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हार नंबर 96: बिहार चुनाव में भी मिली करारी हार, संविधान को झुनझुने की तरह हाथ में लेकर घूमने वाले राहुल गांधी के महागठबंधन को जिताने के दावे फुस्स


कांग्रेस के शहजादे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को एक और हार का सामना करना पड़ा है। दरअसल, कांग्रेस INDI गठबंधन के लिए एक पनौती बन चुकी है। 
INDI गठबंधन में शामिल पार्टियों को जितनी जल्दी हो कांग्रेस को गठबंधन से अलग करना होगा। यही समय की मांग भी है। ताजा उदाहरण बिहार का है। अगर RJD ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा होता चुनाव परिणाम कुछ और होते क्योकि वहां स्थानीय मुद्दे हावी थे। लेकिन भाई-बहन राहुल और प्रियंका की जोड़ी ने उन मुद्दों का दरकिनार कर दिया। पूर्वाचलों के पवित्र त्यौहार छठ को ड्रामा बोलकर दूध में नीबू की बून्द का काम कर चुनाव को एकतरफा कर दिया। फिर भी कुछ बेशर्मों ने गठबंधन को इतनी वोटें दे दी। हकीकत में जो पार्टी विदेशी सहायता और चंदे पर चल रही हो उसे अपने त्यौहार की बेइज्जती भी दिखाई नहीं पड़ती। दूसरे, कांग्रेस द्वारा अपने उन नेताओं को प्रचार में बुलाना जिन्होंने बिहारियों के लिए आपत्तिजनक बयानबाज़ी की उसने कंगाली में आटा गीला करने का काम कर दिया। संविधान को झुनझुने की तरह हाथ में लेकर घूमने का नाटक करने वालों की पार्टी जब दूसरे राज्य के अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हों, देश को एकजुट तो क्या संविधान की भी रक्षा करने में नकारा होते हैं।    

देश की राजनीति में कांग्रेस पार्टी के लिए चुनावी हार अब शायद एक सुखद ‘पैटर्न’ बन चुकी है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के निराशाजनक नतीजों ने एक बार फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर कांग्रेस कब तक गाँधी परिवार को ठोती रहेगी? क्या कांग्रेस में किसी भी धुरंधर नेता में इस परिवार की सलाह के बिना काम करने की क़ाबलियत नहीं? क्या सारे कागजी शेर हैं या फिर गुलाम? पार्टी 10 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए संघर्ष करती रही। जब से राहुल गांधी ने सक्रिय रूप से पार्टी की कमान संभाली है, तब से कांग्रेस लगातार एक के बाद एक राज्यों में अपनी जमीन खोती जा रही है। वैसे तो कांग्रेस सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के बाद से बराबर निचले स्तर पर जानी शुरू हो गयी थी, और सोनिया के अधूरे काम को पूरा करने भाई-बहन की जोड़ी राहुल-प्रियंका मैदान में कूद पड़ी है। देखना है कि कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा भाई या बहन? 

हर चुनाव में नई रणनीति, नए गठबंधन और नए वादों के बावजूद, पार्टी की ‘हार की राह’ खत्म होती नहीं दिख रही है। बिहार में महागठबंधन की हार ने यह स्थापित कर दिया है कि राहुल गांधी का नेतृत्व न तो मतदाताओं को आकर्षित कर पा रहा है और न ही पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं को एकजुट रख पा रहा है। चुनावों के आंकड़े गवाह हैं कि राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी में जैसे-जैसे जिम्मेदारी ज्यादा हुई। वैसे-वैसे कांग्रेस की दुर्दशा बद से बदतर होती गई। राहुल गांधी ने 2004 में लोकसभा का पहला चुनाव लड़ा था। वे सांसद से लेकर पार्टी महासचिव और अखिल भारतीय कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी रहे। लेकिन हालात ये हैं कि पिछले दो दशक के उनके राजनीतिक जीवन के दौरान कांग्रेस हार की सैंचुरी लगाने के करीब पहुंच चुकी है। कांग्रेस पिछले 21 साल की अवधि में लोकसभा और विधानसभाओं के 96 चुनाव हार चुकी है।

हार नंबर 96.
14.11.25
बिहार चुनाव में मिली करारी हार

बिहार विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। राहुल गांधी के नेतृत्व वाले महागठबंधन को लोगों ने एक बार फिर नकार दिया है। राहुल गांधी की कांग्रेस का तो सबसे खराब प्रदर्शन रहा। पार्टी दहाई अंक तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही है। पार्टी को सिर्फ 6 सीटों पर संतोष करना पड़ा है।

हार नंबर 95.
09.09.25
उपराष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को मिली हार

उपराष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी जिस इंडी गठबंधन की जीत के बढ़-चढ़कर दावे कर रहे थे, उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने कांग्रेस और इंडी गठबंधन के उम्मीदवार जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी को 152 वोटों के भारी अंतर से हराया। उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए हुए मतदान में कुल 788 में से 767 सांसदों ने वोट डाला। एनडीए के उम्मीदवार राधाकृष्णन को उम्मीद से कहीं ज्यादा 452 वोट मिले, जबकि रेड्डी को मात्र 300 वोट ही मिले।

 हार नंबर 94.

08.02.25
दिल्ली में बीजेपी को प्रचंड बहुमत, आप सत्ता से बाहर

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला है। पिछले तीन बार से दिल्ली में चुनाव जीत रही आम आदमी पार्टी की झूठ की राजनीति पर इस बार जनता-जनार्दन ने करारा तमाचा जड़ा है। यहां तक कि पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल और पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया चुनाव हार गए हैं। इस चुनाव में सबसे तगड़ा झटका राहुल गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस को लगा है। कांग्रेस 70 में से एक भी सीट नहीं जीत सकी है, जबकि भाजपा को 48 सीट के साथ प्रचंड जीत मिली। दिल्ली की दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर तो कांग्रेस जमानत तक नहीं बचा सकी है। राहुल गांधी के नेतृत्व में दिल्ली में कांग्रेस का यह सबसे शर्मनाक प्रदर्शन है।
हार नंबर 93.
23.11.24
महाराष्ट्र में भाजपा की सुनामी, कांग्रेस की स्थिति सबसे दयनीय 
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा और महायुति की सुनामी चली। 288 सीट के सदन में अकेली बीजेपी ने सर्वाधिक 132 सीट जीतीं। उसकी सहयोगी शिवसेना शिंदे को 57 और एनसीपी अजित को 41 सीट मिलीं। कांग्रेस की स्थिति तो शिवसेना उद्धव (20) से भी दयनीय हो गई और वह सिर्फ 16 सीटों पर जीत पाई। 
हार नंबर 92.
08.10.24
हरियाणा में भाजपा की जीत की हैट्रिक, कांग्रेस की 37 सीट पर जमानत जब्त
हरियाणा में भाजपा ने लगातार तीसरी बार प्रचंड जीत हासिल की। 90 सीटों के सदन में भाजपा ने 48 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस ना सिर्फ 37 सीटों पर सिमटी, बल्कि अन्य 37 सीटों पर उसके प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई।
हार नंबर 91.
05.06.24
लोकसभा में एनडीए गठबंधन की जीत की हैट्रिक, कांग्रेस फिर परास्त
लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन ने जीत की हैट्रिक लगाई। साठ साल के बाद ऐसा मौका आया, जबकि दो टर्म को पूरा करने के बाद लगातार तीसरी बार नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। भाजपा 240 सीटें जीतकर लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी। यूपीए गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस नर्वस नाइंटीज का शिकार हुई और उसे 99 सीटें मिलीं।
हार नंबर 90.
05.06.24
आंध्रप्रदेश में एनडीए की प्रचंड जीत, टीडीपी बनी हीरो और कांग्रेस जीरो
आंध्र प्रदेश में भाजपा, तेलुगू देशम पार्टी और जनसेना के गठबंधन को विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिली। टीडीपी ने 135, जनसेना ने 21 और बीजेपी ने 8 सीटें जीती। सत्तारूढ़ दल वाईएसआर कांग्रेस पार्टी 11 सीट मिली हैं, वहीं कांग्रेस एक भी सीट जीतने में नाकाम रही।
हार नंबर 89.
02.06.24
अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सुनामी, कांग्रेस को निर्दलीयों से कम सीट
अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 46 पर जीत दर्ज की। कांग्रेस को निर्दलीयों से भी कम सीटें मिलीं। चुनाव में तीन निर्दलीय जीते, लेकिन कांग्रेस बमुश्किल एक ही सीट जीत पाई। इसके अलावा नेशनल पीपुल्स पार्टी 5, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी 3, पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल 2 सीट जीती।
हार नंबर 88.
05.06.24
ओडिशा में खिला कमल, भाजपा सत्ता में, कांग्रेस की हार
ओडिशा विधानसभा की 147 सीटों में से भाजपा ने 78 सीटें हासिल कर स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया। कांग्रेस सिर्फ 14 सीटों पर जीत हासिल कर पाई। वहीं, भाजपा ने लोकसभा की 21 में से 20 सीटें भी जीत लीं। मात्र एक सीट कांग्रेस के खाते में गई।
हार नंबर 87.
02.06.24
सिक्किम में कांग्रेस को नोटा से भी कम वोट मिले
सिक्किम की 32 विधानसभा सीटों में से 31 पर सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा ने एकतरफा जीत दर्ज की है। सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने एकमात्र श्यारी विधानसभा सीट जीती। एसकेएम को 58.38 और एसडीएफ को 27.37 प्रतिशत वोट मिले। चुनाव की दिलचस्प बात यह रही कि कांग्रेस को नोटा से भी कम 0.32 प्रतिशत मत मिले। नोटा को 0.99 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 5.18 प्रतिशत वोट मिले।
हार नंबर 86.
02.03.23
त्रिपुरा में लगातार दूसरी बार भाजपा सरकार, कांग्रेस बुरी तरह परास्त
त्रिपुरा विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दूसरी बार बहुमत हासिल किया। भाजपा ने 60 में से 32 सीटों पर जीत दर्ज की। राज्य में 14 सीटें लेकर दूसरे नंबर पर लेफ्ट और कांग्रेस का गठबंधन रहा। लेकिन इसमें कांग्रेस के हिस्से में केवल 3 सीटें आईं। टिपरा मोथा पार्टी ने 11 सीटों पर जीत हासिल की।
02.03.23
नगालैंड में एनडीपीपी-बीजेपी गठबंधन की वापसी, कांग्रेस जीरो
नगालैंड में सत्तारूढ़ एनडीपीपी-बीजेपी गठबंधन को फिर बहुमत मिला। एनडीपीपी को 25 सीटों पर और बीजेपी को 12 सीटों पर जीत मिली। एनसीपी 7 सीट और एनपीपी 5 सीट पर विजयी रही। यहां तक कि एनपीएफ ने 2 सीट, चिराग पासवान की एलजेपी (राम विलास) ने 2 सीट, रिपब्लिकन पार्टी ने 2 सीट, नीतीश कुमार की जेडीयू को एक सीट पर जीत का परचम फहराया, लेकिन कांग्रेस को यहां पर कोई सीट नहीं मिली।
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बिहार में INDI गठबंधन की शर्मनाक हार के लिए कांग्रेस जिम्मेदार; बीजेपी के स्टार प्रचारक राहुल गाँ
हार नंबर 84.
02.03.23
मेघालय में एनपीपी-बीजेपी गठबंधन की सरकार बनी, कांग्रेस हारी
मेघालय में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। यहां एनपीपी ने 60 में से 26 सीटें जीती और सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। एनपीपी ने मेघालय डेमोक्रेटिक अलायंस-2.0 बनाया, जिसमें भाजपा, यूडीपी और पीडीएफ सहगोयी बनीं। कांग्रेस को चुनाव में केवल 5 सीटें हासिल हुईं।

बिहार चुनाव : मैथिली ठाकुर, पवन सिंह, रितेश पांडेय, खेसारी लाल यादव… सब बनेंगे ‘माननीय’ तो क्या कार्यकर्ता गन्ना चूसेंगे?


पवन सिंह, रितेश पांडे, अक्षरा सिंह, मैथिली ठाकुर, खेसारी लाल यादव, छैला बिहारी, भरत शर्मा व्यास, रचना झा…ऐसा लगता है कि बिहार के इस विधानसभा चुनाव में बिहार से जुड़े सभी कलाकारों में खुद को माननीय बनाने की होड़ लगी हुई है। इसे लेकर जनता के बीच भी भारी विरोध देखा जा रहा है।

खासकर जब से मैथिली ठाकुर ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। 25 साल की लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने खुद बेनीपट्टी से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। बिहार बीजेपी के बड़े नेताओं से उनकी मुलाकात, पार्टी में शामिल होने की संभावनाओं ने चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है।

विरोध करने वालों का पहला और सबसे बड़ा तर्क यह है कि मैथिली ठाकुर अब बिहार की जमीन से कट चुकी हैं। उनका परिवार लंबे समय से दिल्ली में रहता है, वहीं से उन्होंने अपनी शिक्षा और करियर दोनों बनाए हैं। उनका मधुबनी या दरभंगा से सीधा जुड़ाव अब सिर्फ सरकारी या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रह गया है।

कई लोगों का तर्क है कि लोकप्रियता को संस्कृति के लिए योगदान से ऊपर नहीं रखा जा सकता है। उनकी पहचान मैथिली गायिका के रूप में जरूर है, पर उन्होंने स्थानीय स्तर पर कलाकारों के लिए कोई संस्थागत काम नहीं किया है। लोगों का कहना है कि अगर अगर बात मैथिली संस्कृति को सम्मान देने की है, तो ऐसे कलाकारों को मौका देना चाहिए जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मैथिली के लिए समर्पित की है।

मैथिली क्षेत्र में ऐसे कई कलाकार हैं जिन्होंने अपना जीवन मैथिली संस्कृति को बचाने में लगा दिया। पूनम मिश्रा, माधव राय, विजय विकास, रचना झा जैसे लोग गाँव-गाँव घूमकर कार्यक्रम करते हैं। इन कलाकारों की पहचान भले ही राष्ट्रीय स्तर पर न हो लेकिन वे आज भी अपने लोगों के बीच रहते हैं, उन्हीं के दुख-दर्द में शामिल होते हैं।

मैथिली ठाकुर के नाम के साथ जो विरोध जुड़ा है, उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि लोग इसे लोकप्रियता की राजनीति मान रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि राजनीतिक दल उनके नाम को सिर्फ वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।

मैथिली ठाकुर कोई अकेला नाम नहीं है। भोजपुरी स्टार रितेश पांडेय को करगहर से अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा भोजपुरी सिनेमा के चमकते सितारे पवन सिंह, अक्षरा सिंह, रचना झा और खेसारी लाल यादव के भी इस सियासी जंग में उतरने की पूरी संभावनाएँ नजर आ रही हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इन कलाकारों ने अपने क्षेत्र की भाषा और कला को पहचान दिलाई है। भोजपुरी सिनेमा में पवन सिंह, खेसारी लाल यादव जैसे कलाकारों का योगदान भी कम नहीं रहा उनकी लोकप्रियता अपार है, उनका फैनबेस जबरदस्त है। पर चुनाव जीतने के लिए फैनबेस से ज्यादा जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है।

 पवन सिंह पहले बीजेपी से आसनसोल से उम्मीदवार बने लेकिन वहाँ से उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद वह बिहार के काराकाट से चुनाव लड़े, पवन सिंह खूब फेमस होने के बाद भी काराकाट से चुनाव नहीं जीत सके बल्कि उन्होंने NDA के उम्मीदवार को हराने का काम ही किया। यानी जिस राजनीतिक विचार से आज वह जुड़ना चाहते हैं उसके प्रति उनकी निष्ठा कितनी रही है या है यह भी एक सवाल है।

याद कीजिए जब मनोज तिवारी ने राजनीति में कदम रखा था, ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ के हिट होने के बाद वह भोजपुरी सिनेमा के बड़े सुपरस्टार बन गए थे। उनकी कैसेट ब्लैक में बिकने लगी थी। इस बीच जब 2009 में मनोज तिवारी सपा के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़े तो उनकी हार हुई।

भोजपुरी सिनेमा के ही एक और बड़े सुपर स्टार हैं रवि किशन, उनकी गिनती उन अभिनेताओं में होती है जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को फिर से खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है। अपनी लोकप्रियता के वाबजूद जव वह चुनावी मैदान में उतरे तो हालता खस्ता हो गई। 2014 में उन्होंने जौनपुर से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें केवल 4.25% वोट ही मिल सके। रवि किशन फिलहाल गोरखपुर से बीजेपी के सांसद है।

ऐसे स्टार्स से लिस्ट लंबी है जो राजनीति में आए लेकिन फ्लॉप हो गए। कुछ ऐसे भी हैं जो आए चुनाव जीते और फिर क्षेत्र से गायब हो गए। हर दल में ऐसे स्टार्स आपको दिख जाएँगे। अमिताभ बच्चन से लेकर जया प्रदा और धर्मेंद्र तक राजनीति में कदम रखने वाले स्टार्स की लंबी फेहरिस्त है।

राजनीति हमेशा से जनसेवा का मंच कही जाती रही है और मंच के सितारों का राजनीति में आना कोई नई घटना भी नहीं है। इसके साथ-साथ एक सवाल जो उठता है वो ये कि क्या ऐसे समय में जो कार्यकर्ता वर्षों से दशकों से पार्टी का झंडा ढो रहा है, दरी-चादर बिछा रहा है, जो हर चुनाव में पोस्टर चिपकाता, भीड़ जुटाता और गलियों में नारे लगाता है, क्या उसका कोई हक नहीं बचा है?

राजनीति में विचार और वैचारिक प्रतिबद्धता हमेशा से एक ताकत रही है। जब कलाकारों और सेलेब्रिटीज को सिर्फ उनकी लोकप्रियता के दम पर टिकट दिए जाते हैं, तो वो विचारधारा के प्रति समर्पित नहीं होते हैं। कई बार वे खुद नहीं जानते कि जिस दल से लड़ रहे हैं, उसकी विचारधारा क्या है, उसकी नीतियाँ क्या हैं या उस क्षेत्र की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं।

अब जब ये स्टार्स चुनाव में उतरते हैं तो इन चेहरों के आने का सीधा असर पड़ता है जमीनी कार्यकर्ता पर, खासतौर पर यूपी या बिहार जैसे राज्यों में। जिन्हें राजनीतिक तौर पर ज्यादा एक्टिव माना जाता है। ऐसी जगहों पर जब कार्यकर्ता अपने खून-पसीने से पार्टी की पहचान बनाते हैं, वहाँ जब कोई स्टार अचानक टिकट लेकर आ जाता है, तो कार्यकर्ता का मन टूट जाता है।

उसे लगता है कि उसका संघर्ष, उसकी मेहनत सब बेकार गई। वह जो बरसों तक अपने इलाके में पार्टी का चेहरा रहा, जनता के सुख-दुख में साथ रहा, अब उसे कोई पूछने वाला नहीं। राजनीति की ताकत हमेशा कार्यकर्ता से आती है, सितारों से नहीं। पार्टी का ढांचा उसी नींव पर टिका होता है जो गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क करते हैं, पोस्टर लगाते हैं, बूथ संभालते हैं। अगर उस नींव को ही कमजोर कर दिया गया, तो उसके ऊपर बना महल भर-भराकर गिर ही जाएगा।

राजनेताओं और राजनीतिक दलों को यह सच्चाई भी समझनी चाहिए, भले ही ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 1-2 हो लेकिन यही लोकप्रियता इनके लिए इस मामले में मुसीबत बन जाती है। यह चर्चा लोगों तक पहुँचने लगती है कि पार्टी में हवा-हवाई उम्मीदवारों को टिकट दिया जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को समझ, जमीनी लोगों को आगे बढ़ाने की जरूरत हैं।

राजनीति का उद्देश्य हमेशा सेवा और जनहित रहा है, न कि लोकप्रियता और चमक। लेकिन जब कलाकारों और गायकों को सिर्फ इसलिए उतारा जाता है क्योंकि उनके लाखों फॉलोअर्स हैं या वे वोटों को influence कर सकते हैं, तो राजनीति विचार और मूल्यों से खाली हो जाती है।

धीरे-धीरे जनता को यह महसूस होने लगा है कि राजनीति अब जनता की आवाज नहीं बल्कि चुनावी ब्रांडिंग की मशीन बन चुकी है। जो लोग राजनीति के लिए पूरी तरह समर्पित होकर इस क्षेत्र में काम करना भी चाहते होंगे उन्हें भी लगने लगेगा कि स्टार बन जाया तो राजनेता बनने का रास्ता साफ हो जाएगा।

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Bihar Assembly Election: सफेदपोशी ब्लैकमेलर लड़ रहे सीटों के लिए; जाति के नाम पर हिन्दुओं को विभाजित करने वाली प
Bihar Assembly Election: सफेदपोशी ब्लैकमेलर लड़ रहे सीटों के लिए; जाति के नाम पर हिन्दुओं को विभाजित करने वाली प
 

इन्हीं, कारणों के चलते राजनीति से वही सुचिता कम हो रही है और लोगों के प्रति जवाबदेही में भी कमी आ रही है। राजनीति की सुचिता को बचाने के लिए जरूरी है कि पूर्ण कालिक लोग राजनीति में आएँ जो इसे साइड बिजनेस ना मानकर पूर्ण कालिक काम मानें।

सुनो कंचना यादव! जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, इसलिए आज भी डरता है बिहार: TV पर गों-गों मत करो, हाई कोर्ट ने लालू-राबड़ी राज को ‘नरक’ भी कहा था

लालू यादव के लिए जंगलराज का शब्द पटना हाई कोर्ट की तरफ से 1997 में कहा गया था (साभार : ABP & Kanchana Yadav)
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। एक बार फिर बिहार में नीतीश राज के विकास और लालू राज के ‘जंगलराज’ को लेकर जमीनी स्तर पर चर्चा होने लगी है। RJD के नेता और प्रवक्ता किसी भी तरह खुद को अपनी ‘जंगलराज’ की छवि से बचाने में लगे हैं। इसी बीच, RJD प्रवक्ता कंचन यादव ‘जंगलराज’ शब्द कहाँ से जन्मा है इसका सबूत आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से लाइव डिबेट में माँगा।

अब तक तेजस्वी यादव में जितना चुनावी प्रचार किया है अपने आपको प्रसारित किया है लालू का नाम तक नहीं लिया, क्योकि सच्चाई जानते हैं पिता का नाम लेने पर जनता के दिमाग में "जंगल राज" और "नौकरी के बदले जमीन घोटाला" आ गया तो चुनाव ही हाथ से निकल जाएगा।      

कहाँ से आया जंगलराज शब्द?- RJD प्रवक्ता

हाल ही में एक टीवी डिबेट में RJD प्रवक्ता कंचन यादव ने जब आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से यह सवाल किया गया कि ‘जंगलराज’ शब्द का जन्म कहाँ से हुआ?, तो अंजना ओम कश्यप ने जवाब दिया, “पटना हाई कोर्ट ने यह शब्द मौखिक रूप से इस्तेमाल किया था।”

आरजेडी प्रवक्ता कंचन यादव ने इस पर आपत्ति जताते हुए ट्वीट किया और चुनौती दी कि अगर कोर्ट ने ऐसा कहा हो तो आदेश निकालकर दिखाएँ। आरजेडी की प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह शब्द बीजेपी और मीडिया ने मिलकर फैलाया है, कोर्ट ने कभी ‘जंगलराज’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया।

जब हाईकोर्ट ने कहा था ‘बिहार में कोई सरकार नहीं, जंगलराज है’

सच्चाई यह है कि 1997 में पटना हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी में कहा था कि ‘बिहार में नाम के लायक कोई सरकार नहीं है, और यहाँ जंगलराज चल रहा है’। यह टिप्पणी जस्टिस बीपी सिंह और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा की बेंच ने की थी। टिप्पणी किसी राजनीतिक केस में नहीं, बल्कि पटना की बदहाल नगर व्यवस्था और जलजमाव को लेकर थी। जजों ने पटना को ‘Veritable Hell’ यानी ‘वास्तविक नरक’ कहा था।

यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता और शहर की गंदगी पर थी, न कि किसी आपराधिक मामले पर। कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया था कि पटना भारत की सबसे गंदी राजधानी होने का दावा कर सकता है। कोर्ट ने भ्रष्ट नौकरशाहों को प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

जंगलराज 2.0: अब भी डर कायम है?

आज तेजस्वी यादव खुद को ‘नई सोच का नेता’ कहकर पेश करते हैं। लेकिन सच यही है कि लालू यादव की RJD का नाम आते ही अब भी बिहार के कई हिस्सों में लोग डरने लगते हैं। पटना से गया तक कई जगहों पर युवाओं, व्यापारियों, महिलाओं में अब भी यह चिंता बनी रहती है कि अगर राजद सत्ता में लौटी तो क्या फिर वही 90 के दशक जैसा डर लौट आएगा?

 जंगलराज कोई अखबार की हेडलाइन नहीं, वह बच्चा है जो स्कूल जाने से पहले माँ की आँखों में डर देखता है। वह व्यापारी है जो दुकान की गल्ले पर बैठा हर आहट पर चौंकता है। वह बेटी है जो कॉलेज जाते वक्त हर मोड़ पर डरती है कि कहीं पीछे कोई बाइक न आ जाए।

और इसीलिए, जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, बिहार के उस दौर की बदनसीबी का नाम है… एक ऐसा नाम, जिसे आज भी सुनते ही लोग सिहर उठते हैं।

"मोदी चोर" कहने वाले राहुल और उसके गुलामों एक नज़र इधर भी ; गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है… जब बच्ची के चुटकुला सुनाने पर फायर हुआ AIR का पूरा स्टाफ: राहुल गाँधी याद करें 37 साल पुरानी घटना

                                   राहुल गाँधी, राजीव गाँधी (फोटो साभार: NDTV/Punekar News)
आज राहुल गाँधी और इसके गुलाम खूब "मोदी चोर" का शोर मचा कर जनता को पागल बना रहे हैं, विशेषकर युवा पीढ़ी को। राहुल, कांग्रेस और इसके गुलामों को 37 साल पुरानी घटना याद कर मोदी और मोदी सरकार के पैर धो-धोकर पीने चाहिए कि इन भटके नेताओं और उनकी पार्टियों पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही।       

साल 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला कैंपेन फेल होने के बाद राहुल गाँधी ने अब केंद्र सरकार पर नए इल्ज़ाम लगाने शुरू किए हैं। वो चाहते हैं कि किसी भी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी छिन जाए और वो सत्ता पर काबिज हो जाए। इसके लिए वो लगातार ऊल-जलूल आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजर भी रहे हैं, मगर अफसोस, हर बार वो मुँह के बल गिरते दिखते हैं।

सत्ता पाने की बौखलाहट में राहुल गाँधी न सिर्फ बिहार एसआईआर को लेकर फर्जी दावे करते दिखे और बल्कि उन्होंने फर्जी आँकड़ों के साथ प्रेस-कॉन्फ्रेंस भी कर डाली। हालाँकि जब आँकड़ों की सच्चाई दुनिया के सामने आ गई, तो उनका मुँह नहीं खुला, और न ही माफी माँगी.. बल्कि उस शर्मिंदगी को पीछे छोड़ने की कोशिश में एक और हरकत कर डाली। कभी ‘चौकीदार…’ वाले नारे पर मुँह की खाने के बाद अब ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर वो लोगों को भड़का रहे हैं।

इसी कड़ी में कांग्रेस की अगुवाई वाला पूरा INDI गठबंधन अब ‘वोट चोरी’ वाला कैंपेन चला रहा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग, मोदी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है और बीजेपी के फायदे के लिए आम लोगों के वोटिंग के हक को छीनने की साजिश रच रहा है।

INDI महागठबंधन भी बिहार में होने वाले चुनावों से पहले चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) मुहिम से नाराज़ है। इस मुहिम में 65 लाख फर्जी वोटरों को हटाया गया, जिससे वोटिंग की प्रक्रिया साफ-सुथरी होगी। लेकिन विपक्ष का गुस्सा इस बात पर है कि ये फर्जी वोटर उनके INDI गठबंधन के समर्थक थे।

खास बात ये है कि चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से कहा कि वो अपने इल्ज़ामों के सबूत के साथ हलफनामा दें या फिर सार्वजनिक माफी माँगें। लेकिन राहुल ने कहा, “मैं एक नेता हूँ, जो मैं लोगों से कहता हूँ, वही मेरा वचन है। मैंने ये बात सबके सामने कही, इसे कसम मान लो। खास बात ये है कि उन्होंने मेरी बात का खंडन नहीं किया।” गौरतलब यह है कि इमरजेंसी के दौर राहुल चाचा संजय गाँधी भी एक बार मुंह से बोल देने पर पूरी सरकार और अधिकारी कानून मान लेते थे। "न लिखत न पढत जो संजय कह वही सही" राहुल और INDI महागठबंधन उसी परिपाटी को चला रहे हैं। ये विपक्ष की वही पुरानी चाल है, जिसमें वो इल्ज़ाम लगाकर भाग जाते हैं।

बच्चों को अपनी राजनीति में घसीट रहे हैं राहुल गाँधी

उम्मीदों के मुताबिक, इस बार भी रायबरेली के सांसद राहुल गाँधी का बनाया हुआ राजनीतिक ड्रामा हकीकत से कोसों दूर है। अब वो कह रहे हैं कि बच्चे भी उन्हें ‘वोट चोरी’ की बात बता रहे हैं।

24 अगस्त को बिहार के अररिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने कहा, “एक बहुत ही मजेदार बात सामने आ रही है, जो मेरी पिछली दो यात्राओं में नहीं थी। बच्चे मेरे पास आ रहे हैं। ये बहुत अजीब बात है। वो कह रहे हैं, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’। ये बड़े लोग नहीं हैं, छोटे-छोटे बच्चे हैं। अब छह साल का एक बच्चा ये बात समझ गया, और सिर्फ एक नहीं, हज़ारों बच्चे। अब चुनाव आयोग को इन बच्चों से जाकर बात करनी चाहिए। उन्हें सब पता चल जाएगा।”

राहुल ने आगे कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले सरकारी कंपनियों को प्राइवेट किया, अब वो चुनाव आयोग की मदद से गरीबों के वोट चुराना चाहती है।” उन्होंने दावा किया कि विपक्ष बिहार में ऐसा नहीं होने देगा। उन्होंने कहा, “संविधान हर नागरिक को बराबर हक देता है। ये एसआईआर संविधान के खिलाफ है। बिहार के लोग विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों को करारा जवाब देंगे।”

जब एक बच्ची ने सचमुच राजीव गाँधी को कहा था चोर

हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने बच्चों के नाम पर अपनी झूठी कहानियाँ और गलत मकसद फैलाए हों। 1988 में एक बड़ी घटना हुई थी, जब एक बच्ची ने ऑल इंडिया रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को चोर कहा था।

राहुल गाँधी शायद भूल गए हों कि एक बच्ची ने उनके पिता के लिए कहा था, “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है।” ये बात एक लाइव शो में कही गई थी। मजेदार बात ये है कि ‘फासिस्ट’ कहलाने वाली बीजेपी सरकार ऐसी बातों पर कोई कार्रवाई नहीं करती, लेकिन ‘उदार और लोकतांत्रिक’ राजीव गाँधी और उनकी पार्टी ने उस वक्त इसका जवाब बहुत सख्ती से दिया था।

साल 1988 में “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है” का नारा राजीव सरकार के खिलाफ बहुत मशहूर हो गया था। ये बोफोर्स घोटाले के खुलासे के बाद हुआ था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन पर एक प्रोग्राम हुआ, जिसमें एक छोटी बच्ची से मजाक सुनाने को कहा गया। उसने जवाब में यही नारा बोल दिया। iChowk.in के मुताबिक, इस प्रोग्राम को आयोजित करने वाली ऑल इंडिया रेडियो की टीम को इसकी सजा भुगतनी पड़ी। लेकिन और भी बुरा होना बाकी था।

इस घटना के बाद सागर यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग के प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया – “कौन सा ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन ‘राजीव गाँधी चोर है’ वाक्य प्रसारित करने के लिए जाना गया?” ये सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड, प्रोफेसर प्रदीप कृष्णात्रेय के लिए बहुत भारी पड़ा। कॉन्ग्रेस ने उन्हें जमकर निशाना बनाया।

यूथ कांग्रेस के लोग पत्रकारिता विभाग में घुस गए और प्रोफेसर को पीटा। उनका मुँह काला किया गया और पूरे कैंपस में घुमाया गया। सागर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रायग दास हजेला ने इस घटना के विरोध में इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा, “ये सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं है। देश में राजनीति में गुंडागर्दी को जोड़ने की कोशिश हो रही है।”

यूनिवर्सिटी ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू की और सभी फैकल्टी मेंबर्स ने क्लास का बहिष्कार किया, जब तक कि प्रोफेसर के अपमान के जिम्मेदार लोगों को पकड़ा नहीं गया। पुलिस ने 10 लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। इतना ही नहीं, यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रोफेसर के खिलाफ जाँच शुरू कर दी। उन्हें जवाब देने के लिए बुलाया गया, लेकिन पुलिस ने उन्हें और परेशान किया।

प्रोफेसर कृष्णात्रेय को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और 504 के तहत गिरफ्तार किया गया। उन पर अशोभनीय व्यवहार, अपमान और शांति भंग करने के इल्ज़ाम लगाए गए। इस कार्रवाई की हर तरफ निंदा हुई। 8 अगस्त को प्रोफेसर ने अपनी सफाई में कहा, “मुझे इस सवाल से जुड़ी समस्याओं की जानकारी नहीं थी। मेरा कोई गलत इरादा नहीं था। मैंने ये सवाल इसलिए पूछा क्योंकि ये एक बड़ी घटना थी, और मैं उम्मीदवार की सतर्कता और याददाश्त जाँचना चाहता था।”

लेकिन 8 अगस्त की सुबह, जिला यूथ कांग्रेस के प्रमुख राकेश शर्मा की अगुवाई में एक भीड़ वाइस चांसलर के दफ्तर पहुँची और हजेला पर चिल्लाने लगी। वो तुरंत कृष्णात्रेय को हटाने की माँग कर रहे थे। हजेला ने मना कर दिया और कहा, “उनके खिलाफ कोई कार्रवाई जाँच पूरी होने और 17 अगस्त 2025 को यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद में रिपोर्ट पेश होने के बाद ही होगी। मैं उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकता क्योंकि कुछ नेता चाहते हैं।”

इस बीच, शर्मा ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के गलत काम को खारिज किया और कहा कि प्रोफेसर ने खुद ऐसा किया और तस्वीरें भी खिंचवाईं। दूसरी तरफ कृष्णात्रेय अपने चेहरे पर काला पेंट लिए बिना ही इलाज के बाद घर लौटे। उसी शाम वो टीचर्स यूनियन की मीटिंग में भी उसी हालत में गए। एक और प्रोफेसर ने उनके समर्थन में अपना चेहरा काला किया।

अगले दिन से टीचर्स ने हफ्ते भर तक क्लास का बहिष्कार करने का फैसला किया, जब तक कि जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाता। लेकिन गवर्नर ने यूनिवर्सिटी की कार्यकारी और शैक्षणिक परिषद को भंग कर दिया और सारी ताकत नए वाइस चांसलर एमएल जैन को दे दी। इसके बाद कैंपस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

कांग्रेस जोसेफ गोएबल्स की प्रचार नीति से प्रेरणा ले रही है और बीजेपी पर वही इल्ज़ाम लगा रही है, जो उसकी अपनी भ्रष्टाचार भरी हुकूमत में उस पर लगे थे। बच्चों के नाम पर पीएम मोदी पर हाल का हमला भी उसी का हिस्सा है।