन की जानकारी 2020 में सामने आई थी। ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2006 के बाद चीनी सरकार ने RGF को 1 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग दी थी।
2008 में UPA सरकार के दौरान कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच एक समझौता (MoU) हुआ था। इसमें दोनों दलों को “महत्वपूर्ण द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर विचार-विमर्श करने का अवसर” देने की बात कही गई थी।
राजीव गाँधी फाउंडेशन में 2005 से ही राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा ट्रस्टी के रूप में जुड़े हुए हैं, जबकि सोनिया गाँधी इसकी चेयरपर्सन हैं।
दिलचस्प बात यह है कि 2017 के डोकलाम विवाद के दौरान राहुल गाँधी ने गुपचुप तरीके से चीन के राजदूत लुओ झाओहुई से मुलाकात की थी। इसके अलावा साल 2018 में कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान उन्होंने गुपचुप तरीके से चीनी मंत्रियों से भी मुलाकात की थी।
यहाँ ये बात बताना भी जरूरी है कि राहुल गाँधी के परनाना और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा देकर आँख मूँदकर बैठ गए थे और चीन ने 1962 में भारत पर हमला कर दिया था। इस युद्ध में भारत की पराजय हुई थी। इससे सबक लेने की बजाए कांग्रेस लीडरशिप ने भी चीन प्रेम जारी रखा।

पित्रोदा के इस बयान पर बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने एक बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कांग्रेस पार्टी, राहुल गांधी, जॉर्ज सोरोस और चीन के एजेंट के रूप में काम करते हैं।

बीजेपी प्रवक्ता तुहिन सिन्हा ने कहा कि जिन्होंने हमारी 40,000 वर्ग किमी जमीन चीन को सौंप दी, उन्हें अब भी ड्रैगन से कोई खतरा नहीं दिख रहा है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि राहुल गांधी चीन से खौफ में हैं और आईएमईईसी की घोषणा से एक दिन पहले बीआरआई की वकालत कर रहे थे। चीन के प्रति कांग्रेस पार्टी के जुनूनी आकर्षण का मूल रहस्य 2008 के कांग्रेस-सीसीपी एमओयू में छिपा है।

आजादी के बाद से ही कांग्रेस चीन के प्रति विशेष लगाव रखती आई है। कांग्रेसी नेता जवाहर लाल नेहरू के चीनी प्रेम के कारण देश को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्थायी सीट उन्हीं के कारण चीन के पास गई थी। भारत-चीन भाई-भाई के नारा देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में ही चीन ने भारत की हजारों किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया था। उसी चीन की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के साथ कांग्रेस ने 2008 में एक गुप्त समझौता किया। आपको जानकर हैरानी होगी कि कांग्रेस चीन से राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए चंदा भी लेती रही है। इतना ही नहीं 2017 के डोकलाम विवाद के दौरान कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने गुपचुप तरीके से चीनी राजदूत से मुलाकात भी की थी। चीनी हमलों के कारण ही गलवान में हमारे कई जवान शहीद हुए थे। ऐसे में चीन के पक्ष में इस बयान से लोग सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के गुरु और पार्टी पर भड़क गए हैं। 

इतिहास के अज्ञानी राहुल गाँधी को नहीं मालूम कि नेहरू ने 16, इंदिरा ने 31, राजीव ने 11 बार बदला संविधान, लेकिन कह रहा है मोदी ने बदला तो आग लगा देंगे…

सोशल मीडिया पर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी का एक वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी कह रहे हैं कि अगर बीजेपी ने चुनाव जीतने के बाद संविधान को बदला तो इस पूरे देश में आग लगने जा रही है। राहुल से पूछों कि "क्या संविधान निर्माताओं ने संविधान में Secular शब्द डाला था? यदि नहीं, फिर किसने डाला और क्यों? क्यों मूल संविधान से छेड़छाड़ कर, जनता को पागल बनाया? क्या Secular का मतलब मुस्लिम तुष्टिकरण होता है?

शायद 90 के दशक में, NN Sippy की शशि कपूर और मुमताज़ अभिनीत चर्चित फिल्म 'चोर मचाये शोर' प्रदर्शित हुई थी। जो आज समस्त बीजेपी विरोधी विपक्ष पर सटीक बैठती है, विशेषकर राहुल गाँधी पर। दूसरे, नीचे एक वीडियो है, हालाँकि यह इस्लाम से सम्बंधित है। परन्तु इन विपक्षियों को बेनकाब करने के लिए बहुत जरुरी भी है। जिस तरह मौलाना अपना वर्जस्व बनाये रखने के लिए लिए मुसलमानों को डराते रहते हैं, लेकिन 72 हूरों पर प्रश्न करने पर कुछ का कुछ बोलने को मजबूर हो जाते हैं, ठीक उसी तरह संविधान को लेकर लोगों में डर बैठाने का दुस्साहस किया रहा है। 

राहुल को नहीं मालूम कि जवाहर लाल से लेकर राजीव तक 59 बार अपनी सहूलियत के मुताबिक संविधान को बदला जा चूका है। जिसे जनमानस समझने में पूर्णरूप से असफल रहा। इन बदलावों से मुस्लिम तुष्टिकरण कर हिन्दुओं की पीठ में छुरा घोंपा गया। इन सबको डर है अगर बीजेपी की 370 और एनडीए की 400 से पार सीटें आ गयीं, कांग्रेस, कम्युनिस्ट और इसके समर्थक पार्टियों की नींद, रोटी और पानी हराम हो जाएगा, क्योकि जनता के सामने वह असली संविधान आ जायेगा जो संविधान निर्माताओं ने जनहित में बनाया था, नाकि मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली पार्टियों के लिए।   

 

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी आजकल लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी हर रैली में यह कहते दिख रहे हैं कि एक तरफ कांग्रेस है, जो संविधान के लिए लड़ रही है तो वहीं दूसरी ओर भाजपा है, जो संविधान और लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है। कांग्रेस नेता राहुल हर जगह कह रहे है कि यह चुनाव विचारधारा का चुनाव है। एक तरफ आरएसएस और बीजेपी संविधान और लोकतांत्रिक को खत्म करने की कोशिश कर रही है, और दूसरी तरफ इंडी गठबंधन और कांग्रेस पार्टी संविधान और लोकतंत्र को बचाने की कोशिश कर रही है।

राहुल गांधी यह भी कह रहे हैं कि ये लड़ाई संविधान को बचाने की लड़ाई है। संविधान चला जाएगा। गरीबों के हक चले जाएंगे। आरक्षण चला जाएगा। और जो आपका धन है, गरीबों का धन है, किसानों का धन है, मजदूरों का धन है, वो पांच छह लोगों के हाथ में चला जाएगा।

वायनाड से सांसद राहुल गांधी की सुई संविधान पर अटक गई है और वे बार-बार कह रहे हैं कि अगर बीजेपी फिर से सत्ता में आ गई तो वो भारत का संविधान बदल देंगे।

बीजेपी ने चुनाव आयोग से राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत भी की है। बीजेपी ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी संविधान बदलने जैसा निराधार आरोप लगा रहे हैं। राहुल गांधी पर लगातार झूठ बोलने और आदतन अपराधी होने का आरोप लगाते हुए बीजेपी ने चुनाव आयोग से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए उनसे सख्ती से निपटने का आग्रह किया है। चुनाव आयोग को शिकायत के बाद भी राहुल गांधी के बार-बार संविधान को लेकर भाषण देने पर लोगों ने उनके पिता राजीव गांधी का वो बयान शेयर करना शुरू दिया है, जिसमें वो कह रहे हैं कि जरूरत पड़ी तो बार-बार संविधान बदलेंगे और हमारे पूर्वजों ने भी कई बार बदला है। यूजर्स कह रहे है कि संविधान बदलने पर आग लगा देने की धमकी देने वाले राहुल के परनाना जवाहर लाल नेहरू ने 16 बार, नानी इंदिरा गांधी ने 31 बार और पिता राजीव गांधी ने 11 बार संविधान बदले। ऐसे में लोग संविधान को लेकर दिए गए राजीव गांधी के बयान को सोशल मीडिया पर शेयर कर राहुल गांधी पर तंज कस रहे हैं। आप भी देखिए लोग लोग किस तरह से राहुल को ट्रोल कर रहे हैं।

जब जवाहर लाल नेहरू के आर्य समाजी स्वामी विद्यानंद विदेह जी ने झापड़ मारा

रमेश अग्रवाल, उगता भारत(सितम्बर 11, 2023)

वो सच्चाई जो देश और आमजनों से छिपाया गयी। जब जवाहरलाल नेहरू के मुँह पर जोरदार झन्नाटेदार झापड़ मारा था स्वामी विद्यानंद विदेह जी ने।

कारण ?

कारण यह है कि नेहरू ने एक समारोह के अपने भाषण में कहा कि हिन्दू आर्य समाज के लोग हिंदुस्तान में शरणार्थी हैं।

इतना सुनते ही .....स्वामी विद्यानंद विदेह जी जो उस समारोह के मुख्य अतिथि थे, वे तत्काल उठे और मंच पर ही नेहरू के मुँह पर एक झन्नाटेदार झापड़ मारा और नेहरू से माइक छींनते कहा कि .......आर्य समाज के लोग शरणार्थी नहीं हैं ये हमारे पूर्वज हैं और ये ही इस हिंदुस्तान के मूलनिवासी है।

साथ ही स्पष्ट रूप से कहा कि नेहरू ही तुम्हारे पूर्वज अरेबिक हैं। और तुम्हारे शरीर में अरब का खून बह रहा है।

तुम इस महान देश के मूल निवासी नहीं हो तुम शरणार्थी हो। साथ ही कहा कि काश सरदार पटेल इस देश के प्रधानमंत्री होते तो य़ह सब नहीं देखना सुनना पड़ता (विदेह गाथा :- पृष्ठ 637 से साभार)


गो हत्या का विवाद आज से नहीं है बल्कि नेहरू जी के टाइम में भी था। कहते हैं कि एक बार संसद में गो हत्या का प्रस्ताव रखा गया था।  जिस पर जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि अगर गो हत्या का प्रस्ताव परित होता है तो मैं अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा। शायद अरेबिक होने के कारण ही जवाहरलाल नेहरू से लेकर आज तक कांग्रेस गो हत्या की समर्थक है। 7 मार्च 1966 को इन्ही की बेटी इंदिरा गाँधी, तत्कालीन प्रधानमंत्री ने गो हत्या का विरोध कर निहत्ते साधु-संतों पर गोलियां चलवाकर पार्लियामेंट स्ट्रीट साधु-संतो की लाशों और खून से लाल हो गयी थी। साधु-संतों की गिरती लाशों और बहते खून से विचलित हो मान्य कृपालु जी महाराज ने इंदिरा गाँधी को श्राप दिया कि "हिमालय से आधुनिक वेशभूषा में एक तपस्वी आएगा जो कांग्रेस को ख़त्म कर देगा। ... जिस तरह गोपाष्टमी के दिन निहत्ते साधु-संतों से खून की होली खेली है, तेरी भी मौत गोपाष्टमी को ही होगी।" दूसरे, जब कुछ वर्ष पूर्व गो हत्या पर चर्चा हो रही थी, तब कांग्रेस ने ही गो मांस की पार्टी की थी।  

कांग्रेस जवाब दे: फ़िरोज़ जहांगीर खान का परिवार कब और कैसे हिन्दू बन गए? मुगलों के दिल्ली दीवान गयासुद्दीन और नेहरू परिवार का सम्बन्ध?

साभार 
डी एस आर्य, चेयरमैन, उगता भारत, गाज़ियाबाद 
सोनिया गाँधी के पुत्र राहुल गाँधी के पिता का नाम राजीव गाँधी। 
राजीव के पिता का नाम फिरोज जहांगीर खान। जो निश्चित रूप से हिंदू नहीं था। सर्वविदित है। तो कौन सी नस्ल हुई। पहचान करो।
परिवार और अंधभक्त जवाहरलाल, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की समाधि पर पहुँच सकते हैं, लेकिन बहु(सोनिया), पोता(राहुल) और पोती(प्रियंका) अपने ससुर-दादा की कब्र पर कभी सजदा करने का साहस नहीं कर पाए, क्यों? अगर इन्होने अपने ससुर-दादा के पद-चिन्हों पर चलने का प्रयास किया होता, कांग्रेस का इतना बुरा हाल नहीं होता। कई वर्ष पूर्व भारत विश्व में ऊँचा स्थान पा चूका होता। 
फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस ने 1555 में सटीक भविष्यवाणी की थी कि हिन्द(भारत) का 1947 में विभाजन होगा, फिर आज़ादी मिलेगी लेकिन फिर गुलाम बनेगा। बीच-बीच में आज़ादी की तरफ बढ़ेगा, लेकिन वास्तविक स्वतन्त्रता 2014 में अधेड़ उम्र के नेता में नई पार्टी के सत्ता में आने पर मिलेगी। जिसे Organiser Weekly में विस्तार से पढ़ा जा सकता है, बाजार में मिलने वाली जरुरत से अधिक सम्पादित किताबे नहीं। वास्तव में आज़ादी मिलने बाद के भारत आधुनिक मुगलों का गुलाम बना हुआ था।  
स्वतंत्र भारत में सबसे पहले घोटाले को उजागर कर फिरोज ने नेहरू के पसीने छुड़वा दिए 
संक्षेप संसद में अपने ससुर के पसीने छुड़ाने वाले राहुल और प्रियंका के दादा फ़िरोज़ खान पर रोशनी डालते हैं: 1952 में रायबरेली से पहले निर्वाचित सांसद चुने जाने के साथ ही फिरोज गांधी और जवाहर लाल नेहरू के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गई थी। कहा जाता है कि फिरोज गांधी राजनीति में बहुत ईमानदार और सक्रियता से काम करते थे इसलिए वह सरकर की आलोचना करने में पीछे नहीं रहते थे। इसकी वजह से उनके ससुर और देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी असहज होना पड़ता था।  
इसको लेकर दोनों के बीच संबंध कई बार तल्‍ख भी रहे लेकिन फिरोज गांधी का रवैया लगातार सरकार के प्रति आलोचनात्मक बना रहा। कहा जाता है कि फिरोज नेहरू सरकार की आर्थिक नीतियों और बड़े उद्योगपतियों के प्रति झुकाव को लेकर नाराज रहते थे। कहा जाता है कि आजाद भारत में सरकार का पहला घोटाला सामने लाने का श्रेय भी फिरोज गांधी को जाता है जिन्होंने दिसंबर 1955 में एक बैंक और इंश्योरेंश कंपनी के चेयरमैन राम किशन डालमिया के फ्रॉड को उजागर किया। जिन्होंने बैंकों के पैसे का उपयोग निजी कंपनियों में निवेश के लिए किया था। 
इसके बाद 1958 में उन्होंने संसद में हरिदास मूंदडा के एलआईसी में किए गए घोटाले को उठाया। उन्होंने ही देश की राष्ट्रीय इंश्योरेंस कंपनी में हुए इस बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया था। उन्होंने सरकार की आर्थिक अनियिमितताओं को भी सामने लाना शुरू कर दिया। इस घोटाले को लेकर फिरोज गांधी का रुख इतना मुखर था कि विरोधी सांसदों से ज्यादा उनकी आवाज संसद में सुनी जाती थी। उनके इस विरोध ने जवाहर लाल नेहरू की पाक साफ छवि को भी नुकसान पहुंचाया। यह फिरोज गांधी ही ‌थे जिनके आवाज उठाने के कारण नेहरू सरकार के वित्त मंत्री टीटी कृष्‍णमाचारी को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद ही फिरोज की आवाज शांत नहीं हुई और वो हर वाजिब मौके पर सरकार की आलोचना करने से नहीं चूकते थे।

खैर, बात सिर्फ यहीं समाप्त नहीं होती, वास्तविकता जानने के लिए इतिहास के उन पृष्ठों को खोलना होगा, जिसे परिवार भक्तों ने काली कोठरी में डाल जनता को कश्मीरी पंडित बताने का दुस्साहस किया है। इसके अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू के पिता का नाम मोतीलाल। मोतीलाल के पिता का नाम गयासुद्दीन ।

वह गयासुद्दीन जो अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शासनकाल में दिल्ली का दीवान होता था। जब 1857 में बहादुर शाह जफर से शासन सत्ता अंग्रेजों ने छीन ली तो उनका दीवान गयासुद्दीन कश्मीर की तरफ भाग गया और बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार करके देश निकासा देते हुए रंगून भेज दिया गया।

जब गयासुद्दीन का पीछा करते हुए अंग्रेजों की सीआईडी कश्मीर पहुंची, तो  जानकारी होने पर गयासुद्दीन ने कश्मीर से भागकर आगरा आ गया। उसकी जानकारी सीआईडी को मिली तो सीआईडी आगरा पहुंच गई। लेकिन उससे पहले गयासुद्दीन को जानकारी हो गई इसलिए उसने आगरा छोड़ दिया। और ट्रेन में इलाहाबाद जाने के लिए सपरिवार  बैठा हुआ था। संदिग्ध होने के नाते उससे उसका नाम पूछा गया तो उसने सोची-समझी रणनीति के तहत तपाक से अपना नाम तुरंत पंडित गंगाधर बता दिया जिससे उसको गयासुद्दीन नाम से ना पहचाना जाए ।

बताया भी तो क्या बताया पंडित गंगाधर यानी कि हिंदुओं में सबसे उच्च जाति जो मानी जाती है वर्ण व्यवस्था के अनुसार भी जिसके प्रति लोगों की श्रद्धा होती है। बनना ही है तो वही बना जाए और फिर सीआईडी द्वारा छोड़ दिया और इलाहाबाद बस गए।

मोतीलाल ने वकालत इलाहाबाद में हाईकोर्ट में शुरु की। प्रारंभ में अच्छी वकालत नहीं चली। एक मुसलमान वकील मुबारक अली जो उस समय एक विख्यात वकील थे उनसे मित्रता की। मोतीलाल की शादी कश्मीर की मुसलमानी से हुई थी। जो बहुत खूबसूरत थी। मुबारक अली एक मुसलमान होने के नाते  शाम को रोज  रेड एरिया में जाता था। इस कमजोरी को मोतीलाल ने पहचान लिया था और मित्रता करके घर पर आना जाना व मुबारक अली को बुलाना प्रारंभ किया। मोतीलाल ने अपनी सहमति से मुबारक अली के साथ अपनी पत्नी के अवैध संबंध स्थापित कराए, जिससे जवाहरलाल पैदा हुआ। उसके पितृत्व को लेकर के मोतीलाल और मुबारक अली विवाद में हुआ लेकिन मुबारक अली ने मोतीलाल का नाम ही पिता के रूप में दर्ज कराया और जवाहरलाल की शिक्षा और पालन-पोषण का सारा खर्चा दिया, और मुबारक अली एडवोकेट ने अपनी एक बिल्डिंग मोतीलाल को उपहार स्वरूप दी जो पुरानी बिल्डिंग आज भी आनंद भवन में देखी जा सकती है। बाद में मोतीलाल ने एक और नई बिल्डिंग बनवाई वह भी आनंद भवन के पास ही है उसी प्रांगण में है दोनों को आज भी देखा जा सकता है।

अब इन लोगों की नस्ल को पहचानने के बाद आप क्या इनसे यह आशा रखोगे कि आप के पक्ष में बोलेंगे।

सोनिया कौन है? राजीव से शादी करने से पहले कौन थी? अर्थात क्या करती थी? राजीव से शादी क्यों की गई थी? क्या यह उसकी क्लास फेलो थी? ये तथ्य किसी से छुपे है क्या?

अरविंद घोष की पुस्तक को पढ़ो। इतिहास के इन तथ्यों की जानकारी आपको मिल जाएगी। यह मैं नहीं कह रहा अरविंद घोष के अलावा अन्य लोगों ने भी इस बात पर लिखा है।

गूगल फेल है यह बताने के लिए की  गंगाधर नाम का कोई दीवान, वह भी अंतिम दीवान दिल्ली का रहा हो। आरटीआई से डाल कर पूछ लो।

 मुगल सल्तनत हो और भला हिंदू दीवान हो ऐसा हो ही नहीं सकता।

इनकी निष्ठा राष्ट्र के साथ हो सकती है?

राहुल का डीएनए टेस्ट और फारुख अब्दुल्ला का डीएनए टेस्ट करवा दो निश्चित हो जाएगा।

कश्मीर में कौन सी नहर थी जिसके किनारे जाकर के बसे  हो और इनका नाम वहां से नेहरू हो गया हो ।

झूठ को इस देश में इस तरीके से प्रचारित किया गया व सत्य पर पर्दा इतने डाल दिए गए वह आज तक उजागर ही नहीं हो पाई। अब भी बहुत से साथी इस पर संदेह कर सकते हैं और उन्हीं पुरानी घिसी पिटी बातों पर ही विश्वास कर सकते हैं।

मान के योग्य साथियों चतुर्वेदी जी व शोभित शर्मा जी व अन्य विद्वत जनों से निवेदन करूंगा इतिहास को उसके सही तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने  का प्रयास करेंगे।विपरीत टिप्पणी करने वाले उन साथियों से निवेदन करना चाहूंगा कि विपरीत टिप्पणी करने से पहले अरविंद घोष की पुस्तक पढ़ लेंगे।

कांग्रेस नेतृत्व मुद्दा विहीन हो चुका है।

यह देश आज तक नेहरू की गलत नीतियों का खामियाजा भुगत रहा है।

उपरोक्त के अतिरिक्त जब जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को  भारत में विलय का प्रस्ताव दिया नेहरू ने मना किया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने कार्यवाही करके पाकिस्तान की सेना को रोका।नेहरू ने कहा कि यह मेरे प्रांत का मामला है आप इसमें हस्तक्षेप न करें सरदार जी। पाकिस्तान की सेना हिंदुस्तान की सेना है जहां जिस लाइन पर खड़ी है वही रोक दिया जाए हम इस मैटर को यू एन ओ से डिसाइड करा लेंगे। जिसको आज पीओके कहते हो यह सब नेहरू की देन । आज तक भारतवर्ष का कितना बड़ा नुकसान जन और धन को लेकर हो चुका है परंतु यह कांग्रेसी हैं कि जो बेशर्म है बे लिहाज है।इस पीओके के ऊपर या जम्मू कश्मीर के ऊपर या  बलूचिस्तान के ऊपर कल कोई युद्ध होता है और वह युद्ध विश्व युद्ध में परिवर्तित होता है( जिसकी संभावना है प्रबल है )तो इसके लिए नेहरू की गलत नीतियां ही जिम्मेदार होंगी

तत्कालीन राजा हरि सिंह के खिलाफ वर्ष 1943 में नेहरू ने अपने भाई शेख अब्दुल्लाह को भड़काया। और 1947 में सरदार बल्लभ भाई पटेल को इसीलिए राजा की सहायता करने से रोका था कि कि राजा हरि सिंह को पीटने दीजिए ।कमजोर होने दीजिए।जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला को नेहरू राज्य सत्ता सौंपना चाहते थे।

अब यह सर्व विदित हो चुका है कि शेख अब्दुल्लाह, मोहम्मद अली जिन्ना और जवाहरलाल नेहरू तीनो भाई भाई थे। और तीनों ने मिलकर इस देश का बंटवारा 3 रियासतों में किया था । तीनों अलग-अलग तीनों रियासतों के मालिक बने थे।

कांग्रेस नेतृत्व बोलने लायक नहीं है। यदि कांग्रेस नेतृत्व में जरा भी नैतिक साहस है तो उपरोक्त बातों का जवाब भारत की जनता को चाहिए।

कांग्रेस के  लोग मर्यादा हीन और खोखले हो चुके हैं।

भारत की जनता अब इनका विश्वास नहीं करती है।

कांग्रेस के लोग और वामपंथी देश के गद्दार हैं।

क्योंकि ये चाइना का समर्थन करते हैं। पाकिस्तान का समर्थन करते हैं ।देश विरोधी शक्तियों का समर्थन करते हैं। उन से हाथ मिलाते हैं। उनके डिनर खाते हैं।

कहां तक लिखे इन कांग्रेसियों के बारे में।

कैसे एक दूसरे के करीब आए थे इंदिरा और फिरोज, पढ़िए 11 अनसुने किस्से

अमर उजाला(13 सितम्बर 2016) के अनुसार कांग्रेस के पूर्व सांसद और इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी का 13 सितम्बर जन्मदिवस है लेकिन उनकी पहचान सिर्फ इतनी भर नहीं है। आजाद भारत में फिरोज गांधी ऐसे पहले सांसद रहे जिन्होंने संसद और उसके बाहर अपनी ही पार्टी की सरकार की जमकर मुखालफत की वो भी तब जब इसके मुखिया उनके ससुर जवाहर लाल नेहरू ही थे। आइए आपको बताते हैं फिरोज गांधी के कुछ ऐसे ही अनसुने किस्सों के बारे में।

पांच भाई बहनों में सबसे बड़े फिरोज गांधी का असली नाम फिरोज घांदी था। उनके पिता जहांगीर घांदी गुजरात के भरूच के रहने वाले एक पारसी थे (हालांकि कुछ इतिहासकार उनके मुस्लिम होने का दावा भी करते हैं)। पिता की मौत के बाद फिरोज अपनी मां रत्तीमई फरदून के साथ भरूच से पहले मुंबई और फिर इलाहाबाद आकर रहने लगे। बताया जाता है कि यहां उनकी मौसी डा. शीरीन कमिसएरिएट रहती थीं, जो सिटी लेडी डफरिन हॉस्पिटल में एक प्रख्यात सर्जन थीं।

इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने विद्या मंदिर हाईस्कूल में एडमिशन लिया और यहां से स्कूली शिक्षा पूरी कर इविंग क्रिश्चियन कालेज से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के साथ साथ उन्होंने आजादी के आंदोलन में भी भाग लेना शुरू कर दिया। 1930 में उन्होंने कई आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। यहीं उनकी मुलाकात इंदिरा गांधी उर्फ इंदिरा प्रियदर्शनी से हुई।

फिरोज गांधी के सरनेम को लेकर इतिहासकारों में हमेशा ही विवाद रहा है। कहा जाता है‌ कि आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी से प्रभावित होकर अपना सरनेम घांदी से गांधी कर लिया था। जबकि किस्सा ये भी है कि इंदिरा गांधी से शादी के बाद जब पंडित जवाहर लाल नेहरू नाराज हुए तो महात्मा गांधी ने उन्हें अपना सरनेम गांधी दे दिया था जो आज तक गांधी परिवार के साथ चला आ रहा है। 

इंदिरा और फिरोज गांधी के प्रेम संबंध और शादी को लेकर भी बहुत किस्से प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जब इंदिरा की मां कमला नेहरू टीबी की गंभीर बीमारी से जूझ रहीं थी तब फिरोज गांधी ने उनकी बहुत सेवा की थी। जब स्विटजरलैंड में कमला नेहरू की मौत हुई तब उनके साथ फिरोज गांधी वहीं मौजूद थे। इससे पूर्व एक बार एक आंदोलन के दौरान जब कमला नेहरू बेहोश होकर गिरीं तो फिरोज गांधी उन्हें अपनी बाजुओं में उठाकर ले गए थे। यह देख इंदिरा फिरोज से  काफी प्रभावित हुईं। 

इसी बीच दोनों एक दूसरे के नजदीक आए तो 1933 में 21 साल के फिरोज गांधी ने 16 साल की इंदिरा के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। लेकिन इंदिरा और उनकी मां कमला नेहरू ने इसे खारिज कर दिया। बात आई गई हो गई और फिरोज फिर नेहरू परिवार के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में जुट गए। इसी बीच एक बार फिर इंदिरा और फिरोज की नजदीकियां बढ़ी और दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। शुरूआत ना नुकुर के बाद जवाहर लाल नेहरू इस रिश्ते के लिए तैयार हो गए और मार्च 1942 में हिंदू रीति रिवाज से दोनों की शादी कर दी गई। लेकिन तब तक कमला नेहरू दुनिया छोड़ चुकी थीं।

शादी के बाद फिरोज ने पत्नी इंदिरा और ससुर ‌जवाहर लाल नेहरू के साथ और सक्रियता से आजादी के आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। इस कारण फिरोज को अगस्त 1942 में जेल भी जाना पड़ा। सालभर तक वह इलाहाबाद जेल में रहे। जेल से छूटने के बाद वह फिर आंदोलन में जुट गए। इसी बीच इंदिरा ने 1944 में राजीव और 1946 में संजय गांधी को जन्म दिया। (विस्तार से अमर उजाला(13 सितम्बर 2016) पढ़िए)