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यूँ ही सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार ने नहीं कहा- इससे पैदा होगी संवैधानिक अराजकता, राष्ट्रपति ने भी ‘डेडलाइन’ पर पूछे थे 14 सवाल


सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हुए विधेयकों की मंजूरी देने की डेडलाइन तय की थी। अब इस पर केंद्र सरकार ने गंभीर चेतावनी दी है। शीर्ष अदालत ने बीते अप्रैल में राष्ट्रपति द्वारा बिल की मंजूरी के लिए 3 महीने की समयसीमा तय की थी जिस पर सरकार ने ‘संवैधानिक अराजकता’ की स्थिति पैदा होने की चेतावनी दी है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं हैं। जिसके बाद खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को लेकर 14 गंभीर सवाल पूछे थे। कोर्ट ने इस पर सुनवाई से पहले केंद्र और राज्य सरकारों से अपना जवाब देने को कहा था।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ 19 अगस्त से इस मामले की सुनवाई करने वाली है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना लिखित जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि ऐसी समयसीमाएँ सरकार के एक अंग द्वारा उन शक्तियों का हड़पना होगा जो उसे नहीं दी गई हैं।

सरकार ने कहा कि इसके चलते शक्तियों का पृथक्करण बिगड़ जाएगा। सरकार ने चेतावनी दी कि इसके चलते ‘संवैधानिक अराजकता‘ की स्थिति पैदा होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने बयान में कहा, “अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी सर्वोच्च न्यायालय संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या या संविधान बनाने वालों की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकता। जब तक संविधान के लिखित नियमों में कोई तय प्रक्रिया मौजूद ना हो।”

मेहता ने कहा कि राज्यपाल की सहमति की प्रक्रिया लागू करने में कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि राज्यपाल जैसे ऊँचे पद को घटाकर एक छोटे या अधीनस्थ पद की तरह बना दिया जाए।

मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद अपने आप में ‘पूर्ण राजनीतिक’ पद हैं और ये लोकतांत्रिक शासन के ऊँचे आदर्शों के प्रतीक हैं। यानी इन्हें संपूर्ण राजनीतिक वैधता मिली हुई है। उन्होंने कहा कि अगर कभी इन पदों से जुड़ी कोई गड़बड़ी नजर आती है तो उसका समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए ना कि अदालत के जरूरत से ज्यादा दखल से।

सरकार ने आगे बताया कि अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वे किसी बिल पर विचार करने में पूरी स्वतंत्रता रखें और उन्हें किसी निश्चित समयसीमा का पालन करना जरूरी नहीं है। समयसीमा ना होना जान-बूझकर और सोच-समझकर संविधान में रखा गया एक विशेष नियम है।

संविधान में कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं बताई गई है जिससे बिना संविधान में बदलाव किए इन सीमाओं को लागू कर सके। संविधान में बदलाव करना केवल संसद की विशेष शक्ति है जो अनुच्छेद 368 के तहत ही किया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने पूछे थे 14 सवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से जुड़े कुछ अहम सवाल पूछे थे। इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ बनाई है।

राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास ये सवाल भेजे थे। अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को कानूनी और सार्वजनिक महत्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की इजाजत देता है।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था-

  1. जब राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत कोई बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या संवैधानिक विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं, या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

सुप्रीम कोर्ट का क्या था फैसला?

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने राज्यपाल RN रवि के उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को मंजूरी ना देने के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बीते अप्रैल में इस पर सुनवाई की। तमिलनाडु की सरकार की दलील थी कि राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा 2 बार पारित किए जाने के बावजूद विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लटका रखा है।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी और साथ ही राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।
राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लंबे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

जब कोई विधेयक संसद या विधानसभा में पास हो जाता है, तो इसे लागू करने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। ‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और कानून नहीं बनता।
राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।
राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।
दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्ञानी जैल सिंह ने उठाया था।
उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदाहरण था।

क्यों SC का फैसले बताया जा रहा न्यायिक दखल?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही न्यायिक दखल को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। संविधान से इतर जाकर देश के प्रमुख के ऊपर समयसीमा लगाने को लेकर कई कानूनविदों ने इस पर सवाल उठाए थे।
पूर्व उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की थी। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट के ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करने तक का दावा कर दिया था।
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि विधेयकों पर कार्यपालिका को समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के लिए कहना संविधान में ना तो दिया गया है और ना ही इसकी भावना निहित है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता राजन सिंह ने चेताया था कि ऐसे फैसलों से न्यायपालिका सरकार की कार्यप्रणाली में बहुत गहराई तक दखल कर सकती है और अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल से भविष्य में अप्रत्याशित परिणाम भी हो सकते हैं।
संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं, जैसा केंद्र सरकार ने भी अपने जवाब में बताया है। कुछ समय पहले की बात है जब चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
कानूनविद मानते हैं कि न्यायपालिका में जवाबदेही के अभाव के चलते ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जहाँ अधिक न्यायिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और अब कुछ दिनों में इस मामले की सुनवाई शुरू होगी तो देखना होगा कि कोर्ट अपने फैसले को लेकर क्या रुख रखता है।

दिल्ली : कांग्रेस द्वारा भारत के टुकड़े-टुकड़े करने वाले कन्हैया कुमार को लोक सभा टिकट देने पर कांग्रेस नेता ने ही किया नंगा, सारे पुराने पाप एक साथ लाया सामने: ‘सेना बलात्कारी’, ‘गरीबों को हटाओ’ वाले वीडियो किए शेयर

कांग्रेस लाख दुहाई दे कि नेहरू-गाँधी परिवार ने देश की आज़ादी में योगदान दिया, जो सफ़ेद झूठ है, जो वीर सावरकर पर ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगने का जो आरोप लगाकर बदनाम किया गया था, लेकिन कांग्रेस के इस पाखंड पर विश्वास करने बताओं कि 'अगर सावरकर ने माफ़ी मांगी थी, फिर काला पानी की सजा क्यों काटी?' कांग्रेस के प्रपंच का पर्दाफाश किया 'नवभारत' के एंकर सुशांत सिन्हा ने कि "माफ़ी सावरकर ने नहीं, जवाहर लाल नेहरू ने मांगी थी' और अब जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग के कन्हैया कुमार को लोक सभा का टिकट देकर साबित कर दिया कांग्रेस को देश की अखंडता नहीं बल्कि इसे खंडित करने की योजना है। जनता को कांग्रेस के इस पाखंड की कटु सच्चाई को समझना होगा।  

कांग्रेस पार्टी ने रविवार (14 अप्रैल 2024) को दिल्ली में अपने तीन प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की। कांग्रेस की ओर से दिल्ली की चाँदनी चौक सीट से जेपी अग्रवाल, उत्तर पूर्वी दिल्ली से टुकड़े-टुकड़े गैंग के कन्हैया कुमार, उत्तर पश्चिम दिल्ली से उदित राज को टिकट दिया गया है। इसमें सबसे चौंकाने वाला नाम उत्तर पूर्वी दिल्ली से कन्हैया कुमार का है। कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई के नेता रहे कन्हैया ने पिछला लोकसभा चुनाव सीपीआई के टिकट पर बिहार के बेगूसराय से लड़ा था, जो उनका गृहजिला है, लेकिन उसमें उन्हें करारी हार मिली थी। इस बार वो कांग्रेस के टिकट पर वहीं से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन आरजेडी ने खेल कर दिया। खैर, उत्तर-पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से जैसे ही कन्हैया कुमार के नाम का ऐलान हुआ, कांग्रेस के भीतर से ही कन्हैया का विरोध होने लगा। दिल्ली में कांग्रेस के नेता ने कन्हैया कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल किया है।

कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी के खिलाफ कांग्रेस के संगठन केकेसी-असंगठित कामगार एवं कर्मचारी कांग्रेस के प्रवक्ता सुभरांश कुमार राय हैं। उन्होंने कन्हैया कुमार के विवादित बयानों का वीडियो पोस्ट किया और कन्हैया कुमार का खुला विरोध किया। सुभरांश कुमार राय ने कन्हैया की उम्मीदवारी की घोषणा के बाद एक्स पर लिखा, “भारत तेरे टुकड़े होंगे? ये कहने वाला या नारेबाजी करती हुई भीड़ की साथ मौन रह कर खड़ा रहना दोनों अपराध है। और एक तरफ राहुल गाँधी न्याय की बात करते है, देश जोड़ने की बात करते है और दूसरी तरफ़ देश को तोड़ने वालों को टिकट? क्या CEC सच में है?”

सुभरांश कुमार राय ने कन्हैया कुमार की सेना को बलात्कारी कहने वाला वीडियो भी पोस्ट किया और अपना जबरदस्त विरोध दर्ज कराया। उन्होंने लिखा, “‘सेना कश्मीर में बलात्कार कर रही है’ -कन्हैया कुमार। जिस सेना ने कश्मीर को आज सही मायने में धरती का स्वर्ग बनाया है उसे ही गली? ये कैसा सम्मान है और कैसी न्याय का हक मिलने तक की बात हो रही है राहुल गाँधी जी? देश और देश रक्षक प्रथम।”

कांग्रेस नेता राय ने एक वीडियो भी रीट्वीट किया है, जिसमें कन्हैया कुमार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर चुटकी लेते दिख रहे हैं।

इस वीडियो में कन्हैया कुमार बोल रहे हैं, “श्रीमती इंदिरा जी ने कहा था कि ‘गरीबी हटाओ’। कुछ दिन में जब गरीबी नहीं हटा, तो कहा-‘गरीबों को भगाओ।'”

इस मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सुभरांश कुमार राय से संपर्क कर बातचीत की। उन्होंने कहा कि वो कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी है, जहाँ पर सभी को अपने विचार और बात रखने का हक है।” उन्होंने आगे कहा, ‘मैं ये नहीं कहता कि ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ कन्हैया कुमार ने कहा या नहीं कहा। इस बात से भी कोई मतलब नहीं है कि कोर्ट में ये केस पेंडिंग है, ऐसे लाखों केस अदालतों में पेंडिंग है। लेकिन आपने कहा या आप वहाँ परोक्ष रूप से मौजूद थे, उस समय अगर आपने प्रतिरोध नहीं किया, तो इसका मतलब आपका समर्थन ही है।

राय ने कहा, “जो हमसे हर बात से आजादी माँगता है, और टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करता है, मेरा उससे विरोध है।” सुभरांश कुमार ने बताया कि वो केकेसी के प्रवक्ता हैं और अन-ऑर्गनाइज सेक्टर में काम कर रहे लोगों के हक के लिए काम करते हैं। केकेसी के अध्यक्ष उदित राज हैं, उन्हें भी कांग्रेस ने टिकट दिया है। उन्होंने कहा कि ‘मैं सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखता हूँ। राहुल गाँधी जी भी यही बोलते हैं कि हमें डरना नहीं है।’

                           कॉन्ग्रेस नेता सुभरांश कुमार राय ने किया कन्हैया का तीखा विरोध

कन्हैया कुमार जेएनयू में छात्रसंघ अध्यक्ष के पद पर चुनाव जीतने के बाद रातों-रात चर्चा में आ गए थे। इस दौरान ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और ‘हम लेकर रहेंगे आजादी’ जैसे नारों से उनका नाम जुड़ा। इस लोकसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा है, जहाँ उनका मुकाबला बीजेपी के दो बार के सांसद और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष रहे भोजपुरी अभिनेता-गायक मनोज तिवारी से है। मनोज तिवारी मौजूदा सांसद भी हैं। उत्तर-पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में ही साल 2020 के हिंदू-विरोधी दंगे हुए थे, जिसमें हिंदुओं की काफी संपत्ति को नुकसान पहुँचा था और कई लोगों की जान गई थी। इस दौरान आईबी अधिकारी की भी हत्या कर दी गई थी। कन्हैया कुमार के साथी उमर खालिद भी इन दंगों का आरोपित है। वो अभी जेल में बंद है।

  • क्या वायरल : कन्हैया कुमार की एक फोटो नजर आ रही है, जिसमें उनकी गोद पर कोई महिला बैठी हुई है। दावा किया जा रहा है कि यह जेएनयू की शिक्षिका हैं
  • क्या सच : फोटो में नजर आ रही महिला जेएनयू की शिक्षिका नहीं बल्कि रिसर्च स्कॉलर है
  • फैक्ट चेक डेस्क. जेएनयू में फीस बढ़ोत्तरी को लेकर चल रहे विरोध के बीच कई फेक खबरें भी वायरल हो रही हैं। जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को भी बहुत सी खबरों में निशाना बनाया जा रहा है। अब कन्हैया कुमार की किसी महिला के साथ फोटो वायरल कर दी गई है। फोटो में महिला कन्हैया की गोद में बैठी नजर आ रही है। इन्हें जेएनयू की शिक्षिका बताया जा रहा है। दैनिक भास्कर मोबाइल ऐप के एक पाठक ने हमें यह फोटो सत्यता की पुष्टि के लिए भेजी। पड़ताल में पता चला कि यह महिला जेएनयू की शिक्षिका नहीं बल्कि कन्हैया कुमार की दोस्त हैं। 2016 में भी यह खबर वायरल हुई थी, तब कई मीडिया संस्थानों ने इसका सच बताया था। 
    • गूगल पर रिवर्स इमेज सर्च करने पर हमें डेक्कन क्रोनिकल में प्रकाशित एक आर्टिकल मिला। आर्टिकल में दी गई जानकारी के मुताबिक, फोटो में नजर आ रही
    • महिला जेएनयू की शिक्षिका नहीं, बल्कि कन्हैया कुमार की दोस्त सौम्या मणि त्रिपाठी हैं।
    • सर्चिंग में हमें जी न्यूज का भी एक आर्टिकल मिला, जो 2016 में प्रकाशित हुआ था। इसके मुताबिक, सौम्या जेएनयू की रिसर्च स्कॉलर रही हैं।
    • 5 मार्च 2016 को उन्होंने खुद ने यह फोटो अपने फेसबुक पर शेयर करते हुए लिखा था कि 'घर है, जहां आजादी है। वसंत जेएनयू में आ चुका है। तुम कुछ भी कर लो, हम लेकर रहेंगे आजादी।'
    • कन्हैया कुमार ने एक इंटरव्यू में खुद भी इस बात की पुष्टि की थी कि, फोटो में नजर आ रही महिला उनकी दोस्त है।

    • 2016 में इस फोटो के वायरल होने के बाद फैक्ट चेक करने वाली कई वेबसाइट्स ने इस खबर की सच्चाई सामने लाई थी।

‘बलिदान स्वीकार, धर्म का अपमान बर्दाश्त नहीं’: लोकेश मुनि; "क्या मुस्लिम देश मदनी की बात से सहमत हैं?"

इस अज्ञानी मौलाना अरशद मदनी ने जिस जहर को उगला है, उसके असर का अंजाम नहीं सोंचा। इतने जमावड़े में उनके चहिते मौलाना को उसी के मंच से चुनौती देना बहुत हिम्मत का काम नहीं, बल्कि इन जहरीले मौलानाओ को होश में आने का संकेत दे दिया गया है। यानि महंत धीरेन्द्र शास्त्री की बात कि 'हद में रहोगे, ठीक है..." अब यह प्रश्न खड़ा हो रहा है, "क्या मुस्लिम देश मदनी की बात से सहमत हैं? या मौलाना की जहरीली बात का समर्थन करते है?" समस्त मुस्लिम देशों को मौलाना से पूछना होगा कि किस आधार पर ॐ को अल्लाह बताया है?   

लोकेश मुनि ने कहा है वे बलिदान स्वीकार कर सकते हैं। लेकिन अपने सामने अपनी धर्म और संस्कृति का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते। जैन मुनि ने बताया है कि यही कारण है कि उन्होंने मौलाना अरशद महमूद मदनी के बयान का विरोध किया था। उन्हें शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी।

जैन मुनि ने इस घटना का एक वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा है, “मुझे अपनी शहादत मंजूर थी। मैं अपनी आँखों के सामने अपने धर्म, संस्कृति का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसलिए विरोध किया, शास्त्रार्थ की चुनौती दी।”

जैन मुनि ने रविवार (12 फरवरी 2023) को मदनी को जमीयत के मंच से ही चुनौती दी थी। जब वे मदनी का विरोध कर रहे थे, तब सामने मुस्लिम भीड़ मौजूद थी और मंच पर विभिन्न धर्मों के गुरु मौजूद थे। दिल्ली के रामलीला मैदान में जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अधिवेशन का रविवार को आखिरी दिन था। लोकेश मुनि के विरोध के बाद जैन और हिंदू धर्मगुरुओं ने जमीयत का मंच छोड़ दिया था।

इस्लामी संगठन जमीयत के प्रमुख मौलाना अरशद महमूद मदनी ने मनु, आदम तथा ॐ और अल्लाह को एक बताया था। इसको लेकर जैनाचार्य लोकेश मुनि ने मौलाना को लताड़ लगाते हुए मंच छोड़ दिया था।

मौलाना मदनी को लोकेश मुनि ने लगाई थी लताड़

मौलाना मदनी के बेतुके बयानों पर फटकार लगाते हुए जैन आचार्य लोकेश मुनि ने कहा था, “मदनी ने जो कहा है उससे कोई भी सहमत नहीं है। मैं आपसे निवेदन करता हूँ यदि हमें जोड़ने की बात आपको करनी है तो प्यार-मोहब्बत की बात कीजिए। आपने जितनी कहानी सुनाई है ओम, अल्लाह, मनु, ये वो उससे कहीं अधिक 4 गुना कहानी मैं सुना सकता हूँ। मदनी साहब को मैं शास्त्रार्थ के लिए बुला रहा हूँ। आप दिल्ली आइए या मुझे सहारनुपर बुलाइए।”
उन्होंने मदनी की बातों का खण्डन करते हुए कहा है, “आपने जो बात कही मैं उससे सहमत नहीं हूँ। चारों धर्म के संत या कोई भी अन्य इससे सहमत नहीं हैं। हम केवल आपस मे मिल-जुलकर रहने को लेकर सहमत हैं। ये जो कहानी है ओम, मनु, अल्लाह, उसकी औलाद ये अब फालतू की बातें हैं। आपने सारा पलीता लगा दिया एकता के सद्भावना के सम्मेलन में।”

मनु, आदम तथा ओम और अल्लाह को बताया था एक

दरअसल, मौलाना अरशद मदनी ने जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के कार्यक्रम में कहा था, “मैंने धर्म गुरुओं से पूछा कि जब कोई नहीं था न श्रीराम थे, न ब्रह्मा थे और न शिव थे, जब कोई नहीं था तो मनु पूजते किसको थे। कोई कहता है कि शिव को पूजते थे। बहुत कम लोग ये बताते हैं कि मनु ओम को पूजते थे। ओम कौन है? बहुत से लोगों ने कहा कि उनका कोई रूप-रंग नहीं है। वो दुनिया में हर जगह हैं। अरे बाबा इन्हीं को तो हम अल्लाह कहते हैं। इन्हें ही आप ईश्वर कहते हैं।”
मौलाना ने आगे कहा है, “इन्हें ही तो हम अल्लाह, आप ईश्वर, फारसी बोलने वाले खुदा और अंग्रेजी बोलने वाले गॉड कहते हैं। इसका मतलब यह है कि मनु ही आदम थे। वह ओम यानी अल्लाह को पूजते थे। हजरत आदम जो नबी थे, सबसे पहले उन्हें भारत की धरती के भीतर उतारा। अगर चाहता तो आदम को अफ्रीका, अरब, रूस में उतार देता। वो भी जानते हैं, हम भी जानते हैं कि आदम को दुनिया में उतारने के लिए भारत की धरती को चुना गया।”
इस जीती जागती सच्चाई पर ध्यान आज तक किसी का क्यों नही जा पाया। इससे अधिक सनातन होने का प्रमाण क्या चाहिए? यह अत्यन्त ही दुर्लभ जानकारी है। जिसको लुप्त करने का प्रयास करने वाले सेक्युलर लोगों पर इतिहास की इस सच्चाई का बडा तमाचा है।  इस छोटे से विडियो का किसी के पास उत्तर नहीं मिल सकता। विडिओ बनाने वाले शोध करता को नमन करते हैं और निवेदन करते हैं ऐसी और छुपी हुई सच्चाईयों को ढूंढें और सनातन विरोधी तत्वों की जुबान पर ताला लगाएं।
अवलोकन करें:-
मौलाना अरशद मदनी जब ॐ और अल्लाह एक, फिर अज़ान और नमाज में ॐ क्यों नहीं?
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मौलाना अरशद मदनी जब ॐ और अल्लाह एक, फिर अज़ान और नमाज में ॐ क्यों नहीं?
यही नहीं मौलाना ने संघ प्रमुख मोहन भागवत की घर वापसी वाले बयान मदनी ने कहा है कि इस्लाम भारत के लिए कोई नया मज़हब नहीं है। बल्कि अल्लाह ने पैगंबर आदम यानी मनु को यहीं उतारा, उनकी पत्नी हव्वा को उतारा, जिन्हें वे (हिंदू) हमवती कहते हैं और वे सारे नबियों, मुसलमानों, हिंदुओं, ईसाइयों के पूर्वज हैं।