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मुस्लिम औरतों ने दी चुनौती : ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता की SC के पास पहुँची जाँच, उसे इस्लाम में माना जाता है सबसे ‘माकूल’

                                                                                                                    साभार: SCI/Chatgpt
‘तलाक-ए-हसन’ इस्लाम में तलाक देने की वो प्रक्रिया है, जिसमें शौहर अपनी बीवी को तीन महीने में हर महीने में एक बार ‘तलाक’ कहने से निकाह तोड़ सकता है। लेकिन यह ‘तीन तलाक’ से अलग है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में असंवैधानिक घोषित करते हुए तीन साल की सजा का प्रावधान दिया था। अब यही सुप्रीम कोर्ट ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता की जाँच कर रही है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जाँच सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ मामले में दाखिल की गई 9 याचिकाओं पर विचार करते हुए शुरू की गई है। मामले में तीन राष्ट्रीय आयोगों से जवाब माँगा गया है, जिसमें मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने आयोगों को इस्लाम की प्रमाणिक पुस्तकों और मजहबी किताबों समेत अन्य किसी भी सामग्री से तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति भी दी है। कोर्ट ने मामले में सुनवाई को 19 नवंबर तक टालते हुए आयोगों को 4 महीने का समय दिया है।

गाजियाबाद की पत्रकार बेनजीर हिना ने दी थी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ से संबंधित सभी दायर याचिकाओं में मुख्य याचिका गाजियाबाद की पत्रकार बेनजीर हिना की है, जिनके शौहर ने इस प्रक्रिया के तहत उन्हें तलाक दे दिया था। साल 2022 में पहले महीने में तलाक के बाद ही बेनजीर ने कोर्ट का रुख किया था।

कोर्ट में याचिका दायर कर हिना ने इस प्रक्रिया को ‘भेदभावपूर्ण’ बताया था। उन्होंने कहा था कि यह एकतरफा तलाक की प्रक्रिया ‘महिलाओं की गरिमा पर घोर आघात’ है। ये औरतों के अधिकार को कमजोर करती है। उन्होंने कोर्ट से माँग की कि यह संविधान के अनुच्छेद 14,15, 21 और 25 का उल्लंघन है, इसीलिए ‘असंवैधानिक’ घोषित किया जाए।

तब सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते इस्लाम में ‘तलाक-ए-हसन’ के जरिए तलाक की प्रक्रिया को तीन तलाक से अलग बताया था और कहा था कि महिलाओं के पास भी ‘खुला’ का विकल्प है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ मामले में दायर याचिकाओं में एक याचिका क्रिकेटर मोहम्मदी शमी की बीवी हसीन जहाँ की भी है।

इस्लाम में तलाक-ए-हसन कितना वैध?

शरिया लॉ में तलाक-ए-हसन को तलाक-उल-सुन्नत का रूप माना गया है। तलाक-उल-सुन्नत के दो रूप हैं, जिनमें अन्य रूप तलाक-ए-अहसन है। तलाक-उल-सुन्नत का अर्थ है ‘सुन्नत के मुताबिक’ तलाक, जिसमें समय दिया जाता है। इस तरीके को पैगंबर मुहम्मद ने भी कबूल किया है।

तलाक-ए-हसन में शौहर तीन महीने में हर महीने एक बार ‘तलाक’ कहकर निकाह खत्म कर सकता है। इस्लाम में इस प्रक्रिया को सबसे माकूल और काबिले गौर तरीका माना जाता है। इस प्रक्रिया में मियाँ और बीवी को सुलह का समय दिया जाता है।

इस पर नोएडा के मौलवी मुफ्ती मुबारक कहते हैं कि तलाक-ए-हसन या तीन तलाक इस्लाम और कुरान में जायज नहीं है, केवल दो तलाक कहना ही मान्य है। तलाक-ए-हसन पर बोलते हुए कहते हैं कि इसमें पहले महीने में तलाक बोलने के बाद भी मियाँ-बीवी को दोबारा एकसाथ रहने का मौका मिलता है। लेकिन दूसरे महीने में ऐसा नहीं है, तब मियाँ-बीवी को दोबारा निकाह करना होगा।

वहीं, तीसरे महीने के तीसरे तलाक के बाद हलाला लागू हो जाएगा। इसके तहत औरत को नए शख्स के साथ निकाह कर संबंध बनाने होंगे, फिर उसे तलाक देकर अपने पहले शौहर से निकाह किया जा सकता है।

तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया

तलाक-ए-हसन में शौहर तभी ‘तलाक’ कह सकता है, जब बीवी तुहर (मासिक धर्म से मुक्त) में नहीं होती है। अगर औरत तुहर में नहीं है, तो पहले महीने पर ‘तलाक’ कहकर प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसके बाद एक महीने तक औरत इद्दत (एक अवधि तक किसी भी मर्द से निकाह या शारीरिक संबंध नहीं बना सकती) में रहती है।

एक महीने के इंतजार पर शौहर अगला ‘तलाक’ भी तभी दे सकता है, जब औरत हैज (मासिक धर्म) में नहीं है। इस एक महीने के बीच अगर सुलह हो जाती है तो ‘तलाक’ की प्रक्रिया रुक जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो तीसरे महीने के हैज में तलाक को दोहराया जाता है। तीसरी बार ‘तलाक’ कहने पर तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया पूरी होने के साथ निकाह खत्म हो जाता है।

शौहर के तलाक देते ही औरत अब ‘इद्दत’ शुरू कर देती है। शरिया लॉ में तलाक के बाद औरत को तीन महीने तक ‘इद्दत’ पूरी करनी होगी। हालाँकि, औरत अगर गर्भवती है तो इस ‘इद्दत’ को पूरा नहीं माना जाता है। ये बच्चा पैदा होने के बाद ही लागू होगी।

फिर निकल आया कार्टून जिन्न : तुर्की की पत्रिका ने बनाया मोहम्मद वाला कार्टून, भड़क गए इस्लामी कट्टरपंथी: कहा- पैगम्बर का किया अपमान, 3 कार्टूनिस्ट गिरफ्तार

                      तुर्की में लेमन पत्रिका के कार्टून को लेकर बवाल ( फोटो साभार-turkiyetoday.com/ )
2015 में फ्रांस गैर-मुस्लिम देश में व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ द्वारा विवादित कार्टून प्रकाशित होने खूब दंगे हुए, दंगों का अखाडा भारत कैसे पीछे रहता। लेकिन अब इतने सालों बाद कार्टून का जिन्न मुस्लिम देश तुर्की में निकल आया है। देखना यह है कि अब कितने दंगाई निकल कर आते हैं?     

तुर्की की साप्ताहिक व्यंग्य पत्रिका लेमन इन दिनों सुर्खियों में है। वजह है इसमें छपा कार्टून। दरअसल कार्टून में ‘मुहम्मद’ और ‘मूसा’ नाम के दो व्यक्तियों को आसमान में हाथ मिलाते दिखाया गया है और नीचे जमीन जल रही है। मुस्लिम कट्टरपंथियों का आरोप है कि ये पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा हैं।

इसके बाद मुस्लिम बहुल देश की भावनाएँ भड़क गई और देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन होने लगे। इस मामले में पुलिस ने तीन कार्टूनिस्टों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें कार्टूनिस्ट डोगन पेहलवान और पत्रिका के प्रबंध संपादक और प्रमुख संपादक शामिल हैं।

तुर्की के कानून मंत्री यिलमाज तुनक ने जून 30 को कहा कि तुर्की के अधिकारियों ने पत्रिका लेमन के खिलाफ़ आपराधिक जाँच शुरू कर दी है। तुनक ने अपने बयान में कहा कि इस्तांबुल के पुलिस कार्यालय ने तुर्की दंड संहिता की धारा 216 के तहत जाँच शुरू की है, जो “सार्वजनिक रूप से मजहबी मूल्यों का अपमान करने” से संबंधित है।

क्या है मामला?

पत्रिका के 26 जून के अंक में छपे कार्टून में इज़राइल और ईरान के बीच हाल ही में हुए संघर्ष का संदर्भ दिया गया था और इसमें पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा को बमबारी से तबाह हुए शहर के ऊपर हाथ मिलाते हुए दिखाया गया था। कार्टून में नीचे जमीन पर जलता शहर और मिसाइलें दिखाई गई हैं।

पत्रिका का कहना है कि इस कार्टून का मकसद इजरायली हमले के दौरान ईरान में मारे गए एक मुस्लिम व्यक्ति की पीड़ा उजागर करना है। उसका नाम कार्टून में ‘मुहम्मद’ रख दिया गया है।

पत्रिका के प्रमुख संपादक तुन्के अकगुन ने एएफपी से बात करते हुए कहा है, “इस कार्टून में दिये गए नाम मुहम्मद का पैगंबर मुहम्मद से कोई लेना देना नहीं है। मुहम्मद नाम से करोड़ों लोग दुनियाभर में रहते हैं। ” पत्रिका ने कहा कि कार्टून का उद्देश्य धार्मिक मूल्यों का मजाक उड़ाना नहीं था।

इस्तांबुल में लेमन के कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन

कार्टून को तुर्की में धार्मिक भावनाओं का अपमान माना गया और कट्टरपंथी संगठन सड़कों पर उतर आए। इस्तांबुल के इस्तिकलाल स्ट्रीट पर लेमन की इमारत के सामने कई प्रदर्शनकारी एकत्र हुए। कुछ लोग लेमन के कार्यालय में घुसने की कोशिश करते देखे गए।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लेमन पत्रिका ने पैगंबर मुहम्मद का खुलेआम अपमान किया है। इस अपमान को कभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता।

ऐसा ही एक मामला 2015 में फ्रांस में सामने आया था। उस वक्त भी मामला पैगंबर मुहम्मद के कार्टून का ही था। जब व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के कार्यालय में घुस कर मुस्लिम कट्टरपंथियों ने फायरिंग की थी। इसमें संपादक समेत 12 लोगों की मौत हो गयी थी।

कांग्रेस के हारते ही शुरू हो गई दिल्ली को ब्लॉक करने की साजिश, बरेली के जहरीले मौलाना ने खोला ‘टूलकिट’: तौकीर रजा ने कहा- देशभर से मुस्लिम पहुँचे रामलीला मैदान


इस्लामी संगठन इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल के प्रमुख और बरेली के रहने वाले मौलाना तौकीर रजा ने एक बार फिर धमकी दी है। उसने कहा है कि मुस्लिमों के पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ यति नरसिंहानंद द्वारा दिए गए कथित अपमानजनक बयान के विरोध में दिल्ली मार्च किया जाएगा और देश को जाम किया जाएगा। इसके पहले वो इस्लामी धर्मांतरण कराने और देश विरोधी भड़काऊ बयान दे चुका है।

 हरियाणा चुनाव में कांग्रेस के हारते ही काउंसिल के 24वें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में तौकीर रजा ने अपना एजेंडा खोल दिया। उसने कहा कि यति नरसिंहानंद जैसे लोग पैगंबर-ए-इस्लाम मोहम्मद साहब की शान में गुस्ताखी कर रहे हैं। ऐसा करने वालों के विरुद्ध कोई धरना या फिर ज्ञापन नहीं होगा। अब दशहरा होने के बाद दिल्ली जाकर रामलीला मैदान में घेराव करके प्रदर्शन किया जाएगा।

मौलाना तौकीर रजा ने कहा कि दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन बरेली के आसपास के ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कोने-कोने से लोग आएँगे। मौलाना तौकीर ने कहा, “इस समय देश के लोगों में गुस्सा भरा हुआ है। नबी की शान में गुस्ताखी करने वाले आजाद घूम रहे हैं। हमारे नौजवानों के साथ मॉब लिंचिंग हो रही है। दाढ़ी वाले को ट्रेन के अंदर पीटने की घटना हो रही है।”

अपनी उत्तेजक एवं कट्टरपंथी बयानों के लिए कुख्यात मौलाना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया। उसने कहा कि देश के वजीरे आजम समुदाय विशेष (मुस्लिम) के साथ पक्षपात कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग देश का माहौल खराब करना चाहते हैं। ये सब पब्लिसिटी के लिए कर रहे हैं। यही वजह है कि महापुरुषों की शान में गुस्ताखी करते हैं।

इतना ही नहीं, बरेली दंगे के मास्टरमाइंड मौलाना तौकीर ने इस्लाम छोड़कर दूसरे धर्म में शादी करने वाली मुस्लिम लड़कियों को लेकर भी बयान दिया। उन्होंने कहा, “मजहब छोड़कर दूसरे धर्म के लोगों के साथ शादी करने वाली लड़कियों की इस्लाम में कोई जरूरत नहीं है। ऐसे कमजोर लोगों की इस्लाम में कोई जगह नहीं है। अच्छा रहा कि वे खुद ही इस्लाम को छोड़कर चली गईं।”

इससे पहले इस मौलाना ने कहा था, “हम 20 करोड़ हैं या 30 करोड़…मैं नहीं जानता, लेकिन हम में से सिर्फ 1 प्रतिशत ही घरों से बाहर निकल आएँ और दिल्ली कूच कर दें और ऐलान करें कि जब तक नरेंद्र मोदी इस्तीफा नहीं देते, तब तक धरना खत्म नहीं करेंगे। हमारे सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है। अगर जो पैमाना छलक गया तो नतीजे बहुत खराब हो सकते हैं।”

बता दें कि कुछ दिन पहले तौकीर रजा ने कुछ हिंदू लड़कियों का सार्वजनिक तौर पर इस्लाम में धर्मांतरण कराने का ऐलान किया था। इसके साथ ही उनका निकाह मुस्लिम युवकों से कराने की बात भी कही थी। इसको लेकर बड़े पैमाने पर बवाल हुआ था। तौकीर रजा ने कहा था कि दूसरे धर्म के 15 लड़के और 8 लड़कियाँ इस्लाम कबूलना चाहते हैं। ये सभी बालिग़ हैं और इन्होंने पहले से ही शादी कर रखी है।

मौलाना ने कहा था कि उन्होंने जिला प्रशासन से सामूहिक निकाह की अनुमति माँगी है। तौकीर ने कहा था इन सबने धर्मांतरण पहले ही कर लिया है। कार्यक्रम में सिर्फ इसकी औपचारिक प्रक्रिया पूरी कराई जाएगी। इसके बाद सार्वजनिक रूप से सामूहिक निकाह कराया जाएगा। मौलाना ने कहा कि जिन 5 जोड़ों का पहले निकाह कराया जाएगा उनमें 1 मध्य प्रदेश से है, बाकी बरेली के आसपास के जिलों के हैं।

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उन्होंने कहा कि पढ़ाई और नौकरी के दौरान ये लड़के-लड़कियाँ प्रेम में पड़े। हालाँकि, हिंदुओं के विरोध के बाद प्रशासन ने इसकी इजाजत नहीं दी थी। इतना ही नहीं, प्रशासन ने भी कहा था कि माहौल बिगाड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने साफ कह दिया था कि बिना अनुमति के इस प्रकार के किसी कार्यक्रम का आयोजन नहीं करने दिया जाएगा। 

पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ शिकायत दर्ज, बदायूँ हत्या के बाद ‘छोटे नरसिंहानंद’ पहुँचे थाने: 39 साल पहले ऐसे ही मामले में भड़के थे दंगे, मारे गए थे हिंदू

अनिल यादव ने पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ दी शिकायत (शिकायतकर्ता दाएँ, जिन पर शिकायत उनका चेहरा नहीं लगा सकते)
उत्तर प्रदेश के बदायूँ में रमजान के दिनों में साजिद द्वारा दो मासूम बच्चों का गला रेतकर की गई हत्या से पूरा देश सन्न है। ऐसे में डासना के शिव शक्ति धाम से जुड़े अनिल यादव ने आहत होकर माँग की है कि इस्लाम के संस्थापक पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो। यादव ने शिकायत में कहा है कि कुरान के कारण दुनिया में जघन्य अपराध हो रहे हैं। यादव ने अपनी इस शिकायत को गाजियाबाद के थाना वेब सिटी में दिया है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में मौजूद जानकारी के अनुसार, अनिल यादव ने कहा है, “पिछले 1400 सालों से हिंदू महिलाओं से बलात्कार लूटपाट, बच्चों की नृशंस हत्या की वजह कुछ और नहीं बल्कि कुरान है। हजरत पैगंबर मुहम्मद द्वारा दी गई तालीम व कुरान में जो कानून लिखा है आज तक वही दोहराया जा रहा है। बदायूँ में बच्चों की हत्या ने गजवा-ए-हिंद की घंटी बजा दी है जो कि हजरत मुहम्मद का सपना है। इससे मेरी भावना आहत हुई है। हजारों हिंदुओं को गजवा-ए-हिंद से बचाने के लिए ये FIR होना जरूरी है।”

बता दें कि जिस गजवा-ए-हिंद का मुद्दा अनिल यादव ने अपनी शिकायत में उठाया है, उसी के संबंध में महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद बात करने जामा मस्जिद जा रहे थे, मगर बताया जा रहा है कि उन्हें रास्ते में ही हिरासत में ले लिया गया।

इस्लाम के विरुद्ध आवाज़ उठना कोई नई बात नहीं। 1985 से चल रही है। जब Calcutta High Court में कुरान की 124 आयतों के विरुद्ध चाँदमल चोपड़ा और शीतल सिंह ने मुकदमा दर्ज किया था। इतना ही नहीं, 31 जुलाई 1986 को दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट ने 24 आयतों के विरुद्ध फैसला दिया था।(देखिए नीचे लिंक) अनवर शेख ने अपनी पुस्तकों में खुलकर इसका विरोध किया, लेकिन आज तक शेख के विरुद्ध किसी ने फतवा जारी करने का साहस नहीं किया। दूसरे, नूपुर शर्मा के कही बात का गलत वीडियो दिखाने पर कट्टरपंथियों ने सर तन से जुदा का फरमान दे दिया, लेकिन नवभारत चैनल के एंकर सुशांत सिन्हा के अलावा किसी भी चैनल में सच्चाई दिखाने की हिम्मत नहीं की, सब की खोजबीन पत्रकारिता अँधेरी गलियों में खो गयी। लेकिन Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation(इस्लाम क्या कहता है) चैनलों ने इस्लाम की सच्चाई सामने ला दी। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ex-muslim वर्ग ने। जिनके तीखे प्रश्नों का उन मौलानाओं को-जिन्हे आम मुसलमान बहुत इज्जत बख्शता है-वातानुकूलित कमरों में पसीने पोंछते देखा। इतने मुद्दों पर गर्मागर्म बहस देखी, काश किसी हिन्दू ने एक भी बोल दी होती, सर तन से जुदा की आवाज़ बुलंद हो गयी होगी, और सारा मीडिया उस हिन्दू को ही अपमानित कर रहा होता।   

डासना का शिव शक्ति धाम यति नरसिंहानंद के कारण ही 2021 में खूब चर्चा में रहा था। अब उसी जगह अनिल यादव (जिन्हें छोटा नरसिंहानंद कहा जाता है) ने ऐसी शिकायत दी है। यादव की शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई हुई इसका पता अभी नहीं चला है लेकिन संभावना है कि इस मामले को आगे न सुना जाए या अगर मामला कोर्ट तक पहुँचे तो वहाँ से खारिज हो जाए। ऐसा क्यों कहा जा सकता है इसके लिए 36 साल पहले दर्ज केस और उसकी डिटेल जानने की जरूरत है जब इस्लाम की ‘पवित्र पुस्तक’ पर सवाल उठते ही न्यायपालिका के भी हाथ-पाँव फूल गए थे

कलकत्ता कुरान याचिका

36 साल पहले 1985 में कुरान को प्रतिबंधित करने की माँग लेकर वकील चाँदमल चोपड़ा और शीतल सिंह कलकत्ता हाईकोर्ट पहुँचे थे। 29 मार्च, 1985 को उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक आवेदन दायर किया था, जिसमें कलकत्ता उच्च न्यायालय से सरकार को ‘पवित्र पुस्तक’ की प्रत्येक प्रति को ‘जब्त’ करने का निर्देश देने की अपील की गई थी।
याचिका में तर्क दिया गया था कि भारतीय दंड संहिता (IPC) धारा 153A और 295A के आधार पर कुरान की प्रत्येक प्रति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 95 के तहत ज़ब्त किए जाने के लिए उत्तरदायी है। इसमें चाँदमल चोपड़ा और शीतल सिंह ने ‘काफिरों’ के खिलाफ हिंसा को लेकर आवाज उठाई थी। उन्होंने कुरान के एक आयत को उद्धृत किया, जिसमें कहा गया था, “जब पवित्र महीने समाप्त हो जाते हैं तो जहाँ भी मूर्ति-पूजा करने वाले मिले, उसे मार डालो।”

जिस जज के पास पहुँची कुरान से जुड़ी याचिका उसका भी हुआ बहिष्कार

यह मामला शुरू में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति खस्तगीर जे के समक्ष आया था जिसके बाद 70 से अधिक अधिवक्ताओं द्वारा ‘खस्तगीर जे’ की अदालत का बहिष्कार करने का आग्रह अन्य वकीलों से किया। वहीं वरिष्ठ वकील सीएफ अली ने कहा था, “यह बेतुका है। पृथ्वी पर कोई भी नश्वर पवित्र धर्मग्रंथ को चुनौती नहीं दे सकता है और दुनिया की किसी भी अदालत को इस पर कोई अधिकार नहीं है।”

बंगाल से लेकर बांग्लादेश में सड़कों पर थी इस्लामी भीड़

इसके बाद तमाम इस्लामवादी विरोध में आ उतरे। नतीजतन बताया जाता है कि भारत से लेकर बांग्लादेश तक में दंगे होने लगे। विकीपीडिया पर मौजूद जानकारी बताती है कि दंगों में हिंदुओं को निशाना बनाया गया था। हजारों की भीड़ ने सड़क पर उतरकर बांग्लादेश में भारतीय उच्च आयोग के सामने हल्ला की थी। बांग्लादेश के सीमाई इलाके में स्थित शहर में 12 लोग मारे गए थे जबकि 100 घायल हुए थे ये सारे हिंदू थे। इसी तरह 20000 मुस्लिमों की भीड़ ढाका में निकलकर आई थी। वहीं अन्य दंगे कश्मीर और बिहार समेत कई जगह देखे गए थे।

बंगाल सरकार ने कहा था- नहीं बदला जा सकता एक शब्द

वहीं सीपीआई (एम) शासित पश्चिम बंगाल सरकार ने याचिका और कलकत्ता उच्च न्यायालय में इसके प्रवेश के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था। अपने हलफनामे में सरकार ने कहा था कि यह, “अदालत को दुनिया भर के मुसलमानों के पवित्र धर्मग्रंथ कुरान पर फैसला सुनाने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, जिसका प्रत्येक शब्द, इस्लामी मान्यता के अनुसार, अपरिवर्तनीय है।” सरकार का कहना था कि यह याचिका दुर्भावनापूर्ण इरादे से दायर की गई थी और भारतीय इतिहास में ऐसी याचिका कभी दायर नहीं की गई है।
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The Case of Inder Sain Sharma
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The Case of Inder Sain Sharma
State, Vs. Inder Sain Sharma s/o Sh. Dewan Chand Sharma r/o 90 Vino-Bha (Vinobha Puri), Lajpat Nagar, New Delhi. 2. Raj Kumar s/o Ishwar Parshad c/o H.No. 67-South Ext., New Delhi.

Some Articles Of The Quran Are Harmful-Delhi Magistrate Z.s. Lohat
SIKHAWARENESS.COM
Some Articles Of The Quran Are Harmful-Delhi Magistrate Z.s. Lohat
SOME ARTICLES OF THE QURAN ARE HARMFUL-DELHI MAGISTRATE Z.S. LOHAT by Sarita Nair on Tuesday, 15 March 2011 at 11:23 SOME ARTICLES OF THE QURAN ARE HARMFUL,TEACH HATRED AND CREATE DIFFERENCES BETWEEN MOHAMMEDANS AND OTHER COMMUNITIES – DELHI MAGISTRATE Z.S. LOHAT I am enclosing herewith a copy of....

याचिका पर सुनवाई तक नहीं, पुस्तक प्रकाशित करने पर गिरफ्तारी

एक याचिका से मामला इतना गरमा गया था कि राजनीतिक दबाव के कारण, न्यायमूर्ति खास्तगीर ने इसे अपनी सूची से हटा दिया और इसे न्यायमूर्ति सतीश चंद्रा की अदालत को भेज दिया। उसके बाद राज्य के महाधिवक्ता एसके आचार्य की सलाह पर, मामला न्यायमूर्ति बिमल चंद्र बसाक की पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया, जिन्होंने 17 मई, 1985 को याचिका खारिज कर दी। 18 जून को फिर चंद्रमल चोपड़ा ने रिव्यू याचिका डाली जिसे बाद में 21 जून को ही खारिज कर दिया गया। इसके बाद इस याचिका को लेकर चंद्राल चोपड़ा ने सीता राम गोयल के साथ मिलकर 1986 में ‘द कलकत्ता कुरान याचिका’ नाम की पुस्तक प्रकाशित की थी, जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। वहीं गोयल को गिरफ्तारी से बचने के लिए भागना पड़ा था।

कर्नाटक : 5000 रुपए का ईनाम रख पैगंबर मुहम्मद पर निबंध प्रतियोगिता करा रहा था हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ

साभार ANI 

कर्नाटक के धरवाड़ क्षेत्र के एक सरकारी स्कूल में गुप्त रूप से इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद (Prophet Muhammad) पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित करने के कारण कार्रवाई की गई है। गडक जिले में स्थित सरकारी स्कूल के हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ को निलंबित कर दिया गया है।

कर्नाटक सरकार की ओर इसे इस तरह की प्रतियोगिता आयोजित करने का किसी तरह का निर्देश नहीं दिया गया था। इसके बावजूद हेडमास्टर ने पैगंबर पर गुप्त रूप से प्रतियोगिता आयोजित की। लोक निर्देश के अतिरिक्त आयुक्त सिद्रमप्पा एस. बिरादर ने बताया, “प्रारंभिक जाँच के दौरान हेडमास्टर के खिलाफ आरोप सही साबित हुए। यही वजह है कि उन्हें निलंबित कर दिया गया है।”

घटना नागवी के सरकारी हाईस्कूल की है। मामले का खुलासा हिंदू संगठन श्रीराम सेना के सदस्यों द्वारा प्रधानाध्यापक के विरोध के बाद हुई। इसके बाद बुधवार (28 सितंबर 2022) को घटना की जाँच शुरू की गई। खंड शिक्षा अधिकारी ने बताया कि एक शिकायत दर्ज की गई थी और वह शिकायत की एक प्रति राज्य शिक्षा विभाग के उप-निदेशक को भेजेंगे।

जाँच में पाया गया कि प्रधानाध्यापक मुनाफ ने अन्य शिक्षकों या विभाग को बताए बिना कक्षा 8 के 43 छात्रों को पैगंबर मुहम्मद पर एक पुस्तक देकर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया था। प्रधानाध्यापक अब्दुल मुनाफ ने कथित तौर पर बच्चों को किताबें दीं और इस प्रतियोगिता के लिए 5,000 रुपए के नकद पुरस्कार की भी घोषणा की।

एक अभिभावक शरणप्पा गौड़ा हापलाद ने कहा, “मुझे पता चला कि स्कूल के प्रधानाध्यापक निबंध लेखन प्रतियोगिता आयोजित करके और 5,000 रुपए का नकद पुरस्कार घोषित कर छात्रों के दिमाग में इस्लाम थोपने की कोशिश कर रहे थे। लड़के और लड़कियों को 5,000 रुपए जीतने की उम्मीद में निबंध लिखने के लिए कहा गया था।”

उन्होंने छात्रों का धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगाते हुए आगे बताया, “हेडमास्टर अब्दुल मुनाफ का इरादा छात्रों का धर्म परिवर्तन कराना था। इसलिए मैंने श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं को सूचित किया। मैं जानना चाहता हूँ कि पैगंबर मुहम्मद पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित करने के पीछे और क्या इरादा हो सकता है।”

अलकायदा भी पड़ा नूपुर शर्मा के पीछे, ‘ईशनिंदा की सज़ा’ देने के लिए भारत के मुस्लिमों को उकसाया: ख़ुफ़िया एजेंसियों के कान खड़े

                                                                                                                                   प्रतीकात्मक
खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन अलकायदा भी अब नूपुर शर्मा के पीछे पड़ गया है। उसने भारत के मुस्लिमों को उकसाते हुए कहा है कि वो नूपुर शर्मा को ईशनिंदा की सज़ा दें। पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी करने के आरोप लगने के बाद से ही नूपुर शर्मा पर जिहादी ख़तरा बढ़ गया है। अब अलकायदा के इस परिदृश्य में सामने आने के बाद ख़ुफ़िया एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं। अलकायदा ने अपने मुखपत्र के जरिए नूपुर शर्मा को ‘सज़ा’ दिलाने का ऐलान किया है।

जिस तरह नूपुर शर्मा के पीछे अब अल कायदा के भी मैदान में कूदने पर सबसे पहले भाजपा के मुस्लिम (अल्पसंख्यक) प्रकोष्ठ और संघ को अपने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच को कट्टरपंथियों के विरुद्ध सड़क पर लाकर जनता को यह समझाना होगा कि "नूपुर ने जो कहा वह हमारी इस्लामिक किताबों में भी लिखा है फिर अपमान किस बात का?" अगर नहीं आते उस स्थिति में भाजपा और संघ को अपने इन प्रकोष्ठों को तुरंत बंद कर देना चाहिए, ताकि जनता इन भ्रमित प्रकोष्ठों से गुमराह न होने पाए। भारत में सोशल मीडिया के अलावा केवल News Nation ऐसा चैनल है जिसने TRP की परवाह न करते हुए "इस्लाम क्या कहता है" शो शुरू किया हुआ है, जिसमें इस्लाम छोड़ चुके मुस्लिम किस तरह मौलवियों और मौलानाओं को बेनकाब कर रहे हैं। मौलानाओं को पसीने पोंछते देखा गया है; कुरान की आयतें ठीक से न पढ़े जाने पर डांटते हुए देखा जाता है। दूसरे, जनता को उन कपटियों से सावधान रहना चाहिए जो टीवी पर 'सर तन से जुदा' को किसी इस्लाम या धर्म के विरुद्ध तो बोलते हैं लेकिन सड़क पर आकर उनके सामाजिक बहिष्कार एवं कानून के हवाले करने की आवाज़ बुलंद नहीं कर सकते। इन लोगों की असलियत को पहचानना होगा। जो परदे के पीछे बैठ देश में अशांति और अराजकता फैलाकर अपनी किसी निजी स्वार्थ को पूरा कर रहे हैं। 

अलकायदा के इस मुखपत्र का नाम ‘नवा-ए-घवा-ए-हिन्द’ है, जिसमें नूपुर शर्मा पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी कर के ईशनिंदा की है। इस पत्रिका के ताज़ा अंक में आतंकी संगठन ने भारतीय मुस्लिमों से कहा है कि वो नूपुर शर्मा से बदला लें। साथ ही मुस्लिमों को उकसाते हुए उन्हें हथियार इकट्ठा करने और इसे चलाना सीखने के लिए भी कहा गया है। अलकायदा ने इसे ‘बचाव वाला जिहाद’ नाम दिया है।

इसके साथ ही भारतीय मुस्लिमों से कहा गया है कि उनके सबसे नजदीक में कश्मीर में जिहाद हो रहा है, जिसमें उन्हें हिस्सा लेना चाहिए। अमेरिका में जिस तरह से इस्लामी कट्टरपंथियों ने लेखक सलमान रुश्दी को निशाना बनाया, उसके बाद से अब नूपुर शर्मा की सुरक्षा को लेकर ख़ुफ़िया एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं। इससे पहले जून में अलकायदा ने नूपुर शर्मा से बदला लेने के लिए आत्मघाती हमलों का ऐलान किया था।

उस समय अलकायदा ने भड़काते हुए लिखा था कि अगर मुस्लिमों ने पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी का बदला नहीं लिया तो उनका बुरा हाल होगा। ‘अलकायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS)’ का मुखिया असीम उमर उत्तर प्रदेश के संभल का रहने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने भी नूपुर शर्मा पर खतरे को देखते हुए उन पर दर्ज सारे FIR को दिल्ली ट्रांसफर करने का फैसला सुनाया। पड़ोस में अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अलकायदा ने अपना गढ़ बना रखा है, जिस कारण भारत के लिए वो एक खतरा बना हुआ है।

नूपुर शर्मा की हत्या के लिए Pak से आया रिजवान अशरफ, साथ में 11 इंच का चाकू, नक्शे और मजहबी किताबें

नूपुर शर्मा की हत्या के लिए पाकिस्तान से आया था रिजवान अशरफ (फोटो साभार: TV9)
नूपुर शर्मा की हत्या के लिए पाकिस्तान से आए रिजवान अशरफ को राजस्थान की अंतरराष्ट्रीय सीमा से गिरफ्तार किया गया है। BSF ने उसे घुसपैठ करते हुए रंगे हाथों पकड़ा। वो नूपुर शर्मा को जान से मार डालने की मंशा से आया था। उनके पास से कई संदिग्ध वस्तुएँ भी बरामद हुई हैं। IB और RAW जैसी ख़ुफ़िया एजेंसियों की टीमें भी उससे पूछताछ में लगी हुई हैं। मिलिट्री एजेंसी की टीम भी उससे पूछताछ कर रही है।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर हिन्दुओं की आस बंधी थी, कि इतने वर्षों से हो रहे हिन्दुओं और हिन्दुत्व के अपमान करने वालों को सबक सिखाया जाएगा, लेकिन स्थिति लगभग पिछली सरकारों जैसी है। जब तक सरकार इन जेहादियों और इनके समर्थकों के साथ इजराइल, फ्रांस और चीन की तरह सख्ती से पेश नहीं आएगी, ये शांतिदूत गरीब, मज़लूम, नासमझ और भटके हुए कहकर देश में अशांति फैलाते रहेंगे। इनकी समस्त सरकारी सुविधाएं तुरंत बंद की जाएं। नूपुर शर्मा ने आखिर क्या कहा है? वास्तव में नूपुर ने इनकी इस्लामिक किताब में लिखी आपत्तिजनक एवं शर्मसार कथन को टीवी पर बोलकर सार्वजनिक कर दी है, यही कसूर है नूपुर का। वरना ज़ाकिर नाइक और अन्य उन मौलानाओं के खिलाफ 'सर तन के अलग' मुहिम क्यों नहीं हुई, क्योकि ये लोग केवल मुस्लिमों के बीच बोलते हैं, किसी टीवी पर नहीं।  

ये घटना 16 जुलाई, 2022 की है, जब रात के 11 बजे श्रीगंगानगर से सटे हिंदुमलकोट बॉर्डर पर फेंसिंग के आसपास एक संदिग्ध व्यक्ति घूम रहा था। पेट्रोलिंग टीम को उस पर संदेह हुआ, जिसके बाद उससे पूछताछ की गई। उसने ठीक से सवालों के जवाब नहीं दिए। तलाशी लेने पर उसके पास से दो चाकू भी बरामद हुए। इसमें से एक चाकू 11 इंच का और काफी धारदार है। उसके पास से मजहबी किताबें, नक़्शे, कपड़े और खाने-पीने के सामान भी मिले हैं।

पूछताछ में रिजवान अशरफ ने बताया है कि वो उत्तरी पाकिस्तान स्थित मंडी बहाउद्दीन शहर का रहने वाला है। ये शहर पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि उसने नूपुर शर्मा की हत्या के लिए बॉर्डर क्रॉस किया था, आधिकारिक रूप से ऐसी कोई पुष्टि हो गई है कि वो इसीलिए ही आया था। पुलिस ने उसे स्थानीय अदालत में पेश किया, जिसके बाद उसे 8 दिन के लिए रिमांड पर भेज दिया गया है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ ने एक वरिष्ठ BSF अधिकारी के हवाले से बताया कि उसने पूछताछ में नूपुर शर्मा की हत्या के लिए बॉर्डर क्रॉस करने की बात कबूल की है। रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि इससे पहले वो अजमेर शरीफ स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाने वाला था। पैगंबर मुहम्मद पर नूपुर शर्मा के बयान से वो नाराज़ है। बता दें कि राजस्थान के उदयपुर में टेलर कन्हैया लाल और महाराष्ट्र के अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे की जिहादियों ने नूपुर शर्मा के समर्थन का आरोप लगा कर हत्या कर दी है।


क्या नैरेटिव सेट करने वाले इस्लामिक किताबों में लिखा ही झूठला रहे हैं ? देखिए वीडियो

नैरेटिव, आज के अर्थ में कह लीजिए कि चर्चा का एंगल तय करना। दुनिया भर में भले ही आग लग जाए, लेकिन अगर 4 लोगों के पास नैरेटिव सेट करने की ताकत है तो वो ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि कोई इस आग की चर्चा ही न करे। या फिर वो ये भी फैला सकते हैं कि ये आग नहीं, पानी है। नैरेटिव की ताकत ये होती है कि अपवाद सामान्य लगने लगता है और जो रोज होता है, उसे अपवाद की श्रेणी में डाल दिया जाता है। हमने ‘पीके (2014)’ जैसी फिल्मों में महादेव के अपमान को बर्दाश्त नहीं किया होता तो आज ऐसी नौबत ही नहीं आती।

नूपुर शर्मा वाला मामला देख लीजिए। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि नूपुर शर्मा ने जो कहा वो सही है या गलत, वो इस्लाम की पवित्र पुस्तकों में लिखा है या नहीं। चर्चा इस पर होनी चाहिए थी कि जाकिर नाइक ने अगर यही बात कही तो उसकी बात पर हंगामा क्यों नहीं हुआ। चर्चा इस पर होनी चाहिए थी कि नूपुर शर्मा ने शिवलिंग का मजाक बनाए जाने वाले बयानों के जवाब में ऐसा कहा। चर्चा का विषय ये होना चाहिए था कि उनके ऐसा कहने के पहले महादेव को लोगों ने क्या-क्या कहा।  चर्चा इस पर नहीं होती टीवी डिबेट के दौरान नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हु-अकबर लगने पर क्यों लगे? ज्ञानवापी में सर्वे का आर्डर देने वाले जज को धमकियां दी जाने पर नैरेटिव सेट करने वाले चुप्पी साधे रहते हैं, विरोध नहीं करते। लेकिन हिन्दू मुंह में दही जमाए बैठा रहा, जबकि कट्टरपंथी और छद्दम धर्म-निरपेक्षी सच को अपमान बताने में सफल होकर ज्ञानवापी, मथुरा और अन्य विवादित स्थलों से ध्यान हटाने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। ज्ञानवापी, मथुरा और अन्य विवादित मुद्दों पर सबने चुप्पी साध ली जाती है। सरकार, सुरक्षा एजेंसीज, पुलिस, एंकरों और हिन्दुओं को इन नैरेटिव सेट करने वालों के षड्यंत्र को समझना  होगा। 

लेकिन, चर्चा इस पर होने लगी कि नूपुर शर्मा ने पैगंबर मुहम्मद का अपमान कर दिया। उन्हें पहले ही दोषी ठहरा दिया गया, चैनल को वीडियो हटाने पर मजबूर करते हुए उससे स्पष्टीकरण जारी करने करवाया गया, मुस्लिम मुल्कों के सरकारों पर दबाव डाल कर आपत्तियाँ जारी करवाई गईं, क़तर जैसे मुल्कों ने भारतीय राजदूत को तलब किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने वालों के दबाव में भाजपा ने ‘गुडविल’ दिखाते हुए अपने दो प्रवक्ताओं को निलंबित भी कर दिया। जिसने इन कट्टरपंथियों की चालों को बल दे दिया। किसी टीवी तो क्या सरकार ने यह पूछने का साहस नहीं किया कि नूपुर क्या इस्लाम या पैगम्बर को गाली दी? नूपुर के कथन और हदीस में जो लिखित है, उसमे फर्क है? यदि नहीं, फिर अपमान कैसे? 

देखिए इस वीडियो में एक मौलाना कट्टरपंथियों से क्या ज्वलंत प्रश्न कर रहा है। क्या इस मौलाना के खिलाफ फतवा होगा? क्या इस मौलाना का सर तन से जुदा करने की मांग होगी? नैरेटिव सेट करने वाले और इनके चुंगल में फंस एंकरिंग करने वाले और नूपुर के विरुद्ध प्रदर्शनकारियों को ध्यान से सुनना चाहिए।

 

मामला यहाँ थम जाना चाहिए था। यद्यपि इससे मुस्लिम कट्टरपंथियों का मनोबल बढ़ा कि वो इस्लामी मुल्कों और इस्लामी मुल्कों के संगठनों से दबाव डलवा कर भारत में कुछ भी करा सकते हैं, लेकिन फिर भी मामला यहाँ रुक जाना चाहिए था। नूपुर शर्मा के कथन में कितने प्रतिशत की सच्चाई है, डर से इसकी चर्चा नहीं हुई – लेकिन, फिर भी इस कार्रवाई के बाद सब ख़त्म हो जाना चाहिए था। शिवलिंग का मजाक बनाने वालों पर कहीं कोई ,लेकिन हिन्दुओं के ही ज़हर का घूँट पीने के बाद नूपुर शर्मा मामले को थम जाना चाहिए था।

लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। प्रयागराज में नाबालिगों को आगे कर के दंगे हुए। राँची में पुलिस पर हमला किया गया। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जुमे की नमाज के बाद हिंसा हुई। नवीं मुंबई में बुर्कानशीं महिलाएँ सड़क पर उतरीं। आम लोग निशाना बने। पुलिसकर्मी घायल हुए। जम्मू कश्मीर में युट्यूबर ने VFX के माध्यम से नूपुर शर्मा का सिर कलम करने का वीडियो भी दिखा दिया। AIMIM सांसद ने उन्हें फाँसी दिए जाने की बात कह डाली

नैरेटिव का खेल देखिए। शिवलिंग के अपमान वाले और भगवान महादेव पर अश्लील टिप्पणी वाले सैकड़ों बयान और मीम्स शेयर करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और ये चर्चा का विषय तक नहीं बना, लेकिन मुहम्मद जुबैर के एक वीडियो शेयर करने से पूरे भारत में दंगे हुए और इस्लामी मुल्कों ने हमारी सरकार पर दबाव बनाया। नैरेटिव सेट करने वालों ने नूपुर शर्मा के कथन की सत्यता पर चर्चे को गौण कर दिया। दंगों को विरोध प्रदर्शन कह दिया, हिंसा को शांतिपूर्ण मार्च कह दिया और पत्थरबाजी करने वालों पर चुप्पी साध ली।

जबकि, होना क्या चाहिए था? दुनिया भर में ये चर्चा होनी चाहिए थी कि राँची में थाना प्रभारी का सिर फोड़ने वाले कौन लोग थे? चर्चा ये होनी चाहिए थी कि अपनी महिलाओं-बच्चों को हिंसा में कौन आगे कर रहा है? चर्चा ये होनी चाहिए थी कि मंदिर में पूजा के बाद लोग प्रसाद लेकर निकलते हैं, लेकिन मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद लोग हाथों में पत्थर लिए बाहर क्यों आते हैं? बहस का बिंदु ये होना चाहिए था कि नूपुर शर्मा के पुतले को दरगाह के पास फाँसी के फंदे पर लटका कर तालिबानी मानसिकता का खुलेआम प्रदर्शन भारत जैसे लोकतंत्र में क्या स्थान रखता है।

चर्चा इस पर होनी चाहिए थी कि नूपुर शर्मा की तस्वीर पर पेशाब करने वाले बच्चों के परिवार वाले कौन हैं। बहस का विषय ये होना चाहिए था कि एक डच सांसद को नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर हत्या की धमकियाँ मिलने लगती हैं। मीडिया में ख़बरें ये होनी चाहिए थीं कि नवीन जिंदल को सिर कलम करने की धमकियों के कारण परिवार सहित दिल्ली से पलायन को मजबूर होना पड़ा। बातचीत इस पर होनी चाहिए थी कि नवीन जिंदल को उनके पूरे परिवार का सिर कलम करने की धमकी देने वाले कौन लोग हैं।

उदाहरण के लिए नैरेटिव की ताकत देखिए। सबा नकवी शिवलिंग के खिलाफ बयान देती हैं। उन पर FIR दर्ज होती है तो महिला पत्रकारों का संगठन एक लंबा-चौड़ा बयान जारी कर के इसे ‘महिला’ और ‘मीडिया’ पर हमले का रूप देता है। ये अलग बात है कि इस संस्था की ही कई पत्रकार इसके विरोध में उतर आती हैं। लेकिन, कहीं भी बयान में शिवलिंग के अपमान की चर्चा नहीं की जाती। इसे गौण कर दिया जाता है। ये नैरेटिव में फिट नहीं बैठता।

लेकिन, नूपुर शर्मा के मामले में यही महिला होने वाली बात की चर्चा तक नहीं की जाती। कुछ मुस्लिम बच्चे हँसी-ठहाके लगाते हुए अपने प्राइवेट पार्ट्स बाहर निकाल कर एक महिला की तस्वीर पर पेशाब करते हैं, लेकिन नैरेटिव में फिट न बैठने के कारण इस पर चर्चा नहीं होती। ऐसा दर्जनों बार हुआ है। अर्णब गोस्वामी को महाराष्ट्र पुलिस केवल आलोचना के लिए गिरफ्तार कर ले तो एडिटर्स गिल्ड चूँ तक नहीं करता, बंगाल में पत्रकार मारे जाते हैं तो आह नहीं निकलती, लेकिन प्रोपेगंडा गिरोह के पत्रकार झूठ फैलाएँ और एक FIR भी दर्ज हो जाए तो लंबा-चौड़ा बयान आ जाता है।

जैसे आज किसी के पुतले को फाँसी पर लटकाना आम हुआ है, कल को अफगानिस्तान की तरह हिन्दुओं को लटकाना आम हो जाएगा। भारत के इतिहास में ऐसा हो चुका है। हिन्दुओं के कटे हुए सिरों से पहाड़ बनाए जा चुके हैं, 2000 भालों पर सिखों के कटे हुए सिर लेकर मुग़ल बादशाह को पेश किया जा चुका है, हिन्दू महिलाओं को थोक में सेक्स स्लेव बनाया जा चुका है और ये सब कुछ इस्लामी शासनकाल में ही हुआ है। फिर इस्लामी भीड़ हावी हो रही है, इसकी कोई गारंटी तो है नहीं कि ऐसा नहीं होगा।

हिन्दुओं को नैरेटिव सेट करने की ताकत रखनी होगी

हिन्दुओं को नैरेटिव सेट करने की ताकत रखनी होगी। एक घटना को अपने एंगल से पेश करने के लिए 10 विदेशी भाषाओं में अनुवाद कर के ट्विटर ट्रेंड चलाना होगा। हर देश के राजनेताओं को टैग कर के सही स्थिति बतानी होगी। प्रोपेगेंडा फैला रहे विदेशी संगठनों को तस्वीरों-वीडियोज के जरिए चुप कराना होगा। जब झूठ 100 बार बोलने से सच प्रतीत हो सकता है तो सच 10 बार बोलने से ताकतवर सच क्यों नहीं बनेगा? नैरेटिव सेट कीजिए।

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नूपुर शर्मा के खिलाफ झूठ फैलाने वाले जुबैर पर FIR करने से मुंबई पुलिस का इनकार: पवार पर पोस्ट करने

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नूपुर शर्मा के खिलाफ झूठ फैलाने वाले जुबैर पर FIR करने से मुंबई पुलिस का इनकार: पवार पर पोस्ट करने

दंगों की बात नहीं हो रही अब भी, जहाँ दंगाइयों पर पुलिस ने कार्रवाई की है उसकी बात हो रही, क्योंकि नैरेटिव को यही चाहिए। उनका नैरेटिव कहता है कि 100 पत्थर अगर कोई इस्लामी कट्टरपंथी मारता है तो उसकी बात मत करो, लेकिन उसे शांत करने के लिए पुलिस एक लाठी उसे लगा दे तो इसको पूरी दुनिया में फैला दो। सीजे वर्लमैन जैसे लोग यही कर रहे। ऐसे ही झूठ फैलता है। ये किसे नहीं पता कि दंगाइयों को शांत करने के लिए पुलिस बल प्रयोग करने को मजबूर होती है, लेकिन ये ऐसा दबाव बनाने की क्षमता रखते हैं कि अगली बार से पुलिस उनका फूल-मालाओं से स्वागत करने लगे।