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हाथ में हिडमा के पोस्टर, जेब में चिली स्प्रे: दिल्ली में पर्यावरण के रखवाले नहीं, ‘अर्बन नक्सल’ उतरे प्रदर्शन पर, पुराने ‘वामपंथी पैटर्न’ पर बनाया पुलिस को निशाना

       वामपंथियों ने नक्सली कमांडर माडवी हिडमा के समर्थन में लगाए नारे (साभार: एक्स @Riccha Dwivedi)
राजधानी दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। इसी गंभीर स्थिति का हवाला देते हुए कुछ युवाओं ने इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। शुरुआत में वे ये दिखा रहे थे कि वे हवा की खराब गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद उनका असली रंग सामने आ गया। वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में मारे गए खूंखार नक्सली हिडमा के समर्थन में नारेबाजी शुरू कर दी और ‘कॉमरेड हिडमा अमर रहे’ के नारे लगाए।

इन वापपंथी प्रदर्शनकारियों की तैयारी देखकर साफ समझा जा सकता है कि प्रदूषण तो एक बहाना था, इनका मुद्दा कुछ और था, क्योंकि प्रदर्शनकारी अपने साथ हिडमा के नाम लिखी तख्तियाँ और पोस्टर ही नहीं बल्कि पेपर स्प्रे भी लेकर आए थे। पुलिस ने जब इनसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की माँग की तो इन्होंने पुलिसकर्मियों पर इसका इस्तेमाल किया।

पुलिस के अनुसार,रविवार (23 नवंबर 2025) को करीब 4:30 बजे ये प्रदर्शनकारी इंडिया गेट के सी-हेक्सागन क्षेत्र में जुटे। वहाँ मौजूद पुलिस ने उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से हटने को कहा, लेकिन वे लगातार हिडमा के पक्ष में नारे लगाते रहे और निर्देशों को नजरअंदाज करते रहे।

पुलिस पर किया पेपर स्प्रे, घायल सुरक्षाकर्मियों का अस्पताल में चल रहा इलाज

स्थिति तब बिगड़ गई जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाना शुरू किया। इसी दौरान प्रदर्शन कर रहे  कुछ लोगों ने पुलिस पर पेपर स्प्रे कर दिया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। कई पुलिसकर्मियों की आँखों में तेज जलन हुई और तीन से चार कर्मियों को तुरंत आरएमएल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनका इलाज जारी है।

नई दिल्ली के DCP देवेश कुमार ने बताया, “पहली बार, हमने पुलिसवालों पर मिर्च स्प्रे का इस्तेमाल होते देखा। हमारे कुछ अधिकारियों की आँखों में स्प्रे लग गया और अभी उनका RML हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। इस बारे में कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”

मामले की जानकारी देते उन्होंने आगे कहा, “कुछ प्रदर्शनकारी C-हेक्सागन के अंदर जमा हो गए और फिर उस बैरिकेड को पार करने की कोशिश की जिसे हमने आने-जाने पर रोक लगाने के लिए लगाया था। हालाँकि, वे नहीं माने, उन्होंने बैरिकेड तोड़ दिया, सड़क पर आ गए, और वहीं बैठ गए। हमने उनसे हटने की रिक्वेस्ट की, क्योंकि उनके पीछे कई एम्बुलेंस और मेडिकल कर्मचारी इंतजार कर रहे थे और उन्हें इमरजेंसी एक्सेस की जरूरत थी…हमने ट्रैफिक में रुकावट से बचने के लिए उन्हें C-हेक्सागन से हटा दिया। हटाने के दौरान, कई प्रदर्शनकारियों की पुलिस से हाथापाई हुई, और हमारे कई कर्मचारी घायल हो गए।”

हंगामे के कारण ट्रैफिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि कुल 15 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है और उनके खिलाफ पुलिस पर हमला करने और हिंसक गतिविधियों में शामिल होने जैसी गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।

वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हिडमा को लेकर क्या बयान दिया?

असल में इन्हें दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण से तो कोई लेना-देना ही नहीं था। इनका टार्गेट ही अशांति पैदा करना था। एक वामपंथी ने इस पर बयान देते हुए तो भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा के तारीफ के पुल ही बाँध दिए।

उसने कहा, “हिडमा एक जनजातीय है जिसने अपने हक के लिए हथियार उठाए। इसे गलत कह सकते हैं, लेकिन वे इसके पीछे के कारण को नकार नहीं सकते। कॉर्पोरेटाइजेशन के खिलाफ लड़ाई जनजातीयों की लड़ाई है, यह पानी, जंगल और जमीन की लड़ाई है। इस वजह से नारायण कान्हा को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता। अपने हक की रक्षा करने वाले लोगों पर ऐसा दबाव नहीं डाला जा सकता।”

शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक बनाने की वापपंथियों की ये हरकते नई नहीं

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को दूसरा रंग दे दिया। उस समय किसानों के हितों की माँग का दावा करने वाले प्रदर्शनकारी अचानक उमर खालिद और शरजील इमाम की तख्तियाँ लेकर बैठ गए थे। इतना ही नहीं, उस समय भी पुलिस को टार्गेट करके हिंसा के प्रयास हुए थे।

इसके अलावा, साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई। पुलिस को निशाना बनाया गया। उनके ऊपर कहीं गर्म पानी फेंका गया था तो कीं हथियार लेकर उन्हें दौड़ाया गया था। उन्हें टारगेट करने के लिए दिल्ली दंगों में आरोपित गुलफिशा फातिमा जैसे लोगों ने उमर खालिद के कहने पर लाल मिर्च पाउडर, एसिड, बोतलें, डंडे तक जमा किए थे।

आज स्थिति दोबारा वैसी ही देखने को मिली है। जिसका मतलब साफ है कि पर्यावरण जैसा मुद्दा भी इन वामपंथियों के लिए सिर्फ अपना प्रोपेगेंडा फैलाने का एक साधन मात्र है। अंत में इनका असली चेहरा कभी नक्सल समर्थक, कभी आतंक समर्थक के तौर पर उभर कर आता है। इन्हें समस्या देश, देश की सरकार और देश के कानून से होती है और इनकी संवेदना देश विरोधी तत्वों से।

आज जिस हिडमा के लिए इन्होंने दिल्ली में पुलिस पर हमला किया है। क्या उसकी लड़ाई सच में अपनी जमीन और अधिकार की थी? क्योंकि अगर ऐसा होता तो उसके हाथ मासूमों की हत्या से लाल नहीं होते।

कौन था 26 बड़े हमलों का मास्टरमाइंड हिडमा?

हकीकत यही है कि हिडमा बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को सँभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिडमा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसे खत्म कर दिया।

हिडमा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।

3 अप्रैल 2021 को सुरक्षाबलों ने माड़वी हिडमा को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। बीजापुर में नक्सलियों ने जवानों पर हमला बोल दिया और इस मुठभेड़ में 22 जवान बलिदान हो गए थे। दंतेवाड़ा हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की बलिदानी हुई थी, इसका नेतृत्व भी इसी ने किया था।

पराली जलाने की घटनाएँ पंजाब में 6 गुना अधिक फिर भी दिल्ली में प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हरियाणा

दिल्ली प्रदूषण पर भ्रम फैला रही केजरीवाल सरकार
भले ही पंजाब में खेतों में पराली जलाने की घटनाएँ केवल 24 घंटों में ही 2,000 का आँकड़ा क्यों न पार कर गई हो, लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) सोशल मीडिया पर एक्स (ट्विटर) पर यह माहौल बनाने में लगी है कि 2022-23 में पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में 55 प्रतिशत की कमी आई है। खासतौर से पंजाब में कथित तौर पर 65.6 प्रतिशत खेतों में आग लगने की घटनाएँ दर्ज की गई हैं, जबकि हरियाणा में 5.3 प्रतिशत दर्ज की गई हैं।

हालाँकि, आप के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने पुलिस और प्रशासन को पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। फिर भी पंजाब सरकार के आँकड़ों को ही माने तो पता चलता है कि राज्य के 21 जिलों में खेतों में आग लगाने की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।

संगरूर में किसानों द्वारा 8 नवंबर को खेत में आग लगने के 466 मामले दर्ज किए गए जिससे कुल संख्या 4,070 हो गई, जो सभी जिलों में सबसे अधिक है। वहीं लुधियाना में 8 नवंबर को 96 मामले दर्ज किए गए, जिससे खेत में आग लगाने की कुल संख्या 1,089 हो गई। दक्षिण मावला में 24 घंटों में खेत में आग लगने के 861 मामले दर्ज किए गए, जिसमें बठिंडा, फरीदकोट, मनसा, फिरोजपुर, मुक्तसर, मोगा और फाजिल्का शामिल हैं।

इससे पंजाब में खेतों में आग लगाने की कुल संख्या 22,981 हो गई है। इस बीच, हरियाणा सरकार ने 2022 की तुलना में इस साल पराली जलाने की घटनाओं में 38 प्रतिशत की कमी दर्ज की है। पिछले दो वर्षों में, हरियाणा ने पराली जलाने की घटनाओं में 57 प्रतिशत की कमी दर्ज की है।

इसकी बड़ी वजह यह है कि भाजपा शासित राज्य हरियाणा ने खेत में आग के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है, 1,256 चालान काटे गए हैं और 32.55 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। 72 एफआईआर दर्ज की गईं और 44 आग बुझाई गईं।

इसके अलावा, हरियाणा सरकार ने पराली जलाने को पूरी तरह से समाप्त करने के उद्देश्य से एक नई नीति की घोषणा की है। ‘हरियाणा एक्स-सीटू मैनेजमेंट ऑफ पैडी स्ट्रॉ पॉलिसी 2023’ का लक्ष्य टिकाऊ ऊर्जा के लिए धान की पुआल का उपयोग करना और 2027 तक फसल अवशेष जलाने को खत्म करना है।

हरियाणा सरकार ने किसानों को सब्सिडी पर 19,141 लाख फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) मशीनें मंजूर की हैं। 940 लाख एकड़ क्षेत्र को 1,000 रुपए प्रति एकड़ के प्रोत्साहन के लिए पंजीकृत किया गया है।

इसके अलावा, राज्य सरकार ने कथित तौर पर 30 नवंबर तक या वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा जीआरएपी चरण को रद्द किए जाने तक तत्काल प्रभाव से गुरुग्राम और फरीदाबाद में बीएस-III पेट्रोल और बीएस-IV डीजल एलएमवी (4-पहिया) पर प्रतिबंध लगा दिया है। 

नासा के फायर इंफॉर्मेशन फॉर रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (एफआईआरएमएस) की सैटेलाइट इमेजरी में पंजाब को लाल बिंदुओं से ढका हुआ दिखाया गया है, जो राज्य में खेत की आग के गंभीर स्तर को दर्शाता है, जबकि हरियाणा में यह काफी कम दिखाई दे रहा है। सैटेलाइट इमेजरी में दर्ज डेटा पिछले 24 घंटों का है।

फिर भी, आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में खतरनाक वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) स्तर के लिए हरियाणा सरकार पर आरोप लगाया है। भले ही AAP दिल्ली और पंजाब दोनों जगह हैं सत्तारूढ़, उसमें से पंजाब में पराली जलाना अपने चरम पर है तो दिल्ली में  जहाँ की AQI वर्तमान में 426 है। लेकिन दिल्ली की ख़राब हवा और प्रदूषण के लिए आम आदमी पार्टी समय-समय पर भाजपा शासित हरियाणा सरकार पर हमला करती रही है जो असली वजह है उससे मुँह मोड़ती रही है। 


दिल्ली : केजरीवाल सरकार ने पटाखों पर लगाया प्रतिबंध, इस बार भी सूनी रहेगी दिवाली: बोले AAP के मंत्री – दीया जलाइए

दिल्ली वालों की दिवाली इस बार भी सूनी रहने वाली है। केजरीवाल सरकार ने सोमवार (11 सितंबर, 2023) को आदेश जारी कर पटाखों के बनाने, भण्डारण और बिक्री पर रोक लगा दी है। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने इसकी जानकारी देते हुए लोगों से दीये जलाकर दिवाली मनाने की अपील की।

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा, “दिल्ली में खासतौर से दिवाली के अवसर पटाखे जलाने से जो प्रदूषण पैदा होता है, उसे रोकने के लिए सीएम केजरीवाल ने सभी तरह के पटाखों के निर्माण, भंडारण, बिक्री, ऑनलाइन डिलीवरी और जलाने पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया है। पुलिस को दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरफ से यह निर्देश जारी करने के लिए कहा गया है कि किसी भी तरह का लाइसेंस जारी न किया जाए।”

पत्रकारों ने गोपाल राय से हिंदू त्योहारों पर ही रोक लगाने को लेकर सवाल किया। इस पर उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जो बदली हुई परिस्थितियाँ हैं उसमें हमें धूमधाम से श्रद्धा के साथ त्योहार मनाना जरूरी है। उतना ही सब लोगों की जिंदगी बचाना जरूरी है। इसलिए पिछले 2 साल से यह निर्णय लिया जा रहा है। दिल्ली के लोगों द्वारा सहयोग भी मिल रहा है। हमारी लोगों से अपील है कि दीये जलाकर धूमधाम से हम दिवाली मनाएँ।”

उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली में सर्दी के मौसम में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। जनवरी से लेकर अगस्त के महीने तक दिल्ली का औसत AQI काफी कम रहा है। 10 सितंबर को दिल्ली में एक्यूआई 45 था। लेकिन धीरे-धीरे अक्टूबर के महीने में सर्दी बढ़ने के साथ दिल्ली के वातावरण में नमी आती है और यहाँ के पार्टिकल मैटर जमा होने शुरू होते हैं। इसमें दिल्ली के बाहर और दिल्ली के अंदर का प्रदूषण यहाँ की हवा को जहरीला बना देते हैं।

गोपाल राय ने दिल्ली के प्रदूषण को नियंत्रित करने को लेकर प्लानिंग की जानकारी देते हुए कहा कि प्रदूषण रोकने के लिए दिल्ली सरकार ने एक्शन प्लान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत 12 सितंबर को दिल्ली सचिवालय में एक्सपर्ट्स के साथ मीटिंग होगी। 14 सितंबर को ऑल डिपार्टमेंट्स के अधिकारियों की बैठक होगी। इसमें विंटर एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा।


दिल्ली में लगेगा टोटल लॉकडाउन? केजरीवाल सरकार के ‘प्रदूषण’ से उखड़ा सुप्रीम कोर्ट, कहा- प्रचार पर हो रहा खर्चा, ऑडिट करा दूँगा

दिल्ली वालों ने मुफ्तखोरी के लालच के कारण किस अराजक के हाथ दिल्ली की सत्ता दी है, अनेकों बार खुलासा हो चूका है, लेकिन मुफ्तखोर दिल्लीवासियों ने अपनी आंखें और दिमाग नहीं खोली। अपने स्वार्थ के लिए जो उन्हीं की जान को कदम-कदम पर जोखिम में डाल रहा है। दिल्लीवासियों थोड़ा दिमाग पर जोर डालो, चौधरी ब्रह्म प्रकाश से लेकर शीला दीक्षित तक इतने मुख्यमंत्री आये किसी भी मुख्यमंत्री ने अपनी नाकामियों को छुपाने के कभी को आरोपित नहीं किया, कभी किसी का वेतन नहीं रोका, कभी प्रदुषण का रोना नहीं रोया, लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को देखिए सुप्रीम कोर्ट ने किस तरह फटकार लगाई। 

जिस तरह कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी पर कितनी अराजकता फैलाई गयी, अस्पतालों के बाहर जमीनों पर पड़े मरीजों की भीड़, ऑक्सीजन की ब्लैक परन्तु जैसे ही केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में ऑक्सीजन ऑडिट की बात करते ही दिल्ली ही नहीं पूरे भारत में ऑक्सीजन की कमी एकदम ख़त्म हो गयी, उसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने प्रदुषण खर्चे की ऑडिट देने की बात कहकर केजरीवाल सरकार के तोते उड़ा दिए। प्रदुषण पर अपनी नाकामी छुपाने के लिए दूसरे राज्यों पर आरोप लगाने वाली केजरीवाल सरकार पर क्या करेगी?     
दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के मामले में निष्क्रियता दिखाने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 अक्टूबर) को अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह प्रदूषण नियंत्रण पर दिल्ली सरकार बहाने बना रही रही है, उसको देखते हुए कोर्ट को सरकार की आय और प्रचार के लिए विज्ञापनों पर किए जा रहे खर्चों का ऑडिट कराने का आदेश देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए दिल्ली सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। दिल्ली सरकार के पास सड़कों पर से धूल-मिट्टी हटाने के लिए कितनी मशीनें हैं? इस पर दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने कहा कि रोड को साफ करने का काम नगर निगम के अंतर्गत आता है। दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि प्रदूषण को रोकने के लिए नगर निगमों को भी कुछ उठाने चाहिए। इस पर कोर्ट ने पूछा कि प्रदूषण के लिए क्या वे नगर निगमों पर दोष लगा रहे हैं?

इसके बाद मेहरा ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली में रोड साफ करने वाली 69 मशीनें हैं। तब कोर्ट ने पूछा कि दिल्ली में और कितनी मशीनें चाहिए और वो कैसे आएँगी इसके बारे में बताइए। तब वकील मेहरा ने कहा कि ये बात नगर निगम के कमिश्नर बताएँगे। इस पर चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा, “मेरी दादी एक एक चेन की कहानी सुनाती थी और बताती थी कि कैसे मछली मर गई। आप लोग नगर निगम पर आरोप लगा रहे हैं।”

सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट को ऑडिट कराने के मजबूर होना पड़ेगा, जिसमें देखा जाएगा कि सरकार को कितनी आय हो रही और वह अपने विज्ञापनों पर कितना खर्च कर रही है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नगर निगम कोर्ट को पहले ही बता चुका है कि उसके पास कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं। इस पर दिल्ली सरकार ने कहा कि वह नगर निगम को फंड जारी के लिए तैयार है।

प्रदुषण का कारण पराली नहीं 

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि दिल्ली में प्रदूषण का कारण पराली जलाना नहीं है। केंद्र ने बताया कि प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान सिर्फ 10 प्रतिशत है। इस पर कोर्ट को पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा के मुख्य सचिवों को केंद्र द्वारा कल की आपातकालीन बैठक के लिए उपस्थित रहने के लिए कहा। कोर्ट ने कहा कि सरकार इस पर भी गौर करे कि प्रदूषण को रोकने के लिए किन उद्योगों, वाहनों, बिजली संयंत्रों को कुछ समय के लिए बंद किया सकता है। कोर्ट ने बुधवार शाम तक दिल्ली और केंद्र सरकार से इस पर जवाब माँगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्रों के राज्यों को इस बीच घर से काम करने का निर्देश दिया। इस पर दिल्ली सरकार ने कहा कि वह पूर्ण लॉकडाउन के तैयार है। दिल्ली सरकार ने सोमवार से एक सप्ताह के लिए स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर, जहाँ परीक्षाएँ आयोजित की जा रही हैं, शारीरिक कक्षाएँ बंद करने की घोषणा कर दी है। इस मामले पर अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

दिल्ली में प्रदूषण का स्तर गंभीर स्तर तक पहुँच चुका है। राष्ट्रीय राजधानी में रविवार को 24 घंटे का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 330 दर्ज किया गया, जबकि शुक्रवार को एक्यूआई 471 था, जो इस सीजन में अब तक का सबसे खराब है। शीर्ष अदालत ने शनिवार को प्रदूषण के स्तर में वृद्धि को ‘आपात स्थिति’ बताते हुए राष्ट्रीय राजधानी में तालाबंदी का सुझाव दिया था।

मुश्किल में दिल्ली, प्रदूषण ने बिगाड़े हालात तो लगा पॉल्यूशन वाला लॉकडाउन! कहाँ है स्मोग टावर?

देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। दिल्ली में आसमान में स्मॉग की जमती परत के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को दिल्ली में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए आपातकालीन उपाय करने को कहा था। शीर्ष अदालत के आदेश के बाद अब दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में अगले एक सप्ताह तक के लिए स्कूलों को बंद कर दिया है और सभी सरकारी कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम दे दिया गया है।
देखिए वीडियो किस तरह स्मोग प्लांट के नाम पर विज्ञापनों पर हज़ारों रूपए बर्बाद कर दिल्ली की जनता को पागल बनाया गया। आखिर कब तक झूठ और मुफ्तखोरी का लालच देकर दिल्ली की जनता को केजरीवाल सरकार ठगती रहेगी? दिल्ली की स्थिति को देखने के बाद दिल्ली से बाहर राज्यों में होने वाले चुनावों के क्या वहां की जनता भी दिल्ली की तरह मूर्ख बनेगी? क्या आम आदमी पार्टी एक भी वोट की हक़दार है? हमेशा अपनी नाकामियों को उपराज्यपाल और केंद्र में मोदी सरकार पर थोपा जाएगा? प्रदुषण की समस्या दिल्ली के बाहर भी है, लेकिन इस मुद्दे पर लगभग सरकारें गंभीर हैं। भारत में, दिल्ली को छोड़, ऐसा कौन-सा राज्य है, जहाँ प्रदुषण के कारण लॉक डाउन किया गया हो? दिल्ली में केवल एक ही नदी यमुना बहती है, वह भी साफ नहीं, पंजाब में तो पांच नदियां बहती हैं, उत्तर प्रदेश में भी गंगा, यमुना, और सरस्वती बहती हैं, क्या वहां भी इन नदियों को गन्दा करने की योजना से चुनाव लड़ते हो?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज शाम घोषणा की कि राष्ट्रीय राजधानी में स्कूल सोमवार से एक सप्ताह के लिए बंद रहेंगे। उन्होंने कहा कि स्कूल बंद रहेंगे लेकिन ऑनलाइन क्लासेस चलेंगी ताकि बच्चों को प्रदूषित हवा में साँस न लेनी पड़े।

केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के सरकारी कार्यालयों के लिए भी इसी तरह का आदेश जारी किया है। इसके तहत शत-प्रतिशत सरकारी कर्मचारी अपने घरों से काम करेंगे। इसके अलावा केजरीवाल सरकार निजी कार्यालयों को भी यथासंभव वर्क फ्रॉम होम (डब्ल्यूएफएच) करने के लिए एक एडवाइजरी जारी करने की तैयारी कर रही है। गौरतलब है कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर निजी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम का ऑप्शन दिया था और अब उसी मॉडल को प्रदूषण के लिए अपनाना पड़ेगा।

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा कि निर्माण कार्यों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए 14 से 17 तक निर्माण गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2-3 दिनों के लिए पूर्ण लॉकडाउन लागू करने के सुझाव के बारे में बात करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वे शीर्ष अदालत के सामने प्रस्तुत करने के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हालाँकि इस कदम को फिलहाल लागू नहीं किया जा रहा है, लेकिन यह बहुत बड़ा कदम होगा। अगर प्रदूषण के हालात बदतर होते हैं तो सरकार वही कदम उठाएगी।

हालाँकि, उससे पहले दिल्ली सरकार केंद्र सरकार, CPCB, SAFAR को विश्वास में लेकर सभी एजेंसियों से चर्चा कर प्रस्ताव तैयार करेगी। केजरीवाल ने कहा कि हालात बिगड़ने पर सभी निजी वाहन, परिवहन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों को रोका जा सकता है।

दिल्ली की खराब होती हवा को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से स्थिति में सुधार के लिए तत्काल कदम उठाने को कहा था। कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रीय राजधानी में हवा की गुणवत्ता इस हद तक खराब हो गई है कि लोग अब घर पर मास्क पहन रहे हैं। इन हालातों में अदालत ने सरकार से जरूरत पड़ने पर 2-3 दिनों के लिए कंप्लीट लॉकडाउन करने को कहा था।

इसके साथ ही पंजाब के किसानों द्वारा पराली जलाने को जिम्मेदार ठहराने से इनकार करते हुए कहा कि आजकल किसानों को दोष देने का फैशन बन गया है। भले ही दिल्ली की हवा कुछ दिन पहले ही बिगड़ी हो, लेकिन अदालत ने दीवाली के पटाखों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है।

‘एक और फ्री सुविधा के लिए बधाई लघुकाय-लंपट जी’: कुमार विश्वास ने कसा केजरीवाल पर तंज

दिल्ली में जब से अरविन्द केजरीवाल की सरकार मुफ्त की रेवड़ियों बांटकर सत्ता में आयी है, हिन्दुओं को अपने त्यौहारों पर किसी न किसी मुसीबत का सामना करना पड़ता है। मुफ्त की रेवड़ी खाने वाले हिन्दुओं अब तो अपनी आंखें खोलो। दीवाली की दस्तक से पहले ही प्रदुषण का रोना शुरू हो जाता है। और अब सूर्य देवता की आराधना पर यमुना नदी के इतने गंदे पानी में खड़े होकर पूजा करने को विवश हिन्दू। यदि यही पर्व ईसाई अथवा इस्लाम में होता, तब भी क्या यमुना नदी की सफाई के लिए ऐसे ही दूसरे राज्यों को आरोपित करते?

केजरीवाल से पूर्व 15 वर्ष शीला दीक्षित की सरकार रही, न किसी का वेतन रुका, न ही प्रदुषण का रोना और न ही छठ पर यमुना का इतना गन्दा पानी। अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए कभी मोदी सरकार, कभी उपराज्यपाल और कभी दूसरे राज्यों पर आरोप लगाकर अपने आपको जनता का हितैषी साबित करने में लगे रहते हैं।  

दिल्ली में छठ पर्व की शुरुआत पर श्रद्धालुओं ने यमुना नदी के जहरीले झाग के बीच खड़े होकर पूजा अर्चना की। इसको लेकर मशहूर कवि कुमार विश्वास ने श्रद्धालुओं की तस्वीर को ट्वीट करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तंज कसा है। उन्होंने ट्वीट किया, ”भगीरथ जी स्वर्ग से गंगा, बादलों के जिस मार्ग से उतार कर लाए थे ‘लघुकाय-लंपट’ जी, यमुना जी को उसी रास्ते दिल्ली ले आएँ हैं और वो भी मुफ्त (और हाँ, इस बार वायु-प्रदूषण की जिम्मेदारी हरियाणा के किसानों पर रहेगी, पंजाब वालों पर नहीं, क्योंकि वहाँ कुछ महीनों में चुनाव हैं)।”

दरअसल, बीते कुछ दिनों से यमुना में सफेद-सफेद झाग बड़े पैमाने पर तैरते हुए देखे जा सकते हैं। आम आदमी पार्टी के पूर्व सदस्य रहे कुमार विश्वास ने दो दिन पहले यानी 7 नवंबर को समाचार एजेंसी एएनआई के एक ट्वीट को रिट्वीट करते हुए लिखा था, ”दिल्ली को एक और ‘फ्री’ सुविधा के लिए बधाई। अब तो यमुना में बादल भी उतार दिए, गली-गली मुफ्त का नरक कोविड के दौरान दिखा ही दिया था। टैक्सपेयर्स के पैसे पर TV में कालनेमि-लाइव देखा ही होगा। अब पंजाब में यही कौशल दिखाने का अवसर दें, स्वराज-शिरोमणि लघुकाय आत्ममुग्ध धूर्तेश्वर’ को।”

कुमार विश्वास का यह तंज केजरीवाल के उन कथित वादों को लेकर है, जो उन्होंने सरकार बनने पर यमुना की सफाई के लिए किए थे। केजरीवाल सरकार के इतने सालों से सत्ता में रहने के बाद भी यमुना नदी की हालत जस की तस है। हर साल छठ पर्व पर श्रद्धालुओं को झाग के बीच खड़े होकर पूजा करनी पड़ती है।

वहीं, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष राघव चड्ढा ने एक बयान जारी कर बीते दिनों कहा था कि हरियाणा से काफी मात्रा में सीवेज और औद्योगिक कचरा छोड़े जाने के चलते दिल्ली के जल शोधन संयत्रों में उत्पादन प्रभावित हुआ है। 

दिवाली के ‘पटाखों’ से पहले ही दमघोंटू हो गई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि पटाखे नहीं पराली है प्रदूषण की बड़ी वजह
(साभार: दैनिक जागरण)
कुछ वर्षों से आभास हो रहा है कि मौसम विभाग और National Green Tribunal(केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) कोहरा/fog का नाम शायद भूल गया है। जैसे ही श्राद्ध प्रारम्भ होते हैं, प्रदुषण नाम की महामारी दीवाली पर ग्रहण बन छा जाती है। हिन्दू संस्कृति के अनुसार हर त्यौहार किसी न किसी मौसम आने का संकेत देता है, लेकिन जब से हिन्दू विरोधियों ने जरुरत से ज्यादा सिर उठाना शुरू किया है, कभी होली पर, कभी करवा चौथ तो कभी दिवाली पर ज्ञान वाचक बन आ जाते हैं। लगभग 4 दशक पूर्व तक LPG आने से पहले हर घर में चूल्हा जलता था, कभी प्रदुषण का रोना नहीं रोया गया। फिर आज क्यों? क्या यह हिन्दुओं पर प्रहार नहीं? इस प्रश्न का जवाब हर हिन्दू विरोधियों के साथ-साथ नेताओं और पार्टियों को भी देना होगा। प्रदुषण के पीछे कौन-सा राज छुपा है? कोरोना के समय हुए लॉक डाउन में आसमान एकदम साफ दिखना शुरू हो गया था। कैसे? केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस पर चिंतन करने की जरुरत है। 

पराली आज पहली बार नहीं जल रही, लेकिन हिन्दू त्यौहारों पर कोहरा का नाम नहीं, पराली से हो रहे प्रदुषण का रोना रोकर दिवाली पर जलने वाली आतिशबाज़ी पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है, परन्तु आतिशबाज़ी नहीं जलने के बावजूद भी प्रदुषण दिवाली के अगले दिन कहीं अधिक होता है, क्यों? आतिशबाज़ी न जलने से इस उद्योग को कितनी हानि हो रही है, किसी नेता अथवा पार्टी ने कभी सोंचने की जहमत नहीं फ़रमाई। जिस कारण लोगों के रोजगार भी प्रभावित हो रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है, लघु उद्योग निम्न स्तर पर जा रहा है।  
ठंड का मौसम आते ही देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण बड़ी समस्या बनकर उभरता है। दिल्ली में स्मॉग छा जाने से लोगों को साँस लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किसानों द्वारा पराली जलाया जाना इसकी सबसे बड़ी वजह है। इसी क्रम में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बुलेटिन जारी किया है। बुलेटिन के अनुसार, दिल्ली का समग्र वायु गुणवत्ता सूचकांक नवंबर 3 को ‘बहुत खराब’ श्रेणी में रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 3 को राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स AQI 314 रहा, जिसमें पीएम 10 और पीएम 2.5 मुख्य प्रदूषक रहे। इससे पहले नवंबर 2 को यह आँकड़ा 303 से कुछ डिग्री अधिक था। नवंबर 3 को दिल्ली ही नहीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गुरुग्राम, गाजियाबाद, फरीदाबाद, बुलंदशहर और नोएडा समेत कई हिस्सों में AQI ‘बहुत खराब’ दर्ज किया गया। सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (सफर) के अनुसार, नवंबर 4 यानि दीपावली से हवा की गुणवत्ता और खराब होने की आशंका है।

माना जा रहा है कि एक्यूआई नवंबर 4 को ‘बेहद खराब’ श्रेणी के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच सकता है। पराली जलाने के कारण दिल्ली में पीएम 2.5 में भारी बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसके अलावा, प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान नवंबर 3 के लगभग 8% से बढ़कर नवंबर 4 को अनुमानित 20% हो सकता है। हवा के उत्तर-पश्चिमी दिशा में हुए बदलाव को इसका कारण माना जा रहा है।

दिल्ली के उत्तर-पश्चिम से आने वाली हवाएँ पराली जलाए जाने वाली हॉटस्पॉट पंजाब और हरियाणा से प्रदूषक हवाएँ लाती हैं। SAFAR के पूर्वानुमान में कहा गया है कि नवंबर 5 और 6 को प्रदूषण में पराली का शेयर 35 से 45 फीसदी तक पहुँच सकता है। ऐसे में पटाखों के कारण दिल्ली में हवा की गुणवत्ता का सूचकांक 4 से 6 नवंबर के बीच ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुँच सकता है।

हाल ही में पटाखों पर प्रतिबंध पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पटाखे अस्थायी मुद्दा हैं, जबकि पराली जलाना मुख्य मुद्दा है। यह स्वीकार करते हुए कि अदालत को इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला, जस्टिस एमआर शाह और एएस बोपन्ना की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वे दीवाली की छुट्टी के बाद इस मुद्दे को सुनवाई के लिए उठाएँगे।

दिल्ली : केजरीवाल सरकार ने RTI में ही खोल दी अपनी पोल : पर्यावरण के नाम पर वसूले 883 करोड़ रूपए , खर्चे बस 14 करोड़ रूपए


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 

जब भी कोरोना पर केजरीवाल टीवी पर आते हैं, उनका यही कहना होता है "आपने मुझे अपने परिवार का सदस्य माना है, मेरी सलाह है कि जब भी घर से बाहर निकलें मास्क पहनकर निकलें..." आदि आदि। लेकिन अपने आपको सबके परिवार का सदस्य मानने वाला ही जब पर्यावरण के नाम पर मिले धन को कहीं और खर्च कर, दिल्ली वालों को उनके रहमोकरम पर छोड़ दे, क्या ऐसा आदमी परिवार का सदस्य हो सकता है? यही स्थिति कोरोना को भी लेकर है। जो आदमी मुंह में राम बगल में छुरी रखे वह आदमी क्या विश्वास के काबिल हो सकता है? क्या अब अभी भी दिल्ली मुफ्त की रेवड़ियां खाने के लालच में अपना और अपने परिजनों का जीवन संकट में डालेंगे? 
दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार प्रदूषण की समस्या को लेकर कितनी ‘गंभीर’ है यह एक आरटीआई जवाब से फिर उजागर हुआ है। द संडे गार्जियन की खबर के अनुसार केजरीवाल सरकार ने बीते चार साल में पर्यावरण के नाम पर 883 करोड़ रुपए इकट्ठे किए हैं। लेकिन, प्रदूषण रोकने पर इस राशि का केवल 1.6 फीसदी ही खर्च किया गया है। यानी 883 करोड़ रुपए में से केवल 141,280,000 रुपए खर्च किए गए हैं।

यह चौंकाने वाला खुलासा दिल्ली सरकार के ट्रांसपोर्ट विभाग ने स्वयं संडे गार्जियन की आरटीआई के जवाब में किया है। विभाग द्वारा मुहैया करई गई जानकारी के मुताबिक दिल्ली सरकार ने साल 2017 में पर्यावरण कर के नाम पर 503 करोड़ रुपए, साल 2018 में 228 करोड़ रुपए और साल 2019 में 110 करोड़ रुपए इकट्ठा किए। इसके अलावा सरकार पर्यावरण उपकर के नाम पर साल 2020 में सितंबर तक 4 करोड़ रुपए जमा कर चुकी है।

रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण कर को दिल्ली सरकार क्षतिपूर्ति शुल्क के रूप में एकत्रित करती है। इसका एक बड़ा हिस्सा उन ट्रकों से लिया जाता है जो आए दिन दिल्ली में घुसते हैं और जिनके कारण प्रदूषण फैलता है। इस सूचना में आगे कहा गया है कि दिल्ली सरकार पर्यावरण उपकर का केवल बहुत छोटा हिस्सा सालों से प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल कर रही है।

आरटीआई यह भी बताती है कि दिल्ली सरकार ने पिछले चार सालों में सिर्फ 15 करोड़ 58 लाख रुपए पर्यावरण संरक्षण और साफ हवा के लिए खर्च किया है, जबकि साल 2017 में इकट्ठा हुए उपकर में से केजरीवाल सरकार ने एक रुपया भी खर्च नहीं किया है।

साल 2018 के कर में से 15 लाख रुपए एनएमवी (नॉन-मोटर व्हीकल) लेन के सुधार और रखरखाव के लिए खर्च किए गए थे और शहर में मार्शल के रूप में नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों की तैनाती के लिए 43 करोड़ रुपए खर्च किया गया।

साल 2017 में आम आदमी पार्टी सरकार ने हाइड्रोजन पावर बस लाने का वादा किया था, लेकिन आरटीआई जवाब में बताया गया है कि साल 2019 तक इस पर सिर्फ 15 करोड़ खर्च हुआ है और 265 करोड़ रुपए दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल ट्रांसपोर्ट प्रणाली के सुधार के लिए खर्च किया गया है।

साल 2017 में द न्यूज इंडियन एक्सप्रेस पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक फंड का सही उपयोग न कर पाने के कारण AAP सरकार को कॉन्ग्रेस तक घेर चुकी है। कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन ने उस समय आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार फंड का सही प्रयोग नहीं कर पा रही है और न ही ट्रांसपोर्ट सुविधा सुधार रही है।

अब सोचने वाली बात है कि दिल्ली में आए दिन प्रदूषण के नाम पर पड़ोसी राज्यों को दोषी ठहराने वाली केजरीवाल सरकार का मकसद क्या है? आखिर क्यों हमें भ्रम में रख कर ऐसा दर्शाया जा रहा है कि सरकार प्रदूषण के लिए नित नए कदम उठा रही है, लेकिन उसे दूसरे लोग सहयोग नहीं कर रहे।

‘ऑड-ईवन’ से लेकर ‘रेड लाइट ऑन गाड़ी ऑफ’ तक का आह्वान करवाने के लिए दिल्ली सरकार जोर-शोर से जनता के सामने विज्ञापन करती है। लेकिन ऐसे प्रयोगों के नतीजे जब देने होते हैं तो दिल्ली की जनता का आभार व्यक्त करके उससे उनका ध्यान भटका दिया जाता है। 

संडे गार्जियन की यह रिपोर्ट सवाल उठाती है कि आखिर क्यों प्रदूषण जैसी व्यापक समस्या से उभरने के लिए सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए? आखिर क्यों आम आदमी पार्टी ने एक भी बार पर्यावरण के नाम पर इकट्ठा धनराशि का जवाब देना सही नहीं समझा? क्या केवल दिवाली पर पटाखे बैन से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या केवल ग्रीन दिल्ली एप लॉन्च करने से दिल्ली का AQI सुधर जाएगा?

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का दिल्ली सरकार से पूछना है कि आखिर जब इस तरह जनता के पैसे खाने थे तो फिर ऑड-ईवन का नाटक क्यों किया गया था? एक यूजर तंज कसते हुए कहता है कि 1% प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया, क्योंकि बाकी का विज्ञापन पर यूज होना था।


प्रदूषण को लेकर गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने केजरीवाल को पाठ पढ़ाया

तमाम वामपंथी गैर सरकारी संगठनों और समाचारों समूहों ने गोवा के तीन महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को निशाना बनाया है। आरोप है कि इन परियोजनाओं से वन्य जीव (वाइल्ड लाइफ) को नुकसान पहुँचेगा। यह तीन परियोजनाएँ कुछ इस प्रकार हैं: राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) 4-ए को चौड़ा करना, ट्रांसमिशन लाइन का निर्माण और वर्तमान रेलवे लाइन को दोहरा करना। जिसका विरोध समस्त विकास विरोधी कर रहे हैं। 

आरोपों के अनुसार, इन परियोजनाओं के चलते भगवान महावीर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और मल्लेम स्थित नेशनल पार्क का वन्य जनजीवन प्रभावित होगा। विरोध की इस हवा में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी छलांग लगा चुके हैं। नतीजतन गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत और उनके बीच वाद-विवाद भी देखने को मिला।

इस प्रकरण की शुरुआत हुई 9 नवंबर को, जब अरविन्द केजरीवाल ने गोवा में पर्यावरण और वन्य जीव की सुरक्षा के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों को सराहा। इसके साथ ही साथ, केजरीवाल ने प्रदर्शनकारियों पर दर्ज की गई प्राथमिकी के लिए गोवा सरकार की निंदा भी की। केजरीवाल ने प्रमोद सावंत की अगुवाई में गोवा में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी सरकार पर जनता के विरोध को दबाने का आरोप लगाया था।

केजरीवाल द्वारा की गई टिप्पणी का जवाब देते हुए गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने समाचार समूहों के समक्ष अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि गोवा की चिंता करने से पहले अरविन्द केजरीवाल को दिल्ली की स्थिति सुधार लेनी चाहिए।

इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गोवा न्यूज़ हब के ट्वीट का उल्लेख करते हुए गोवा के मुख्यमंत्री की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह ‘दिल्ली के प्रदूषण बनाम गोवा के प्रदूषण’ के संबंध में नहीं है। उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए काम करना होगा कि दिल्ली या गोवा कहीं भी प्रदूषण नहीं हो। 

प्रमोद सावंत इस बात से सहमत नज़र आए और उन्होंने कहा कि गोवा की सरकार राज्य में प्रदूषण को समाप्त करने के लिए लगातार कार्यरत है। लेकिन अपनी चतुराई का प्रदर्शन करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस जवाब का इस्तेमाल करते हुए गोवा के मुख्यमंत्री कहा कि वह प्रदर्शनकारियों की आवाज़ सुनें। फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा कि वह जानते हैं केंद्र गोवा पर परियोजनाएँ थोप रहा है, उन्हें (प्रमोद सावंत) को इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से असहमति जतानी चाहिए और गोवा को कोयले का हब (गढ़) बनने से रोकना चाहिए। 

इसके बाद प्रमोद सावंत ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए केजरीवाल के दावे को खारिज किया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में रेलवे लाइनों को दोहरा किया जा रहा है और इस परियोजना से मोल्लेम को कोई ख़तरा नहीं है। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि गोवा कोयले का हब नहीं बनेगा। इसके अलावा उन्होंने केंद्र और गोवा सरकार के बीच तनाव पैदा करने का प्रयास करने की बात पर केजरीवाल को तार्किक ढंग से घेरा। उन्होंने कहा, “केंद्र और राज्य के बीच विवाद पैदा करने पर आपकी कुशलता के बारे में हम बखूबी जानते हैं इसलिए हम आपकी सलाह को नज़रअंदाज़ करते हैं।”

लेकिन अरविन्द केजरीवाल की बात ही निराली है, वह लगातार निवेदन करते रहे कि केंद्र सरकार गोवा पर यह परियोजना थोपना चाहती है। गोवा की सरकार को इसका विरोध करना चाहिए। 

दिल्ली का अनियंत्रित प्रदुषण 

अरविन्द केजरीवाल ने भले ही गोवा सरकार को सुझावों का एक लंबा पुलिंदा दे दिया हो लेकिन इस बीच वह दिल्ली के पर्यावरण के हालात भूल गए। जिसकी स्थिति सुधारने में वह लगभग नाकामयाब रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में इस वर्ष बेहिसाब प्रदूषण है लेकिन दिल्ली की सरकार इस मोर्चे पर पूरी तरह असफल साबित हुई है। जबकि यह बात सभी जानते थे कि साल के इस वक्त में दिल्ली के भीतर प्रदूषण की मात्रा कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। 

अरविन्द केजरीवाल ने दावा किया था कि पराली जलाना वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण था और वह इस बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह पडोसी राज्यों में किया जाता है। कुल मिला कर दिल्ली के मुख्यमंत्री ने अपनी निष्क्रियता और लापरवाही के लिए अन्य मुख्यमंत्रियों को दोषी ठहरा दिया और प्रदूषण के तमाम अहम कारणों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। 

इतना ही नहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री का पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से भी इस मुद्दे पर वाद विवाद हो चुका है। इस मुद्दे पर पर्यावरण मंत्री का कहना था कि दिल्ली के कुल प्रदूषण में पराली जलाने की हिस्सेदारी सिर्फ 4 फ़ीसदी है। जिस पर केजरीवाल ने कहा था कि नकारने से इस समस्या का समाधान नहीं निकलेगा, फिर उन्होंने दावा किया कि पराली ही दिल्ली के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। आईआईटी कानपुर द्वारा साल 2015 में किए गए एक शोध के अनुसार दिल्ली के 70 फ़ीसदी प्रदूषण का कारण, स्थानीय स्रोत हैं। जिसमें सड़क की धूल, वाहन और घरेलू स्रोत मुख्य रूप से शामिल हैं। यानी केजरीवाल के दावे के अनुसार सिर्फ पराली जलाना दिल्ली के प्रदूषण का एकमात्र सबसे बड़ा कारण नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि केजरीवाल एक विवादित मुख्यमंत्री होते हुए केवल मुफ्त की रेवड़ियां बांट सत्ता हथियाने में विशेषज्ञ जरूर हैं, लेकिन इनकी मुफ्त रेवड़ियों के लालचियों ने दिल्ली को कितना नुकसान पहुँचाया है, जिसे मुफ्तखोर अब तक नहीं समझ रहे। इस विवादित आदमी से दिल्ली तो संभल नहीं रही, चले हैं गोवा में अपरिपक़्व ज्ञान से वहां की जनता को भ्रमित करने। दिल्ली में 15 वर्ष शीला दीक्षित, 5 वर्ष मदन लाल खुराना और 5 वर्ष राधारमण आदि ने शासन किया, लेकिन कभी प्रदुषण की समस्या नहीं हुई, लेकिन जब से अरविन्द केजरीवाल के हाथ मुफ्तखोरों से दिल्ली दी है, हर वर्ष दीपावली पर प्रदुषण, मानों पराली पहली बार जल रही हो। कुछ करना नहीं, और अपनी नाकामी दूसरों पर पटक दो, यह है इस विवादित केजरीवाल की वास्तविकता। 

इस मुफ्त की रेवड़ियां बांट राज करने वाले मुख्यमंत्री से न प्रदुषण काबू हो रहा है और न ही कोरोना, गोवा में ज्ञान बांटने पर ट्विटर पर लोग इस तरह मजाक बना रहे हैं, जैसे किसी ने हंसी का पिटारा खोल दिया हो:- 

मूल समस्या का उल्लेख और उसे स्वीकार नहीं करने की वजह से दिल्ली की सरकार तमाम प्रयासों के बावजूद प्रदूषण पर नियंत्रण करने में असफल रही है। दिल्ली की सरकार ने अक्टूबर में ‘ग्रीन वॉर रूम’ इओन (ion) की शुरुआत की थी जिसके तहत तमाम निर्देश जारी किए गए थे। जिसमें सैटेलाइट तस्वीरें, धूल ख़त्म करने के लिए ड्राइव, अलग अलग क्षेत्रों में एंटी स्मोग गन लगाना, दिल्ली में प्रदूषण के 13 हॉटस्पॉट वाले क्षेत्रों के लिए एक्यूआई (AQI) समेत अन्य कई निर्देश। लेकिन इनमें से कोई भी निर्देश प्रभावी साबित नहीं हुआ बल्कि राजधानी के कई क्षेत्रों का एक्यूआई स्तर लगभग 999 रहा जो कि डिवाइस द्वारा मापी जाने वाली सबसे अधिक रीडिंग है। सरल शब्दों में कहें तो दिल्ली का प्रदूषण स्तर इतना है, जितना मशीन की माप से भी ज़्यादा है। 

पटाखों पर प्रतिबंध लगाने और ग्रीन पटाखों का संग्रह करने वालों को गिरफ्तार करने के अलावा (दिल्ली सरकार द्वारा इसके लिए लाइसेंस जारी किए जाने के बाद) प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केजरीवाल सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। इतना ही नहीं केजरीवाल ने प्रदूषण के मुद्दे पर गोवा के मुख्यमंत्री से बहस कर ली लेकिन अपने पड़ोसी राज्य पंजाब को पराली जलाने से रोकने के लिए मना नहीं कर पाए जो उनके मुताबिक़ प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। यह बात भी आम लोगों की समझ के दायरे से बाहर है कि पता नहीं कैसे केजरीवाल ने गोवा सरकार के साथ प्रदूषण का सामना करने का प्रस्ताव रख दिया। जो दिल्ली से लगभग 2000 किलोमीटर दूर स्थित है और वहाँ की जलवायु और पर्यावरण कितना अलग है।

दोहरा करने की परियोजना पर फैलाया झूठ 

इस परियोजना के तहत कर्नाटक के होसपेट और गोवा के वास्कोडिगामा के बीच रेलवे लाइन को दोहरा किया जाएगा। कुल 342 किलोमीटर की रेलवे लाइन में 252 किलोमीटर रेलवे लाइन का काम पूरा हो चुका है, बचे हुए 90 किलोमीटर में लगभग 70 किलोमीटर गोवा में आता है। इस इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की ज़रूरत तब महसूस हुई जब यह बात सामने आई कि 24 कोच की लंबाई वाली पैसेंजर ट्रेन को प्लेटफॉर्म की लंबाई और अन्य पहलुओं की वजह से शुरु नहीं किया जा सकता था। 

तमाम कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने इस परियोजना का तमाम पर्यावरण संबंधी कारणों की वजह से विरोध किया। जिसमें नेशनल पार्क को हानि, पुरानी इमारतों को नुकसान, कोयले के आवागमन की वजह से पर्यावरण की हानि। ऐसा भी दावा किया जाता है कि उच्च न्यायालय ने इस परियोजना पर रोक लगाई है और परियोजना को रोकने के लिए रेलवे बोर्ड की तरफ से भी आदेश जारी किया गया था। एक और दावे के अनुसार रेलवे ने इस परियोजना के लिए ग्रामीण प्रशासन से अनुमति नहीं ली थी।

इसके बाद रेलवे के आईआईएससी, बेंगलुरु की मदद से एक सर्वेक्षण (एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट) कराया। देश का एक ऐसा प्रतिष्ठित संस्थान जो वन विभाग और पर्यवारण मंत्रालय से जुड़ी चीज़ों का विश्लेषण और निगरानी रखता है। उस क्षेत्र में पशुओं की ‘सेफ क्रासिंग’ के लिए 5 नए अंडरपास, 3 नए ओवरपास बनाए जाने की योजना तैयार की गई है। पर्यावरण मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि किसी भी परम्परागत इमारत ट्रैक को दोहरा करने की परियोजना के दौरान नहीं तोड़ा जाएगा। 

इसके अलावा सरकार कोयले के निर्यात पर भी रोक लगाएगी, इसका मतलब रेलवे ट्रैक पर कोयले का आवागमन बढाया नहीं जाएगा। रेलवे ने यह बताया है, ‘हाईकोर्ट ने परियोजना पर रोक लगाई है’ यह बात झूठी है क्योंकि इस मसले पर अभी भी सुनवाई होनी है। इसके अलावा रेलवे बोर्ड द्वारा जारी किए गए आदेश की बात भी पूरी तरह झूठ है। मंत्रालय के मुताबिक़ क़ानूनी तौर पर अगर रेलवे की ज़मीन पर किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी स्थानीय प्रशासन की ज़रूरत नहीं पड़ती है।

‘दिल्ली में प्रदूषण 25% कम’- केजरीवाल के इस दावे को ग्रीन पीस ने किया ख़ारिज

Related imageपर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ग्रीनपीस इंटरनेशनल ने दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा प्रदूषण घटाने वाले झूठे दावों की पोल खोली है। ग्रीनपीस का कहना है कि पिछले कुछ सालों में प्रदूषण का स्तर 25% नहीं घटा हैं। संस्था के अनुसार अगर दिल्ली और आसपास के राज्यों में वायु गुणवत्ता और सैटेलाइट डेटा के साथ पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों की बढ़ती खपत के आँकड़ों को मिलाकर देखें तो उन्हें ये दावा गलत लगता हैं।
Image result for delhi govt pollution advertisementएनजीओ के विश्लेषण के मुताबिक, “दिल्ली और आसपास के राज्यों में वायु गुणवत्ता निगरानी और उपग्रह के आँकड़ों के साथ ही पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों की बढ़ती खपत को मिलाकर देखें तो सरकार का यह दावा गलत है कि पिछले वर्षों के दौरान प्रदूषण के स्तर में 25 प्रतिशत की कमी आई है।”
लेकिन, ग्रीनपीस की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि उनके लिए यह विश्लेषण महत्वहीन है। उन्होंने कहा कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा है कि दिल्ली में प्रदूषण घटा है और अक्टूबर और नवंबर में प्रदूषण पराली जलाने से हो रहा है।
पिछले कुछ समय में दिल्लीवासियों को दिल्ली की सड़कों पर हर जगह सरकारी एडवरटाइजमेंट के जरिए राज्य में कम हुए प्रदूषण की सूचना दी जा रही थी। जिसमें कहा जा रहा था कि दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर 2012-2014 के 154 के औसत से 2016-2018 में 115 तक आ गया है। जिसका मतलब है कि पीएम 2.5 में करीब 25% कमी आई है।
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दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर कोई कामयाब कदम न उठा पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने केजरीवाल सरकार को जमकर फटकार लगाई...

ग्रीनपीस इंडिया ने सैटेलाइट डेटा के हवाले से कहा है कि साल 2013 से 2018 तक पीएम 2.5 के स्तर में कोई भी कमी नहीं दिख रही हैं। उनका कहना है कि पिछले 3 सालों की तुलना में केवल साल 2018 के अंतिम महीनों में प्रदूषण के स्तर में कुछ कमी आई है।