Showing posts with label bill. Show all posts
Showing posts with label bill. Show all posts

यूँ ही सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार ने नहीं कहा- इससे पैदा होगी संवैधानिक अराजकता, राष्ट्रपति ने भी ‘डेडलाइन’ पर पूछे थे 14 सवाल


सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हुए विधेयकों की मंजूरी देने की डेडलाइन तय की थी। अब इस पर केंद्र सरकार ने गंभीर चेतावनी दी है। शीर्ष अदालत ने बीते अप्रैल में राष्ट्रपति द्वारा बिल की मंजूरी के लिए 3 महीने की समयसीमा तय की थी जिस पर सरकार ने ‘संवैधानिक अराजकता’ की स्थिति पैदा होने की चेतावनी दी है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं हैं। जिसके बाद खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को लेकर 14 गंभीर सवाल पूछे थे। कोर्ट ने इस पर सुनवाई से पहले केंद्र और राज्य सरकारों से अपना जवाब देने को कहा था।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ 19 अगस्त से इस मामले की सुनवाई करने वाली है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना लिखित जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि ऐसी समयसीमाएँ सरकार के एक अंग द्वारा उन शक्तियों का हड़पना होगा जो उसे नहीं दी गई हैं।

सरकार ने कहा कि इसके चलते शक्तियों का पृथक्करण बिगड़ जाएगा। सरकार ने चेतावनी दी कि इसके चलते ‘संवैधानिक अराजकता‘ की स्थिति पैदा होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने बयान में कहा, “अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी सर्वोच्च न्यायालय संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या या संविधान बनाने वालों की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकता। जब तक संविधान के लिखित नियमों में कोई तय प्रक्रिया मौजूद ना हो।”

मेहता ने कहा कि राज्यपाल की सहमति की प्रक्रिया लागू करने में कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि राज्यपाल जैसे ऊँचे पद को घटाकर एक छोटे या अधीनस्थ पद की तरह बना दिया जाए।

मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद अपने आप में ‘पूर्ण राजनीतिक’ पद हैं और ये लोकतांत्रिक शासन के ऊँचे आदर्शों के प्रतीक हैं। यानी इन्हें संपूर्ण राजनीतिक वैधता मिली हुई है। उन्होंने कहा कि अगर कभी इन पदों से जुड़ी कोई गड़बड़ी नजर आती है तो उसका समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए ना कि अदालत के जरूरत से ज्यादा दखल से।

सरकार ने आगे बताया कि अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वे किसी बिल पर विचार करने में पूरी स्वतंत्रता रखें और उन्हें किसी निश्चित समयसीमा का पालन करना जरूरी नहीं है। समयसीमा ना होना जान-बूझकर और सोच-समझकर संविधान में रखा गया एक विशेष नियम है।

संविधान में कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं बताई गई है जिससे बिना संविधान में बदलाव किए इन सीमाओं को लागू कर सके। संविधान में बदलाव करना केवल संसद की विशेष शक्ति है जो अनुच्छेद 368 के तहत ही किया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने पूछे थे 14 सवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से जुड़े कुछ अहम सवाल पूछे थे। इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ बनाई है।

राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास ये सवाल भेजे थे। अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को कानूनी और सार्वजनिक महत्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की इजाजत देता है।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था-

  1. जब राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत कोई बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या संवैधानिक विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं, या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

सुप्रीम कोर्ट का क्या था फैसला?

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने राज्यपाल RN रवि के उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को मंजूरी ना देने के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बीते अप्रैल में इस पर सुनवाई की। तमिलनाडु की सरकार की दलील थी कि राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा 2 बार पारित किए जाने के बावजूद विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लटका रखा है।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी और साथ ही राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।
राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लंबे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

जब कोई विधेयक संसद या विधानसभा में पास हो जाता है, तो इसे लागू करने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। ‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और कानून नहीं बनता।
राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।
राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।
दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्ञानी जैल सिंह ने उठाया था।
उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदाहरण था।

क्यों SC का फैसले बताया जा रहा न्यायिक दखल?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही न्यायिक दखल को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। संविधान से इतर जाकर देश के प्रमुख के ऊपर समयसीमा लगाने को लेकर कई कानूनविदों ने इस पर सवाल उठाए थे।
पूर्व उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की थी। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट के ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करने तक का दावा कर दिया था।
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि विधेयकों पर कार्यपालिका को समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के लिए कहना संविधान में ना तो दिया गया है और ना ही इसकी भावना निहित है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता राजन सिंह ने चेताया था कि ऐसे फैसलों से न्यायपालिका सरकार की कार्यप्रणाली में बहुत गहराई तक दखल कर सकती है और अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल से भविष्य में अप्रत्याशित परिणाम भी हो सकते हैं।
संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं, जैसा केंद्र सरकार ने भी अपने जवाब में बताया है। कुछ समय पहले की बात है जब चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
कानूनविद मानते हैं कि न्यायपालिका में जवाबदेही के अभाव के चलते ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जहाँ अधिक न्यायिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और अब कुछ दिनों में इस मामले की सुनवाई शुरू होगी तो देखना होगा कि कोर्ट अपने फैसले को लेकर क्या रुख रखता है।

कर्नाटक : हिन्दुओं जागो और सेकुलरिज्म के नशे को छोड़ो ; जिस पीड़ित हिंदुओं को ही जेल में ठूँसने वाला ‘काला कानून’ बिल को सोनिया ला रही थी , रोहित वेमुला एक्ट से हिंदुओं को खंड-खंड करना चाहता है बेटा: बदले नहीं हैं कांग्रेस के इरादे

कर्नाटक में कांग्रेस जिस तरह हिन्दुओं के विरुद्ध काम करने जा रही है, हिन्दुओं को कांग्रेस और उन सभी पार्टियों से दूरी बनानी चाहिए जो इस हिन्दुओं के विरुद्ध बिल लाकर देश में शरीयत लाने में साथ दे रही हैं। इन हिन्दू विरोधियों को नगर निगम से लेकर संसद तक हर मोर्चे से कोसों मील दूर रखो। अगर हिन्दू और जितनी भी हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं अभी भी नहीं जागी बहुत देर हो जाएगी और आने वाली तुम्हारी पीडियां पानी पी-पीकर तुम्हे कोसेंगी। 
आज से लगभग 14 साल पहले देश में कांग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार थी। UPA की यह सरकार ‘अल्पसंख्यकों का संसाधनों पर पहला हक़’ वाली नीति पर चलती थी। मुस्लिम तुष्टिकरण की पिच पर रोज चौके-छक्के लगाने की मंशा रखने वाली कांग्रेस ने इसी दौरान Anti-Communal Violence Bill से देश का परिचय करवाया था। यह बिल देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को दंगाई घोषित करने का दस्तावेज था। तब यह पास नहीं हो पाया था। लेकिन 14 साल बाद ऐसा ही एक बिल कांग्रेस ने दूसरी शकल में पेश किया है।

कर्नाटक में रोहित वेमुला बिल के नाम से यह नया शिगूफा छेड़ा है। इस बिल के प्रावधानों को लगातार कुछ वैसा ही बताया जा रहा है, जैसा 14 वर्ष पहले Anti-Communal Violence Bill के प्रावधानों को बताया गया था। जैसे बिना किसी सुनवाई के तब बहुसंख्यक आबादी को दंगाई बताने का प्रयास हो रहा था, वैसे ही अब नए बिल में एक बाद वर्ग के बच्चों को डिफ़ॉल्ट तौर पर शोषक बताने का प्रयास किया गया है। एक बिल माँ सोनिया गाँधी के दौर में आया था, दूसरा उनके बेटे राहुल गाँधी के कहने पर लाया गया है।

जिस कानून से आज इस कर्नाटक के नए कानून की तुलना कर रहा हूँ, इसका मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC) ने बनाया था। यह NAC असल में और कुछ नहीं बल्कि देश की चुनी सरकार के ऊपर की सरकार थी, जिसकी मुखिया सोनिया गाँधी थीं और सदस्यों में योगेन्द्र यादव और हर्ष मांदर जैसे लोग शामिल थे। अगर ये क़ानून बन गया होता तो बहुसंख्यक हिन्दू पीड़ित होकर भी अपराधी की श्रेणी में आते और कथित अल्पसंख्यक दंगे कर के भी पीड़ित कहे जाते। हिन्दुओं को बिना कुछ किए ही सज़ा मिलती।

इस कानून के पास होने के बाद जिस भी इलाके में दंगा हो, वहाँ बहुसंख्यक आबादी ही दोषी मानी जाती। अब इस देश में बहुसंख्यक हिन्दू हैं, तो सब जगह वही दोषी होते। यहाँ तक कि अगर कोई हिन्दू किसी समुदाय विशेष वाले को अपना मकान बेचने से मना कर दे, फिर भी घृणा जैसे आरोप लग जाते। जघन्य अपराध कर के भी दंगाई बच निकलते तो पत्थरबाजी, गोलीबारी और बमबारी करने वालों के लिए ये क़ानून कितने बड़े ढाल का काम करता।

हिन्दुओं के पीड़ित होने के बाद भी उन्हें दोषी माना जाता। पुलिस आपकी सुनवाई तक नहीं करती। अब ये सब ‘गुण’ ‘कर्नाटक के इस नए कानून में मौजूद हैं। कर्नाटक सरकार के इस नए शिगूफा बिल के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्रों को छोड़कर बाकी सभी के लिए, यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अन्याय से बचाने’ के लिए प्रावधान बनाए गए हैं। इसके प्रावधान कहते हैं कि कोई भी पीड़ित या फिर उसके परिवार का व्यक्ति सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कर सकता है और बिना किसी सबूत के आरोप लगाया जा सकता है।

इसके बाद तुरंत एक्शन का भी नए कानून में प्रावधान है। बिल में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-जमानती और संगीन अपराध माना गया है। यानी आरोप लगते ही किसी भी छात्र को दोषी मान लिया जाएगा। अब आपने जो कर्नाटक के नए कानून में पढ़ा और सांप्रदायिक हिंसा बिल के बारे में पढ़ा था, उसमे समानता नजर आई होगी। एक बिल मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं को बिन सुनवाई दोषी बना रहा था, दूसरा छात्रों को बिन सुनवाई दोषी बनाता है।

यानी माँ सोनिया गाँधी जिस स्कीम को लागू करना चाहती थी उसे ही थोड़ा सा मोडिफाई करके अब बेटे राहुल गाँधी ने कर्नाटक में लागू करने का प्रयास किया है। दरअसल, बात यह है कि पहले कांग्रेस चाहती थी कि वह मुस्लिमों का तुष्टिकरण करके सत्ता हासिल करती रहे। 2014 के बाद देश की राजनीति ऐसी पलटी कि हिन्दू संगठित हो गए, वोटबैंक की राजनीति करने वालों को सर पकड़ना पड़ा। लगातार कई चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को समझ आया कि उसकी राह का रोड़ा यह हिन्दू एकता है।

फिर चाहे जातिगत जनगणना की बात हो, या फिर आरक्षण को 50% से ऊपर ले जाना और अब ये रोहित वेमुला बिल, यह सभी उसकी इसी नीति का एक टूल हैं। कांग्रेस की प्लेबुक कभी भी बदलती नहीं है। कभी वह शाह बानो तो कभी सांप्रदायिक हिंसा बिल तो कभी रोहित वेमुला के नाम पर बनाए गए कानून के रूप में सामने आती है।

असम के कानून से समस्या : निकाह और तलाक़ के रजिस्ट्रेशन से किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए; हर बात में मुस्लिम फैक्टर लाना उचित नहीं है

सुभाष चन्द्र 

सबसे बड़ा आरोप लगाया जा रहा है कि The Assam Compulsory Registration of Muslim Marriage and Divorce Bill, 2024 केवल मुसलमानों के लिए है और इसलिए यह उनके लिए भेदभावपूर्ण (Discriminatory) हैं जबकि हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने कहा है कि बिल का लक्ष्य child marriage / बिना सहमति के शादी और बहु विवाह को रोकना है और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करके Institution of Marriage को मजबूत करना है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
सच्चाई यह है कि मुसलमानों को इस्लाम और शरिया के नाम पर अनेक फायदे मिले हुए हैं इस नए कानून में काजी को निकाह का रजिस्ट्रेशन का अधिकार नहीं होगा जबकि रजिस्ट्रेशन सरकार के पास कराना होगा अभी तक के कानून में On Certain Grounds child marriage को भी अनुमति थी और काज़ी निकाह करा कर सर्टिफिकेट दे देता है

दरअसल यह हिंदुओं के साथ भेदभावपूर्ण है क्योंकि उन्हें तो अपनी शादी register करानी ही पड़ती है जिसका कोई विरोध नहीं करता जैसे आज मुस्लिम कर रहे हैं असम में, शादी करवाने वाले पंडित को शादी का प्रमाणपत्र देने का अधिकार नहीं है जो काजी को है, इतना ही नहीं वर्षों से आर्य समाज मंदिरों में विवाह किए जा रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आर्यसमाज का यह अधिकार भी अवैध घोषित कर दिया क्या ऐसा करने के लिए काजी पर भी रोक लगाना जरूरी नहीं था 

मुसलमानों का कहना है कि इस्लाम में शादी नहीं निकाह होता है और निकाह एक अनुबंध (contract) होता है लेकिन Contract कौन कर सकता है यह Indian Contract Act, 1872 में परिभाषित है लेकिन मुस्लिम समाज किसी कानून को नहीं मानता, बस अपना इस्लामिक कानून चाहिए 

इस कानून के अनुसार Valid Contract करने वाले की आयु 18 वर्ष होनी जरूरी है और यदि किसी के लिए कोर्ट से Guardian नियुक्त हुआ हो तो उस केस में 21 वर्ष से कम को नाबालिग माना जाता है; दूसरी शर्त यह है कि 18 वर्ष के बालिग Contract तब ही कर सकते हैं जब वे मानसिक रूप से स्वस्थ हों Sound Mind के हों जिन्हें पता हो कि contract में क्या लिखा है और उनके हित के लिए है या नहीं, Unsound Mind वाले व्यक्ति द्वारा किया हुआ Contract शुरू से ही Void माना जाता है

यह सबसे बड़ी समस्या है मुसलमानों के लिए कि सरकार के पास रजिस्ट्रेशन के समय आयु पकड़ी जाएगी जिससे 18 से कम उम्र के लोगों का निकाह नहीं हो सकेगा दूसरी मुख्य बात है जिससे मुसलमान असम में परेशान हैं कि रजिस्ट्रेशन के समय लड़का लड़की को साबित करना होगा कि वे असम के ही नागरिक है बांग्लादेशी पकडे जाएंगे, रोना बस इस बात है

बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF ने कहा है कि वो इस कानून को कोर्ट में चुनौती देंगे - कोर्ट जाना तो हर किसी का अधिकार है, आप भी जाएं लेकिन पहले यह विचार कर लेना कि यदि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी कानून पर मुहर लगा दी तो क्या आपको स्वीकार होगा क्योंकि कोर्ट के ऐसे फैसले मुस्लिम संगठन शरिया के खिलाफ बता कर मानने में आनाकानी करते हैं अभी हाल ही का सुप्रीम कोर्ट के मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ के बाद गुजारा भत्ता के अधिकार देने के फैसले को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नाखुशी जाहिर की थी

मुस्लिम समुदाय को समय के अनुसार अपने में बदलाव लाने चाहिए, निकाह रजिस्टर होने दीजिये, प्रतिष्ठा का मुद्दा ( Prestige Issue) न बनायें