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चोरी और सीना जोरी, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध तस्करी में जेल जाने से बचने के लिए टीएमसी बना रही दबाव

ड्रामेबाज़ ममता का चोटिल होना 
पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों एक बार फिर उबाल पर है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रुख और टीएमसी नेताओं को सड़क पर उतारना, दरअसल उस राजनीति का परिचित दृश्य है, जिसमें जांच को “राजनीतिक प्रतिशोध” बताकर असली सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है। मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध तस्करी और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जब एजेंसियां सवाल पूछती हैं, तो जवाब देने के बजाय नेता आंदोलन का रास्ता अपनाने लग जाते हैं। बिहार में राजद और दिल्ली में आप नेताओं के ऐसे कई उदाहरण हैं। अब इसी लकीर पर टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी चल निकली हैं। ईडी बनाम दीदी की यह लड़ाई दरअसल एजेंसी बनाम नेता की नहीं, बल्कि जवाबदेही बनाम दबाव की राजनीति की है। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन जांच से भागा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल की जनता अब यह समझने लगी है कि सच्ची ताकत नारों, सड़कों पर शोर-शराबे में नहीं, बल्कि भाजपा के सुशासन में होती है। यदि टीएमसी सरकार इन सवालों का ठोस जवाब नहीं देती, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में जनादेश अपना फैसला सुनाने से बिल्कुल नहीं हिचकेगा।

तृणमूल सरकार में चोरी और सीना जोरी की कहावत चरितार्थ

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सरकार दरअसल, चोरी और सीना जोरी की कहावत ही चरितार्थ कर रही हैं। मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध तस्करी के आरोपों से बचने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक टीएमसी नेताओं को सड़क पर उतारा है, लेकिन इस दबाव के बावजूद जनता के सामने उनकी कलई खुल गई है, जिसका खामियाजा उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में जरूर उठाना पड़ेगा। जनता-जनार्दन भ्रष्टाचारी नेताओं को अब किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं करने वाली है। बिहार में पिछले साल ही में हुए चुनाव इसका ताजा उदाहरण है, जिसमें भाजपा-एनडीए को प्रचंड जीत मिली थी। पीएम मोदी ने कहा था कि गंगा बिहार से होकर बंगाल तक जाती है। इसी तर्ज पर ममता सरकार की काली करतूतों के चलते बिहार के बाद जनता-जनार्दन भाजपा को बंगाल में भी जीत का आशीर्वाद दे सकती है।

कारनामों की पोल खुलने से ममता की धड़कने बढ़ीं
दरअसल, सीएम ममता बनर्जी को जैसे ही आई-पैक में छापे की जानकारी मिली, वे प्रतीक जैन के घर पर पहुंच गईं। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि क्या ईडी का काम पार्टी की हार्ड डिस्क और उम्मीदवारों की सूची जब्त करना है? सीएम ने कहा कि मेरी पार्टी के सभी दस्तावेज उठा ले जाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में SIR के बाद अब इस तरह की कार्रवाई की जा रही है। दरअसल, पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, त्यों-त्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। हिंदुओं की खिलाफत, मुस्लिम तुष्टिकरण, एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और अब ईडी के छापे ने ममता बनर्जी की धड़कने बढ़ा दी हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के दम पर जिस तरह तृणमूल कांग्रेस जीतती रही है, उस पर एसआईआर ने सेंध लगा दी है। इस रिवीजन में राज्य के 58 लाख से ज्यादा ‘फर्जी’ वोटर के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं।
खाली हाथ आईं ममता हरी की ग्रीन फाइल सुर्खियों में आई
ममता खाली हाथ आईं थीं, लेकिन घर से बाहर निकलीं तो हाथ में ग्रीन फाइल थी। छापेमारी के दौरान प्रतीक जैन अपने घर पर ही मौजूद थे। यह कार्रवाई सुबह से जारी थी, लेकिन करीब 11:30 बजे के बाद मामला बढ़ा। सबसे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर प्रतीक जैन के आवास पर पहुंचे। कुछ समय बाद सीएम ममता बनर्जी खुद लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के घर पहुंचीं। ममता वहां कुछ देर रुकीं। जब बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरी फाइल दिखाई दी। इसके बाद वे I-PAC के ऑफिस भी गईं।
जांच में बाधा डाली, सीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा कि ममता बनर्जी ने केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल देने का काम किया है। ईडी सबूतों के आधार पर अपना काम कर रही है। बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, ‘छापेमारी के बारे में ED पूरी डिटेल्स दे सकती है। लेकिन यह सच है कि ममता बनर्जी केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल दिया। ममता ने आज जो किया, वह जांच में बाधा डालना था। मुख्यमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। IPAC ऑफिस में वोटर लिस्ट क्यों मिली। क्या IPAC कोई पार्टी ऑफिस है।’
ईडी की कार्रवाई और ‘पीड़ित राजनीति’ का नया अध्याय

ईडी की जांच जिन मामलों से जुड़ी है, वे केवल कागजी आरोप नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे उस तंत्र की ओर इशारा करते हैं, जिसमें सत्ता, पैसे और प्रभाव का कथित गठजोड़ दिखाई देता है। टीएमसी नेतृत्व का यह कहना कि सब कुछ राजनीतिक साजिश है, तब खोखला लगता है जब बार-बार अलग-अलग मामलों में पार्टी से जुड़े नाम सामने आते हैं। यदि सरकार और पार्टी नेतृत्व स्वयं को निर्दोष मानते हैं, तो जांच का सामना करना चाहिए, न कि सड़कों पर दबाव की राजनीति कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को डराने की कोशिश। पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक टीएमसी नेताओं का प्रदर्शन यह दिखाता है कि पार्टी जांच एजेंसियों से ‘पीड़ित राजनीति’ के नैरेटिव से लड़ाई जीतना चाहती है। मगर सवाल यह है कि क्या प्रदर्शन से सच्चाई को छुपा सकता है? क्या नारे लगाने से दस्तावेज और सुबूत गायब हो जाएंगे ? लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन जब विरोध का उद्देश्य केवल जांच से बचना हो, तो जनता उसे समझने में देर नहीं लगाती। पश्चिम बंगाल की प्रबुद्ध और जागरूक जनता भावनात्मक अपील से नहीं, तथ्यों और जवाबदेही से संतुष्ट होती है।

आरोपों से भागना यानी जनता-जनार्दन को गुमराह करना

देश की राजनीति में बीते वर्षों में एक स्पष्ट बदलाव दिखा है। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं के प्रति जनता का धैर्य अब टूट रहा है। भ्रष्टाचार में डूबे नेता आरोपों से भागकर जनता को भले कितना ही गुमराह करने के प्रयास कर लें, लेकिन यह पब्लिक है, जो सब जानती है। बिहार में हालिया चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया कि विकास, सुशासन और साफ छवि को मतदाता प्राथमिकता दे रहे हैं। यह संदेश केवल बिहार तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल की जनता भी यह देख रही है कि सत्ता में रहते हुए कौन जवाबदेह है और कौन हर सवाल को साजिश बताकर टाल देता है। आने वाले विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के लिए केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं होंगे, बल्कि राजनीतिक संस्कृति की दिशा तय करने का अवसर होंगे। जनता यह तय करेगी कि क्या वह आरोपों, आंदोलनों और टकराव की राजनीति को स्वीकार करेगी या पारदर्शिता, विकास और जवाबदेही को चुनेगी। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने खुद को जनता से ऊपर समझा, तब-तब जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से उसे जवाब दिया है।

 गंगा का प्रतीक और सुशासन बनाम सड़कों की राजनीति

प्रधानमंत्री मोदी का बिहार की जीत के बाद का यह कथन कि “गंगा बिहार से होकर बंगाल तक जाती है” केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत भी है। जैसे बिहार में जनता ने भ्रष्टाचार और अराजकता की बरसों-बरस तक राजनीति करने वालों के जंगलराज को नकारा, वैसे ही बंगाल में भी बदलाव की बयार चलने की बात कही जा रही है। टीएमसी सरकार पर लगे आरोप, कानून-व्यवस्था को लेकर उठते सवाल और निवेश व उद्योग के मोर्चे पर पिछड़ता राज्य—ये सभी मुद्दे आने वाले विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। दरअसल, किसी भी सीएम से जनता की अपेक्षा होती है कि वह शासन, विकास और कानून के पालन की मिसाल पेश करे। लेकिन जब सत्ता का केंद्र खुद को हर जांच से ऊपर समझने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ता है। सड़क पर उतरकर संस्थाओं पर दबाव बनाना सुशासन नहीं, बल्कि असहजता का संकेत है। यदि टीएमसी सरकार के पास अपने बचाव में ठोस तथ्य हैं, तो उन्हें अदालत और जांच एजेंसियों के सामने रखना चाहिए, न कि भीड़ जुटाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश करनी चाहिए।
दरअसल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी के भंवर में बुरी तरह से फंस गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।
पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव
आज पश्चिम बंगाल देश के सामने एक ऐसा उदाहरण बन रहा है, जो कि सत्ता के लंबे शासन में पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव से चल रहा है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई किसी व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं होती, बल्कि उन तथ्यों के आधार पर है, जो जांच में सामने आए हैं। ऐसे में यदि ममता बनर्जी सच में अपने आपको बेदाग मानती हैं, तो उन्हें जांच से डरने की नहीं, सहयोग करने की जरूरत है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध जांच नहीं, सच से भागना होता है। इस समय ममता बनर्जी वही कर रही हैं। इससे साफ है कि उनके मन में किसी काले कारनामे का पर्दाफाश होने का डर समाया हुआ है।
ममता के राज में सत्ता, पैसे और सिस्टम का गठजोड़?
सबसे अहम तथ्य यह है कि प्रतीक जैन न केवल I-PAC के डायरेक्टर हैं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आईटी सेल के प्रमुख भी बताए जाते हैं। यानी यह मामला केवल एक कंसलटेंसी फर्म तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सत्ता के डिजिटल, रणनीतिक और चुनावी इको सिस्टम तंत्र तक पहुंचता दिखाई देता है। ममता बनर्जी अक्सर केंद्र सरकार पर “राजनीतिक बदले” का आरोप लगाती रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ पारदर्शी है तो ईडी बार-बार टीएमसी के इतने करीबी नेताओं, मंत्रियों और अफसरों तक क्यों पहुंच रही है? क्या यह महज संयोग है या फिर सत्ता के भीतर पनपते उस सिस्टम का संकेत है, जहां राजनीति, पैसा और प्रशासन एक-दूसरे में घुलते जा रहे हैं?
अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में छापेमारी
छापेमारी के बाद ED ने मीडिया से कहा कि छापेमारी अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई है। ED ने कहा कि कोलकाता में I-PAC कार्यालय पर छापे पूरी तरह सबूतों के आधार पर किए जा रहे हैं। यह किसी राजनीतिक दल या चुनाव से जुड़ा मामला नहीं है। यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े केस में हो रही है। फिलहाल 10 ठिकानों पर तलाशी जारी है। 6 पश्चिम बंगाल और 4 दिल्ली में बताए जाते हैं। एजेंसी ने बताया कि जांच में कैश जनरेशन, हवाला ट्रांसफर से जुड़े परिसर शामिल हैं। किसी भी पार्टी कार्यालय की तलाशी नहीं ली गई। अधिकारियों के मुताबिक कुछ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग दो ठिकानों पर पहुंचे, अवैध दखल दिया और दस्तावेज छीन लिए।
प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक ने संभाली
  • I-PAC (Indian Political Action Committee) एक पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म है। इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन है।
  • यह राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति, डेटा-आधारित कैंपेन, मीडिया प्लानिंग और वोटर आउटरीच में मदद करती है।
  • I-PAC पहले Citizens for Accountable Governance (CAG) थी। इसकी शुरुआत 2013 में प्रशांत किशोर ने प्रतीक के साथ की थी। बाद में इसका नाम I-PAC रखा गया।
  • प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक के पास आ गई।
  • प्रशांत ने बाद में बिहार में ‘जन सुराज’ पार्टी बनाई।
  • I-PAC तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ 2021 से जुड़ी है।

दीवाली मनाने वाले भारतीयों को विदेशी द्वारा brain dead, shithole, retarded और garbage लिखने पर सनातन विरोधी तृणमूल कांग्रेस सांसद, महुआ मोइत्रा ने ‘I agree’ लिखा

   महुआ मोइत्रा का भारत विरोधी पोस्ट पर मैं सहमत हूँ लिखना, फिर विवाद के बाद उसे डिलीट करना (साभार :                                                                                                                                         Timesnow)
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने एक विदेशी व्यक्ति के उस पोस्ट पर ‘मैं सहमत हूँ’ (I Agree) लिखा, जिसमें दिवाली मनाने वाले भारतीयों को ब्रेन डेड (brain dead), गंदगी (shithole) और दिवाली की तुलना ‘मंदबुद्धि’ (retarded) और ‘कचरे’ (garbage) से की गई थी।।

माहुआ मोइत्रा के इस ट्वीट ने सोशल मीडिया पर भारी बवाल मचा दिया, जिस पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई और इसे भारत विरोधी और हिंदू विरोधी नफरत को बढ़ावा देने वाला बताया। चौतरफा आलोचना के बाद, सांसद ने अंततः अपने इस विवादित पोस्ट को हटा लिया। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब पश्चिमी सोशल मीडिया पर हिंदुओं और दिवाली के ख़िलाफ नस्लीय और धार्मिक असहिष्णुता का एक भयानक चलन दिख रहा है।

दिवाली पर नस्लीय टिप्पणी और महुआ मोइत्रा का ‘सहमत’ होना

23 अक्टूबर 2025 को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने एक ईसाई चरमपंथी के दिवाली त्योहार के खिलाफ किए गए अपमानजनक पोस्ट का खुलेआम समर्थन किया। उस विदेशी अकाउंट ने हिंदुओं के प्रति नस्लीय नफरत को बढ़ावा देते हुए भारतीयों को ‘दिमाग से मरे हुए भो#$के’ कहा और पश्चिमी देशों को ‘उनकी मंदबुद्धि दिवाली गंदगी’ से ‘पूरी तरह से गंदगी’ में बदलने का आरोप लगाया।

इस पोस्ट पर मोइत्रा ने सीधा और संक्षिप्त जवाब दिया ‘मैं सहमत हूँ’ (I agree)। उनका यह बयान पश्चिमी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दिवाली के ख़िलाफ़ फैल रही नस्लीय नफ़रत और हिंदू विरोधी कट्टरता को समर्थन देता हुआ प्रतीत हुआ, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गईं।

अब पोस्ट डिलीट कर सांसद दे रही सफाई

तृणमूल कांग्रेस सांसद माहुआ मोइत्रा अपने विवादित ‘I agree’ ट्वीट को लेकर सफाई देती नजर आ रही हैं। उन्होंने कहा कि उनका इरादा उस विदेशी के हिंदू-विरोधी पोस्ट का समर्थन करने का नहीं था, बल्कि उन्होंने गलती से ‘मैं सहमत हूँ’ उस ट्वीट पर लिख दिया जो उसके नीचे था।

माहुआ के मुताबिक, यह एक गलत क्लिक और भ्रम का मामला था, न कि किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ उनकी राय का संकेत। उन्होंने कहा कि वह यात्रा पर थीं और समय पर ट्वीट की जाँच नहीं कर सकीं। हालाँकि, उनके इस बयान के बाद भी सोशल मीडिया पर बहस थमी नहीं है। कई लोग इसे ‘बचाव की कोशिश’ बता रहे हैं, जबकि कुछ ने उनकी सफाई को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें ट्वीट करने से पहले और सावधानी बरतनी चाहिए थी।

महुआ बांग्लादेश को भारत से बेहतर मानती- बीजेपी

यह पहला मौक़ा नहीं है जब महुआ मोइत्रा ने हिंदू धर्म या भारत के खिलाफ विवादित टिप्पणी की हो। बीजेपी के पोस्ट के अनुसार, यह वही महुआ मोइत्रा हैं जो मानती हैं कि बांग्लादेश भारत से बेहतर है और जिन्होंने कथित तौर पर लक्जरी हैंडबैग के बदले राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला है। बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि टीएमसी सांसद पहले देवी काली का वर्णन ‘मांस और शराब की देवी’ के रूप में कर चुकी हैं।

इसी साल अगस्त में, उन्होंने एक वायरल वीडियो में कथित तौर पर नमासूद्र और मटुआ जैसे अनुसूचित जाति समुदायों के हिंदुओं का मज़ाक उड़ाया था और उनके धार्मिक प्रतीकों को ‘लकड़ी की माला’ कहकर अपमानित किया था। इसके अलावा, बीजेपी ने टीएमसी शासित पश्चिम बंगाल में दिवाली के दौरान आतिशबाजी करने पर महिलाओं और बच्चों पर कथित अत्याचार और काली मंदिरों पर हमले की घटनाओं का भी उल्लेख किया।

बंगाल : SIR से क्यों डर रही ममता सरकार, अवैध घुसपैठियों पर आ रहा दुलार? IIM प्रोफेसरों की रिसर्च में खुलासा- हजारों-लाखों नहीं, 1 करोड़ से ज्यादा हो सकते हैं अतिरिक्त वोटर

SIR के खिलाफ कांग्रेस और सारे विपक्ष द्वारा हंगामा कर जनता को गुमराह करने की असली वजह है देशहित की बजाए अपनी कुर्सी की खातिर घुसपैठियों को संरक्षण देकर वोटर लिस्ट में शामिल किये जाने की सच्चाई का सामने आना। क्या इस विपक्ष को देश हितैषी की सोंच रखी जा सकती है? इतने दिन संसद बर्बाद कर देश को रोज करोड़ों का चूना लगाने वाले देश की चिंता बिलकुल नहीं कर सकते। इन जनविरोधियों को सिर्फ प्यारी अपनी कुर्सी और तिजोरी, जनता जाए भाड़ में, यही है इनकी असलियत। घुसपैठियों को बचाने हिन्दू-मुसलमान दंगे करवाकर जनता को गुमराह करना ही विपक्ष का असली मकसद है।     
SIR का विरोध करने वाला एक भी नेता या उसकी पार्टी सामने आये और देश को बताए कि क्या अवैध रूप से किसी भी देश में जा सकते हो? यदि नहीं फिर क्यों क्यों दामादों की तरह घुसपैठियों को संरक्षण दिया जा रहा है? जो सियासत पार्टियां घुसपैठियों को अहमियत देती हो उन्हें देशवासियों की बिलकुल भी चिंता नहीं हो सकती।

   

चुनाव आयोग (ECI) ने बिहार में स्पेशल इंटेंशिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची की खास समीक्षा की। इसमें 60 लाख से ज्यादा फर्जी या अपंजीकृत मतदाता सामने आए। इस खुलासे ने भारतीय लोकतंत्र में फर्जी वोटिंग और राजनीतिक संरक्षण के जरिए वोटरों की घुसपैठ की गंभीरता को उजागर कर दिया है।

इस अभियान के दौरान जो सामने आया कि 35 लाख लोग या तो अब नहीं मिल रहे हैं या हमेशा के लिए कहीं और चले गए हैं, 22 लाख वोटर अब इस दुनिया में नहीं हैं यानी उनकी मौत हो चुकी है, 7 लाख वोटर एक से ज्यादा जगहों पर नामांकित हैं और लगभग 1.2 लाख फॉर्म अभी लंबित हैं।

चुनाव आयोग के इस कदम को लेकर विपक्षी दल, खासकर राजद (RJD) और कॉन्ग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया एक ‘साजिश’ है जिसका मकसद वोटरों, खासकर मुस्लिम समुदाय के वोटरों को बाहर करना है। उन्होंने ECI की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए और कहा कि आयोग BJP के इशारे पर काम कर रहा है।

खास बात यह है कि IIM संस्थानों के प्रोफेसरों द्वारा पहले ही एक शोध पत्र में चेतावनी दी गई थी कि बिहार में 70 लाख से अधिक फर्जी वोटर हो सकते हैं।

यह पूरी प्रक्रिया अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही। इससे देशभर में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के खिलाफ चल रहे अभियानों को भी नई ताकत मिली है। जैसे ही बिहार में फर्जी वोटरों की पहचान हुई, वैसे ही कई राज्यों में अवैध घुसपैठियों को पहचानने, हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।

इस अभियान को लेकर तथाकथित ‘धार्मिक रूप से तटस्थ’ (secular) पार्टियों में नाराजगी साफ देखी जा रही है।

ममता बनर्जी ने बीएलओ को दिलाया याद, वे चुनाव आयोग नहीं राज्य सरकार के लिए करते हैं काम

हरियाणा और अन्य BJP शासित राज्यों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई और बिहार में SIR की प्रक्रिया के बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन पर पहले भी यह आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सरकार वोट बैंक बढ़ाने के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देती है।

ममता बनर्जी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे बंगाल में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) लागू नहीं होने देंगी। हाल ही में उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों को बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में लिया जा रहा है, वे असल में बंगाली प्रवासी हैं।

इसके साथ ही उन्होंने मतदाता सूची सुधार (Summary Revision) के लिए ट्रेनिंग ले रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) को एक तरह से चेतावनी दे दी। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग सिर्फ तब सक्रिय होता है जब चुनाव की तारीखें घोषित होती हैं। उससे पहले और उसके बाद भी प्रशासन राज्य सरकार के हाथ में रहता है। आप राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, किसी को बेवजह परेशान मत कीजिए।”

बीरभूम में जुलाई में एक प्रशासनिक बैठक को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग BJP के इशारों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “मतदाता सूची गुजरात में बैठे लोग बना रहे हैं। यह काम BJP की एक एजेंसी कर रही है, मुझे उसका नाम भी पता है।”

इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर बंगाल में किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई तो छऊ नृत्य (एक आदिवासी नृत्य) होगा, ढोल और शंख की आवाज सुनाई देगी। मैं जिंदा रहते हुए ना NRC लागू होने दूँगी और ना ही डिटेंशन कैंप बनने दूँगी।”

पश्चिम बंगाल वह राज्य है, जहाँ जाली दस्तावेजों और स्थानीय मदद से रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या है सबसे अधिक

हाल ही में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर राज्य में SIR कराया गया तो लाखों फर्जी मतदाता, खासकर वे जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर नकली दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान बना चुके हैं, वे सूची से हटा दिए जाएँगे।

पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक है जहाँ सबसे अधिक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ आकर बसते हैं। पिछले तीन वर्षों में 2,688 बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और उन्हें वापस भेजा गया है।

8 अगस्त को, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार ने राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Election Officer – CEO) से एक ‘स्पष्टीकरण’ माँगा, क्योंकि उन्होंने चुनाव आयोग को यह लिखा था कि राज्य SIR के लिए ‘तैयार’ है।

पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने 293 विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की SIR वोटर लिस्ट प्रकाशित की (सिर्फ एक सीट को छोड़कर)।

बंगाल में आखिरी बार SIR वर्ष 2002 में हुआ था और उसी के आधार पर 2004 की मतदाता सूची तैयार की गई थी। अब जब 22 साल बाद फिर से SIR की संभावना है तो राज्य में राजनीति गरमा गई है।

चुनाव आयोग का काम होता है कि वह मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करे, गलतियाँ सुधारे, मृतकों के नाम हटाए और फर्जी वोटरों को चिन्हित करे, लेकिन राज्य की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार, जिसे कई लोग ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहकर मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ते हैं, इस SIR प्रक्रिया को लेकर विरोध जता रही है और इसे लेकर चुनाव आयोग को ‘याद दिला’ रही है और दबाव भी बना रही है।

पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील राज्य में मतदाता सूची में गड़बड़ी (Electoral Roll Inflation) कोई नई बात नहीं है और इसी वजह से SIR की जरूरत महसूस की जा रही है।

IIM प्रोफेसरों के शोध पत्र में आया सामने: पश्चिम बंगाल की 2024 की मतदाता सूची में 1 करोड़ अतिरिक्त मतदाता

7 अगस्त 2025 को प्रकाशित एक रिसर्च पेपर, जिसका नाम ‘Electoral Roll Inflation in West Bengal: A Demographic Reconstruction of Legitimate Voter Counts (2024)’ है,  यह दिखाता है कि पश्चिम बंगाल की 2024 की वोटर लिस्ट में लगभग 1 करोड़ फर्जी नाम हो सकते हैं। यह 13.69% का वोटर इन्फ्लेशन है।

यह रिसर्च IIM विशाखापत्तनम के डॉ. मिलन कुमार और SP जैन के डॉ. विधु शेखर ने किया है। उन्होंने सरकारी आँकड़ों जैसे कि वोटर लिस्ट, जनगणना और सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया और हर चरण पर रक्षात्मक (conservative) तरीका अपनाया, ताकि अनुमान नीचे रहे।
शोध पत्र में कहा गया है, “हम सभी पात्र युवाओं के पूर्ण पंजीकरण को मानते हैं, उच्च उत्तरजीविता संभावनाओं को लागू करते हैं, और हालिया वृद्धि के बजाय दशकीय रुझानों के आधार पर प्रवासन का मॉडल तैयार करते हैं। इससे हमें वैध मतदाता आबादी का एक निम्न-सीमा अनुमान लगाने में मदद मिलती है। फिर हम इस आँकड़े की तुलना 2024 के लिए चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित आधिकारिक मतदाता सूची से करते हैं।”
यह शोध 2024 तक पश्चिम बंगाल में वैध मतदाता आबादी के अनुभवजन्य अनुमान तीन चरणों में प्रस्तुत करता है: (i) 2004 की मतदाता सूची से बचे लोगों का अनुमान, (ii) 1986 और 2006 के बीच जन्मे नए मतदाता समूहों से जुड़ाव, और (iii) शुद्ध स्थायी प्रवास के लिए समायोजन। इसके बाद शोधकर्ताओं ने मतदाता सूची में अनुमानित अधिशेष की गणना करने के लिए परिणामों का संश्लेषण किया।
2004 की मतदाता सूची में 4.74 करोड़ पंजीकृत मतदाता दर्ज थे। शोध में इस जनसंख्या को छह आयु समूहों में विभाजित किया गया और 2001 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, आयु-विशिष्ट 20-वर्षीय उत्तरजीविता दरों का उपयोग किया गया। इन अनुमानों से 2004 की मतदाता सूची के अनुसार, अनुमानित 3.74 करोड़ जीवित मतदाता प्राप्त होते हैं।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि 2004 और 2024 के बीच लगभग 3.01 करोड़ नए पात्र व्यक्ति नामांकित होंगे।
इसके बाद, शोध ने 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके स्थायी बाहरी और आंतरिक प्रवास का अनुमान लगाया। विश्लेषण में पाया गया कि 2001 और 2011 के बीच पश्चिम बंगाल में प्रवासियों की कुल संख्या में गिरावट आई है।
2001 और 2011 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए तथा CAGR के माध्यम से अनुमान लगाते हुए शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस अवधि के दौरान पश्चिम बंगाल से कुल 17.86 लाख व्यक्तियों का स्थाई प्रवास हुआ।
विश्लेषण के अनुसार, वैध मतदाताओं की अनुमानित संख्या (2024) 6,57,06,849 है, जबकि आधिकारिक मतदाता सूची (2024) के अनुसार मतदाताओं की संख्या 7,61,24,780 है। यह अनुमानित 1,04,17,931 मतदाताओं का अधिशेष दर्शाता है, जो प्रतिशत के हिसाब से 13.69% है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर ऊँची सर्वाइवल रेट, ज्यादा पंजीकरण और धीमी माइग्रेशन रेट मानी, ताकि कम से कम फर्जीवाड़ा दिखे, फिर भी इतना बड़ा अंतर मिला। इसका मतलब है कि असल वोटर इन्फ्लेशन इससे भी ज्यादा हो सकता है।
इस रिसर्च के अनुसार, इतने ज्यादा फर्जी नाम होने से चुनावों की निष्पक्षता पर खतरा पैदा होता है, क्योंकि कई सीटों पर जीत का अंतर इससे छोटा होता है। इसका फायदा धोखाधड़ी, फर्जी वोटिंग और राजनीतिक गड़बड़ी में उठाया जा सकता है।
रिसर्च सुझाव देता है कि वोटर लिस्ट को आधार, सिविल रजिस्ट्रेशन और माइग्रेशन डेटा से जोड़ा जाए। एल्गोरिदम से ऑटोमेटिक चेकिंग हो जैसे 100 साल से ऊपर के हजारों वोटर, एक ही व्यक्ति के कई रजिस्ट्रेशन आदि और हर तीन महीने में जनसांख्यिकीय ऑडिट हो।
पश्चिम बंगाल और ऐसे राज्य जहाँ पिछले कई सालों से SIR नहीं हुई है, वहाँ घर-घर जाकर वोटर वेरिफिकेशन होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में 2024 में 13.69% यानी 1 करोड़ से ज्यादा फर्जी नाम हो सकते हैं। यह चुनाव की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है और जरूरी है कि सरकार व चुनाव आयोग इस पर तुरंत और सख्त कदम उठाए।

क्यों SIR का विरोध कर रहीं हैं मुख्यमंत्री ममता? पश्चिम बंगाल में जोड़े जा रहे थे फर्जी वोटर, चुनाव आयोग ने सैंपल चेकिंग में पकड़ी गड़बड़ी: जाँच के आदेश; SIR से ज्यादा फायदा वामपंथियों को होगा

                                                                                                                         साभार: द स्टेट्समैन
बिहार में SIR लागू कर चुनाव आयोग ने उस Pandora Box को खोल विपक्ष में खलबली मचना लाजमी है। जिन बोगस वोटरों के आधार पर जो पार्टियों ने अपनी दादागिरी दिखाई जा रही थी, वो सब मिट्टी में मिलते देख बिलबिला रहे हैं। बिहार में बोगस और घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट में मिलने ने ममता बनर्जी की भी नींद हराम कर दी है। 

बंगाल में SIR होने से जितना फायदा वामपंथियों और बीजेपी को होगा उससे ज्यादा नुकसान ममता की तृणमूल और कांग्रेस को होने वाला है। इसीलिए ममता बंगाल में SIR नहीं करने की धमकी देनी दे रही है। चर्चा यह है कि बिहार से कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में बोगस और घुसपैठियों के नाम बाहर होंगे। इस मुद्दे पर वामपंथियों को चुनाव आयोग का साथ देना चाहिए, क्योकि बंगाल में SIR होने से चुनाव में बीजेपी से कहीं ज्यादा वामपंथियों को होने वाला है। वामपंथियों को कांग्रेस के चुंगल में फंसने की बजाए अपनी पार्टी के हित और फिर से सत्ता की दौड़ से पीछे नहीं हटना चाहिए।      

पश्चिम बंगाल में वोटरलिस्ट में बड़ा फर्जीवाड़ा चुनाव आयोग ने पकड़ा है। यहाँ चुनाव आयोग ने पाया है कि बड़ी मात्रा में फर्जी वोटर फॉर्म को स्थानीय अधिकारी जमा कर रहे थे। यह काम बंगाल के कुछ जिलों में हो रहा था। दो अधिकारियों ने यह माना भी है कि उन्होंने बड़ी संख्या में फर्जी फॉर्म भी जमा किए।

पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 28 जुलाई, 2025 को सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को संबोधित एक पत्र में लिखा, “निरंतर अपडेशन के दौरान ERO द्वारा 1% से कम फॉर्म 6 निपटान की सैंपल जाँच में सामने आया है कि कि दो लोगों ने फर्जी मतदाताओं के लिए काफी संख्या में फॉर्म 6 स्वीकार किए थे।”

चुनाव आयोग ने बताया कि इन दो ERO अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने से निचले अधिकारियों को चुनाव आयोग पोर्टल का एक्सेस दिया था। यहाँ ERO.net पोर्टल पर ‘डाटा एंट्री ऑपरेटरों’ ने फॉर्म 6 के आवेदन निपटा दिए।

भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल के राष्ट्रीय संयोजक अमित मालवीय ने एक्स पर ट्वीट करते हुए कहा है,”ममता बनर्जी द्वारा बूथ लेवल अधिकारियों को खुलेआम धमकी देने और उन्हें भारत के चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन न करने के लिए कहने के कुछ ही दिनों बाद, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने नियमित मतदाता सूची जाँच और नमूना सर्वेक्षणों के दौरान गंभीर अनियमितताओं को चिन्हित किया है।”

और भी गंभीर बात यह है कि इन मामलों में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से फॉर्म की सत्यापन प्रक्रिया को बिना किसी जरूरी कारण के हटा दिया गया। एक जैसे दस्तावेज कई फॉर्मों में इस्तेमाल किए गए और उनकी जाँच रिपोर्ट भी एक जैसी दिखाई दी।

इस गंभीर गड़बड़ी को देखते हुए CEO ने तत्काल जाँच के आदेश दिए हैं। सभी DEOs को निर्देश दिया गया है कि वे वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम बनाकर पिछले एक साल में निपटाए गए सभी फॉर्म 6 की सैंपल जाँच करें। यह रिपोर्ट 14 अगस्त 2025 तक अनिवार्य रूप से CEO को भेजनी होगी।

CEO ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट जाँच पर हो रही बात

राज्य चुनाव आयोग की वेबसाइट पर स्पेशल इन्टेंशिव रीवीजन (SIR) 2002 के डेटा के प्रकाशन के साथ ही राज्य में मतदाता सूची की समीक्षा की अटकलें तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राज्य चुनाव आयोग मतदाता सूची को अपडेट कर सकता है।

बिहार में चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया करवाई है। यहाँ अक्टूबर-नवंबर 2025 में विधानसभा चुनाव होने हैं। राजद, कॉन्ग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने दावा किया है कि यह मतदाता सूची के बहाने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को गुपचुप तरीके से लागू करने की कोशिश है।

TMC सांसद महुआ मोइत्रा समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि यह मतदाता सूची को अपडेट करने की नियमित प्रक्रिया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को यह करने का पूरा अधिकार है।

बिहार में SIR के बाद करीब 65 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। इससे पहले 21 जुलाई 2025 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अपने राज्य में SIR प्रक्रिया नहीं होने देंगी।

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में फर्जी मतदाताओं को लेकर जताई चिंता

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में आरोप लगाया था कि बांग्लादेश से सटी पश्चिम बंगाल की सीमावर्ती जिलों में मतदाता आवेदन की संख्या में अचानक तेजी आई है। उनका कहना है कि यह बढ़ोतरी राज्य प्रशासन द्वारा जिला अधिकारियों को डोमिसाइल (स्थायी निवास) प्रमाणपत्र जारी करने के निर्देश देने के बाद देखने को मिली है।

सुवेंदु अधिकारी ने चुनाव आयोग (ECI) को पत्र लिखकर माँग की है कि अगर 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में कोई विशेष पुनरीक्षण (SIR) किया जाता है, तो 25 जुलाई 2025 या उसके बाद जारी किए गए डोमिसाइल प्रमाणपत्रों को मान्य नहीं माना जाए।

बीजेपी लंबे समय से पश्चिम बंगाल में फर्जी और डुप्लिकेट वोटरों का मुद्दा उठाती रही है। फरवरी 2024 में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी के छह सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) से मिला और 16 लाख फर्जी या दोहरे वोटरों की शिकायत की। उन्होंने चुनाव आयोग से तुरंत कार्रवाई की माँग की।

इसके अलावा, दिसंबर 2023 में झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों का मुद्दा उठाया था और केंद्र सरकार से जल्द से जल्द राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) लागू करने की माँग की थी।

‘बंगाली बोलने के कारण महिला और उसके बच्चे का उत्पीड़न’: दिल्ली पुलिस ने ममता बनर्जी का ‘फैक्ट’ किया दुरुस्त, बताया कैसे बीबी सजनूर ने गढ़ी झूठी कहानी

                                                               साभार- ममता बनर्जी के फेसबुक से
पश्चिम बंगाल के मालदा से दिल्ली के गीता कॉलोनी में रहने आए एक बंगाली प्रवासी परिवार ने सोशल मीडिया पर लाइक्स और चर्चा में आने के लिए एक ऐसा वीडियो बनाया जिसके कारण राजनीतिक उठापटक मच गई। इसके बाद पुलिस जाँच हुई तो मामले की सच्चाई सामने आ गई।

शनिवार (26 जुलाई 2025) को एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें मुख्तार खान अपने छोटे से बच्चे के कान और चेहरे के साथ अपनी पत्नी सजनूर बीबी के चेहरे को भी दिखलाकर बंगाली भाषा में यह कहता नजर आ रहा है कि उन दोनों के साथ मारपीट की गई है और साधारण कपड़ों में आए कुछ पुलिस वालों ने उनसे 25,000 रुपए भी वसूले हैं। वीडियो में जीपीएस ट्रैक में लिखा है कि यह वीडियो नई दिल्ली के गीता कॉलोनी में बनाया गया है।

ममता ने लपका मौका

 सोशल मीडिया में वायरल होते ही पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधने का मौका नहीं छोड़ा। 27 जुलाई 2025 को वीडियो को साझा करते हुए ममता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “भयानक, बेहद भयावह! देखिए मालदा के चंचल से दिल्ली आए एक प्रवासी परिवार के बच्चे और उसकी माँ को दिल्ली पुलिस ने कितनी बुरी तरह से मारा है।”

ममता बनर्जी ने आगे लिखा, “देखिए किस तरह बच्चों तक को हिंसा की क्रूरता से बक्शा नहीं जा रहा है। भाषाई आतंक के दौर में बीजेपी ने देश के बंगालियों के खिलाफ हिंसा शुरू कर दी है। हमारा देश किस दिशा में जा रहा है?”

पुलिस ने की पड़ताल

टीएमसी सुप्रीमो के इस ट्वीट के बाद पूर्वी दिल्ली के डीसीपी अभिषेक धनिया ने इस मामले की पूरी पड़ताल करवाई। सीसीटीवी फुटेज और परिवार से कड़ाई से पूछताछ की। पूरी जाँच के बाद डीसीपी ने अपना बयान जारी किया।

उन्होंने बताया कि यह पूरा मामला ही झूठा था और महिला ने मालदा जिले में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के कहने पर भी झूठा वीडियो बनाया था। यह रिश्तेदार एक राजनीतिक कार्यकर्ता है जिसने जानबूझकर इस तरह का वीडियो बनवाया जिससे वह किसी तरह का राजनीतिक लाभ उठा सके।

डीसीपी अभिषेक ने कहा, “पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने ‘X’ पर एक पोस्ट किया, जिसमें कहा गया कि दिल्ली पुलिस ने एक बंगाली भाषी महिला और उसके बच्चे के साथ मारपीट की। जानकारी मिलते ही हमने जाँच शुरू की और पता चला कि महिला का नाम सजनूर बीबी है। वह अपने पति मुख्तार खान और दो बच्चों के साथ पश्चिम विनोद नगर के मजबूर नगर में रहती है। पूछताछ के दौरान उसने बताया कि 26 जुलाई की रात लगभग 10:30 बजे चार पुलिसकर्मी सिविल ड्रेस में उनके घर आए और उन्हें एक सुनसान जगह ले जाकर पीटा, साथ ही ₹25,000 की माँग की, जो उन्होंने बाद में दे दिए।”

डीसीपी ने आगे कहा, “मामले की गंभीरता को देखते हुए हमने कई टीमें गठित कीं। तकनीकी और स्थानीय इंटेलिजेंस के साथ-साथ सीसीटीवी फुटेज के आधार पर हमने कई सबूत इकट्ठा किए। उन सबूतों के आधार पर हमें यह ज्ञात हुआ कि महिला द्वारा बताई गई पूरी कहानी निराधार है। महिला अपनी मर्जी से दोपहर 12:03 बजे दोनों बच्चों के साथ घर से निकली। उसके साथ किसी के भी होने की बात CCTV फुटेज में सामने नहीं आई।”

डीसीपी अभिषेक ने बताया कि पूछताछ में महिला ने यह भी बताया कि वह रास्ता भटक गई थी। किसी स्थानीय की मदद से उसने अपने मामा को फोन किया। वह पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में रहता है और एक राजनीतिक कार्यकर्ता है। उसके कहने पर ही उसने यह झूठा वीडियो बनाया और उसे भेजा, जिसे बाद में स्थानीय मीडिया में प्रसारित किया गया।

डीसीपी ने कहा, “गहन जाँच और पूछताछ के बाद ये बात सामने आई है कि पूरा वीडियो झूठा और मनगढ़ंत है। इस वीडियो को जानबूझकर सोशल मीडिया पर फैलाया गया ताकि दिल्ली पुलिस की छवि को नुकसान पहुँचाया जा सके। आगे की जाँच अभी भी जारी है।”

यूजर्स ने भी ममता ‘दीदी’ को लताड़ा

पुलिस के बयान के बाद एक्स पर कई यूजर्स ने TMC सुप्रीमो और कोलकाता पुलिस को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। एक यूजर ने कहा कि कोलकाता पुलिस ने फेक न्यूज़ फैलाने के एवज में ममता बनर्जी का अकाउंट सस्पेंड नहीं किया, उन्हें कोई नोटिस जारी नहीं किया। लेकिन इसी जगह कोई दूसरा होता तो उसका अकाउंट अब तक बंद हो चुका होता। समानता सभी नागरिकों के लिए एक जैसी होनी चाहिए। जय हिंद।

एक अन्य यूजर ने दिल्ली पुलिस के लिए लिखा कि दिल्ली पुलिस को निराधार आरोप लगाने के लिए ममता बनर्जी पर मुकदमा करना चाहिए। एक यूजर ने लिखा, “हम सभी को पता है कि अब चुनाव होने वाले हैं तो बंगाल की ओर से इस तरह के अनगिनत ड्रामा देखने को मिलेंगे।”

बंगाल : खेला होबे, संदेशखाली, मुर्शिदाबाद… वैचारिक विष्ठा करने से पहले सब भूल गईं सागरिका जी, बंगाल-हिंदुओं के लिए ‘M-O-D-I सिंड्रोम यानी Misinformation, Opacity, Distractions, and Incompetence या T-R-A-G-E-D-Y’ सिंड्रोम है TMC

      टीएमसी सांसद सागरिका घोष (बाएँ), पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी (दाएँ), (साभार : FB_sagarikaghose & PTI)
सागरिका घोष ने ‘द प्रिंट’ पर मोदी सरकार की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा है, जिसमें सागरिका घोष ने 11 साल में हुई ‘दुर्घटनाओं’ और प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी सरकार को घेरा है। आइए जानते हैं कि सागरिका घोष की बातों में कितनी सच्चाई है।

सागरिका घोष का ‘सच’ और हकीकत: दीदी के चश्मे से देश देखना

सागरिका घोष अपने लेख में मोदी सरकार पर ‘सत्यमेव जयते’ का सम्मान न करने और केवल ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ पर ध्यान देने का आरोप लगा रही हैं। सागरिका घोष M-O-D-I सिंड्रोम यानी Misinformation, Opacity, Distractions, and Incompetence (गलत सूचना, अस्पष्टता, भटकाव और अक्षमता) का जिक्र कर रही हैं।

लेकिन, सागरिका घोष की अपनी बातों में ही कितनी सच्चाई है, यह हमें देखना होगा। लगता है सागरिका जी को अपनी ‘दीदी’ यानी ममता बनर्जी को छोड़कर कोई और काम करता हुआ पसंद ही नहीं आता।

M-O-D-I सिंड्रोम या टीएमसी का ‘T-R-A-G-E-D-Y’ सिंड्रोम?

सागरिका घोष मोदी सरकार को M-O-D-I सिंड्रोम (Misinformation, Opacity, Distractions, and Incompetence) का शिकार बता रही हैं। लेकिन, अगर हम पश्चिम बंगाल में उनकी ही पार्टी TMC के राज को देखें, तो हमें एक नया और अधिक भयावह सिंड्रोम दिखाई देता है, जो T-R-A-G-E-D-Y (त्रासदी) है।

  • T (Terror) आतंक का राज- पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के शासनकाल से भी कई गुना ज्यादा अत्याचार TMC के राज में हो रहा है। हिंदुओं की जान की दुश्मन बनी हुई है TMC सरकार। हिंदुओं के घरों पर बम फेंके जाते हैं, पत्थर बरसाए जाते हैं, आग लगाई जाती है। महिलाओं के साथ दुष्कर्म और पुरुषों को मार डालने, उनके प्राइवेट पार्ट देखने जैसी घिनौनी हरकतें आम हैं। मालदा और मुर्शिदाबाद में हिंदुओं को अपने घर छोड़ने पर मजबूर किया गया, राज्यपाल सीवी आनंद बोस को पीड़ितों से मिलने जाना पड़ा। वहीं, संदेशखाली में TMC के गुंडे महिलाओं के साथ रेप-गैंगरेप की घटनाओं को अंजाम देते और टीएमसी महिलाओं को भी हवस का शिकार बनाते। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की टीमें भी पीड़ितों से मिलीं, जिन्होंने डर और उत्पीड़न की भयावह कहानियाँ सुनाईं।
  • R (Riot) सुनियोजित दंगे– रामनवमी पर हुई हिंसा सुनियोजित थी, जैसा कि पटना हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस नरसिम्हा रेड्डी की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया। पुलिस ने खुद पीड़ितों से मिलने जा रही टीम को रोका, यह दिखाता है कि सरकार क्या छुपाना चाहती थी। हावड़ा और बाँकुड़ा में हिंदुओं के जुलूस पर हमला हुआ और उलटा हिंदुओं को ही गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि मुहर्रम के जुलूस में ऐसी हिम्मत नहीं दिखाई जाती।
  • A (Anarchy) अराजकता और कानून का अभाव- 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा हुई। टीएमसी के गुंडों ने भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर हमले किए, उनकी हत्याएँ कीं। हजारों लोग डर के मारे अपने घर छोड़कर भाग गए, जिनमें से कई आज भी विस्थापित हैं। जॉय प्रकाश यादव, कुश खेत्रपाल और अभिजीत सरकार जैसे भाजपा कार्यकर्ताओं की बर्बर हत्याएँ हुईं, जिन पर सागरिका घोष जैसे पत्रकारों की चुप्पी सवाल खड़ा करती है। अभिजीत सरकार की हत्या तो फेसबुक लाइव पर हुई थी। TMC के गुंडों ने परिवारों को जान से मारने की धमकी दी, और मुख्य आरोपित खुले घूम रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी TMC कार्यकर्ताओं के जरिए एक हिंदू परिवार पर हमला करने के मामले में उनकी जमानत रद्द करते हुए इसे ‘लोकतंत्र पर गंभीर हमला’ बताया था।
  • G (Grooming Jihad) धर्मांतरण का खतरा– सागरिका घोष ने खुद ग्रूमिंग जिहाद के खतरे को ‘मानसिक उन्माद’ यानि पागलपन कहकर खारिज कर दिया, जबकि यह हिंदू परिवारों के लिए एक गंभीर खतरा है। यह दिखाता है कि सागरिका घोष सच्चाई को कैसे तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं और पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं।
  • E (Electoral Violence) चुनावी हिंसा का नंगा नाच- चुनावों के बाद TMC की जीत के नशे में चूर गुंडों ने भाजपा समर्थकों को निशाना बनाया, उनके घरों पर हमला किया और उन्हें उजाड़ दिया। यहाँ तक कि केंद्रीय योजनाओं का लाभ भी भाजपा समर्थकों को नहीं मिलता है।
  • D (Demographic Change) जनसंख्या असंतुलन का खेल- पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठियों को जानबूझकर बसाया जा रहा है, रोहिंग्या मुस्लिमों को आधार कार्ड और घर दिए जा रहे हैं। यह सब वोट बैंक की राजनीति के लिए किया जा रहा है, जिसका सीधा असर राज्य की Demographic पर पड़ रहा है और हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं।
  • Y (Yield to Lies) झूठ के आगे घुटने टेकना- पश्चिम बंगाल की फिल्म इंडस्ट्री को TMC ने पूरी तरह से कंट्रोल कर रखा है। जो सरकार की तारीफ करता है उसे काम मिलता है, विरोधियों को बाहर कर दिया जाता है। भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने खुद बताया है कि कैसे उन्हें काम नहीं मिलता क्योंकि वह भाजपा में हैं। राष्ट्रीय मीडिया में पश्चिम बंगाल की हिंसा को उस स्तर की कवरेज नहीं मिलती, क्योंकि TMC सरकार सच्चाई को दबाने का काम करती है।

    दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं पर बचकानी सोच

सागरिका घोष ने अहमदाबाद विमान दुर्घटना, ट्रेन पटरी से उतरने और कुंभ मेले में भगदड़ जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। सागरिका घोष का यह तर्क कि ऐसी दुर्घटनाएँ और प्राकृतिक आपदाएँ (जैसे कोविड-19 से हुई मौतें) सीधे सरकार की ‘खामियाँ’ हैं, पूरी तरह से बेतुका और बचकाना है।
क्या किसी सरकार का कंट्रोल विमान दुर्घटनाओं या कुंभ जैसे बड़े आयोजनों में होने वाली भगदड़ पर हो सकता है, जब लाखों लोग एक साथ आते हैं? ऐसी घटनाएँ दुनिया भर में होती हैं और अक्सर नियति और अप्रत्याशित परिस्थितियों के अधीन होती हैं।
यह तो भगवान की माया और नियति का खेल है, जिसे किसी भी सरकार के पाले में डालना नासमझी और बचकानापन है। यदि सागरिका जी यह मानती हैं कि उनकी ‘ममता दीदी’ के राज में ऐसी दुर्घटनाएँ नहीं होतीं या प्राकृतिक आपदाएँ नहीं आतीं, तो यह उनकी संकीर्ण सोच का प्रमाण है।

कोविड-19 के आँकड़ों पर आरोप

कोविड-19 से हुई मौतों के आँकड़ों को लेकर भी सागरिका घोष ने सवाल उठाए हैं। यह सच है कि वैश्विक महामारी के दौरान आँकड़ों को लेकर बहस हुई है, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि ऐसी अभूतपूर्व स्थिति में सटीक आँकड़ों का संग्रह एक जटिल चुनौती थी।
सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए हर संभव प्रयास किया, और दुनिया के कई देशों में भी ऐसे ही आँकड़े सामने आए थे, जो बाद में संशोधित हुए। क्या वह यह कहना चाह रही हैं कि दुनिया की किसी भी सरकार ने कोविड से हुई मौतों के सही आँकड़े नहीं दिए?

क्या सागरिका घोष ममता दीदी को भारत का पीएम बनाने का सपना देख रही हैं?

सागरिका घोष को तृणमूल कॉन्ग्रेस ने राज्यसभा भेजा है। उनके पति राजदीप सरदेसाई को ‘रसगुल्ला पत्रकारिता’ के लिए जाना जाता है, जिन्होंने ममता बनर्जी से पश्चिम बंगाल की हिंसा पर कभी कड़े सवाल नहीं पूछे, ताकि उनके ‘चाय पर चर्चा’ में ‘रसगुल्ले’ मिलते रहें। यह सब देखकर तो यही लगता है कि सागरिका घोष ममता दीदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाने का ख्वाब देख रही हैं।
लेकिन, क्या उन्हें यह नहीं दिखता कि जिस ममता दीदी के राज में हिंदुओं का अस्तित्व खतरे में है, महिलाएँ असुरक्षित हैं, और पूरी कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, वह भारत को कैसे चला सकती हैं? क्या उनका सपना भारत को एक इस्लामी मुल्क बनाने का है, जहाँ हिंदुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाए?
जिस सरकार के राज में रामनवमी के जुलूस पर पत्थरबाजी होती है, धर्मांतरण के खतरे को ‘मानसिक उन्माद’ यानि पागलपन बताया जाता है, और अपने ही नागरिकों को घर छोड़ने पर मजबूर किया जाता है, क्या ऐसी सरकार देश को आगे ले जा सकती है?

आईना देखना जरूरी है

सागरिका घोष मोदी सरकार पर ‘झूठ’ बोलने और ‘जवाबदेही से बचने’ का आरोप लगा रही हैं। लेकिन, उन्हें सबसे पहले कहीं और झांकना होगा। जिस पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा है, वह पश्चिम बंगाल में अराजकता, हिंसा और तुष्टिकरण का प्रतीक बन चुकी है।
भारत में मोदी सरकार ने विकास के कई आयाम गढ़े हैं, चाहे वह सड़कें हों, एयर पोर्ट हों या डिजिटल इंडिया का सपना। हाँ, कोई भी सरकार पूर्ण नहीं होती और गलतियाँ भी होती हैं, लेकिन उन्हें ऐसे पेश करना जैसे हर आपदा और दुर्घटना के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार है, यह निराधार और राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है।
भारत की जनता मोदी के कामकाज से प्रेरित होकर उन्हें वोट देती है, जबकि ममता दीदी दादागिरी करके वोट छीनती हैं।
सागरिका घोष जी, आपको यह समझना होगा कि पत्रकारिता का धर्म सच्चाई दिखाना होता है, न कि किसी विशेष राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना। अगर आपको ‘M-O-D-I सिंड्रोम’ दिखाई देता है, तो अपनी ही पार्टी के ‘T-R-A-G-E-D-Y सिंड्रोम’ पर भी नजर डालनी चाहिए।

‘अगर CM योगी बंगाल आए तो वापस नहीं जाने देंगे’: ज्ञानवापी में पूजा पर TMC मंत्री सिद्दीकुल्लाह

                                                                                                     साभार: : Bharatabharati.com 
वाराणसी के जिला कोर्ट द्वारा हिंदुओं को व्यास तहखाने में पूजा का अधिकार मिला तो कई लोग नाराज हो गए। इस लिस्ट में ममता बनर्जी के मंत्री सिद्दीकुल्लाह चौधरी का भी नाम है। उन्होंने हाल में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धमकी दी है।

धमकी देने से पहले ममता बनर्जी के मंत्री सिद्दीकुल्लाह चौधरी यह भूल गए कि योगी-मोदी-अमित की त्रिमूर्ति खतरों के खिलाडी एवं जख्मी शेर है, जो इन गीदड़ धमकियों से कभी नहीं डरे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'शेर'योगी बंगाल जरूर जाएगा और उसकी दहाड़ से सिद्दीकुल्लाह की नींद हराम हो जाएगी। जब नरेंद्र मोदी को मुरली मनोहर जोशी के साथ जाकर लाल चौक पर तिरंगा फहराने पर इसी मोदी(तब प्रधानमंत्री थे) को आतंकवादियों ने नहीं आने के लिए धमकाया था, लेकिन मोदी ने कहा था "मैं आ रहा हूँ।' गए और जीवित वापस आये और आज उसी मोदी को भारत का जीवट प्रधानमंत्री बना है। सिद्दीकुल्लाह क्या कभी योगी ने किसी मुसलमान को नमाज या ईद मनाने से रोका? जो तुम एक योगी को अपना धर्म मानने पर धमकी दे रहे हो। 

सिद्दीकुल्लाह वही व्यक्ति हैं जिन्होंने सितंबर 2018 में कुरान को संविधान से ऊपर बताते हुए तीन तलाक पर लगे प्रतिबंध के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की थी। इसके अलावा वह ममता बनर्जी के उस कमेटी का भी हिस्सा थे जो टीएमसी ने सागरदिघि में करारी हार के बाद बनाई गई थी। इस कमेटी का उद्देश्य यही पता लगाना था कि जब ममता सरकार मुस्लिमों के लिए इतनी स्कीमें चला रही है तो फिर उन्हें वोट क्यों नहीं मिला।

सिद्दीकुल्लाह ने एक रैली में कहा कि अगर सीएम योगी बंगाल आए तो वो लोग उनका घेराव करेंगे और उनको वापस नहीं जाने देंगे। तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता ने यूपी सीएम को धमकी देने के साथ माँग की है कि ज्ञानवापी में हिंदुओं को पूजा न करने दिया जाए।

उन्होंने कहा, “कोर्ट की मदद से ये लोग जबरदस्ती मस्जिद में पूजा कर रहे है। उनको (योगी आदित्यनाथ) अकल है या नहीं? अगर वो बंगाल आए तो हमारा संगठन उन्हें घेरेगा और उन्हें बंगाल से जाने नहीं दिया जाएगा। हमें ज्ञानवापी खाली चाहिए। हम तो किसी मंदिर में नहीं जाते इबादत करने। तो हमारी मस्जिदों में क्यों आ रहे हैं। मस्जिद तो मस्जिद है। ज्ञानवापी मस्जिद को खाली करें तुरंत।”

बंगाल में सिद्दीकुल्लाह ने यह बयान जमीयत उलेमा-ए-हिंद की एक सभा में दिया और कहा कि ज्ञानवापी मस्जिद वहाँ पर 800 सालों से है वो कैसे उसे ध्वस्त कर सकते है।

ममता बनर्जी के मंत्री सिद्दीकुल्लाह के हिंदूविरोधी बयान

पहली बार ममता बनर्जी के मंत्री ने इस तरह हिंदूविरोधी बयान नहीं दिया। 2021 में इसी मंत्री ने कहा था बंगाल में गायों को कटने से कोई नहीं रोक सकता। टीएमसी मंत्री ने कहा था, “उत्तर प्रदेश सीएम योगी आदित्यनाथ यहाँ आए और कह गए कि अगर उनकी सरकार आई तो गौकशी नहीं होगी।”
इस पर उन्होंने कहा था, “गौकशी बंगाल में 1000-1200 सालों से होती आई है। हर कोई बीफ खाता है। मुस्लिम और अन्य भी। बीफ का वोट से क्या लेना देना। ये हिंदूवादी मानसिकता को बढ़ाने का प्रयास कर सकती है।” उन्होंने राम मंदिर फैसले पर भी कहा था कि इससे पीएम मोदी की छवि खराब होगी।

बंगाल में ओबीसी लिस्ट में बड़ी गड़बड़ी! ममता का मुस्लिम प्रेम, आरक्षण का लाभ रोहिंग्या उठा रहे

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार ने ओबीसी आरक्षण के नाम पर बड़े घोटाले को अंजाम दिया है। वोट बैंक के लिए बांग्लादेशी मुसलमानों और रोहिंग्याओं को पश्चिम बंगाल में बसाने के साथ ही अब उन्होंने आरक्षण के नाम पर पिछड़ी जाति को इस्लाम में धर्मांतरित करने का घिनौना काम भी किया है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने देशभर में ओबीसी आरक्षण की समीक्षा करना शुरू किया है। इस समीक्षा में यह देखना है कि देशभर में ओबीसी वर्ग को दिए जाने वाले संवैधानिक अधिकार को पूरी तरह पालन किया जा रहा है या नहीं। इस जांच के क्रम में पिछड़ा वर्ग आयोग ने 25 फरवरी 2023 को बंगाल के अधिकारियों के साथ बैठक की। इसमें चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। समीक्षा और जांच के दौरान आयोग को पता चला कि बंगाल में कुल 179 जातियां ओबीसी में हैं। 179 ओबीसी जातियों की पूरी सूची जब केंद्रीय ओबीसी आयोग ने देखा तो पता चला कि सूबे में कुल 118 जातियां मुस्लिम ओबीसी से हैं जबकि लिस्ट में हिंदू ओबीसी की संख्या महज 61 है।

मुस्लिम जातियों को ओबीसी दर्जा देने के पीछे मुस्लिम तुष्टिकरण!
पश्चिम बंगाल में राज्य सूची के तहत ओबीसी का दर्जा देने में व्यापक गड़बड़ी का आरोप सरकार पर लगा है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) के अध्यक्ष हंसराज अहीर ने कहा कि बंगाल राज्य सूची में 179 ओबीसी समूहों में से 118 मुस्लिम समुदाय के हैं। उन्होंने कहा कि बंगाल की ओबीसी सूची में बांग्लादेशी प्रवासियों और कुछ रोहिंग्याओं को शामिल किए जाने की भी शिकायतें मिली हैं। एनसीबीसी मामले की जांच कर रहा है और राज्य से समस्या का समाधान करने को कहा है। एनसीबीसी प्रमुख ने कहा कि इतनी सारी मुस्लिम जातियों को ओबीसी का दर्जा देने के पीछे तुष्टिकरण की राजनीति है।

मुसलमानों को ज्यादा लाभ दे रहीं ममता बनर्जी
एनसीबीसी के अध्यक्ष ने कहा कि बंगाल में ओबीसी समुदायों को श्रेणी ए और बी में विभाजित किया गया है। श्रेणी ए में अधिक संख्या में पिछड़ी जातियां सूचीबद्ध हैं, जिनमें से 90 प्रतिशत मुस्लिम जातियां हैं। उन्होंने दावा किया कि श्रेणी बी में जिसका लाभ कम है उसमें 54 प्रतिशत हिंदू जातियां हैं।

ममता ने कर दी मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी हदें पार कर
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य में अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी हदे पार कर गई हैं। मुस्लिमों को तमाम सुविधाएं देने के साथ ही हिंदुओं के खिलाफ कई ऐसे कदम उठाई है, जिनसे लगता है कि वे पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश बनाने पर तुली हुई हैं। ममता बनर्जी की वोट बैंक की राजनीति के कारण बंगाल के कई इलाके मुस्लिम बहुल हो गए हैं। राज्य में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या एक करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है। अवैध घुसपैठ ने राज्य की जनसंख्या का समीकरण बदल दिया है। उन्हें सियासत के चक्कर में देश में वोटर कार्ड, राशन कार्ड जैसी सुविधाएं मुहैया करवा दी जाती हैं और इसी आधार पर वे देश की आबादी से जुड़ जाते हैं।

2011 के बाद लिस्ट में 65 मुस्लिम जातियां जोड़ी गई
मेडिकल कॉलेजों में श्रेणी ए के तहत 91.5 प्रतिशत मुस्लिम और 8.5 प्रतिशत हिंदू पाए गए। 2011 तक, बंगाल में कुल ओबीसी जातियां 108 थीं, जिनमें से 53 मुस्लिम समुदाय थीं और 55 हिंदू थीं। लेकिन 2011 के बाद, ओबीसी सूची में कुल जातियों की संख्या बढ़कर 179 हो गई, और नए 71 जुड़ने वालों में 65 मुस्लिम जातियां और छह हिंदू जातियां शामिल थीं।

2011 के बाद 70 प्रतिशत हिंदू आबादी से 6 और 26 प्रतिशत मुस्लिम आबादी से 65 ओबीसी जातियां जोड़ी गई
पश्चिम बंगाल की कुल जनसंख्या में हिंदुओं की कुल आबादी 70.5 प्रतिशत है जबकि कुल आबादी के 27 प्रतिशत मुस्लिम बंगाल में रहते हैं। लेकिन 2011 के बाद राज्य के ओबीसी जातियों की सूची में भारी बदलाव आया और इसमें ओबीसी अतिरिक्त जातियों के 71 जातियों को जोड़ा गया जिसमें से 65 ओबीसी जातियां मुस्लिम समाज से जोड़ी गई जबकि मात्र 6 ओबीसी जातियां ही हिंदू समाज की जोड़ी गई। साल 2011 के पहले बंगाल में महज 108 जातियां ही पिछड़ी जाति के दायरे में आती थी जिसमें 53 मुस्लिम वर्ग के ओबीसी और 55 हिंदू ओबीसी वर्ग से आती थी।

सरकार ने कहा- हिंदू लोगों ने इस्लाम धर्म अपना लिया
सरकार संचालित सांस्कृतिक शोध संस्थान की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बंगाल में बड़ी संख्या में हिंदू लोगों ने इस्लाम धर्म अपना लिया है। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग के सामने बंगाल पिछड़ा आयोग ने तर्क दिया कि बंगाल में ओबीसी कैटेगरी में फायदा उठाने वाले अधिकांश मुस्लिम ओबीसी हिंदू से ही मुस्लिम बने हैं। इस बाबत हंसराज आयोग का कहना है कि उन्होंने तर्क दिया है लेकिन साक्ष्य नहीं दिया। केंद्रीय पिछड़ा आयोग का कहना है कि बंगाल ओबीसी वर्ग में बांग्लादेशी घुसपैठियों और उनके आश्रितों को लाकर मिक्स किया गया है।

बंगाल में ओबीसी की A कैटेगरी में 73 जातियां मुस्लिम, मात्र 8 जातियां हिंदू
बंगाल में ओबीसी को 2 कैटेगरी में बांटा गया है। जिसमें से A कैटेगरी के अति पिछड़ा वर्ग में 81 जातियों में से 73 जातियां मुस्लिम ओबीसी हैं जबकि मात्र 8 जातियां ही हिंदू ओबीसी वर्ग की हैं। वहीं ओबीसी वर्ग के हैं B कैटेगरी बैकवर्ड कम्युनिटी के 98 जातियों में से 45 मुस्लिम ओबीसी हैं 53 हिंदू ओबीसी वर्ग के लोग आते हैं।

राज्य सरकार की नौकरियों में 91.5 प्रतिशत लाभ मुस्लिम ओबीसी को
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का कहना है कि उसने जांच में ये पाया है कि राज्य सरकार की नौकरियों में भर्ती में A कैटेगरी के ओबीसी वर्ग के नियुक्ति में 91.5 प्रतिशत लाभ मुस्लिम ओबीसी को मिला है जबकि हिन्दू ओबीसी को मात्र 8.5 प्रतिशत ही फायदा मिल पा रहा है। वहीं B कैटेगरी वर्ग के ओबीसी को भर्ती में मिलने वाले फायदों में 54 प्रतिशत हिंदू ओबीसी थे और 45.9 प्रतिशत मुस्लिम ओबीसी जातियों के लोगों को फायदा हुआ है।

बंगाल ओबीसी सूची गलत, ओबीसी जनता के साथ अन्याय
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का मानना है कि तुष्टिकरण की नीति के कारण जानबूझकर बंगाल में ये सब काम किया गया है। जहां कुल आबादी के 34 प्रतिशत ओबीसी हैं। आयोग का कहना है कि बंगाल के मेडिकल कॉलेज में 90 प्रतिशत मेडिकल स्टूडेंट मुस्लिम ओबीसी कैटेगरी के हैं। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने बंगाल सरकार और राज्य पिछड़ा आयोग को कहा है कि राज्य की ओबीसी सूची गलत बना है जो असली ओबीसी जनता के साथ अन्याय है। आयोग ने पश्चिम बंगाल सरकार को आदेश दिया है जल्द से जल्द राज्य की पिछड़ा वर्ग की सूची को दुरुस्त किया जाए। इस क्रम में पश्चिम बंगाल सरकार से पिछले 12/13 सालों का रिक्रूटमेंट डिटेल मांगा है।

आरक्षण का लाभ रोहिंग्या उठा रहे
बंगाल में पिछड़े वर्ग के लोगों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। पिछड़े वर्ग के लोगों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ रोहिंग्या मुसलमान उठा रहे हैं। जब इस पर बंगाल सरकार से जवाब मांगा गया तो कहा गया कि इसमें से अधिकांश लोग पहले हिंदू ही थे।

बंगाल में फिलहाल 45 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान
फिलहाल पश्चिम बंगाल में सरकारी संस्थाओं और नौकरियों में 45 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें 17 प्रतिशत ओबीसी, 28 प्रतिशत फीसदी आरक्षण समाज के एससी/एसटी जातियों को दिया जाता है।

राज्य के NRI कोटा आरक्षण खत्म होना चाहिए
केंद्रीय पिछड़ा आयोग का कहना है कि राज्य के NRI कोटा को भी ओबीसी के लिए निर्धारित 17 प्रतिशत कोटे से ही रिजर्वेशन दिया जा रहा है, उसको भी खत्म किया जाना चाहिए।

ओबीसी सूची को ठीक नहीं किया गया तो आयोग एक्शन लेगा
ओबीसी कमीशन के अध्यक्ष हंसराज अहीर का कहना है कि अगले महीने कमीशन बंगाल दौरे पर जाएगी। इस मुद्दे पर बंगाल सरकार की दो सुनवाई करेंगे अगर उसके बाद भी ओबीसी सूची को ठीक नहीं किया गया तब राज्य सरकार के खिलाफ आयोग एक्शन लेगा। बंगाल सरकार की अकर्मण्यता की स्थिति में राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग इसकी शिकायत सीधे राष्ट्रपति को कर सकता है। देश के राष्ट्रपति पिछड़ा आयोग के इस शिकायत को अध्ययन के बाद देश की संसद (लोकसभा) को भेज सकते हैं उसके बाद इसको तामील करवाने की जिम्मेदारी लोकसभा की होगी।