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हाथ में हिडमा के पोस्टर, जेब में चिली स्प्रे: दिल्ली में पर्यावरण के रखवाले नहीं, ‘अर्बन नक्सल’ उतरे प्रदर्शन पर, पुराने ‘वामपंथी पैटर्न’ पर बनाया पुलिस को निशाना

       वामपंथियों ने नक्सली कमांडर माडवी हिडमा के समर्थन में लगाए नारे (साभार: एक्स @Riccha Dwivedi)
राजधानी दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। इसी गंभीर स्थिति का हवाला देते हुए कुछ युवाओं ने इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। शुरुआत में वे ये दिखा रहे थे कि वे हवा की खराब गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद उनका असली रंग सामने आ गया। वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में मारे गए खूंखार नक्सली हिडमा के समर्थन में नारेबाजी शुरू कर दी और ‘कॉमरेड हिडमा अमर रहे’ के नारे लगाए।

इन वापपंथी प्रदर्शनकारियों की तैयारी देखकर साफ समझा जा सकता है कि प्रदूषण तो एक बहाना था, इनका मुद्दा कुछ और था, क्योंकि प्रदर्शनकारी अपने साथ हिडमा के नाम लिखी तख्तियाँ और पोस्टर ही नहीं बल्कि पेपर स्प्रे भी लेकर आए थे। पुलिस ने जब इनसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की माँग की तो इन्होंने पुलिसकर्मियों पर इसका इस्तेमाल किया।

पुलिस के अनुसार,रविवार (23 नवंबर 2025) को करीब 4:30 बजे ये प्रदर्शनकारी इंडिया गेट के सी-हेक्सागन क्षेत्र में जुटे। वहाँ मौजूद पुलिस ने उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से हटने को कहा, लेकिन वे लगातार हिडमा के पक्ष में नारे लगाते रहे और निर्देशों को नजरअंदाज करते रहे।

पुलिस पर किया पेपर स्प्रे, घायल सुरक्षाकर्मियों का अस्पताल में चल रहा इलाज

स्थिति तब बिगड़ गई जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाना शुरू किया। इसी दौरान प्रदर्शन कर रहे  कुछ लोगों ने पुलिस पर पेपर स्प्रे कर दिया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। कई पुलिसकर्मियों की आँखों में तेज जलन हुई और तीन से चार कर्मियों को तुरंत आरएमएल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनका इलाज जारी है।

नई दिल्ली के DCP देवेश कुमार ने बताया, “पहली बार, हमने पुलिसवालों पर मिर्च स्प्रे का इस्तेमाल होते देखा। हमारे कुछ अधिकारियों की आँखों में स्प्रे लग गया और अभी उनका RML हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। इस बारे में कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”

मामले की जानकारी देते उन्होंने आगे कहा, “कुछ प्रदर्शनकारी C-हेक्सागन के अंदर जमा हो गए और फिर उस बैरिकेड को पार करने की कोशिश की जिसे हमने आने-जाने पर रोक लगाने के लिए लगाया था। हालाँकि, वे नहीं माने, उन्होंने बैरिकेड तोड़ दिया, सड़क पर आ गए, और वहीं बैठ गए। हमने उनसे हटने की रिक्वेस्ट की, क्योंकि उनके पीछे कई एम्बुलेंस और मेडिकल कर्मचारी इंतजार कर रहे थे और उन्हें इमरजेंसी एक्सेस की जरूरत थी…हमने ट्रैफिक में रुकावट से बचने के लिए उन्हें C-हेक्सागन से हटा दिया। हटाने के दौरान, कई प्रदर्शनकारियों की पुलिस से हाथापाई हुई, और हमारे कई कर्मचारी घायल हो गए।”

हंगामे के कारण ट्रैफिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि कुल 15 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है और उनके खिलाफ पुलिस पर हमला करने और हिंसक गतिविधियों में शामिल होने जैसी गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।

वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हिडमा को लेकर क्या बयान दिया?

असल में इन्हें दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण से तो कोई लेना-देना ही नहीं था। इनका टार्गेट ही अशांति पैदा करना था। एक वामपंथी ने इस पर बयान देते हुए तो भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा के तारीफ के पुल ही बाँध दिए।

उसने कहा, “हिडमा एक जनजातीय है जिसने अपने हक के लिए हथियार उठाए। इसे गलत कह सकते हैं, लेकिन वे इसके पीछे के कारण को नकार नहीं सकते। कॉर्पोरेटाइजेशन के खिलाफ लड़ाई जनजातीयों की लड़ाई है, यह पानी, जंगल और जमीन की लड़ाई है। इस वजह से नारायण कान्हा को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता। अपने हक की रक्षा करने वाले लोगों पर ऐसा दबाव नहीं डाला जा सकता।”

शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक बनाने की वापपंथियों की ये हरकते नई नहीं

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को दूसरा रंग दे दिया। उस समय किसानों के हितों की माँग का दावा करने वाले प्रदर्शनकारी अचानक उमर खालिद और शरजील इमाम की तख्तियाँ लेकर बैठ गए थे। इतना ही नहीं, उस समय भी पुलिस को टार्गेट करके हिंसा के प्रयास हुए थे।

इसके अलावा, साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई। पुलिस को निशाना बनाया गया। उनके ऊपर कहीं गर्म पानी फेंका गया था तो कीं हथियार लेकर उन्हें दौड़ाया गया था। उन्हें टारगेट करने के लिए दिल्ली दंगों में आरोपित गुलफिशा फातिमा जैसे लोगों ने उमर खालिद के कहने पर लाल मिर्च पाउडर, एसिड, बोतलें, डंडे तक जमा किए थे।

आज स्थिति दोबारा वैसी ही देखने को मिली है। जिसका मतलब साफ है कि पर्यावरण जैसा मुद्दा भी इन वामपंथियों के लिए सिर्फ अपना प्रोपेगेंडा फैलाने का एक साधन मात्र है। अंत में इनका असली चेहरा कभी नक्सल समर्थक, कभी आतंक समर्थक के तौर पर उभर कर आता है। इन्हें समस्या देश, देश की सरकार और देश के कानून से होती है और इनकी संवेदना देश विरोधी तत्वों से।

आज जिस हिडमा के लिए इन्होंने दिल्ली में पुलिस पर हमला किया है। क्या उसकी लड़ाई सच में अपनी जमीन और अधिकार की थी? क्योंकि अगर ऐसा होता तो उसके हाथ मासूमों की हत्या से लाल नहीं होते।

कौन था 26 बड़े हमलों का मास्टरमाइंड हिडमा?

हकीकत यही है कि हिडमा बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को सँभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिडमा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसे खत्म कर दिया।

हिडमा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।

3 अप्रैल 2021 को सुरक्षाबलों ने माड़वी हिडमा को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। बीजापुर में नक्सलियों ने जवानों पर हमला बोल दिया और इस मुठभेड़ में 22 जवान बलिदान हो गए थे। दंतेवाड़ा हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की बलिदानी हुई थी, इसका नेतृत्व भी इसी ने किया था।

दिल्ली ब्लास्ट के बाद UP सरकार का बड़ा कदम, मदरसों के बाहरी मौलाना-छात्रों का डेटा ATS को देना अनिवार्य

                 मदरसों के लिए बना नया नियम, ATS को देनी होगी जरूरी जानकारी (साभार: इंडिया टीवी)
कहते हैं "जहां न पहुंचे रवि, कहां पहुंचे कवि" जिसे 1958 में चरितार्थ किया कवि प्रदीप ने। प्रदीप के रचित इस गीत "कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से, संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से..." से तत्कालीन नेहरू सरकार इतनी भयभीत हो गयी कि इसके प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन उस प्रतिबंध को 1965 में हुए इंडो-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने। दूसरे, भारत में पल रहे गद्दारों को पकड़ने का शंखनाद शास्त्री जी ने कर दिया था। लेकिन उनके निधन के बाद मुस्लिम कट्टरपंथी और पाकिस्तानपरस्त नेताओं ने इस देशहित काम को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। 

अगर शास्त्री जी द्वारा देशहित के काम पर काम होता देश आतंकवाद, पत्थरबाज़ी और अब हुए दिल्ली ब्लास्ट नहीं होते। मुस्लिम कट्टरपंथियों को मालूम था कि हमारी हरकतों को बचाने हमारी गुलाम सियासती पार्टियां है। ये मुस्लिम कट्टरपंथियों की गुलाम पार्टियां जो पहलगाम में धर्म पूछकर महिलाओं को विधवा बनाने पर Operation Sindoor होने पर हत्यारों को पकडे जाने पर पूछने वाले आज दिल्ली ब्लास्ट करने वाले डॉक्टरों को भटका हुआ, गुमराह और बेगुनाह बताने वालों पर भी सरकार को कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं, पत्थरबाज़ी करने वालों में शामिल बच्चों को भी बच्चा समझ नहीं छोड़ना चाहिए। इन पर भी उसी तरह कार्यवाही करनी चाहिए जिस तरह बड़ों पर की जाती है। इन्हें आतंकवादियों का स्लीपर सेल मान कार्यवाही करनी होगी।         

दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके और इसमें फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन सामने आने के बाद पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट मोड पर हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए मदरसों की निगरानी को और मजबूत करने का फैसला किया है।

अब प्रदेश के सभी मदरसों, चाहे वे मान्यता प्राप्त हों या बिना मान्यता के, उसको अपने कर्मचारियों, मौलानाओं और छात्रों का पूरा विवरण ATS (Anti-Terrorism Squad) को उपलब्ध कराना होगा।

15 नवंबर 2025 को जारी एक पत्र में UP ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों (DWO) को निर्देश दिए कि वे अपने-अपने जिलों के सभी मदरसों के छात्रों और शिक्षकों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराएँ।

सरकार के अनुसार यह केवल सर्वे या साधारण जानकारी एकत्रित करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा ऑडिट है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे या मजहबी संस्थान में कोई संदिग्ध व्यक्ति छिपकर आतंकी गतिविधियाँ न चला सके।

इस कदम की पृष्ठभूमि में है अल-फलाह यूनिवर्सिटी का मामला, जिसमें विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को यह दिख चुका है कि एक निजी विश्वविद्यालय कैसे आतंक-संबंधी गतिविधियों के नेटवर्क के केंद्र के रूप में उभर सकता है।

यूपी सरकार ने मदरसों के लिए क्या नया नियम बनाया?

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के अनुसार, राज्य के सभी मदरसों, चाहे वो मान्यता प्राप्त हों या मान्यता प्राप्त ना हो, उसे यह सुनिश्चित करना है कि उन संस्थाओं में पढ़ने वाले सभी छात्रों तथा वहाँ कार्यरत मौलानाओं और शिक्षकों की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, मोबाइल नंबर, आधार-संख्या, स्थायी पता आदि की जानकारी UP ATS को समय-बद्ध रूप से उपलब्ध कराई जाए।
इसमें छात्रों के नाम, उनके पिता के नाम, पते और मोबाइल नंबर जैसी जानकारियाँ शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे का इस्तेमाल असामाजिक या आतंकी गतिविधियों के लिए न हो सके। फिलहाल यह आदेश सिर्फ इन आठ जिलों के लिए लागू किया गया है।
प्रयागराज के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि जिले के लगभग 206 मदरसों की जानकारी ATS को भेज दी गई है और अब इन जानकारियों का जमीनी सत्यापन शुरू हो चुका है।
इस आदेश को लेकर यूपी पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बताया कि पहले भी प्रदेश के कई मदरसों में अवैध गतिविधियों के मामले सामने आए हैं, इसलिए यह निगरानी जरूरी है।

 उन्होंने कहा, “समय-समय पर मदरसों से अलग-अलग मामले सामने आते रहते हैं। जैसे, प्रयागराज में करेंसी छापने के मामले सामने आए, और इसी तरह कुशीनगर में भी। बहराइच में विदेशियों और बाहरी लोगों के मदरसों में रहने का इंतजाम पाया गया। इसी तरह, हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके में एक डॉक्टर का नाम सामने आया और उसके आधार पर जाँच शुरू हुई।”

इस आदेश में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह सिर्फ डेटा जमा करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक सुरक्षा-ऑडिट है, ताकि किसी भी मदरसे में बाहरी राज्यों या देशों से आने वाले छात्रों-मौलानाओं की आवाजाही, संदिग्ध गतिविधियाँ व सुरक्षा-रिस्क पहले-से पकड़ी जा सके।

मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार की कोशिशें

इस दिशा में यूपी सरकार का दृष्टिकोण सिर्फ सुरक्षा-निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह प्रयास भी करने लगी है कि मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक स्वीकार्यता के साथ जोड़ा जाए।
मदरसों में पढ़ने-वाले छात्रों व वहाँ पढ़ाने-वाले मौलानाओं की जानकारी जुटाना और ATS को उपलब्ध कराना: इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होगा कि मदरसे सिर्फ मजहबी शिक्षा का केंद्र न बनें बल्कि उनकी संरचना, छात्र-छात्राओं की पृष्ठभूमि और भविष्य-संभावनाएँ भी ज्ञात हों।
बाहर-राज्यों या विदेशी छात्रों की आवाजाही पर विशेष ध्यान देना: यह देखा जा रहा है कि कुछ मदरसों में बाहरी राज्यों से आए छात्रों की संख्या काफी अधिक है, जिसे अब खुफिया एजेंसियों ने सन्देह के घेरे में लिया है।
मदरसों को आधुनिक पाठ्यक्रम अपनाने, मान्यता प्राप्त करने, मुख्यधारा की शिक्षा-संस्थाओं से तालमेल बिठाने की दिशा में प्रेरित करना: ताकि मदरसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से स्वीकार्य बने और उनके छात्र आगे-व्यावसायिक या विश्वविद्यालय-स्तर पर भी सहजता से आगे बढ़ सकें।

अवैध मदरसों पर कार्रवाई और दिल्ली ब्लास्ट के बाद जाँच-तेजी

मदरसों पर निगरानी पहले से चल रही थी, लेकिन हाल के में सामने आई घटनाओं, विशेष रूप से 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए ब्लास्ट ने जाँच-प्रक्रिया को और अधिक तीव्र कर दिया है।
इस ब्लास्ट के बाद राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों ने निर्देश दिया कि मजहबी और शैक्षणिक संस्थानों में आने-जाने वालों की पहचान और आवाजाही पर विशेष नजर रखी जाए। इसी सिलसिले में यूपी ATS ने मदरसों से डेटा जमा करने का अभियान शुरू किया है।
इसका मतलब यह है कि अब मदरसों के कार्य-प्रभावों के साथ-साथ, सुरक्षा-विचारों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है, ताकि कोई भी संस्थान अनियंत्रित रूप से आतंकी गतिविधियों का माध्यम न बने।
दिल्ली के लालकिले धमाके के बाद से सुरक्षा एजेंसियों की नजर फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी पर टिकी हुई है। इस यूनिवर्सिटी को संदेह के घेरे में रखा गया है क्योंकि यहाँ कई ऐसे प्रोफेसर और बाहरी लोग सक्रिय पाए गए हैं, जिन पर आतंकियों को पनाह देने और उनके साथ मिलकर खुफिया तौर पर गतिविधियाँ करने का शक है।

मुस्लिम और विपक्ष कर रहा नए नियम का विरोध

मदरसों के लिए बनाए गए इन नियमों का मुस्लिम लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सरकार उनकी प्रोफाइलिंग करने की कोशिश कर रही है। जबकि एजेंसियाँ पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि यह सब कुछ केवल सुरक्षा की दृष्टि से किया जा रहा है।
वहीं इस कार्रवाई पर विपक्ष ने भी नाराजगी जताई है। कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शहजाद आलम ने कहा कि सरकार सुरक्षा के नाम पर डर पैदा कर रही है और हर मुस्लिम को शक की निगाह से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अगर ATS इतनी जाँच कर रही है तो उसे अपने मामलों के नतीजों पर भी श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, क्योंकि कई मामलों में कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अमीक जामेई ने भी कहा कि देश आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह एकजुट है, लेकिन मदरसों को ATS से जाँच के दायरे में लाना अनावश्यक कदम है और इससे भ्रम और माहौल खराब होगा।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब एक मकान मालिक किसी नए किराएदार को घर में रहने की अनुमति देता है तो उससे पहले उससे न सिर्फ उसकी जानकारी लेता है बल्कि कुछ जरूरी दस्तावेज भी अपने पास जमा करवाता है। जाहिर सी बात है कि अगर मदरसों में देश के नहीं बल्कि बाहरी छात्रों की संख्या भी अधिक देखने मिल रही है, तो ऐसे में उनकी जानकारी आवश्यक है।
उस पर अल-फलाह जैसे विश्वविद्यालयों से सामने आ रही कश्मीरी छात्रों की संख्या, विश्वविद्यालय के अंदर पढ़ा रहे जिहादी प्रोफेसर इन नियमों को लागू करना और भी आवश्यक बना देते हैं।

ब्रिटेन : नाक फोड़ी, दाँत तोड़े और पुलिस को मारे लात-घूँसे: लंदन की सड़कों पर एक साथ उतरे 1.5 लाख अंग्रेज, क्यों निकाली गई ‘यूनाइट द किंगडम’ रैली

               लंदन में अप्रवासन के खिलाफ सड़कों पर उतरे 1.50 लाख लोग (साभार: The Guardian)
ब्रिटेन के लंदन में शनिवार (14 सितंबर 2025) को 1.50 लाख से ज्यादा लोग ‘यूनाइट द किंगडम’ के बैनर लिए सड़क पर उतरे। इस रैली का नेतृत्व एंटी इमिग्रेशन एक्टिविस्ट टॉमी रॉबिन्सन ने किया। लंदन के व्हाइट हॉल के पास प्रदर्शनकारियों और पुलिस की झड़प भी हुई, जिसमें 26 पुलिसकर्मी घायल हो गए, इनमें 4 की हालत गंभीर है।

 प्रदर्शनकारियों ने ब्रिटेन और अमेरिका के झंडे में लिपटे हुए ‘Stop the Boats’, ‘Send Them Home’ और ‘We Want Our Country Back’ जैसे नारे लगाए। असिस्टेंट कमिश्नर मैट ट्विस्ट ने कहा, “बहुत लोग शांतिपूर्ण तरीके से आए थे लेकिन बड़ी संख्या में लोग हिंसा फैलाने की नीयत से पहुँचे थे। उन्होंने पुलिस पर लात-घूँसों से हमला किया और सुरक्षा घेरे को तोड़ने की कोशिश की। कई पुलिसकर्मी के दाँत टूटे हैं और नाक भी फोड़ी गई। “

इस रैली में अमेरिकी एक्टिविस्ट चार्ली किर्क को भी याद किया गया। उनकी याद में एक मिनट का मौन रखा गया और बगपाइपर ने ‘अमेजिंग ग्रेस’ धुन बजाई।

‘यूनाइट द किंगडम’ प्रदर्शन की वजह क्या है ?

ब्रिटेन में ‘यूनाइट द किंगडम’ प्रदर्शन देश में अवैध अप्रवासन के खिलाफ किया जा रहा है। इस प्रदर्शन की माँग है कि अवैध प्रवासियों को देश से बाहर किया जाए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल 28 हजार से ज्यादा प्रवासी इंग्लिश चैनल के रास्ते नावों से ब्रिटेन पहुँचे हैं।

टॉमी रॉबिन्सन ने बुलाई रैली

टॉमी रॉबिन्सन का असली नाम स्टीफन याक्सली-लेनन है। रॉबिन्सन ने इंग्लिश डिफेंस लीग की स्थापना की है और लगातार एंटी मुस्लिम और एंटी इमिग्रेशन मामले में आवाज उठा रहे हैं। रॉबिन्सन ने ही एंटी-इमिग्रेशन के खिलाफ लंदन में भीड़ जुटाई।

रॉबिन्सन ने भीड़ से कहा कि प्रवासियों को अदालत में ‘ब्रिटिश जनता, जो इस राष्ट्र के निर्माता हैं’ से अधिक अधिकार प्राप्त हैं। उनके आह्वान पर लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। इस दौरान टॉमी रॉबिन्सन ने एक्स पर पोस्ट में कहा, “आज लाखों लोग यूनाइटेड द किंगडम फ़्री स्पीच फ़ेस्टिवल में शामिल होने के लिए आ रहे हैं!!!!”

टॉमी रॉबिन्सन ने आगे लिखा, “कोई भी मेनस्ट्रीम मीडिया जो इसके अलावा कुछ भी छापता है, वह झूठ बोल रहा है। तो बेझिझक उनकी बकवास पर उन्हें फटकार लगाएँ और यह वीडियो उन्हें भेजें।”

ब्रिटेन में अप्रवासन बड़ा राजनीतिक मुद्दा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रिटेन में अप्रवासन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर सामने आया है। इस मुद्दे से देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था की चिंताए दब गई हैं क्योंकि देश में शरण के लिए काफी संख्या में लोग आ रहे हैं। साल 2025 में अब तक 28000 से ज्यादा प्रवासी छोटी नावों में चैनल पार करके पहुँच चुके हैं।

क्या विरोधियों ने नेपाल में गुंडागर्दी ने पलटा तख्ता; क्या नेपाल जलाने से बेरोजगारी और भ्रष्टाचार दूर हो गया; सेना ने देश की कमान संभाली; वामपंथियों ने खून बहा अस्थिरता की ओर धकेला, अब सोशल मीडिया के लिए उबल रहा Gen-Z

                                        नेपाल में प्रदर्शन की प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)
क्या श्रीलंका और बांग्लादेश की चुनी हुई सरकार को जिस तरह से साजिश के तहत गिराया गया था, क्या वही नेपाल के साथ हो रहा है? श्रीलंका और बांग्लादेश में जिस तरह संसद पर कब्जा किया गया और अराजकता फैलाया गया, नेपाल में भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है।

नेपाल की राजधानी काठमांडू से लेकर आसपास के 7 बड़े जिलों की सड़कों पर हजारों युवा इकट्ठा होकर सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। पुलिस की गोलियाँ चलीं, आँसू गैस के गोले फूटे और अब तक कम से कम 19 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि 347 से ज्यादा घायल हो गए हैं।

इन प्रदर्शनों के पीछे सोशल मीडिया बैन को वजह बताया जा रहा है। हैरानी की बात है कि जो देश दशकों तक हिंसा से जूझता रहा। जिस देश में राजशाही खत्म होने के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था लाई गई, वो देश राजनीतिक स्थिरता के लिए तरसता रहा। उस देश में बेरोजगारी चरम पर है। लोगों के पास काम नहीं है। देश लगातार पीछे जा रहा है। उस देश में युवा रोजगार और नौकरियों के लिए नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर बैन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं।

नेपाल की संसद में घुसे प्रदर्शनकारी

नेपाल में सोशल मीडिया इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर बैन लगाए जाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ युवा विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। जेन जी यानी 18 से 30 साल के युवा सोमवार (8 सितंबर 2025) को संसद में घुस गए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए आँसू गैस के गोले दागे और पानी का बौछार किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ भी चलाई गईं। इसमें अब तक 14 प्रदर्शनकारियों की मौत की खबर है।

हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि ये प्रदर्शन सिर्फ सोशल मीडिया ऐप्स जैसे फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट पर लगे बैन के खिलाफ शुरू हो हुआ, लेकिन इसकी जड़ में भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म (यानी परिवारवाद) और बेरोजगारी के खिलाफ भरा गुस्सा भी है। लेकिन ये गुस्सा अब तक क्यों नहीं दिखा, लोगों के मन में ये सवाल भी उठ रहा है।

दशकों की माओवादी हिंसा, फिर राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है नेपाल

पहले नेपाल की स्थिति समझिए। नेपाल दो दशक पहले तक माओवादी हिंसा से जूझ रहा था। 1996 से 2006 तक चले गृहयुद्ध में हजारों लोग मारे गए, और उसके बाद से राजनीतिक अस्थिरता का सिलसिला थमा नहीं। राजशाही खत्म हुई, लोकतंत्र आया, लेकिन सरकारें बदलती रहीं।

आज नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) की सरकार है, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में। लेकिन भ्रष्टाचार की शिकायतें आसमान छू रही हैं। युवा कहते हैं कि नेता अपने परिवारवालों को पोस्ट देते हैं, ‘नेपो किड्स’ को फायदा पहुँचाते हैं जबकि आम लोग भूखे मर रहे हैं। और अब सोशल मीडिया बैन ने आग में घी डाल दिया।

5 सितंबर 2025 से नेपाल सरकार ने 26 बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा दिया। वजह? ये कंपनियाँ नेपाल में रजिस्टर नहीं हुईं, लोकल ऑफिस नहीं खोले और टैक्स नहीं दे रही थीं। सरकार का कहना है कि ये प्लेटफॉर्म फेक आईडी, हेट स्पीच और फ्रॉड फैला रहे हैं, इसलिए रेगुलेशन जरूरी है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये फ्री स्पीच पर हमला है।

नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से कहा था कि आप कानून बनाकर सोशल मीडिया को रेगुलेट कर सकते हैं, लेकिन कैबिनेट डिसीजन से ऐसा करना सही नहीं होगा। इसके बावजूद ओली सरकार नहीं मानी और 26 ऐप्स को बैन कर दिया।

नतीजा? काठमांडू, पोखरा, भैरहावा, भरतपुर, इतहारी और दमक जैसे शहरों में प्रदर्शन फैल गए। जेन-जी (यानी 1997-2012 में जन्मे युवा) स्कूल-कॉलेज यूनिफॉर्म पहनकर सड़कों पर उतरे, नारे लगाए- ‘एनफ इज एनफ’ (बस बहुत हो गया)।

पुलिस ने रबर बुलेट्स, वॉटर कैनन और यहाँ तक कि प्रदर्शनकारियों पर सीधे फायरिंग भी की गई। इसी कड़ी में 8 सितंबर 2025 को संसद के बाहर प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़े, जिसके बाद गोलीबारी में 17 मौतें काठमांडू में ही हुईं। स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़े के मुताबिक, नेपाल में 19 मौतें हो चुकी हैं, जबकि 347 युवा घायल हुए हैं।

नेपाल में बवाल के पीछे की असल वजह क्या?

अब मुख्य कारण पर आते हैं- बेरोजगारी और भ्रष्टाचार। नेपाल में युवाओं की हालत बहुत खराब है। वर्ल्ड बैंक के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक, 2024 में बेरोजगारी दर 10.71% थी, और 2025 के अंत तक ये 10% तक रहने की उम्मीद है। लेकिन युवाओं में ये दर और ज्यादा है- करीब 20-25% युवा बेरोजगार हैं।

देश की आबादी 3 करोड़ है, और 15-24 साल के युवाओं में बेरोजगारी सबसे ज्यादा। पैसा नहीं, नौकरी नहीं, तो युवा अपना समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं। वो वहाँ दोस्तों से जुड़ते हैं, दुनिया की खबरें लेते हैं, और हाँ कुछ कमाई भी करते हैं। यूट्यूब पर वीडियो बनाकर, इंस्टाग्राम पर इन्फ्लुएंसर बनकर, या फेसबुक पर छोटे बिजनेस चलाकर। लेकिन बैन ने ये सब छीन लिया।

एक युवा प्रदर्शनकारी ने कहा, “हमारे पास खाने को पैसे नहीं, काम नहीं, अब मनोरंजन और आवाज का साधन भी छीन लिया।” ये गुस्सा जायज है। नेपाल पहले से ही गरीबी से जूझ रहा है- जीडीपी पर कैपिटा महज 1,300 डॉलर है और महंगाई 7% से ऊपर। युवा विदेश जा रहे हैं- हर साल लाखों नेपाल छोड़कर मलेशिया, कतर जैसे देशों में मजदूरी करते हैं। घर पर रहने वाले सोशल मीडिया से जुड़े रहते थे, अब वो भी गया।

ये प्रदर्शन सिर्फ बैन के खिलाफ नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ हैं। युवा नेपो किड्स (नेता के बच्चे) पर हमला बोल रहे हैं, जो बिना मेहनत के पोस्ट पा जाते हैं। भ्रष्टाचार के मामले जैसे कोऑपरेटिव फ्रॉड, जहाँ लाखों लोगों का पैसा डूब गया।

ये सबकुछ देखते हुए, समझते हुए सवाल भी उठ रहे हैं कि जो देश इन सब समस्याओं से लगातार प्रभावित रहा हो, वहाँ अब तक जनता खामोश क्यों बैठी रही? ये जेन-जी जेनरेशन सोशल मीडिया बैन के बाद ही क्यों जागी? सवाल ये भी है कि इन प्रदर्शनों के पीछे सिर्फ सोशल मीडिया बैन ही है, या फिर कोई अन्य ताकत?

कांग्रेस की नई उम्मीद भी फेल

नेपाल के इन प्रदर्शनों को लेकर इंडियन यूथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी ने ट्वीट किया, “नेपाल के जागरूक युवाओं ने बगावत कर दी है। तानाशाही ज्यादा दिनों तक चलती नहीं, चाहे कोई भी मुल्क हो।” उनके ट्वीट में एक वीडियो भी है जहाँ युवा सड़कों पर उतरे दिख रहे हैं।
अब भारत की बात। कांग्रेस पार्टी को लगता है कि अगर यहाँ सोशल मीडिया पर पाबंदी लगी या कंपनियाँ पैसा बंद कर दें, तो भारतीय युवा भी सड़कों पर आ जाएँगे। शाहीन बाग, किसान आंदोलन की तरह। वो उम्मीद जता रही है कि नेपाल का ये आंदोलन भारत में विपक्ष को मजबूत करेगा। हालाँकि सवाल ये भी है कि नेपाल भारत का मित्र राष्ट्र रहा है। ऐसे में नेपाल के अंदर की अस्थिरता भारत के हित में कभी नहीं होती, इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी के नेता नेपाल में आई अस्थिरता को लेकर खुश हो रहे हैं, तो ये सोचने वाली बात है।
वैसे, भारत की बात करें तो भारत में सोशल मीडिया का मार्केट बहुत बड़ा है। 2025 में भारत में 491 मिलियन सोशल मीडिया यूजर्स हैं, जो कुल आबादी का 33.7% है। इंटरनेट यूजर्स 806 मिलियन हैं। सोशल मीडिया से लोग कैसे कमाते हैं? इन्फ्लुएंसर्स यूट्यूब, इंस्टाग्राम से लाखों कमाते हैं- स्पॉन्सरशिप, ऐड्स से। छोटे बिजनेस वाले फेसबुक पर प्रोडक्ट बेचते हैं। डिजिटल मीडिया मार्केट 2023 में 21.85 बिलियन डॉलर था, जो 2030 तक 61.36 बिलियन तक पहुँचेगा। सोशल मीडिया मैनेजमेंट मार्केट 2024 में 263.3 मिलियन डॉलर है, जो 2030 तक 1.16 बिलियन हो जाएगा।
हालाँकि रही बात भारत में ऐसे आंदोलनों की, तो वो होने से रही। भारत में सोशल मीडिया हो या न्यू मीडिया, सरकार की गाईडलाइन्स भी हैं और यूजर्स के हितों की रक्षा भी। चूँकि भारत का लोकतंत्र बहुत मजबूत है। भारत सरकार लगातार युवाओं के लिए कदम उठा रही है। नौकरियों से लेकर रोजगार तक में पिछली सरकारों से बेहतर ट्रैक रिकॉर्ड इस सरकार का रहा है। ऐसे में कुछ लोगों के चाहने भर से नेपाल जैसी स्थिति हो जाए, ऐसा फिलहाल नजर नहीं आता है।

बिहार बंद : उपद्रव करवा भाषणबाजी कर भाग गए राहुल गाँधी-तेजस्वी यादव: चुनाव आयोग के अधिकारी करते रहे इंतजार, नहीं बताया वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन में क्या है आपत्ति; INDI गठबंधन की गुलाम मीडिया खामोश, क्यों?

                                     पटना में राहुल - तेजस्वी और पप्पू समेत अन्य (फोटो साभार: Swadeshi)

किस तरह जनता को गुमराह किया जाता है जुलाई 9 को INDI गठबंधन द्वारा बुलाया बिहार बंद में सामने आ गया। पुलिस के लठ खाए कार्यकर्ताओं ने लेकिन तेजस्वी और राहुल भाषणबाज़ी कर भाग गए। चुनाव आयोग अधिकारी इंतज़ार में सूखे जा रहे हैं। आखिर चुनाव आयोग कार्यालय गठबंधन का कोई नेता नहीं पहुंचा, क्यों? दरअसल बात है कि जो चोर होता है उसको सारे ही चोर नज़र आते हैं। मालूम है तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस की 400+ सीटें कैसे आयी थी। इंदिरा हत्या की सहानुभूति नहीं बल्कि वोटर लिस्ट से लाखो विरोधियों के वोट ही निकाल दिए थे। यानि तब चुनाव आयोग कांग्रेस के इशारे पर काम करता था। सच्चाई जानने के उस समय Organiser Weekly के प्रथम पृष्ठ पर मेरी रपट "Lakhs of BJP voters deleted from Voter list" पढ़ लो। इतने वर्षो बाद भी इस समाचार कर खंडन नहीं हुआ।  

संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले हाथों में संविधान लेकर इसकी दुहाई देकर जनता को गुमराह कर देश में उपद्रव करना चाहा रहे हैं। आखिर कब तक और कितना झूठ परोसकर वोट लेते रहोगे उपद्रवियों। अब कल की INDI गठबंधन की हरकत देख इन्हे नेता की बजाए उपद्रवी नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए। आम जनता परेशान, प्रशासन परेशान मदारी तमाशा कर भाग गए। अगर मतदाता सूची ठीक जा रही है तो इन्हे तकलीफ क्यों हो रही है? ऐसे अब चुनाव को एक काम और करना चाहिए कि कटने वाले नाम किस पार्टी ने जुड़वाए थे, उन पर कार्यवाही करे।  

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर बवाल मचा हुआ है। हर तरफ प्रदर्शन हो रहे हैं। सड़कें, रेल बंद हैं। लेकिन नेता लोग अपना भाषण देकर गायब हो गए। वहीं, अब भी कार्यकर्ता सड़कों पर लोट रहे हैं।

दरअसल, विपक्षी महागठबंधन ने इसे बीजेपी और चुनाव आयोग की साजिश बताकर बुधवार (9 जुलाई 2025) को ‘बिहार बंद’ बुलाया। सुबह से ही सड़कों पर हंगामा शुरू हो गया। पटना से लेकर दरभंगा, आरा, कटिहार तक महागठबंधन के कार्यकर्ताओं ने चक्का जाम कर दिया।

कहीं ट्रेनें रोकी गईं, कहीं हाईवे जाम किए गए। पटना के आयकर गोलंबर पर तो कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सड़क पर चादर बिछाकर लेट गए, बोले – “गाड़ी भी चढ़ जाए, हम नहीं उठेंगे!” वैशाली में RJD के लोग भैंस लेकर प्रदर्शन करने पहुँच गए। कोई रेलवे ट्रैक पर लेटा, तो कोई गाँधी सेतु पर आगजनी करता दिखा। पूरे बिहार में बाजार बंद, बस-ट्रेन ठप, जनता परेशान।

इधर, तेजस्वी यादव और राहुल गाँधी ने पटना में खुले ट्रक पर चढ़कर जोरदार भाषण दिए। तेजस्वी ने कहा, “ये बीजेपी की चाल है, गरीबों-दलितों का वोट छीनने की।” राहुल ने महाराष्ट्र के ‘वोट चोरी’ वाले आरोप को बिहार से जोड़ते हुए आयोग पर निशाना साधा।

राहुल गाँधी हो या तेजस्वी यादव, दोनों ने कार्यकर्ताओं को भड़काया और मार्च की शुरुआत की, लेकिन शहीद स्मारक के पास पुलिस ने रोक लिया। भाषण खत्म, फोटो खिंचवाए और दोनों नेता गायब। राहुल दिल्ली लौट गए, तेजस्वी घर। चुनाव आयोग के दफ्तर में अफसर इंतजार करते रह गए कि शायद कोई प्रतिनिधिमंडल आए, उनकी शिकायत सुने। लेकिन कोई नहीं पहुँचा।

              नेताओं के आने का इंतजार करते चुनाव आयोग के अधिकारी (फोटो साभार: Live Hindustan)  

विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची के लिए माँगे गए 11 दस्तावेजों में आधार कार्ड जैसी चीजें शामिल नहीं, जिससे गरीबों के नाम कट सकते हैं। तेजस्वी ने सवाल उठाया, “आयोग को ये हक किसने दिया?” उधर, आयोग का कहना है कि ये काम संविधान और कानून के तहत हो रहा है। ईसी का कहना है कि “किसी वैध वोटर का नाम नहीं कटेगा, सिर्फ घुसपैठियों और फर्जी नाम हटाए जाएँगे।” सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर 10 जुलाई को सुनवाई है, लेकिन उससे पहले बिहार की सड़कों पर सियासत गरमा गई।

बंद की वजह से आम लोग खासे परेशान दिखे। एक ऑटो ड्राइवर ने कहा, “नेता तो भाषण देकर चले गए, हमारी कमाई का क्या?” स्कूल-कॉलेज बंद, दुकानें सूनी, मरीज अस्पताल नहीं पहुँच पाए। विपक्ष का दावा है कि ये ‘लोकतंत्र बचाने’ की लड़ाई है, लेकिन सड़क पर भैंस और चादर लेकर प्रदर्शन देख जनता भी हैरान है। अब सवाल ये कि क्या ये बंद वाकई गरीबों की आवाज उठा रहा है या सिर्फ सियासी ड्रामा?

फिर निकल आया कार्टून जिन्न : तुर्की की पत्रिका ने बनाया मोहम्मद वाला कार्टून, भड़क गए इस्लामी कट्टरपंथी: कहा- पैगम्बर का किया अपमान, 3 कार्टूनिस्ट गिरफ्तार

                      तुर्की में लेमन पत्रिका के कार्टून को लेकर बवाल ( फोटो साभार-turkiyetoday.com/ )
2015 में फ्रांस गैर-मुस्लिम देश में व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ द्वारा विवादित कार्टून प्रकाशित होने खूब दंगे हुए, दंगों का अखाडा भारत कैसे पीछे रहता। लेकिन अब इतने सालों बाद कार्टून का जिन्न मुस्लिम देश तुर्की में निकल आया है। देखना यह है कि अब कितने दंगाई निकल कर आते हैं?     

तुर्की की साप्ताहिक व्यंग्य पत्रिका लेमन इन दिनों सुर्खियों में है। वजह है इसमें छपा कार्टून। दरअसल कार्टून में ‘मुहम्मद’ और ‘मूसा’ नाम के दो व्यक्तियों को आसमान में हाथ मिलाते दिखाया गया है और नीचे जमीन जल रही है। मुस्लिम कट्टरपंथियों का आरोप है कि ये पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा हैं।

इसके बाद मुस्लिम बहुल देश की भावनाएँ भड़क गई और देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन होने लगे। इस मामले में पुलिस ने तीन कार्टूनिस्टों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें कार्टूनिस्ट डोगन पेहलवान और पत्रिका के प्रबंध संपादक और प्रमुख संपादक शामिल हैं।

तुर्की के कानून मंत्री यिलमाज तुनक ने जून 30 को कहा कि तुर्की के अधिकारियों ने पत्रिका लेमन के खिलाफ़ आपराधिक जाँच शुरू कर दी है। तुनक ने अपने बयान में कहा कि इस्तांबुल के पुलिस कार्यालय ने तुर्की दंड संहिता की धारा 216 के तहत जाँच शुरू की है, जो “सार्वजनिक रूप से मजहबी मूल्यों का अपमान करने” से संबंधित है।

क्या है मामला?

पत्रिका के 26 जून के अंक में छपे कार्टून में इज़राइल और ईरान के बीच हाल ही में हुए संघर्ष का संदर्भ दिया गया था और इसमें पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा को बमबारी से तबाह हुए शहर के ऊपर हाथ मिलाते हुए दिखाया गया था। कार्टून में नीचे जमीन पर जलता शहर और मिसाइलें दिखाई गई हैं।

पत्रिका का कहना है कि इस कार्टून का मकसद इजरायली हमले के दौरान ईरान में मारे गए एक मुस्लिम व्यक्ति की पीड़ा उजागर करना है। उसका नाम कार्टून में ‘मुहम्मद’ रख दिया गया है।

पत्रिका के प्रमुख संपादक तुन्के अकगुन ने एएफपी से बात करते हुए कहा है, “इस कार्टून में दिये गए नाम मुहम्मद का पैगंबर मुहम्मद से कोई लेना देना नहीं है। मुहम्मद नाम से करोड़ों लोग दुनियाभर में रहते हैं। ” पत्रिका ने कहा कि कार्टून का उद्देश्य धार्मिक मूल्यों का मजाक उड़ाना नहीं था।

इस्तांबुल में लेमन के कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन

कार्टून को तुर्की में धार्मिक भावनाओं का अपमान माना गया और कट्टरपंथी संगठन सड़कों पर उतर आए। इस्तांबुल के इस्तिकलाल स्ट्रीट पर लेमन की इमारत के सामने कई प्रदर्शनकारी एकत्र हुए। कुछ लोग लेमन के कार्यालय में घुसने की कोशिश करते देखे गए।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लेमन पत्रिका ने पैगंबर मुहम्मद का खुलेआम अपमान किया है। इस अपमान को कभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता।

ऐसा ही एक मामला 2015 में फ्रांस में सामने आया था। उस वक्त भी मामला पैगंबर मुहम्मद के कार्टून का ही था। जब व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के कार्यालय में घुस कर मुस्लिम कट्टरपंथियों ने फायरिंग की थी। इसमें संपादक समेत 12 लोगों की मौत हो गयी थी।

खैबर-पख्तूनख्वा में क्यों उठी बगावत की चिंगारी? पाकिस्तान में सरकार को मुख्यमंत्री ही दे रहे धमकी :‘गोली का जवाब गोली से, गोले का जवाब गोले से’

                             खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर (फोटो साभार: Tribune.pk/X)
पाकिस्तान में उठापटक तेज हो गई है। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर ने हाल ही में पाकिस्तान में एक बड़े राजनीतिक आंदोलन की घोषणा की। उनका कहना था कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि बिना इस आंदोलन के देश में कोई सुधार संभव नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “अब सरकार की ओर से होने वाले किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा। अगर गोली चलाई गई, तो उसका जवाब गोली से दिया जाएगा, अगर किसी ने लाठी चलाई, तो लाठी से जवाब मिलेगा, और अगर गोले दागे गए, तो उसका जवाब भी गोले से ही दिया जाएगा।”

गंडापुर ने कहा कि अब अगर कोई चलाएगा तो उसके ऊपर गोली चलाई जाएगी। अगर तुम एक गोली मारोगे तो हम तो हम 10 गोली चलाएँगे। यह बयान तब आया जब गंडापुर रावलपिंडी में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें बुरहान इंटरचेंज पर रोक दिया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रावलपिंडी में PTI के समर्थक अपने नेता इमरान खान के आह्वान पर सड़कों पर उतरे थे। यह प्रदर्शन तब हुआ जब पार्टी के कई बड़े नेता देश में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने का आह्वान कर रहे थे। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य था सरकार की नीतियों का विरोध करना और PTI के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना। हालाँकि, इस प्रदर्शन में हिंसा भड़क उठी और PTI समर्थकों और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हो गईं। पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और रबर की गोलियां चलाईं, जबकि प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी और लाठीचार्ज का सामना किया।

अली अमीन गंडापुर, जो कि इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए जा रहे थे, उन्हें बुरहान इंटरचेंज पर कई घंटों तक रोका गया। प्रशासन ने PTI के विरोध को रोकने के लिए कई जगहों पर कंटेनर लगा दिए थे और सड़कों को बंद कर दिया था। इससे गंडापुर का काफिला भी कई घंटे तक इंटरचेंज पर फँसा रहा। इस दौरान उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संदेश भेजा कि उन्हें प्रदर्शन खत्म करना होगा और वापस लौटना होगा।

उन्होंने अपने समर्थकों से कहा, “हम अपने संवैधानिक अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सरकार हमें हमारा अधिकार देने को तैयार नहीं है। जब हम वापस लौटेंगे, तो अपने साथ सभी संसाधन लाकर फिर से संघर्ष करेंगे।” उनके इस बयान से साफ था कि वह इस संघर्ष को और अधिक तीव्रता से जारी रखने के लिए तैयार हैं।

गंडापुर ने एक  वीडियो संदेश में दावा किया कि पुलिस ने उनके समर्थकों पर सीधे फायरिंग की और आंसँ गैस के गोले दागे। उनके मुताबिक, हर तीन किलोमीटर पर पंजाब पुलिस गोलियाँ और गोले दाग रही थी। इस दौरान तीन PTI कार्यकर्ताओं को गोली लगी और 50 से अधिक लोग घायल हुए। यह एक गंभीर आरोप था, जिसने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया।

गंडापुर ने यह भी दावा किया कि PTI कार्यकर्ताओं ने कुछ पुलिसकर्मियों को पकड़ लिया था, लेकिन उनके आदेश पर उन्हें रिहा कर दिया गया। इस बयान के साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वह इसे कोई धमकी नहीं मानते, बल्कि इसे एक “अंतिम चेतावनी” के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका संदेश था कि अगर सरकार और संस्थाएं जनता की आवाज नहीं सुन सकतीं, तो उन्हें पीछे हट जाना चाहिए और राजनीतिक निर्णयों को राजनीतिक नेताओं के हाथों में छोड़ देना चाहिए।

हालाँकि, जब गंडापुर ने प्रदर्शन को स्थगित करने का ऐलान किया, तो PTI के समर्थकों में भारी नाराजगी देखी गई। बुरहान इंटरचेंज पर प्रदर्शनकारियों ने गंडापुर के खिलाफ नारेबाजी की और उनके वाहन को घेर लिया। उन्होंने गंडापुर से इस्तीफा देने की मांग की, क्योंकि वे प्रदर्शन खत्म करने के उनके फैसले से सहमत नहीं थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उन्हें संघर्ष जारी रखना चाहिए था।

PTI नेता आज़म स्वाती ने इस स्थिति में हस्तक्षेप किया और प्रदर्शनकारियों को शांत किया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय PTI के अध्यक्ष इमरान खान के निर्देशों पर लिया गया है और हमें उनके आदेश का पालन करना होगा। स्वाती के हस्तक्षेप से प्रदर्शनकारियों को शांत किया गया और अंततः प्रदर्शन खत्म हो गया।

इससे पहले, पंजाब सरकार ने रावलपिंडी में धारा 144 लागू कर दी थी, जिससे किसी भी प्रकार की राजनीतिक रैली, धरना या विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाई गई थी। इसके बावजूद PTI ने प्रदर्शन करने का फैसला किया था, जो बाद में हिंसक रूप में बदल गया। पुलिस ने शहर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे और शहर को “हाई अलर्ट” पर रखा गया था। रावलपिंडी के सभी प्रवेश और निकास बिंदुओं पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। पुलिस के प्रवक्ता ने साफ कर दिया था कि शहर में किसी भी अवैध जनसभा की अनुमति नहीं दी जाएगी और अगर किसी ने कानून का उल्लंघन किया, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

प्रदर्शन के दौरान PTI के कुछ प्रमुख नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया। PTI अध्यक्ष बैरिस्टर गोहर अली खान और सलमान अकरम राजा को रावलपिंडी के पास सेक्टर H-13 में हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने उन्हें रोककर हिरासत में ले लिया था, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। गोहर और सलमान ने बाद में बताया कि पुलिस ने उन्हें रावलपिंडी जाने से मना कर दिया था और वापस लौटने का निर्देश दिया था।

PTI ने पहले रावलपिंडी के लियाकत बाग में एक बड़ी जनसभा करने की योजना बनाई थी, लेकिन बाद में इमरान खान के निर्देश पर इसे प्रदर्शन में बदल दिया गया। PTI ने लाहौर हाई कोर्ट की रावलपिंडी बेंच से रैली के लिए NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) माँगने की अर्जी भी वापस ले ली थी।

गंडापुर के नेतृत्व में यह आंदोलन सरकार के खिलाफ PTI के संघर्ष का एक हिस्सा है, जो लंबे समय से जारी है। PTI के समर्थकों का मानना है कि उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है और इस आंदोलन का उद्देश्य इन अधिकारों को पुनः प्राप्त करना है।

अली अमीन गंडापुर के नेतृत्व में PTI का यह नया आंदोलन पाकिस्तान की राजनीति में एक नया मोड़ ले सकता है। उनके नेतृत्व में पार्टी ने सरकार के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई और प्रदर्शन किया, लेकिन पुलिस और प्रशासन के कड़े कदमों के कारण उन्हें अपने समर्थकों को वापस बुलाना पड़ा। इसके बावजूद, गंडापुर और PTI के अन्य नेता इस संघर्ष को जारी रखने का संकल्प ले चुके हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह आंदोलन किस दिशा में आगे बढ़ता है और पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिति पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

बंगाल में ‘TMC छात्र परिषद’ के गुंडे मुस्ताफिजुर का खौफ : लड़कियों को आइटम सॉन्ग पर नचाता, हॉस्टल पर कर रखा था कब्जा: जूनियर डॉक्टरों ने वसूली के लगाए आरोप

                 मेदिनीपुर अस्पताल में प्रदर्शन करते डॉक्टर (चित्र साभार: YouTube/ ABP Ananda)
पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टरों ने गुरुवार (29 अगस्त, 2024) को एक धरना दिया। यह डॉक्टर तृणमूल छात्र परिषद (TMCP) के नेता मुस्ताफिजुर रहमान मलिक द्वारा उन्हें लगातार परेशान किए जाने के खिलाफ धरना दे रहे थे।

आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष के करीबी मुस्ताफिजुर पर रैगिंग में शामिल होने का आरोप है। उसने कथित तौर पर जूनियर महिला डॉक्टरों को आइटम गानों पर डांस करने तक के लिए मजबूर किया है। धरना दे रहे मोहम्मद सीबी नाम के एक डॉक्टर के अनुसार, मुस्ताफिजुर ने करीब 3 साल पहले मेदिनीपुर मेडिकल कॉलेज से डिग्री ली थी।

वह पढ़ाई पूरी होने के बाद भी यहीं जमा हुआ है और हॉस्टल में ही रहता है। मोहम्मद ने बताया “वह हमें परेशान करते रहता है और जूनियर डॉक्टरों को हॉस्टल से बाहर निकालने की धमकी देता है। जब हम मुस्ताफिजुर से कहते हैं कि हम उसके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाएँगे तो वह बताता है कि इससे कुछ नहीं होगा। भले ही शिकायत स्वास्थ्य विभाग से ही क्यों ना हो।”

मोहम्मद ने बताया कहा कि मुस्ताफिजुर ने जूनियर डॉक्टरों को उनके रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट ना मिलने की धमकी दी है। मोहम्मद ने आगे कहा, “TMCP नेता हर चीज को नियंत्रित करके रखता है है, परीक्षा में कौन कैसे बैठेगा से लकर से लेकर छात्रों को फेल-पास करने तक।”

उन्होंने यह भी बताया कि मुस्ताफिजुर ने प्रत्येक जूनियर डॉक्टर से ₹2000 भी वसूले और उन्हें जबरन TMCP में शामिल किया। प्रदर्शनकारी डॉक्टर ने बताया कि मुस्ताफिजुर एक सिंडिकेट चलाता है और मेदिनीपुर मेडिकल कॉलेज में सबकुछ नियंत्रित करता है।

श्रेया मंडल नाम की एक मेडिकल छात्रा ने रिपब्लिक टीवी को बताया, “जब हमने इस कॉलेज में एडमिशन लिया, उस दिन ही शिक्षक क्लास छोड़कर चले गए थे और छात्र क्लास में थे, फिर यह यूनिट आई और हमारे दरवाज़े बंद कर दिए, और इस मुस्ताफिजुर के गुंडे यहाँ घुस आए और हमारी रैगिंग की।”

श्रेया मंडल ने बताया, “हमें परेशान किया जाता है। जब हम नए थे, तो हमें ऑडिटोरियम में ले जाया जाता था। पूरे ऑडिटोरियम के सामने, वे कहते हैं कि आइटम सॉन्ग बजाओ और डांस करो। उसी दिन से, हम डरे हुए हैं। कई जूनियर्स को धमकाया जाता है कि अगर तुम इसका विरोध करोगे, तो तुम निशाना बन जाओगे!”

अब मेदिनीपुर मेडिकल कॉलेज के पीड़ित जूनियर डॉक्टरों ने मुस्ताफिजुर रहमान मलिक को हॉस्टल से तत्काल बाहर निकालने की माँ को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके प्रदर्शन के बाद प्रशासन ने मुस्ताफिजुर के कॉलेज में घुसने पर रोक लगा दी है।

कॉलेज के प्रिंसिपल ने कहा, ”हम यहाँ सुरक्षा सम्बन्धित सभी कमियों को दूर कर रहे हैं। हैं। हम और CCTV ला रहे हैं और स्वास्थ्य विभाग को इस मामले में सूचित कर दिया है। पुलिस से लेकर कांस्टेबल तक सुरक्षा अधिकारी और सुरक्षा के उपायों पर भी काम किया जा रहा है।”

बांग्लादेश के तख्ता पलट को स्टूडेंट्स का आंदोलन बताने वाले, तानाशाही के विरुद्ध लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं, तो वो या तो जेहादी है, या पैसा लेकर यह सब कर रहा है

                                         क्रांति के नाम पर नहीं चलेगा - "बस नाम रहेगा अल्लाह का"
बांग्लादेश। पड़ोसी मुल्क। बड़ी मुश्किल में। कारण है इस्लामी मानसिकता। प्रधानमंत्री को भागना पड़ गया। उनका ब्रा-साड़ी सब लूट लिया। नहीं भागतीं तो न जाने क्या होता। सब अल्लाह-हू-अकबर वाली भीड़ ने किया। वही भीड़, जिसकी आग में इंग्लैंड-यूरोप जल रहा।

(a) तानाशाही की हार (b) लोकतंत्र जीत गया (c) जनता की लड़ाई – इस तरह के शब्द या वाक्य बांग्लादेश की तबाही के बाद सुन-पढ़-देख रहे हैं तो समझिए वो किसी कट्टर इस्लामी (देश-दुनिया में चाहे जहाँ भी हैं) और वामपंथी भेड़िए के हैं। शांति/विकास/उन्नति/तरक्की आदि इनकी समझ से बाहर है। तबाही, बर्बादी, जुल्म, कत्ले-आम से इस कौम (इस्लामी-वामी) को मोहब्बत है।

भूमिका खत्म। बात मुद्दे की। वाजिद खान नाम का एक इस्लामी आदमी है, खुद को पत्रकार भी लिखता है। इस्लामी मतलब कट्टर। उसके लिए अल्लाह ही आखिरी है। अल्लाह उसके लिए आखिरी हो, इसमें कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत तब है, जब वो कहता है कि अल्लाह के नाम के अलावे और कुछ बचेगा ही नहीं। इतनी बड़ी हिम्मत? औकात से बढ़कर बातें क्यों? और क्यों नहीं बचेगा अल्लाह के नाम के अलावे कुछ भी? चीन में तो नामोनिशान मिटा दिया जा रहा है!

ट्विटर पर खुद को अमेरिका में रहने वाला बताता है वाजिद खान। बांग्लादेश पर इस्लामी कब्जे की खुशी में ट्विटर पर ही फैज की नज्म लिख डालता है। फैज को ढंग से जान लेता वाजिद तो बेऔकात बातें नहीं लिखता। इस्लामी मुल्कों की हकीकत पढ़ लेता वाजिद तो ‘अल्लाह के नाम के अलावे और कुछ बचेगा ही नहीं’ के रोमांस भरे गाने नहीं गुनगुनाता। इस्लामी मानसिकता के कारण इस्लामी मुल्क से ही भागे मुस्लिमों को शरण देने वाले देशों में इनके प्रति कितना गुस्सा भरा पड़ा है, यह समझ लेता वाजिद तो घर-वापसी कर चुका होता।

तो आखिर था क्या फैज? फैज एक फट्टू कवि था। कट्टर इस्लामी भी। वामपंथ की चादर ओढ़े हुए। इस्लामी सरकार के टुकड़ों पर पलने वाला, दुम हिलाने वाला कवि था फैज। कैसे?

  • जब भारत का बँटवारा हुआ, फैज अहमद फैज ने मजहब के आधार पर बने देश को चुना। असली वामपंथी होता तो इस्लामी मुल्क क्यों जाता?
  • जब पाकिस्तान चला ही गया तो वहाँ के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर चुप्पी क्यों साधे रखा? वामपंथी तो अपने आप को ‘सेकुलर’ कहते हैं, कहाँ घुसा ली थी अपने अंदर की क्रांति वाली आवाज?
  • ‘सब दरगाह उछाले जाएँगे, सब मस्जिद गिराए जाएँगे… बस नाम रहेगा भगवान राम का’ – ऐसी पंक्तियों की रचना क्यों नहीं कर पाया फैज? वामपंथी होकर भी ‘अल्लाह’ के नाम को लेकर झूलता क्यों रह गया?
  • जिस पाकिस्तानी सरकार ने अहमदियों को मुस्लिम मानने तक से इनकार कर दिया, उसी इस्लामी सरकार में मंत्री बन कर मलाई क्यों चापते रहा फैज? अहमदियों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ नज्म लिखने में क्या अल्लाह ने उसके हाथ बाँध रखे थे?

फैज एक फट्टू कवि था। जगह-जगह फैज की नज्म चेपने और खुद को क्रांति का सिपाही कहने वाले लोग भी फट्टू हैं। इसलिए वाजिद खान जैसे फट्टुओं को औकात में रह कर बात करनी चाहिए। औकात यह है कि चाहे कयामत की रात आए या बरसात की… वो रात कभी नहीं आने वाली, जब सिर्फ और सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का।

खुद अमेरिका में रह कर (शायद 100% झूठ ही हो यह) जो बांग्लादेश में शरिया के सपने देख रहा है, उससे बड़ा फट्टू और कौन होगा? सीरिया में रहो, इस्लाम को बुलंद करो। फिलिस्तीन जाके अपने मरते भाईजानों को पानी पिलाओ, ब्रदरहुड के दूध का कर्ज और कैसे उतारोगे बे? अमेरिका में रह कर ट्वीट करते हुए! लानत है तेरे जैसे इस्लाम के सिपाही पर! फट्टू! अल्लाह के अलावे बहुत सारे सुंदर नाम हैं। अपने और भाईजानों की तरह घरवापसी कर लो। दुनिया सुंदर दिखेगी। छाती में बम बाँध के फटने से 72 हूर नहीं मिलते मूर्ख।

घटना बांग्लादेश में होती है। इस्लामी पत्रकार रहता अमेरिका में है। काम अलजजीरा (मतलब अंग्रेजी खबरें) के लिए करता है… लेकिन ट्वीट हिंदी में। न उर्दू-फारसी-अरबी-बांग्ला, न ही अंग्रेजी में। इसका मतलब क्या हुआ? भारत में रह रहे लोगों को भड़काना। कैसे लोगों को? भारत में रह रहे ऐसे लोग, जो इस देश को अपना देश नहीं मानते। मजहब उनके लिए सर्वोपरि है। संविधान से ऊपर वो एक किताब को रखते हैं। यहीं पर चूक जाता है वाजिद खान जैसा लोग। ऐसे लोगों के लिए एक ही सलाह – वाजिद हो या खान… सिर्फ भारत के नागरिक बन कर रहो, कायदे में रहोगे। संविधान को ही आखिरी किताब मानो, फायदे में रहोगे।

और हाँ! एक बात और बेऔकात इस्लामी वाजिद खान। “एक दिन फ़िलिस्तीन भी आज़ाद होगा” तेरा ख्वाब है। ख्वाब देखने पर पाबंदी भी नहीं। लेकिन इजरायल जब मार-मार के फलावर बना देता है, तब अपने फिलिस्तीनी इस्लामी आतंकियों की लाशों के साथ रोया मत करो। सोशल मीडिया पर सूअरों की लाश का तमाशा अच्छा नहीं लगता। सनातन में घरवापसी करने में कोई समस्या (हमारी ओर से कोई पाबंदी नहीं) है तो इजरायल भी जा सकते हो या चीन भी। बस मजहब छोड़ना होगा, वरना वो लोग तो ऐसे भी छुड़वा देंगे।

CCTV फुटेज गायब, फोन फॉर्मेट: जाँच में सहयोग नहीं कर रहा विभव कुमार; क्या 3W(Wine, Wealth, Woman) केजरीवाल को ले डूबेगा?

किसी भी व्यक्ति के पतन में 3W(Wine, Wealth, Woman) का जरूर रोल होता है। जो अरविन्द केजरीवाल पर शत-प्रतिशत सटीक बैठती है। दौलत(wealth) हासिल करने के केजरीवाल ने क्या नहीं किया, केजरीवाल खुद जानते हैं; शराब(wine) घोटाले ने तिहाड़ पहुंचा दिया तो बाकि कसर स्वाति मालीवाल(woman) से पंगा लेना पूरा करने जा रहा है।    

स्वाति मालीवाल पिटाई मामले में बिभव की गिरफ्तारी से अरविंद केजरीवाल बौखलाए दिख रहे हैं। वो बीजेपी ऑफिस तक मार्च कर रहे हैं। मजे की बात है कि सारे निगम पार्षद, विधायक तक प्रदर्शन में नहीं पहुंचे। यानि पार्टी में ही मतभेद। वहीं, बिभव कुमार को कोर्ट ने 5 दिन की हिरासत में भेज दिया है, क्योंकि पुलिस ने बताया कि बिभव कुमार जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं और वो मजबूत आदमी हैं। वो गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं और चीजों को बदल सकते हैं। कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने बताया कि स्वाति मालीवाल पर हुआ हमला भयावह था, इसमें उन्हें काफी नुकसान पहुँच सकता था। यही नहीं, पुलिस ने कहा है कि बिभव कुमार ने अपने फोन तक को फॉर्मेट कर दिया है, ताकि उसकी जानकारी पुलिस तक न पहुँचे।

केजरीवाल के मार्च पर स्वाति का तंज

बिभव कुमार को 5 दिन के लिए पुलिस कस्टडी में भेजे जाने के खिलाफ अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी ऑफिस को घेरने के ऐलान के बाद स्वाति मालीवाल ने आम आदमी पार्टी के जेल में बंद नेता मनीष सिसोदिया का नाम लेकर तंज कसा है।
स्वाति मालीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “किसी दौर में हम सब निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए सड़क पर निकलते थे, आज 12 साल बाद सड़क पर निकले हैं ऐसे आरोपी को बचाने के लिए, जिसने CCTV फुटेज गायब किए और फोन फॉर्मेट किया? काश इतना ज़ोर मनीष सिसोदिया जी के लिए लगाया होता… वह यहां होते तो शायद मेरे साथ इतना बुरा नहीं होता!”
इससे पहले, स्वाति मालीवाल को पीटने के मामले में पुलिस ने शनिवार को बिभव कुमार को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ कोर्ट ने उन्हें 5 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। शनिवार देर शाम दाखिल की गई रिमांड अर्जी में कहा गया था यह एक गंभीर मामला है जिसमें बेरहमी से किया गया हमला घातक हो सकता था। पुलिस का दावा है कि आरोपी बिभव कुमार शनिवार को घटनास्थल पर सबूत नष्ट करने के लिए गया था, तभी उसे गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने अदालत में एक वीडियो पेश किया। जिसमें वह बिभव से पूछ रहे हैं कि उन्होंने राज्यसभा सांसद पर हमला क्यों किया, लेकिन वह जवाब नहीं दे रहा। दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया कि उपलब्ध कराया गया सीसीटीवी फुटेज खाली है और बिभव का जो फोन जब्त किया गया था, वह फॉर्मेट किया गया है, इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया।

साजिशों की भी हद होती है: स्वाति

इस मामले में स्वाति मालीवाल ने गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने एक्स पर लिखा, “पहले मुझे बेरहमी से बिभव ने पीटा। थप्पड़ और लातें मारी। जब मैंने ख़ुद को छुड़ा के 112 कॉल करी, तो बाहर जाके सिक्योरिटी बुलायी और वीडियो बनाने लगा। मैं सिक्योरिटी को चीख चीख के बता रही थी की मुझे बहुत बेरहमी से बिभव ने पीटा है। वो पूरा लंबा हिस्सा वीडियो का एडिट कर दिया गया। सिर्फ़ 50 सेकंड रिलीज़ किए गये जब मैं सिक्योरिटी वालों को समझा समझा के खीज चुकी थी। अब फ़ोन फॉर्मेट करके पूरी वीडियो डिलीट कर दी ? सीसीटीवी की फुटेज भी ग़ायब! साज़िश की भी हद्द है!”
13 मई की सुबह स्वाति मालीवाल के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पर मारपीट की गई। मारपीट उनके पीए बिभव कुमार ने की। इस मामले में 16 मई को आधिकारिक एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसके बाद पुलिस ने 18 मई को बिभव कुमार को गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट ने बिभव को 5 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। आरोप है कि बिभव ने सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी की है और अपना फोन भी फॉर्मेट कर दिया है। वो जाँच में सहयोग नहीं कर रहा है।



क्यों उड़ान नहीं भर पा रही एयर इंडिया एक्सप्रेस? कर्मचारियों की बर्खास्तगी तक पहुँचा संकट: अब तक 100 फ्लाइट कैंसल

एयर इंडिया एक्सप्रेस (Air India Express) में कर्मचारियों का संकट गहरा गया है। बताया जा रहा है कि विरोध प्रदर्शन करने के नाम पर एक साथ करीबन 200 स्टाफ मेंबर ने सिक लीव ले ली, जिसकी वजह से एयरलाइन की 100 उड़ानें बाधित हुईं। साथ ही पैसेंजर्स को भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस घटना के बाद एयरलाइन ने 25 स्टाफ मेंबर्स पर कार्रवाई की है। वहीं बाकी बचे स्टाफ को नोटिस भेजकर नौकरी पर आने को कहा है। साथ ही ये चेतावनी भी दी है कि अगर वो बात नहीं मानते तो फिर एक्शन लिया जाएगा।

कहाँ की फ्लाइट हुई कैंसिल

जानकारी के मुताबिक, एयर इंडिया एक्सप्रेस के पास अभी 70 प्लस एयरक्राफ्ट हैं। रोजाना ये एयरलाइन 300 से ज्यादा फ्लाइट ऑपरेट करती है। 1 हफ्ते में इस एयरलाइन्स से 2500 फ्लाइट्स ऑपरेट की जाती है। ये उड़ानें देश के 31 और विदेश के 14 शहरों में ऑपरेट होती हैं। मंगलवार को स्टाफ की कमी के कारण नई दिल्ली, श्रीनगर, गुवाहाटी, बेंगलुरु, गोवा, तिरुवनंतपुरम, कोच्चि, कालीकट, कुन्नूर, कोझिकोड एयरपोर्ट पर एअर इंडिया एक्सप्रेस की उड़ानें कैंसिल करनी पड़ी थीं, जिसकी वजह से काफी नुकसान हुआ था और पैसेंजर्स को दिक्कत भी हुई थी।

क्यों बिगड़े हालात

एयर इंडिया एक्सप्रेस के चेयरमैन की मानें तो 2022 में टाटा द्वारा टेकओवर के बाद हालत बिगड़े हैं। वेतन का बड़ा हिस्सा पोस्टर लाइफ इंश्योरेंस से जोड़ा गया है जिससे कर्मचारी नाराज हैं। इसके अलावा सीनियर्स पर भेदभाव का आरोप है। साथ ही ये भी बात हैं कि यहाँ प्रमोशन की नीति ठीक नहीं है। इसके अलावा ये इस प्रदर्शन का कारण एआईएक्स कनेक्ट और विस्तारा का एअर इंडिया में विलय करना, भी माना जा रहा है। कर्मचारी कह रहे हैं कि ऐसे निर्णय एअर इंडिया के मूल कर्मचारियों के हितों के खिलाफ है।

मामला सुलझाने के लिए हो रही बात

एयरलाइन इस संकट को खत्म करने के लिए मैनेजमेंट वर्कर्स की यूनियन से बात कर रही हैं। कोशिश की जा रही हैं कि किसी भी तरह से उड़ानें प्रभावित न हों। मगर, हालात देख लगता है कि फिलहाल कर्मचारी काम पर लौटने के लिए तैयार नहीं हैं।
ऐसे में एयर इंडिया एक्सप्रेस ने अचानक छुट्टी पर जाने वाले 200 में से 25 क्रू मेंबर्स को नौकरी से निकाल दिया है। बाकी बचे सभी सदस्यों को नौकरी ज्वाइन करने को कहा है। वहीं यात्रियों से उन्हें हो रही असुविधा के लिए माफी माँगी है।
मंगलवार को एयरलाइन के 200 से ज्यादा कर्मचारियों के एकसाथ छुट्टी जाने पर कंपनी की उड़ानों के परिचालन पर 100 से ज्यादा फ्लाइट्स रद्द करनी पड़ीं थीं। इससे एयर इंडिया एक्सप्रेस का परिचालन लगभग ठप हो गया था, जिससे करीब 15 हजार यात्री प्रभावित हुए।