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महबूबा मुफ्ती से आरफा तक चाहती हैं कि हम न जानें इस्लामी लुटेरों-आक्रांताओं का सच, क्योंकि नफरत फैलेगी: अजीत डोभाल से यूँ ही नहीं चिढ़ा लेफ्ट-लिबरल गैंग

                                          अजीत डोभाल के बयान के बाद पीछे पड़े लिबरल और कट्टरपंथी
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने 10 जनवरी 2026 को ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के उद्घाटन समारोह में युवाओं से प्रेरित करने के लिए शब्द कहे, उससे इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों का धड़ा आहत होकर बैठा है।

नतीजतन NSA को सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक, नफरत फैलाने वाला, देश को बाँटने वाला व इनसिक्योर बताकर सेकुलर भारत के लिए खतरा बताया जा रहा है। उन्हें घेरने वालों में इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम, अलगाववादियों का समर्थन करने वाली जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती जैसों के नाम हैं।

नीचे देख सकते हैं महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट किया, “यह बहुत दुखद है कि डोभाल जैसे उच्च पद के अधिकारी, जिनका काम देश को अंदरूनी और बाहरी खतरों से बचाना है, उन्होंने नफरत फैलाने वाली सांप्रदायिक विचारधारा को अपनाया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश की। 21वीं सदी में सदियों पुराने घटनाओं के लिए Revenge लेने की बात करना केवल एक इशारा है, जो गरीब और अशिक्षित युवाओं को एक पहले से ही परेशान और लक्ष्य बन रही अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला करने के लिए उकसाता है।”

इसी तरह, आरफा खानम शेरवानी ने डोभाल को ऐसा इनसिक्योर अधिकारी बताया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

इनके अलावा कंचना यादव जैसे लोग भी अजीत डोभाल के बयान को तोड़-मरोड़कर अपना एंगल देने में लगे हैं। वो अपने फॉलोवर्स को ये बता रहे हैं कि डोभाल अपने बच्चों को तो विदेशों में पढ़ा रहे हैं और आपके बच्चों को भड़का रहे हैं। कंचना का ट्वीट देखिए-

ऐसे ही लिबरल धड़े का जाना-माना नाम स्वाति चतुर्वेदी- लिखती हैं- आपके बच्चे मंदिर तोड़ने वालों से बदला लेंगे और डोभाल के बच्चे बाहर विदेश में बिजनेस करके लक्जरी जीवन जीएँगे।

ऊपर दिए सारे ट्वीट को देख ऐसा लग रहा है मानो डोभाल ने देश के युवाओं से बदला लेने की बात कही है, उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ युवाओं को भड़काया है। जबकि हकीकत इससे पूरी अलग है। अजीत डोभाल ने कार्यक्रम में युवाओं से जो कहा, उसका कहीं से कहीं तक अर्थ हिंसा से जुड़ा नहीं था।

क्या कहा था अजीत डोभाल ने?

कार्यक्रम में अजीत डोभाल ने देश के युवाओं को देश के इतिहास के प्रति जागरूक किया था। उन्होंने युवाओं से ये कहा था स्वतंत्रता हमें आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके लिए पीढ़ियों ने अपार बलिदान दिए। इतिहास की सच्चाइयों को समझ कर युवाओं को देश के पुनर्निर्माण में जुटना चाहिए।

उनके जिस शब्द पर वामपंथी और कट्टरपंथी ने बवाल मचाया हुआ है उसे भी उन्होंने किस संदर्भ में कहा था इसे उनके पूरे बयान से समझिए। डोभाल ने कहा था-

भारत के अतीत को सिर्फ दुख के साथ याद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई लोगों को फाँसी दी गई, गाँव जला दिए गए, हमारी सभ्यता को नुकसान पहुँचाया गया। मंदिर लूटे गए और लोग बेबस होकर यह सब होते देखते रहे। यह इतिहास हमें चुनौती देता है कि हर युवा के भीतर आग होनी चाहिए। ‘बदला’ शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन बदला एक शक्तिशाली ताकत है। हमें अपने इतिहास का बदला लेना होगा और भारत को उसके अधिकारों, विचारों और विश्वासों के आधार पर फिर महान बनाना होगा।

डोभाल के बयान से साफ है कि वो कहीं भी ‘बदले’ शब्द को हिंसा से जोड़कर नहीं बोल रहे थे बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण की बात कर रहे हैं। उन्होंने इतिहास से सीख लेकर राष्ट्र को पुनर्निर्मित करने की बात कही, न कि किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की। उनका मकसद अपने श्रोता युवाओं में देशभक्ति जगाने का था, द्वेष फैलाने का नहीं।

हालाँकि, उनके बयान को वामपंथी और कट्टरपंथी अपने एजेंडे के अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। उन्हें शायद डर है कि कहीं सच में लोग उस इतिहास को लेकर सजग न हो जाएँ जहाँ देश को तोड़ने वालों और संपत्तियों को लूटने वालों का जिक्र है। इनकी दिक्कतें इसलिए हैं क्योंकि जिन्होंने भारत को समय-समय पर नष्ट करने का प्रयास किया वो ही इनके पसंदीदा ‘नायक’ हैं।

इस्लामी आक्रांताओं को क्यों कर रहे हो बदनाम- लिबरल और कट्टरपंथियों का तर्क

दिलचस्प बात ये है कि डोभाल के बयान को विकृत ढंग से पेश करने के चक्कर में ये लोग खुद ही इसको स्वीकार कर बैठे कि देश के मंदिर को लूटने वाली घटनाएँ बिलकुल सच हैं। महबूबा मुफ्ती के ट्वीट से स्पष्ट है कि वह मान रही हैं कि 21वीं सदी से पहले ये घटनाएँ हुईं थीं। लेकिन फिर भी वो इससे मुँह इसलिए मोड़ रही हैं क्योंकि वो नहीं चाहती इतिहास को बार-बार उकेरा जाए जिससे पता चले सच क्या था।

वहीं आरफा खानम हैं, जिनकी पत्रकारिता का केंद्र हमेशा ये बताने-समझाने पर रहता है कि मुगलों ने देश के लिए क्या किया… उनके लिए अगर कोई ये बता दे कि उन्होंने देश में और देश के लोगों के साथ क्या किया तो उन्हें इससे आपत्ति होने लगती है।

कंचना यादव और स्वाति चतुर्वेदी का भी यही पैटर्न है। वह अच्छे से जान-समझ रही हैं कि डोभाल ने क्या बोला है, लेकिन उनकी बात चूँकि वामपंथी एजेंडे पर सही नहीं बैठ रही इसलिए उन्होंने उस बयान के खुद ही मायने गढ़ लिए।

असली गलती किसकी?

ऐसे ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग लोगों को समझने की जरूरत है कि इतिहास को इनके हिसाब से पेश करने का एक दौर बीत चुका है। अब वो समय नहीं है कि इस्लामी आक्रांताओं के कुकृत्यों को महिमामंडन करने का काम हो। इतिहास का अर्थ वही होता है जो बीता समय का सच हो। अगर उसे बताने से एक समुदाय पर सवाल उठ रहे हैं, तो समस्या उस रिलिजन या मजहब में है न कि इतिहास में।

आज अगर देश को लूटे जाने के इतिहास को गहराई से पढ़ने पर ‘लुटेरे’ इस्लामी आक्रांता ही निकलकर आ रहे हैं तो इसमें इतिहास बताने वाले की क्या गलती है? गलती उसकी है जिसने ये किया, गलती उसकी है जिसने हमेशा ये समझा कि दुनिया वही इतिहास पढ़ेगा जो वो वर्ग पढ़ाना चाहेगा। गलती उस वर्ग की है जिसे लगा कि उन्होंने कह दिया तो अकबर हमेशा ‘महान’ बना रहेगा और औरंगजेब को लोग हमेशा ‘मंदिर का निर्माण’ कराने वाले के तौर पर जानेंगे।

नाइजीरिया में हो रहे ईसाइयों के नरसंहार के लिए इस्लामी कट्टरपंथी जिम्मेदार: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ; पत्नी से जुड़े विवाद में घिरे जेडी वेंस भी समर्थन में


अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पत्नी उषा वेंस के धर्म को लेकर दिए विवादास्पद बयानों के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक पोस्ट शेयर की है। इस पोस्ट में ट्रंप ने लिखा है, “नाइजीरिया में ईसाई धर्म पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। वहाँ हजारों ईसाइयों की हत्या की जा रही है। इन नरसंहारों के पीछे कट्टरपंथी इस्लामी समूह जिम्मेदार हैं।”

ट्रंप ने आगे लिखा है, “लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है, जब ईसाइयों या किसी भी समुदाय के लोगों की इस तरह हत्या होती है (सिर्फ नाइजीरिया में 3,100, जबकि दुनिया भर में 4,476 मौतें), तो हमें कार्रवाई करनी ही होगी। संयुक्त राज्य अमेरिका चुप नहीं रह सकता जब नाइजीरिया और कई अन्य देशों में ऐसे अत्याचार हो रहे हैं। हम दुनिया भर में अपने महान ईसाई समुदाय की रक्षा करने के लिए तैयार, इच्छुक और सक्षम हैं।”

राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया, “नाइजीरिया के एक गाँव में आतंकी हमला हुआ था, जिसमें करीब 20 ईसाई मारे गए। साल 2024 दुनियाभर में धर्म के नाम पर मारे गए लोगों में 70 प्रतिशत लोग ईसाई थे और नाइजीरिया निवासी थे। इस नरसंहार के लिए बोको हराम, इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस (ISWAP) और फुलानी उग्रवादी चरवाहे जिम्मेदार हैं।”

जेडी वेंस ने ईसाईयों की रक्षा को लेकर लिखी गई ट्रंप की यह पोस्ट ऐसे समय में शेयर की है, जब वे खुद अपनी हिंदू पत्नी के ईसाई धर्म अपनाने की इच्छा जता रहे हैं और लगातार आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं।

‘मेरी आलोचना करने वाले दिखा रहे नफरत’: हिंदू पत्नी को ईसाई बनाने की इच्छा रखकर घिरे अमेरिकी राष्ट्रपति जेडी वेंस, सफाई में बोले- वो नहीं बदलेगी धर्म

                              अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पत्नी उषा वेंस के साथ (फोटो साभार: न्यूज 18)

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने अपनी हिंदू पत्नी उषा वेंस के ईसाई मजहब अपनाने की इच्छा जताई थी। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भारी आलोचना शुरू हो गई, जिसमें कई लोगों ने कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी के हिंदू धर्म का अपमान किया है। इसके बाद अब इस मामले में जेडी वेंस ने प्रतिक्रिया दी है।

जेडी वेंस ने शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को अपनी पत्नी उषा वेंस के धर्म को लेकर दिए गए बयान पर बचाव करते हुए कहा कि उनकी पत्नी क्रिश्चियन नहीं हैं और उनका धर्म बदलने का कोई इरादा भी नहीं है। वेंस ने इस मुद्दे पर हुई आलोचना को घृणित बताया और आरोप लगाया कि यह ‘ईसाई-विरोधी पूर्वाग्रह (anti-Christian bigotry)’ से प्रेरित है।

जेडी वेंस ने कहा- चाहता हूँ वह मेरे नजरिए को समझें

वेंस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर स्पष्टीकरण देते हुए लिखा, “वह क्रिश्चियन नहीं हैं और धर्म परिवर्तन की कोई योजना भी नहीं है। लेकिन जैसे हर इंटरफेथ (मिश्रित धर्म) शादी में होता है, मैं भी चाहता हूँ कि एक दिन वह मेरे नजरिए को समझें, फिर भी मैं उन्हें प्यार करता रहूँगा, उनका साथ दूँगा और हम जीवन और आस्था पर बात करते रहेंगे, क्योंकि वह मेरी पत्नी हैं।”

वेंस ने यह भी बताया कि उषा ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने उन्हें सालों पहले दोबारा अपने धर्म से जुड़ने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने कहा, “मेरी पत्नी मेरे जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद हैं। उन्होंने ही मुझे अपने धर्म और विश्वास से दोबारा जोड़ने में मदद की।”

अंत में वेंस ने लिखा, “इस तरह की पोस्ट ईसाई-विरोधी कट्टरता को बढ़ावा देती हैं। हाँ, ईसाइयों की भी अपनी मान्यताएँ होती हैं और हाँ, इन मान्यताओं के कई परिणाम होते हैं, जिनमें से एक यह है कि हम उन्हें दूसरों के साथ साझा करना चाहते हैं। यह बिल्कुल सामान्य बात है, और जो कोई भी आपको इसके विपरीत बता रहा है, उसका कोई न कोई एजेंडा जरूर है।”

दरअसल, मिसिसिपी विश्वविद्यालय में Turning Point USA के एक कार्यक्रम के दौरान वेंस ने कहा था कि वे चाहते हैं कि उनकी पत्नी उषा, जो एक हिंदू परिवार से हैं, भविष्य में ईसाई मजहब को अपनाएँ। उन्होंने कहा था, “अधिकतर रविवार वह मेरे साथ चर्च आती हैं। क्या मैं चाहता हूँ कि किसी दिन उन्हें भी वही अनुभव हो जो मुझे चर्च में हुआ था? हाँ, मैं वास्तव में चाहता हूँ।”

‘दुनिया में रहेंगे तो गाज़ी की तरह…’: जानें इस्लामी किताबों में क्या है इसका अर्थ, क्या काफिरों के कत्लेआम के लिए भड़का रहे हैं ओवैसी?

कालचक्र इतनी तेजी से बदल रहा है, जिसकी छद्दम सेक्युलरिस्ट्स कल्पना नहीं कर सकते। मोदी-योगी विरोध में संविधान और सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं से छल-कपट करने वाले सामने आने शुरू हो चुके हैं। निम्न लेख उसी पर रौशनी डाल रहा है। 

हिन्दुओं और शांतिप्रिय मुसलमानों को आंखे और दिमाग को खोल उन सभी नेताओं और उनकी पार्टियों का सामाजिक बहिष्कार करों जिन्होंने गाज़ियों को महान मुग़ल बादशाह बता कर देश को गुमराह किया। 

इन्ही जैसे तथाकथित जनहितैषी नेताओं की वजह से ही देश में दंगे होते हैं, जिनमे बेगुनाह -चाहे वह हिन्दू है या मुसलमान- लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। ये ओवैसी जब मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बोलता है ऐसी ही भाषा बोलता है और जब हिन्दू क्षेत्रों में बोलता है हिन्दुओं को विभाजित करने दलितों का मसीहा बनकर बोलता है। 
असदुद्दीन ओवैसी ने कोई हैरान करने वाली बात नहीं की, बल्कि सच्चाई को कबूला है। इस्लाम की वास्तविकता जानने के लिए अनवर शेख को पढ़ना चाहिए, नूपुर शर्मा विवाद के दिनों के Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर 'इस्लाम क्या कहता है' एपिसोड देखने चाहिए जिस पर एक्स-मुस्लिमों के तीखे सवालों ने 
वातानुकूलित कमरों में बैठे होने के बावजूद बड़े-बड़े मौलानाओं और मौलवियों को पसीना पोंछते देखा जा सकता। 
देखिए कुछ वीडियो, जो ओवैसी जैसे गाज़ी सोंच वालो को बेनकाब कर रही है। ये तो केवल मुस्लिम के हैं, हिन्दुओं के नहीं। महाराज देवकी नंदन ठाकुर ने भी इन कट्टरपंथियों को चारों खाने चित किया हुआ है।  
  

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने रविवार (7 अप्रैल 2024) को पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का एक छोटा वीडियो एक्स पर पोस्ट किया। इस वीडियो में ओवैसी लोगों को संबोधित कर रहे हैं, जिसमें ओवैसी कह रहे हैं कि वो ‘गाजी’ के रूप में जीना या मरना पसंद करते हैं। उन्होंने अपने साथी मुस्लिमों से भी गाजी के तौर पर जीने-मरने की बात कही। बता दें कि गौरतलब है कि इस्लामिक पुस्तकों में गाजी का मतलब अल्लाह के बताए रास्ते पर चलने वाला इस्लामिक लड़ाका होता है। एक गाजी काफिरों (मतलब इस्लाम को न मानने वालों) के खिलाफ लड़ता है। वह या तो काफिरों और अनेकेश्वरवादियों को मार डालता है या लड़ाई में मारा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि असदुद्दीन ओवैसी भारत में मुस्लिमों से आख़िर क्या करने को कह रहे हैं?

इस वीडियो में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ”तुम हमको मारना चाहते हो तो मारो प्यारे, कौन रोक रहा है तुमको? मेरी जिंदगी अल्लाह ने लिख दी, जब मैं अपनी माँ के पेट में था। मेरी जिल्लत, मेरी इज्जत सबकुछ अल्लाह लिख चुका है। तुम क्या लोगे मुझसे? अरे याद रखो, दुनिया में रहेंगे तो गाजियों की तरह रहेंगे, या फिर मौत आएगी तो शहादत को पसंद करेंगे। हम अपने माता-पिता को शर्मिंदा नहीं होने देंगे, इंशाल्लाह!”

गाजी का क्या मतलब होता है?

सबसे पहले तो ये समझने की जरूरत है कि गाजी का मतलब आखिर क्या होता है? गाजी शब्द की पैदाइश अरबी भाषा में हुई, जिसमें ग़ज़व का अर्थ लड़ाई है। गाज़ी का अर्थ है लड़ने वाला, या योद्धा। इस्लामी संदर्भ में गाज़ी शब्द स्पेशल माना जाना है। इस्लाम में गाज़ी का मतलब वह व्यक्ति है जो इस्लाम और उसकी शिक्षाओं के लिए जिहाद में लड़ता है। जिहाद का मूल मतलब काफिरों और गैर-इस्लामियों या इस्लाम त्यागने वालों के खिलाफ धर्म की लड़ाई है। यह हर किसी और हर उस चीज़ के खिलाफ लड़ाई है जो इस्लाम में विश्वास नहीं करता है। इस प्रकार गाजी का मतलब अनिवार्य रूप से एक जिहादी है जो गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लड़ने को तैयार है। इस युद्ध में वह या तो मरने या दूसरों को मारने के लिए तैयार रहता है।
सुन्नन अन-नसाई 2625 (पुस्तक 24, हदीस 7) के अनुसार, गाजी अल्लाह के तीन सबसे प्रिय मेहमानों में से एक हैं। इस्लामिक धर्मग्रंथों की एक वेबसाइट पर इस हदीस की व्याख्या में कहा गया है, “अबू हुरैरा द्वारा सुनाई गई हदीस के अनुसार, अल्लाह के दूत ने तीन प्रकार के लोगों का उल्लेख किया है जिन्हें अल्लाह का मेहमान माना जाता है। इनमें एक गाजी, एक हज यात्री और एक मुतामिर शामिल हैं। गाज़ी वह है जो इस्लाम और उसकी शिक्षाओं के लिए जिहाद में लड़ता है। हज यात्री वह व्यक्ति होता है जो अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार मक्का की तीर्थयात्रा करता है यदि उसके पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हों। अंत में, मुतामिर वह व्यक्ति होता है जो ज्ञान प्राप्त करने या अल्सेलाह से ईनाम पाने करने के लिए व्यापार या शिक्षा जैसे किसी भी उद्देश्य के लिए यात्रा करता है। इन तीनों को अल्लाह का अतिथि माना जाता है और उसके लिए किए गए कामों या प्रयासों के हिसाब से उन्हें ईनाम भी दिया जाता है।

एक गाजी की मदद करना भी गाजी होने के बराबर

इस्लामी किताबों में सिर्फ गाजी को ही सम्मान नहीं मिला, बल्कि उन लोगों को भी सम्मान मिलता है, जो गाजी की मदद करता है। या फिर गाजी के परिवार के सदस्यों की मदद करता है या देखरेख की जिम्मेदारी लेता है। साहिह अल-बुखारी 2843  ( किताब 56, हदीस 59) ने इसे विस्तार से बताया है। यह उन लोगों के लिए इनाम की बात करता है, जो गाजी के बच्चों या परिवार की देखभाल करते हैं और उनकी मदद करते हैं या फिर गाजियों को इस्लाम के लिए लड़ने के लिए तैयार करते हैं। इस हदीस के अनुसार , पैगंबर मुहम्मद ने कहा, “जो अल्लाह के रास्ते पर जाने के लिए एक गाजी को तैयार करता है, उसे एक गाजी के बराबर इनाम दिया जाता है। और जो अल्लाह की राह में जाने वाले गाजी के परिजनों की ठीक से देखभाल करता है, उसे भी गाजी के बराबर इनाम दिया जाता है।
इसके अलावा, रियाद अस-सलीहिन (किताब 11 हदीस 22) के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद ने कहा था, “वह जो अल्लाह के रास्ते में एक गाजी (लड़ाकू) को तैयार करता है, ऐसा लगता है जैसे उसने खुद लड़ाई में भाग लिया हो; और जो गाज़ी की अनुपस्थिति में उसके आश्रितों की देखभाल करता है, वह मानो स्वयं लड़ाई में भाग लेता है।

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ‘हम गाजियों की तरह जिएँगे’

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ‘हम (खुद और अन्य मुस्लिम जिनका वह दावा करते हैं कि वह प्रतिनिधित्व करते हैं) गाजियों की तरह रहेंगे।’ एआईएमआईएम प्रमुख के इस भाषण के बाद स्वाभाविक रूप से उठने वाले सवालों को इस्लामिक धर्मग्रंथ में इस शब्द के स्पष्ट अर्थ और संदर्भ को देखते हुए हेरफेर करना आसान नहीं है। क्या ओवेसी का मतलब यह है कि वह और भारत में जिन मुस्लिमों का वह नेतृत्व करने का दावा करते हैं, वे देश में गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लड़ाई कर रहे हैं? क्या इसका मतलब यह है कि गाजी बनकर ओवैसी और उसके साथी गैर-मुस्लिमों, काफिरों, इस्लाम त्यागने वालों को मारना चाहते हैं या ऐसी उनपर हुक्म करने की इच्छा रखते हैं?
असदुद्दीन ओवैसी ने बलिदान और मौत को वरीयता देने की बात कही है, जैसे ही वो गाजी शब्द पर आए, वैसे ही ‘मैं’ की जगह ‘हम’ कहने लगे। इसका मतलब साफ है कि वो अन्य मुस्लिमों को भी गाजी बनने के लिए उकसा रहा है। ऐतिहासिक रूप से, मुहम्मद बिन कासिम, गजनी के महमूद, मुहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी, बाबर, औरंगजेब आदि इस्लामी अत्याचारियों को इस्लामिक हलकों में गाज़ियों के रूप में पहचाना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने भारत पर हमला किया, जोकि अनेकेश्वरवादियों और गैर-मुस्लिमों का देश है। उन्होंने यहाँ रहने वाले लोगों को लूटा और मार डाला, क्योंकि वे गैर-मुस्लिम थे। इस तरह से वे ग़ाज़ी कहलाने के योग्य हो गए। खुद को और अपने साथियों को ग़ाज़ी कहकर, असदुद्दीन ओवेसी यकीनन खुद को और उन्हें मानने वालों को इन गाजियों से जोड़ रहे हैं।

क्या इस क्लिप को पोस्ट करने के समय में कोई संदेश छिपा है?

AIMIM ने यह वीडियो क्लिप 7 अप्रैल को पोस्ट किया – हिंदू नव वर्ष से ठीक दो दिन पहले, जो 9 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि और गुड़ी पड़वा के साथ शुरू हुआ था। 17 अप्रैल को, देश राम नवमी मनाएगा – हिंदू देवता भगवान राम का जन्म उत्सव। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में उनके जन्मस्थान पर बने भव्य मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यह पहली राम नवमी होगी।
पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में रामनवमी जुलूसों और शोभा यात्राओं पर हमले हुए हैं। खास तौर पर 2022 और 2023 में, भारत में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने शांतिपूर्ण जुलूसों पर पथराव और हमले किए। इसके बाद कानूनी कार्रवाई में जब दंगाइयों के घरों को जमींदोज किया गया, तो ये खुद को पीड़ित दिखाने लगे। और अब रामनवमी से कुछ ही दिन पहले ओवैसी ने गाजियों वाली अपील की है।
इस साल 2024 की रामनवरी 17 अप्रैल को है, जो लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण के मतदान के लिए प्रचार का आखिरी दिन है। 19 अप्रैल को देश के 21 राज्यों के 102 लोकसभा सीटों पर मतदान होना है। अब तक के चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अपने विरोधियों पर भारी पड़ती दिख रही है। बीजेपी उम्मीदवार और हिंदू शेरनी माधवी लता हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी को चुनौती दे रही हैं और ओवैसी पर भारी पड़ती दिख रही हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी और एनडीए अजेय दिख रहे हैं, तो दूसरी तरफ हताश हो चुके विपक्ष को ये तक नहीं समझ आ रहा कि वो मोदी का सामना कैसे करें। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ओवैसी के इस वीडियो पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है। मूल लेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें(साभार)

‘Newslaundry’ वालो, जन्नत की टपरी पर 72 हूरों के साथ शराब कब बहाओगे?

                               'न्यूजलॉन्ड्री' ने वीर सावरकर के अपमान के लिए क्रिएट किया 'स्वर्ग का दृश्य'
जन्नत का दृश्य है, 130 फ़ीट की 72 हूरों के साथ वो लोग बैठे हुए हैं जिनकी इस्लाम में सबसे ज़्यादा इज्जत है, वो जन्नत में बहने वाली दारू की नदी में से दारू निकाल कर ‘दारू पर चर्चा’ कर रहे हैं। सबका मजाक बनाया जा रहा है। आतंकवाद पर चर्चा हो रही है, ‘सर तन से जुदा’ पर चर्चा हो रही है। क्या आपने कभी किसी यूट्यूब चैनल पर ऐसा ‘व्यंग्य’ वाला वीडियो देखा? नहीं देखा ना? हम पूरी बात समझेंगे, लेकिन पहले शुरू से शुरू करते हैं।

‘झबड़ा’ कहे जाने वाले अभिनंदन शेखरी कप्रोपगैंडा प्लेटफॉर्म Newslaundry एक वीडियो बनाता है। वीडियो में व्यंग्य के नाम पर हिन्दू देवी-देवताओं और पौराणिक किरदारों का मज़ाक बनाया जाता है। महान स्वतंत्रता सेनानी वीर विनायक दामोदर सावरकर का अपमान किया जाता है। शुरू में एक फालतू डिस्क्लेमर लगा दिया जाता है, जिसे व्यंग्य की शैली में रखने के चक्कर में उसकी ऐसी की तैसी कर दी गई है। जिस वीडियो की हम बात कर रहे, उसमें पत्रकार अतुल चौरसिया ने राम मंदिर पर प्रलाप किया है।

उस वीडियो में पत्रकार अमीश देवगन(News18) को ब्रह्मर्षि नारद की भूमिका में दिखाया गया है। साथ ही अंजना ओम कश्यप को एक साध्वी की वेशभूषा में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी प्राचीन शासक की वेशभूषा में दिखाया गया है। इस वीडियो में वीर सावरकर और अटल बिहारी वाजपेयी को भी दिखाया गया है। दिखाया गया है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के मौजूदा घटनाक्रम से दुःखी हैं।

संक्षेप में बताएँ तो इस वीडियो के जरिए जहाँ इस बात पर चिंता जताई गई है कि 500 वर्षों के संघर्ष और बलिदानों के बाद अवैध कब्जे से मुक्त हुई रामजन्मभूमि पर बन रहे मंदिर को मीडिया कवरेज क्यों मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल और कॉन्ग्रेस का बचाव किया गया है और उन्हें सीख दी गई है कि आगे क्या करना चाहिए। वीडियो में आज के भारत पर चिंता जताते हुए वीर सावरकर पर दोष मढ़ दिया गया है। यहाँ तक कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन को लेकर नेहरू ने डॉ प्रसाद को वहाँ न जाने की सलाह दी थी, उसका भी बचाव किया गया है।

अब वापस आते हैं डिस्क्लेमर पर। इसमें लिखा है, “यह बात समझ से परे है कि किसी मृत व्यक्ति की भावना को कैसे ठेस पहुँच सकती है, लेकिन अगर आत्मा ज़िंदा रहती है और आत्मा में भावनाएँ हैं तो हम नहीं चाहते कि उस आत्मा की भावनाओं को भी ठेस नहीं पहुँचाना सकते।” यहाँ बड़ी चालाकी से हिन्दू देवी-देवताओं, साधु-संतों और पौराणिक पात्रों पर टिप्पणियों को लेकर खुद को ही NOC सर्टिफिकेट दे दिया गया है। यानी, उनका कहना है कि वो हिन्दुओं की भावनाएँ आहत करेंगे और किसी को विरोध करने का अधिकार नहीं है।

                                ‘न्यूजलॉन्ड्री’ के डिस्क्लेमर में व्यंग्य के चक्कर में व्यंग्य की कर दी ऐसी ही तैसी

ठीक है, चलिए मान लेते हैं। किसी को आहत होने का अधिकार नहीं है। Newslaundry को पत्रकारिता का सबसे बड़ा झंडाबरदार भी मान लेते हैं। अतुल चौरसिया को श्रीलाल शुक्ल से भी अव्वल दर्जा का व्यंग्यकार का दर्जा दे देते हैं। तो क्या अब ‘न्यूजलॉन्ड्री’ के यूट्यूब चैनल पर स्वर्ग की जगह जन्नत का वीडियो आएगा, जिसमें हिन्दू धर्म नहीं बल्कि इस्लाम मजहब वाले जिनकी इबादत करते हैं, जिन्हें महापुरुष मानते हैं – उन्हें लेकर व्यंग्य किया जाएगा? क्या ये संभव है?

मान लीजिए, जन्नत का दृश्य है। वहाँ मुल्ले-मौलवी जमा हैं। कन्हैया लाल तेली और उमेश कोल्हे का ‘सर तन से जुदा’ किए जाने पर बहस हो रही है। जिस तरह अतुल चौरसिया ने इस वीडियो में धर्मराज युधिष्ठिर को लेकर व्यंग्य किया है, क्या वो इस्लाम के ____ को लेकर व्यंग्य कर सकता है? नूपुर शर्मा ने जब हदीथ से लेकर एक तथ्य का जिक्र कर दिया तो क्या हुआ ये बताने की ज़रूरत नहीं है। वो डेढ़ वर्षों से घर में कैद हैं, बाहर निकलती भी हैं तो काफी सुरक्षा व्यवस्था की ज़रूरत पड़ती है।

उसके बाद ‘सर तन से जुदा’ का सिलसिला चला, देश भर में भीड़ जुटा कर नारेबाजी हुई, इस बयान का समर्थन करने वालों पर हमले हुए, क़तर से लेकर अन्य इस्लामी मुल्कों से बयान दिलवाए गए और पूरे देश में डर का माहौल बना दिया गया। जब तथ्य कहने पर इतना सब कुछ हो गया, व्यंग्य पर क्या कुछ होगा ये सोच से भी परे है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास इसका उदाहरण मौजूद नहीं है। फ्रांस में एक ऐसे ही व्यंग्य के कारण कुछ ऐसा हो गया था जिसने पूरे यूरोप को हिला दिया था।

जनवरी 2015 में फ्रांस में ‘शार्ली हेब्दो’ पत्रिका के दफ्तर पर हमला बोल दिया गया। कारण – उसने पैगंबर मुहम्मद का कार्टून प्रकाशित किया था। पत्रिका के दफ्तर और एक सुपरमार्केट पर हुए हमलों में 17 लोग मारे गए। मृतकों में 5 कार्टूनिस्ट थे, इमारत के बाहर तैनात एक पुलिस अधिकारी थी। अगले दिन एक सुपरमार्ट पर हमला कर के एक कर्मचारी और 3 ग्राहकों को इन्हीं हमलावरों में मार डाला। अक्टूबर 2020 में फ्रांस में ही एक शिक्षक सैमुअल पैंटी को उनके ही छात्र ने मार डाला, क्योंकि उन्होंने क्लासरूम में ये कार्टून दिखाया था।

नूपुर शर्मा और ‘शार्ली हेब्दो’ वाली घटनाएँ सिर्फ एक उदाहरण हैं उस चीज का, जो सदियों से होता आ रहा है। अगर ‘न्यूजलॉन्ड्री’ की हिम्मत है तो वो इसी तरह का वीडियो बनाए। इस्लाम छोड़िए, ईसाई मजहब या जीसस क्राइस्ट को लेकर ही कोई व्यंग्य बना कर दिखाए। फरिश्तों, 72 हूरों और जन्नत में शराब की नदी पर क्या कभी ‘न्यूजलॉन्ड्री’ व्यंग्य बनाएगा? नहीं बनाएगा, क्योंकि इसका सारा डिस्क्लेमर सिर्फ हिन्दुओं के लिए है, अगर कहीं एक मुस्लिम भी नाराज़ हो गया तो ये मीडिया संस्थान बिना किसी व्यंग्य के माफीनामा जारी कर देगा।

‘न्यूजलॉन्ड्री’ ‘जन्नत में दारू की टपरी’ पर 72 हूरों के साथ चर्चा करते हुए मुल्ले-मौलवियों का भी वीडियो आएगा? अलकाय, ISIS, बोको हराम, तालिबान और जैश-ए-मुहम्मद द्वारा की जा रही हत्याओं पर चर्चा सुनने को मिलेगी? बिना किसी बात के ‘संविधान की हत्या’ का रट्टा मारने वाला अतुल चौरसिया सचमुच में हो रही हत्याओं पर कुछ बोलेगा? सचमुच की हत्याएँ, यानी जहाँ हथियार का इस्तेमाल किया जाता है, खून निकलता है, अस्पताल में पोस्टमॉर्टम होता है, परिवार वाले रोते हैं।

ये ‘संविधान की हत्या’ क्या होती है? ‘न्यूजलॉन्ड्री’ कहता है कि मीडिया मर गया है। क्या भारत भूमि के आराध्य श्रीराम से जुड़ी खबरें दिखाने की मनाही है संविधान में? कहाँ लिखा है, किसने लिखा है? संविधान में तो राम, सीता और लक्ष्मण के वन-गमन की तस्वीर अंकित है। राम-राज्य की अवधारणा तो महात्मा गाँधी की थी, जिनका इस वीडियो में इस्तेमाल वीर सावरकर को नीचा दिखाने के लिए किया गया है। वो वीर सावरकर, जिन्हें अंग्रेजी ने दो-दो आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई, कालापानी की कैद में कोल्हू में बैल की जगह जोता।

वहीं वीर सावरकर, जिनके बिना 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को हम अंग्रेजों के नज़रिए से साधारण ‘सिपाही विद्रोह’ ही समझ कर पढ़ रहे होंगे, रानी लक्ष्मीबाई और वीर कुँवर सिंह जैसे कई शूरवीर इतिहास के पन्नों में गुम रहते। इसीलिए, ‘न्यूजलॉन्ड्री’ ज़रा अपने डिस्क्लेमर के हिसाब से चलते हुए कभी जन्नत की टपरी पर दारू पर चर्चा वाला भी वीडियो बनाए, उसमें इस्लाम मजहब में जिन लोगों का नाम तक लेने पर ‘सर तन से जुदा’ हो जाता है उन्हें लेकर व्यंग्य कर के दिखाए। क्या लगता है, होगा?

मुस्लिम कट्टरपंथियों का दोगलापन ! जिस बात पर नुपूर शर्मा को मिली ‘सर तन से जुदा’ की धमकी, उसी बात पर मुस्लिम महिला पत्रकार को कट्टरपंथी दे रहे ताली

                                                           नुपूर शर्मा और इरेना अकबर
इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व पत्रकार इरेना अकबर ने 1 दिसंबर 2023 को पैगंबर मोहम्मद से जुड़े कुछ पोस्ट किए। एक ट्वीट में उसने एक मीम के जरिए ये दिखाने की कोशिश की कि एक तिलक लगाया साँवला शख्स पैगंबर मोहम्मद के निकाह पर सवाल उठाता है जिसका जवाब ‘गोरा’ मुस्लिम शांति से देता है और कहता है-

“हाँ, पैगंबर मोहम्मद ने निकाह किया था, लेकिन इससे न तो आयशा के अब्बा को दिक्कत थी, न आयशा के परिवार को, न उनके समुदाय को… यहाँ तक जो लोग हमेशा पैगंबर मोहम्मद पर हमले की फिराक में रहते थे, उन्हें भी इससे कोई दिक्कत नहीं थी।” इसके बाद तिलक लगाया शख्स और दो और लोग रोते हुए कहते दिखाए जाते हैं- “हमें परेशानी है।”

इस मीम को शेयर करते हुए इरेना ने लिखा- हाँ! अलहमदुलिल्लाह।

इरेना के पैगंबर मोहम्मद और आयशा के निकाह पर किए गए पोस्ट

इरेना अकबर को ट्विटर पर कुछ मुस्लिम लोगों को भी गलत ठहराते देखा गया जो दावा कर रहे थे कि निकाह के वक्त आयशा की उम्र 18 की थी। इरेना के अर्काइव ट्वीट में देख सकते हैं कि वो जोर देकर कहती हैं,
“नहीं, सीराह के प्रामाणिक स्रोतों के अनुसार, जब निकाह हुआ तब वह (आयशा) 9 वर्ष की थीं। कुछ ‘विद्वानों’ ने इस्लाम को त्रुटिपूर्ण पश्चिमी-उदारवादी-धर्मनिरपेक्ष-नारीवादी ढाँचे में ‘फिट’ करने के लिए उनकी उम्र को 18 वर्ष तक बढ़ाने का प्रयास किया। हमें इस्लाम से घृणा करने वालों को खुश करने के लिए तथ्यों को नहीं बदलना चाहिए। आयशा और उनके परिवार को निकाह से कोई समस्या नहीं थी। पैगंबर मोहम्मद के दुश्मन भी इस निकाह का इस्तेमाल करके उन्हें आसानी से निशाना बना सकते थे लेकिन उन लोगों ने भी ऐसा नहीं किया। यह केवल आजकल के इस्लाम से घृणा करने वाले वो लोग हैं जो इस बारे में बकवास करते रहते हैं। हमें इन सबपर शर्मिंदा होना बंद करना पड़ेगा।”

आगे इरेना ने अर्काइव ट्वीट में ‘द सील्ड नेक्टर’ जैसे सीराह स्रोतों का जिक्र किया। इसके बाद अपील की कि इस संबंध में मदीना की इस्लामिक यूनिवर्सिटी के स्कॉलरों की बातें सुनीं और पढ़ी जानी चाहिए।

इसके अलावा इरेना अकबर ने आयशा (आरए) की जीवनी संबंधी स्रोत भी पढ़ने को कहा और बताया कि उन्हें कैसे कम उम्र में बुद्धिमत्ता का तोहफा मिला था और वह बहुत प्रतिभाशाली थीं। इरेना ने मुस्लिम यूजर (जिसने उम्र 18 बताई थी) को जवाब देते हुए ये भी कहा, “हो सकता है कि आप किसी को खुश करने के लिए ऐसा नहीं कर रहे हो, लेकिन पूरे अदब के साथ बता रही हूँ आपका थ्रेड शादी को लेकर पश्चिमी-आधुनिक विचारों से उपजा है।”

नुपूर शर्मा के बात रखने पर हुआ था बवाल

इरेना अकबर ने आज जिस मुद्दे पर बात की है, उसी मुद्दे को कभी नुपूर शर्मा ने ऑन टीवी अपनी बात रखी थी, लेकिन ऑल्ट न्यूज वाले मोहम्मद जुबैर ने उनकी आधी वीडियो को शेयर किया और इस्लामी कट्टरपंथी इसे पैगंबर मोहम्मद का अपमान बताकर नुपूर शर्मा की जान लेने पर तुल गए।
उन्हें देश के कट्टरपंथियों से ही नहीं बल्कि दूसरे इस्लामी देशों तक से धमकियाँ आईं। विवाद इतना बढ़ा कि जिन लोगों ने नुपूर शर्मा का समर्थन किया उन्हें भी धमकियाँ दी गईं और कन्हैया लाल जैसों को तो मौत के घाट उतार दिया गया।

उस समय यही इरेना अकबर ने इस मुद्दे की आग को भड़काया था। उन लोगों के बारे में कट्टरपंथियों को बताया था जो इस मुद्दे पर बोल रहे थे। आज इरेना ने भी इसी मुद्दे पर अपनी बात रखी। लेकिन इस बार इस्लामी कट्टरपंथियों ने न कोई धमकी दी और न दी ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए।
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कट्टरपंथियों ने की इरेना की वाहवाही

उलटा इरेना के पोस्ट को समर्थन देते हुए कहा गया – हाँ बिलकुल सही बात हैं। ये सब पैगंबर मोहम्मद की इच्छा से थोड़ी था, वो तो वही कर रहे थे जो अल्लाह उनसे करवाना चाहता था।
एक यूजर ने कहा, “तुम्हें सलाम। ये एक महिला से सुनना वाकई काबिल-ए-तारीफ है। लिबरलिज्म और फेमिनिज्म वाली दुनिया में जब मुस्लिम पुरूष और महिलाओं को भटकाया जा रहा है तब आप इस बात को बिन शर्मिंदगीं के कह रहीं हैं।

‘यूरोप की संस्कृति के अनुकूल नहीं है इस्लाम’: जॉर्जिया मेलोनी, इटली की प्रधानमंत्री

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का पुराना बयान वायरल (चित्र साभार: Le Monde)
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का एक बयान इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। इसमें वो कह रही हैं कि इस्लाम यूरोपियन मूल्यों और संस्कृति के अनुकूल नहीं है। वो कह रही हैं कि इटली में इस्लाम को सऊदी अरब की फंडिंग के जरिए फैलाया जा रहा है और सऊदी अरब में शरिया कानून लागू है।

यही बयान मीडिया द्वारा भी रिपोर्ट किया गया, रिपोर्ट करने वालों में अधिकांश मीडिया संस्थान भारतीय हैं।

मीडिया चैनल ने यह दावा किया कि जॉर्जिया मेलोनी का यह बयान उनकी ‘द ब्रदर्स ऑफ़ इटली’ पार्टी द्वारा इटली में हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम के बाद आया है। इस कार्यक्रम में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और कारोबारी एलन मस्क भी शामिल हुए थे।

भारतीय मीडिया में WION, हिंदुस्तान टाइम्स, मिंट, NDTV और टाइम्स नाउ जैसे संस्थानों ने इसी दावे के साथ रिपोर्ट छापी। NDTV ने एक्स (पहले ट्विटर) पर किए गए एक ट्वीट के आधार पर मेलोनी के बयान को रिपोर्ट में लिखा और दावा किया कि यह बयान उन्होंने हाल ही में अपनी पार्टी के आयोजन में दिया था।

हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय मीडिया के किसी संस्थान में यह बयान बीते 24 घंटों में नहीं मिला। खोजबीन पर पता चला कि यह वीडियो सबसे पहले एक्स पर रेडियो जेनेवा नाम के एक हैंडल द्वारा डाला गया हो सकता है। हालाँकि, इसने भी यह दावा नहीं किया कि यह बयान अभी का है और उसने बयान की तारीख भी नहीं बताई।

हालाँकि, इस बयान से सम्बंधित शब्दों को सर्च करने पर जॉर्जिया का एक पाँच साल पुराना वीडियो मिला। इसका असली वीडियो जुलाई 2018 में यूट्यूब पर डाला गया था। इसे यूट्यूब पर एक न्यूज चैनल Alanews पर डाला गया था।

असली वीडियो में मेलोनी कहते हुए दिखती हैं, “साल्विनी कहते हैं कि इस्लाम संविधान के प्रतिकूल है। उनसे इस पर सफाई देने को कहिए। लेकिन मुझे लगता है इस्लाम हमारे मूल्यों और संस्कृति के अनुकूल नहीं है और इस्लामिक केन्द्रों में क्या होता है, इसका गवाह है। मैं इसका सामान्यीकरण नहीं कर रही, लेकिन हाँ प्रतिकूलता तो है।”

मेलोनी इस वीडियो में एक अन्य कंजर्वेटिव नेता मैटियो साल्विनी के बयान के बारे में बात कर रहीं थी। साल्विनी ने यह बयान कोलोन शहर में हुई यौन हिंसा और बर्लिन में हुए आतंकी हमलों के विषय में दिया था।


सऊदी अरब में 3 देवियों की मूर्ति-पूजा, आराधना को बढ़ावा देने पर बवाल: कुछ कह रहे – यही है अरब का असली इतिहास

                                        सऊदी अरब में मूर्ति पूजा पर विवाद (चित्र साभार: Twitter & PNG tree)
सऊदी अरब का सोशल मीडिया तीन प्राचीन अरबी देवियों की आराधना को बढ़ावा देने को लेकर बँट गया है। यह तीनों देवियाँ सऊदी अरब और आसपास के अरबी जगत में प्राचीन काल में पूजी जाती थीं। यह पूरा मामला सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान की राष्ट्रवाद और विरासत को बढ़ावा देने की विचारधारा से मेल खाता है।

इसी को लेकर एक्स (पहले ट्विटर) पर एक यूजर ने इन तीन में से एक देवी अल-उज्ज़ा की एक तस्वीर डाली है। इस तस्वीर में सऊदी अरब के म्यूजियम में अल उज्जा की मूर्ति को घेर कर कुछ लोग खड़े हैं। यूजर का कहना है कि सऊदी अरब के लोग अपने इतिहास से गहरे तौर पर जुड़े हैं चाहे वो मुस्लिम हों या नहीं लेकिन यह अरब का इतिहास है। इस यूजर ने सऊदी सरकार की तारीफ़ भी की। उसने लिखा कि सरकार प्राचीन सऊदी देवताओं का संरक्षण कर रही।

 इसी ट्वीट के बाद शुरू हुई बहस में कुछ यूजर्स ने बताया कि प्राचीन समय में पूरे अरब जगत में तीन देवियों की मान्यता थी। इनके नाम ‘अल्लत (Allat)’, ‘मनत (Manat)’ और ‘अल-उज्जा (Al-Uzza)’ थे। इसे सोशल मीडिया पर लोगों ने अरब जगत में महिला सशक्तीकरण के प्रतीक के तौर पर भी बताया। यह भी बताया गया कि इन देवियों के सम्मान में छोटी बच्चियों को दफनाया जाता था। तब अरबी समाज के लिए यह कोई शर्म की बात नहीं थी।

सऊदी अरब के कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सहवा (पुनर्जागरण) पर सऊदी के इस्लाम से पहले के इतिहास को तवज्जो ना देने और तीन देवियों की महत्ता को धुँधला करने का आरोप लगाया। सहवा, 1960 के बाद सऊदी अरब में आई इस्लामी राजनीतिक विचारधारा है। इसमें सऊदी समेत मिस्र जैसे अरब देशों के कई मुस्लिम बुद्धिजीवी शामिल थे।

सोशल मीडिया पर एक यूजर का कहना था कि सहवा ने सऊदी अरब का इतिहास लोगों के दिमाग से भुला दिया। इसने इतिहास, संस्कृति और विरासत से संबंधित बातों को भी तोड़ा-मरोड़ा। यूजर का कहना है कि अगर कुछ साल पहले तक आप इन देवियों की बात करते तो यह मूर्ति-पूजा और बहुदेववाद को बढ़ावा देना करार दिया जाता।

सऊदी अरब के सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड और अन्य इस्लामी बुद्धिजीवियों ने सहवा के दौरान सऊदी लोगों की शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। बाहरी लोगों को शरण देना सऊदी की एक बड़ी भूल थी।

सऊदी अरब के सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड और अन्य इस्लामी बुद्धिजीवियों ने सहवा के दौरान सऊदी लोगों की शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। बाहरी लोगों को शरण देना सऊदी की एक बड़ी भूल थी।

तीन देवियों के ऊपर छिड़ी इस बहस को कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सऊदी अरब में मूर्ति पूजा को जिन्दा करने की कोशिश बताया। वर्तमान समय में सऊदी अरब में मूर्ति पूजा नहीं होती क्योंकि यह एक इस्लामिक देश है और इस्लाम में मूर्ति (बुत) की पूजा की मनाही है।

कुछ कट्टरपंथी यूजर्स का कहना है कि सऊदी सरकार राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर इस्लामिक पहचान को दबा रही है। कुछ यूजर्स ने इसके लिए ‘हिंदुत्व’ और यहूदियों को दोषी ठहरा दिया। उनका कहना था कि यह हिंदुत्व और यहूदियों की साजिश है कि अरब जगत को सेक्यूलर और उदार बनाया जाए।

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बीते कुछ वर्षों से सहवा पर बंदिशें लगा रहे हैं और कट्टरपंथियों को हाशिये पर धकेल रहे हैं। उनके सत्ता का नियन्त्रण लेने के बाद सऊदी के समाज में तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं।

कथित ईशनिंदा के विरोध की आड़ में घाटी में अराजकता फैलाने वालों पर हमारी कड़ी नजर, इकट्ठा कर रहे हैं सबूत: जम्मू-कश्मीर डीजीपी

                                                                                                  साभार- वायरल वीडियो स्क्रीनशॉट
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में NIT (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) के छात्रों ने एक हिन्दू छात्र पर ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया था। उनका आरोप था कि छात्र ने सोशल मीडिया पर पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया है। प्रदर्शन के दौरान ‘लब्बैक या रसूल अल्लाह’ के नारे भी लगे थे और इस प्रदर्शन को पाकिस्तानी हैंडलों से भी हवा दी गई थी।

सवाल यह है कि समाचारों में उत्तेजक नारेबाजी करते उपद्रवियों के चेहरे साफ दिख रहे हैं,  जम्मू-कश्मीर पुलिस इनको कब गिरफ्तार करेगी? कब इनको समर्थन देने वालों पर कार्यवाही होगी? आखिर कश्मीर में हिन्दू कब तक प्रताड़ित होता रहेगा? यही हाल नूपुर शर्मा केस में भी हुआ, वीडियो को ट्वीस्ट करके भड़काने वाला जुबेर आज़ाद घूम रहा है और बेकसूर नूपुर गुमनामी की ज़िंदगी जी रही है, क्या इसी का नाम इंसाफ है? इस  मुद्दे पर समस्त हिन्दू संगठनों को राज्य एवं केंद्र सरकारों पर उपद्रवी लोगों पर कार्यवाही कर यह पूछे जब हमास सह-संस्थापक के बेटे ने यह बयान दिया था, उस समय क्यों चुप थे? इसलिए कि वह मुसलमान है? कोई छद्दम सेक्युलरिस्ट नहीं बोलेगा, सबके मुंह में दही जमी हुई है, कसूरवार हिन्दू लड़के को ही ठहराया जायेगा। इस हंगामे के पीछे छिपे षड्यंत्र की अति गंभीरता से जाँच बहुत जरुरी है।   

इसको लेकर जम्मू-कश्मीर के डीजीपी आरआर स्वैन का कहना है, “हमने सभी पहलुओं पर कानूनी कार्रवाई की है। मामले दर्ज कर लिए गए हैं और जाँच चल रही है। हम इस पर नजर रख रहे हैं और सबूत इकट्ठा कर रहे हैं। इस विरोध के बहाने कुछ और करने की कोशिश की जा रही है। उन पर भी हमारी नजर है और उनके खिलाफ भी सबूत इकट्ठा कर रहे हैं।”

डीजीपी ने कहा, “हमने तय किया है कि CrPC की धारा 144 के तहत सरसरी तौर पर एक कानून लाएँगे, जिसमें किसी किस्म का कंटेंट, मैसेज, वीडियो, ऑडियो… जिससे कम्युनल सेंसिटिविटी खत्म हो जाएगी या किसी को डराया जाएगा, धमकाया जाएगा… वो चाहे टेररिस्ट-सेपरेटिव्स की से हो या दहशत पंसद की तरफ से हो, ऐसे कंटेंट को पोस्ट करना कानून जुर्म हो जाएगा।”

उन्होंने आगे कहा, “पोस्ट करने वाले को जरूर हम कानून के दायरे में लाएँगे और उसको फॉर्वर्ड-शेयर करना भी कानूनन जुर्म हो जाएगा। कोई अगर ये कहे कि साब किसी ने इनोसेंटली मुझे भेज दिया, मैं क्या करूँ तो उसके जवाब में ये रहेगा कि साब अब आपको, आपके बगैर इजाजत के अगर किसी ने इस तरह के ऑब्जेक्शनेबल वीडियो, ऑडियो, मैसेज, टेक्स्ट भेजा तो आप नजदीकी थाने में जाकर कह सकते थे कि मैं नहीं चाहता था कि ये मैसेज मेरे फोन में आए। ये पता नहीं कि किसने और कहाँ से भेजा है।”

डीजीपी स्वैन ने कहा, “आप ये इन्फॉर्मेशन अपनी तरफ से थाने में दे दीजिएगा। इसके बाद आप क्रिमिनल लायब्लिटी के बाहर हो जाएँगे। लेकिन, अगर आप जानते हैं कि ये ये ऑडियो-वीडियो या टेक्स्ट माहौल को खराब करने वाले किसी टेटरिस्ट-सेपरेटिब्स नेटवर्क है या कोई ऐसा है जो दंगा-फसाद कराना चाहता है या पैगंबर साहब की इज्जत को ठेस पहुँचाने वाला काम करता है या कम्युनिली सेंसिटिव चीजों को पोस्ट करता है और आगे आप उसे फॉरवर्ड करते हो तो यह कानून जुर्म बन जाएगा।”

फिर खाली उसी बुनियाद पर कार्रवाई करने के लिए कानून हमें इजाजत देगी। हम उसको कोर्ट में पेश करेंगे और उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। यकीनन ऐसे लोगों को हम इंडेक्स करके रखेंगे ताकि उनको हर हालत में, हर स्टेज में उनको पता रहे कि उन्होंने ये गलत काम किया है। ऐसे करने से ही लोगों के मन भय पैदा होता है। क्योंकि कुछ चंद लोग इसका फायदा लेते हैं और अपनी रोटी सेंकते हैं।”

दरअसल, कॉलेज में 28 नवंबर 2023 को पैगंबर मोहम्मद के कथित अपमान को लेकर श्रीनगर के NIT में बवाल और प्रदर्शन हुआ था। इसके बाद पुलिस ने आरोपित छात्र के खिलाफ FIR दर्ज कर ली। साथ ही आरोपित को इंस्टिट्यूट से सस्पेंड करते हुए आने वाले सेमेस्टर के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

दरअसल, यहाँ पढ़ने वाले एक छात्र (जो हिंदू है) ने इस्लाम के नबी पैगंबर मोहम्मद के विरुद्ध आपत्तिजनक वीडियो अपने व्हाट्सएप स्टेस्ट्स और इंस्टाग्राम पर डाला था। इसके उलट हालाँकि सोशल मीडिया पर कई लोग उस वीडियो का स्क्रीनशॉट लगा कर यह दावा कर रहे हैं कि वो वीडियो हमास के संस्थापक के बेटे का है, खुद आरोपित लड़के ने अपनी ओर से कोई बात नहीं कही है।

सोशल मीडिया में आरोपित लड़के से संबंधित जिस स्क्रीनशॉट को शेयर किया जा रहा है, उसके अनुसार इस वीडियो में हमास संस्थापक का बेटा इस्लाम के बारे में कुछ बता रहा है। कट्टर मुस्लिमों ने इसे पैगंबर मोहम्मद की आपत्ति से जोड़ दिया, ईशनिंदा का आरोप लगा दिया। ऊपर के सोशल मीडिया पोस्ट में आरोपित लड़के और उसकी मुस्लिम गर्लफ्रेंड के बारे में भी लिखा गया है। नेटिजन्स इस पर भी बात कर रहे हैं कि स्थानीय कट्टर मुस्लिम भीड़ को इस बात से दिक्कत है कि एक हिंदू लड़के की गर्लफ्रेंड मुस्लिम क्यों?

अवलोकन करें:-

जिस हसन के वीडियो पर ‘पैगंबर मोहम्मद का अपमान’, उसने बोला – मार दो मेरे अब्बा को: NIT श्रीनगर में कट

ईशनिंदा की बात सुन कट्टर मुस्लिमों की भीड़ जुट गई। कुछ ही देर में इस वीडियो को ईशनिंदा बताते हुए श्रीनगर NIT के तमाम मुस्लिम छात्र ‘लब्बैक या रसूल अल्लाह’ (रसूल अल्लाह हम तेरे लिए हाजिर हैं) का नारा लगाते हुए प्रदर्शन करने लगे।