SIR के खिलाफ कांग्रेस और सारे विपक्ष द्वारा हंगामा कर जनता को गुमराह करने की असली वजह है देशहित की बजाए अपनी कुर्सी की खातिर घुसपैठियों को संरक्षण देकर वोटर लिस्ट में शामिल किये जाने की सच्चाई का सामने आना। क्या इस विपक्ष को देश हितैषी की सोंच रखी जा सकती है? इतने दिन संसद बर्बाद कर देश को रोज करोड़ों का चूना लगाने वाले देश की चिंता बिलकुल नहीं कर सकते। इन जनविरोधियों को सिर्फ प्यारी अपनी कुर्सी और तिजोरी, जनता जाए भाड़ में, यही है इनकी असलियत। घुसपैठियों को बचाने हिन्दू-मुसलमान दंगे करवाकर जनता को गुमराह करना ही विपक्ष का असली मकसद है।
SIR का विरोध करने वाला एक भी नेता या उसकी पार्टी सामने आये और देश को बताए कि क्या अवैध रूप से किसी भी देश में जा सकते हो? यदि नहीं फिर क्यों क्यों दामादों की तरह घुसपैठियों को संरक्षण दिया जा रहा है? जो सियासत पार्टियां घुसपैठियों को अहमियत देती हो उन्हें देशवासियों की बिलकुल भी चिंता नहीं हो सकती।
चुनाव आयोग (ECI) ने बिहार में स्पेशल इंटेंशिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची की खास समीक्षा की। इसमें 60 लाख से ज्यादा फर्जी या अपंजीकृत मतदाता सामने आए। इस खुलासे ने भारतीय लोकतंत्र में फर्जी वोटिंग और राजनीतिक संरक्षण के जरिए वोटरों की घुसपैठ की गंभीरता को उजागर कर दिया है।
इस अभियान के दौरान जो सामने आया कि 35 लाख लोग या तो अब नहीं मिल रहे हैं या हमेशा के लिए कहीं और चले गए हैं, 22 लाख वोटर अब इस दुनिया में नहीं हैं यानी उनकी मौत हो चुकी है, 7 लाख वोटर एक से ज्यादा जगहों पर नामांकित हैं और लगभग 1.2 लाख फॉर्म अभी लंबित हैं।
चुनाव आयोग के इस कदम को लेकर विपक्षी दल, खासकर राजद (RJD) और कॉन्ग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया एक ‘साजिश’ है जिसका मकसद वोटरों, खासकर मुस्लिम समुदाय के वोटरों को बाहर करना है। उन्होंने ECI की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए और कहा कि आयोग BJP के इशारे पर काम कर रहा है।
खास बात यह है कि IIM संस्थानों के प्रोफेसरों द्वारा पहले ही एक शोध पत्र में चेतावनी दी गई थी कि बिहार में 70 लाख से अधिक फर्जी वोटर हो सकते हैं।
यह पूरी प्रक्रिया अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही। इससे देशभर में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के खिलाफ चल रहे अभियानों को भी नई ताकत मिली है। जैसे ही बिहार में फर्जी वोटरों की पहचान हुई, वैसे ही कई राज्यों में अवैध घुसपैठियों को पहचानने, हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।
इस अभियान को लेकर तथाकथित ‘धार्मिक रूप से तटस्थ’ (secular) पार्टियों में नाराजगी साफ देखी जा रही है।
ममता बनर्जी ने बीएलओ को दिलाया याद, वे चुनाव आयोग नहीं राज्य सरकार के लिए करते हैं काम
हरियाणा और अन्य BJP शासित राज्यों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई और बिहार में SIR की प्रक्रिया के बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन पर पहले भी यह आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सरकार वोट बैंक बढ़ाने के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देती है।
ममता बनर्जी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे बंगाल में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) लागू नहीं होने देंगी। हाल ही में उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों को बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में लिया जा रहा है, वे असल में बंगाली प्रवासी हैं।
इसके साथ ही उन्होंने मतदाता सूची सुधार (Summary Revision) के लिए ट्रेनिंग ले रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) को एक तरह से चेतावनी दे दी। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग सिर्फ तब सक्रिय होता है जब चुनाव की तारीखें घोषित होती हैं। उससे पहले और उसके बाद भी प्रशासन राज्य सरकार के हाथ में रहता है। आप राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, किसी को बेवजह परेशान मत कीजिए।”
बीरभूम में जुलाई में एक प्रशासनिक बैठक को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग BJP के इशारों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “मतदाता सूची गुजरात में बैठे लोग बना रहे हैं। यह काम BJP की एक एजेंसी कर रही है, मुझे उसका नाम भी पता है।”
इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर बंगाल में किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई तो छऊ नृत्य (एक आदिवासी नृत्य) होगा, ढोल और शंख की आवाज सुनाई देगी। मैं जिंदा रहते हुए ना NRC लागू होने दूँगी और ना ही डिटेंशन कैंप बनने दूँगी।”
पश्चिम बंगाल वह राज्य है, जहाँ जाली दस्तावेजों और स्थानीय मदद से रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या है सबसे अधिक
हाल ही में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर राज्य में SIR कराया गया तो लाखों फर्जी मतदाता, खासकर वे जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर नकली दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान बना चुके हैं, वे सूची से हटा दिए जाएँगे।
पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक है जहाँ सबसे अधिक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ आकर बसते हैं। पिछले तीन वर्षों में 2,688 बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और उन्हें वापस भेजा गया है।
8 अगस्त को, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार ने राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Election Officer – CEO) से एक ‘स्पष्टीकरण’ माँगा, क्योंकि उन्होंने चुनाव आयोग को यह लिखा था कि राज्य SIR के लिए ‘तैयार’ है।
पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने 293 विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की SIR वोटर लिस्ट प्रकाशित की (सिर्फ एक सीट को छोड़कर)।
बंगाल में आखिरी बार SIR वर्ष 2002 में हुआ था और उसी के आधार पर 2004 की मतदाता सूची तैयार की गई थी। अब जब 22 साल बाद फिर से SIR की संभावना है तो राज्य में राजनीति गरमा गई है।
चुनाव आयोग का काम होता है कि वह मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करे, गलतियाँ सुधारे, मृतकों के नाम हटाए और फर्जी वोटरों को चिन्हित करे, लेकिन राज्य की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार, जिसे कई लोग ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहकर मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ते हैं, इस SIR प्रक्रिया को लेकर विरोध जता रही है और इसे लेकर चुनाव आयोग को ‘याद दिला’ रही है और दबाव भी बना रही है।
पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील राज्य में मतदाता सूची में गड़बड़ी (Electoral Roll Inflation) कोई नई बात नहीं है और इसी वजह से SIR की जरूरत महसूस की जा रही है।