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‘उन्हें सिर्फ बातचीत के लिए जिंदा छोड़ा है’: शांति वार्ता से पहले ट्रंप की ईरान को धमकी, कहा- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर टोल वसूलना बंद करे


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर अपनी मनमानी बंद करे। ट्रंप ने साफ कर दिया कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को ‘होर्मुज स्ट्रेट’ से गुजरने वाले जहाजों पर कोई टैक्स या टोल (पारगमन शुल्क) वसूलने की इजाजत नहीं देगा।

ट्रंप ने तेहरान की इस कोशिश को ‘दुनिया से जबरदस्ती वसूली‘ करार दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर ट्रंप ने तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा कि ईरान के पास अब कोई मजबूत दाँव नहीं बचा है।

ट्रंप ने यहाँ तक कह दिया कि आज ईरान अगर सुरक्षित है, तो उसकी एकमात्र वजह यह है कि अमेरिका ने बातचीत के लिए दरवाजे खुले रखे हैं। ट्रंप के मुताबिक, ईरान अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का इस्तेमाल दुनिया को डराने और अपनी सौदेबाजी करने के लिए कर रहा है, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

यूँ ही सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार ने नहीं कहा- इससे पैदा होगी संवैधानिक अराजकता, राष्ट्रपति ने भी ‘डेडलाइन’ पर पूछे थे 14 सवाल


सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हुए विधेयकों की मंजूरी देने की डेडलाइन तय की थी। अब इस पर केंद्र सरकार ने गंभीर चेतावनी दी है। शीर्ष अदालत ने बीते अप्रैल में राष्ट्रपति द्वारा बिल की मंजूरी के लिए 3 महीने की समयसीमा तय की थी जिस पर सरकार ने ‘संवैधानिक अराजकता’ की स्थिति पैदा होने की चेतावनी दी है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं हैं। जिसके बाद खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को लेकर 14 गंभीर सवाल पूछे थे। कोर्ट ने इस पर सुनवाई से पहले केंद्र और राज्य सरकारों से अपना जवाब देने को कहा था।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ 19 अगस्त से इस मामले की सुनवाई करने वाली है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना लिखित जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि ऐसी समयसीमाएँ सरकार के एक अंग द्वारा उन शक्तियों का हड़पना होगा जो उसे नहीं दी गई हैं।

सरकार ने कहा कि इसके चलते शक्तियों का पृथक्करण बिगड़ जाएगा। सरकार ने चेतावनी दी कि इसके चलते ‘संवैधानिक अराजकता‘ की स्थिति पैदा होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने बयान में कहा, “अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी सर्वोच्च न्यायालय संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या या संविधान बनाने वालों की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकता। जब तक संविधान के लिखित नियमों में कोई तय प्रक्रिया मौजूद ना हो।”

मेहता ने कहा कि राज्यपाल की सहमति की प्रक्रिया लागू करने में कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि राज्यपाल जैसे ऊँचे पद को घटाकर एक छोटे या अधीनस्थ पद की तरह बना दिया जाए।

मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद अपने आप में ‘पूर्ण राजनीतिक’ पद हैं और ये लोकतांत्रिक शासन के ऊँचे आदर्शों के प्रतीक हैं। यानी इन्हें संपूर्ण राजनीतिक वैधता मिली हुई है। उन्होंने कहा कि अगर कभी इन पदों से जुड़ी कोई गड़बड़ी नजर आती है तो उसका समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए ना कि अदालत के जरूरत से ज्यादा दखल से।

सरकार ने आगे बताया कि अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वे किसी बिल पर विचार करने में पूरी स्वतंत्रता रखें और उन्हें किसी निश्चित समयसीमा का पालन करना जरूरी नहीं है। समयसीमा ना होना जान-बूझकर और सोच-समझकर संविधान में रखा गया एक विशेष नियम है।

संविधान में कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं बताई गई है जिससे बिना संविधान में बदलाव किए इन सीमाओं को लागू कर सके। संविधान में बदलाव करना केवल संसद की विशेष शक्ति है जो अनुच्छेद 368 के तहत ही किया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने पूछे थे 14 सवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से जुड़े कुछ अहम सवाल पूछे थे। इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ बनाई है।

राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास ये सवाल भेजे थे। अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को कानूनी और सार्वजनिक महत्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की इजाजत देता है।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था-

  1. जब राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत कोई बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या संवैधानिक विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं, या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

सुप्रीम कोर्ट का क्या था फैसला?

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने राज्यपाल RN रवि के उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को मंजूरी ना देने के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बीते अप्रैल में इस पर सुनवाई की। तमिलनाडु की सरकार की दलील थी कि राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा 2 बार पारित किए जाने के बावजूद विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लटका रखा है।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी और साथ ही राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।
राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लंबे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

जब कोई विधेयक संसद या विधानसभा में पास हो जाता है, तो इसे लागू करने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। ‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और कानून नहीं बनता।
राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।
राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।
दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्ञानी जैल सिंह ने उठाया था।
उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदाहरण था।

क्यों SC का फैसले बताया जा रहा न्यायिक दखल?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही न्यायिक दखल को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। संविधान से इतर जाकर देश के प्रमुख के ऊपर समयसीमा लगाने को लेकर कई कानूनविदों ने इस पर सवाल उठाए थे।
पूर्व उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की थी। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट के ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करने तक का दावा कर दिया था।
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि विधेयकों पर कार्यपालिका को समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के लिए कहना संविधान में ना तो दिया गया है और ना ही इसकी भावना निहित है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता राजन सिंह ने चेताया था कि ऐसे फैसलों से न्यायपालिका सरकार की कार्यप्रणाली में बहुत गहराई तक दखल कर सकती है और अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल से भविष्य में अप्रत्याशित परिणाम भी हो सकते हैं।
संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं, जैसा केंद्र सरकार ने भी अपने जवाब में बताया है। कुछ समय पहले की बात है जब चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
कानूनविद मानते हैं कि न्यायपालिका में जवाबदेही के अभाव के चलते ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जहाँ अधिक न्यायिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और अब कुछ दिनों में इस मामले की सुनवाई शुरू होगी तो देखना होगा कि कोर्ट अपने फैसले को लेकर क्या रुख रखता है।

कांग्रेस नेताओं ने रजत शर्मा को लेकर फैलाया झूठ: IndiaTV ने दिया करारा जवाब, कहा- इस बार सीमा लाँघ दी

रागिनी नायक (बाएँ), रजत शर्मा (दाएँ) (फोटो साभार : Youtube/IndiaTV)
क्या कांग्रेस अपने बुरे दिनों से गुजर रही है? कोई न कोई विवाद कांग्रेस के गले पड़ रहा है। चुनाव में बांटे गारंटी कार्ड कब अति गंभीर हो जाये, कहा नहीं जा सकता। अगर यह काम बीजेपी की तरफ से हुआ होता जितने भी मुल्ला, मौलवी और कट्टरपंथी चील-कौओं की तरफ चीख-चिल्ला रहे होते। अभी ये विवाद शांत भी नहीं हुआ कि India TV के पत्रकार रजत शर्मा पर कांग्रेस नेताओं ने गाली देने का जो आरोप लगाया है, अगर मीडिया रजत के साथ खड़ी हो गयी कांग्रेस को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। 

रजत से मुलाकात हुए लगभग 4 दशक हो गए हैं। दोनों ही पत्रकारिता के लगभग पहले पायदान पर ही थे, शायद 'रविवार' पत्रिका में थे। सर्वश्री भानु प्रताप शुक्ला और प्रबल मैत्र आदि अन्य पाञ्चजन्य सम्पादकीय के साथ चाय पर किसी चर्चा के अलावा दो/तीन वार्ताओं में मुलाकात हुई। रजत को कभी गाली तो दूर गुस्से में नहीं देखा। अब इतने लम्बे अंतराल में उनके व्यवहार में अंतर आया हो कहा नहीं जा सकता। केवल रतन मलकानी, प्रो वेद प्रकाश भाटिया,  डॉ आर बालाशंकर और तरुण विजय आदि ऐसे संपादक हैं, जिन्होंने कभी किसी को कोई अपशब्द नहीं कहा।  

कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक, जयराम रमेश और पवन खेड़ा ने मशहूर पत्रकार रजत शर्मा पर ऑन एयर गाली देने का आरोप लगाते हुए फर्जी खबरें फैलाने की कोशिश की, जिसके बाद इंडिया टीवी ने मंगलवार (11 जून 2024) को इन नेताओं को चेतावनी देते हुए कानूनी कार्रवाई की धमकी दी है।

कांग्रेस के तीनों नेताओं को चेताते हुए इंडिया टीवी की लीगल हेड रितिका तलवार ने बयान जारी किया, “मैं आपको भारत के सबसे सम्मानित पत्रकार और टीवी एंकर रजत शर्मा की ओर से लिख रही हूँ, जो चार दशकों से इस पेशे में हैं और उनकी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा बहुत अधिक है। रजत शर्मा ऑन एयर और ऑफ एयर दोनों जगह अपने सुसंस्कृत और सभ्य व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। दुनिया भर के टेलीविजन दर्शक उनकी विनम्र और सौम्य एंकरिंग शैली की तारीफ करते हैं।”

उन्होंने आगे लिखा, “हमने सोशल मीडिया पर आपके पोस्ट देखे हैं, जिसमें आपने रजत शर्मा पर ऑन एयर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। आपके द्वारा अपने पोस्ट में लगाए गए आरोप बिल्कुल झूठे हैं और उनका कोई आधार नहीं है। वे दुर्भावनापूर्ण और अपमानजनक हैं और स्पष्ट रूप से फर्जी खबरें हैं। आपने ऊँची प्रतिष्ठा वाले व्यक्तित्व पर झूठा आरोप लगाकर सार्वजनिक शालीनता की सभी सीमाओं को लाँघ दिया है। हम इस पर आगे की कार्रवाई करने के लिए कानूनी सलाह ले रहे हैं।”

इस वार्निंग वाले पोस्ट में आगे लिखा है, “इस बीच हमें पता चला है कि आप प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एक बार फिर से वही बेबुनियाद, झूठी और अपमानजनक खबरें फैलाकर इस अकल्पनीय स्थिति को और बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हम आपको चेतावनी देते हैं कि आपको ऐसा करने से बचना चाहिए। हम दोहराते हैं कि रजत शर्मा ने निजी या सार्वजनिक जीवन में कभी भी अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं किया है। आपके द्वारा गैर-मौजूद और काल्पनिक बातों से निकाले गए निष्कर्ष अपने आप में अपमानजनक हैं। हम आगे कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।” रितिका तलवार ने कहा कि कांग्रेस नेता इस मामले को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने और रजत शर्मा के बारे में झूठा दावा करने की कोशिश करते रहेंगे।

इंडिया टीवी के ऑफिसियल एक्स हैंडल के इस पोस्ट को कोट करते हुए रजत शर्मा ने भी अपने एक्स हैंडल से उसे रीट्वीट किया और सोशल मीडिया पर फैलाई जाने वाली सामग्रियों को खुद पर हमला करार दिया।

सोमवार (10 जून 2024) को कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर आरोप लगाया कि रजत शर्मा ने लाइव डिबेट के दौरान उनके साथ गाली-गलौज की। उन्होंने ट्वीट किया, “पत्रकारिता में इससे ज़्यादा घटिया और क्या हो सकता है? रजत शर्मा, क्या आपके पास कोई जवाब है?”

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश और पवन खेड़ा ने इस निराधार दावे को और आगे बढ़ाया। पवन खेड़ा ने ट्वीट किया, “यह अत्यंत निंदनीय है कि एक महिला नेत्री से एक वरिष्ठ संपादक इस तरह के अपशब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। रजत शर्मा, आप इस बारे में क्या कहेंगे?”

जयराम रमेश ने भी इस झूठ को आगे बढ़ाया। जयराम रमेश ने इस पर लिखा, “रजत शर्मा एक प्रसिद्ध मीडिया व्यक्तित्व हैं। उनके अपने राजनीतिक झुकाव हैं, लेकिन कांग्रेस की एक प्रमुख प्रवक्ता, जो एक महिला हैं, के लिए इस तरह की अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना पूरी तरह से अस्वीकार्य है और इसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए। इस मामले में बिना शर्त सार्वजनिक माफी की तत्काल आवश्यकता है।”

हालाँकि अब इंडिया टीवी और रजत शर्मा ने इस मामले को लेकर अपना रुख साफ कर दिया है कि वो जल्द ही कांग्रेस के इन तीनों नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।

शराब घोटाले का पैसा कहाँ गया, 28 मार्च को बताएँगे केजरीवाल: ‘CM की कुर्सी’ पर बैठ पत्नी सुनीता

       अरविंद केजरीवाल को लेकर वकीलों को दिल्ली उच्च न्यायालय की फटकार, सुनीता केजरीवाल का नया बयान
शराब घोटाले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गिरफ्तार किए जा चुके हैं। वो फ़िलहाल ED (प्रवर्तन निदेशालय) की कस्टडी में रिमांड पर हैं। AAP के लीगल सेल ने इस कार्रवाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि जो वकील विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं वो करें, लेकिन अपने जोखिम पर। बता दें कि बुधवार (27 मार्च, 2024) को AAP के लीगल सेल ने दिल्ली की सभी जिला अदालतों में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया था।

इसी पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कद कार्रवाई की चेतावनी दी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने इस पर सवाल उठाया कि आखिर अदालत परिसर में कैसे विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जा सकता है। दोनों जजों ने कहा कि अगर कोर्ट परिसर में प्रदर्शन किया जाता है तो इसके परिणाम काफी भयंकर होंगे। एक वकील ने AAP के लीगल सेल द्वारा प्रदर्शन के खिलाफ शिकायत का जिक्र किया था, जिस पर ये टिप्पणी आई।

अपने रिस्क पर प्रदर्शन करें वकील: दिल्ली हाईकोर्ट

उक्त वकील ने आधी रात को शिकायत की प्रति ईमेल की थी और इस पर त्वरित सुनवाई की माँग की थी। कोर्ट ने कहा कि 1 दिन बाद इस पर सुनवाई होगी, लेकिन साथ ही प्रदर्शनकारी वकीलों को चेताया भी। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित नियम का पालन किया जाएगा। साथ ही कहा कि अदालत को बाधित नहीं किया जा सकता है, कोर्ट को नहीं रोका जा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को अदालत में रुकने से नहीं रोका जा सकता।
अधिवक्ता वैभव सिंह ने ये शिकायत दर्ज कराई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रदर्शन को लेकर कहा, “आप कोर्ट तक पहुँचने के किसी के मूलभूत अधिकारों को नहीं छीन सकते। यही स्थापित कानून है। अगर कोई ऐसा करता है तो वो अपने जोखिम पर करेगा और ज़रूरत पड़ी तो हम कार्रवाई करेंगे।” BCI (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) भी AAP के लीगल सेल को आगाह कर चुका है कि वो प्रदर्शन न करें। संस्था ने कहा कि न्यायपालिका के फैसले का इंतज़ार करना चाहिए, तब तक विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।

केजरीवाल कोर्ट में बताएँगे कहाँ है तथाकथित शराब घोटाले का पैसा: पत्नी सुनीता

उधर अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल ने कहा है कि गुरुवार को उनके पति अदालत को बताएँगे कि दिल्ली शराब घोटाले का पैसा कहाँ लगा है। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने 2 दिन पहले ही जल मंत्री आतिशी को सन्देश भेजा था कि लोगों की सीवर की समस्या का समाधान हो, क्या गलत किया। सुनीता ने कहा कि अरविंद केजरीवाल को इससे बेहद पीड़ा हुई है कि इस आदेश का विरोध हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस तथाकथित शराब घोटाले का एक पैसा किसी भी छापे में नहीं मिला है।

सुनीता केजरीवाल ने कहा, “इस तथाकथित शराब घोटाले का ये पैसा है कहाँ? अरविंद जी ने कहा है कि 28 मार्च को कोर्ट के सामने इसका खुलासा करेंगे, सारे देश को सच-सच बताएँगे और इसका सबूत भी देंगे। अरविंद जी सबसे सच्चे, देशभक्त, निडर और साहसी व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा है कि मेरा शरीर जेल में है लेकिन आत्मा आप सबके बीच है। आँखें बंद करो तो मुझे अपने आसपास महसूस करोगे।” सुनीता केजरीवाल ने एक बार फिर से अपने पति वाली कुर्सी पर बैठ कर ही ये संबोधन दिया।

तीर से ड्रोन गिराने का दावा करने वाले निहंग ने दी बैसाखी पर खून-खराबे की धमकी, ‘बंदी सिंहों’ को छुड़ाने को एजेंडा बनाएँ किसान; आंदोलन के नाम पर गुंडागर्दी

           निहंग गुरवंत सिंह, जो ड्रोन गिराने की बात कर रहा है (चित्र साभार: Roazana Spokesman)
सोमवार (19 फरवरी, 2024) को पंजाबी यूट्यूब समाचार चैनल ‘रोजाना स्पोक्समैन’ का एक निहंग सिख के साथ बातचीत का वीडियो सामने आया। निहंग सिख का नाम गुरवंत सिंह है और वह अपनी तीरंदाजी को लेकर जाना जाता है। उसने इस वीडियो पर काफी विवादास्पद बयान दिए। सिंह किसानों के आंदोलन में भाग ले रहा है। उसने पंजाब के बड़े त्यौहार बैसाखी पर खून-खराबे की धमकी दी और कहा कि सरकार को इसके परिणाम झेलने होगे। उसने यहाँ तक कहा कि यदि सिख धर्मगुरु आंदोलन में पहुँच गए तो बैरिकेड मिनटों में हट जाएँगे।

उसने हरियाणा पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आँसू गैस के गोले छोड़ने को लेकर भी प्रश्न किए। उसने कहा कि जो लोग लंगर बाँटते हैं उन पर आँसू गैस नहीं चलाई जानी चाहिए। हालाँकि, यह अब एक नयन शगल बन गया है कि सेवा को प्रदर्शन के लिए ढाल की तरह उपयोग किया जाए। जहाँ असल में यह लोग सेवाभाव से करते हैं तो वहीं प्रदर्शनकारी इसे अपनी एक विशेषता के तौर पर दर्शाते हैं।

गुरवंत सिंह ने किसानों के प्रदर्शन को छोड़ कर और भी कई आपत्तिजनक बातें की। उसने कहा कि निहंग सिख भी प्रदर्शन में जाएँगे लेकिन उनकी माँग है कि किसान अपने एजेंडा में ‘बंदी सिंह’ को छुड़वाने को लेकर वादा करें। ‘बंदी सिंह’ उन खालिस्तान सिख समर्थकों को कहा जाता है जो आतंक के किसी मामले में जेल काट रहे हैं। इनको छोड़ने की माँग लम्बे समय से हो रही है। गुरवंत सिंह ने भी यही बात दोहराई।

इसके बाद वह अपनी तीरंदाजी के गुर बताने लगा। निहंग गुरवंत ने कहा कि वह ड्रोन को भी तीर का निशाना लगाकर नीचे गिरा सकता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि अम्बाला के शम्भू बॉर्डर पर डटे प्रदर्शनकारियों पर नजर रखने और उनको नियंत्रित करने के लिए हरियाणा पुलिस ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है। उसने इसके साथ ही कहा कि अगर ड्रोन गिराने के कारण वह किसी कानूनी पचड़े में फँसता है तो उसकी विधिक सहायता कौन करेगा, इसकी उसे चिंता है। उसने यहाँ अपनी तुलना ‘बंदी सिंहों’ के साथ की।

जिस तरह तथाकथित किसान आंदोलन उग्र रूप धारण कर रहा है, यह इन तथाकथित किसानों और इनको समर्थन दे रही राजनीतिक पार्टियों के लिए भी उतनी ही घातक होने वाली है। जनता समझ चुकी है कि दिशाहीन हुए विपक्ष कोई मुद्दा न होने के कारण मोदी सरकार को बदनाम करने देश में उपद्रव फ़ैलाने का षड़यंत्र है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार होने के बावजूद ये तथाकथित किसान हरियाणा बॉर्डर तक इतनी संख्या में कैसे पहुंचे? केजरीवाल ने पंजाब में सरकार बनाने के लिए जो वायदे किये, उन्ही को पूरा करने केंद्र सरकार पर क्यों थोपा जा रहा है? केंद्र सरकार को 2024 चुनाव के बाद इन सभी प्रदर्शनकारियों के बैंक खाते, जमीन-जायदाद आदि की गहन जाँच करनी होगी। अगर जाँच में जो भी बाधा डाले उस पर भी सख्ती से पेश आना होगा। विदेशी भीख पर देश का माहौल ख़राब करने वालों का सख्ती से इलाज उतना ही जरुरी है, जितना जीवित रहने के लिए अन्न और साँस।    

उसने यहाँ CRPF की आलोचना भी की, उसने कहा कि CRPF वालों को ब्रेनवॉश किया गया है कि वह प्रदर्शनकारियों को दिल्ली जाने से रोकें। उसने दावा किया कि इन्हें मेडल देने का वादा किया जा रहा है। साथ ही गुरवंत ने खालिस्तान की विचारधारा को लेकर भी बात की। उसने यहाँ दीप सिद्धू का नाम लिया। दीप सिद्धू पहले एक अभिनेता था जो कि किसान आन्दोलन 1.0 के समय नेतागिरी करने में आ गया था। गुरवंत ने प्रदर्शनकारियों से अपील की कि वह निशान साहिब के तले दिल्ली की तरफ कूच करें।

उसने ये भी कहा कि प्रदर्शनकारियों को टिड्डियो की तरह एक साथ चलना चाहिए ना कि मेढकों की तरह इधर-उधर कूदना चाहिए। इसके बाद उसने बैसाखी त्योहार पर खून-खराबे की धमकी भी दी। गुरवंत ने कहा कि प्रदर्शनकारियों में ‘चंडी दा वार’ का उपयोग करके और भी ताकत भरी जानी चाहिए। उसका यह वीडियो यूट्यूब पर लाखों लोगों द्वारा देखा जा चुका है। सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे लोगों पर नजर रखने की जरूरत है। उसकी खून-खराबे वाली धमकी को लेकर सुरक्षा एजेंसियों को जाँच करनी चाहिए।

यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि रोज कोई ना कोई कैमरा पर आकर सिखों को भड़काने का काम करता रहता है, ऐसे में लोगों को संभल कर कैमरा पर बोलना चाहिए क्योंकि इससे समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं और भड़काऊ भाषणों से कानून व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो सकती है।

पंजाब : ‘माँ का दूध पीया है तो आकर दिखाए पन्नू, औकात बता दूँगी’: दुर्ग्याणा मंदिर को बम से उड़ाने की धमकी पर लक्ष्मी कांता चावला , पूर्व मंत्री, बोलीं- मैं गुरु तेगबहादुर की बेटी

साभार: लक्ष्मी कांता चावला फेसबुक/ livehindustan.com
पंजाब की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और दुर्ग्याणा मंदिर कमिटी की अध्यक्ष लक्ष्मी कांता चावला ने खालिस्तानी आतंकी और अलगाववादी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ के सरगना गुरपतवंत सिंह पन्नू को सख्त लहजे में चेतावनी दी है। 26 जनवरी को एक बार फिर मंदिर को बम से उड़ाने की धमकी भरा कॉल आने के बाद भाजपा नेता चावला ने कहा कि अगर पन्नू में हिम्मत है तो वह दुर्ग्याणा मंदिर आकर दिखाए।

83 साल की लक्ष्मी कांता चावला पंजाब सरकार की पूर्व कैबिनेट मंत्री रही हैं। अभी वह बीजेपी की सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। राजनीति में आने से पहले वह एक कॉलेज लेक्चरर थीं। साल 2022 में 496 वोट पाकर वह श्री दुर्ग्याणा मंदिर की पहली महिला प्रधान बनी थीं। उनके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पार्टी के समर्थक रमेश शर्मा को सिर्फ 350 वोट मिले थे।

दरअसल दुर्ग्याणा मंदिर कमिटी के प्रबंधक राम पाठक ने कहा कि 25 जनवरी 2024 को धमकी भरे दो फोन कॉल आए। पाठक ने मीडिया को बताया कि कॉल करने वाले ने मंदिर को बम से उड़ाने की धमकी दी है। इसके साथ ही कमिटी की अध्यक्ष लक्ष्मी कांता चावला और सचिव अरुण खन्ना को गोली मारने की भी बात कही गई।

इस धमकी का जवाब अब अयोध्या राम मंदिर से लौटकर आई लक्ष्मी कांता चावला ने दिया है। उन्होंने कहा है कि खालिस्तानी आतंकी पन्नू की धमकियों पर उन्हें तरस आता है। वह लाइमलाइट में रहने के लिए ये सब करता है। उन्होंने कहा, “हमारा देश इतना मजबूत है कि उसे उसकी औकात बताने में देर नहीं करेंगे, बस एक बार वो भारत आ तो जाए।”

चावला ने आगे कहा कि गुरपतवंत का अर्थ ‘गुरु के उपदेश का मान रखने वाला’ होता है। उन्होंने कहा, “पन्नू सिख भी नहीं है। अगर वह सिख होता तो युवाओं को गुमराह कर और पैसों का लालच देकर गलत काम नहीं करवाता। उसे पैसे मिल रहे हैं। कोई विदेशी एजेंसी उससे ये करवा रही है। विदेश में बैठ वो देश का माहौल खराब करना चाहता है।”

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, चावला ने कहा कि अगर पन्नू ने माँ का दूध पीया है तो एक बार दुर्ग्याणा आ जाए। उसे प्रसाद चखाया जाएगा। उससे पूछा जाएगा कि किसके कहने पर ये आग लगाने वाली बातें कर रहा है। उन्होंने कहा कि बीते 40 साल से ऐसी धमकियाँ आ रही हैं, लेकिन वे इससे डरने वाली नहीं हैं। उन्होंने सलाह दी कि पन्नू को अपना नाम बदल लेना चाहिए।

लक्ष्मी कांता चावला ने कहा कि वो खुद को गुरु तेगबहादुर की बेटी कहती हैं और वो डरने वाली नहीं हैं। पंजाब ने कई साल संताप झेला है। उन्होंने कहा कि पन्नू को अब समझ जाना चाहिए कि पंजाब में सांप्रदायिक माहौल नहीं खराब किया जा सकता। उन्होंने देश और पंजाब के युवाओं से गलत कदम नहीं उठाने का भी आग्रह किया।

इससे पहले 22 जनवरी 2024 को खालिस्तान समर्थक पन्नू ने एक वीडियो जारी कर दुर्ग्याणा मंदिर बंद करके इसकी चाबियाँ हरमंदिर साहिब को सौंपने की बात कही थी। इसके बाद अमृतसर पुलिस ने पन्नू के खिलाफ मामला दर्ज किया था। पुलिस ने पन्नू के खिलाफ देश की एकता, अखंडता और माहौल खराब करने की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ आईटी एक्ट में भी केस दर्ज किया है।

‘नूपुर शर्मा की तरह अब मेरे पीछे पड़ा जिहादी मोहम्मद ज़ुबैर’: एमी मेक, अमेरिका की महिला पत्रकार

हमास आतंकियों के समर्थन के लिए मोहम्मद ज़ुबैर को इजरायली काउंसल जनरल और अमेरिकी पत्रकार ने लताड़ा (फोटो साभार: X/Attia Muhammed/Flash90)
कटा हुआ वीडियो शेयर करने के लिए कुख्यात मोहम्मद ज़ुबैर अब इजरायल-हमास युद्ध को लेकर प्रोपेगंडा फैलाने में लग गया है। सोमवार (16 अक्टूबर, 2023) को अमेरिका स्थित ‘RAIR फाउंडेशन’ की संस्थापक और इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट एमी मेक ने मोहम्मद ज़ुबैर के AltNews द्वारा चलाए जा रहे प्रोपेगंडा को लेकर आगाह किया। उन्होंने कहा कि जैसा मोहम्मद ज़ुबैर ने नूपुर शर्मा के साथ किया था, वैसे ही अब वो अब उन्हें निशाना बना रहा है, सिर्फ इसीलिए, क्योंकि उन्होंने हमास जैसे इस्लामी आतंकी संगठनों की पोल खोली।

उन्होंने भारत में अपने फॉलोवर्स को आगाह करते हुए कहा कि मोहम्मद ज़ुबैर नाम का एक ‘जिहादी’ वामपंथी फेक न्यूज़ पोर्टल चलाता है, जो उन्हें और उनके जैसे कई लोगों को निशाना बना रहा है। उन्होंने उसे हिन्दू घृणा और यहूदी घृणा से सना बताते हुए याद दिलाया कि कैसे उसने नूपुर शर्मा के जीवन को खतरे में डाला था। बता दें कि नूपुर शर्मा का एडिटेड वीडियो शेयर करने के बाद कन्हैया लाल तेली और उमेश कोल्हे की हत्याएँ हुई थीं। ‘सर तन से जुदा’ गिरोह ने भाजपा की निलंबित नेता नूपुर शर्मा को धमकियाँ दी थीं।

एमी मेक ने याद दिलाया कि कैसे नूपुर शर्मा ने इस्लाम की पुस्तकों से तथ्य उद्धृत किए थे और पैगंबर मुहम्मद की बीवियों में से एक आयशा की उम्र बताई थी जो उस समय मात्र 6 साल की थी। इसके बाद उन्हें हत्या की धमकियाँ मिलने लगीं। अमेरिकी महिला पत्रकार ने कहा कि मोहम्मद ज़ुबैर भारत में गिरफ्तार भी किया गया था और वो एक खतरनाक व्यक्ति लगता है जो अपने समर्थकों को लोगों को प्रताड़ित करने के लिए उकसाता है।

उन्होंने ये सवाल भी दागा कि क्या मोहम्मद ज़ुबैर को अरबपति जॉर्ज सोरोस की ‘ओपन सोसायटी फाउंडेशन’ से पैसे मिलते हैं? जो भारत में रह रहे भारत विरोधी तत्वों की फंडिंग करता है? उन्होंने लोगों से मोहम्मद ज़ुबैर के बारे में और सूचनाएँ साझा करने की अपील की। साथ ही कहा कि उन्होंने सुना है कि वो लोगों की प्राइवेट जानकारियाँ भी खुलेआम शेयर कर देता है। याद दिला दें कि नूपुर शर्मा मामले में ज़ुबैर ने बड़ी चालाकी से उस बहस में शामिल तस्लीम रहमानी का वीडियो काट कर हटा दिया था, जो बार-बार शिवलिंग पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर रहा था।

मध्य-पश्चिम भारत में इजरायल के काउंसल जनरल कोब्बी शोषनी ने भी मोहम्मद ज़ुबैर की ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “इजरायल को लेकर झूठ खबरें और घृणा फैलाना बंद करो। अगर तुम सच में अपने-आप को फैक्टचेकर बताते हो तो इजरायल जाओ।” मोहम्मद ज़ुबैर लगातार ट्विटर का इस्तेमाल कर के हमास को पीड़ित दिखाने में लगा हुआ है। जबकि हमास एक आतंकवादी संगठन है जिसने इजरायल में नरसंहार किया।

इजरायल इस वक्त कई फ्रंड पर युद्ध लड़ रहा है। न सिर्फ हमास, बल्कि लेबनान का हिज्बुल्ला भी उसके पीछे पड़ा हुआ है। हिज्बुल्ला ने सीमा पर इजरायल की सेना (IDF) के सर्विलांस कैमरों को तबाह करने का दावा किया है। हमास ने इजरायल की राजधानी तेल अवीव में फिर से रॉकेट्स दागे हैं। इजरायल में 1400 लोग हमास के हमलों में मारे जा चुके हैं। अब तक 3968 लोग घायल हुए हैं, जिनमें से 351 अब भी अस्पताल में हैं।