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बंगाल में 50 लाख ‘फर्जी वोटर’ , ‘बाबरी’ का नींव रख हुमायूं बोले- अगले साल सीएम नहीं बनेगी ममता बनर्जी; कबीर को पार्टी से सस्पेंड कर बहुत तगड़ा खेला खेल दिया ममता ने

हरियाणा के बाद बिहार चुनावों ने मुस्लिम सियासत करने वाली सारी पार्टियों में भूचाल ला दिया है। मुसलमानों को खुश करने वाले लालू और तेजस्वी ने महाकुम्भ और राममन्दिर का विरोध करने की वजह से धरातल पर आ गए और कांग्रेस की तो लुटिया ही डूब गयी। खैर, अब बंगाल में भी वही होने के संकेत मिल रहे हैं। हुमायूँ कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रख ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटबैंक की सबके सामने वोट चोरी कर लिए। वो वोट बैंक जिसके दम पर ममता हिन्दुओं को ठोकर पर रखती थी। लेकिन बेशर्म हिन्दू इसके चोटिल होने के भ्रमजाल में फंस इसको वोट दे गए। जबकि ममता के मुख्यमंत्री बनने के बाद से जितना जानमाल का नुकसान हिन्दुओं का हुआ है किसी का नहीं हुआ। 

मुर्शिदाबाद में कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद की नींव रख ममता को मुस्लिम वोट का सौदागर बन मझधार में डाल दिया है। तृणमूल के सूत्रों के अनुसार ममता कबीर को वापस पार्टी में लेकर उसके इशारे पर नाचेगी। जो कबीर कहेगा ममता मानने को तैयार हो जाएगी। लेकिन यह खेला कांग्रेस, ओवैसी और वामपंथियों को बहुत भारी पड़ने वाला है। खेला खेलने की माहिर ममता ने जो खेला खेला है सबकी नींद हराम कर दी है। ममता ने मस्जिद का विरोध करने की बजाए पूरा संरक्षण देने की चाल को समझना होगा। राजनीति शतरंज की चाल होती है यानि कबीर को पार्टी से सस्पेंड करना सिर्फ ड्रामा है। क्योकि कबीर मुसलमानों का ठेकेदार बन सकता है मुख्यमंत्री नहीं।  
पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया में करीब 50 लाख संदिग्ध नामों ने ममता बनर्जी सरकार पर सवालिया निसान खड़े कर दिए हैं। अब तक मिले 50 लाख हटाने योग्य नामों में से 23 लाख से ज्यादा लोगों के नाम ‘मृत मतदाता’ श्रेणी में आते हैं, जिनके मतदाता पहचान पत्र जारी हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर ‘स्थानांतरित’ मतदाता हैं, जिनकी संख्या 18 लाख से अधिक है। इसके अलावा 7 लाख से ज्यादा मतदाता ‘लापता’ हैं। जबकि शेष नाम ‘दोहराव’ या अन्य कारणों से ‘फर्जी’ पाए गए हैं। दूसरी ओर टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार (6 दिसंबर) को मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखकर ममता बनर्जी के लिए नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। ऐसे हालात में तृणमूल कांग्रेस की राजनीति इस समय एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर है, जहां हर कदम ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी बनता जा रहा है। कभी खुद को अल्पसंख्यक वोट बैंक की निर्विवाद चैंपियन बताने वाली ममता आज उसी वोट बैंक के भीतर उठी बगावत की आग में घिर गई हैं। इस बीच हुमायूं कबीर ने दावा किया है कि जिस वोट बैंक के दम पर ममता इतने सालों से पश्चिम बंगाल में राज कर रही हैं, वह उससे बेहद नाराज है। इसलिए अगले साल के विधानसभा चुनाव में ममता किसी भी सूरत में मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी।

ममता बनर्जी अपने ही विधायक के राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसी
सीएम ममता बनर्जी की दिक्कत यह है कि वह कबीर को ना रोक सकती हैं और ना ही उनका समर्थन कर सकती हैं। रोकेंगी तो मुस्लिम समुदाय के भीतर नाराजगी की आग भड़केगी, और समर्थन करेंगी तो यह और साफ हो जाएगा कि ममता की राजनीति सिर्फ एकतरफा तुष्टिकरण पर टिकी है। यह ऐसी दुविधा है जिसने उन्हें एक ऐसे राजनीतिक चक्रव्यूह में घेर लिया है, जिसमें किसी भी दिशा में कदम उठाने पर नुकसान ही नुकसान है। दरअसल, हुमायूं कबीर जिस तरह बाबरी मुद्दे को बंगाल की राजनीति में उठा रहे हैं, वह साफ संकेत देता है कि वह सिर्फ एक विधायक की भूमिका में नहीं, बल्कि एक मुस्लिम नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश में हैं। यही वह बिंदु है, जो ममता बनर्जी को सबसे अधिक अस्थिर कर रहा है। बंगाल का मुस्लिम वोट लंबे समय तक टीएमसी की सत्ता का ईंधन रहा है। पर आज वही वोट-बैंक भीतर से बिखरने को तैयार खड़ा है। कबीर का अभियान मुस्लिम समुदाय के बीच एक नया संदेश दे रहा है कि टीएमसी चाहे कितनी भी बड़ी पार्टी क्यों न हो, लेकिन उनकी आवाज कहने के लिए एक “नया चेहरा” अब मैदान में उतर चुका है।

दोहरे आक्रमण ने ममता सरकार में राजनीतिक तूफान खड़ा किया
राज्य में मतदाता सूची में 50 लाख संदिग्ध वोटरों का खुलासा, TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर की खुली चुनौती, और मुर्शिदाबाद में नई ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखे जाने का विवाद, इन तीनों ने मिलकर ममता सरकार के सामने एक ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसकी पकड़ से निकल पाना फिलहाल तो उनके लिए संभव नजर नहीं आता। दरअसल, बंगाल की वोटर लिस्ट में 50 लाख संदिग्ध नामों की मौजूदगी कोई छोटी बात नहीं। विपक्ष का आरोप है कि TMC ने अपने चुनावी हितों को साधने के लिए मतदाताओं की सूची को ऐसे भर दिया है कि फर्क करना मुश्किल हो गया है कि वास्तविक वोटर कौन है और ‘राजनीतिक रूप से पोषित’ नाम कौन से हैं। यदि वोटर लिस्ट पर ही भरोसा टूट जाए तो चुनावी लोकतंत्र कागज की तरह बिखर जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अविश्वास का निशाना सीधा ममता बनर्जी की सरकार है, क्योंकि यह पूरा तंत्र राज्य प्रशासन के दायरे में आता है।

अगले साल चुनाव में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी- कबीर
इस बीच TMC के लिए असली झटका मुर्शिबाद से आया है। मुर्शिदाबाद के विधायक हुमायूं कबीर, जिन्हें पार्टी ने निलंबित किया है, अब खुले तौर पर ममता बनर्जी के बड़े मुस्लिम वोट बैंक को चुनौती दे रहे हैं। शनिवार (6 दिसंबर) के दिन कबीर ने एक नई बाबरी मस्जिद की नींव रखी। इतिहास को देखते हुए जिसे स्थानीय लोग ‘बाबरी-स्टाइल’ मस्जिद कहने लगे हैं। यह कदम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह एक राजनीतिक ऐलान है कि बंगाल में मुस्लिम राजनीति अब TMC की मोनोपॉली में नहीं रहेगी। कबीर ने यह कहकर TMC नेतृत्व के होश उड़ा दिए हैं कि 2026 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी और वे स्वयं 90 मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर धार्मिक राजनीति की नई धारा खड़ी करेंगे।

अयोध्या की तर्ज पर ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखी, दो लाख लोग शामिल
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार को अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर बनने वाली मस्जिद की आधारशिला रखी। कबीर ने मंच पर मौलवियों के साथ फीता काटा और आधारशिला रखने की औपचारिकता पूरी की। इस दौरान नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर के नारे लगाए गए। कार्यक्रम में 2 लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ जुटने के दावे किए गए। बंगाल के अलग-अलग जिलों से आए लोगों में कोई अपने सिर, कोई ट्रैक्टर-ट्रॉली तो कोई रिक्शा या वैन से ईंट लेकर कार्यक्रम में पहुंचे। हुमायूं कबीर ने 25 नवंबर को कहा था कि वे 6 दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के 33 साल पूरे होने पर बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखेंगे। TMC ने 4 दिसंबर को हुमायूं कबीर को पार्टी से सस्पेंड कर दिया था।

हाईकोर्ट ने मस्जिद निर्माण पर रोक से इनकार किया था
कोलकाता हाईकोर्ट ने शुक्रवार को मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने से इनकार किया था। कोर्ट ने कहा कि कार्यक्रम के दौरान शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद हुमायूं कबीर मस्जिद की नींव रख रहे हैं। बेलडांगा समेत आसपास का इलाका आज हाई अलर्ट पर रहा। बेलडांगा और रानीनगर थाने के इलाका और उसके आसपास सेंट्रल आर्म्ड फोर्स की 19 टीमें, रैपिड एक्शन फोर्स, बीएसएफ, स्थानीय पुलिस की कई टीमों समेत 3 हजार से ज्यादा जवान तैनात किए हैं। विधायक हुमायूं कबीर ने मस्जिद निर्माण को लेकर कहा कि अब बेलडांगा में बाबरी मस्जिद को बनने से कोई भी ताकत इसे रोक नहीं सकती। कबीर ने दावा किया कि हिंसा भड़काकर कार्यक्रम को बाधित करने की साजिशें रची जा रही हैं। बंगाल के विभिन्न जिलों से लाखों लोग ऐसी कोशिशों को नाकाम कर देंगे। हुमायूं ने बताया कार्यक्रम में सऊदी अरब से भी धार्मिक नेता आ रहे हैं।

ममता बनर्जी मुस्लिम हितों की वास्तविक संरक्षक नहीं रहीं
दरअसल, विधायक हुमायूं कबीर की यह चुनौती इसलिए मामूली नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट करीब 25-27 प्रतिशत हैं और लंबे समय से इनका बड़ा हिस्सा TMC के साथ है। लेकिन घरेलू असंतोष, प्रशासनिक पक्षपात और स्थानीय स्तर पर TMC नेतृत्व की खामियों ने इस वोट बैंक को भीतर से खोखला कर दिया है। कबीर जैसे नेता इसी असंतोष को भुना रहे हैं। यह पहली बार है जब TMC के भीतर से ही कोई नेता मुस्लिम समुदाय को यह संदेश दे रहा है कि ममता बनर्जी उनके वास्तविक हितों की संरक्षक नहीं रहीं। दरअसल, ममता बनर्जी के सामने असली समस्या यह नहीं है कि कबीर ने मस्जिद की नींव रखी, बल्कि यह है कि उसने इसे बाबरी मस्जिद की यादों से जोड़कर भावनात्मक मुद्दा बना दिया है। यह वही मुर्शिदाबाद है जो TMC के लिए कभी एक सुरक्षित ‘राजनीतिक गढ़’ माना जाता था और अब वहीं से पार्टी की दीवार में गहरी दरार पड़ गई है।

नया मुस्लिम ध्रुवीकरण तैयार होने से ममता की मुश्किलें दोगुनी हुईं
हुमायूं कबीर की यह बगावत ममता बनर्जी के पूरे राजनीतिक कैलकुलेशन को झकझोर रही है। मुस्लिम वोट पहले ही AIMIM, ISF और छोटे स्थानीय समूहों के कारण खिसक रहे थे। अब TMC के ही विधायक ने एक नया मुस्लिम ध्रुवीकरण तैयार करने की कोशिश से ममता की मुश्किलें दोगुनी कर दी हैं। TMC ने जिसे निलंबित किया, वे अब खुद को ‘नई मुस्लिम राजनीति’ का चेहरा बनाने में जुटे हैं। वास्तविकता यह है कि ममता की राजनीति उन्हीं हथकंडों के वजन से दबने लगी है जिन्हें उन्होंने वर्षों तक सहारा बनाया था। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति इतनी ज्यादा केंद्रीकृत थी कि अब उसी समुदाय के भीतर असंतोष पनप गया है। TMC के भीतर कई नेता शिकायत करते रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, केवल चुनावी भाषणों तक बात सीमित रहती है।

हिंदू वोटर भाजपा के साथ, मुस्लिम वोटर होने लगा विभाजित
बंगाल के राजनीतिक समीकरणों में एक नई हकीकत तेजी से उभर रही है। ममता बनर्जी चुनावी मैदान में अब दो तरफ से छिटकते वोटों से घिरी हैं। एक तरफ हिन्दू वोट जो पहले ही बीजेपी की ओर खिसक चुका है और दूसरी तरफ मुस्लिम वोट जो अब विभाजित होता दिख रहा है। बंगाल की सत्ता की चाबी इन्हीं दोनों समुदायों के संतुलन में छिपी हुई है। यदि यह संतुलन ही टूट जाए, तो TMC की राजनीति का पहिया चरमराना तय है। इसलिए 2026 का चुनाव अब TMC के लिए ‘रूटीन चुनाव’ नहीं रहेगा। यह ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य का निर्णायक मोड़ बनेगा। यदि मुस्लिम वोट बैंक दो या तीन हिस्सों में टूट गया और मतदाता सूची विवाद उनकी सरकार पर अविश्वास को और गहरा कर गया तो ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता में लौटना असंभव जैसा हो जाएगा। क्योंकि विपक्ष से लड़ना तो आसान है, लेकिन पार्टी में बगावत, अपने ही वोट बैंक का टूटना, और प्रशासनिक तंत्र पर अविश्वास यह तीनों मिलकर किसी भी सरकार की नींव हिला सकते हैं।

टीएमसी के भीतर वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभरने के संकेत
दरअसल, मुर्शिदाबाद वह जिला है जहां से ममता को वर्षों से अपराजेय समर्थन मिलता आया है। लेकिन उसी किले की दीवारों के भीतर अब दरारें दिखने लगी हैं। कबीर की यह मुहिम न केवल टीएमसी के भीतर गुटबाजी को बढ़ा रही है, बल्कि यह भी संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर एक वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभर सकता है। ममता बनर्जी इसे अपने लिए राजनीतिक खतरा मानें या पार्टी के लिए संकट, लेकिन सच यही है कि बाबरी मस्जिद का यह विवाद अब एकतरफा नहीं रहेगा। यह पूरे राज्य के सत्ता समीकरणों में बदलाव की झनकार पैदा करेगा।

भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया
इसी बीच भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया है। साध्वी भारती ने साफ कहा है, “यदि बाबर के नाम वाली मस्जिद बनी तो उसका अयोध्या जैसा हाल होगा।” उन्होंने X पर लिखा, “खुदा, इबादत, इस्लाम के नाम पर मस्जिद बने हम सम्मान करेंगे। अगर बाबर के नाम से इमारत बनी तो उसका वही हाल होगा, जो 6 दिसंबर को अयोध्या में हुआ था। ईंटें तक नहीं बची थीं। मेरी ममता बनर्जी को सलाह है कि बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने की बात कहने वालों पर कार्रवाई करें। पश्चिम बंगाल और देश में अस्मिता और सद्भाव के लिए उनकी जिम्मेवारी है।” उमा भारती के एक-एक ईंट गायब वाले बयान पर विधायक हुमायूं उन्हें मुर्शिदाबाद आने की चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि उमा भारती को ईंट खोलने के लिए मुर्शिदाबाद आना पड़ेगा। हिम्मत है तो आकर गिरा दें। अगर तोड़ दिया तो दोबारा बनाएंगे। उनके इस बयान ने मस्जिद के मुद्दे को बंगाल की सरहदों से निकालकर राष्ट्रीय विमर्श में ला खड़ा किया। भाजपा को यह मौका मिला कि वह ममता पर सीधे प्रहार कर सके और कह सके कि बंगाल सरकार एक पक्ष की धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दे रही है। यह बयान टीएमसी के लिए सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि उसकी छवि पर लगा एक गहरा राजनीतिक धब्बा भी बन गया है।

ममता बनर्जी ने हुमायूं कबीर को दूसरा औवेसी बनने का मौका दिया
हिंदू मतदाताओं के बीच यह पक्की धारणा पहले ही गहरी हो चुकी है कि ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से कभी बाहर नहीं निकलतीं। अब इस विवाद ने उस धारणा को और ठोस रूप दे दिया। टीएमसी का ढुलमुल रवैया, आधिकारिक प्रतिक्रिया का अभाव और कबीर जैसे नेताओं की स्वतंत्र बयानबाजी, इन सबने मिलकर बंगाल के हिंदू मतदाताओं को एक बार फिर यह महसूस कराया कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए कोई जगह नहीं। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी अब एकमत नहीं रहे। AIMIM पहले से ही बंगाल में जमीन तलाश रही थी और अब कबीर का उभार उस जमीन को और उपजाऊ बना सकता है। राजनीति का यह समीकरण ममता बनर्जी के लिए सबसे घातक है। हिंदू वोट जा चुके हैं और अब मुस्लिम वोट भी बंटने की कगार पर खड़े हैं। ऐसे में हुमायूं कबीर पश्चिम बंगाल में दूसरे औवेसी बन कर उभर सकते हैं। क्योंकि इस पूरे विवाद के बीच हुमायूं को अब TMC से निलंबित कर दिया गया है।

पश्चिम बंगाल : 26 लाख से ज्यादा ‘फर्जी वोटर’ से ममता के खेमे में मचा हड़कंप, TMC इसलिए कर रही SIR का विरोध; EPF की तरह वोटर लिस्ट बने


पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया जोरों पर चल रही है, इससे जुड़े कुछ न कुछ मामले सामने आ रहे हैं। अपना फर्जी वोट बैंक जाने के डर से सीएम ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस प्रक्रिया का विरोध किया जा रहा है। वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के बीच चुनाव आयोग की ओर से एक बड़ा खुलासा किया गया है। आयोग के मुताबिक अभी तक के पुनरीक्षण में यह फैक्ट सामने आए हैं उनके अनुसार पश्चिम बंगाल की मौजूदा वोटर लिस्ट में 26 लाख से अधिक वोटर्स के नाम 2002 की वोटर लिस्ट से मेल नहीं खा रहे हैं। यानि एक तरह से राज्य में 26 लाख से अधिक वोटर ‘फर्जी’ हैं। आयोग के मुताबिक फाइनल रिपोर्ट में यह संख्या बढ़ भी सकती है। इससे पहले भी राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अब तक 10 लाख से ज्यादा SIR फॉर्म ऐसे हैं जिन्हें अब तक जमा नहीं कराया गया है। इससे साफ है कि प्रदेश में बड़े पैमाने पर फर्जी वोटर बने हुए हैं। चुनाव आयोग के इस खुलासे के बाद तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के होश उड़े हुए हैं।
चुनाव आयोग को Employees' Provident Fund Pension तर्ज पर वोटर लिस्ट बनानी चाहिए। जिसमे आधार कार्ड, मोबाइल नंबर, चेहरा और अंगूठे का निशान हो, न मतदान के दिन बुर्का(चेहरे को पहचानने के लिए) हटाने का झगड़ा और न ही मतदान तक किसी पोलिंग एजेंट के बैठने की जरुरत। सिर्फ मतदान शुरू होने से पहले और मतदान ख़त्म होने पर EVM को चेक और सील करते समय एजेंट की जरुरत। जिस तरह आज टेक्नोलॉजी विकसित कर रही है, उसके सहयोग से चेहरा और ऊँगली अंगूठे का निशान उस मतदाता ने अगर कहीं और किसी अन्य नाम से नाम दर्ज करवाया हुआ है सब अपने आप सामने आने पर उम्मीद है पूरे भारत में लाखों फर्जी मतदाता निकल जाएंगे। चर्चा है कि घरों में काम करने वाली बांग्लादेशी महिलाओं ने हिन्दू क्षेत्रों में हिन्दू नाम रख और अन्य प्रदेश में किसी और नाम से लिस्ट में नाम है। आधार बनवाये हुए हैं। सब पकड़ में आ जायेंगे। अगर चुनाव आयोग Employees' Provident Fund तर्ज पर वोटर लिस्ट बनाता है बार-बार SIR की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। ना ही मतदान से पहले पर्चियां बाँटने की जरुरत। मतदाता बस अपना वोटर कार्ड, मोबाइल और आधार कार्ड लेकर आये। बोगस मतदान करने आयी या आये को तुरन्त पुरुष/महिला सुरक्षा कर्मी द्वारा हिरासत में लेकर हवालात भेजा जाए। एक बार खर्चा जरूर होगा लेकिन भविष्य में बचत।
         

ममता सरकार और टीएमसी नेता बीएलओ को तरह-तरह से धमका रहे

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की ओर से वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR अभियान चलाया जा रहा है। ममता सरकार और टीएमसी नेताओं द्वारा बीएलओ को तरह-तरह से धमकाकर इसमें अड़चने पैदा की जा रही हैं। चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बुधवार को इस बारे में जानकारी दी। अधिकारी ने बताया है कि पश्चिम बंगाल में नवीनतम वोटर लिस्ट की तुलना जब पिछली SIR प्रक्रिया के दौरान साल 2002 और 2006 के बीच विभिन्न राज्यों में तैयार की गई लिस्ट से की गई। तब जाकर वोटर लिस्ट की ये विसंगति सामने आई है कि 26 लाख से अधिक वोटर्स के नाम 2002 की वोटर लिस्ट से मेल नहीं खा रहे हैं। निर्वाचन आयोग के सूत्रों के अनुसार, राज्य में वर्तमान में जारी SIR की प्रक्रिया के तहत बुधवार दोपहर तक पश्चिम बंगाल में छह करोड़ से अधिक गणना प्रपत्र अपलोड कर दिए गए थे।

अब तक प्रदेश के 26 लाख से अधिक वोटर्स के नामों का मिलान नहीं

चुनाव आयोग के अधिकारी ने बताया है- “पोर्टल पर अपलोड होने के बाद, इन प्रपत्रों को ‘मैपिंग’ प्रक्रिया के तहत लाया जाता है, जहां इनका मिलान पिछले एसआईआर रिकॉर्ड से किया जाता है। शुरुआती निष्कर्षों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 26 लाख से अधिक मतदाताओं के नामों का मिलान अब भी पिछले एसआईआर चक्र के आंकड़ों से नहीं किया जा सका है।” चुनाव आयोग ने हाल ही में जानकारी दी थी कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दूसरे चरण का आयोजन पश्चिम बंगाल समेत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किया जाएगा, जहां अगले साल चुनाव होने है। SIR की प्रक्रिया 4 नवंबर से शुरू होकर 4 दिसंबर तक चलेगी। मतदाता सूची का मसौदा 9 दिसंबर को जारी किया जाएगा और अंतिम मतदाता सूची 7 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।

एसआईआर के 10.33 लाख फॉर्म जमा नहीं कराए गए – CEO

इससे पहले भी राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि लाखों फॉर्म जमा नहीं हुए हैं। ये इसलिए ‘जमा नहीं कराए जा सके’ क्योंकि वोटर या तो गैर-हाजिर रहे, डुप्लीकेट थे या फिर वोटर्स की मौत हो चुकी है या हमेशा के लिए ये लोग कहीं और चले गए हैं। सीईओ अग्रवाल ने कहा कि एसआईआर फॉर्म के जमा कराने और डिजिटलाइज का काम जारी है। अभी तक इनमें से 10.33 लाख फॉर्म ऐसे रहे जिन्हें वापस जमा नहीं कराया गया है। यह रियल-टाइम डेटा है।” उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में अब तक 7.64 करोड़ एसआईआर फॉर्म बांटे जा चुके हैं। जमा कराने वाले फॉर्म के बारे में विस्तार से बताते हुए सीईओ ने कहा कि अभी के लिए, ‘जमा नहीं कराए गए’ फॉर्म बांटे गए कुल फ़ॉर्म का महज 1.35 फीसदी है। अग्रवाल ने वोटर रोल के SIR प्रक्रिया में लगे बूथ-लेवल ऑफिसर (BLO) की भूमिका की भी तारीफ की और कहा कि वे इस काम के असली हीरो हैं।

80,600 बीएलओ लगाए, कनेक्टिविटी के लिए Wi-fi हब बनाए

उन्होंने कहा कि कई बूथ-लेवल ऑफिसर ऐसे भी हैं जो वोटर्स तक पहुंचने और फॉर्मैलिटी पूरी करने के लिए ऑफिस टाइम के बाद भी लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “बूथ-लेवल ऑफिसर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। SIR प्रक्रिया के असली हीरो यही लोग हैं। यह प्रक्रिया 4 नवंबर को शुरू की गई थी और महज 20 दिनों के अंदर, वे 7 करोड़ से ज्यादा वोटर्स तक पहुंच गए, जो कोई आसान काम नहीं है।” राज्य में SIR के लिए 80,600 से अधिक बीएलओ, के साथ-साथ 8,000 सुपरवाइजर, 3,000 असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर और 294 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स को लगाया गया है। इस प्रक्रिया के दौरान बीएलओ को आसानी से कनेक्टिविटी के लिए Wi-fi हब बनाए गए हैं। उनका कहना है कि BLO को डेटा एंट्री में मदद करने के लिए DM, ERO और BDO ऑफिस में हेल्प डेस्क भी हैं, जहां कहीं भी इंटरनेट की दिक्कतें हैं, वहां अलग से Wi-fi हब हैं।”

पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में फर्जी नाम 1.04 करोड़ से ज्यादा- रिपोर्ट

मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर देशभर में सियासी हलचल तेज हो गई है। बीजेपी का आरोप है कि यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों की सुनियोजित साजिश है, जिसका मकसद लोकतंत्र को कमजोर करना है। बिहार में चुनावी साल के बीच पश्चिम बंगाल में यह मुद्दा और भी गंभीर हो गया है, जहां ममता बनर्जी की सरकार पर फर्जी वोटरों के सहारे चुनाव परिणाम प्रभावित करने का आरोप लगाया जा रहा है। बीजेपी का कहना है कि बंगाल में फ्री एंड फेयर चुनाव तभी संभव है, जबकि एसआईआर पूरी तरह से सुनिश्चित हो। एक स्टडी रिपोर्ट ने बीजेपी के इन आरोपों को और बल दिया है। रिपोर्ट में सामने आए तथ्य के आधार पर चुनाव आयोग से तुरंत सख्त कार्रवाई की मांग हो सकती है। अगस्त 2025 में आई इस स्टडी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल की 2024 की वोटर लिस्ट में करीब 1.04 करोड़ फर्जी नाम दर्ज हैं। यह कुल वोटरों का लगभग 13.7% हिस्सा है। रिपोर्ट में सामने आया है कि 2004 में 4.74 करोड़ वोटर थे, 2024 तक 6.57 करोड़ (जनसंख्या, उम्र,मौत और नए 18 साल के वोटरों को जोड़कर) होने चाहिए थे। इस रिपोर्ट को एस पी जैन, इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च, मुंबई के विधु शेखर और आईआईएम विशाखापट्टनम के मिलन कुमार ने तैयार किया। इस स्टडी में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिसमें बहुत से मृत लोगों के नाम अब भी वोटर लिस्ट में दर्ज हैं। कई नाबालिग और राज्य छोड़ चुके लोग भी वोटर के तौर पर मौजूद हैं। कुछ जिलों में तो वोटरों की संख्या वहां की वास्तविक आबादी से भी ज्यादा पाई गई।

ममता बनर्जी सरकार में एसआईआर का पहले दिन से अनर्गल विरोध

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने एसआईआर की शुरुआत के पहले दिन से विरोध शुरू कर दिया है। राज्य में बड़े पैमाने पर फर्जी वोटरों को बचाने के लिए अभी से सारी हदें पार की जा रही है। प्रदेश के बीएलओ यूनाइटेड फोरम का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण वाले अपराधी तत्व बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) को धमका रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि यदि ममता के मुताबिक राज्य में कोई बोगस वोटर नहीं है, तो उन्हें एसआईआर से एतराज क्यों है? भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पश्चिम बंगाल यूनिट ने राज्य के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (सीईओ) को एक चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कूचबिहार ज़िला अध्यक्ष गिरिंद्रनाथ बर्मन ने एक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को सरेआम धमकी दी। चिट्ठी में तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया गया है कि वह वोटर लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों और फर्जी वोटर्स” के नामों को हटाने का विरोध कर रही है। एसआईआर की शुरुआत के दिन ही पश्चिम बंगाल में सियासी गर्मी बढ़ गई!

टीएमसी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओ को धमकाने में लगे

पश्चिम बंगाल बंगाल समेत देश के 12 राज्यों में चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के लिए शनिवार को BLO का ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू कर दिया है। राजस्थान समेत कई राज्यों में बीएलओ को ट्रेनिंग दी गई। लेकिन पश्चिम बंगाल में इस दौरान कई BLO ने प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्थाओं का विरोध किया। दरअसल, इसके पीछे वहां की तृणमूल सरकार ही है, जो एसआईआर का विरोध कर रही है। इसलिए पार्टी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओज को धमकाने में लगे हैं। बीएलओ ने उचित दस्तावेज और सुरक्षा देने की मांग की है। BLO का कहना है कि ट्रेनिंग के दौरान उनके स्कूलों में उपस्थिति दर्ज नहीं की जा रही है और BLO के रूप में उनकी ड्यूटी को ऑन ड्यूटी नहीं माना जा रहा है।
भाजपा ने ममता बनर्जी के मार्च को जमात की रैली बताया
पश्चिम बंगाल में मंगलवार को CM ममता बनर्जी ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के खिलाफ कोलकाता में विरोध मार्च निकाला। 3.8 km लंबी रैली में उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और बड़ी संख्या में पार्टी वर्कर्स मौजूद रहे। इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि जैसे हर उर्दू बोलने वाला पाकिस्तानी नहीं, वैसे ही हर बांग्लाभाषी बांग्लादेशी नहीं होता। इधर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने ममता के मार्च को जमात की रैली बताया। उन्होंने कहा- यह भारतीय संविधान की नैतिकता के खिलाफ है। वहीं, बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा- ममता जी को अगर कुछ कहना है, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।

"मोदी चोर" कहने वाले राहुल और उसके गुलामों एक नज़र इधर भी ; गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है… जब बच्ची के चुटकुला सुनाने पर फायर हुआ AIR का पूरा स्टाफ: राहुल गाँधी याद करें 37 साल पुरानी घटना

                                   राहुल गाँधी, राजीव गाँधी (फोटो साभार: NDTV/Punekar News)
आज राहुल गाँधी और इसके गुलाम खूब "मोदी चोर" का शोर मचा कर जनता को पागल बना रहे हैं, विशेषकर युवा पीढ़ी को। राहुल, कांग्रेस और इसके गुलामों को 37 साल पुरानी घटना याद कर मोदी और मोदी सरकार के पैर धो-धोकर पीने चाहिए कि इन भटके नेताओं और उनकी पार्टियों पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही।       

साल 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला कैंपेन फेल होने के बाद राहुल गाँधी ने अब केंद्र सरकार पर नए इल्ज़ाम लगाने शुरू किए हैं। वो चाहते हैं कि किसी भी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी छिन जाए और वो सत्ता पर काबिज हो जाए। इसके लिए वो लगातार ऊल-जलूल आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजर भी रहे हैं, मगर अफसोस, हर बार वो मुँह के बल गिरते दिखते हैं।

सत्ता पाने की बौखलाहट में राहुल गाँधी न सिर्फ बिहार एसआईआर को लेकर फर्जी दावे करते दिखे और बल्कि उन्होंने फर्जी आँकड़ों के साथ प्रेस-कॉन्फ्रेंस भी कर डाली। हालाँकि जब आँकड़ों की सच्चाई दुनिया के सामने आ गई, तो उनका मुँह नहीं खुला, और न ही माफी माँगी.. बल्कि उस शर्मिंदगी को पीछे छोड़ने की कोशिश में एक और हरकत कर डाली। कभी ‘चौकीदार…’ वाले नारे पर मुँह की खाने के बाद अब ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर वो लोगों को भड़का रहे हैं।

इसी कड़ी में कांग्रेस की अगुवाई वाला पूरा INDI गठबंधन अब ‘वोट चोरी’ वाला कैंपेन चला रहा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग, मोदी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है और बीजेपी के फायदे के लिए आम लोगों के वोटिंग के हक को छीनने की साजिश रच रहा है।

INDI महागठबंधन भी बिहार में होने वाले चुनावों से पहले चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) मुहिम से नाराज़ है। इस मुहिम में 65 लाख फर्जी वोटरों को हटाया गया, जिससे वोटिंग की प्रक्रिया साफ-सुथरी होगी। लेकिन विपक्ष का गुस्सा इस बात पर है कि ये फर्जी वोटर उनके INDI गठबंधन के समर्थक थे।

खास बात ये है कि चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से कहा कि वो अपने इल्ज़ामों के सबूत के साथ हलफनामा दें या फिर सार्वजनिक माफी माँगें। लेकिन राहुल ने कहा, “मैं एक नेता हूँ, जो मैं लोगों से कहता हूँ, वही मेरा वचन है। मैंने ये बात सबके सामने कही, इसे कसम मान लो। खास बात ये है कि उन्होंने मेरी बात का खंडन नहीं किया।” गौरतलब यह है कि इमरजेंसी के दौर राहुल चाचा संजय गाँधी भी एक बार मुंह से बोल देने पर पूरी सरकार और अधिकारी कानून मान लेते थे। "न लिखत न पढत जो संजय कह वही सही" राहुल और INDI महागठबंधन उसी परिपाटी को चला रहे हैं। ये विपक्ष की वही पुरानी चाल है, जिसमें वो इल्ज़ाम लगाकर भाग जाते हैं।

बच्चों को अपनी राजनीति में घसीट रहे हैं राहुल गाँधी

उम्मीदों के मुताबिक, इस बार भी रायबरेली के सांसद राहुल गाँधी का बनाया हुआ राजनीतिक ड्रामा हकीकत से कोसों दूर है। अब वो कह रहे हैं कि बच्चे भी उन्हें ‘वोट चोरी’ की बात बता रहे हैं।

24 अगस्त को बिहार के अररिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने कहा, “एक बहुत ही मजेदार बात सामने आ रही है, जो मेरी पिछली दो यात्राओं में नहीं थी। बच्चे मेरे पास आ रहे हैं। ये बहुत अजीब बात है। वो कह रहे हैं, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’। ये बड़े लोग नहीं हैं, छोटे-छोटे बच्चे हैं। अब छह साल का एक बच्चा ये बात समझ गया, और सिर्फ एक नहीं, हज़ारों बच्चे। अब चुनाव आयोग को इन बच्चों से जाकर बात करनी चाहिए। उन्हें सब पता चल जाएगा।”

राहुल ने आगे कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले सरकारी कंपनियों को प्राइवेट किया, अब वो चुनाव आयोग की मदद से गरीबों के वोट चुराना चाहती है।” उन्होंने दावा किया कि विपक्ष बिहार में ऐसा नहीं होने देगा। उन्होंने कहा, “संविधान हर नागरिक को बराबर हक देता है। ये एसआईआर संविधान के खिलाफ है। बिहार के लोग विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों को करारा जवाब देंगे।”

जब एक बच्ची ने सचमुच राजीव गाँधी को कहा था चोर

हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने बच्चों के नाम पर अपनी झूठी कहानियाँ और गलत मकसद फैलाए हों। 1988 में एक बड़ी घटना हुई थी, जब एक बच्ची ने ऑल इंडिया रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को चोर कहा था।

राहुल गाँधी शायद भूल गए हों कि एक बच्ची ने उनके पिता के लिए कहा था, “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है।” ये बात एक लाइव शो में कही गई थी। मजेदार बात ये है कि ‘फासिस्ट’ कहलाने वाली बीजेपी सरकार ऐसी बातों पर कोई कार्रवाई नहीं करती, लेकिन ‘उदार और लोकतांत्रिक’ राजीव गाँधी और उनकी पार्टी ने उस वक्त इसका जवाब बहुत सख्ती से दिया था।

साल 1988 में “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है” का नारा राजीव सरकार के खिलाफ बहुत मशहूर हो गया था। ये बोफोर्स घोटाले के खुलासे के बाद हुआ था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन पर एक प्रोग्राम हुआ, जिसमें एक छोटी बच्ची से मजाक सुनाने को कहा गया। उसने जवाब में यही नारा बोल दिया। iChowk.in के मुताबिक, इस प्रोग्राम को आयोजित करने वाली ऑल इंडिया रेडियो की टीम को इसकी सजा भुगतनी पड़ी। लेकिन और भी बुरा होना बाकी था।

इस घटना के बाद सागर यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग के प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया – “कौन सा ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन ‘राजीव गाँधी चोर है’ वाक्य प्रसारित करने के लिए जाना गया?” ये सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड, प्रोफेसर प्रदीप कृष्णात्रेय के लिए बहुत भारी पड़ा। कॉन्ग्रेस ने उन्हें जमकर निशाना बनाया।

यूथ कांग्रेस के लोग पत्रकारिता विभाग में घुस गए और प्रोफेसर को पीटा। उनका मुँह काला किया गया और पूरे कैंपस में घुमाया गया। सागर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रायग दास हजेला ने इस घटना के विरोध में इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा, “ये सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं है। देश में राजनीति में गुंडागर्दी को जोड़ने की कोशिश हो रही है।”

यूनिवर्सिटी ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू की और सभी फैकल्टी मेंबर्स ने क्लास का बहिष्कार किया, जब तक कि प्रोफेसर के अपमान के जिम्मेदार लोगों को पकड़ा नहीं गया। पुलिस ने 10 लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। इतना ही नहीं, यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रोफेसर के खिलाफ जाँच शुरू कर दी। उन्हें जवाब देने के लिए बुलाया गया, लेकिन पुलिस ने उन्हें और परेशान किया।

प्रोफेसर कृष्णात्रेय को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और 504 के तहत गिरफ्तार किया गया। उन पर अशोभनीय व्यवहार, अपमान और शांति भंग करने के इल्ज़ाम लगाए गए। इस कार्रवाई की हर तरफ निंदा हुई। 8 अगस्त को प्रोफेसर ने अपनी सफाई में कहा, “मुझे इस सवाल से जुड़ी समस्याओं की जानकारी नहीं थी। मेरा कोई गलत इरादा नहीं था। मैंने ये सवाल इसलिए पूछा क्योंकि ये एक बड़ी घटना थी, और मैं उम्मीदवार की सतर्कता और याददाश्त जाँचना चाहता था।”

लेकिन 8 अगस्त की सुबह, जिला यूथ कांग्रेस के प्रमुख राकेश शर्मा की अगुवाई में एक भीड़ वाइस चांसलर के दफ्तर पहुँची और हजेला पर चिल्लाने लगी। वो तुरंत कृष्णात्रेय को हटाने की माँग कर रहे थे। हजेला ने मना कर दिया और कहा, “उनके खिलाफ कोई कार्रवाई जाँच पूरी होने और 17 अगस्त 2025 को यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद में रिपोर्ट पेश होने के बाद ही होगी। मैं उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकता क्योंकि कुछ नेता चाहते हैं।”

इस बीच, शर्मा ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के गलत काम को खारिज किया और कहा कि प्रोफेसर ने खुद ऐसा किया और तस्वीरें भी खिंचवाईं। दूसरी तरफ कृष्णात्रेय अपने चेहरे पर काला पेंट लिए बिना ही इलाज के बाद घर लौटे। उसी शाम वो टीचर्स यूनियन की मीटिंग में भी उसी हालत में गए। एक और प्रोफेसर ने उनके समर्थन में अपना चेहरा काला किया।

अगले दिन से टीचर्स ने हफ्ते भर तक क्लास का बहिष्कार करने का फैसला किया, जब तक कि जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाता। लेकिन गवर्नर ने यूनिवर्सिटी की कार्यकारी और शैक्षणिक परिषद को भंग कर दिया और सारी ताकत नए वाइस चांसलर एमएल जैन को दे दी। इसके बाद कैंपस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

कांग्रेस जोसेफ गोएबल्स की प्रचार नीति से प्रेरणा ले रही है और बीजेपी पर वही इल्ज़ाम लगा रही है, जो उसकी अपनी भ्रष्टाचार भरी हुकूमत में उस पर लगे थे। बच्चों के नाम पर पीएम मोदी पर हाल का हमला भी उसी का हिस्सा है।

बंगाल : SIR से क्यों डर रही ममता सरकार, अवैध घुसपैठियों पर आ रहा दुलार? IIM प्रोफेसरों की रिसर्च में खुलासा- हजारों-लाखों नहीं, 1 करोड़ से ज्यादा हो सकते हैं अतिरिक्त वोटर

SIR के खिलाफ कांग्रेस और सारे विपक्ष द्वारा हंगामा कर जनता को गुमराह करने की असली वजह है देशहित की बजाए अपनी कुर्सी की खातिर घुसपैठियों को संरक्षण देकर वोटर लिस्ट में शामिल किये जाने की सच्चाई का सामने आना। क्या इस विपक्ष को देश हितैषी की सोंच रखी जा सकती है? इतने दिन संसद बर्बाद कर देश को रोज करोड़ों का चूना लगाने वाले देश की चिंता बिलकुल नहीं कर सकते। इन जनविरोधियों को सिर्फ प्यारी अपनी कुर्सी और तिजोरी, जनता जाए भाड़ में, यही है इनकी असलियत। घुसपैठियों को बचाने हिन्दू-मुसलमान दंगे करवाकर जनता को गुमराह करना ही विपक्ष का असली मकसद है।     
SIR का विरोध करने वाला एक भी नेता या उसकी पार्टी सामने आये और देश को बताए कि क्या अवैध रूप से किसी भी देश में जा सकते हो? यदि नहीं फिर क्यों क्यों दामादों की तरह घुसपैठियों को संरक्षण दिया जा रहा है? जो सियासत पार्टियां घुसपैठियों को अहमियत देती हो उन्हें देशवासियों की बिलकुल भी चिंता नहीं हो सकती।

   

चुनाव आयोग (ECI) ने बिहार में स्पेशल इंटेंशिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची की खास समीक्षा की। इसमें 60 लाख से ज्यादा फर्जी या अपंजीकृत मतदाता सामने आए। इस खुलासे ने भारतीय लोकतंत्र में फर्जी वोटिंग और राजनीतिक संरक्षण के जरिए वोटरों की घुसपैठ की गंभीरता को उजागर कर दिया है।

इस अभियान के दौरान जो सामने आया कि 35 लाख लोग या तो अब नहीं मिल रहे हैं या हमेशा के लिए कहीं और चले गए हैं, 22 लाख वोटर अब इस दुनिया में नहीं हैं यानी उनकी मौत हो चुकी है, 7 लाख वोटर एक से ज्यादा जगहों पर नामांकित हैं और लगभग 1.2 लाख फॉर्म अभी लंबित हैं।

चुनाव आयोग के इस कदम को लेकर विपक्षी दल, खासकर राजद (RJD) और कॉन्ग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया एक ‘साजिश’ है जिसका मकसद वोटरों, खासकर मुस्लिम समुदाय के वोटरों को बाहर करना है। उन्होंने ECI की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए और कहा कि आयोग BJP के इशारे पर काम कर रहा है।

खास बात यह है कि IIM संस्थानों के प्रोफेसरों द्वारा पहले ही एक शोध पत्र में चेतावनी दी गई थी कि बिहार में 70 लाख से अधिक फर्जी वोटर हो सकते हैं।

यह पूरी प्रक्रिया अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही। इससे देशभर में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के खिलाफ चल रहे अभियानों को भी नई ताकत मिली है। जैसे ही बिहार में फर्जी वोटरों की पहचान हुई, वैसे ही कई राज्यों में अवैध घुसपैठियों को पहचानने, हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।

इस अभियान को लेकर तथाकथित ‘धार्मिक रूप से तटस्थ’ (secular) पार्टियों में नाराजगी साफ देखी जा रही है।

ममता बनर्जी ने बीएलओ को दिलाया याद, वे चुनाव आयोग नहीं राज्य सरकार के लिए करते हैं काम

हरियाणा और अन्य BJP शासित राज्यों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई और बिहार में SIR की प्रक्रिया के बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन पर पहले भी यह आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सरकार वोट बैंक बढ़ाने के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देती है।

ममता बनर्जी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे बंगाल में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) लागू नहीं होने देंगी। हाल ही में उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों को बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में लिया जा रहा है, वे असल में बंगाली प्रवासी हैं।

इसके साथ ही उन्होंने मतदाता सूची सुधार (Summary Revision) के लिए ट्रेनिंग ले रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) को एक तरह से चेतावनी दे दी। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग सिर्फ तब सक्रिय होता है जब चुनाव की तारीखें घोषित होती हैं। उससे पहले और उसके बाद भी प्रशासन राज्य सरकार के हाथ में रहता है। आप राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, किसी को बेवजह परेशान मत कीजिए।”

बीरभूम में जुलाई में एक प्रशासनिक बैठक को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग BJP के इशारों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “मतदाता सूची गुजरात में बैठे लोग बना रहे हैं। यह काम BJP की एक एजेंसी कर रही है, मुझे उसका नाम भी पता है।”

इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर बंगाल में किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई तो छऊ नृत्य (एक आदिवासी नृत्य) होगा, ढोल और शंख की आवाज सुनाई देगी। मैं जिंदा रहते हुए ना NRC लागू होने दूँगी और ना ही डिटेंशन कैंप बनने दूँगी।”

पश्चिम बंगाल वह राज्य है, जहाँ जाली दस्तावेजों और स्थानीय मदद से रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या है सबसे अधिक

हाल ही में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर राज्य में SIR कराया गया तो लाखों फर्जी मतदाता, खासकर वे जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर नकली दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान बना चुके हैं, वे सूची से हटा दिए जाएँगे।

पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक है जहाँ सबसे अधिक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ आकर बसते हैं। पिछले तीन वर्षों में 2,688 बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और उन्हें वापस भेजा गया है।

8 अगस्त को, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार ने राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Election Officer – CEO) से एक ‘स्पष्टीकरण’ माँगा, क्योंकि उन्होंने चुनाव आयोग को यह लिखा था कि राज्य SIR के लिए ‘तैयार’ है।

पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने 293 विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की SIR वोटर लिस्ट प्रकाशित की (सिर्फ एक सीट को छोड़कर)।

बंगाल में आखिरी बार SIR वर्ष 2002 में हुआ था और उसी के आधार पर 2004 की मतदाता सूची तैयार की गई थी। अब जब 22 साल बाद फिर से SIR की संभावना है तो राज्य में राजनीति गरमा गई है।

चुनाव आयोग का काम होता है कि वह मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करे, गलतियाँ सुधारे, मृतकों के नाम हटाए और फर्जी वोटरों को चिन्हित करे, लेकिन राज्य की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार, जिसे कई लोग ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहकर मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ते हैं, इस SIR प्रक्रिया को लेकर विरोध जता रही है और इसे लेकर चुनाव आयोग को ‘याद दिला’ रही है और दबाव भी बना रही है।

पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील राज्य में मतदाता सूची में गड़बड़ी (Electoral Roll Inflation) कोई नई बात नहीं है और इसी वजह से SIR की जरूरत महसूस की जा रही है।

IIM प्रोफेसरों के शोध पत्र में आया सामने: पश्चिम बंगाल की 2024 की मतदाता सूची में 1 करोड़ अतिरिक्त मतदाता

7 अगस्त 2025 को प्रकाशित एक रिसर्च पेपर, जिसका नाम ‘Electoral Roll Inflation in West Bengal: A Demographic Reconstruction of Legitimate Voter Counts (2024)’ है,  यह दिखाता है कि पश्चिम बंगाल की 2024 की वोटर लिस्ट में लगभग 1 करोड़ फर्जी नाम हो सकते हैं। यह 13.69% का वोटर इन्फ्लेशन है।

यह रिसर्च IIM विशाखापत्तनम के डॉ. मिलन कुमार और SP जैन के डॉ. विधु शेखर ने किया है। उन्होंने सरकारी आँकड़ों जैसे कि वोटर लिस्ट, जनगणना और सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया और हर चरण पर रक्षात्मक (conservative) तरीका अपनाया, ताकि अनुमान नीचे रहे।
शोध पत्र में कहा गया है, “हम सभी पात्र युवाओं के पूर्ण पंजीकरण को मानते हैं, उच्च उत्तरजीविता संभावनाओं को लागू करते हैं, और हालिया वृद्धि के बजाय दशकीय रुझानों के आधार पर प्रवासन का मॉडल तैयार करते हैं। इससे हमें वैध मतदाता आबादी का एक निम्न-सीमा अनुमान लगाने में मदद मिलती है। फिर हम इस आँकड़े की तुलना 2024 के लिए चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित आधिकारिक मतदाता सूची से करते हैं।”
यह शोध 2024 तक पश्चिम बंगाल में वैध मतदाता आबादी के अनुभवजन्य अनुमान तीन चरणों में प्रस्तुत करता है: (i) 2004 की मतदाता सूची से बचे लोगों का अनुमान, (ii) 1986 और 2006 के बीच जन्मे नए मतदाता समूहों से जुड़ाव, और (iii) शुद्ध स्थायी प्रवास के लिए समायोजन। इसके बाद शोधकर्ताओं ने मतदाता सूची में अनुमानित अधिशेष की गणना करने के लिए परिणामों का संश्लेषण किया।
2004 की मतदाता सूची में 4.74 करोड़ पंजीकृत मतदाता दर्ज थे। शोध में इस जनसंख्या को छह आयु समूहों में विभाजित किया गया और 2001 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, आयु-विशिष्ट 20-वर्षीय उत्तरजीविता दरों का उपयोग किया गया। इन अनुमानों से 2004 की मतदाता सूची के अनुसार, अनुमानित 3.74 करोड़ जीवित मतदाता प्राप्त होते हैं।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि 2004 और 2024 के बीच लगभग 3.01 करोड़ नए पात्र व्यक्ति नामांकित होंगे।
इसके बाद, शोध ने 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके स्थायी बाहरी और आंतरिक प्रवास का अनुमान लगाया। विश्लेषण में पाया गया कि 2001 और 2011 के बीच पश्चिम बंगाल में प्रवासियों की कुल संख्या में गिरावट आई है।
2001 और 2011 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए तथा CAGR के माध्यम से अनुमान लगाते हुए शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस अवधि के दौरान पश्चिम बंगाल से कुल 17.86 लाख व्यक्तियों का स्थाई प्रवास हुआ।
विश्लेषण के अनुसार, वैध मतदाताओं की अनुमानित संख्या (2024) 6,57,06,849 है, जबकि आधिकारिक मतदाता सूची (2024) के अनुसार मतदाताओं की संख्या 7,61,24,780 है। यह अनुमानित 1,04,17,931 मतदाताओं का अधिशेष दर्शाता है, जो प्रतिशत के हिसाब से 13.69% है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर ऊँची सर्वाइवल रेट, ज्यादा पंजीकरण और धीमी माइग्रेशन रेट मानी, ताकि कम से कम फर्जीवाड़ा दिखे, फिर भी इतना बड़ा अंतर मिला। इसका मतलब है कि असल वोटर इन्फ्लेशन इससे भी ज्यादा हो सकता है।
इस रिसर्च के अनुसार, इतने ज्यादा फर्जी नाम होने से चुनावों की निष्पक्षता पर खतरा पैदा होता है, क्योंकि कई सीटों पर जीत का अंतर इससे छोटा होता है। इसका फायदा धोखाधड़ी, फर्जी वोटिंग और राजनीतिक गड़बड़ी में उठाया जा सकता है।
रिसर्च सुझाव देता है कि वोटर लिस्ट को आधार, सिविल रजिस्ट्रेशन और माइग्रेशन डेटा से जोड़ा जाए। एल्गोरिदम से ऑटोमेटिक चेकिंग हो जैसे 100 साल से ऊपर के हजारों वोटर, एक ही व्यक्ति के कई रजिस्ट्रेशन आदि और हर तीन महीने में जनसांख्यिकीय ऑडिट हो।
पश्चिम बंगाल और ऐसे राज्य जहाँ पिछले कई सालों से SIR नहीं हुई है, वहाँ घर-घर जाकर वोटर वेरिफिकेशन होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में 2024 में 13.69% यानी 1 करोड़ से ज्यादा फर्जी नाम हो सकते हैं। यह चुनाव की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है और जरूरी है कि सरकार व चुनाव आयोग इस पर तुरंत और सख्त कदम उठाए।

बिहार : SIR से अभी ‘पूर्ण स्वच्छ’ नहीं हुआ है वोटर लिस्ट? चुनाव आयोग ने 65 लाख ‘मुर्दा-फ्रॉड-घुसपैठिए’ पहचाने, IIM प्रोफेसरों के रिसर्च ने 77 लाख ‘फर्जी मतदाताओं’ का लगाया है अनुमान

                  बिहार के वैशाली जिले वोटर पुनरीक्षण अभियान में लगे BLO (फोटो साभार: CEOBihar/X)
बिहार में चुनाव आयोग की ओर से चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान का पहला चरण पूरा हो चुका है। 24 जून से 25 जुलाई 2025 तक चले इस अभियान के दौरान राज्य के कुल 7.89 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने अपने फॉर्म जमा किए, जो कुल का 91.69% है।

लेकिन इस प्रक्रिया में करीब 65 लाख मतदाताओं के नामों पर सवाल उठे हैं, जिनमें से 36 लाख का कोई अता-पता नहीं है, 22 लाख की मौत हो चुकी है और 7 लाख नामों में दोहराव पाया गया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि ये आँकड़े अंतिम नहीं हैं, क्योंकि 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दावे और आपत्तियाँ स्वीकार की जाएँगी।

इसी बीच, आईआईएम के दो प्रोफेसरों की हालिया स्टडी ने दावा किया है कि बिहार की वोटर लिस्ट में असली फर्जीवाड़ा 77 लाख तक हो सकता है, जो SIR के नतीजों से भी ज्यादा है। इससे सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग ने अब तक कोई कड़ा कदम उठाया है?

इसी बीच, आईआईएम के दो प्रोफेसरों की हालिया स्टडी ने दावा किया है कि बिहार की वोटर लिस्ट में असली फर्जीवाड़ा 77 लाख तक हो सकता है, जो SIR के नतीजों से भी ज्यादा है। इससे सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग ने अब तक कोई कड़ा कदम उठाया है?

चुनाव आयोग की प्रेस नोट के मुताबिक, SIR का मुख्य उद्देश्य सभी योग्य मतदाताओं को शामिल करना और कोई भी पात्र व्यक्ति को छूटने न देना था। राज्य में 38 जिलों, 243 विधानसभा क्षेत्रों और 77,855 पोलिंग बूथों पर यह अभियान चलाया गया।

                                      चुनाव आयोग ने दिए ये आँकड़े (फोटो साभार: चुनाव आयोग)

मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) बिहार, जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO), इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO), असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) और बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) की टीम ने घर-घर जाकर फॉर्म बांटे और कम से कम तीन बार विजिट की। इसके अलावा 12 प्रमुख राजनीतिक दलों के 1.60 लाख बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। BLA की संख्या SIR के दौरान 18% बढ़ गई, जो दलों की भागीदारी को दर्शाता है।

आयोग ने विशेष रूप से प्रवासी, शहरी और युवा मतदाताओं पर फोकस किया। प्रवासियों के लिए हिंदी में पूरे देश के 246 अखबारों में विज्ञापन दिए गए, जिनकी कुल सर्कुलेशन 2.60 करोड़ थी। साथ ही, CEO बिहार ने अन्य राज्यों के CEO को पत्र लिखकर बिहार के प्रवासियों तक पहुँचने का अनुरोध किया। प्रवासियों ने ऑनलाइन पोर्टल voters.eci.gov.in या ECI ऐप के जरिए 16 लाख फॉर्म भरे, जबकि 13 लाख ने फॉर्म डाउनलोड किए।

हरी इलाकों में विशेष कैंप लगाए गए और युवाओं (18-19 साल) को शामिल करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए गए। कुल 5.7 करोड़ मोबाइल नंबरों पर SMS भेजे गए और राजनीतिक दलों के साथ कई मीटिंग्स हुईं। BLO ने BLA के साथ बूथ लेवल मीटिंग्स कीं और BLA को प्रति दिन 50 फॉर्म जमा करने की अनुमति दी गई।

आईआईएम के 2 प्रोफेसरों के रिसर्च पेपर में आँकड़े अलग

लेकिन SIR के इन नतीजों से ठीक पहले जुलाई 2025 में आईआईएम कलकत्ता के पूर्व छात्र और वर्तमान प्रोफेसर डॉ. विदु शेखर (एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च) और डॉ. मिलन कुमार (आईआईएम विशाखापत्तनम) की स्टडी ने बड़ा खुलासा किया। “Estimating Legitimate Voter Numbers in Bihar (2025): A Demographic and Migration-Based Reconstruction” नाम की इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार में असली योग्य मतदाताओं की संख्या सिर्फ 7.12 करोड़ हो सकती है, जबकि आधिकारिक रोल में 7.89 करोड़ हैं। यानी 77 लाख (9.7%) का अंतर है।

यह स्टडी डेमोग्राफिक और माइग्रेशन डेटा पर आधारित है, जिसमें 2003 के वोटर लिस्ट से सर्वाइवर्स, 1985-2007 में जन्मे नए वोटर्स और 2003-2025 के बीच पर्मानेंट आउटमाइग्रेशन को कैलकुलेट किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2003 में 4.6 करोड़ वोटर्स थे, जिनमें से 2025 तक सिर्फ 4.1 करोड़ जिंदा बचे हैं (मोर्टैलिटी रेट को ध्यान में रखकर)। 1985-2007 में जन्मे नए वोटर्स 4.83 करोड़ हैं। लेकिन पर्मानेंट आउटमाइग्रेशन (अन्य राज्यों में स्थाई रूप से बस जाना) 1.12 करोड़ है, जो मुख्य रूप से रोजगार, शादी और फैमिली मूवमेंट के कारण है।

                                                     फोटो साभार: रिसर्च पेपर का स्क्रीनशॉट

स्टडी ने 2011 की जनगणना, जीवित बचे लोगों की अनुमानित संख्या और अन्य सरकारी विभागों के डेटा का इस्तेमाल किया। रिपोर्ट कहती है कि वोटर लिस्ट में इन्फ्लेशन की वजहें हैं- माइग्रेंट्स का नाम नहीं हटना, डुप्लिकेट एंट्रीज और अनडॉक्यूमेंटेड रजिस्ट्रेशन। स्टडी ने कंजर्वेटिव एस्टिमेट्स इस्तेमाल किए, जैसे माइग्रेशन रेट को 2011 के बाद नहीं बढ़ाया, ताकि आँकड़ा ज्यादा न लगे।

SIR के 65 लाख संदिग्ध नामों और आईआईएम स्टडी के 77 लाख के अंतर को जोड़कर देखें, तो साफ है कि समस्या गहरी है। SIR में 36 लाख लापता, 22 लाख मृत और 7 लाख डुप्लिकेट पाए गए, लेकिन स्टडी कहती है कि ये संख्या और बड़ी हो सकती है, क्योंकि माइग्रेशन को पूरी तरह अकाउंट नहीं किया गया।

उदाहरण के लिए, बिहार से हर साल लाखों लोग दिल्ली, मुंबई, गुजरात जैसे राज्यों में जाते हैं, लेकिन उनका नाम लिस्ट से नहीं हटता। इससे डबल रजिस्ट्रेशन होता है और चुनाव में फ्रॉड का खतरा बढ़ता है।

                                                             फोटो साभार: रिसर्च पेपर का स्क्रीनशॉट

बिना आदेश के नहीं हटाए जाएँगे नाम

बता दें कि चुनाव आयोग ने SIR के 10 उद्देश्यों का जिक्र किया है, जिनमें सभी मतदाताओं की भागीदारी, कोई पात्र न छूटे, प्रवासियों और युवाओं को शामिल करना शामिल है। आयोग ने दावा किया कि हर शिकायत का व्यक्तिगत समाधान किया गया, चाहे वो प्रिंट, टीवी या सोशल मीडिया से आई हो। अब 1 अगस्त को ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल जारी होगा, जो सभी दलों को प्रिंट और डिजिटल फॉर्म में दिया जाएगा। CEO की वेबसाइट पर भी यह उपलब्ध होगा।

1 अगस्त से 1 सितंबर तक कोई भी व्यक्ति या दल फॉर्म भरकर नाम जोड़ने या हटाने की अपील कर सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई नाम ड्राफ्ट रोल से बिना नोटिस और ERO/AERO के स्पष्ट आदेश के नहीं हटाया जा सकता। अगर कोई असंतुष्ट होता है, तो वो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या CEO के पास अपील कर सकता है। अपील के लिए स्टैंडर्ड फॉर्म तैयार किया जा रहा है और वॉलंटियर्स को ट्रेनिंग दी जाएगी।

चुनाव आयोग ने SIR को एक बड़ा कदम बताया है, लेकिन अब तक कोई हार्ड स्टेप नहीं दिख रहा। जैसे, मृतकों और लापता वोटर्स को तुरंत हटाने के लिए कोई सख्त डेडलाइन नहीं है।

रिसर्च में सुझाव दिया गया है कि डेमोग्राफिक मॉडलिंग को इलेक्टोरल प्रशासन में शामिल किया जाए। राजनीतिक दलों ने भी SIR की सराहना की, लेकिन कुछ ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में BLO की पहुँच कम थी। विपक्षी दलों ने माँग की है कि ड्राफ्ट रोल में पारदर्शिता बरती जाए।

कुल मिलाकर SIR एक सकारात्मक कदम है, लेकिन आईआईएम स्टडी से साफ है कि बिहार की वोटर लिस्ट में सुधार की जरूरत और गहरी है। अगर 77 लाख फर्जी नाम रह गए, तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। आयोग को अब माइग्रेशन डेटा को लिंक करने और Aadhaar जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। 1 अगस्त का ड्राफ्ट रोल देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि ये तय करेगा कि बिहार के लोकतंत्र में कितने ‘भूत’ वोटर्स बचे हैं।