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सीरिया में 2 दिन में 1000+ का कत्लेआम, हर तरफ बिखरी हैं लाशें: औरतों को नंगा कर सड़क पर घुमाया

                                               सीरिया में हर तरफ कत्लेआम (फोटो साभार: DNA)
सीरिया (Syria) में पिछले दो दिनों से खून की नदियाँ बह रही हैं। सीरिया के अपदस्थ राष्ट्रपति बशर अल-असद के समर्थकों और नई सरकार के सुरक्षा बलों के बीच हुई भयंकर झड़पों में 1,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इसमें करीब 750 आम लोग शामिल हैं, जो इस हिंसा की चपेट में आ गए।

ब्रिटेन के मानवाधिकार संगठन ‘सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स’ ने शनिवार (9 मार्च 2025) को ये चौंकाने वाला आँकड़ा जारी किया। संगठन का कहना है कि ये पिछले 14 साल से चल रहे सीरिया के गृहयुद्ध में सबसे खतरनाक घटनाओं में से एक है। इसमें 745 नागरिकों के अलावा 125 सरकारी सैनिक और असद के वफादार 148 लड़ाके भी मारे गए हैं। ये हिंसा गुरुवार (6 मार्च 2025) से शुरू हुई और अब तक थमने का नाम नहीं ले रही।

फिर से क्यों सुलग रहा है सीरिया

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये सब तब शुरू हुआ जब गुरुवार (6 मार्च 2025) को तटीय शहर जबलेह के पास सुरक्षा बल एक भगौड़े अपराधी को पकड़ने पहुँचे, लेकिन इस दौरान उन पर कथित तौर पर असद के समर्थकों ने घात लगाकर हमला कर दिया। इसके बाद हालात बेकाबू हो गए। नई सरकार का कहना है कि वो असद के बचे हुए लड़ाकों के हमलों का जवाब दे रही है, लेकिन शुक्रवार से ये झड़पें बदले की कार्रवाई में बदल गईं। सरकार से वफादार सुन्नी मुस्लिम हमलावरों ने असद के अलावी समुदाय के लोगों पर हमले शुरू कर दिए।
अलावी समुदाय लंबे वक्त से असद का समर्थन करता रहा है। इस हिंसा ने नई सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है, जो तीन महीने पहले ही असद को हटाकर सत्ता में आई थी।

बदले की आग में जल रहा सीरिया

शुक्रवार (7 मार्च 2025) को हालात तब और खराब हो गए, जब सुन्नी लड़ाकों ने अलावी गाँवों और कस्बों में घुसकर लोगों को निशाना बनाना शुरू किया। अलावी समुदाय के ज्यादातर पुरुषों को सड़कों पर या उनके घरों के बाहर ही गोली मार दी गई। कई जगहों पर घरों को लूटा गया और फिर आग के हवाले कर दिया गया। महिलाओं को नंगा करके सड़क पर घुमाया गया।
बनियास जैसे शहरों में हालात इतने खराब हैं कि सड़कों पर शव बिखरे पड़े हैं। वहाँ के लोगों का कहना है कि छतों पर भी लाशें पड़ी हैं, लेकिन उन्हें उठाने की इजाजत तक नहीं दी जा रही। बनियास से अपने परिवार के साथ भागे 57 साल के अली शेहा ने बताया कि उनके इलाके में कम से कम 20 लोग मारे गए। कुछ को उनकी दुकानों में, तो कुछ को घरों में गोली मारी गई।
अली ने कहा, “हालात बहुत डरावने थे। हमलावर हमारे अपार्टमेंट से सिर्फ 100 मीटर दूर थे और अंधाधुंध गोलियाँ चला रहे थे।” उन्होंने ये भी बताया कि हमलावर लोगों से उनकी आईडी माँगते थे, उनका मजहब और संप्रदाय चेक करते थे, फिर उन्हें मार देते थे। कई घरों को जलाया गया, गाड़ियाँ लूटी गईं और संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। अली का कहना है कि ये हमले असद की सरकार के पुराने अपराधों का बदला लेने के लिए किए जा रहे हैं। कुछ लोगों ने ये भी कहा कि हमलावरों में विदेशी लड़ाके और आसपास के गाँवों से आए आतंकी शामिल थे।

लताकिया में बुनियादी सुविधाएँ ठप

इस हिंसा का असर सिर्फ जानमाल तक सीमित नहीं है। तटीय शहर लताकिया के बड़े इलाकों में बिजली और पानी की सप्लाई बंद हो गई है। कई बेकरी बंद हो चुकी हैं, जिससे लोगों को खाने-पीने की चीजों के लिए भी जूझना पड़ रहा है। लोग डर के मारे पहाड़ों की ओर भाग रहे हैं। बनियास के एक शख्स ने बताया कि उनके 5 पड़ोसियों को शुक्रवार को करीब से गोली मारी गई, लेकिन घंटों तक कोई उनके शवों को हटा नहीं सका। हमलावरों ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। साफ है कि ये हिंसा अब सिर्फ लड़ाई नहीं, बल्कि एक समुदाय के खिलाफ नफरत का रूप ले चुकी है।

हयात तहरीर अल-शाम के लिए मुसीबत

ये हिंसा उस गुट ‘हयात तहरीर अल-शाम’ (HTS) के लिए बड़ा झटका है, जिसने असद को हटाकर सत्ता हासिल की थी। HTS के नेतृत्व में विद्रोही समूहों ने दमिश्क पर कब्जा किया था, लेकिन अब उनके सामने अपने ही देश को संभालने की चुनौती है। अलावी समुदाय के खिलाफ ये हमले सीरिया में गहरी धार्मिक और जातीय दरार को दिखाते हैं। अगर ये हालात काबू में नहीं आए, तो ये हिंसा और खतरनाक रूप ले सकती है।
सीरिया की सरकारी न्यूज एजेंसी ने रक्षा मंत्रालय के अधिकारी के हवाले से कहा कि सरकारी बलों ने ज्यादातर इलाकों पर फिर से कब्जा कर लिया है। तटीय इलाकों की ओर जाने वाली सड़कों को बंद कर दिया गया है, ताकि और हिंसा न हो और धीरे-धीरे हालात सामान्य किए जा सकें। शनिवार (8 मार्च 2025) को तुवायम गाँव में 31 लोगों की सामूहिक कब्र बनाई गई, जिनमें 9 बच्चे और 4 महिलाएँ शामिल थीं। इन लोगों को शुक्रवार की हिंसा में मारा गया था। वहीं, उत्तर-पश्चिम के अल-जनौदिया गाँव में चार सैनिकों का अंतिम संस्कार हुआ, जो तटीय इलाकों में मारे गए थे।
लेबनान के सांसद हैदर नासर ने बताया कि लोग डर के मारे सीरिया से लेबनान की ओर भाग रहे हैं। कुछ लोग रूस के ह्मेमिम एयरबेस पर शरण ले रहे हैं। नासर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अलावियों की सुरक्षा की माँग की। उनका कहना है कि असद के जाने के बाद कई अलावियों को नौकरी से निकाल दिया गया। यही नहीं, जिन सैनिकों ने नई सरकार से सुलह कर ली थी, उन्हें भी मार दिया गया। फ्रांस ने भी इस हिंसा पर गहरी चिंता जताई है। फ्रांसीसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वो धार्मिक आधार पर नागरिकों और कैदियों के खिलाफ अत्याचारों की कड़ी निंदा करता है। फ्रांस ने सीरिया की अंतरिम सरकार से माँग की है कि इन अपराधों की निष्पक्ष जाँच हो।
ये हिंसा नई सरकार के लिए एक बड़ा इम्तिहान है। असद के शासन के दौरान अलावी समुदाय सेना और सुरक्षा एजेंसियों में बड़े पदों पर रहा था। अब नई सरकार का कहना है कि असद के समर्थक पिछले कुछ हफ्तों से उनके सैनिकों पर हमले कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह ये हिंसा बदले की भावना में बदल गई है, उससे साफ है कि सीरिया में शांति अभी दूर की बात है।

इजरायल की ताबड़तोड़ कार्रवाई से डरा ईरान! सेफ हाउस भेजे गए आयतुल्ला अली खामेनेई: हिज्बुल्लाह चीफ से पहले हमास प्रमुख का भी ऐसे ही किया था खात्मा

                              ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खामेनेई (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को हिज्बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत के बाद सुरक्षा कारणों से सुरक्षित स्थान पर भेजा गया है। इजरायल के हवाई हमले में नसरल्लाह के मारे जाने की खबर के बाद, क्षेत्र में तनाव चरम पर है। ईरान हिज्बुल्लाह और अन्य सहयोगियों के साथ निकट संपर्क में है और इजरायल के खिलाफ रणनीति तैयार कर रहा है।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई ने इजरायल की क्रूरता की निंदा करते हुए कहा कि वह(ईरान) लेबनान के साथ खड़ा है। ईरान ने मुस्लिम देशों को इजरायल के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है। फिलहाल उन्हें सुरक्षित जगह पर भेजा जा चुका है। बता दें कि इजरायल ने ईरान की राजधानी में अपने सबसे बड़े दुश्मनों से एक हमास के चीफ इस्माइल हानिया को ढेर कर दिया था। ऐसे में ईरान को डर है कि कहीं इजरायल वैसा ही कदम न उठा ले। इस बीच, इजरायल में भी हाई अलर्ट जारी किया जा चुका है।

हिज्बुल्लाह प्रमुख की मौत के बाद लेबनान के प्रधानमंत्री नजीब मिकाती ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। इस बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, इजरायल के बढ़ते हमले और हिज्बुल्लाह के भविष्य को लेकर विचार-विमर्श हो रहा है। मिकाती ने कहा कि यह बैठक लेबनान की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।

ईरान और हिज्बुल्लाह के बीच संपर्क और भी गहरा हो गया है। ईरान ने हिज्बुल्लाह को सैन्य और रणनीतिक समर्थन देने की पुष्टि की है और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ाने वाली इजरायली गतिविधियों की आलोचना की है। नसरल्लाह की मौत के बाद, ईरान ने मुस्लिम देशों की बैठक (ओआईसी) बुलाने का प्रस्ताव रखा है, ताकि इस क्षेत्रीय संकट का हल निकाला जा सके।

इजरायल ने हिज्बुल्लाह के खिलाफ लगातार हवाई हमले किए हैं, जिससे लेबनान की राजधानी बेरूत में व्यापक विनाश हुआ है। इजरायली सेना का कहना है कि उन्होंने हिज्बुल्लाह के केंद्रीय ठिकाने पर हमला कर नसरल्लाह को खत्म कर दिया है, हालाँकि हिज्बुल्लाह ने अभी तक इस बारे में कोई बयान नहीं दिया है। इजरायल की इन कार्रवाइयों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। लेबनान ने ईरानी विमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसके बाद ईरान से आ रहे एक विमान को वापस लौटना पड़ा।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस संघर्ष को ‘आवश्यक’ बताते हुए कहा कि हिज्बुल्लाह और उसके समर्थकों से निपटना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और हिज्बुल्लाह के खिलाफ यह अभियान जारी रहेगा। वहीं, इजरायल ने नसरल्लाह को मारने के बाद हाई अलर्ट जारी किया है।

हिज्बुल्लाह और ईरान के ऐतिहासिक संबंध

ईरान और हिज्बुल्लाह के बीच लंबे समय से गहरे राजनीतिक और सैन्य संबंध हैं। नसरल्लाह की मौत के बाद, ईरान के नेता खामेनेई ने हिज्बुल्लाह को अपने समर्थन का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि इजरायल ने गाजा युद्ध से कोई सबक नहीं सीखा और यह मूर्खतापूर्ण रणनीति उसे ही नुकसान पहुँचाएगी। ईरान ने यह भी साफ कर दिया है कि वह लेबनान के साथ मजबूती से खड़ा है और इजरायल की क्रूरता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर करेगा।
ईरान ने इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) की आपात बैठक की माँग की है, ताकि मुस्लिम देशों के बीच एकजुटता बढ़ाई जा सके और इजरायल के खिलाफ सामूहिक रुख अपनाया जा सके। ईरान का यह कदम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अहम साबित हो सकता है।
नसरल्लाह की मौत के बाद, हिज्बुल्लाह के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। ईरान और हिज्बुल्लाह के सहयोगियों के बीच इस पर विचार किया जा रहा है कि अब अगला कदम क्या होगा। इजरायल के खिलाफ किसी बड़े जवाबी हमले की आशंका बनी हुई है, जिससे पूरे क्षेत्र में और ज्यादा हिंसा फैल सकती है।

ममता बनर्जी के MLA के सीने में धधक रहा ‘मुस्लिम राष्ट्र’, वही हर ताजेमुल के सीने में तालिबानी राज


पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर स्थित चोपरा में एक महिला और एक पुरुष की सरेआम पिटाई की गई। वहाँ एक बड़ी भीड़ जमा दी, जब ‘त्वरित न्याय’ हो रहा था तब चारों तरफ से देख रही भीड़ इसके मजे ले रही थी। ताजेमुल नाम का ‘न्यायाधीश’ हाथ में डंडा लेकर ‘न्याय’ कर रहा था। वीडियो वायरल होने के बाद देश भर में इसकी कितनी भी निंदा हुई हो, स्थानीय TMC विधायक हमीदुल रहमान ने ‘इस्लामी मुल्क के अचार-विचार’ का हवाला देते हुए इस घटना का बचाव किया और पीड़िता को ही ‘दुष्ट जानवर’ बता दिया।

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल CV आनंद बोस ने इस मामले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से रिपोर्ट तलब की है। उन्होने इसे एक बर्बर घटना करार दिया है। हिम्मत देखिए कि सत्ताधारी दल के विधायक को इस तक का भरोसा था कि उक्त महिला या उसके परिजन इस मामले में पुलिस तक नहीं जाएँगे, उन्होंने कह दिया कि सिर्फ मीडिया हल्ला मचा रहा है। इसका अर्थ है कि शरिया के अंतर्गत होने वाले इस न्याय से पीड़ित भी ‘संतुष्ट’ हैं, इसमें प्रशासन-न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

शरिया के सामने सरकार-कानून की कोई हैसियत नहीं

इसका दूसरा मतलब ये भी समझिए कि शरिया के कारण सब कोई खौफ में रहें और मुस्लिमों के लिए भारत सरकार, यहाँ की पुलिस या अदालतें सब ‘बाहरी ताकतें’ हैं। ताजेमुल पहले भी इस तरह के ‘न्याय’ कर चुका है। वीडियो में देखा जा सकता है कि उसने हाथ में बाँस से बनी छड़ी ले रखी है। उक्त महिला और पुरुष प्रेम संबंध में थे, इसीलिए उन्हें ये ‘सज़ा’ दी गई। ताजेमुल हक़ को गिरफ्तार कर के इस्लामपुर में ACJM की अदालत में पेश किया गया।

सचमुच पीड़िता की तरफ से कोई मामला नहीं दर्ज कराया गया, वीडियो देश भर में वायरल होने के बाद पुलिस ने ही स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज की। वैसे भी चुनावी हिंसा से पीड़ित भाजपा कार्यकर्ताओं की शिकायतों के साथ पुलिस क्या करती है, ये सबको पता है। उल्टे पीड़ित कार्यकर्ताओं को डराया-धमकाया जाता है, अतः उन्हें पलायन को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में पश्चिम बंगाल में इस्लामी ताकतों के खिलाफ FIR दर्ज कराने वालों को छोड़ दिया जाता, ये शायद ही संभव हो।

भाजपा भी कह रही है कि जंगलराज कैसा होता है, ये हम पश्चिम बंगाल में देख सकते हैं। पार्टी का कहना है कि ताजेमुल हक़ उर्फ़ JCB संविधान को टुकड़े-टुकड़े कर रहा है। ऐसे समय में जब कॉन्ग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन ने पूरा का पूरा चुनाव ही संविधान बचाने के नाम पर लड़ा हो, पश्चिम बंगाल में भारत के कानून को धता बता कर शरिया के तहत ‘सज़ा’ दिए जाने वाली घटना पर विपक्षी नेताओं की चुप्पी समझ में आती है। अगर वो कुछ बोलेंगे तो पता चल जाएगा कि कौन संविधान बदल रहा है।

सीरिया से लेकर तमिलनाडु तक, शरिया से शासन नई बात नहीं

ऐसा नहीं है कि शरिया अदालतों के उदाहरण हमारे पास नहीं हैं। हमने सीरिया में ISIS को देखा है कि वो कैसे अमेरिकी बंदियों को घुटने के बल बिठा कर उनका गला काट डालते हैं। हमने अफगानिस्तान में तालिबानियों को देखा है कि कैसे वो महिलाओं पर सरेआम कोड़े बरसाते हैं। हमने पाकिस्तान में देखा है कि कैसे ईशनिंदा के नाम पर किसी शख्स को ज़िंदा जला दिया जाता है। हमने बांग्लादेश में देखा है कैसे दुर्गा पूजा के पंडालों को ध्वस्त करते हुए भीड़ ‘काफिरों को सज़ा’ देने के लिए निकल पड़ती है।
और विदेश से उदाहरण क्यों लें? संविधान तो हमारे देश में भी बदला जा रहा है, शरिया चल रही है बहुत जगह। तमिलनाडु के तिरुचिरपल्ली स्थित श्रीरंगम के तिरुचेंदुराई में तो पूरे के पूरे गाँव पर ही वक्फ बोर्ड ने दावा कर दिया। गाँव में मंदिर भी था, उसको भी वो अपनी संपत्ति बताने लगे। कावेरी नदी के तट पर स्थित 1500 वर्ष पुराना सुंदरेश्वर मंदिर भी उनका हो गया, जिनका मजहब ही उतना पुराना नहीं है। सोचिए, कानून का ये लोग किस तरह दुरूपयोग करते हैं।
एक हिन्दू बेचारा जब अपनी जमीन बेचने चला तो प्रशासन से उसे एक नई बात पता चली – उसकी पूरी की पूरी 1.20 एकड़ जमीन वक्फ बोर्ड की है। उसे 20 पन्नों का दस्तावेज थमा दिया गया। तमिलनाडु का ही एक और उदाहरण लीजिए। पेरम्बलूर स्थित V कलाथुर गाँव में मुस्लिमों ने ‘अपने एरिया’ में हिन्दू शोभा यात्राओं पर ही प्रतिबंध लगा दिया। जहाँ वो बस गए, वो ‘उनका इलाका’ हो गया। वर्षों से ये वार्षिक त्योहार चला आ रहा था, लेकिन 2012 से मुस्लिमों को इससे आपत्ति हो गई और इसे बंद करा दिया गया।
मद्रास हाईकोर्ट को कहना पड़ा कि किसी खास क्षेत्र में कोई खास मजहब बहुलता में है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि दूसरे धर्मों को अपना त्योहार न बनाने दिया जाए या शोभा यात्रा न निकालने दिया जाए। उच्च न्यायालय को धार्मिक असहिष्णुता की बात करनी पड़ी। क्या आपने कभी ये खबर सुना है कि किसी हिन्दू बहुल इलाके में ईद, गुरुपर्व या क्रिसमस मनाने से रोका गया हो? आखिर एक ही वर्ग को बार-बार सहिष्णुता का पाठ क्यों पढ़ाना पड़ता है, जब नैरेटिव बनाया जाता है एकदम इसका उलटा।

इतिहास में भी शरिया के कारण हुआ हिन्दुओं का नरसंहार

ऐसा आज से नहीं हो रहा है भारत में भी, यानी ये कोई नई बात नहीं है। आपको केरल में मोपला मुस्लिमों द्वारा बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के नरसंहार वाला इतिहास पता होगा। ये हिन्दू समृद्ध थे, लेकिन उनका कत्लेआम हुआ, उनकी बहन-बेटियों का बलात्कार हुआ। उस दौरान केरल में ‘खिलाफत आंदोलन’ का एक नेता था वरियाकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी नाम का, जिसे स्वतंत्रता संग्राम का नायक बता कर पेश किया गया। जबकि वो शरिया कोर्ट चलाता था, कई गाँवों में इस्लामी नियम-कानून चलाता था।
यानी मोपला से लेकर चोपरा, तक – सोच वही है, समूह वही है और परिणाम वही हैं। ये वही पश्चिम बंगाल हैं, जहाँ की लगभग एक तिहाई जनसंख्या मुस्लिम हो चुकी है। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ बांग्लादेश और म्यांमार से बड़ी संख्या में घुसपैठिए लेकर बसाए जा रहे हैं। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ एक महिला विदेशी घुसपैठिया होने के बावजूद सरपंच बन जाती है। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ की सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते हैं।
ज़्यादा पीछे न जाएँ तो ये वही पश्चिम बंगाल है जहाँ बसीरहाट के संदेशखाली में शाहजहाँ शेख नाम का सत्ताधारी पार्टी का गुंडा अपने गुर्गों के साथ जनजातीय समाज की महिलाओं का यौन शोषण करता था। ये सब TMC के दफ्तर में किया जाता था। शाहजहाँ शेख का नाम राशन घोटाले में भी आया था, उसे गिरफ्तार करने गई ED टीम पर ही हमला कर के उसे भगा दिया गया। यही तो है ‘शरिया अदालत’, जहाँ पुलिस-प्रशासन या जाँच एजेंसियों का कोई काम नहीं।
और ज़्यादा पीछे भी चल ही लेते हैं। ये वही बंगाल है जिसका विभाजन ही मजहबी हिंसा की नींव पर हुआ था। 1946 के ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ में 10,000 से अधिक हिन्दुओं को मौत के मुँह में भेज दिया गया था। उस समय भी दंगाइयों को ‘मुस्लिम लीग’ के मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी का समर्थन प्राप्त था। चूँकि तब बंगाल में 54% मुस्लिम थे और 44% हिन्दू, बहुमत में आकर वो क्यों भला अपना अलग मुल्क न बनाएँ, ये तो उनके खून में है। मार-काट कर उन्होंने अपना एक अलग मुल्क ले लिया।
16-19 अगस्त, 1946 के ये दिन कलकत्ता के लिए कत्ल के दिन थे। 16 अगस्त को ही ‘मुस्लिम लीग’ ने पाकिस्तान के गठन के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया था। सुहरावर्दी पर आरोप लगा कि लालबाजार पुलिस थाने में जाकर उसने खुद ये सुनिश्चित किया कि दंगाइयों पर कार्रवाई न हो, पुलिस भी हिन्दुओं के खिलाफ हो। गोपाल पाठा जैसे वीर अगर उस वक्त इन दंगों के खिलाफ खड़े न होते और हिन्दुओं को प्रेरित न करते तो शायद आज बंगाल हिन्दूविहीन हो जाता।

माँ काली की भूमि को संतों ने सींचा, आज रामनवमी मनाना भी दूभर

थोड़ा और पीछे चलें, ताकि हम समझें कि पश्चिम बंगाल क्या से क्या हो गया। माँ काली की ये वही भूमि है जहाँ रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकाकंद का जन्म हुआ। ये वही भूमि है जहाँ 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु जैसे महान कृष्णभक्त का जन्म हुआ। श्री अरविन्द ने अपने हिन्दू दर्शन से जिस भूमि को समृद्ध किया, लाहिरी महाशय के चमत्कारों की चर्चा जहाँ गूँजी, जहाँ हरिचंद ठाकुर ने भेदभाव मिटाया, जहाँ स्वामी प्रणवानन्द जैसे योगी की कर्मभूमि रही।
आज स्थिति अलग है। घुसपैठ और हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल में आज रामनवमी जैसा त्योहार शांति से नहीं मनाया जा सकता। 2018 में रानीगंज, 2019 में आसनसोल, 2022 में शिवपुर और 2023 में हावड़ा के अलावा इस साल शक्तिपुर क्षेत्र में दंगे हुए। यानी, हिन्दू अपना त्योहार तक ठीक से नहीं बना सकते। शायद पश्चिम बंगाल में स्थिति अभी और भयंकर होने वाली है। हमीदुल रहमान जैसे लोग सत्ता में रहे तो कई ताजेमुल पैदा हो जाएँगे।
और भारत में जहाँ संविधान है, कानून है, यहाँ की पुलिस है, केंद्र-राज्य की सरकारें हैं और न्यायपालिका है – लेकिन इन सबके बावजूद वहाँ के विधायक बात करते हैं ‘इस्लामी मुल्क के अचार-विचार’ की बात करते हैं तो ये सवाल पूछा ही जाएगा कि क्या पश्चिम बंगाल इस्लामी मुल्क है? या फिर सत्ता में बैठे मुस्लिम ही एक और विभाजन का सपना देख रहे हैं। हर जगह इनकी सोच वही है, शिक्षा या सामाजिकता से ये बदलने वाली नहीं है – ये साबित हो चुका है।
अवलोकन करें:-
आतंकियों में डॉक्टर-इंजीनियर का पकड़ा जाना इसका उदाहरण है कि शिक्षा से इस्लामी सोच नहीं बदल सकती। जब संसद में शपथग्रहण के दौरान असदुद्दीन ओवैसी जैसे 5वीं बार सांसद चुने जाने के बावजूद ‘जय फिलिस्तीन’ कहते हैं तो हमें खिलाफत की बरबस ही याद आ जाती है। तुर्की में कौन खलीफा बैठे, इसका भारत से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन इसके बावजूद खून हिन्दुओं का बहाया गया। इस सोच से लड़ने की रणनीति क्या है, इसमें हर तरफ कन्फ्यूजन ही है, सैकड़ों वर्षों से यही संशय का माहौल हमारी भूमि को खंडित करता रहा है।

सऊदी अरब में 3 देवियों की मूर्ति-पूजा, आराधना को बढ़ावा देने पर बवाल: कुछ कह रहे – यही है अरब का असली इतिहास

                                        सऊदी अरब में मूर्ति पूजा पर विवाद (चित्र साभार: Twitter & PNG tree)
सऊदी अरब का सोशल मीडिया तीन प्राचीन अरबी देवियों की आराधना को बढ़ावा देने को लेकर बँट गया है। यह तीनों देवियाँ सऊदी अरब और आसपास के अरबी जगत में प्राचीन काल में पूजी जाती थीं। यह पूरा मामला सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान की राष्ट्रवाद और विरासत को बढ़ावा देने की विचारधारा से मेल खाता है।

इसी को लेकर एक्स (पहले ट्विटर) पर एक यूजर ने इन तीन में से एक देवी अल-उज्ज़ा की एक तस्वीर डाली है। इस तस्वीर में सऊदी अरब के म्यूजियम में अल उज्जा की मूर्ति को घेर कर कुछ लोग खड़े हैं। यूजर का कहना है कि सऊदी अरब के लोग अपने इतिहास से गहरे तौर पर जुड़े हैं चाहे वो मुस्लिम हों या नहीं लेकिन यह अरब का इतिहास है। इस यूजर ने सऊदी सरकार की तारीफ़ भी की। उसने लिखा कि सरकार प्राचीन सऊदी देवताओं का संरक्षण कर रही।

 इसी ट्वीट के बाद शुरू हुई बहस में कुछ यूजर्स ने बताया कि प्राचीन समय में पूरे अरब जगत में तीन देवियों की मान्यता थी। इनके नाम ‘अल्लत (Allat)’, ‘मनत (Manat)’ और ‘अल-उज्जा (Al-Uzza)’ थे। इसे सोशल मीडिया पर लोगों ने अरब जगत में महिला सशक्तीकरण के प्रतीक के तौर पर भी बताया। यह भी बताया गया कि इन देवियों के सम्मान में छोटी बच्चियों को दफनाया जाता था। तब अरबी समाज के लिए यह कोई शर्म की बात नहीं थी।

सऊदी अरब के कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सहवा (पुनर्जागरण) पर सऊदी के इस्लाम से पहले के इतिहास को तवज्जो ना देने और तीन देवियों की महत्ता को धुँधला करने का आरोप लगाया। सहवा, 1960 के बाद सऊदी अरब में आई इस्लामी राजनीतिक विचारधारा है। इसमें सऊदी समेत मिस्र जैसे अरब देशों के कई मुस्लिम बुद्धिजीवी शामिल थे।

सोशल मीडिया पर एक यूजर का कहना था कि सहवा ने सऊदी अरब का इतिहास लोगों के दिमाग से भुला दिया। इसने इतिहास, संस्कृति और विरासत से संबंधित बातों को भी तोड़ा-मरोड़ा। यूजर का कहना है कि अगर कुछ साल पहले तक आप इन देवियों की बात करते तो यह मूर्ति-पूजा और बहुदेववाद को बढ़ावा देना करार दिया जाता।

सऊदी अरब के सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड और अन्य इस्लामी बुद्धिजीवियों ने सहवा के दौरान सऊदी लोगों की शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। बाहरी लोगों को शरण देना सऊदी की एक बड़ी भूल थी।

सऊदी अरब के सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड और अन्य इस्लामी बुद्धिजीवियों ने सहवा के दौरान सऊदी लोगों की शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। बाहरी लोगों को शरण देना सऊदी की एक बड़ी भूल थी।

तीन देवियों के ऊपर छिड़ी इस बहस को कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सऊदी अरब में मूर्ति पूजा को जिन्दा करने की कोशिश बताया। वर्तमान समय में सऊदी अरब में मूर्ति पूजा नहीं होती क्योंकि यह एक इस्लामिक देश है और इस्लाम में मूर्ति (बुत) की पूजा की मनाही है।

कुछ कट्टरपंथी यूजर्स का कहना है कि सऊदी सरकार राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर इस्लामिक पहचान को दबा रही है। कुछ यूजर्स ने इसके लिए ‘हिंदुत्व’ और यहूदियों को दोषी ठहरा दिया। उनका कहना था कि यह हिंदुत्व और यहूदियों की साजिश है कि अरब जगत को सेक्यूलर और उदार बनाया जाए।

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बीते कुछ वर्षों से सहवा पर बंदिशें लगा रहे हैं और कट्टरपंथियों को हाशिये पर धकेल रहे हैं। उनके सत्ता का नियन्त्रण लेने के बाद सऊदी के समाज में तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं।

स्वीडन, डेनमार्क के बाद अब बांग्लादेश में जलाई गई कुरान की 45 पुस्तकें

                                          बांग्लादेश में कुरान जलाने पर हुआ प्रदर्शन((फोटो साभार: Wion)
स्वीडन और डेनमार्क के बाद अब इस्लामिक देश बांग्लादेश में कुरान की दर्जनों प्रतियाँ जलाई गईं। नुरूर रहमान और महबूब आलम नामक दो व्यक्तियों ने मिलकर इस घटना को अंजाम दिया। इसकी जानकारी सामने आने के बाद करीब 10 हजार लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। साथ ही दोनों आरोपितों को मारने की कोशिश की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुरान जलाने के आरोप में बांग्लादेश के पूर्वोत्तर शहर सिलहट से पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया। आरोपितों की पहचान स्कूल के प्रिंसिपल नुरूर रहमान और उसके सहयोगी महबूब आलम नामक के रूप में हुई। आरोपितों का कहना है कि कुरान की प्रतियाँ बहुत पुरानी और कुछ में प्रिंटिंग मिस्टेक थी। इसलिए उन्होंने उनमें आग लगा दी। पुलिस ने दोनों के पास से कुरान की जली हुई 45 प्रतियाँ जब्त की हैं।

एएफपी ने पुलिस अधिकारी अजबहार अली शेख के हवाले से कहा है कि रविवार से लेकर सोमवार रात (6-7 अगस्त 2023) तक कुरान जलाने के विरोध में 10 हजार लोग प्रदर्शन कर रहे थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रबर की गोलियाँ और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।

Wion ने ढाका ट्रिब्यून के हवाले से कहा है कि सिलहट मेट्रोपोलिटन पुलिस आयुक्त मोहम्मद एलियास शरीफ का कहना है कि कुरान जलाए जाने को लेकर स्कूल के शिक्षक, छात्र व क्षेत्र के अन्य लोग प्रिंसिपल व अन्य आरोपित से नाराज थे। इसलिए भीड़ ने दोनों को घेरकर पिटाई कर दी। हालाँकि बाद में पुलिस ने दोनों को बचा लिया। इस दौरान गुस्साई भीड़ ने पुलिस पर भी हमला किया। हमले में 14 पुलिसकर्मी घायल हो गए। पुलिस और इस्लामवादियों के बीच हुई झड़प में कुछ अन्य लोगों के घायल होने की भी खबर है। हालाँकि घायलों की संख्या की पुष्टि नहीं हुई।

बीते कुछ महीनों में यूरोपीय देश स्वीडन और डेनमार्क में कई बार कुरान जलाई गई है। कई इस्लामिक देश इसका विरोध करते हुए दोनों देशों की सरकारों से रोक लगाने व कार्रवाई करने की माँग कर चुके हैं। हालाँकि स्वीडन और डेनमार्क दोनों ही देशों का कहना है कि वह देश के कानून के चलते कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, स्वीडन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर मजबूत कानून है। इसके तहत ही लोग वहाँ कुरान जला रहे हैं।

सऊदी अरब : ‘अल्लाह-हु अकबर, क़यामत आने वाली है’: हैलोवीन पार्टियों में शैतान के वेश में मजे में घूमते दिखे शेख


कभी अपने कट्टर फैसलों और इस्लामी कानून के लिए दुनिया भर के मुस्लिमों का चहेता सऊदी अरब आज अपने ही कौम के लोगों की आँखों में खटकने लगा है । वजह भी कुछ ऐसी है जिससे मुसलमानों का चौकना स्वभाविक है । अपने रूढ़िवादी स्टैंड के लिए पहचाने जाने वाले इस देश में पश्चिमी देशों के वीभत्स त्यौहार हैलोवीन मनाया जा रहा है । दुनिया भर के मुस्लिम एक तरफ आश्चर्य और गुस्से में है, इसीलिए मुस्लिम समाज में सऊदी के इस कदम की चौतरफा आलोचना भी शुरू हो गई है।

दरअसल, मोहम्मद बिन सलमान के क्राउन प्रिंस बनने के बाद से ही सऊदी अरब अपनी मान्यताओं को लेकर काफी नरम हुआ है। ये बात और है कि कुछ साल पहले तक सऊदी अरब में ऐसे उत्सवों के बारे में सोचना भी किसी बड़े गुनाह से कम नहीं था।

वन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब वही देश है जहाँ 2018 में एक पार्टी में पुलिस ने छापा मार कर हैलोवीन मना रहे कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन आश्चर्य है कि वहाँ सार्वजनिक रूप से हैलोवीन मनाया जा रहा है। सऊदी सरकार ने इसकी अनुमति भी दी है। राजधानी रियाद के कई इलाकों में यह फेस्टिवल मनाया गया। इस दौरान सड़कों पर दूर-दूर तक शैतान के रूप में घूम रहे लोग नजर आए । हालाँकि लोगों को सऊदी सरकार का यह फैसला पसंद नहीं आ रहा है।

एक ट्विटर यूजर तैय्यब ने हैलोवीन पार्टी का वीडियो का शेयर करते हुए लिखा, ”रियाद (नजद) सऊदी अरब में हैलोवीन। अल्लाह हू अकबर । निश्चित ही कयामत के दिन आने वाले हैं।”

एक यूजर रमजान आइजोल ने ट्वीट कर कहा, “ये तस्वीरें रियाद में ली गई हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ‘सुधारवाद’ के नाम पर सऊदी अरब में हैलोवीन समारोह की अनुमति देना शुरू कर दिया है। यह सुधारवाद या नवाचार नहीं, बल्कि अपमान और पतन है। हम इसे स्वीकार नहीं करते हैं।”

एक यूजर डालिया जियादा ने कहा, “SaudiArabia और Egypt की ओर से हैलोवीन की शुभकामनाएँ। यह देखना वाकई दिलचस्प है कि इस तरह का विशुद्ध अमेरिकी हॉलिडे मध्य पूर्व के देशों से यहाँ आ गया और मनाया जा रहा है! संयुक्त राज्य अमेरिका अभी तक मध्य पूर्व से वापस नहीं आया है!”

तुर्की तक पहुँचा ईरान का हिजाब विरोधी प्रदर्शन : पूर्व राष्ट्रपति की बेटी गिरफ्तार

                       पूर्व राष्ट्रपति की बेटी फाजेह और तुर्की की गायिका मलेक (फोटो साभार: AFP/स्क्रीनशॉट)
हिजाब को उतार फेंक अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने वाली ईरान (Anti-Hijab Protest in Iran) की महिलाओं के खिलाफ वहाँ की इस्लामी सरकार बर्बरतापूर्वक व्यवहार कर रही है। हालाँकि, महिलाएँ भी किसी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं है और शरिया कानून का सार्वजनिक रूप से बहिष्कार कर रही हैं।

पूरे ईरान में जारी महिलाओं के प्रदर्शन के बीच वहाँ की पुलिस ने पूर्व राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफसंजानी (Ali Akbar Hashemi Rafsanjani) की बेटी फाजेह हाशमी (Faezeh Hashemi) को गिरफ्तार कर लिया है। फाजेह पर आरोप लगाया गया है कि वह ईरान की राजधानी तेहरान में महिला प्रदर्शनकारियों को उकसा रही हैं।

वहीं, हिजाब को लेकर ईरान की महिलाओं के समर्थन में तुर्की की प्रसिद्ध गायिका मलेक मोस्सो (Melek Mosso) ने एक स्टेज शो के दौरान सार्वजनिक रूप से अपने बाल को काट दिया। आज बाल मुस्लिम महिलाओं की आजादी का प्रतीक बन गया है।

हिजाब के खिलाफ संघर्ष में ईरान की महिलाओं को दुनिया भर से समर्थन मिल रहा है। इसमें समाज के उच्च तबके से लेकर निचले पायदान के लोग भी शामिल है। दुनिया भर के लोग अलग-अलग तरीकों से ईरानी महिलाओं के प्रति समर्थन जता रहे हैं।

पूर्व राष्ट्रपति की बेटी ईरान की नीतियों की आलोचक रही हैं। उन्हें साल 2009 में विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किया गया था। उसी साल उन्हें बेअदबी और सरकार के खिलाफ काम करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन पर पैगंबर मुहम्मद का अपमान करने का भी आरोप लगाया गया था।

हाशमी के पिता अली अकबर हाशमी रफसंजानी ईरान में इस्लामी शासन की स्थापना करने वाले लोगों में शामिल रहे हैं। वे ईरान के दो बार राष्ट्रपति रहे। अली अकबर की साल 2017 में निधन हो चुका है।

ईरान में 13 सितंबर 2022 को हिजाब न पहनने की वजह से महसा अमीनी को मोरल पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन्हेें पीट-पीट कर कोमा में पहुँचा दिया गया था। गिरफ्तारी के दिन बाद यानी 16 सितंबर को महसा की मौत हो गई थी। इसके बाद से ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए, जो कि सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण हिंसक होते चले गए।

ईरान के लगभग हर शहर में महिलाएँ मोरल पुलिसिंग और हिजाब कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर गई हैं। ईरान में महिलाएँ सरकार के लिए मुश्किल का सबसे बड़ा सबब बन गई हैं। न तो वो हिजाब पहनने को तैयार हैं और न ही बाल ढँकने को तैयार हैं। इसी तरह प्रदर्शन करने वाली एक युवती को वहाँ की पुलिस ने 6 गोलियाँ दाग दीं। उस युवती की मौत के बाद आंदोलन और उग्र हो गया है।

हिजाब विरोधी प्रदर्शन से ईरान में अब तक चार महिलाओं समेत करीब 76 लोगों की मौत हो चुकी है। प्रदर्शनों से घबराई इब्राहिम रईसी सरकार दमन पर उतारू है। कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा वाली सरकार ने कुछ दिन पहले ईरान में इंटरनेट भी बंद कर दिया था। इसके कारण वहाँ से काफी कम जानकारी सामने आ रही है।

इस्लामोफोबिया है तो हिंदुफोबिया भी है, दोहरा मापदंड स्वीकार नहीं: भारत ने UN में दी इस्लामी देशों को नसीहत

                 UN में तिरुमूर्ति और अफगानिस्तान में बुद्ध की प्रतिमा तोड़ते तालिबान (फोटो साभार: Panos)
धार्मिक घृणा को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) में भारत ने दुनिया के देशों द्वारा अपनाए जा रहे दोहरे मानदंड पर लताड़ लगाई है। भारत ने कहा कि ‘रिलीजियोफोबिया (Religiophobia)’ सिर्फ अब्राहमिक मजहबों (यहूदी, ईसाई और मुस्लिम) के लिए नहीं, बल्कि सभी धर्मों पर लागू होना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा, “रिलिजियोफोबिया केवल 1 या 2 धर्मों को शामिल करने वाला एक चयनात्मक अभ्यास नहीं होना चाहिए, बल्कि गैर-अब्राहम धर्मों के खिलाफ भी यह समान रूप से लागू होना चाहिए। धार्मिक भय पर दोहरे मानदंड नहीं हो सकते।”

तिरुमूर्ति ने कहा, “हमने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि धार्मिक भय का मुकाबला करना केवल एक या दो धर्मों को शामिल करने वाला एक चुनिंदा अभ्यास नहीं होना चाहिए, बल्कि गैर-अब्राहम धर्मों के खिलाफ भी समान रूप से लागू होना चाहिए। जब ​​तक ऐसा नहीं किया जाता, हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में कभी सफल नहीं हो सकेंगे।”

उन्होंने कहा कि भारत ने अब्राहिमक धर्मों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि सिख धर्म, बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म सहित सभी धर्मों के खिलाफ नफरत और हिंसा का मुकाबला करने के लिए लगातार कोशिश की है। दरअसल, तिरुमूर्ति हेट स्पीच (Hate Speech), गैर-भेदभाव और शांति के मूल कारणों को लेकर शिक्षा की भूमिका नाम से आयोजित अंतर्राष्ट्रीय दिवस की पहली वर्षगाँठ पर बोल रहे थे।

तिरुमूर्ति ने आगे कहा, “हम सहनशीलता और समावेश को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश करते हैं। किसी भी विचार में भिन्नता को कानूनी ढाँचे के भीतर हल किया जाना चाहिए।” बीजेपी के दो नेताओं की टिप्पणी को लेकर कई मुस्लिम देशों द्वारा दी गई प्रतिक्रिया के मामले में सलाह देते हुए उन्होंने कहा, “दूसरे देशों को विशेष बात को मसला बनाकर भारत को आक्रोश दिखाने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है।”

हिंदू-सिखों पर बढ़ते हमलों को लेकर उन्होंने कहा कि धार्मिक भय के रूपों को गुरुद्वारों, मठों और मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों पर हमलों में वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है। गैर-अब्राहमिक धर्मों के खिलाफ घृणा और दुष्प्रचार के प्रसार में वृद्धि इसका उदाहरण है।

अफगानिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कट्टरपंथियों द्वारा बामियान स्थित प्रतिष्ठित बुद्ध की मूर्ति को तोड़ना, गुरुद्वारे पर आतंकवादी हमला करना, हिंदू और बौद्ध मंदिरों का विनाश जैसे धार्मिक घृणा वाले कृत्यों की भी निंदा की जानी चाहिए।

अफगानिस्तान के काबुल में शनिवार (19 जून 2022) को गुरुद्वारा करते परवान पर आतंकी हमला किया गया, जिसमें दो लोगों के मौत हो गई है। वहीं, मार्च 2020 में अफगानिस्तान के ही एक गुरुद्वारे पर इस्लामिक आतंकियों ने हमला किया गया था, जिसमें 25 सिख मारे गए थे।

तिरुमूर्ति ने यह भी कहा कि भारतीय समाज की बहु-सांस्कृतिक ढाँचे ने सदियों से भारत को आश्रयदाता बनाया है। चाहे वह यहूदी समुदाय हो, पारसी समुदाय हो या पड़ोस का तिब्बती समुदाय, भारत ने सबको सुरक्षित शरण दिया है।

टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि भारत आतंकवाद, खासकर सीमा पार आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार रहा है। उन्होंने कहा कि सभी देशों को एक ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जो लोकतंत्र के सिद्धांतों को बढ़ावा देकर आतंकवाद का मुकाबला करने में सही अर्थों में योगदान दे सके।

दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस्लामोफोबिया का मुकाबला करने के लिए 15 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित करने के लिए इस साल के शुरू में एक प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव को पाकिस्तान द्वारा पेश किया गया था।

भारत ने सिर्फ धर्म के खिलाफ फोबिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाए जाने पर चिंता व्यक्त की थी। भारत ने कहा था कि धार्मिक भय के कई रूप आजकल बढ़ रहे हैं, जिनमें हिंदू विरोधी, बौद्ध विरोधी और सिख विरोधी फोबिया विशेष रूप से शामिल है।

तिरुमूर्ति ने तब कहा था कि भारत को उम्मीद है कि इससे चुनिंदा धर्मों के आधार पर फोबिया पर कई प्रस्तावों को जन्म देगा और संयुक्त राष्ट्र को धार्मिक में विभाजित करेगा। उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि केवल एक धर्म के बजाय संपूर्ण धार्मिक भय के प्रसार के रोक को स्वीकार किया जाए।

हिंदू धर्म के 1.2 अरब, बौद्ध धर्म के 53.5 करोड़ और सिख धर्म के 3 करोड़ से अधिक अनुयायी दुनिया भर में फैले हुए हैं। वहीं, दुनिया भर इस्लाम मानने लोगों की संख्या 1.8 अरब और ईसाइयों की संख्या 2.3 अरब है। यहूदियों की संख्या 1.52 करोड़ और पारसियों की संख्या लगभग 2 लाख है।