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नेहरू की इंटेलिजेंस की अनदेखी से लेकर इंदिरा गाँधी की CIA से जुड़ी दखलअंदाजी तक: निजी फायदे के लिए देश के हितों को बेचने का कांग्रेस का रहा है इतिहास

साभार-chatgpt
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को भारत-US ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला किया। लेकिन उनका भाषण सिर्फ बगैर सबूत के आरोपों से भरा था। असल में ये पूरा ड्रामा था, जो हकीकत से कोसों दूर थी।

केंद्र पर ‘भारत माता को बेचने’ और ‘राष्ट्रीय हितों से समझौता करने’ के आरोप लगाते हुए उन्होंने तर्क देने के बजाय अपने गुस्से का इजहार किया। संसद में उनके भाषण में बड़े-बड़े दावों के साथ इमोशनल नारे भी थे, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं था कि भारत के हितों की कैसे अनदेखी की मोदी सरकार ने?

राहुल गाँधी ने कहा कि सरकार खुद मानती है कि दुनिया एक उथल-पुथल वाले दौर में जा रही है, जिसमें जियोपॉलिटिकल टकराव, एनर्जी और फाइनेंस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने आगे दावा किया कि अगर अमेरिका कहता है कि भारत किसी खास देश से तेल नहीं खरीद सकता है और भारत ऐसा करता है, तो इसका मतलब है कि मोदी सरकार ने ‘भारत’ को बेच दिया है।

यह एक गंभीर आरोप है। बिना किसी डॉक्यूमेंट्री सबूत के, ट्रेड डील के दस्तावेजों में कहाँ ये बात लिखी हुई है, ये बताए बिना, कौन से खास क्लॉज से संप्रभुता खतरे में है, ये बताए बिना आरोप लगाना काफी खतरनाक है। उन्होंने सरकार पर ‘प्रेशर’ की बात की, ‘प्रधानमंत्री की आँखों में डर’ की बात की और यहाँ तक कि सीलबंद ‘एपस्टीन फाइल्स’ का भी जिक्र किया, जिसका भारत की ट्रेड डील से कोई कनेक्शन नहीं है। यह भाषण एक ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ से ज्यादा कुछ नहीं था।

उन्होंने आगे दावा किया कि टैरिफ करीब 3% से बढ़कर 18% हो गए हैं और भारत में US इंपोर्ट $46 बिलियन से बढ़कर $146 बिलियन हो सकता है। उन्होंने इसे ‘जबरदस्ती रियायत’ कहना बताया। लेकिन ट्रेड नेगोशिएशन नारों में नहीं होती। टैरिफ लाइन, कोटा, मिनिमम इंपोर्ट प्राइस और सेफगार्ड क्लॉज मायने रखते हैं। पूरे डील पर बातचीत किए बगैर राहुल गाँधी की बातें आर्थिक नीति की आलोचना से ज्यादा डर पैदा करने वाले लगते हैं।

चीन में भारत के खुफिया तंत्र की मजबूती के खिलाफ थे नेहरू

इतिहासकार पॉल एम. मैकगार ने अपनी 2024 की किताब ‘स्पाइंग इन साउथ एशिया: ब्रिटेन, द यूनाइटेड स्टेट्स, एंड इंडियाज़ सीक्रेट कोल्ड वॉर’ में लिखा है, कांग्रेस के कई फैसलों ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर किया। मैकगार ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया में फैले मजबूत खुफिया ढाँचा बनाने का विरोध किया, खासकर चीन के मामले में। नेहरू का तर्क था कि चीन जैसे देश में इंटेलिजेंस क्षमताओं को बढ़ाना, भारत के बस की बात नहीं है। खुफिया तंत्र की कमजोरी का खामियाजा भारत को 1962 के युद्ध के वक्त उठानी पड़ी।

मसाजर की किताब का अंश

यह सिर्फ फैसले की नाकामी नहीं थी, बल्कि सरकार के नीति पर सवाल था।

इतिहासकार मैकगार ने इंदिरा गांधी के दौर का जिक्र करते हुए कांग्रेस की नीति की बखिया उधेड़ डाली है। डैनियल पैट्रिक मोयनिहान की 1978 की किताब ‘ए डेंजरस प्लेस’ का ज़िक्र करते हुए, मैकगार ने लिखा है कि CIA ने कम से कम दो बार भारतीय राजनीति में दखल दिया, केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकारों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी को पैसे दिए। मोयनिहान के मुताबिक, एक बार CIA के पैसे सीधे इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते दिए गए।

लाहौर और सियालकोट भारत के हो सकते थे, लेकिन कांग्रेस ने दे दिया

युद्ध के मैदान में मिली जीत को बातचीत की टेबल पर हार में बदलने में कांग्रेस माहिर रही है। जब भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पछाड़ दिया, तो कांग्रेस सरकार ने ताशकंद में समझौता के दौरान उन सभी क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस करने पर सहमत हो गई, जो भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए जीता था। इसमें लाहौर जैसे कई शहर और कश्मीर का हाजी पीर दर्रा शामिल थे। ये जमीन के सिर्फ सिंबॉलिक टुकड़े नहीं थे, बल्कि जांबाजों की खून और कुर्बानी से हासिल की गई जगहें थीं। भारतीय सैनिक लाहौर की आखिरी डिफेंसिव बैरियर, इछोगिल कैनाल तक पहुँच गए थे और कश्मीर में घुसपैठ के मुख्य रास्ते हाजी पीर पर कब्ज़ा कर लिया था।
मिलिट्री और डिप्लोमैटिक तौर पर भारत मजबूत स्थिति में था। फिर भी इंटरनेशनल दबाव में और कॉन्ग्रेस की विदेश नीति के हिसाब से, भारत सरकार ने लाहौर और सियालकोट जैसे जगहों और कश्मीर का हाजी पीर पाकिस्तान को लौटा दिया। युद्ध में जीत के बाद भी भारत के हाथ नाकामी ही आई।
उस फैसले के नतीजे आज भी भारत को परेशान करते हैं। हाजी पीर पास वापस करके कांग्रेस सरकार ने कश्मीर में घुसपैठियों और आतंकियों को भारत भेजने का एक रास्ता छोड़ दिया। आज भी इस रास्ते से आतंकवादी भारत में घुस कर पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब बनाने की कोशिश करते रहते हैं। पुलवामा हमला जैसे साजिश रचते हैं।
ताशकंद समझौते से हमेशा के लिए शांति नहीं मिली। इसने पाकिस्तान को हार के बावजूद कुछ खास नुकसान नहीं हुआ और साँस लेने की जगह दी। अयूब खान बिना कुछ खोए घर लौटे जबकि भारत जीत के बावजूद ‘खाली हाथ’ घर लौटा।
यह कोई नेतागिरी नहीं थी, यह खुद को नुकसान पहुँचाना था। जब राहुल गाँधी दूसरों पर ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाते हैं, तो वह एक ऐसी पार्टी की तरफ से बोल रहे होते हैं, जिसके अपने रिकॉर्ड शानदार रहे हों। ताशकंद में युद्ध के मैदान में मिली जीत को छोड़ देना और उससे पहले 1948 में कश्मीर का इंटरनेशनलाइजेशन करना शामिल है। ऐसे फैसलों ने पीढ़ियों तक भारत की ताकत को कमजोर किया।

बगैर मोल भाव किए 93,000 बंदी बनाए गए पाकिस्तानी फौजियों को वापस करना बड़ी गलती थी

भारत की सबसे बड़ी मिलिट्री जीत 1971 में देखने को मिली। उस वक्त भी कांग्रेस ने वही किया। बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के समय भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश बनाए, बल्कि 93,000 पाकिस्तानियों को युद्धबंदी भी बनाया। ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े सरेंडर में से एक था। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। भारत के पास पाकिस्तानी फौज के जवान और अफसर थे, जिन्हें बगैर किसी मोलभाव के वापस भेज दिया गया।
भारत चाहता तो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर अपने सभी झगड़ों का निपटारा कर सकता था। जम्मू कश्मीर के पीओके वाले हिस्से को वापस ले सकता था, जिस पर आज भी पाकिस्तान का कब्जा है, 54 भारतीय सैनिकों और एयरमेन की वापसी पक्की कर सकता था, जिन्हें पाकिस्तान ने पकड़ लिया था और जिन्हें 1971 से ऑफिशियली “मिसिंग इन एक्शन” लिस्ट में रखा गया था।
लेकिन इंदिरा गाँधी सरकार ने शिमला समझौते के तहत सभी 93,000 पाकिस्तानी POWs को वापस भेजने की जल्दबाजी की, बिना उन 54 भारतीय सैनिकों की वापसी पक्की किए और न ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर कोई पक्का समझौता किया। दशकों बाद भी उन भारतीय सैनिकों की किस्मत का फैसला नहीं हुआ है।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।

कांग्रेस के वक्त हुई थी असली ‘वोट चोरी’

बाहरी पैसे का इस्तेमाल भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए और चुनावी नतीजे सत्तारूढ़ कांग्रेस के पक्ष में झुकाने के लिए किया जा रहा था। लेकिन इस पर कांग्रेस ने देश से कभी माफी नहीं माँगी, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया।
राहुल गाँधी का दावा है कि भारत ‘बाहरी दबाव’ में फैसले ले रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कांग्रेस सरकारों के वक्त भारत की स्ट्रेटेजिक क्षमताएं कमजोर हुआ करती थीं। खुफिया तंत्र कमजोर था। अगर मैकगार और मोयनिहान की बात पर यकीन करें, तो सत्ताधारी पार्टी ने अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए विदेशी इंटेलिजेंस और फंडिंग का भी इस्तेमाल किया।
इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की ट्रेड बातचीत जाँच से बाहर होनी चाहिए। अमेरिका के साथ ट्रेड डील के हर शब्द, हर सेक्टर और हर क्षेत्र में फायदे की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। लेकिन जाँच के लिए फैक्ट्स, दस्तावेजों और तर्कों की जरूरत होती है, न कि ‘आँखों में डर’ या इंटरनेशनल स्कैंडल्स को जबरदस्ती मुद्दा बनाने की।
राहुल गाँधी का भाषण लफ्फाजी और बगैर सबूत के आरोप लगाने के आदत को दिखाता है। देश की सुरक्षा को लेकर कांग्रेस के रिकॉर्ड खुद काफी खराब रहे हैं। ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाने से पहले, कांग्रेस को अपने अतीत में किए गए कार्यकलापों पर जवाब देना चाहिए।
राहुल गाँधी का आरोप कि मोदी सरकार ने अमेरिका से ट्रेड डील कर ‘भारत को बेच दिया।’ कॉन्ग्रेस का खुद का रिकॉर्ड इस मामले में काफी खराब रहा है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का एक मजबूत इंटेलिजेंस सिस्टम बनाने से इनकार करना, 1966 में ताशकंद समझौता करना जिसमें भारत को युद्ध में मिली जीत पर पानी फेर देना। 1972 में कश्मीर या भारत के सैनिकों को रिहा करवाए बिना 93,000 पाकिस्तानी POWs को रिहा करना शामिल है। इतिहास बताता है कि युद्ध के मैदान में सेना जीतती है और बातचीत की टेबल पर कॉन्ग्रेस उसका फायदा नहीं उठा पाती और भारत का नुकसान करती रही है।

चिदंबरम का कांग्रेस पर एक और धमाका : इंदिरा गाँधी को ‘शहीद’ बताने वाली कांग्रेस की पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम ने खोली पोल, कहा- टाला जा सकता था ऑपरेशन ब्लू स्टार: दिल्ली में कैसे हुआ था सिख नरसंहार

                                 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' पर चिदंबरम ने उठाए सवाल (साभार- zeenews, abp)
ब्रिटिश नागरिक द्वारा स्थापित कांग्रेस देशहित में कैसे काम कर सकती है जिसका खुलासा करने में कांग्रेस नेता भी पीछे नहीं। कांग्रेस इस मुगालते में रही कि हमारे गलत फैसले कभी बेनकाब नहीं होंगे और जनता भी इस भ्रम में कांग्रेस पर विश्वास करती रही। जिस खालिस्तान की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा था आज की कांग्रेस विशेष रूप उसी इंदिरा की बहु और पोता-पोती खालिस्तानियों का समर्थन कर वर्तमान सरकार पर हमला कर रही है। लेकिन अक्ल से पैदल जनता कांग्रेस की इस देश विरोधी नीति को नहीं समझ रही।  

कांग्रेस की वो पुरानी पोल अब खुद उनके बड़े नेता और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने खोल दी है। कांग्रेस इंदिरा गाँधी को ‘शहीद’ बताकर हमेशा पॉलिटिकल फायदा उठाती रही है, लेकिन चिदंबरम ने साफ कहा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार एक बड़ी ‘गलती’ थी, जिसे टाला जा सकता था।

इस गलती की कीमत इंदिरा गाँधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी और फिर 1984 में सिखों का खौफनाक कत्लेआम हुआ। कांग्रेस ने आज तक इन दंगों के लिए माफी नहीं माँगी।

दरअसल, इंदिरा गाँधी ने पहले तो जरनैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया, ताकि अकाली दल की पॉलिटिक्स को कमजोर कर सकें और पंजाब में अपनी पकड़ मजबूत करें। लेकिन जब बात हाथ से निकल गई, तो उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार करवाया। इसके बाद उनकी हत्या हो गई, और दिल्ली समेत कई जगहों पर कांग्रेस वालों ने सिखों का नरसंहार कर डाला। 

भिंडरावाले को बढ़ावा देने की शुरुआत

पंजाब में 1980 के दशक में हालात बिगड़ रहे थे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पंजाब को भारत से अलग करने की साजिश रच रही थी। भारत ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश छीना था, तो बदला लेने के लिए आईएसआई ने सिख आतंकवाद को हवा दी। जरनैल सिंह भिंडरावाले को उन्होंने अपना हथियार बनाया, जो खालिस्तान की माँग कर रहा था।

भिंडरावाले को प्रश्रय देने में कांग्रेस का हाथ था। इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने उसे सपोर्ट किया, ताकि अकाली दल की पॉलिटिक्स पर हावी हो सकें। अकाली दल सिखों की मुख्य पार्टी थी और कांग्रेस चाहती थी कि पंजाब में उसकी ताकत कम हो।

साल 1981 में गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह (जो बाद में राष्ट्रपति बने) ने भिंडरावाले को जेल से छुड़वाया और कहा कि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। 1982 में इंदिरा गाँधी ने बड़ा पॉलिटिकल मूव खेला और ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति बना दिया।

अप्रैल 1983 से भिंडरावाले ने स्वर्ण मंदिर को अपना हेडक्वार्टर बना लिया। कांग्रेस की ये रणनीति थी, जिसमें अरुण नेहरू, अरुण सिंह, कमलनाथ और संजय गाँधी जैसे लोग शामिल थे। अंत में ये आग पूरे पंजाब को जला गई, सिखों और पूरे देश का नुकसान हुआ।

ऑपरेशन ब्लू स्टार: राजनीतिक फायदे के लिए करवाया

जब पंजाब हिंसा की आग में जलने लगा, तो इंदिरा गाँधी ने समझौते की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। भिंडरावाले ने हथियारबंद आतंकियों के साथ स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया। खालिस्तानी अलगाववादी पंजाब की स्वायत्तता की माँग को उग्र बना रहे थे। 1984 में लोकसभा चुनाव होने वाले थे और खुद को ‘देशभक्त’ दिखाने के लिए इंदिरा गाँधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को हरी झंडी दे दी।

ऑपरेशन ब्लू स्टार 3 से 6 जून 1984 तक चला। भारतीय सेना का मकसद अमृतसर के हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) को भिंडरावाले और उसके समर्थकों से मुक्त कराना था। 1 जून 1984 को खालिस्तानी आतंकियों से समझौता फेल होने के बाद 3 जून को सुरक्षा बलों ने मंदिर घेर लिया। एक बड़ी वजह ये भी थी कि 3 जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस था, और हजारों श्रद्धालु वहाँ जुटने वाले थे। मंदिर के अंदर भिंडरावाले की मोर्चाबंदी और बाहर सेना की, पूरे इलाके को छावनी बना दिया।

4 जून को सेना ने गोलीबारी शुरू की, 5 जून को भारी टक्कर हुई। 83 सैनिक मारे गए, 249 घायल हुए। 6 जून को भिंडरावाले की मौत की खबर आई, और सेना ने मंदिर को मुक्त कर लिया। लेकिन सिखों के पवित्र मंदिर में सेना का घुसना दुनिया भर के सिखों को गुस्सा दिला गया।

चिदंबरम ने कहा कि ये गलत तरीका था। उन्होंने बताया, “मैं किसी सैन्य अधिकारी का अनादर नहीं कर रहा, लेकिन स्वर्ण मंदिर को कब्जे में लेने का वो गलत रास्ता था। कुछ साल बाद हमने सेना को बाहर रखकर सही तरीका दिखाया। ऑपरेशन ब्लू स्टार सभी उग्रवादियों को पकड़ने के लिए था। मैं मानता हूँ कि श्रीमती गाँधी ने उस गलती की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। वो गलती सेना, पुलिस, खुफिया और सिविल सर्विस का मिला फैसला था। सिर्फ श्रीमती गाँधी को दोषी नहीं ठहरा सकते।”

बीजेपी नेता अमित मालवीय ने उनका बयान शेयर कर पूछा है कि क्या अब कांग्रेस सच बोलने और उनके झूठे बयानों का पर्दाफाश करने के लिए चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई करेगी?

बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट किया कि कांग्रेस इंदिरा और राजीव गाँधी को ‘शहीद’ बताकर माइलेज लेती है, लेकिन चिदंबरम ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को गलती बताकर इस मिथक को तोड़ दिया। राजीव गाँधी की हत्या भी पड़ोसी देशों से निपटने में फेल होने का नतीजा थी। अब क्या कांग्रेस चिदंबरम के खिलाफ एक्शन लेगी, क्योंकि उन्होंने सच बोला और उनके झूठ का पर्दाफाश किया?

राजनीतिक फायदे के लिए किया ऑपरेशन- बीजेपी

बीजेपी नेता आरपी सिंह कहते हैं, “ये विवादास्पद नहीं, सच है। ऑपरेशन टाला जा सकता था। गुरुद्वारे की बिजली-पानी काटकर या दूसरे रास्तों से आतंकियों को निकाला जा सकता था। लेकिन इंदिरा गाँधी सिर्फ चुनाव की चिंता में थीं। कांग्रेस को माफी माँगनी चाहिए। इससे बड़ा अपराध नहीं हो सकता। देश ऐसे अपराध को माफ नहीं करेगा। कांग्रेस के सारे फैसले पॉलिटिकल हैं।”

इंदिरा गाँधी की हत्या और सिखों का नरसंहार

3 से 6 जून 1984 तक भारतीय सेना द्वारा चलाए गए सैन्य कार्रवाई को ऑपरेशन ब्लू स्टार कहा जाता है। इसका मकसद अमृतसर (पंजाब) में हरिमंदिर साहिब परिसर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराना था।

ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला 31 अक्टूबर 1984 को लिया गया। इंदिरा गाँधी के दो सिख बॉडीगार्ड्स, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन्हें गोली मार दी। हत्या के तुरंत बाद देश भर में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे। दिल्ली समेत 40 से ज्यादा शहरों में ये हुआ। दिल्ली में सबसे खराब हालत थी, जहाँ 3,000 से ज्यादा सिख मारे गए। कुल मिलाकर करीब 15,000 लोग मारे गए, और कम से कम 50,000 सिखों को घर छोड़कर भागना पड़ा।

आरोप कांग्रेस नेताओं पर लगा कि उन्होंने ये दंगे भड़काए। फरवरी 2025 में दिल्ली की एक कोर्ट ने पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को 1984 दंगों में सरस्वती विहार में दो सिखों की हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा दी। कांग्रेस ने इन दंगों के लिए कभी माफी नहीं माँगी।

कांग्रेस का पुराना चरित्र और चिदंबरम की चुप्पी का टूटना

कांग्रेस हमेशा पॉलिटिकल फायदे के लिए फैसले लेती रही। मनमोहन सिंह सरकार में 26/11 मुंबई अटैक हुआ, तो पाकिस्तान पर सबूतों के बावजूद अटैक नहीं किया, क्योंकि डर था कि बीजेपी को फायदा हो जाएगा। ये खुलासा पूर्व अमेरिकी प्रेसिडेंट ओबामा ने अपनी किताब में किया। कांग्रेस के इसी चरित्र को जानते हुए चिदंबरम ने अब चुप्पी तोड़ी।

कांग्रेस की इन गलतियों का खामियाजा देश और जनता को भुगतना पड़ा। भिंडरावाले को बढ़ावा दिया, फिर हिंसा रोकने के नाम पर ऑपरेशन किया, हत्या हुई तो सिखों का कत्लेआम करवाया। चिदंबरम का बयान पुराने जख्म ताजा कर गया और साफ है कि कांग्रेस को इन सबके लिए माफी माँगनी चाहिए।

आजाद भारत में पैदा होने वाले पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जवाहरलाल नेहरू के बाद दूसरे स्थान पर, इंदिरा गाँधी को भी पीछे छोड़ा

इंदिरा गाँधी से आगे निकले नरेन्द्र मोदी

इंदिरा गाँधी 24 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1977 तक लगातार 4077 दिनों तक प्रधानमंत्री रहीं। इस दौरान 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच 21 महीने का आपातकाल का दौर भी आया। 16 मार्च 1977 को लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस की करारी हार के बाद उन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा।

लगातार 6 बार नरेन्द्र मोदी को मिला जनता का आशीर्वाद

प्रधानमंत्री मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। वह अभी भी प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने लगातार तीन लोकसभा चुनावों में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए गठबंधन को जीत दिलाई। इस मामले में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू की बराबरी की है, जिनके नेतृत्व में कॉन्ग्रेस लगातार सत्तासीन रही।

राज्य और केंद्र मिलाकर बात करें तो नरेन्द्र मोदी के समान कोई दूसरा नेता भारत के इतिहास में नहीं है, जो 6 बार लगातार मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बने। एक निर्वाचित सरकार के मुखिया के तौर पर पीएम मोदी का कार्यकाल सबसे लंबे कार्यकालों में एक है।

गुजरात में 7 अक्टूबर 2001 से मुख्यमंत्री पद पर विराजमान नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2002, 2007 और 2012 का विधानसभा चुनाव बीजेपी ने लड़ा और जीत हासिल की।

मुख्यमंत्री रहते हुए उनके नेतृत्व में बीजेपी ने 2014 का चुनाव लड़ा और जबरदस्त जीत हासिल की। इसके बाद 2019 और 2024 का लोकसभा चुनाव भी एनडीए ने उनके नेतृत्व में लड़ा और सत्ता पर काबिज हुई।

आजाद भारत में पैदा होने वाले पहले पीएम

देश की आजादी के बाद पैदा होने वाले नरेन्द्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री होने के साथ साथ सबसे लंबे समय तक पीएम पद पर रहने वाले गैर कॉन्ग्रेसी नेता भी हैं, जो लगातार तीसरी बार लोकसभा चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बने हैं।

उन्होंने दो लगातार बार 5 साल का कार्यकाल भी पूरा किया और तीसरा कार्यकाल चल रहा है।

रूस से पैसा लेते थे 150+ कांग्रेस सांसद, पत्रकारों ने दलाली में लिखे 16000 आर्टिकल- निशिकांत दुबे ने ‘कठपुतली गैंग’ की खोली पोल: इंदिरा हो या राजीव, DNA में ‘सूटकेस कल्चर’


पूर्व PM इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की Grok AI जनरेटेड तस्वीर, भाजपा MP निशिकांत दुबे (बाएँ)
भारत में बिकाऊ लोगों की कमताई नहीं। कदम-कदम पर बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र की औलादें मिल जाएँगी। देशहित में वर्तमान मोदी सरकार को इसकी जाँच कर सच्चाई को सामने लानी चाहिए। इन मुद्दों पर दर्ज होने मुकदमों की सुनवाई करने वाली निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट और इनकी पैरवी करने वकीलों पर गिद्ध की निगाह रख सबके खातों की जाँच करवानी चाहिए। अगर किसी भी रूप में इनके बचाव में निर्णय दिया जाता है। इन मुद्दों पर ऐसे ही सख्ती से पेश आना जैसाकि पाकिस्तान के साथ। 
आज विपक्ष खासतौर से कांग्रेस देश में लोकतंत्र और संविधान खतरे पर चीखाचिल्ली कर देश को गुमराह कर चोर मचाए शोर वाली हालत किये हुए है। ऐसा इसलिए कि जनता ही इतनी भुलक्कड़ है जो इनके कुकर्मों को भूल इनके पाखंड के चक्रव्यू में फंसते रहे हैं। EVM को लागू करने वाले ही इसको हटा बैलेट पेपर लाने का शोर मचा रहे हैं ताकि इनके गुंडे बैलेट बॉक्स लूटने और बैलेट पेपर फाड़ने के काम लग जाए। 
दूसरे, भारत में CAA विरोध में बने शाहीन बागों से लेकर हुए प्रदर्शन, धरने और उपद्रव आदि कोई जनता के हित में नहीं किए गए थे बल्कि जॉर्ज सोरोस और अन्य भारत विरोधियों की दी भीख के धन से कर दुनिया में भारत को बदनाम करने का दुस्साहस किया जा रहा है। अक्ल से पैदल जनता समझती है कि मोदी सरकार जनता के साथ बहुत अन्याय कर रही है। जो विरोधी भारत विरोधियों की हाथ कठपुतली बन देश में उपद्रव कर जनता को गुमराह करने वाले क्या देशहित में काम कर सकते हैं। 
 
 
दूसरे, LoP राहुल गाँधी की कार्यशैली क्या पद के अनुरूप है? स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगने वाला बताए क्या साबित करना चाहता है? साबित करता है कि इस आदमी को भारतीय इतिहास का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं।   
संविधान के मूल स्वरुप को बिगाड़ने वाले द्वारा जब संविधान की रक्षा का शोर मचाने वालों के कुकर्म को चोर मचाये शोर नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा? 
सोनिया गाँधी जिसे परिवार 'राजमाता' कहते है वही सोनिया उस FDL-AP की co-president जो कश्मीर विरोधी संगठन है। इतना ही नहीं कई पत्रकार भी शामिल हैं। यही वजह है कि कांग्रेस कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देती रही। अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करती है। INDI गठबंधन को समर्थन देने वाली जनता को इन पार्टियों से जवाब मांगना चाहिए।    
झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया है कि कभी कांग्रेस के 150 से अधिक सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे। उनका कहना है कि पत्रकारों के एक समूह भी रूस का दलाल था।

ट्विटर/एक्स पर निशिकांत दुबे ने ‘कांग्रेस, करप्शन और गुलामी’ शीर्षक के साथ किए पोस्ट में ये दावा किया है। उन्होंने कहा है;

  1. ये अवर्गीकृत गुप्त दस्तावेज सीआईए का 2011 में जारी हुआ।
  2. कांग्रेस के बड़े नेता एचकेएल भगत की अगुवाई में 150 से ज्यादा कांग्रेस के सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे, रूस के लिए दलाली करते थे?
  3. पत्रकारों का एक समूह दलाल था, कुल 16000 न्यूज आर्टिकल रूस ने छपवाए?
  4. उस जमाने में रूस के जासूसी संस्थानों के 1100 लोग हिन्दुस्तान में थे जो नौकरशाही, व्यापारी संगठनों, कम्युनिस्ट पार्टियों, ओपिनियन मेकर को अपने पॉकेट में रखते थे और सूचना के आधार पर भारत की नीति बनाते थे?
  5. कांग्रेस की उम्मीदवार सुभद्रा जोशी ने लोकसभा चुनाव में उस वक्त 5 लाख रुपए लिए जर्मन सरकार से चुनाव के नाम पर, हारने के बाद इंडो जर्मन फोरम की अध्यक्ष बनीं।
उन्होंने लिखा है, “यह देश था या ग़ुलामों, दलालों या बिचौलियों की कठपुतली। कांग्रेस इसका जवाब दे, आज इस पर जाँच हो या नहीं?”
यह पहला मौका नहीं है जब रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी से पैसे लेने और उनके इशारे पर काम करने का आरोप कांग्रेस पर लगा है। इससे पहले भी इंदिरा गाँधी और उनके बेटे राजीव के जमाने में कॉन्ग्रेस के ‘ब्रीफकेस कल्चर’ को लेकर को लेकर तथ्य सामने आ चुके हैं।
2017 की शुरुआत में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कुछ पुराने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए गए थे। इससे पता चलता है कि इंदिरा गाँधी के जमाने में कांग्रेस के 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिला था। 2005 में केजीबी के ही एक पूर्व जासूस वासिली मित्रोकिन की किताब आई थी। इसमें तो बकायदा बताया गया है कि खुद इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर पैसे भेजे गए थे।
                                                                                                                                                                                           साभार: indiafacts.org
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया को बताया था कि जो तथ्य सार्वजनिक हुए, उससे जाहिर होता है कि 1967 के आम चुनाव के वक्त कांग्रेस सहित देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों को विदेश से पैसा मिला था। उन्होंने बताया था कि शीत युद्ध के जमाने में कम्युनिस्ट देश जहाँ भारत में साम्यवाद के फैलाव के लिए पैसे खर्च कर रहे थे, तो पूँजीवादी देश साम्यवाद को रोकने के लिए। ऐसे में जब सत्ताधारी दल का नेता ही बिकने को तैयार हो तो विदेशी ताकतों के लिए चीजें आसान हो जाती है।
किशोर ने ऐसी कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए एक फेसबुक पोस्ट भी लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि विदेश से पैसा लेने के मामले की जाँच भी कराई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट दबा दी गई। जब कुछ विपक्षी सांसदों ने इसे सार्वजनिक करने की माँग की तो तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने संसद में कहा कि जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं, उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते, क्योंकि इससे उनके हितों को नुकसान पहुँचेगा।

लेकिन, सालों तक जिन तथ्यों को कांग्रेस छिपाती रही उसे मित्रोकिन ने 2005 में दुनिया के सामने ला दिया। वे सोवियत संघ के जमाने के हजारों गोपनीय दस्तावेज चुराकर देश से बाहर ले गए थे। बाद में इसके आधार पर क्रिस्टोफर एंड्रयू (Christopher Andrew) के साथ मिलकर किताबें लिखी। द वर्ल्ड वॉज गोइंग आवर वे (The World Was Going Our Way) नामक किताब में कहा गया है कि केजीबी ने 1970 के दशक में पूर्व रक्षा मंत्री वीके मेनन के अलावा चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार के लिए फंड दिया था।
2017 में सामने आई दिसंबर 1985 की सीआईए की रिपोर्ट में बताया गया है कि सोवियत संघ ने भारतीय कारोबारियों के साथ समझौतों के जरिए कांग्रेस पार्टी को रिश्वत दी थी। सोवियत संघ का दूतावास कांग्रेस नेताओं को छिपकर रकम देने सहित कई खर्चों के लिए बड़ा रिजर्व रखता था। इसके मुताबिक कांग्रेस के अलावा सीपीआई और सीपीएम को भी सोवियत संघ से काफी पैसा मिलता था। ऐसा नहीं है कि सभी को पैसे ही दिए गए थे। कुछ के साथ तो सोवियत संघ ने बकायदा समझौता भी किया था।

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि केजीबी के पैसे की वजह से भारत के ढेरो नेता सोवियत संघ की मुट्ठी में थे और वे भारतीय राजनीति को अपने हितों के हिसाब से प्रभावित करते थे। मित्रोकिन की किताब में भी यह बात कही गई है। केजीबी के लीक दस्तावेजों में भारत को तीसरी दुनिया की सरकारों में केजीबी के घुसपैठ का एक मॉडल बताया गया था। इन दस्तावेजों में साफ तौर पर भारत सरकार में केजीबी के बहुत से सूत्र होने की बात कही गई थी।

                                                                                                                                                                                               साभार: indiafacts.org

ऐसा भी नहीं है कि इंदिरा के बाद विदेश से पैसा लेने की कांग्रेस की आदत छूट गई। दस्तावेज बताते हैं कि सोवियत संघ से पैसा लेने का जो सिलसिला इंदिरा गाँधी के जमाने में शुरू हुआ था वह राजीव गाँधी के जमाने में भी जारी रहा है। हालॉंकि इस दौर में सोवियत संघ का प्रभाव कुछ सीमित करने की कोशिश भी हुई थी।

                                                                                                                                                                                                 साभार: indiafacts.org

ये दस्तावेज मीडिया में भी केजीबी की घुसपैठ के बारे में बताते हैं। इसके अनुसार सोवियत संघ ने अपने प्रोपेगेंडा के प्रचार के लिए भारत के बड़े मीडिया संस्थानों के साथ व्यापक पैमाने पर साँठगाँठ कर रखी थी। वे उसकी जरूरत के हिसाब से लेख लिखते थे। यहाँ तक की संपादकीय में भी सोवियत संघ की धुन बजाते थे। जिन संस्थानों का जिक्र है उनमें टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, द हिंदू शामिल है।

मित्रोकिन ने अपनी किताब में बताया है कि सोवियत संघ ने इस काम के लिए भारत में 40-50 पत्रकार रखे थे। बाद के सालों में इनकी संख्या बढ़कर 200 से 300 हो गई थी।

राजीव गाँधी ने भारत-पाकिस्तान में सुलह के लिए अमेरिका से माँगी थी मदद, राष्ट्रपति रीगन को लिखा था पत्र: भाजपा MP निशिकांत दुबे ने 1987 का पत्र दिखा पूछे सवाल

    राजीव गांधी-रोनाल्ड रीगन, तस्वीरें इंस्टाग्राम पर Rememberingrajiv और यूट्यूब पर रीगन लाइब्रेरी से ली गई हैं
2014 में मोदी सरकार बनने से पहले कांग्रेस पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा हमला करने पर डोसियर-डोसियर खेलती थी। अमेरिका के आगे रोती थी की पाकिस्तान ने हमें मारा लेकिन मोदी सरकार सीधे पाकिस्तान की छाती पर बैठ मारती है। और आज वही पाकिस्तान अमेरिका के आगे रो रहा है "बचा लो मोदी से।" मोदी सरकार से पहले तक जो पब्लिक पाकिस्तान से डरी-डरी रहती थी लेकिन आज वही पाकिस्तान उसकी भाषा में जवाब मिलने पर डरा हुआ है।      

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने बुधवार (28 मई 2025) को कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि 1987 में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति समझौता करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अमेरिका से मदद माँगी थी। निशिकांत दुबे ने यह दावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा राजीव गांधी को लिखे एक पुराने पत्र के आधार पर किया है, जिसे अब सार्वजनिक कर दिया गया है।

निशिकांत दुबे ने दिखाया 1987 पत्र

निशिकांत दुबे का कहना है कि 1972 के शिमला समझौते के तहत यह तय हुआ था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी विवाद सिर्फ दोनों देशों के बीच बातचीत से सुलझाया जाएगा, इसमें कोई तीसरा देश शामिल नहीं होगा। ऐसे में राजीव गाँधी का अमेरिकी मदद माँगना इस समझौते का उल्लँघन है।
दुबे ने 25 मार्च, 1987 को अमेरिकी राजदूत द्वारा राजीव गाँधी को भेजे गए एक कथित पत्र का हवाला दिया है। निशिकांत दुबे ने बताया कि इस पत्र में गाँधी ने सीमा पार से होने वाली नशीले पदार्थों की तस्करी पर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिकी विशेषज्ञों की मदद माँगी थी ऐसा लिखा है। रीगन ने कहा था कि अगर भारत और पाकिस्तान की सरकारें मदद माँगती हैं तो उन्हें खुशी होगी।
हालाँकि, रीगन के इस पत्र में सीधे तौर पर 1987 के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में अमेरिका की दखलअंदाजी का कोई संकेत नहीं मिलता है। पत्र में सिर्फ भविष्य के तनाव को कम करने के लिए पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के बीच प्रभावी तरीकों के बारे में कुछ जानकारी देने की बात कही गई है।
यह नया दावा ऐसे समय में आया है जब हाल ही में पहलगाम आतंकवादी हमले और भारत के जवाबी ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ा हुआ है, और तीसरे पक्ष की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।

इंदिरा गाँधी पर सवाल

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने मंगलवार (27 मई 2025) को एक अमेरिकी खुफिया दस्तावेज़ शेयर किया। निशिकांत दुबे ने बताया कि यह दस्तावेज़ 1971 के बांग्लादेश युद्ध से जुड़ा है, जिसमें इंदिरा गाँधी ने संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम के प्रस्ताव को मान लिया था।
दुबे ने पूछा कि क्या भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) को वापस लेने और करतारपुर गुरुद्वारा जैसी जगहों को सुरक्षित करने के बजाय बांग्लादेश बनाने को ज़्यादा अहमियत दी। निशिकांत दुबे ने ‘X’ (पहले ट्विटर) पर लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अमेरिकी दबाव में आकर 1971 का युद्ध रोक दिया था, जबकि उस समय के रक्षा मंत्री जगजीवन राम और सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ इसके खिलाफ थे।

कॉन्ग्रेस का पलटवार

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर निशाना साधा है। जयराम रमेश ने कहा कि जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिका की मदद और किसी ‘तटस्थ जगह’ पर बात करने की बात कही, तो जयशंकर चुप क्यों रहे।

हालाँकि, भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति के उन दावों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने में मदद की। भारत ने अपनी पुरानी नीति को दोहराते हुए साफ किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़ा कोई भी मुद्दा भारत और पाकिस्तान मिलकर ही सुलझाएँगे, इसमें किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी नहीं होगी।
निशिकांत दुबे के इस दावे के बाद भारत द्वारा पूर्व में लिए गए इस फैसलों पर राजनीतिक बहस और तेज़ हो गई है।

इंदिरा गाँधी की 100% प्रॉपर्टी अपने बच्चों को दिलवाने के लिए राजीव गाँधी सरकार ने खत्म करवाया था ‘विरासत कर’… वरना सरकारी खजाने में चला जाता पैसा

आखिर क्या कारण है कि राजीव गाँधी द्वारा ख़त्म किए ‘विरासत कर (Inheritance Tax)’ को कांग्रेस अपने मैनिफेस्टो में ‘विरासत कर (Inheritance Tax)’ क्यों लेकर आयी? इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले कांग्रेस को ही विरोध करना था। लेकिन दिक्कत यह है कि मोदी द्वारा मुद्दा उठाने पर मैनिफेस्टो पढ़े बिना चुनाव आयोग पहुँच गए। 'विरासत टैक्स' लाकर गाँधी परिवार को नुकसान नहीं होने वाला, क्योकि परिवार को मालूम है कि 2024 चुनाव के बाद उनकी संपत्ति कब ED, CBI द्वारा जब्त कर ली जाए। उनके पास बचेगा विदेश में जमा, जिस तक सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। अगर टैक्स को लाना था अपने कार्यकाल में लेकर क्यों नहीं आए? नहीं मालूम था कि कांग्रेस सत्ता से दूर होती जाएगी और परिवार की संपत्ति पर सरकार का कब्ज़ा भी हो सकता है। कालचक्र ऐसा घूमा जिस टैक्स को राजीव ख़त्म करते हैं, परिवार उसे ही वापस लाएगा। 

इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष और राहुल गाँधी के सलाहकार सैम पित्रोदा ने ‘विरासत कर (Inheritance Tax)’ का मुद्दा छेड़कर कांग्रेस की ही परेशानी बढ़ा दी है। अब लोकसभा चुनाव से पहले वो पुराने पन्ने भी खुल रहे हैं जिन पर इतने समय से चुप्पी थी। हर कोई कांग्रेस की मंशा पर सवाल खड़ा कर रहा है कि उनका मकसद देश के लोगों से उनकी कमाई संपत्ति छीनना है… लेकिन मालूम हो कि ‘विरासत कर’ देश के लिए नया टैक्स नहीं है। 40 साल पहले तक ये भारत में लागू था, जिसे 1985 में राजीव गाँधी सरकार ने ठीक उस समय खत्म किया जब इंदिरा गाँधी के संपत्ति के बँटवारे की बात आई।

मौजूदा जानकारी के अनुसार, यह ‘विरासत कर’ का कॉन्सेप्ट देश में तीन दशकों तक अस्तित्व में था। एस्टेट ड्यूटी एक्ट 1953 के तहत, व्यक्ति के मृत्यु के बाद उसकी विरासत का कर 85% तक जा सकता था। इसमें भी दरें निर्धारित थीं। जो प्रॉपर्टी 20 लाख रुपए से ऊपर थी उसमें 85% टैक्स लगता था जिसका मतलब है कि व्यक्ति की मौत के बाद अधिकांश जमीन पर अधिकार सरकार का हो जाता था। हालाँकि, ये कानून उस तरह से काम नहीं किया, जिस प्रकार से सोचा गया था।

इसके तहत नागरिकों को दो बार संपत्ति से जुड़ा कर भरना पड़ता था एक तो जीवन रहते (जिसे 2016 में मोदी सरकार ने बंद करवा दिया) और फिर उनके निधन पर भी। इसके अलावा जिस प्रकार से कांग्रेस ने इस कर को लागू करके धन जुटाने की सोची थी वो भी लक्ष्य पूरा नहीं हुआ क्योंकि जब देश में ऐसा कर आ गया तो फिर लोग बेनामी प्रॉपर्टी के मामले और संपत्ति छिपाने के मामले ज्यादा बढ़ गए। अंत में ये एक्ट 1985 में जाकर खत्म कर दिया गया।

अब दिलचस्प बात ये है कि जिस समय पर ये कानून रद्द किया गया वो वही समय था जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की प्रॉपर्टी उनके पोते-पोतियों के नाम पर होनी थी। राजीव गाँधी सरकार ने इस काम से ठीक एक माह पहले एस्टेट ड्यूटी 1953 को खत्म किया, उस समय वीपी सिंह वित्त मंत्री हुआ करते थे। घोषणा हुई कि ये कानून 1 अप्रैल 1985 के बाद से लागू नहीं होगा। इसके बाद 2 मई 1985 को इंदिरा गाँधी की करीबन 21 लाख 50 हजार की संपत्ति उनके तीन पोते-पोतियों में हस्तांतरित हो गई। आज उस प्रॉपर्टी की कीमत करीब 4.2 करोड़ रुपए है।

यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल (यूपीआई) की 2 मई 1985 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1981 में हस्ताक्षरित वसीयत में इंदिरा गाँधी ने अपने बेटे राजीव गाँधी और उनकी पत्नी सोनिया गाँधी को वसीयत का निष्पादक (एग्जिक्यूटर) नियुक्त किया था, लेकिन बाद में उन्होंने उन्हें कुछ नहीं दिया। उन्होंने अपनी बहु मेनका गाँधी के लिए भी कुछ नहीं छोड़ा था। सारी संपत्ति तीनों पोते-पोतियों के नाम की गई थी।

राजीव गाँधी द्वारा ये वसीयत कोर्ट में दिखाए जाने के बाद इसे अखबार में भी पब्लिश किया गया था। इस विल के अनुसार इंदिरा गाँधी संपत्ति का बड़ा हिस्सा महरौली में निर्माणाधीन एक खेत और एक फार्महाउस था, जिसकी कीमत 98,000 डॉलर थी (आज के हिसाब से 81,72,171 रुपए)।

इसके अलावा तीनों बच्चों के नाम इंदिरा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित पुस्तकों के कॉपीराइट के साथ-साथ इकट्ठा हुए लगभग 75,000 डॉलर की नकदी, स्टॉक और बांड भी थे। वहीं इंदिरा गाँधी की प्राचीन वस्तुएँ और लगभग 2500 डॉलर की निजी आभूषण केवल प्रियंका गाँधी के लिए छोड़े गए थे। 1984 में तीनों वारिस नाबालिग थे इसलिए उस समय राजीव गाँधी और सोनिया गाँधी को उनके बड़े होने तक संपत्ति संभालने की जिम्मेदारी दी गई।

अवलोकन करें:-

हिन्दू विरोधी कांग्रेस manifesto : क्या कांग्रेस भारत में शरीयत लागु करने का जाल बिछा रही है? मुस्लिम

अब ये ध्यान देने वाली बात है कि जिस देश में 20 लाख से अधिक संपत्ति होने पर 85% प्रॉपर्टी सरकार को चली जाती थी, वो नियम राजीव गाँधी की सरकार में ठीक उस समय पलटा गया जब उनके बच्चों को उनकी दादी की विरासत मिलनी थी। यूपीआई की रिपोर्ट में भी कहा गया था, “1 अप्रैल से प्रभावी हुए एक वित्त विधेयक के तहत, भारत में सभी मृत्यु शुल्क समाप्त कर दिए गए हैं और गांधी संपत्ति पर कोई विरासत कर नहीं लगाया जाएगा।”

139 साल बूढ़ी कांग्रेस की दुर्दशा; नक्सलियों की जयकार करे, मुस्लिम लीग की गुलामी करती, भगवान राम कृष्ण से बैर करे, अल्लाह को क्या मुंह दिखाएगी? पहला यात्री विमान हाईजैक संजय गाँधी ने किया था

सुभाष चन्द्र

यह सत्य है कि 139 साल की बूढ़ी कांग्रेस की कब्र में दफ़न होने से पहले आज ऐसी दुर्दशा हो गई है कि हर राज्य में लोकसभा चुनाव के क्षेत्रीय दलों पर निर्भर हो गई सीटों के लिए यानी उन दलों से जो कुछ रुखा सूखा बचा खुचा मिलेगा, उससे काम चलाना पड़ रहा है। आतंक से प्यार का तो पुराना नाता है जिसे अब नक्सलियों की जयकार करके और उन्हें शहीद बता कर जताना पड़ रहा है

 
 20 दिसंबर 1978 को इंदिरा गांधी संजय गांधी ने खुद प्लेन को हाईजैक कराया था। भारत में विमान हाईजैक की यही पहली दुर्घटना थी। समय निकालकर जरूर वीडियो देखें और कांग्रेस की सच्चाई जाने, इसीलिए कहते हैं कांग्रेस आतंकवादियों के साथ है। रोज नए नए तथ्य और कथ्य आ रहे है। कांग्रेस द्वारा दिखाए रास्ते पर ही चल कर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में आतंकवादियों द्वारा यात्री विमान हाईजैक किया गया था। 
लेखक 
1990 ये कोई पुरानी बात नही है कांग्रेस की मानसिकता मुगलो वाली सोच थी उसे समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार थी। राम की भक्ति के  नाम लेने पर भगवा पहनने पर माथे पे तिलक  लगा लेने पर उसे व्यक्ति के खिलाफ चालान काटे जाते थे। ये दौर मुलायम खानदान और मुगलों के विचारों में कोई अंतर नहीं था। 
मुस्लिम लीग की ऐसी गुलामी करनी पड़ रही है कांग्रेस को कि वायनाड में राहुल गांधी के लिए चुनाव प्रचार में कांग्रेस का ध्वज इस्तेमाल न करने की मुस्लिम लीग की शर्त माननी पड़ी
 राहुल के नामांकन में पाकिस्तान जिंदाबाद और पाकिस्तान झंडे तो खूब चले लेकिन अब चुनाव प्रचार में कांग्रेस का झंडा नहीं चलेगा यह घोषणा केरल कांग्रेस अध्यक्ष MM Hasan ने खुद की यह वही मुस्लिम लीग है जिसे 1950 में नेहरू ने केरल की अपनी यात्रा के दौरान Dead Horse कहा था लेकिन कांग्रेस वर्षों से उसके साथ “गठबंधन” में है 

सुप्रिया श्रीनेत ने छत्तीसगढ़ में मारे गए 29 आतंकी नक्सलियों को शहीद बता कर भारतीय जवानों का घोर अपमान किया है

सुप्रिया का मतलब है नक्सली जैसे आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए “शहीद” हो गए और भारत उनके आज़ादी के आंदोलन को कुछ रहा है

आतंकवाद  और आतंकियों से कांग्रेस का रिश्ता कोई नई बात नहीं है कांग्रेस बिन लादेन को “ओसामा जी” कहती है और हाफिज सईद को “हाफिज साहब” कहती है। आतंकी पाकिस्तान से मदद मांगती है कांग्रेस मोदी को हटाने के लिए। इसका मुख्य कारण सोशल मीडिया पर संलग्न फोटो बहुत वायरल हो रही है कि कांग्रेस का इस्लाम से कितना गहरा सम्बन्ध है, लेकिन इस्लाम के ही मानने वाले कांग्रेस को नकार रहा है। जबकि राहुल गांधी RSS को  मिस्र के Islamic Brotherhood जैसे आतंकी संगठन जैसा बताता है जबकि उस संगठन को इस्लामिक देशों ने ही बैन किया हुआ है जिनमे शामिल है

Bahrain, Egypt, Russia, Syria, Saudi Arabia and the UAE - हमास के साथ खड़ी है कांग्रेस वर्षों से।यही वजह की कांग्रेस अपने कार्यकाल में जिस पाकिस्तान से भारतीयों को डराती रहती थी, 2014 के बाद वही पाकिस्तान आज भीगी बिल्ली बना हुआ है। इस्लामिक आतंकवादियों को संरक्षण देने अरबों वर्ष पुराने सनातन धर्म को 'हिन्दू आतंकवाद' और 'भगवा आतंकवाद' के नाम से कलंकित करती रही।  

RSS को किसी देश ने बैन नहीं किया, उसे केवल कांग्रेस सरकार ने 3 बार बैन किया लेकिन अदालत ने बैन को गैर कानूनी बता कर कांग्रेस के मुंह पर थप्पड़ मारा हर बार

याद कीजिए कश्मीर में आतंकियों को मरने पर 1 करोड़ मुआवजा देने की घोषणा भी कांग्रेस ने की थी पाकिस्तान के आतंक पर ढील देती रही कांग्रेस और देश भर भी पाकिस्तान खुनी खेल खेलता रहा मगर कांग्रेस ने हिन्दू आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ दी 

आज मिलिंद देवड़ा ने कहा है कि कांग्रेस काफी हद तक “वामपंथी” हो गई है

कांग्रेस में सबसे ज्यादा तो “अंग्रेजियत” घुसी हुई है विदेशी हुकूमत अंग्रेजों की अभी भी कांग्रेस पर राज कर रही है। अभी भी कांग्रेस अंग्रेज़ों की गुलाम है और देश को भी गुलाम बनाना चाहती है लेकिन अब कांग्रेस चाहती है चीन का भारत पर राज

कांग्रेस में केवल “वामपंथी” ही नहीं है, कांग्रेस में इस्लामिक genes हावी हैं इसके अलावा original mughals के भी अंश कूट कूट कर भरे हैं

इस्लाम और Mughals दोनों अलग अलग हैं मुग़ल वो हैं जो विदेश से आए हिन्दू महिलाओं के साथ जबरन औलादें पैदा की कांग्रेस और विपक्षी दलों में अनेक लोग उन्हीं के वंशज है और ये ही मुग़ल हैं। कांग्रेस जवाब दे कि गयासुद्दीन, मुग़ल समय में दिल्ली कोतवाल, और मोती लाल नेहरू परिवार से क्या सम्बन्ध है? क्या फिरोज जहांगीर खान राहुल और प्रियंका का दादा नहीं? जब फिरोज सोनिया गाँधी का ससुर और राहुल-प्रियंका का दादा है, फिर किस आधार पर हिन्दू हो गए? मैमुना बेगम(इंदिरा गाँधी का निकाहनामा में नाम) कब हिन्दू बन गयी?  

इसके अलावा कांग्रेस में सनातन और हिन्दू विरोध की कीड़े भरे पड़े हैं और हाथ मिलाया हुआ है अब DMK के साथ और बाकी इंडी ठगबंधन के दलों को भी इस घ्रणित सोच में मिला लिया है 

राहुल गांधी ने आज भगवान कृष्ण के अस्तित्व को भी नकार दिया और मोदी के समुद्र में द्वारका नगरी की पूजा करने को भी बेकार कह दिया तो दूसरी तरफ जयराम रमेश ने प्रतिज्ञा करी कि हम लोग कभी राम मंदिर नहीं जाएंगे यह बात तो घोषणा पत्र में की चाहिए थी मूर्खों

इतिहास के अज्ञानी राहुल गाँधी को नहीं मालूम कि नेहरू ने 16, इंदिरा ने 31, राजीव ने 11 बार बदला संविधान, लेकिन कह रहा है मोदी ने बदला तो आग लगा देंगे…

सोशल मीडिया पर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी का एक वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी कह रहे हैं कि अगर बीजेपी ने चुनाव जीतने के बाद संविधान को बदला तो इस पूरे देश में आग लगने जा रही है। राहुल से पूछों कि "क्या संविधान निर्माताओं ने संविधान में Secular शब्द डाला था? यदि नहीं, फिर किसने डाला और क्यों? क्यों मूल संविधान से छेड़छाड़ कर, जनता को पागल बनाया? क्या Secular का मतलब मुस्लिम तुष्टिकरण होता है?

शायद 90 के दशक में, NN Sippy की शशि कपूर और मुमताज़ अभिनीत चर्चित फिल्म 'चोर मचाये शोर' प्रदर्शित हुई थी। जो आज समस्त बीजेपी विरोधी विपक्ष पर सटीक बैठती है, विशेषकर राहुल गाँधी पर। दूसरे, नीचे एक वीडियो है, हालाँकि यह इस्लाम से सम्बंधित है। परन्तु इन विपक्षियों को बेनकाब करने के लिए बहुत जरुरी भी है। जिस तरह मौलाना अपना वर्जस्व बनाये रखने के लिए लिए मुसलमानों को डराते रहते हैं, लेकिन 72 हूरों पर प्रश्न करने पर कुछ का कुछ बोलने को मजबूर हो जाते हैं, ठीक उसी तरह संविधान को लेकर लोगों में डर बैठाने का दुस्साहस किया रहा है। 

राहुल को नहीं मालूम कि जवाहर लाल से लेकर राजीव तक 59 बार अपनी सहूलियत के मुताबिक संविधान को बदला जा चूका है। जिसे जनमानस समझने में पूर्णरूप से असफल रहा। इन बदलावों से मुस्लिम तुष्टिकरण कर हिन्दुओं की पीठ में छुरा घोंपा गया। इन सबको डर है अगर बीजेपी की 370 और एनडीए की 400 से पार सीटें आ गयीं, कांग्रेस, कम्युनिस्ट और इसके समर्थक पार्टियों की नींद, रोटी और पानी हराम हो जाएगा, क्योकि जनता के सामने वह असली संविधान आ जायेगा जो संविधान निर्माताओं ने जनहित में बनाया था, नाकि मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली पार्टियों के लिए।   

 

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी आजकल लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी हर रैली में यह कहते दिख रहे हैं कि एक तरफ कांग्रेस है, जो संविधान के लिए लड़ रही है तो वहीं दूसरी ओर भाजपा है, जो संविधान और लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है। कांग्रेस नेता राहुल हर जगह कह रहे है कि यह चुनाव विचारधारा का चुनाव है। एक तरफ आरएसएस और बीजेपी संविधान और लोकतांत्रिक को खत्म करने की कोशिश कर रही है, और दूसरी तरफ इंडी गठबंधन और कांग्रेस पार्टी संविधान और लोकतंत्र को बचाने की कोशिश कर रही है।

राहुल गांधी यह भी कह रहे हैं कि ये लड़ाई संविधान को बचाने की लड़ाई है। संविधान चला जाएगा। गरीबों के हक चले जाएंगे। आरक्षण चला जाएगा। और जो आपका धन है, गरीबों का धन है, किसानों का धन है, मजदूरों का धन है, वो पांच छह लोगों के हाथ में चला जाएगा।

वायनाड से सांसद राहुल गांधी की सुई संविधान पर अटक गई है और वे बार-बार कह रहे हैं कि अगर बीजेपी फिर से सत्ता में आ गई तो वो भारत का संविधान बदल देंगे।

बीजेपी ने चुनाव आयोग से राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत भी की है। बीजेपी ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी संविधान बदलने जैसा निराधार आरोप लगा रहे हैं। राहुल गांधी पर लगातार झूठ बोलने और आदतन अपराधी होने का आरोप लगाते हुए बीजेपी ने चुनाव आयोग से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए उनसे सख्ती से निपटने का आग्रह किया है। चुनाव आयोग को शिकायत के बाद भी राहुल गांधी के बार-बार संविधान को लेकर भाषण देने पर लोगों ने उनके पिता राजीव गांधी का वो बयान शेयर करना शुरू दिया है, जिसमें वो कह रहे हैं कि जरूरत पड़ी तो बार-बार संविधान बदलेंगे और हमारे पूर्वजों ने भी कई बार बदला है। यूजर्स कह रहे है कि संविधान बदलने पर आग लगा देने की धमकी देने वाले राहुल के परनाना जवाहर लाल नेहरू ने 16 बार, नानी इंदिरा गांधी ने 31 बार और पिता राजीव गांधी ने 11 बार संविधान बदले। ऐसे में लोग संविधान को लेकर दिए गए राजीव गांधी के बयान को सोशल मीडिया पर शेयर कर राहुल गांधी पर तंज कस रहे हैं। आप भी देखिए लोग लोग किस तरह से राहुल को ट्रोल कर रहे हैं।